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मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — "पगला गई है भागवती!..."

दिस॰ 17, 2019

दुनिया में आदमियों की दुनिया में औरतों की दुनिया... सवालों को टटोलती वरिष्ठ कथाकार मैत्रेयी पुष्पा की लेखनी



मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — पगला गई है भागवती!...


पगला गई है भागवती!...

मैत्रेयी पुष्पा

काम से उचटकर भागो की निगाह हवेली पर पड़ती है तो अपनी ही गली अनपहचान-सी मालूम होती है। रेत-भरी डगर पर दूधिया रोशनी की नदी बह निकली हो जैसे। कौन कहेगा कि यह हवेली जर्जर होकर चरमरा रही है, या ढुरऊ बखरी फूट जाने के कारण इसकी पौर में भैंस बँधने लगी हैं! आज की तो रंगत ही अलग है, जिज्जी के घर की।

जिज्जी भाई-बहनों में सबसे बड़ी संतान थीं और भागो सबसे छोटी। जिज्जी का ब्याह यहाँ महुआपुर में हुआ होगा माधोसिंह के साथ, पर भागो को अपने ब्याह की तो याद ही नहीं।

अपने गाँव की कोई झाँईं-परछाईं भी मन में नहीं उतरती। एक दिन जिज्जी जोर से रो उठीं तो वह गिट्टे खेलते से भागी थी। जड़ मूरख-सी निरखती रही बहन को। पड़ोस की औरतें जिज्जी को चुपाने में लगी थीं, ‘‘काहे कों रोऊती ठकुरायन? करम की हेटी हती अभागिन, सो कछू देखवो नहीं बदौ हतौ। इतेक लंबी जिंदगी, फिर अपनी जात-बिरादरी में दूसरे ब्याह की रसम-रीत...?’’



‘‘आँसू काढ़ जनमजली! आदमी नहीं रहौ और तें उजबक-सी हेर रही!’’ किसी जनाने हाथ ने उसके सिर पर थप्पड़ दे मारा।

वह सारे दिन कोठे में छिपी बैठी रही। फिर समय के अंतराल ने बता दिया कि वह विधवा हो गई। तब से आज तक उसका तन, उसका मन, संपूर्ण अस्तित्व विधवा है। होंस-उमंग, पहनना-ओढ़ना, सजना-सँवरना उसके लिए वर्जित है। औरतें उसे सगुन-सात-मंगल कार्यों से बचाती हैं। सुबह-सवेरे उसका किसी के आगे पड़ जाना अशुभ है। यह बात भागो जानती है। वह स्वयं भी देख-बचकर निकलती है। ‘अठैन’ कर देने से सामने वाले के साथ उसका अपना मन भी दुखी हो जाता है।

सदैव जी-जान लगाकर जिज्जी के काम करती रही। जीजा के हुकुम पर दौड़ती रही। आम-जामुन तोड़ते, बहनोतों को गोद खिलाते उमर उतरने को हो आई है अब तो।

आज शोभा देखने लायक है। लोग क्या जानते नहीं कि माधोसिंह की हवेली भले ही मिट्टी और ककरिया ईंटों की बनी हो, मगर पुरानी चाल की राजसी गरिमा से खड़ी है। इन दिनों तो रंग-रोगन पुतवा दिया है, सो नई लकदक से जगर-मगर है।

जब से गाँव में बिजली आई है, शादी-ब्याहों की रंगत ही बदल गई है। पहले की तरह नहीं हंडा ‘मूड़’ पै धर कें चलो तो कहो बीच रास्ते में ही गुप-गुप करके बुझ जाय। दिखइया, सुनइया, दूल्हा, पालकी सब वहीं के वहीं थिर।

भले ही ‘करंट’ सिंचाई के लिए न मिले, देर-सवेर मिले, पर ब्याह के समय तो कहकर रखना पड़ता है, किसी प्रकार ‘औसर’ की शोभा बनी रहे। ब्याह के खर्च में से ही सौ-पचास काढ़कर ऑपरेटर के हाथ पै धर दो, पंगत जिंवा दो बस्स!

