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देख तमाशा लकड़ी — अंश 'काशी का अस्सी’ काशीनाथ सिंह | Kashinath Singh ki Kahani

देख तमाशा लकड़ी

अंश 'काशी का अस्सी’ काशीनाथ सिंह 

शब्दांकन के पाठक कम मानीखेज नही हैं कि उनके मान की चिंता करो। चलते जाओ। बढ़ो। 

काशीनाथ सिंह 
4.10.21 काशी 





'जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम्, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?'

देख तमाशा लकड़ी का

मित्रो, यह संस्मरण वयस्कों के लिए है, बच्चों और बूढ़ों के लिए नहीं; और उनके लिए भी नहीं जो यह नहीं जानते कि अस्सी और भाषा के बीच ननद-भौजाई और साली-बहनोई का रिश्ता है! जो भाषा में गन्दगी, गाली, अश्लीलता और जाने क्या-क्या देखते हैं और जिन्हें हमारे मुहल्ले के भाषाविद् ‘परम' (चूतिया का पर्याय) कहते हैं, वे भी कृपया इसे पढ़कर अपना दिल न दुखाएँ — 

तो, सबसे पहले इस मुहल्ले का मुख्तसर-सा बायोडॉटा-कमर में गमछा, कन्धे पर लँगोट और बदन पर जनेऊ-यह 'यूनिफॉर्म' है अस्सी का!

हालाँकि बम्बई-दिल्ली के चलते कपड़े-लत्ते की दुनिया में काफी प्रदूषण आ गया है। पैंटशर्ट, जीन्स, सफारी और भी जाने कैसी-कैसी हाई-फाई पोशाकें पहनने लगे हैं लोग! लेकिन तब, जब कहीं नौकरी या जजमानी पर मुहल्ले के बाहर जाना हो! वरना प्रदूषण ने जनेऊ या लँगोट का चाहे जो बिगाड़ा हो, गमछा अपनी जगह अडिग है!

'हर हर महादेव' के साथ 'भोंसड़ी के' नारा इसका सार्वजनिक अभिवादन है! चाहे होली का कवि-सम्मेलन हो, चाहे कर्फ्यू खुलने के बाद पी.ए.सी. और एस.एस.पी. की गाड़ी, चाहे कोई मन्त्री हो, चाहे गधे को दौड़ाता नंग-धडंग बच्चा यहाँ तक कि जॉर्ज बुश या मार्गरेट थैचर या गोर्बाचोव चाहे जो आ जाए (काशी नरेश को छोड़कर) — सबके लिए 'हर हर महादेव' के साथ 'भोसड़ी के' का जय-जयकार!

फर्क इतना ही है कि पहला बन्द बोलना पड़ता है — जरा जोर लगाकर; और दूसरा बिना बोले अपने आप कंठ से फूट पड़ता है।




जमाने को लौड़े पर रखकर मस्ती से घूमने की मुद्रा ‘आइडेंटिटी कॉर्ड' है इसका!

नमूना पेश है — 
खड़ाऊँ पहनकर पाँव लटकाए पान की दुकान पर बैठे तन्नी गुरू से एक आदमी बोला — 'किस दुनिया में हो गुरू! अमरीका रोज-रोज आदमी को चन्द्रमा पर भेज रहा है और तुम घंटे-भर से पान घुला रहे हो?" 

मोरी में 'पच्' से पान की पीक थूककर गुरू बोले — 'देखौ! एक बात नोट कर लो! चन्द्रमा हो या सूरज-भोंसड़ी के जिसको गरज होगी, खुदै यहाँ आएगा। तन्नी गुरू टस-से-मस नहीं होंगे हियाँ से! समझे कुछ?'




'जो मजा बनारस में; न पेरिस में, न फारस में' — इश्तहार है इसका।
यह इश्तहार दीवारों पर नहीं, लोगों की आँखों में और ललाटों पर लिखा रहता है!
'गुरू' यहाँ की नागरिकता का 'सरनेम' है। 
न कोई सिंह, न पांडे, न जादो, न राम! सब गुरू! जो पैदा भया, वह भी गुरू, जो मरा, वह भी गुरू!
वर्गहीन समाज का सबसे बड़ा जनतन्त्र है यह :
गिरिजेश राय (भाकपा), नारायण मिश्र (भाजपा), अम्बिका सिंह (कभी कांग्रेस, अभी जद) तीनों की दोस्ती पिछले तीस सालों से कायम है और आनेवाली कई पीढ़ियों तक इसके बने रहने के आसार हैं! किसी मकान पर कब्जा दिलाना हो, कब्जा छुड़ाना हो, किसी को फँसाना हो या जमानत करानी हो — तीनों में कभी मतभेद नहीं होता! वे उसे मंच के लिए छोड़ रखते हैं...अस्सी के मुहावरे में अगर तीनों नहीं, तो कम-से-कम दो — एक ही गाँड़ हगते हैं।




अन्त में, एक बात और। भारतीय भूगोल की एक भयानक भूल ठीक कर लें। अस्सी बनारस का मुहल्ला नहीं है। अस्सी 'अष्टाध्यायी' है और बनारस उसका 'भाष्य'! पिछले तीस-पैंतीस वर्षों से 'पूँजीवाद' के पगलाए अमरीकी यहाँ आते हैं और चाहते हैं कि दुनिया इसकी 'टीका' हो जाए...मगर चाहने से क्या होता है ?

अगर चाहने से होता तो पिछले खाड़ी-युद्ध के दिनों में अस्सी चाहता था कि अमरीका का 'व्हाइट हाउस' इस मुहल्ले का 'सुलभ शौचालय' हो जाए ताकि उसे 'दिव्य निपटान' के लिए 'बहरी अलंग' अर्थात् गंगा पार न जाना पड़े...मगर चाहने से क्या होता है ?

इति प्रस्तावना।


तो मित्रो, यही अस्सी मेरा बोधगया है और अस्सीघाट पर गंगा के किनारे खड़ा वह पीपल का दरख्त बोधिवृक्ष, जिसके नीचे मुझे निर्वाण प्राप्त हुआ था!

अन्तर्कथा यह है कि सन् '53 में मैं गाँव से बनारस आया था। मँझले भैया रामजी सिंह के साथ। आगे की पढ़ाई के लिए। उन्हें बी.ए. में प्राइवेट पढ़ना था घर की खेती-बारी सँभालते हुए। और मुझे इंटर में। वे बेहद सख्त गार्जियन थे — कुछ-कुछ प्रेमचन्द के बड़े भाई साहब' की तरह! इस बात का मुझे भी आश्चर्य होता था और उन्हें भी कि अपने अध्यापकों से अधिक ज्ञान के बावजूद, अपने ही मित्रों को पढ़ा-पढ़ाकर पास कराने के बावजूद वे खुद फेल कैसे हो जाते हैं ?

उन्होंने एक बार अपने पास चेले को पकड़ा। रिजल्ट आया ही आया था। उन्होंने पूछा — 'बे लालजी! हम तुझे पढ़ाए, जो-जो नहीं आता था तुझे, सब बताए, लिखाए, रटाए; तू पास हो गया, हम कइसे फैल हो गए ?' लालजी बोले — 'गुरू, ऐसा है कि आप जो पढ़ाए, वह तो हम पढ़े ही। बाकी आपकी चोरी-चोरी भी कुछ पढ़े थे।' 

उन्हें उसके उत्तर से सन्तोष नहीं हुआ। मुझसे पूछा — 'अन्दाजा लगाओ तो जरा! क्या बात हो सकती है ?' इसमें अन्दाजा लगाने जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन मैं अन्दाजा लगाने लगा और नहीं लगा पाया। कारण, कि भैया के शब्दकोश में व्याकरण के लिए कोई जगह नहीं थी! 'ने', 'में','का', 'के', 'पर', 'से' आदि को वे फालतू और बेमतलब का समझते थे! सीधे-सादे वाक्य में अड़ेंगेबाजी के सिवा और कोई काम नहीं नजर आता था इनको।...लेकिन यह बताता तो लात खाता!

बहरहाल, बात 'निर्वाण' की।

एक दिन भैया ने कहा — 'तुम्हारी अंग्रेजी कमजोर है। वह बातचीत लायक होनी चाहिए। कोई तुमसे अंग्रेजी में कुछ पूछे और तुम उजबक की तरह टुकुर-टुकुर ताकने लगो, यह अच्छा नहीं। तुम अस्सी के चुडुक्कों के साथ खेलना छोड़ो और चलो, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास करो।'

भैया मुझे इसी पीपल के पास ले आए। शाम के समय। घाट पर भीड़-भाड़ कम थी। उन्होंने मुझे एक सीढ़ी के पास बिठा दिया और कहा — 'देखो! डेली शाम को यहाँ आकर अभ्यास करो — ऐसे!'

वे पन्द्रह गज दूर खड़े हो गए — अटेंशन की मुद्रा में और पेड़ से बोले — 'व्हाट इज योर नेम ?' फिर पेड़ के पास गए और सामने देखते हुए उसी मुद्रा में बोले — 'सर, माई नेम इज रामजी सिंह!' फिर वहाँ से पन्द्रह गज दूर — 'व्हाट इज योर फादर्स नेम ?' फिर पेड़ के पास से-'सर, माई फादर्स नेम इज श्री नागर सिंह!' इस तरह वे तब तक पीपल के पास आते-जाते रहे, जब तक पसीने-पसीने नहीं हो गए!

'हाँ, चलो अब तुम?' वे सीढ़ी पर मेरी जगह बैठकर सुस्ताने लगे।

मित्रो! भगवान झूठ न बुलवाएँ तो कहूँ कि अंग्रेजी बोलना तो मुझे नहीं आया, हाँ, इतना जरूर समझा कि पसीने से ज्ञान का बड़ा गहरा सम्बन्ध है!

