काटो | आलोक रंजन की कहानी | हिंदी साहित्य | शब्दांकन

आलोक रंजन की कहानी काटो – शब्दांकन पर प्रकाशित हिंदी कथा

काटो

कहानी: आलोक रंजन

जैसे कस्बाई शहर के उस मुहल्ले का दिन जल्दी शुरू होकर वहीं अटक गया था। और तो और सूरज शहर की एकमात्र सिख बस्ती के ऊपर रुका लग रहा था। गुरिंदर के घर गर्मी बढ़ती ही जा रही थी। शहर में सिख भी रहते हैं—ऐसा बस कहा जा सकता है, वरना बाज़ार में, सड़कों पर, गलियों के रहस्यमय छोरों से आगे किसी भी अँधेरे में उनके चिह्न खोजने वालों को मुश्किल ही होती है। वे शहर के अल्पसंख्यकों से भी अल्प हैं। ज़्यादातर तो बहुसंख्यक हिंदुओं में ही घुले दिखते हैं।

गुरिंदर को सिखों के अलावा सबने गुरविंदर ही कहा, जैसे सबको पता हो कि गुरिंदर शब्द और कुछ नहीं, बस गुरविंदर का अपभ्रंश है। ये वही लोग हैं जिनकी हिंदी बाहर अशुद्ध मानी जाती है, जिनके श, ष और स के उच्चारण में कोई फ़र्क़ नहीं है और यही लोग लिंग पकड़कर नहीं बोलते! इनके यहाँ ‘सड़क जाता है’ और ‘पानी गंदी है’।

गली की आँख तेज़ आवाज़ से खुली थी। शायद गुरिंदर का बाप उस पर चिल्लाया हो। जो जाग गए, उन्हें सबसे पहले ख़बर हुई, फिर बहुतों को ख़बर देने के लिए ही जगाया गया। गुरिंदर तो ख़ैर ख़बर का हिस्सा ही था, लेकिन यह उसकी माँ थी, जिसका नए सत्य से पहला सामना हुआ था। वह समझ नहीं पाई कि क्या करे—चीख़ पड़ी थी! उसकी देह में आगामी दहशत की कल्पना की लहर चली हो जैसे।

चीख़ से उसका पति जागा। वह बाहर आया, उसकी आँखों में नींद थी ही। समझ उसे कुछ आ नहीं रहा था। बस एक सवालिया शक्ल ही बना पाया, जैसे पूछ रहा हो—क्या हुआ! गुरिंदर को घर के भीतर घुसने की जल्दी थी। भीतर घुसकर उसने अपने साथ आई स्त्री को अपने कमरे में छोड़ा और बाहर से कुंडी लगा दी। उसे समझ नहीं आया कि बाप कुंडी बंद करने से चिल्लाया था या सारा माजरा समझ जाने से!

‘भेंच: ई की कित्ता?’

उठते ही कुल्ला करके चाय पीने वालों के लिए यह चिल्लाना अकेले गुरिंदर को पड़ने वाली आम डाँट जैसी नहीं लगी। उधर सिख पंजाबी कहाँ बोलते हैं। पूजा-पाठ करते हुए पंजाबी बोली जाती है। ऐसे में पंजाबी में डाँट! एक-दो लोग भीतर गए और ख़बर लीक होनी शुरू हुई। फिर तो जैसे ख़बर ने तेज़ रफ़्तार पकड़ ली हो।

सब जान गए। ऐसा लग रहा था कि उस सुबह की तेज़ होती गर्मी में एकदम से बंद होने से पहले वाली हल्की हवा से डोल रहे पत्तों ने भी वह बात जान ली हो।

गुरिंदर किसी की औरत ले आया है… औरत अपने पति और दो बच्चों को छोड़कर भाग आई है!

यह एक रोमांचक बात थी। लोग अपने घरों से निकलकर यूँ ही जमा होने लगे। जिनके घरवालों ने उन्हें अब तक खैनी खाते और बीड़ी पीते नहीं देखा था, वे लौंडे भी आज पकड़े जाने की हद तक ढीठ होकर लिद्दर बड़े-बुज़ुर्गों के आसपास खड़े होकर पिच्च-पिच्च थूक रहे थे।

केवल जहाँ-तहाँ थूकी जा रही पीक ही नागवार बेचैनी पैदा नहीं कर रही थी, बल्कि भरे नाले की काली हो चुकी गीली मिट्टी पर रुके हुए मोटे पानी की गंध भी जान मारे दे रही थी। नाले और पानी की यह गंध उस शहर की गंध थी और उसी से पता चल सकता था कि दुर्गंध और ख़राब व्यवस्था में सारे मोहल्ले एक जैसे हैं। उस घिनौनी गंध में भी लोग डटे हुए थे। बात ही ऐसी दिलचस्प थी!