सजावट भी कम नहीं करवाई जीजा ने! आतिशबाजी चले न चले, यह रंग-बिरंगे लट्टुओं पर थिरकती चमकनी-फुरहरी किसी आतिशबाजी से कम है क्या? चारों ओर अनार-से छूट रहे हैं-आँखों के सम्मुख बिखरते हुए चमकीले छींटे।

भागो की आँखें जगमगाने लगीं।

आज अनुसुइया होती तो देखती कि भाई के ब्याह पर उसका घर-द्वार कैसा...!

अनुसुइया का ध्यान आते ही भागो का मन बुझने लगा। कलेजे में हूक उमड़ आई। हाथ में पकड़ा हलदी का बेला गिरने-गिरने को हो आया।

इतने में जिज्जी आ गईं, ‘‘भागो, तुम्हें दस जांगा देखि आए रुआँसौ मों बनाएँ काहे बैठीं इतै? कपड़ा उन्ना बदल डारौ। ऐसी ही गत बनाए रहैगी पई-पाहुनों के आगें सिर्रिन।’’

‘‘जिज्जी को याद नहीं आ रही अनुसुइया?’’

‘‘अब जिज्जी से क्या कहे कि उन्ना कपड़ा देखें या कुटान-पिसान करवाएँ? तुमने तो कह दई कि मठोले की जनीं कों टेर कें करा लो काम! पर वो आबै तब न।’’

अब पहले की-सी बात रही है कहीं? वह चमरौटा के गिनकर दस चक्कर लगा आई है, तब कहीं जाकर...इतने में तो वह खुद ही फटक डालती गेहूँ। और आ गई, यही क्या कम है। जिज्जी को संतोष हो गया।

अजब बहस बाँध रखी है —  इन्हें बुलाने की जिद है और उन्हें पैज पड़ गई है न आने की। आपसी अहं की बात ही कहो। प्यार-प्रीत का बुलाना-चलाना हो तो आदमी सिर के बल चला आए। अब जीजा तौ अपनी ठकुराइस गाँठे फिरते हैं। मठोले की जनी बुरी थोड़े ही है, बात करो तो रस-भरी गगरी-सी छलकती है, सौ-सौ बेर पाँव पड़ती है। दुःख-तकलीफ में जान-प्रान से हाजिर। जो कुत्ता-कूकरा की तरह दुत्कारोगे तो फिर अपनी इज्जत-आबरू तो ‘सबै’ प्यारी है।

जिज्जी की बात पर वह खड़ी हो गई। अपनी हलदी-मसाले लगी धोती को झाड़ा और ठीक से पटली बिठाने लगी।

कपड़े बदलने का मन था ही नहीं, फिर भी ट्रंक खोला। धोतियाँ उलटती-पुलटती रही, ‘‘जे तौ अनुसुइया ने पहरी थी केशकली की बरात के दिन। नई की नई धरी है। बस, एक बार ही पहरी। और जे! जे स्यौरा-पहाड़ के मेला में पहर गई थी। जाने किस की नजर लगी कि मोंडी भट्टिन बुखार में तपत आई। जा सुपेद धुतिया...कैसी लगत हती पहर कें, मीरा बाई! जोगिन! बस, तनपुरिया हाथ में लेवे की देर हती।’’

उसने ट्रंक बंद कर दिया, देर तक वहीं धरती खरोंचती रहीं। क्या करे मनिख! मन कुंद हो तो पहनना-ओढ़ना रुचता है भला? होंस-हुलस, सोंख-मौज सब मन के खेल ठहरे। उमंग-उछाह, सुख-दुःख, जवानी-बुढ़ापा मन के भीतर उठती सोच की लकीरें ही तो हैं। अनुकूल पड़ें तो बूढ़े शरीर में भी पंख लगा दें और विपरीत पड़ें तो गद्दर जवानी भी रोगिनी-सी घिसटे।