इसीलिए जब लोग पूछते हैं कि तुम्हें इतना अधिक पसीना क्यों होता है या बूढ़े बकरे की तरह क्यों गन्धाते हो तो मैं उनकी मूर्खता पर हँसकर रह जाता हूँ। अरे भले आदमी, ज्ञानी को ज्ञानोद्रेक से पसीना नहीं आएगा तो क्या कँपकँपी छूटेगी?




लेकिन साहब, मेरे ज्ञान की बधिया बैठा दी मुहल्ले के आदिवासियों' ने।

इधर 'प्रामाणिक अनुभूति' और उधर 'भोगा हुआ यथार्थ' और यथार्थ को पसीने से परहेज!

एक थे हमारे बापजान जो पैना उठाए हमें किताब-कापियों में जोते रखते थे — 'सालो, खेती तो गई सरकार के 'उसमें'। अगर यह भी नहीं करोगे तो भीख माँगोगे!' दूसरी ओर मुहल्ले के बाप थे जो अपने बच्चों का स्कूल में नाम लिखाते थे — पढ़ने के लिए नहीं, सरकार की ओर से मुफ्त बँटनेवाली 'दलिया' के लिए! वे केवल रेसस पीरियड' में ही स्कूल में नजर आते।

उनका एक जीवन-दर्शन था — 'जो पठितव्यम् तो मरितव्यम्, न पठितव्यम् तो मरितव्यम्, फिर दाँत कटाकट क्यों करितव्यम् ?'

पूरा मुहल्ला पीढ़ियों से इसी शैली में जीता चला आ रहा था गाता, बजाता, झूमता, मदमाता! किसी के पास कोई डिग्री नहीं, रोजगार नहीं, नौकरी नहीं, व्यवसाय नहीं, काम नहीं; परलोक सिधारते समय पंडित महाराज ने पत्रा-पोथी लपेटे एक लाल बेठन खोंस दिया बेटे की काँख में बस! वे तख्त पर बेठन रखे हुए जनेऊ से पीठ खुजा रहे हैं और जजमान का इन्तजार कर रहे हैं!

जजमान रोज-रोज नहीं आते, ग्रह-नक्षत्र भी रोज-रोज खराब नहीं होते, मुंडन, शादीब्याह, जनेऊ जैसे संस्कार भी रोज-रोज नहीं होते और न रोज-रोज फत्ते गुरू के कन्धे पर कुम्हड़ा होता है। फत्ते गुरू कुम्हड़े का पूरा वजन उठाए हुए मुहल्ले-भर को सुनानेवाली ऊँची आवाज में आत्मालाप करते आ रहे हैं 'पालागी फत्ते गुरु!' 

'जय हो। जजमान!' 

'सटी गए थे का गुरू ?' 

'कवन अँडुआ सटी जाता है जजमान ?' 

'अरे तो इतना बड़ा कोहड़ा? हफ्तेभर तो चलेगा ही गुरु!' 

'हफ्ते-भर तुम्हारे यहाँ चलता होगा। यहाँ तो दो जून के लिए भी कम है!’

मुहल्ला अपने दरवाजों, खिड़कियों, छतों से आँख फाड़े फत्ते गुरू का कोहड़ा देख रहा है और उनके भाग्य से जल-भुन रहा है। सन्तोष है तो यह कि आज का दिन फते गुरू का, कल 

का दिन किसी और गुरू का! कौन जाने हमारा ही हो? 

कहते हैं, बुढ़ापे में तुलसी बाबा कुछ-कुछ ‘पिड़काह' और चिड़चिड़े हो चले थे। मुहल्लेवालों ने उनसे जरा सी छेड़छाड़ की, पिनक गए और शाप दे डाला 'जाओ, तुम लोग मूर्ख और दरिद्र रह जाओगे!'

मित्रो, मेरा मतभेद है इससे। शान्तिप्रिय द्विवेदी को जितना तंग किया मुहल्ले ने, उससे अधिक तंग तो नहीं ही किया होगा बाबा की और अगर उन्हें शाप ही देना था जो जाते-जवाते इनके हाथ 'मानस' की पोथी क्यों पकड़ा जाते ? फिर भी ये कहते हैं, तो हम मान लेते हैं; लेकिन सरापकर भी क्या कर लिया बाबा ने ? माथे पर चन्दन की बेंदी, मुँह में पान और तोंद सहलाता हाथ! न किसी के आगे गिड़गिड़ाना, न हाथ फैलाना। दे तो भला, न दे तो भला! उधर मन्दिर, इधर गंगा; और घर में सिलबट्टा! देनेवाला 'वह'; जजमान भोंसड़ी के क्या देगा ? भाँग छानी, निपटे और देवी के दर्शन के लिए चल पड़े।

चौके में कुछ नहीं, मगर जिए जा रहे हैं ताव के साथ! चेहरे पर कोई तनाव नहीं, कहीं कोई फिक्र नहीं और उधर से लौटे तो साथ में कभी-काल, एक जजमान — 'सुन बेरजुआ, खोल केवाड़ी, आयल हौ जजमान चकाचक!'



तो साहब! कच्ची उमर और बाला जोबन! अपन को भा गया यह दर्शन!

काहे की है-है और काहे की खट-खट्! साथ तो जाना नहीं कुछ! फिर क्यों मरे जा रहे हो चौबीस घंटे ? सारा कुछ जुटाए जा रहे हो, फिर भी किसी के चेहरे पर खुशी नहीं! यह नहीं है, तो वह नहीं है! इसे साड़ी, तो उसे फ्रॉक, तो इसे फीस, तो उसे टिफिन, तो इसे दवा, तो उसे टॉनिक, तो इसे...कुछ करो तब भी और न करो तब भी यह दुनिया चल रही है और चलती रहेगी...

प्यारेलाल! अपनी भी जिन्दगी जियो, दूसरों की ही नहीं! ऐसे में ही गया था सब्जी लेने अस्सी पर! लुंगी और जाकिट पहने हुए! 

लगभग दो बजे दोपहर। सन् '70 के जाड़ों के दिन। 

सलीम की दुकान पर खड़ा हुआ ही था कि सड़क से आवाज आई — डॉक्टर! मैंने मुड़कर देखा तो एक परिचित मित्र! रिक्शे पर! इससे पहले एक-दो बार की ही भेट थी उससे।

मैं पास पहुंचा तो उसने पूछा, 'आवारगी करने का मन है डॉक्टर ?' 

'क्या मतलब ?' 

'कहीं चलना चाहते हो? कलकत्ता, बम्बई, दार्जिलिंग, कालिंगपाँग, नेपाल कहीं भी!' 

मैं चकित! बोला-

'रुको! सब्जी देकर आते हैं तो बात करते हैं।'

उसने रिक्शे पर बैठे-बैठे मेरा हाथ पकड़ा 'एक बात का उत्तर दो। महीने में कितने दिन होते हैं ? तीस दिन। इनमें से कितने दिन तुम्हारे अपने दिन हैं ? 'अपने' का मतलब जिसमें माँ-बाप, भाई-बहन, बीवी, बेटा-बेटी किसी का दखल न हो। जैसे चाहो, वैसे रहो। जैसा चाहो, वैसा जियो।'

मैं सोच में पड़ गया। 

'एक दिन, दो दिन, तीन दिन?' वह उसी गम्भीरता से बोलता रहा। 

मैं चुप। 

'सुनो! महीने के सत्ताइस दिन दे दो बीवी को, बाल-बच्चों को, पूरे खानदान को! उनसे कहो कि भैया, ये रहे तुम्हारे दिन! लेकिन ये तीन दिन मुझे दे दो। मेरी भी अपनी जिन्दगी है, उसके साथ जुल्म न करो, समझा ?'

‘और सुनो! कार्यक्रम बनाकर जीने में तो सारी जिन्दगी गवा रहे हैं हम! हम घर से निकलते ही कहते हैं कि सुनो, अमुक जगह जा रहे हैं और इतने बजे आएँगे। और कहीं बाहर जाना हुआ तो हफ्ते-भर के राशन-पानी, साग-सब्जी का बन्दोबस्त करके जाते हैं!...इन सबका कोई मतलब है क्या ? आवारगी करने का भी कार्यक्रम बनाया जाता है क्या ?'

'ठीक है यार! मैं सलीम को बता तो दूं कि सब्जी पहुँचा के घर पर बोल देगा!' 

'लो, फिर वही बात! अरे, जिन्हें खाना है, वे ले जाएँगे; चलो तुम!' 

'अच्छा, चलो!' मैं भी बगल में रिक्शे पर बैठ गया — 'तुम भी क्या कहोगे?'

और साहब! मैंने सोचा था कि शहर में ही कहीं सिनेमा वगैरह देख-दाखकर शाम नहीं तो रात तक लौट आएँगे, लेकिन पहुँच गए पंजाब मेल से सचमुच कलकत्ता, वहाँ से डायमंड हार्बर, फिर वहाँ से काकद्वीप। छककर रास्ते-भर खाया-पिया-मौज मनाई! पसीने के बगैर जिन्दगी का मजा लिया। ...वही लुंगी और जाकिट, हवाई चप्पल, जेब में दस नए पैसे। आन का आँटा, आन का घी। भोग लगावै बाबाजी!

पाँच दिन बाद लौटे थे घर!

मौज तो बहुत आई, लेकिन लौटानी ट्रेन में ही एक दूसरा ज्ञानोदय हुआ।

जो भी तुम पर पैसा खर्च करता है, वह तुम्हारे लिए नहीं, अपने लिए। प्यारेलाल! ट्रेन छुटनेवाली है, लपक के जरा दो टिकट तो ले आओ!...जरा उस तरफ बैठ जाओ तो थोड़ा बदन सीधा कर लें...यार, कैसे दोस्त हो? कहीं से एक गिलास पानी नहीं पिला सकते?...जरा वो तौलिया तो पकड़ाना, 'फ्रेश' हो लिया जाए ?...गुरू, सिगरेट तो है मगर माचिस छूट गई, डिब्बे में नजर दौड़ाओ! कोई-न-कोई जरूर बीड़ी-सिगरेट पी रहा होगा!...अगर आप दोस्त के लिए इतना भी नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?