अब तो वे लोग भी आ गए, जिनकी गली के बाहर की सड़क पर झाड़ू लगाने की नौकरी है, जो झाड़ू लगाते हैं तो सड़क पर उठने वाला धूल का गुबार आसपास के घरों की सीमा में साधिकार घुस जाता है और यहाँ-वहाँ टिककर तब तक बना रहता है, जब तक कि झाड़ू मारकर उन्हें बाहर न निकाला जाए।

‘ये काले की औरत है।’

गुरिंदर ने यह सूचना उनको नहीं दी थी, जो उसके घर मरनी-हरनी में आते थे और आज भी आए थे। उसे अपने बाप को बताना था। उसका बाप काले को जानता था। काले का नाम सुनते ही उसका बाप तैश में आ गया। लोग बीच में न पड़ते तो बेटे पर हाथ चल जाना था उसका।

माँ अलग सुबक रही थी। बड़ी उमर की औरत ले आया हरामज़ादा। रसोई से कूड़े की पन्नी निकालकर सड़क किनारे फेंकना रह गया, रात के जूठे बर्तन धुलने से रह गए। एक गरम दमघोंटू गंध सब महसूस कर रहे थे।

गुरिंदर को दीवार की सीलन में बनती आकृतियों में अपने को पैबस्त कर देने का काम मिल गया था।

गुरिंदर का बाप काले को जानता था। आज से पहले तक यह पहचान सूद पर पैसा देने वाले और पैसा लेने वाले के संबंध के रूप में चिह्नित की जा सकती थी। काले अपने बालू-सीमेंट की दुकान पर माल लाने के लिए अक्सर पैसे सूद पर लेता था और लौटाता भी था। लेकिन छह महीने पहले लिए पाँच लाख रुपये लौटाने में देर होती गई। तक़ादा करने का काम बाप ने गुरिंदर को सौंप रखा था।

काले के यहाँ भी वही जाता था। किसी शाम काले के घर चाय पीते हुए उसने पहली बार काले की बीवी को देखा था। फिर तो वह उस वक़्त जाने लगा, जब काले घर पर न हो। यूँ मिलते-मिलाते उसकी बात बन गई। दोनों के बीच प्यार बाद में हुआ, जैसा इधर की शादियों में होता है।

‘साला हिंदुओं की औरत उठा लाया।’

बाप के इस वाक्य में क्रोध कम और दहशत अधिक थी। वहाँ मौजूद लोग जान रहे थे इस वाक्य का मतलब।

स्त्री और पुरुष के मिलने को सबसे खूबसूरत क्षण कहा जा सकता है, लेकिन साथ रहने के निर्णय पर अमल करने के क्षण से हसीन कुछ नहीं है। लेकिन इसे सबसे सुंदर समय कैसे कहा जा सकता था, जब बहुसंख्यक आबादी की एक औरत भगा लिए जाने की घटना हुई हो और इसके बाद की कल्पना में आने वाले दिनों की लंबी दहशत छिपी हो।

संख्या-बल का प्रभाव तो दिख ही रहा है हर तरफ़। कौन है जो अंजान है उस दहशत से? कोई नहीं। भीतर मौजूद लोगों में सलाह हुई कि अपने लोग बुला लिए जाएँ—वे लोग, जो मुश्किल में साथ देंगे, ख़ासकर सिख। यहाँ की सिख आबादी है ही कितनी। तो क्या हुआ! बीस किलोमीटर दूर ही तो दूसरा शहर है—वहाँ भी दसेक घर हैं सिखों के। वे आ सकते हैं, यदि फ़ोन से उन्हें बुलावा भेज दिया जाए।

बाहर सबके अपने-अपने अंदाज़े थे, लेकिन सब एक बात पर एकमत थे कि इससे बड़ा बवाल तो अब होगा। उस गली के इतिहास में दर्ज़ होने वाली एक घटना तो हो चुकी—अब प्रतिक्रिया में जो कुछ होगा, वे भी इतिहास में दर्ज़ होने लायक ही बड़े मयार का होगा।

एक अनिष्ट की संभावना-सी फैलती जा रही थी। सुबह वाली ख़बर की रोमांचक छुअन मिटती जा रही थी। बाहर जमा लोग धीरे-धीरे खिसकने लगे। बाप से छिपकर खैनी खाने वाले लौंडे दूसरी गली में बीड़ी पीने को निकल लिए।