आज के दिन होती न अनुसुइया, तो उर्र-फुर्र उड़ी फिरती। अब तक तो गाँव के दस चक्कर मार आती। मठोले की जनी तो क्या पूरे चमरौटा और कछियाने कों बुला लाती। अपने नरेश भइया के ब्याह की होंस में ‘बिला-पपरिया’ बाँट आती। भाभी के रूप-सरूप की गाथा कहती डोलती।

कितनी बार तो उसी से झगड़ लेती कि अम्मा, नाइन बुलाओ, उबटन लगवाकर नहाना है। मेहँदी-बिंदी का सवाल अलग। फिर चुरेलिन बुलाओ, चूड़ियाँ पहननी हैं। दर्जी काका की देहरी खूँद आती दसियों बार। चोली-घाघरे में बीसियों खोट निकालकर रख देती-यहाँ से ऊँचा, वहाँ से छोटा! कद की लंबी थी सो चार की जगह पाँच गज कपड़ा लगता था घाघरे में।

जब तक ठीक न होता, बड़बड़ाती रहती, ‘‘फि़टन ठीक नहीं है अम्मा!’’

भागो के समक्ष इस बेवक्त अनचाहे चित्र क्यों उभरने लगे! ये यादें क्या इस विवाह की वेला में उमड़ने को थीं?

अनुसुइया पैदा हुई थी जिज्जी की पाँचवीं संतान! पहले चार लड़के थे। वह सतमासी जनम पड़ी, रोई, न कुलबुलाई। महतरानी ने बड़ी निश्चितता से एक कोने में तसले समेत धर दी, ‘‘मोड़ी जनमी है, मरी भई। द्वारे खबर कर दो।’’

‘‘चल अच्छी...’’ न जाने किसका जनाना स्वर था।

भागो तसले के पास जा बैठी। नवजात शिशु पर निगाहें अटकाए देर तक देखती रही। लगा कि साँस चल रही है। चिड़िया के हाल भए बच्चे की-सी कमजोर नन्ही गरदन के ठीक पास आँखें गड़ा दीं— लगा कि अंडी-भर जगह में हरकत हो रही है— ऊपर-नीचे गिरती— धुक्, धुक्।

भागो उछल पड़ी। दौड़कर जिज्जी की खटिया के पास आ गई, ‘‘जिज्जी, ओ जिज्जी! मरी नहीं है बिटिया! तेरौ कौल, जिंदी है! फि़ंकवा न दिओ।’’

जननी ने बहन की आवाज पर आँखें खोलीं और उदास हो गई, मानो बेटी खत्म हो जाने से मिली विश्रांति में किसी ने खलल डाला हो।

‘‘अब भागो, तें ही पाल लै, जा मोंड़ी को।’’ दाई ने कठोरता से कहकर बित्ते-भर की कमजोर काया को उसकी गोद में डाल दिया।

भागो क्या जाने, उसे तो बिटिया सपने में सोचा हुआ वरदान लगी। बाँहों में सहेज ली। रुई के फाये को गुड़ के घोल में डुबो-डुबोकर बच्ची को चटाती रही। उसके बाद बकरी का दूध, गाय का दूध...! माँ की रिक्तता पाटने का सामर्थ्य-भर उपक्रम करती रही। बच्ची जब कभी गाय-बकरी के दूध से बीमार होने लगती तो भागो जिज्जी से विनती करती, ‘‘जिज्जी, पिवा दो दूध! हाँ...हाँ जिज्जी! बिटिया भूख से तलफ़ रही। पिवा दो तनक...।’’