घर में ऐसा कुहराम मचा था कि न पूछिए! कई दिनों से चूल्हा नहीं जला था और बीवी ने बेवा होने की पूरी तैयारी कर ली थी!

मुझे जल्दी ही अहसास हो गया कि माया-मोह के जंजाल में फँसा मैं — अस्सी का प्रवासी इस दर्शन के काबिल नहीं!



अस्सी पर प्रवासियों की एक ही नस्ल थी शुरू में — लेखकों-कवियों की!

आजादी के बाद देश में जगह-जगह 'केन्द्र' खुलने शुरू हो गए थे–-'मुर्गी-पालन केन्द्र', 'मत्स्य-पालन केन्द्र', 'सूअर-पालन केन्द्र', 'मगर-घड़ियाल-पालन केन्द्र'। इन कवियों लेखकों ने भी अपना एक केन्द्र खोल लिया — केदार चायवाले की दुकान में। 'कवि-पालन केन्द्र'। कोई साइनबोर्ड नहीं था, लेकिन जनता उसे इसी रूप में जानती थी। सुबह हो या दोपहर या शाम — केदार, विजयमोहन, अक्ष्योभ्येश्वरी प्रताप, शालिग्राम, अधीर, आनन्द भैरवशाही, विद्यासागर नौटियाल, विश्वनाथ त्रिपाठी (देहलवी), श्याम तिवारी, विष्णुचन्द्र शर्मा, बाबा कारन्त — इनमें से किसी को भी समूह में या अलग-अलग यहीं पाया जाता था!

इसके मानद इंचार्ज थे समीक्षक नामवर सिंह और पर्यवेक्षक थे त्रिलोचन। ये कवि प्राय: यहीं से 'काव्य-भोज' के लिए 'तुलसी पुस्तकालय' या 'साधु वेला आश्रम' की ओर रवाना होते

मगर हाय! '60 शुरू होते-होते कवि भी ‘फुरी' हो गए और केन्द्र भी टूट गया! सन् '65 के आस-पास जब धूमिल का आविर्भाव हुआ तो उसने गुरु के चरण-चिह्नों पर चलते हुए केदार चायवाले के सामने हजारी की दुकान को 'केन्द्र' बनाने की कोशिश की। हजारी के बगल में कन्हैया हलवाई की दुकान। वह कन्हैया के यहाँ से चार आने की जलेबी लेता और चार आने का सेव-दालमोठ और हजारी की दुकान में आ बैठता। इधर-उधर से कवियाये दुसरे लोग भी आते और नागानन्द भी। कवियों की नजर अखबार या बहस पर होती, नागानन्द की जलेबी-नमकीन के दोनों पर!

ऐसे में केन्द्र क्या चलता!

मगर बाद के कई वर्षों तक — जिस प्रकार गोला दीनानाथ के इलाके में घुसते ही मसालों की गन्ध से नाक परपराने लगती है, उसी प्रकार अस्सी पर खड़े होनेवाले किसी भी आदमी के कान के पर्दे काव्य-चर्चा से फटने लगते थे। धूमिल काव्यद्रोहियों के लिए परशुराम था और उसकी जीभ फरसा!

अस्सी से धूमिल क्या गया, जैसे आँगन से बेटी विदा हो गई। घर सूना और उदास।

इधर सुनते हैं कि कोई बुढ़ऊ-बुढ़ऊ से हैं कासीनाथ — इनभर्सीटी के मास्टर जो कहानियाँ-फहानियाँ लिखते हैं और अपने दो-चार बकलोल दोस्तों के साथ 'मारवाड़ी सेवासंघ' के चौतरे पर 'राजेश ब्रदर्स' में बैठे रहते हैं! अकसर शाम को! “ए भाई! ऊ तुमको किधर से लेखककवी बुझाता है जी ? बकरा जइसा दाढ़ी-दाढ़ा बढ़ाने से कोई लेखक-कवी थोड़े नु बनता है ? देखा नहीं था दिनकरवा को? अरे, उहै रामधारी सिंघवा ? जब चदरा-ओदरा कन्हियाँ पर तान के खड़ा हो जाता था-छह फुटा ज्वान; तब भह्-भह् बरता रहता था। आउर ई भोसड़ी के अखबार पर लाई-दाना फइलाय के, एक पुड़िया नून और एक पाव मिरचा बटोर के भकोसता रहता है! कवी-लेखक अइसे होता है का?

सच्ची कहें तो नमवर-धूमिल के बाद अस्सी का साहित्य-फाहित्य गया एल.के.डी. (लौड़ा के दक्खिन)!"



मित्रो, इमर्जेंसी के बाद और '80 के आस-पास से गजब हो गया!

भारत पर तो बेशक हमले हुए यवनों के, शकों के, हूणों के, कुषाणों के, लेकिन अलग अलग और बारी-बारी, मगर अस्सी पर एक ही साथ कई राज्यों और जिलों से हमले हुए आरा, सासाराम, भोजपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, आजमगढ़, जौनपुर, गोरखपुर, देवरिया जाने कहाँ-कहाँ से 'जुवा' लड़के युनिवर्सिटी में पढ़ने आए और चौराहे पर डेरा-डंडा गाड़ चले!

इनमें कई नस्लें थीं!

एक नस्ल पैदा हुई, 'फाइन आर्ट्स’ के शौक से! ये लड़के 'मारवाड़ी सेवा संघ' के चौतरे पर पेंसिल और स्केचबुक लिये बैठे रहते हैं और 'संघ' की ओर से बँटनेवाली खिचड़ी या रोटियों के इन्तजार में बैठी या लेटी गायों, कुत्तों और भिखमंगों के चित्र बनाया करते हैं!

दूसरी नस्ल 'तुलसीघाट' पर आयोजित होनेवाले 'ध्रुपद मेला' से निकली! यह गायकोंवादकों और उनकी कला पर फिदा होकर सिर हिलानेवालों की नस्ल है! ये कढ़ाई किए हुए रंग-बिरंगे कुर्ते और चूड़ीदार पाजामा पहने, कन्धे पर झूलते लम्बे बाल बढ़ाए किसी गुरु या चेली के साथ बगल में तानपूरा दबाए इधर-उधर आते-जाते नजर आते हैं।

तीसरी नस्ल और भी जालिम है — पत्रकारों की! 'तलवार मुकाबिल हो तो अखबार निकालो' वालों की। ये मालिकों की गरियाते हैं लेकिन छापते वही हैं जो वह चाहता है! ये धर्मनिरपेक्ष हैं लेकिन खबरें धर्मोन्माद की छापते हैं! दंगा, हत्या, लूट-पाट, चोरी-डकैती, बलात्कार के शानदार अवसरों पर इनके चेहरे की चमक देखते बनती है!

एक चौथी नस्ल भी है गोवर्धनधारियों की जो कानी उँगली पर 'राष्ट्र' उठाए किसी चेले के 'हीरो होंडा' पर दस-बारह साल से मुस्की मार रहे हैं। लेकिन इनके बारे में बाद में!

जब इनकी — इन सबकी फौज ने एक साथ अस्सी पर धावा मारा, तो कहते हैं, चौराहे की उत्तरी सीमा पर तैनात पप्पू वल्द बलदेव ने आत्मरक्षा में इन पर भाँग की गोलियाँ दागनी शुरू की...तब से हाल यह है कि दो लम्बी मेजों और चार लम्बे बेंचोंवाले इस दड़बे में दस-बारह गाहकों के बजाय बीस-पच्चीस संस्कृतिकर्मी सुबह से शाम तक टँसे रहते हैं! 

उधर गोलियों के डब्बे के साथ बलदेव, इधर चूल्हे और केतली के पास पप्पू — नाम पप्पू, उम्र चालीस साल!

यह भी कहते हैं कि इसी के मॉडल पर दिल्ली में 'श्रीराम सेंटर' की कल्पना की गई थी! बाकी तो शहर-शहर का फर्क है।



तो साहब, जानिए कि भाँग अस्सी की संस्कृति है। और जब संस्कृति है तो कोई-न-कोई परम्परा भी जरूर होगी और वह परम्परा है होली का विश्वप्रसिद्ध 'कवि-सम्मेलन'!

मेरे साथ ही आप सब लोग वन्दना करें इस संस्कृति और परम्परा के रक्षक और मुहल्ले के डीह डॉ. गया सिंह की!

हरिश्चन्द्र महाविद्यालय के अध्यापक डॉ. गया सिंह ने 'विद्वान' कहलाने के लिए अथक संघर्ष किया है। एक ओर विद्वानों की संगत, दूसरी ओर ऐसे लोगों से मारपीट जो उन्हें गुंडा, लंठ, झगड़ालू, मुकदमेबाज और जाने क्या-क्या कहते थे! अपने को 'विद्वान' साबित करने के लिए उन्होंने कई लोगों से कई मुकदमे भी लड़े। अनाड़ी लोग उन्हें कानपुर के 'धरतीपकड़' घोड़ावाले की टक्कर का व्यक्तित्व मनाते हैं। ये चुनाव तो नहीं लड़े लेकिन हिन्दू विश्वविद्यालय के एक विभाग में निकलनेवाला ऐसा कोई पद नहीं जिसके लिए इंटरव्यू न दिया हो! अगर ये छंटे तो अपनी विद्वत्ता के आतंक और दबदबे के कारण! मूर्खता के कारण दूसरे छंटे होंगे!

उनके कई अमर वाक्य हैं जिन्हें लोग अकसर 'कोट' करते रहते हैं, जैसे — 'मैंने शिवप्रसाद सिंह रूपी पौधे को उगाया और सींचकर बड़ा किया तो त्रिभुवन सिंह ने उखाड़कर अपने गमले में लगा लिया! — 'मैंने शिवप्रसाद को कंडालन चाय, खँचियन रसगुल्ला, झउवन पान और टनन समोसा खिलाया है!' — 'जब सौ रचनाकार मरते हैं तब एक आलोचक पैदा होता है।' आदि!

