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गिरिराज किशोर : स्मृतियां और अवदान — रवीन्द्र त्रिपाठी




रवीन्द्र त्रिपाठीजी के मेरे बड़े भाई होने के सम्बन्ध की नीव में पिता-समान राजेन्द्र यादवजी हैं रवीन्द्रजी से मैं यह आग्रह करता रहता हूँ कि वह साहित्य से जुड़ी अपनी छोटी-बड़ी स्मृतियाँ ज़रूर कलमबद्ध करते रहेंउनका प्रस्तुत, गिरिराज किशोरजी को याद करता हुआ इस माह के 'हंस' में प्रकाशित लेख पढ़ने के बाद आप भी शायद मेरी इल्तज़ा से सहमत होंगे। संस्मरण को शब्दांकन के लिए उपलब्ध कराने का रवीन्द्रजी को आभार. 


भरत एस तिवारी
शब्दांकन संपादक
(नोट: प्रिय हिंदी साहित्य-जगत! इस बात का दुःख हो रहा है कि बहुत तलाशने के बाद भी गिरिराज किशोरजी की कोई तस्वीर मुझे अपने पास नहीं मिली. अंततः नेट पर ढूँढा लेकिन वहाँ भी ...)




लगे हाथ ये भी बता दिया जाए कि आगे चलकर `जनसत्ता’ में एक वाकया हुआ जिससे गिरिराज किशोर का गहरा नाता है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ये अज्ञात-सी मगर सच्ची घटना है। मेरी जानकारी में अभी तक कहीं लिखित रूप में आई नहीं है।

गिरिराज किशोर : स्मृतियां और अवदान

— रवीन्द्र त्रिपाठी

गिरिराज किशोर से मेरा परिचय राजेंद्र यादव ने कराया था। `हंस’ के दरियागंज वाले दफ्तर में। ये लगभग बत्तीस-तैंतीस साल पहले की बात है। साल ठीक ठीक याद नहीं हैं। सटीक रूप से इतना कह सकता हूं कि ये 1990 के कुछ बरस पहले हुआ था। सर्दी का मौसम था। लगभग शाम पांच बजे घूमता-घामता `हंस’ के दफ्तर में चला गया था।

उस समय मैं दिल्ली विश्व विद्यालय में शोध कर रहा था और फ्रीलांसिंग करता था। यादवजी अक्सर अपने परिचितों से बेतकल्लुफी से बात करते थे। कोई औपचारिता नहीं चाहे कोई उम्र में बड़ा हो या छोटा। उस दिन ‘हंस’ के दफ्तर पहुंचा ही था कि थोडी देर के बाद गिरिराजजी वहां आ गए। यादवजी ने उनको देखते ही कहा- `अरे, अचानक कहां से टपक पडे?‘ यादवजी के अन्य मित्रों और परिचितों की तरह गिरिराजजी भी उनकी बेतकल्लुफी की इस आदत से परिचित थे, सो बोले- `सोचा तुम सही सलामत हो या नहीं, ये देख लूं। आखिर तुम्हारी जिम्मेदारी भी तो मेरे ऊपर है पिताजी।‘ फिर दोनों के ठहाके। मैं भी हंसा। गिरिराज उस दिन एक उम्दा सूट पहने थे। इसी को लक्षित करते हुए यादवजी कहा- `ये किसका सूट मार दिया?’ गिरिराजजी ने फिर कोई चुटीली बात कही और फिर दोनों के ठहाके। इसी ठहाकेबाजी दौरान यादवजी ने गिरिराज से मेरा परिचय कराया। गिरिराज ने बडे प्यार से जताया कि मेरा लिखा कुछ कुछ पढा है। `हंस’ में।

उन दिनों मोबाइल फोन होता नहीं था इसलिए बिना किसी पूर्व सूचना के कहीं पहुंचना सामान्य सी बात थी। खासकर किसी संपादक-लेखक के यहां। `हंस’ वैसे भी लेखकों का मिलन केंद्र था। दिल्ली में रहनेवाले और बाहर से आने वाले वहां रोज ही आते रहते थे। राजेंद्रजी के शब्दों में `आ टपकते’ थे। दोपहर बारह बजे से शाम छह-सात बजे तक। देर तक गप-शप होती थी। कभी कभी नौ-दस बजे तक `बैठना’ भी। 