भागो को गीता के मंत्रें का ज्ञान भले न हो, साधना-उपासना का मरम उसकी भदेस-बुद्धि से बाहर की चीज है और न उसे रामायण की चौपाइयाँ ही याद हैं, लेकिन उसने सती अनुसुइया, सावित्री, नल-दमयंती और मदालसा की कथाएँ सुनी हैं। आख्यानों में अटूट श्रद्धा है, इसी कारण वह बिना नागा मंदिर जाती है।

‘अनुसुइया’ नाम उसे बहुत भाया। बिटिया का नाम अनुसुइया रख दिया।

अप्रसूता-कोख में ममता का अथाह सागर लहराने लगा। जीवन की एकांगी छाया में वह अनुसुइया को समेटकर कुनबा-कुटुंब वाली हो गई। एक जीव से सारा संसार...ऐसा भरा-पूरा! भागो को लगता कि उँगली पकड़कर बिटिया उसे अलौकिक ब्रह्मांड में उतार लाई है।

और दिन, महीने, साल सरकते-सरकते अनुसुइया नाजुक बेल-सी बढ़ने लगी। फूलों-सी महकने लगी। वह सराबोर हुई बेटी पर निछावर हुई जाती। वही क्या, पूरा मोहल्ला, गाँव गमकता, जैसे कच्चे आम फलने की ऋतु आ गई हो। गोरी कचनार-सी बेटी के लंबे बाल देखकर ठकुराइन सिहा उठतीं:

‘‘भागो तें जानत हती कै ऐसी सुगढ़ निकरहैं मोंड़ी।’’

‘‘नजर न लगइओ जिज्जी! तुम्हारी आँखन में नौन-राई!’’

घर में भागो के वैधव्य की चर्चा होती, अनुसुइया की जन्म-कथा कही जाती, मगर अनुसुइया सबसे निष्प्रभाव हुई बेटी बनकर उसी की गोद में पड़ी रही।




‘‘मौसी, ओ मौसी! आटे, बेसन-मसालों में ही लिपटी बैठी रहोगी या...। क्यों पागल हुई इन सब में समय नष्ट कर रही हो।’’ नरेश हँसता है।

भागो की तंद्रा टूटी। अरे, वह तो यहीं बैठी रह गई।

‘‘मौसी, पहले कहतीं तो तुम्हें इतना काम न करना पड़ता। शहर से थैलियों में बंद आटा, पैकटों में बंद मसाले-बेसन, सब आ जाता। तुम्हारे सारे झंझट खत्म।’’

अब नरेश को कौन समझाए कि भइया, पाँच गाँव का न्योता है। दोपहर से आधी रात तक बीसियों पंगत बिठानी पड़ेंगी। तुम्हारे थैली-पैकेट कितनी देर चलेंगे यहाँ?

ब्याह-कारज ही द्वारे पर लोग मुँह जुठराते हैं। वैसे कौन आता है किसी के घर खाने के लिए। सब अपनी नोंन-रोटी पर हिम्मत रखते हैं।

‘‘नरेस, तुमारी दुल्हन आबै तो खरीदबा दिओ जे अटाँक-छटाँक भरे मसाले के पैकट और सेर-आध सेर की थैली चून की। भइया, भागो की जिंदगानी तौ जई काम के सहारे गुजरी है।’’

नरेश का ब्याह क्या, बस दावत समझो। ब्याह तो कहता है कि ‘कोरट-कचैरी’ में हो गया। वह तो बड़े असमंजस में पड़ी है कि यह लड़का बरात लेकर किसके दरवाजे गया होगा? टीका किसने किया होगा? पाँव-पखराई कैसे हुई होगी और कलेऊ में नेग के लिए किससे झगड़ा होगा-वकील, जज्जों से?