भाँग बाबू साहब की प्रतिभा के लिए नित्य खाद-पानी है, ऐसा लोग बोलते हैं!

जब अस्सी पर चाय के साथ बिना लाइसेंस के भाँग बेचनेवालों को दारोगा ने गिरफ्तार करके चालान किया तो किसी भी माई के लाल की हिम्मत नहीं हुई कि इस जुल्म के खिलाफ बगावत का झंडा बुलन्द करे! खाते सब थे, मगर पस्त! अस्सी की सारी दुकानें बन्द! ऐसे गाढ़े वक्त पर — जबकि बड़े-बड़े नेता रण छोड़ चुके थे — गया सिंह ने माइक सँभाला — दहाड़ने से पहले उन्होंने मंच को तीन तरफ से धेरै पचासों सिपाहियों समेत दारोगा शर्मा को देखा "शर्मा...जी! देख रहे हो मेरा सिर? खल्वाट ? खोपड़ी पर एक भी बाल नहीं। तुम्हारे डंडे का वार इस पर भरपूर पड़ेगा! मारो! मार सको, तो! लेकिन शर्मा भोंसड़ी के! तुम काशी की संस्कृति और परम्परा मिटाना चाहते हो? तुम्हारी हैसियत कि तुम हजारों-हजार साल से चली आ रही काशी की संस्कृति और परम्परा मिटा दो? तुम्हारे जैसे जाने कितने दरोगा-दरोगी आए और गए; अस्सी कायम है और कायम रहेगा। "...इसके बाद उन्होंने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक अलंकार की सहायता से जब यह बताना शुरू किया कि किस तरह भाँग बनारस की आबोहवा के लिए अनिचारर्य है, भाँग का सम्बन्ध 'दिव्य निपटान' से है, 'दिव्य निपटान' का सम्बन्ध शरीर और स्वास्थ्य से है, स्वास्थ्य का सम्बन्ध मानवअस्तित्व से है और मानव-अस्तित्व का सम्बन्ध अस्सी से है तो शर्मा लाठी-बन्दूकधारी अपने लश्कर के साथ वहाँ से खिसकने लगा!

ऐसा ही विकट संकट एक बार आया परम्परा के आगे! और यह संकट प्रशासन की ओर से नहीं, अपने ही लोगों की ओर से आया! 

'भारतीय संस्कृति' के भाजपाई चरवाहों ने अस्सी-परम्परा के रखवालों से कहा कि होली का यह कवि-सम्मेलन नहीं होगा। अश्लील है, गन्दा है, फूहड़ है। इसे करना हो। तो शहर से बाहर जाओ! गंगा के उस पार, रेती पर! जहाँ कोई न सुने! अगर हुआ, तो गोली चल जाएगी, लाशें बिछ जाएँगी, आदि-आदि।

इधर यह हिन्दुओं के महान पर्व पर आयोजित होनेवाला अकेला विश्व-स्तर का सम्मेलन! जिसे देखने-सुनने के लिए आनेवाले देश-विदेश के लाखों लोग! वीडियो-कैमरे और टेपरिकार्डर के साथ! सड़कें और गलियाँ जाम! यातायात ठप! लंका से लेकर शिवाला तक कहीं भी तिल रखने की जगह नहीं!...महीनों से अस्सी के इसी दिन का बनारस की जनता इन्तजार करती है! और इन्तजार करते हैं महीनों तक मशक्कत और रियाज के बाद कविताएँ बनानेवाले कवि! महाकवि चकाचक बनारसी से लेकर बद्रीविशाल और भुटेले गुरू तक!

लोगो! बाबा की धरती का यह चमत्कार 'अवसि देखिए देखन जोगू'! मानव-शरीर का कोई अंग नहीं जो सक्रिय न हो! लिट्टे, खालिस्तान, उग्रवाद, रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कोई समस्या नहीं, कोई राष्ट्रीय-अराष्ट्रीय पार्टी नहीं जो होली की गालियों के ‘प्रक्षेपास्त्रों’ की जद के बाहर हो! गालियों में दिलचस्पी हो तब भी आइए और राजनीतिक व्यंग्य में हो तब भी! अगर शब्दों के अर्थ पर न जाएँ तो जीवन की अकुंठ उच्छल-उल्लसित ध्वनियों का समारोह!

तो साहब! धमकी से भुटेले गुरू, बद्रीविशाल, सुशील त्रिपाठी, सुरेश्वर और दूसरे आयोजक परेशान! परम्परा खतरे में! जो भी शख्स मंच पर खड़ा होगा, गोली मार दी जाएगी! एक बार फिर ऐसे वक्त पर अपने त्याग, बलिदान और दिलेरी से डॉ. गया सिंह ने प्रसाद की 'गुंडा' कहानी के बाबू नन्हकू सिंह की याद ताजा कर दी-–'जिसने अपनी माँ का दूध पिया है, सामने आए और मार दे गोली!'



पप्पू की दुकान इन्हीं कलाकारों, चित्रकारों पत्रकारों नेताओं और नागरिकों की दैनिक (अर्थात् दिन की) छावनी है!

अक्तूबर के दिन। सुबह के नौ बज रहे थे।

दुकान गाहकों से भरी हुई थी। कुछ लोग खाली होने के इन्तजार में गिलास लिये खड़े थे। शोर-शराब काफी था, मगर बातें एक मुद्दे पर नहीं टिकी थीं — कभी मंडल, कभी खरमंडल (मन्दिर-मस्जिद), कभी बंडल — शटल की तरह आ-जा रहे थे! कुछ लोग सुबह का अखबार देख रहे थे, कुछ पढ़ रहे थे, कुछ चाट रहे थे! बीच-बीच में बच्चन की बेंच से हरिद्वार या रायसाहब इस दुकान में खड़े किसी पत्रकार को आवाज देते जो रात की ड्यूटी से लौटा था!

तन्नी गुरू अस्सी के युनिफॉर्म में दड़बे के एक छोर पर बैठे थे और दूसरे छोर पर अपने चेले के साथ कोई तानसेन रियाज़ कर रहा था! रियाज़ क्या, किसी राग का धीमे सुरों में आलाप ले रहा था और चेला अपने झबरे बालोंवाले सिर से ठेका दे रहा था!

"तन्नी गुरू! जरा बोलना तो, यह कौन राग है ?"

गुरू को आवाज देकर वह चालू हुआ-आऽऽऽ, तूम तन न न न तूम! आऽऽ...

'दैनिक जागरण' से लौटे तुलसीदास रात में 'टेलीप्रिंटर' पर आई किसी 'न्यूज' का खुलासा कर रहे थे — चूल्हे की बगल में बैठे पत्थर की बेंच से!

"गुरू, सुन नहीं रहे हो, ध्यान दो! देखो, विलम्बित में — आऽऽऽऽ...” 

"कमंडल मंडल पर भारी पड़ रहा है!” 'आज' के संवाददाता बद्री बोले।

उनके समर्थन में कहीं से आवाज आई — "आरक्षण का सारा मामला 85 करोड़ लोगों में से सिर्फ चालीस हजार लोगों की नौकरी का है!"

"अरे चुप रहो, तुम क्या बात करोगे ? रात-भर रीवाँ कोठी में जुआ खेलते रहे और यहाँ बहस करने चले ही? "

रायसाहब बोले — "जुआ न होता तो गीता न आई होती!"

इसी बीच बद्री के जोड़ीदार 'भारत कला भवन' में काम करनेवाले राजेन्द्र ने प्रवेश किया “बद्री, तुम पहले झुनझुनवाला-पुनपुनवाला के अखबार में नौकरी करना बन्द करो, फिर बोलो!”

"देखो! मेरे मालिक के बारे में कुछ न बोलो!”

"हे बदिरिया, हम-तुम दीवाली को रात-भर रीवा कोठी में जुआ खेलते रहे, उस बीच दो बार बिजली गई और साले, दूसरे दिन तुमने अखबार में निकलवा दिया कि बनारस की दीवाली अबकी अँधेरे में मनी। यही नैतिकता है तुम्हारी ?" रायसाहब बोलते-बोलते खड़े हो गए।

इस पर राजेन्द्र ने रायसाहब का पक्ष लेना चाहा कि वे उखड़ गए–-“अरे चलो! तुम क्या बात करोगे ? जाओ, कला भवन में अकबर-बाबर का जूता-चप्पल, शेरवानी, टोपी, पीकदान दिखाओ! सारा सोना और सिक्का और साड़ियाँ चुराकर अपने घर ले गए तुम लोग और यहाँ बात करने चले हो!”

तब तक किसी ने अखबार के ऊपर से अपना सिर उठाया "विपिया (वी.पी.) को किसी मेढ़िया पहलवान से कम मत समझो! जैसे मेढ़िया पहलवान हर बार पटकाते हैं, लेकिन धूल झाड़कर उठ खड़े होते हैं देखिए, पटका कहाँ ? पीठ पर धूल लगने से क्या होता है ? कन्धे का यह हिस्सा देखिए!” 

इस पर काँव-काँव मचा ही था कि किसी ने अखबार का दूसरा पन्ना दिखाते हुए कहा — “यह देखो मोहर सिंह की मूंछ! इससे विकराल मूंछे तो मरकंडवा हलवाई की हैं मगर उससे भी तावदार मुन्नू दीक्षित की! यार! एक बात गौर करते हो कि नहीं? हमारे महाल में तीन मुच्छड़ और तीनों अपनी बीवियों के आगे थर-थर कॉपनेवाले!"

"चुप बे! बात कुछ हो रही है और ई ससुर!”

पूरा दड़बा शोर और धुआँ से भरता चला गया, तब तक तानसेन द्रुत पर पहुँच चुका था। वह बीच-बीच में तन्नी गुरू को देख लेता था। लेकिन गुरू का ध्यान राग पर नहीं, कहीं और था!

“अब बोलो गुरू! बता दो तो जानें!" उसने सम पर आकर पूछा! 

तन्नी गुरू ने उसे देखा और बोले — "आग राग है!" 