इस पहली मुलाकात के बाद गिरिराजजी से बाद में अक्सर मुलाकातें होती रहीं। हालांकि वे कानपुर रहते थे लेकिन दिल्ली अक्सर आते रहते थे। जब उनको साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तब `जनसत्ता’ के लिए उनका साक्षात्कार मैंने ही लिया था।

लगे हाथ ये भी बता दिया जाए कि आगे चलकर `जनसत्ता’ में एक वाकया हुआ जिससे गिरिराज किशोर का गहरा नाता है। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में ये अज्ञात-सी मगर सच्ची घटना है। मेरी जानकारी में अभी तक कहीं लिखित रूप में आई नहीं है।

वाकया 1992-93 का है। ये लगभग वैसा ही है जैसा पुर्तगाली नोबल पुरस्कार विजेता जोजे सरामागु के उपन्यास `लिस्बन की घेरेबंदी का इतिहास’ (अंग्रेजी नाम `सीज ऑफ लिस्बन’) में होता है। इस उपन्यास में एक प्रूफरीडर लिस्बन के इतिहास संबंधी एक प्रकाशित होनेवाली किताब में प्रूफरीडिंग के दौरान एक छोटा-सा बदलाव करता है जिससे किताब का पूरा आशय बदल जाता है।

उस समय गिरिराजजी का एक लेख `जनसत्ता’ के संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ था। जब अखबार छप गया तो मालूम हुआ कि उसमें एक बडी गड़बडी हो गई है। लेख तत्कालीन राजनीति पर केंद्रित था और उस समय के प्रधानमंत्री नरसिंह राव का भी उसमें हवाला था। गिरिराज किशोर के मूल लेख में कुछ जगहों पर, जहां वाक्य का अंत `है’ से हो रहा था वहां प्रकाशित रूप में `नहीं है’ हो गया था। इससे लेख का पूरा ही मतलब बदल गया था। सामान्य पाठक को ये बदलाव समझ में नहीं आया था। लेकिन गिरिराजजी की निगाह से कैसे बच सकता था? उन्होंने गलती पकड़ ली और कानपुर से, जहां वे रहते थे, तब के संपादक प्रभाष जोशी को फोन किया। फिर प्रभाषजी ने जांच शुरू कराई कि ये सब कैसे हुआ। मुंबई के इंडियन एक्सप्रेस के कार्यालय से दिल्ली केंद्र में कंप्यूटर इंजीनियर बुलाए गए कि जांच करके बताएं कि किस स्तर पर ये सब हुआ। जांच के दौरान पाया गया कि गिरिराजजी के मूल लेख में कंप्यूटर से एडिंटिंग की गई है। किसने की एडिटिंग? ये प्रश्न तब के `जनसत्ता’ कार्यालय में एक सनसनीखेज विषय बन गया था। पता लगा कि आलोक तोमर ने ये शरारती फेरबदल किए थे। आलोक तब प्रभाषजी के बहुत प्रिय थे। उनका `जनसत्ता’ के भीतर अपना जलवा था। अब क्या होगा – ये सवाल सबकी जुबां पर था। आखिरकार आलोक तोमर को इस्तीफा देना पड़ा।

वक्त आगे बढा और आगे चलकर ऐसा भी हुआ कि गिरिराजजी साहित्य के इलाके में अखाड़ेबाज बने। इस अर्थ में कि उन्होंने एक हिंदी के दूसरे बडे अखाड़ेबाज को साहित्य की राजनीति में मात दी। ये दूसरे अखाड़ेबाज थे नामवर सिंह। लेकिन इस दंगल में मात नामवर सिंह जरूर हुए लेकिन वे चित्त नहीं हुए। चित्त हुए कवि केदारनाथ सिंह।