पर जीजा कहते हैं कि नरेश का ब्याह हो गया। शहर के ब्याह ऐसे ही होते हैं-कागज पर दस्तखत करके। जिज्जी भी कैसी हैं जो अंधी की तरह जीजा की बात मान गईं।

तिरवेनियाँ तो ऐन जिज्जी के सामने बता रही थी कि वह अपने डॉक्टर देवर के यहाँ ब्याह में शहर गई थी। कहती थी कि ऐसा रौनकदार ब्याह तो उसने अपनी जिदगी में नहीं देखा, बैंड वाले खुद ऐसे सजे कि उनके सामने दूल्हा फीका लगने लगा।

उसने तो ऐसा खाना कभी नहीं खाया। गिनने पर आई तो गिनती नहीं कर सकी— छप्पन भोगों से भी ज्यादा रही होंगी खाने की चीजें। फिर जितनी मरजी हो, उतनी लो। यहाँ की तरह नहीं कि लड्डू वाला एक बार पंगत के सामने फिर गया सो फिर गया। फिर बीस टेर मारते रहो, मजाल है कि दरसन दे जाए। पर शहर के लोग खाते ही कितना हैं? बस, चिरइया की तरह एक-दो चोंच।

फिर जीजा और नरेश कहते हैं कि शहर के ब्याह कोरट में ...।

खैर, अब ब्याह वहाँ हुआ है, तो हुआ है। कौन जिरह करे! पर जीजा ने तो पंडित के सामने, अगिनि के समक्ष उसके फेरे डालने की जरूरत ही नहीं समझी। जिज्जी इस बात पर खूब झगड़ी थी कि अब गाँव में वे क्या मुँह दिखाएँगी? कुनबा-खानदान, पुरा-पड़ोस के बुलउआ-चलउआ तो उन्हें ही निभाने पड़ते हैं, सभी के उत्तर उन्हें ही देने पड़ेंगे। अब माधोसिंह की मूँछ पकड़कर तो कोई पूछेगा नहीं।

जिज्जी ने बहुत रार मचाई तो जीजा ने फटकार डालीं, ‘‘मूरख हो तुम! बखत के संग बदलबौ सीखौ। नहीं तो कल्ल के दिना लड़का बुढ़ापै पै ठोकर मार जैहै। अकेलीं बैठी बिसूरत रहियो।’’

‘‘हओ, अब तुम्हें जरूल बँहगी में बैठार कें तीरथ करा ले आहै।’’

‘‘न करायै तीरथ, न बैठारै बँहगी। इज्जत-आबरू तौ राखि है! माधोसिंह के खानदान की सान-सौकत और बंस-बेल तो जई से रैहै। अपनी हठ पकरें रहें, दुसमनाई बाँध लें! जा कहाँ की अकलमंदी भई!’’

भागो ने सब सुना। बड़ी अकल है जीजा में!





‘‘भागो, ओ भागो! अरी बाहर सिरकारी अहलकार आ गए, नाते-रिश्तेदार जुर गए, और तें इतै कोठा में जा बैठी। का करई इतै? सरबत पहुँचवा दो बाहर।’’

जिज्जी की आवाज पर जैसे वह सोते से जागी हो। बाल्टी और स्टील का जग उठा लाई। यंत्रवत् शरबत घोलने लगी।

भागो ने उझककर देखा-बाहर की बैठक में बहू सज रही है। जीजा ने खास प्रबंध किया है। कह रहे थे कि शहर की बेटी है, कुछ दुःख-तकलीफ न हो।

सजाने वाली भी बहू के संग शहर से आई है। बहू साड़ी-कपड़ा, सिंगार-पटार अपने संग लाई है। गहने जिज्जी ने दिए हैं। जिज्जी खड़ी-खड़ी बता तो रही हैं कि दस्ताने का पेच कैसे लगेगा, बेल-चूड़ी कैसे पहनी जाएँगी और तिदाना गले से चिपकाकर पहना जाता है। कर्धनी की कील आधे ठप्पे से जुड़ेगी।

बहू उत्फुल्ल है। वह गाँव के गहनों को कैसे निरख रही है— हाथ में उछाल-उछालकर तोल रही है— ‘‘ओ गॉड, सो हैवी! ऐसे भारी! मेरी तो कलाई ही मुड़ जाएगी। पाँव छिल जाएँगे।’’