“यह कौन सा राग है ? कभी नाम नहीं सुना!” उसने अचरज से पूछा।

"जिस राग को सुनकर झाँट में आग लग जाए, वह आग राग।” और भुनभुनाते उठ खड़े हुए तन्नी गुरू!

उधर लुंच गुरू बच्चन की दुकान के आगे भँडैती फाने थे। उन्होंने आज सबेरे ही डबल डोज ले ली थी! ऑफिस रवाना होने से पहले अपने चपरासी सुकुल के कल का किस्सा बयान कर रहे थे!

बोले — "सुकुल कल हमें पिटवाते-पिटवाते बचा। साले पर अंग्रेजी से हाईस्कूल करने का भूत सवार है! तीन दिन से 'वाइफ' का माने याद कर रहा है! हर समय स्टूल पर बैठे-बैठे 'डब्ल्यू आई एफ ई, वाइफ; वाइफ माने औरत' बोलता रहता था! कल हुआ ऐसा कि सामने से आती हुई एक लड़की को देखा। कहा — गुरू, वाक्य में प्रयोग करें ? मैंने ध्यान ही नहीं दिया कहा, अच्छा; करो! वह बोला — ही इज़ वाइफ! महाराज, निकाल लिया चप्पल उस लड़की ने! मैं तो साइकिल पर सवार होकर भगा, उसका क्या हुआ ? अब चलें तो पता चलेगा! अच्छा, जै श्रीराम!”

"बाबू साहब! जरा इधर तो आइए।” 

मैंने देखा तन्नी गुरू कमर पर हाथ रखे खड़े हैं। 

"आप ही से कह रहे हैं, सुनिए तो!" 

"पालगी महराज!” मैंने कहा। 

वे मुस्कुराते हुए बोले — "नाश हो तुम्हारा!”

"क्या बात है गुरू, कुछ उखड़े-उखड़े लग रहे हो!” मैंने पूछा और वे मेरी कुहनी पकड़कर एक किनारे ले चले!

गुरू कुछ बोलें, इससे पहले आपसे थोड़े में ज्यादा समझने का अनुरोध!

गुरू अस्सी के चमत्कारों में से एक हैं! लोगों का मगज़ ही उनका कलेवा है! मेरे साथ पढ़ चुके हैं। जाने किन-किन नौकरियों से होते हुए होमगार्डों के मेठ हुए और तैनात किए गए गंगा के घाटों पर! 'गंगा-प्रदूषण' के नए महकमे में। उन्हें दस-पन्द्रह और होमगार्ड दिए गए और कहा गया कि घाटों पर किसी की दिसा-फराकत न करने दें।

तननी गुरु चौकस! जिस किसी को धोती, लुंगी, नेकर, गमछा, लँगोट खोलकर बैठा देखते, दौड़ा लेते! वे क्या उनके गण दौड़ाते। घाटों पर जीने और रहनेवाली पब्लिक परेशान! जिस 'दिव्य निपटान' के लिए बनारस सारे संसार में प्रसिद्ध है, उसके लिए भी ‘चवन्नी', 'अठन्नी’ देनी पड़े, इससे बुरी बात क्या हो सकती है ? लेकिन इसके लिए तन्नी गुरू दोषी कहाँ हैं ? बकौल उनके, 'मुफ्त में कौन सा काम होता है इस देश में ? और यह तो गंगा मैया की पवित्रता का प्रश्न है! जै। गंगा मैया!'

लेकिन गुरू जल्दी ही इस 'माले मुफ्त दिले बेरहम' वाले काम से छुट्टी पाकर दूसरे महकमे में चले गए।

"तुम एकदम्म से झंडू हो गए हो का?" 

"कुछ बताओ तो!” मैंने पूछा।

"बात यह है...जरा इधर आओ एक किनारे!" उन्होंने मेरी आँखों में देखा — “लेकिन सच्ची बोलना! हाँ ? मेरे मन में एक डाउट है! देखो, झूठ मत बोलना! चौथीराम जादो तुम्हारे दोस्त! मुकुन्द जादो के यहाँ चाय पीते हो! बर्फीवाले सीताराम जादो से भी तुम्हारी घुटती है, हम देखे हैं। एक और फंटूस तुम्हारे आगे-पीछे घूमता है — रामौध जादो!...कल कोई बोला कि दिल्ली में भी कोई जादो है जिसकी किताब में अस्सीचरितम् की घोषणा है। अब यह बताओ, तुम भी तो जादो नहीं हो?"

मुझे हँसी आ गई उन्हें सुनकर। 

"देखो गुरू, हँसो मत! हमें तुम्हारे खून में कुछ फरक मालूम हो रहा है!" 

"बस, इतनी सी बात?"

"तुम उस दिन गोपला की दुकान पर मंडल-मंडल काहे चिल्ला रहे थे ?...तुम्हें याद है न! जब वह विपिया भोंसड़ी के हर जगह से दुरदुराया और लतियाया जा रहा था तो यही अस्सी-भदैनी है जिसने उसका तिलक किया और कहा राजर्षि! राजा नहीं फकीर है, देस की तकदीर है!...और ससुरा दिल्ली गया तो हमारे ही 'उसमें' डंडा कर दिया!...और अब तुम भी पगलाए भए हो का? चलो, पान खिलाकर प्रायश्चित् करो! ए देवराज! दो ठो पान बढ़ाना तो!"

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मित्रो, तन्नी गुरू उधर गए तो मेरा ध्यान बच्चन की दुकान के आगे पड़ी बेंच पर गया जिसके आस-पास सड़क का इलाका 'संसद' के नाम से कुख्यात है। 

और आपसे यह भी बता दें कि जिसने 1990 के अक्तूबर-नवम्बर महीने में अस्सी नहीं देखा, उसने दुनिया भी देखी तो क्या देखी?

देश जल रहा था उसके पहले से। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक। सिर्फ दिल बचा था। दिल माने उत्तर प्रदेश! मंडल-कमंडल के झगड़े ने इसे भी लपेट लिया। दिल्ली की सरकार अब गई कि तब गई यही लगा हुआ था। पप्पू की दुकान के सामने, कहना वीरेन्द्र श्रीवास्तव का कि 'पी.एम. मंडल आयोग में फँस गया, सी.एम. बाबरी मस्जिद में और डी.एम. दोनों की व्यवस्था में देश भोंसड़ी के जहाँ-का-तहाँ है।'

लेकिन देश जहाँ-का-तहाँ नहीं था। मुहल्लेवालों को दाल खाए दो महीने हो गए थे। गेहूँ और कोयला-दोनों एक भाव बिक रहे थे। यानी ढाई रुपए किलो, चाहे कोयला खाइए, चाहे गेहूँ! 

ऐसी हालत में सबकी नजर वामपन्थी पार्टियों की तरफ थी। देखो, वे क्या करते हैं ? रामवचन पांडे ने घोषणा की कि कम्युनिस्ट पार्टियों और डोम में कोई फर्क नहीं है! जिस तरह डोम घाट (मसान) पर लकड़ी वगैरह जुटाकर मुर्दे का इन्तजार करता रहता है, उसी तरह ये पार्टियाँ भी टकटकी लगाए बैठी रहती हैं कि सरकार कब गिरे!

वीरेन्द्र श्रीवास्तव और रामवचन पांड़े अस्सी के बड़े-बुजुर्ग नेता हैं। 'बड़े-बुजुर्ग' का मतलब घर का ऐसा सदस्य जिसकी सलाह या आदेश को बकवास समझा जाए, जिस पर ध्यान देने की जरूरत न समझी जाए! जैसे अगर वह चिल्लाए कि 'अरे देखो! बैला खूटा तुड़ा के भागा जा रहा है, पकड़ो उसे' या 'गैया को नाँद से हटाकर नीम की छाँह में बाँध दो' तो लड़के-बच्चे ताश खेल रहे हों तो खेलते रहें! यानी, वह जो अपने जीते-जी फालतू हो जाए!

ये दोनों पिछले पचीस-तीस सालों से समाजवादी हैं! इनकी परवरिश छात्र-संघों में हुई! इन्होंने लड़ाइयाँ लड़ी, जेल गए, धरने दिए, अनशन किए, लाठिया खाई, सब किया और आज तक 'समाजवाद' से टस-से-मस नहीं हुए! लेकिन इन्होंने समाजवाद की परती में जब-जब खूटा गाड़कर अपना ढाबा खड़ा करना चाहा, धकिया दिए गए! वीरेन्द्र की सारी जवानी गोदौलिया पर 'दी रेस्त्राँ' के नीचे सोकर रात काटने में चली गई और पांडेजी की गाँव में।

और गाँव में पांडेजी की हैसियत क्या है, उन्हीं से सुनिए — 'इस देश में बुद्धिजीवी से बेकार कुछ नहीं है जी! अब यही देखिए, मैं एम.एस-सी. हूँ। पी-एच.डी. हूँ। नेता हूँ, बुद्धिजीवी हूँ लेकिन गाँव जाता हूँ तो कोई मुझ पर विश्वास नहीं करता। जहाँ गाँव-घर की किसी गम्भीर समस्या पर बात होती है, लोग सीधे-सीधे कह देते हैं — अरे! इनसे क्या पूछ रहे हैं, ये तो नेता है! यही नहीं, जब हमारे दरवाजे का बनिहार हमारे ही काम से घंटे-भर के लिए बाहर जाने लगता है चाहे वह खलिहान का काम हो, चाहे कोई और — सन्देह से मेरी ओर देखता है और पूछता है नेताजी! अभी तो यहाँ बैठे रहिएगा न! जरा नजर रखिए, आ रहे हैं! वह चला तो जाता है लेकिन उसके भीतर बराबर डर रहता है कि कहीं मैं उठकर चला न जाऊँ!' 