घटना इक्कीसवी सदी के आरंभिक दौर की है। साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष का चुनाव होना था।। एक तरफ थे उर्दू के प्रोफेसर गोपीचंद नारंग और दूसरी तरफ थी बांग्ला की लेखिका महाश्वेता देवी। महाश्वेती देवी को ये चुनाव लड़ाने में जिनकी प्रमुख भूमिका थी वे थे नामवर सिंह। नामवरजी की तूती बरसों तक साहित्य अकादेमी में बोलती रही। इसी कारण ये आम धारणा भी बन गई थी कि अकादेमी में हिंदी को लेकर हर फैसले में नामवरजी की चलती है। इसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। इसी कारण चुनाव के दौरान हिंदी के कई लेखक गोपीचंद नारंग के साथ हो गए थे। इनमें प्रमुख थे कमलेश्वर और गिरिराज किशोर। राजस्थानी के लेखक विजय दान देथा ने नारंग के पक्ष में अखबारों लिखित अभियान चलाया था।

जहां तक मेरी जानकारी है, नामवर सिंह से खार खाए हिंदी के कुछ लेखकों का ये सवाल भी था कि अगर महाश्वेता देवी अध्यक्ष चुनी गईं तो हिंदी का संयोजक कौन होगा? चर्चा थी कि नामवरजी चाहते हैं संयोजक केदार नाथ सिंह बने। इस बात पर भी नामवरजी और गिरिराजजी में ठन गई थी। जिन दिन चुनाव हो रहा था उस दिन रवींद्र भवन के परिसर में, जहां साहित्य अकादेमी का कार्यालय है, मैं भी मौजूद था। `प्रगतिशील वसुंधा’ के तब के संपादक और प्रगतिशील लेखक संघ के तत्कालीन महासचिव कमला प्रसाद (दिवंगत) भी थे। वे चुनावी समर में महाश्वेता और नामवरजी के साथ थे। मैं उनके साथ गपिया रहा था। हिंदी कवि ( दिंवंगत) भगवत रावत भी वहां उपस्थित थे। उधर से गिरिराजजी आए। कमलाजी और उनकी मुलाकात हुई। शुरुआती बात तो सौहार्द्रपूर्ण तरीके से हुई फिर कमलाजी ने उनको अलग ले जाकर कुछ बात की। धीमे धीमे। पता नहीं उन्होंने क्या कहां पर गिरिराजजी ने जवाब में उनसे जरा जोर से कहा जिसे मैंने भी सुना - क्या साहित्य अकादेमी पर नामवर सिंह और उनके के संबंधियों का ही राज रहेगा? इशारा केदारनाथ सिंह की तरफ था जो नामवरजी के समधी थे। केदारजी एक सर्वप्रिय व्यक्ति थे। अजातशत्रु की तरह। एक बहुत अच्छे कवि। पर हिंदी साहित्य की राजनीति में उनको नामवरजी के साथ मिलाकर ही देखा जाता था।

खैर, चुनाव हुआ। महाश्वेताजी हार गईं और गोपीचंद नारंगजीत गए। ये होना ही था क्योंकि महाश्वेताजी ने चुनाव जीतने के लिए अपनी तरफ से कुछ खास नहीं किया। वे चुनाव में खडी तो हुईं पर अपने लिए किसी तरह की लॉबिंग नहीं की। चुनावी कमान उन्होंने नामवर सिंह के हाथों सौंप रखी और इसके लिए एक पत्र भी सार्वजनिक किया था। नामवरजी बडे विद्वान थे इसमें शक नहीं। लेकिन वे साहित्य की राजनीति भी करते थे। पर जिस तरह की राजनीति करते थे उसे आजकल `बोर्डरूम पॉलटिक्स’ कहा जाता है। यानी कमरे में बैठकर शतरंजी चाल चलना। वे चुनावी राजनीति में माहिर नहीं थे जबकि नारंग इसमें दक्ष थे। महाश्वेता की हार की ये भी एक बड़ी वजह थी।