माधाो जीजा सुनहरी अचकन और चूड़ीदार पजामा पहने भीतर आए। कनखी से बहू के कमरे की ओर झाँक गए। निछावर हुए जाते हैं। होंठों में असीसें भरी हैं। कितने खुश हैं जीजा।

जिज्जी से कहते हुए निकल गए हैं, ‘‘देख लो, अब कोई जा नहीं कह सकता कि माधोसिंह के बेटे ने ब्याह की बावत बाप से विरोध काहे करौ। सब के मों बंद हो जैहें। चंदा की उजियारी लैकें आऔ है नरेस। पूरनमासी के चंदरमा-सी खूबसूरत! गाँव-भर में है कनेऊ बहू ऐसी? अरे, अब का बच्चा थोड़े ही है, बड़ौ है, समझदार। बई की हाँ में हाँ मिलावे में भलाई है। असहमति जता कें का कर लेते? वा की बला से! बैठे रहते अपने घर।’’

पर आज भागो को क्या हुआ? ऐसे असमय, अनुसुइया की सुधियों से कलेजा भर आया! दइया, कोई कटार-सी चलती है आत्मा में। जिज्जी भी क्या कहेंगी, जनमजली सगुन-सात बेटे-बहू को देखकर सिहा नहीं रही। मनहूस सूरत बनाए डोल रही है।

उसने धोती के छोर से आँखें पोंछ डालीं। जिज्जी भूल गईं अनुसुइया को? कुछ भी सही, कोख से जनी तो उन्होंने ही थी! पली तो उनके ही आँगन में...! शायद पति के डर से मुख भींचें हों। जीजा के सामने कौन ले सकता है अनुसुइया का नाम? कच्चा चबा जाएँगे।

द्वार की धजा बदल चुकी है— शामियाने में वर-वधू के लिए दो महाराजा कुर्सियाँ— लाल मखमल से जड़ी हुईं, सुनहरी हत्थों वाली, सिंहासन की तरह डाल दी गईं। सामने कतारबद्ध कुर्सियाँ ही कुर्सियाँ। बगल वाले शामियाने में खाने का प्रबंध होगा। डोंगा-प्लेटों का असबाब। विभिन्न मसालों की उठती महक से गाँव गमक उठा।

लोग चकित थे, ‘‘देखो ठाकुर का दिल। बेटे की राजी में राजी! जी खोलकर खर्च किया है। कचहरी-कोरट के ब्याह में फूटी पाई भी दहेज नहीं! अपने घर से लुटाकर ही तमाशा देख रहे हैं। माधो ठाकुर ने बाप-दादों की बात रखी है सदा। भले ही जमींदारी टूट गई, पर मजाल है कि नाक पर मक्खी बैठने दी हो।

पंडाल भर गया। दूल्हा-दुलहन आ बैठे। औरतों के खड़े झुंड में घूँघटों के बीच वार्तालाप चल रहा था-‘‘सिया जू लग रही है बहू! गुलाबी घाघरा-चुनरी में दूध-सी गोरी बहू! गहने कैसे खिल रहे हैं। सच्ची, सियाराम जी की जोड़ी लग रही है।’’

‘‘लरका ने खुद्द पसंद करी।’’

रिश्तेदार, सगे-संबंधी ऊँची स्टेज पर चढ़कर रुपया-पैसा-उपहार दे आए। अपनी-अपनी औकात के हिसाब से और वर-वधू के साथ फोटू खिंचा आए। उसी सब की विषद चर्चा में लगे थे।

अंत में माता-पिता की बारी थी।

पंडित जी की आवाज गूँजी, ‘‘माधो ठाकुर साहब, आशीर्वाद दो। बुला लो जनानखाने से भी। लड़का-बहू को असीसें।’’