एक और समाजवादी नेता हैं देवव्रत मजुमदार! पूर्वांचल के नौजवान समाजवादियों के पुरखा। पांडेजी के गुरुभाई और श्रीवास्तवजी के गुरु! लोहिया, चरणसिंह, बहुगुणा से होते हुए राजीव गाँधी तक पहुंचे हैं। वे भी अकसर अस्सी आते हैं अपनों के बीच बेगानों की तरह।

श्रीवास्तवजी अपने कांग्रेसी गुरु को देखते ही कहते हैं — 

तेरे हुस्न का हुक्का बुझ गया है 

एक हम हैं कि गुड़गुड़ाए जाते हैं!



जैसे मेरे पिताजी-जो प्राइमरी के मुरिस थे-कहा करते थे कि उनके पढाए हुए लड़के आज किस-किस ओहदे पर हैं, वैसे ही ये नेता भी कहते रहते हैं कि 'अरे वो लूगा मन्त्री! और वो पसवनवा! और वो मूर्ख मन्त्री ललुआ! ए भाई! इनको भगई पहनने का भी सहूर नहीं था। जब जेहल से छूटा सब, तो किराया-भाड़ा हमीं दिया! और ई जे गोड़वा देखते हैं ना! दबाने के लिए मारामारी करता था सब! लेकिन सब लक्क है भाईजी! आज ऊ सब मन्त्री हैं और हम! देखियै रहे हैं! बाकी एक बात है; आज भी सब देखता है तो सन्त्री-फन्त्री हटाकर बुला लेता

पिताजी और इनके कहने में फर्क इतना ही है कि उनका चेहरा चमक उठता था, इनका बुझ जाता है! उन्हें गर्व होता था, इन्हें तकलीफ होती है!

इनके सिवा अस्सी पर नेताओं की एक दूसरी प्रजाति है जो 'सम्पूर्ण क्रान्ति' के 'जच्चाबच्चा केन्द्र' से निकली है जिन्हें देखने से लगता है कि उनकी राजनीतिक पार्टियों ने उन्हें अपनी जायज औलाद मानने से इनकार कर दिया है। हो सकता है, इसलिए भी इनकार कर दिया हो कि इनकी 'तरुणाई' में 'अंगड़ाई' और 'ललाई' जरूरत से ज्यादा रही हो!

ये भी चुनाव के बाद 'विधानसभा' और 'संसद' की ओर ऐसे ताकते हैं जैसे वे अंगूर के गुच्छे हो और बेहद खट्टे हों!

ऐसे नेताओं में सूबेदार सिंह, हरिद्वार पांडेय, अनिल कुमार 'झुन्ना', अशोक पांडेय वगैरह हैं जिनका पार्टी दफ्तर बच्चन की दुकान की बेंच है! ये तेज-तर्रार हैं, ('ईमानदार' तो कौन रह गया है इस जमाने में वी.पी. को छोड़कर) समझदार हैं, अस्सी की जनता के गले के हार हैं मगर बेकार हैं।

"इनमें से किसी को टिकट क्यों नहीं मिला पांडेजी!” मैंने पूछा।

रामवचनजी बोले — “सन् '70 के बाद से कुछ लोग हैं जो बराबर सत्ता में हैं! सरकार चाहे जिसकी बने, वे हारें या जीतें, सत्ता-सुख भोग रहे हैं! जैसे, मैं एक मन्त्रीजी को जानता हूँ। बड़ा रुतबा है उनका इन दिनों। उन्होंने अलग-अलग काम के लिए लोगों से कल मिलाकर लगभग एक करोड़ रुपए ले रखे है।! अब मान लीजिए, कल सरकार गिर गई! सरकार में रहकर वे जान चुके हैं कि काम कैसे कराया जाता है! वे मन्त्री रहें, न रहें लेकिन आधा करोड़ भी खर्च कर देंगे तो काम हो जाएगा! अगले चुनाव तक तो काम चलता रहा न! यह दलबदलुओं को छोड़ के बकिया लोगों का हाल है।”

"तो, गुरुजी, सिर्फ चूतिए कैडर्स हैं जो इस या उस पार्टी में हैं और उम्मीद बाँधे हैं!”

पांड़े से थोड़ी दूर पर खड़े थे हरिद्वार पांड़े! भाषण-कला के बैजू बावरा! मंच पर खड़े हो जाएँ तो जो चाहें, कर दें-पानी बरसा दें, बिजली गिरा दें, दीया जला दें, पत्थर पिघला दें! वे उन दिनों 'मूल्यों और सिद्धान्तों' की बात करनेवाली पार्टी में थे! मैं जब उनके पास पहुंचा, उस समय वे एक दूसरे नेता को डाँट रहे थे-–“और कोई श्रोता नहीं मिला क्या आपको ? मुसीबत है यहाँ! हर आदमी अपने लिए श्रोता ढूँढ़ता रहता है...अब बताइए! ये मुझे पालिटिक्स पढ़ाएँगे! जबकि इनके जैसे सैकड़ों लौंडों को मैंने नेता बनाकर छोड़ दिया! देखना चाहो तो जाकर देख लो, वे आज भी पटना और लखनऊ की विधानसभाओं में झाड़ा फिर रहे हैं... 

“यहाँ हफ्ते-भर के भीतर सारा समीकरण बदल जाता है और सिद्धान्त धरा रह जाता है! क्यों नहीं देखते लोग कि 3 अगस्त, 1990 को देवीलाल के निकाले जाने पर जो लोग 'वी.पी. सिंह जिन्दाबाद' और 'देवीलाल मुर्दाबाद' बोल रहे थे, वही लोग 15 अगस्त, 1990 को मंडल आयोग की घोषणा के बाद 'वी.पी. सिंह मुर्दाबाद' बोलने लगे!

"जिस देश में मुर्दा फूंकने के लिए घूस देना पड़ता हो उसमें सिद्धान्त ?"

हरिद्वार कह ही रहे थे कि इधर-उधर से नेता जुटने लगे! कड़कड़ाता कुर्ता-पाजामा, कलफ किया हुआ खड़ा कॉलर!

"बस कीजिए पांडेजी! अब चला जाए, देर हो रही है।” उनमें से किसी ने टोका। मैं समझ गया कि यह हरिद्वार का 'रिहर्सल' चल रहा था! 

"का गुरू! किधर ?” हरिद्वार ने सामने सड़क पर आवाज दी।

देखा तो रिक्शे पर सूबेदार सिंह! विनम्रता की मूर्ति! उनके दोनों जुड़े हाथ बाएँ-दाएँ, आगे-पीछे सबको प्रणाम करने में व्यस्त! कहते हैं, प्रणाम के मामले में वे जड़-चेतन-पशुपक्षी-मनुष्य में भेद नहीं करते!

“गुरू, तेरही की पूड़ी खाने जा रहा हूँ।" सूबेदार ने सूचना दी, "पिछले तीन महीने से बारात कर रहा था और ये तीन महीने तेरही के सीजन हैं!”

"बाकी के छह महीने?" किसी ने पान की दुकान से पूछा। 

"भाजपा के खिलाफ भाषण करने के!” वहीं से कोई बोला। 

"गोदौलियावाले कार्यक्रम का क्या होगा?" हरिद्धार ने पूछा। 

रिक्शा आगे बढ़ाते सूबेदार बोले — "आ जाऊँगा! डेढ़-दो घंटे से ज्यादा नहीं लगेगा।"



मित्रो! बीच में हस्तक्षेप के लिए क्षमा करें!

सन् '50 के जमाने में सुनता था कि किसी कॉलेज, संस्था या विश्वविद्यालय को 'कवि-सम्मेलन' कराना होता था तो वह इस नगर के एक कवि-पुंगव से सट्टा करता था और वे दस-पन्द्रह कवियों को लिये-दिए वहाँ पहुँच जाते थे! कवि-सम्मेलनों की यह परम्परा आज भी जीवित है! हर कवि के यहाँ जाने, उसे मनाने, निमंत्रित करने की जरूरत नहीं! भोजपुरी के महाकवि चन्द्रशेखरजी से सम्पर्क कीजिए, बयाना दीजिए और सभी रसों के कवियों का मजा लीजिए!

यही परम्परा अस्सी के नेता-समाज में भी चलती है।

नगर में कहीं भी अन्याय हो, अत्याचार हो, जुल्म हो, बेईमानी हो, भ्रष्टाचार हो, चटावन हो, जनेऊ हो, मुंडन हो — आप इनमें से किसी एक को खबर दीजिए, सब हाजिर! आपका काम बस इतना है कि फुटपाथ पर एक माइक रखवा दें और किसी खम्भे में लाउडस्पीकर बाँध दें!

जब कई दिन बीत जाते हैं और कहीं से किसी के मरने की सूचना नहीं मिलती तो मोहपातर पसेरी लुढ़काने लगते हैं कि लोग मर क्यों नहीं रहे हैं — ऐसा कहते थे मेरे गाँव में। ऐसे ही, हमारे ये नेता भी शान्ति के दिनों में बेचैन हो उठते थे — 'भई! ऐसे कैसे चलेगा यह देश?’

अशान्ति के ये भयानक दिन थे लेकिन नेताओं की हालत खस्ता! 

'अपने' कहे जानेवाले कई लोग एक-एक करके वी.पी. का साथ छोड़ रहे थे : अस्सी पर नेताओं की भीड़ जुटती लेकिन उदास! सबकी नजर दिल्ली और 'अध्यक्षजी' पर। उन्होंने वी.पी. को हटाने की मुहिम तेज कर दी थी। 'मंडल आयोग' ने पूर्वांचल के इन नेताओं को तोड़ दिया था। इन्हें देखते ही भाजपाई नारा लगाते — 'ठाकुर बुद्धी, यादव बल! झंडू हो गया जनता दल!' इन नेताओं के पास इसका कोई जवाब नहीं था! ये भी झंडू हो गए थे क्योंकि ये न ठाकुर थे और न यादव! इन्होंने सारी जिन्दगी विपक्ष की राजनीति की थी, लेकिन बदले हालात में इन्हें अपने लिए दो-टूक जगह नहीं सूझ रही थी!