किसी को काम पर जाना याद आ गया, तो किसी की बीवी ने बुला लिया। जिनकी पैदाइश पिछले पाँच-सात सालों में हुई हो, ऐसे बच्चों को छोड़कर गली के सभी निवासियों को फ़ौजी का घर घेर लिए जाने वाली वह घटना तो याद होगी ही।

उन दिनों यह इलाक़ा शहर की सीमा हुआ करता था। यहाँ से हाइवे पर चलती गाड़ियाँ साफ़ दिखती थीं। लोग छतों पर चढ़कर हाइवे से आती-जाती बारात की रौनक, मुहर्रम पर ‘रनखेत’ जाते ताज़ियों और जंगियों के झुंड को देखते थे।

हाइवे के पार का गाँव, जिसे अब शहर ने लील लिया है, तब एक गाँव ही था। उस गाँव के पशुपालक कभी-कभी अपनी भैंसें लेकर इधर आ जाते थे। भैंसें दीवारों की जड़ों में उग आई दूब चरतीं, किसी की छत से लटक रही घीये की बेल का पहुँच-भर का हिस्सा खा जातीं।

फ़ौजी उन दिनों गाँव आया हुआ था। किसी भैंस के बच्चे ने भीतर घुसकर उसकी भिंडी की फ़सल ख़राब कर दी। तैश में फ़ौजी ने पास खड़े पशुपालक को गालियाँ दे दीं। देखते ही देखते पचास-साठ लोगों ने फ़ौजी का घर घेर लिया और फ़ौजी की पिटाई कर दी।

उस दिन गली में किसी ने अपना दरवाज़ा नहीं खोला था। बाद में फ़ौजी ने शराब के नशे में गली वालों को ख़ूब गालियाँ सुनाईं। उसकी गालियों पर भी कोई नहीं बोला था। ऐसी गली के निवासी, जो मसाले की तलाश में आए थे, अब बरसाती पानी की तरह गायब हो चुके थे।

किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि मधेपुरा से आने वाले जत्थे में गुरजोत बुआ भी आएँगी। यदि लड़ाई होती है, तो उसमें वह क्या तो अपनी जान बचाएँगी और क्या ही किसी और की। उन्हें देखकर असगर वजाहत के नाटक ‘जिस लाहौर नहीं देख्या’ के रतन की माँ और रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानी ‘नमक’ की सिख बीवी के मिले-जुले रूप का आभास हो रहा था।

वे अपने जत्थे के साथ भीतर घुसीं और प्लास्टिक की कुर्सी में फँस गईं। उस तनाव भरे माहौल में अकेली आदमजात, जिसके चेहरे पर सुकून था। बुआ का सफ़ेद आँचल जैसे सब कुछ अपने में समेटकर भी शांत और निर्विकार रहने की मिसाल हो।

‘सुखपाल… क्या हो गया, लड़का औरत ले आया तो… यह तो खुशियाँ मनाने का वक़्त है।’

एक साथ सबने उनकी ओर देखा। गुरिंदर के बाप को उसके नाम से बुलाने वाली औरत अचानक से गुरिंदर को बहुत अच्छी लगी। इस मनहूसियत में एक ठंडी छाँव-सी।

‘बुआ, जब सबको डंडे पड़ेंगे और सब मारे जाएँगे, तब तुझे समझ आएगा कि इस लड़के के करने से क्या हो गया… वे लोग आते ही होंगे।’

‘कौन लोग?’

‘वही, जिसकी औरत ये भगा लाया है।’

‘बूढ़े हो गए, पर अक़्ल नहीं आई तुम्हें, सुखपाल सिंह… लड़ने वे जाते हैं, जिन्हें अपनी जीत की थोड़ी-सी भी आस हो। फिर जिसकी बीवी भाग गई, वह तो पहले ही हार गया… सुना है दो बच्चे भी हैं। अब वह बच्चे सँभाले या हँसेड़ी लेकर लड़ने आए!’

कहते-कहते बुआ ज़ोर से हँस पड़ीं। उस अकेली हँसी ने माहौल हल्का किया। ठक-बक से बैठे लोगों में हरकतें होने लगीं।

‘कुड़ी किथ्थे है?’