नारंग की जीत के बाद गिरिराजजी साहित्य अकादेमी में हिंदी के संयोजक बन गए। पर इससे ये निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि नारंग से उनकी हमेशा पटती रही या वे नारंग के गुट के थे। गिरिराजजी स्वतंत्रचेता थे और इसी कारण आगे चलकर नारंग से उनके मतभेद भी हुए। ये सब हुआ अकादेमी के तत्कालीन प्रशासन में हिंदी के प्रशासकीय प्रभारी/ सहायक सचिव को लेकर। गिरिराजजी का मानना था तत्कालीन सहायक सचिव नाकारा भी है और हिंदी के एक प्रकाशक की बेहद स्तरहीन साहित्यिक पत्रिका के संपादक भी बने हुए हैं। गिरिराजजी का कहना था ये काम वो सहायक सचिव बिना साहित्य अकादेमी की अनुमति लिए कर रहे हैं, इसलिए कम से कम उनको अकादेमी से नहीं तो लेकिन प्रशासकीय जिम्मेदारी से हटाया जाए। लेकिन नारंग इसके लिए तैयार नही हुए। तब गिरिराजजी ने अकादेमी के कार्यक्रमों में आना लगभग बंद-सा कर दिया। अपने संयोजकीय कार्यकाल के आखिर बरस में। उन्होंने मुझसे ऐसा ही कहा था।

साहित्य अकादेमी में बतौर हिंदी संयोजक गिरिराज किशोर का कार्यकाल इसलिए भी याद रखा जाएगा कि कमलेश्वर, मनोहर श्याम जोशी और वीरेन डंगवाल जैसों को उस दौरान साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिले। शायद नारंग का पूरा सहयोग मिला होता तो हिंदी के लिए वहां कुछ और बड़ा कर पाते। पर अकादेमी की राजनीति में अध्यक्ष काफी ताकतवर होता है और वो संयोजक को सहयोग न दे तो संबधित भाषा में रुटीन के काम के अलावा कुछ खास नहीं होता। गिरिराजजी बाद में निजी बातचीत में नारंग के खिलाफ बोलते रहे।

हिंदी साहित्य गिरिराज किशोर को कैसे याद करेगा? बेशक एक अच्छे कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में। पर इससे भी अधिक महात्मा गांधी की स्मृति को आगे बढाने के लिए। उन्होंने गांधी जीवन से संबंधित दो उपन्यास लिखे- `पहला गिरमिटिया’ और `बा’। `बा’ कस्तूरबा गांधी पर केंद्रित है। गिरिराजजी के दोनों उपन्यास कितने महत्त्वपूर्ण हैं इसका आकलन इस बात से भी होना चाहिए कि आज जिस तरह गांधीजी के जीवन और विचारों का हनन करने का प्रयास हो रहा है उसमे इन उपन्यासों की क्या भूमिका हो सकती है। ये ध्यान में रखना चाहिए कि गिरिराजजी ने ये काम आज के माहौल से कई साल पहले किया। आजादी की लड़ाई के दौरान वैसे तो गांधी को केंद्र में रखकर हिंदी में काफी कुछ लिया पर बाद में वो सिलसिला रूक-सा गया। गिरिराजजी ने इस रूके हुए सिलसिले को आगे बढ़ाया। इसी कारण उनके ये दोनों उपन्यास साहित्यिक के अलावा वैचारिक अहमियत भी रखते हैं। गांधी-विचार कोई व्यक्ति केंद्रित-विचार नहीं है। ये पूरी मानवता और प्रकृति के बचाने का विचार है। इसी कारण हिंदी और दूसरी भाषाओं के साहित्य के पाठकों के लिए गिरिराजजी का लेखन एक सार्वजनीन व सार्वकालिक संदर्भ-स्रोत रहेगा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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2 टिप्पणियां

  1. जनसत्ता का आलोक तोमर वाला किस्सा काफी चर्चित रहा है और कई बार लोगों से सुना है, हालांकि शायद यह सही है कि कहीं लिखा हुआ नहीं पढ़ा।

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