इसी बीच 'हर हर महादेव' की जगह 'जय श्रीराम' ने ले ली। पप्पू की दुकान में 'भाँग' और चाय की खपत बढ़ गई। अस्सी के सभी ‘आदिवासी' रामभक्त हो गए और कारसेवा की तैयारी में लग गए। 23 अक्तूबर को आडवानी की गिरफ्तारी ने सनसनी पैदा कर दी! शंख, घड़ियाल, आतिशबाजी, मशाल, नारे अस्सी की दिनचर्या बन गए! कारसेवकों के जत्थे निकालनेवाले वही लोग थे जिनके साथ इनका रोज का उठना-बैठना था! 'मन्दिर-मस्जिद' के मामले में ये नेता सरकार के साथ थे लेकिन 'मंडल आयोग' ने इन्हें तमाशबीन बना दिया था!

गोपाल पानवाले की दुकान के सामने सुर्ती ठोंकते हुए रामवचन पांडे ने कहा — "पूरा देश एक भयानक हादसे से गुजर रहा है! आप यहाँ खड़े हैं और कौन जाने, कोई आतंकवादी आपकी ताक में कहीं छिपा हो! आप यहाँ बैठे हुए हैं, कौन जाने आपकी सीट के नीचे बम रखा हो; आप यादव के समर्थन में बोलिए, बाभन मार देगा; बाभन के समर्थन में बोलिए, यादव मार सकता है; आप दाढ़ी रखे हुए हैं, हो सकता है मदनपुरा या नई सड़क से गुजरते हुए बच जाएँ, मगर हिन्दू मुहल्ले से भी बच निकलेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है!...देखिए, उस पटरी पर केसरिया पट्टा बाँधे चीखते-चिल्लाते लोगों का जुनून!"

“पांडेजी!” मैं हरिद्वार की ओर मुड़ा, “अगर प्रोग्राम बनाइए तो 'कारसेवा' के बहाने हम भी तमाशा देखने अयोध्या चलें!”

"बिलकुल नहीं!” हरिद्वार ने दृढ़ता से कहा — "हम संजय हैं। हमें दिव्य दृष्टि प्राप्त है! हम यहीं से सारी दुनिया देख रहे हैं! हममें यह क्षमता इसलिए है कि हमें बनारस दक्षिणी से चुनाव नहीं लड़ना है, विधायक नहीं होना है, मन्त्री होने की ख्वाहिश नहीं है, हमें कार नहीं चाहिए, हवाई जहाज नहीं चाहिए; ये सारी आकांक्षाएँ और सपने आँखों की ज्योति हर लेते हैं, हमें कुछ दिखाई नहीं देता! 

"जैसे मन्त्रीजी के आने के पहले सड़क की सफाई होती है, कूड़ा-करकट फेंक दिया जाता है, चूना और डी.टी.टी. छिड़का जाता है, मन्त्रीजी गुजरते हैं तो उन्हें सारा कुछ साफ-सुथरा नजर आता है लेकिन हमें तब भी और अब भी गोपाल की दुकान के नीचे नाली में बह रही गन्दगी भी नजर आती है! 

"क्यों? क्योंकि मुझे अपनी साइकिल और स्कूटर से सन्तोष है!

“दूसरी बात यह कि हमारे दिल-दिमाग के तन्तु कहीं-न-कहीं जीवित हैं। इनमें हमारे संस्कार हैं, जाति है, धर्म है! जब डेढ़-दो करोड़ लोग 'जय श्रीराम', 'जै सियाराम' एक साथ गाना शुरू करेंगे तो हमारे न चाहते हुए भी अपने आप हमारे मुँह से निकल पड़ेगा; और फिर कहीं आँसू-गैस, लाठी-चॉर्ज और गोलियाँ चलनी शुरू हुई तो सारे 'रामभक्त' हमें भारत की 'जनता' लगने लगेंगे! और रामलला की दया से कहीं दो-चार डंडे हम भी खा गए तो हो गए धर्मनिरपेक्ष!...इसलिए हम यहीं खड़े-खड़े कारसेवा देखेंगे!...

“एक मजेदार बात और गौर करने की है। जब पिछले दिनों दाल चौबीस रुपए किलो बिक रही थी तो बीस लाख की आबादीवाले इस शहर में एक भी ऐसा आदमी आपको मिला जो उसके खिलाफ सड़क पर चिल्लाया हो? मेरी तो, मान लीजिए, पार्टी है; मैं उसके अनुशासन के बाहर नहीं जा सकता, लेकिन ये जो सड़क के उस पार नाच-गा रहे हैं कहाँ थे उस समय ? ये नहीं बोल सकते थे क्योंकि बनियों के मुनाफे का मामला था!”

पांडेजी चुप हो गए क्योंकि 'रामधुन' की आवाजें ऊँची हो गई थीं!

 

‘कर्फ्यू’ पहले की शाम! शायद 28 अक्तूबर!

अस्सी का हर कारसेवक अयोध्या के रामलला के साथ हॉटलाइन पर! प्रत्येक दस मिनट पर नई-नई अफवाहें! आडवानी नज़रबन्दी से फरार अयोध्या में! अटलबिहारी गिरफ्तार! मुलायम सिंह को दिल का दौरा! अयोध्या में तैनात सेनाओं में बगावत! वी.पी. सिंह अस्पताल में! गई-रात रामसेवक हनुमानजी ने गदा से मस्जिद की गुम्बज उड़ा दी! रामलला ने कारसेवकों की कमान खुद सँभाल ली है...आदि-आदि।

दूसरी ओर सड़क पार झाँझ, करताल, शंख, थाली जैसे बाजों समेत कुछ बच्चों का जमावड़ा! बड़े-बूढ़े रामभक्त पहले ही अलग-अलग रास्तों से अयोध्या के लिए रवाना किए जा चुके हैं! कुछ हैं जो अयोध्या के रास्ते में गिरफ्तारी दे चुके हैं और कुछ यहीं देंगे!

इस पार की पब्लिक को सुनाकर अशोक पांडे ने कहा — “बचपन में एक कहावत सुनते थे — 

परलैं राम कुकुर के पाले, 

खींच-खींच केले गए खाले! 

तब इसका मतलब समझ में नहीं आया था लेकिन आज आ रहा है। राम कुक्कुरों के पाले पड़ेंगे, तो उसका अंजाम वही होगा जो नजर आ रहा है!...”

मित्रो, अशोक पांड़े नेता हैं, जन-प्रतिनिधि नहीं! जन-प्रतिनिधि तो अस्सी पर एक ही शख्स है रामजी राय; जो बच्चन की बेंच पर बैठा वह सारा तमाशा देख रहा था!

रामजी राय को कई चीजों से परहेज है — खड़ी बोली से, फूलमाला और माइक से, मंच और लाउडस्पीकर से : उन्हें भोजपुरी गालियों का माइक टायसन कहा जाता है। यह भी कहते हैं कि नगरसेठ ने कभी अखबारों के जरिए यह ऐलान करवाया था कि जो कोई रामजी राय से एक भी ऐसा वाक्य बुलवा दे जिसमें गाली न हो, उसे सवा लाख रुपए का इनाम!...और आज भी वह इनाम अपनी जगह है!

जब अस्सी के सभी नेता वी.पी. को गच्चा दे गए थे, अकेले राय साहब थे जो 'रजवा' की डूबती नैया का डाँड़ा सँभाले हुए थे! उनका कहना था कि अगर चन्द्रशेखर पी.एम. हुए तो 'बाटी-चोखा' राष्ट्रीय भोजन, 'खो-खो' राष्ट्रीय खेल, 'सुरहा ताल' राष्ट्रीय कार्यालय और 'भोंसड़ी' पी.एम. ऑफिस होगा!

राय साहब का गला ही लाउडस्पीकर है और लाउडस्पीकर से निकलते रहते हैं ईट, पत्थर, गोले! बहुतों को उनसे बतियाना अपना मुँह पिटाना लगता है!

वे कई दिनों से कारसेवकों को जुटानेवाले रामभक्त राधेश्याम के पीछे पड़े थे! वे अस्सी के 'युनिफॉर्म' में बेंच पर बैठे-बैठे जिस किसी फालतू लड़के या भिखमंगे या साधू को देखते, बुला लेते — “यहाँ क्या उखाड़ रहे हो ? अयोध्याजी क्यों नहीं जाते? देखो, अगर रास्ते में पकड़े गए तो बढ़िया-बढ़िया पूड़ी-कचौड़ी, मिठाई-मोहनभोग मिलेगा!... और अगर कहीं राधेश्याम की सरकार आ गई तो जैसे स्वतन्त्रता सेनानियों को 'पिंसिन' मिलती है, वैसे ही 'पिसिंन' भी मिलेगी! और अगर लाठी-गोली खाके टें बोल गए तो सरग कहीं गया नहीं है! इस अस्सी पर भोंसड़ी के दाँत निपोरे गली-गली घूम रहे हो!..विसास न हो तो पूछो राधेश्याम से!”

राय साहब को देखते ही सारे रामभक्त हाथ जोड़ लेते थे।

अब तक 'अस्सी' के 'फेनामना' बन चुके राय साहब ने अकेले दम उनकी हालत बिगाड़ के रख दी थी! उस शाम कारसेवकों के जत्थे का नेता नारे का पहला बन्द बोलता — 

"रामलला हम आएँगे!”। 

जुलूस के बोलने से पहले ही इधर से राय साहब का लाउडस्पीकर बोलता — 

"मस्जिद वहीं बनाएँगे!” 

उधर से, “बच्चा बच्चा राम का!" 

इधर से, "भाजपा के काम का!" 

वे जब तक सँभलें तब तक बेंच पर खड़े होकर राय साहब चिल्लाते — 

रामलला तुम मत घबराना

हम तुम्हारे साथ हैं! 

कन्धे पर रामनामी गमछा, माथे पर चन्दन की रेखाएँ और चेहरे पर शान्ति और विश्वास की ऊर्जा — कौन कहता कि राय साहब रामभक्त नहीं हैं!

उनका यह जलवा अस्सी की पब्लिक तब तक देखती रही जब तक कारसेवक खेत नहीं रहे!