जिज्जी को भागो का ध्यान हो आया। घूँघट की ओट से इधर-उधर निगाह दौड़ाई। ऐसे समय में भी न जाने कहाँ काम में हि लगी होगी। संग चलती, बा के का बेटा-बहू नहीं हैं? हमारे सो वाके! और है ही कौन, बिचारी कौ।’’

जिज्जी को दिखी, दूर कोने में खड़ी, गंभीर मुद्रा बनाए किसी पाहुने से बातों में उलझ रही थी।

‘‘ओ भौजाई, भागो को भेजियो जल्दी, वो ठाड़ी।’’ जिज्जी कहती हुई रेशमी चादर सँभालती पति के पीछे चली गईं।

स्टेज पर पहुँचकर ठाकुर ने दोनों हाथ बेटा-बहू के शीशों पर रख दिए।

फोटोग्राफर दौड़ा, ‘‘ठाकुर साहब, ऐसे ही, ऐसे ही खड़े रहो।’’

क्लिक-क्लिक कैमरा चलने लगा कि ठीक उसी समय निशाना बाँधा हुआ नुकीला पत्थर, विष-बुझे बाणों की तरह नुकीले और धारदार! पत्थर ही पत्थर!

अचूक संधान...जैसे कोई बंदूक से गोली दाग रहा हो। नाक और चेहरे के कटावों से रक्त की तेज धारें छूटने लगीं। खानदानी शेरवानी रँगकर लाल हो गई।

आसपास के लोग भी घायल हो रहे थे। भगदड़ मच गई। कोलाहल के बीच ठाकुर अचेत होकर कबके लुढ़क चुके थे। ठकुरायन विलाप करने लगीं।

अपने को बचाते तथा प्रक्षेपण की दिशा को अनुमानते हुए लोग उसी ओर दौड़ने लगे। गली-मोहल्ला, घर-बखरी सब छान लिए, कोना-कोना खोजा। पर कोई नहीं...

अंत में लाला की रोड़ी-पत्थर से भरी छत से जो पकड़कर लाई गई, उसे देखते ही जिज्जी को गश आने लगा, ‘‘भागो...!!!’’

भागो चीखती चली आ रही थी, विक्षिप्तों की तरह, ‘‘ओ अधरमी! अन्यायी! ठाकुर माधों! आज बेटा-बहू के स्वागत में मरे जा रहे हो तुम? खुसी में असपेर भर के गाँव जिंवा रहे!

‘‘आज आँखें मूँद लईं? बेटा की गलती दिखाई नहीं दई तुम्हें? याद करौ माधों...जे ही गलती तौ मेरी अनुसुइया ने करी थी...बस जे ही! राच्छस...जे ही।

‘‘तैने जो सराबी-जुआरी ढूँढ़ों हतो सो बा ने पसंद नहीं करौ। मास्टर जी से प्रीत हती...हमें बताई हमाई बिटिया ने! भगवान् के अगाई मंदिर में ब्याह करौ हतो और फिर गरभ...’’

‘‘मास्टर आन-बिरादरी हतो सो का? भलौ मानस हतो। और जा बहू...जा की तुम आरती उतार रहे...जा कौन-सी असल ठाकुर की जाई है, जा तैं हिंदू तक नइयाँ! और चार महिना गरभ...! माधों फिर, आज दै दै बेटा कों जहर...जैसे मेरी अनुसुइया कों...!!!’’

वह चीखते-चीखते धरती पर लुढ़क पड़ी। मगर खींचने वाले खिचते रहे ...दूर तक।

बाकी लोग अवाक्! अवसन्न! एक-दूसरे को उलझी हुई प्रश्नवाचक निगाहों से घूरते हुए...।

धीरे-धीरे फुसफुसाहटें उभरने लगीं। उन सारी आवाजों के ऊपर रोदन में लिपटा हुआ ठकुराइन का स्वर तैरने लगा, ‘‘भागो, सिर्रिन हो गई ...’’

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