बुआ ने बड़ी मुश्किल से कुर्सी से अपना शरीर निकालते हुए पूछा, तो गुरिंदर ने अपने बंद कमरे का दरवाज़ा खोल दिया। उसके साथ आई स्त्री उसी तरह बैठी थी, जैसी वह बैठाकर गया था।

बुआ उसके पास जाकर बैठ गईं। सारे लोग दरवाज़े के इर्द-गिर्द जमा हो गए।

‘मेरी माँ एक कहावत बार-बार कहती थी—“कल्ला न जावीं खेत नूँ, किक्कर ’ते काटो रहंदी।” वह बात आज पूरी तरह समझ में आई, वरना तो मैं यही सोचती रहती कि बबूल के पेड़ पर गिलहरी ही तो है—उससे क्या डरना, और अकेले नहीं जाना…’

बुआ इतना बोलकर चुप हो गईं, जैसे इंतज़ार में हों कि लोग उनसे असली अर्थ पूछें। कोई कुछ नहीं बोला, तो ख़ुद ही बोल पड़ीं—

‘चालाक लोगों के पास अकेले नहीं जाना चाहिए। देखो, सुखपाल के पाँच लाख कैसे गँवा आया ये लाड़ला।’

‘हम चालाक नहीं हैं, बुआ…’

उस घर में पहली बार किसी ने उसकी आवाज़ सुनी।

‘हमें गुरविंदर से प्यार हुआ… उसे भी है। और आपके पाँच लाख तो इन जेवरों से निकल आएँगे, जो मेरे बाप ने दिए थे… ये लीजिए।’

कहते हुए जेवरों की थैली उसने सामने धर दी। लोग सकते में आ गए।

‘हमने प्यार में वह घर छोड़ा है… गुरविंदर से वह प्यार मिला, जिसकी ज़रूरत थी हमें… आप भी स्त्री हैं, यहाँ और भी औरतें हैं—आप जानते होंगे, घर में रहते हुए सबके बीच अकेले होने का दर्द…

आप सिर्फ़ काम किए जाएँ, पति आकर खाए और आपके ऊपर चढ़कर सो जाए, आप माँ की दो बात करने को तरस जाएँ—उसका दर्द समझते तो होंगे। हम आपके लड़के से ज़्यादा बड़े नहीं हैं, बस बड़े दिखने लगे हैं…

एक कोशिश की है प्यार पाने की। इसकी बड़ी क़ीमतें देनी होंगी हमें—हम जानते हैं। पर एक बात सीख गए कि कल को इधर भी वही हाल हो गया, तो यहाँ से निकलने में उतना वक़्त नहीं लेंगे!’

गुरिंदर की माँ भागकर आई और उससे लिपट गई। वहाँ मौजूद स्त्रियों की आँखें नम हुई जा रही थीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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कथ्य और संवेदना

आलोक रंजन की कहानी ‘काटो’ बाहरी घटना के आवरण में भीतर के डर की कहानी है। यह कथा बताती है कि समाज में घटने वाली घटनाएँ केवल बाहर नहीं रहतीं, वे व्यक्ति के मन और सामूहिक चेतना में उतरकर डर, आशंका और चुप्पी का रूप ले लेती हैं। कस्बाई जीवन की सघनता, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का तनाव और निजी प्रेम का सार्वजनिक हो जाना - इन सबके बीच कहानी की संवेदना पाठक को लगातार असहज करती चलती है। यही असहजता इस कथा की सबसे बड़ी ताक़त है।

कहानी के प्रमुख विषय

  • कस्बाई समाज और उसकी सामूहिक मानसिकता
  • प्रेम और सामाजिक भय का टकराव
  • अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक संबंधों की दहशत
  • अफ़वाह, भीड़ और हिंसा की संभावनाएँ
  • स्त्री की स्थिति और उसका मौन निर्णय
  • डर के भीतर पनपता हुआ सामाजिक अनुशासन

लेखक परिचय

सहरसा में जन्मे और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़े आलोक रंजन कई स्थानों को साथ लिए चलते हैं। उनकी कहानियों में उन स्थानों की सौंधी गंध है। उनके भीतर के यात्री और लेखक का अक्सर विलय होता है, जो उनकी कहानियों में दिखाई पड़ता है। उनके यात्रा-वृत्तांत ‘सियाहत’ को भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनका कथा-संग्रह ‘रोटी के चार हर्फ़’ लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित है। हाल ही में उनकी कहानी ‘तलईकूत्तल’ को ‘हंस कथा सम्मान’ मिला है। वे निरंतर हिंदी साहित्य की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं व अख़बारों में प्रकाशित होते रहे हैं। वर्तमान में नाहन में अध्यापन के साथ-साथ विद्यार्थियों का मनोविज्ञान समझने-बूझने का काम कर रहे हैं।

शब्दांकन की टिप्पणी

आलोक रंजन की कहानी ‘काटो’ पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि कहानी बाहर घटती है, लेकिन डर हमारे भीतर उतर आता है। कस्बाई जीवन के भीतर पलती दहशत, प्रेम और सामाजिक भय को यह कथा सधे हुए ढंग से सामने रखती है।

— भरत तिवारी
संपादक, शब्दांकन


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