 

मित्रो, 30 अक्तूबर से लेकर 8 नवम्बर के बीच वह सारा कुछ हुआ जिसका इन्तजार था।

सरजू की जगह अयोध्या में खून की नदी बही! 

मस्जिद के ऊपर भगवा ध्वज लहराया!

रामलला ने ऐलानिया कहा कि अगर हमारा घर नहीं बना, तो तुम्हीं क्या, कोई भी सरकार नहीं टिकने पाएगी!

जद टूटा। एक सरकार गिरी, दूसरी सरकार बनी! बनी तो क्या, बनती-सी नजर आई!

और इधर अस्सी पर ‘कर्फ्यू’ लागू हुआ और फिर हट भी गया! 

मैं जब शाम को पहुंचा तो हर तरफ 'जै श्रीराम!' जै श्रीराम!' पप्पू की दुकान में भाग और चाय के लिए लोगों की धकापेल! लेकिन बच्चन की बेंच खाली! एक भी नेता नजर नहीं आया। अकेले रामवचन एक किनारे खड़े होकर खैनी ठोंक रहे थे!

उन्होंने मुझे देखते ही कहा — "सब लोग दिल्ली-लखनऊ गए हैं! कुछ सरकार बनवाने और कुछ अगले चुनाव की तैयारी में! और कुछ यह देखने कि फायदा किधर है ? आइए, यहीं बैठते हैं!"

हम बाहर ही बेंच पर बैठ गए।

"ऐसा लग रहा है जैसे एक बड़ी भारी बारात आई रही हो, जगह-जगह टैंट गड़े रहे हों, दस हजार बराती इधर, पाँच हजार उधर, चार हजार यहाँ, सात हजार वहाँ — कड़ाह चढ़े हैं, हलवाई लगे हैं, कम्बल दिए जा रहे हैं, बिस्तरे बैंट रहे हैं, कीर्तन हो रहे हैं, नाच-गाना चल रहा है — महीनों से व्यवस्था में पुलिस लगी है और सात नवम्बर को बारात विदा हो गई!

देश हलका महसूस कर रहा है...और बरातियों के चेहरे पर कोई खुशी नहीं! वी.पी. सरकार यही बराती थी!...

उन्होंने 'चैतन्य चूर्ण' की हथेली मेरे आगे की — लेंगे?'

"नहीं, पान खाया है अभी। सुनाते चलिए!"

"सुनाना क्या डाक् साहब ? गाँव में भी बनिहार ठीक किया जाता है साल-भर के लिए। माना जाता है कि साल-भर फसल ठीक रहेगी, हम निश्चिन्त रहेंगे, बीच में यह दगा नहीं देगा मगर यहाँ पाँच साल कौन कहे, छह महीने में ही टें बोल जाते हैं! 

"एक से बढ़कर एक हैं! जरा हर एक की सूरत देखिए! गाय कैसे दुही जाती है, पता नहीं, दुहने के लिए किधर बैठना चाहिए, थन की छेमी कैसे पकड़नी चाहिए, बछड़े को कब लगाना चाहिए, किधर से लगाना चाहिए, कब हटा लेना चाहिए, कुछ पता नहीं और चाहते हैं कि बाल्टी में पाँच लिटर दूध आ जाए!” 

“यह सब तो ठीक है पांडेजी, हम आपसे आपके नेता के बारे में सुनना चाहते हैं! वी.पी. के बारे में!” मैंने सीधे पूछा

पांडेजी हँसे-–“आप भी ती गाँव के ही हैं। जानते हैं, घरों में मालिक कौन होता है ? जो गाय-भैस दुहना जानता हो, खलिहान में चोरी न कर सके, रुपए-पैसे चुराना न जानता हो, जितना दे दिया जाए — गिनना जाने या न जाने — उसे सन्दूक में ज्यों-का-त्यों रखकर ताला लगाना जरूर जानता हो! तो डाक् साहब, जनता धूर्त को नहीं, मूर्ख को चाहती है! यह कोई पसन्द नहीं करता कि आप जिस सीढ़ी से चढ़े, ऊपर पहुँचने के बाद उसे गिरा दें। मान लीजिए, ऊपर पहुँचने के बाद कोई आपको झोंक दे। अगर सीढ़ी रहेगी तो किसी-न-किसी डंडे पर सँभल भी सकते हैं — झोंकनेवाले से लड़ भी सकते हैं लेकिन जब सीढ़ी ही नहीं है तब तो नीचे धड़ाम से गिरेंगे और उठने लायक नहीं रहेंगे! 

"और जानते हैं, सबसे बड़ी गलती क्या की उन्होंने ? आपने अपनी लड़ाई शुरू की थी खेतों से, खलिहानों से यानी उत्पादन की जमीन से जहाँ चीजें पैदा की जाती हैं। यह वह जमीन थी जहाँ कांग्रेस-भाजपा लाचार हो गई थीं आपके आगे। भाजपा घिधिया रही थी, भीख माँगने की स्थिति में थी — अच्छा, पाँच सीटें दे दो! चार ही दे दो! कोई बात नहीं, दो ही दे दो! 

"लेकिन आप वहाँ से चले आए बाजार में, शहर में जहाँ चीजें बेची जाती हैं। यह आपकी लड़ाई का मैदान नहीं था। यह वह मैदान था जहाँ किसी भी सूरत में वे आपको ले आना चाहते थे! और चले आए आप, नतीजा सामने है!"

कहते-कहते अचानक खड़े हो गए पांडेजी — "आप तो रहेंगे अभी! मैं नहा-निपटकर आ रहा हूँ!"




अगली शाम पता चला कि पांडेजी भी पटना!

अस्सी नशे में चूर था — थोड़ा भाँग के, थोड़ा 'जै श्रीराम' के और रहा-सहा अध्यक्षजी की सरकार के! अस्सी के कितने लोग बलिया के थे और कितने बनारस के — कहना मुश्किल था। पूरा माहौल पिकनिक और जश्न का था! उस रात हर अस्सीवासी के घर में एक बगीचा हो गया था जिसमें मकुनी और चोखा और अरहर की गाढ़ी दाल बनने जा रही थी!

जाने कैसे मेरे पाँव अपने आप घाट की ओर बढ़ चले। एक मुद्दत के बाद; और जा पहुंचे उसी 'बोधिवृक्ष के नीचे जहाँ दो साल पहले 'जनता के कवि, जनता के बीच' बैनर तले कवि-सम्मलेन हुआ था नामवरजी की षष्टिपूर्ति के अवसर पर। तब नागार्जुन थे, त्रिलोचन थे, केदारनाथ सिंह, अरुण कमल, भगवत रावत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, और भी कई लोग थे।

आज कोई नहीं था। मैं था और खंजड़ी पर गाता एक जोगी। इसे पहली बार देख रहा था मैं। हवा में गाँजे की खुनक थी और उसके बगल में बैठी एक विदेशी लड़की खंजड़ी पर पड़नेवाली उँगलियों की हरकत को बड़े गौर से निहारे जा रही थी!

 

सुनो सुनो ऐ दुनियावालो 
यह जग बना है लकड़ी का 
जीते लफड़ी, मरते लकड़ी 
देख तमाशा लकड़ी का।


 

इस मौसम में भी धुंधलके में दस-पाँच लोग घाट पर नहा रहे थे। लहरों के हलकोरे सुनाई पड़ रहे थे। और गाए जा रहा था जोगी — धूनी रमाए, पूरे बदन पर राख पोते, जटा-जूट बढ़ाए और गाँजे के लहराते तरन्नुम में — ऐ दुनियावालो! वह पालना लकड़ी है जिस पर बचपन में सोए थे! वह गुल्ली-डंडा भी लकड़ी है जिससे खेले थे! वह पटरी भी लकड़ी है जिसे लेकर मदरसा गए थे! वह छड़ी भी लकड़ी है जिससे मुरिस की मार खाई थी! ब्याह का मँड़वा और पीढ़ा भी लकड़ी है जिस पर ब्याह रचाया था! सुहाग की सेज भी लकड़ी है जिस पर दुलहन के साथ सोए थे! और बुढ़ापे का सहारा लाठी भी तो लकड़ी ही है!

ऐ दुनियावालो! अन्तकाल जिस टिकटी पर मसान जाते हो और जिस चिता पर तुम्हें लिटाया जाता है — सब लकड़ी है!

ऐ दुनियावालो! यह संसार कुछ नहीं, सिर्फ लकड़ी का तमाशा है!

मित्रो, मुझे यह कहते हुए न लाज है, न सरम कि मानव-योनि से बढ़कर बेकार जनम किसी जीव का नहीं! उसमें भी अगर लिख-पढ़ गया तो गया काम से! और लिख-पढ़कर भी कहीं लेखक-कवि हो गया तो कौड़ी का तीन समझिए! हर बात में अर्थ! हो न हो, तब भी अर्थ!

अब इसी 'निरगुन' को लीजिए। बुरा हो मेरा कि मुझे लगने लगा कनाट सर्कस (दिल्ली), चौरंगी (कलकत्ता), चर्च गेट (बम्बई), वगैरह-वगैरह चौराहे जरूर हैं जिनके लिए दुनिया सोने की है, चाँदी की है, ताँबे या काँसे की है, इस्पात की है लेकिन अपना भी एक चौराहा है जो दुनिया को लकड़ी का समझता है! इस पर आने-जानेवालों में कुछ हैं जो उसका इस्तेमाल 'हवन' के लिए करते हैं, कुछ 'डंडा' के लिए और कुछ 'डाँडा' (पतवार) के लिए!

लेकिन जान सब रहे हैं कि यह दुनिया 'लकड़ी' के सिवा कुछ भी नहीं! जब-जब भूकम्प आएँगे और दुनिया का जैसा हाल है उसमें आते रहेंगे — महल-दोमहले ढह जाएँगे लेकिन यह लकड़ी खड़ी रहेगी। अगर खड़ी नहीं, तो कम-से-कम पड़ी जरूर रहेगी।


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