साहित्य और कला को बढ़ावा हमेशा उसके चाहने वालों ने दिया है। पल्लव इस विरल श्रेणी के बड़े संपादक हैं और इसका फ़ायदा हिंदी को उनकी संपादित लघु पत्रिका 'बनास जन' के माध्यम से मिल रहा है। उन्हें खूब शक्ति मिले। इस समीक्षा के लिए आशीष कुमार सिंह का शुक्रिया।
~ भरत तिवारी
लघु पत्रिका आंदोलन की उर्वर भूमि और 'बनास जन' (अंक 89)
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा था—
साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।
बाज़ारीकरण, भूमंडलीकरण और उत्तर-आधुनिकता के इस कोलाहलपूर्ण समय में, जहाँ शब्दों की अस्मिता और बौद्धिक विमर्शों को व्यावसायिक लाभ-हानि के क्रूर तराज़ू पर तौला जा रहा है, पल्लव की वैचारिक दृढ़ता और पूर्णतः अवैतनिक संपादन में प्रकाशित बनास जन का अंक 89 (वर्ष 18) समकालीन विमर्शों का एक ऐसा विलक्षण दस्तावेज़ है, जो साहित्य को निरे बौद्धिक विलास और अकादमिक बंद कमरों से निकालकर उसे जन-सरोकारों की खुरदुरी ज़मीन पर ला खड़ा करता है।
गुरदीप भोसले को दिए गए साक्षात्कार में पल्लव ने स्वीकार किया है कि ‘पश्चिम के सांस्कृतिक आक्रमण का उत्तर हैं लघु पत्रिकाएँ।’ भैरव प्रसाद गुप्त की 'कहानी', कमलेश्वर की 'सारिका' और राजेंद्र यादव की 'हंस' जैसी पत्रिकाओं ने जिस वैचारिक ज़मीन को सींचा था, उसी गरिमामयी, प्रतिरोधधर्मी और लोकोन्मुखी परंपरा की एक अत्यंत सुदृढ़ और अव्यावसायिक कड़ी है—'बनास जन'। सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह का यह मानना सर्वथा प्रासंगिक है कि
लघु पत्रिकाएँ मुख्यधारा के गहन अंधकार में जुगनू की भाँति होती हैं, जो निविड़ तिमिर में भी वैचारिक दृष्टि और दिशा दोनों प्रदान करती हैं।
पल्लव ने इस अंक के संपादकीय ('अपनी बात') में समकालीन साहित्यिक परिदृश्य, राजनीतिक विडंबनाओं और समाज के सांस्कृतिक पतन का जो सूक्ष्म खाका खींचा है, वह एक सामान्य संपादक की नहीं, बल्कि एक युग-सजग प्रहरी की वाणी प्रतीत होती है। यह संपादन स्पष्ट करता है कि एक लघु पत्रिका का दायित्व महज़ कुछ अच्छी रचनाओं का मुद्रण कर देना नहीं है, अपितु एक ऐसा प्रगतिशील, पारदर्शी और लोकतांत्रिक साहित्यिक परिवेश सृजित करना है, जहाँ सत्य को बिना किसी लाग-लपेट या वैचारिक समझौते के अभिव्यक्त किया जा सके।
स्मृति और सामाजिक न्याय के प्रश्न
अंक का आरंभ 'स्मृति' खंड से होता है, जिसमें शिरीष कुमार मौर्य का आलेख 'भेजा तो था खुदा ने बशारत के वास्ते / लेकिन बशीर ने जो किया कुछ अलग है वो' शामिल है। साहित्य में स्मृति कभी भी केवल अतीत का विलाप या भावुक रुदन नहीं होती। उत्कृष्ट साहित्य में वह वर्तमान का पाथेय और भविष्य का दिशा-सूचक बन जाती है। यह संस्मरण महज़ एक व्यक्ति की जीवन-यात्रा का विवरण नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति के बहाने पूरे युगबोध, उसकी विसंगतियों और उसके साहित्यिक अवदान की तात्त्विक मीमांसा करता है। मृत्यु और विस्मृति के विरुद्ध यह आलेख शब्दों के माध्यम से एक अमरत्व रचने का सफल प्रयास है।
ऐतिहासिक चेतना, दलित विमर्श और स्त्रीवादी ज्ञानमीमांसा का उत्कर्ष पत्रिका के 'प्रसंग' खंड में दिखाई देता है। महात्मा जोतिबा फुले के कथन—‘विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र पस्त हुए। इतना अनर्थ एक अविद्या ने किया’—की छाप इस खंड में ध्वनित होती है। सुप्रसिद्ध चिंतक नामदेव का आलेख 'सामाजिक न्याय के पुरोधा जोतिबा फुले और भारतीय समाज' यहाँ प्रस्तुत है।
उन्होंने फुले के दर्शन, स्त्री-शिक्षा के प्रति उनके अप्रतिम समर्पण और ब्राह्मणवादी सत्ता-विमर्श के विरुद्ध उनके ऐतिहासिक तथा ज्ञानमीमांसीय संघर्ष का जो तार्किक मूल्यांकन किया है, वह स्तुत्य है। आज के दौर में, जहाँ साम्प्रदायिक विद्रूपताएँ, छद्म राष्ट्रवाद और सामाजिक विषमताएँ नए आवरण ओढ़कर प्रस्तुत हो रही हैं, फुले का यह दर्शन एक शाश्वत वैचारिकी के रूप में हमारा पथ-प्रदर्शन करता है। नामदेव यह स्पष्ट करते हैं कि फुले का संघर्ष केवल सत्ता के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस ज्ञान-परंपरा के विरुद्ध था जिसने सदियों से बहुजनों को उनके मानवीय अधिकारों से वंचित रखा।
कृष्णा सोबती और स्त्री यथार्थ
कृष्णा सोबती का विचार कि
लेखन कोई बौद्धिक विलास नहीं है, बल्कि आग में तपकर कुंदन होने की प्रक्रिया है। स्त्री होना कोई कमजोरी नहीं, यह जीवन को उसकी समग्रता में देखने की एक दृष्टि है
अनामिका के आलेख में स्पष्ट देखा जा सकता है। कृष्णा सोबती की जन्म शताब्दी के अवसर पर अनामिका का आलेख 'स्त्री यथार्थ और स्त्री आख्यान: भारतीय उपन्यास और कृष्णा सोबती' संकलित है।
वे सोबती के पात्रों की देह-भाषा को वर्जनाओं के चश्मे से नहीं, बल्कि स्त्री-मुक्ति के एक सशक्त उपकरण के रूप में देखती हैं। यह आलेख बताता है कि सोबती ने किस प्रकार भाषा को उसके पितृसत्तात्मक साँचों से मुक्त कर उसे एक नई रवानी और धार प्रदान की।
विरासत: चोखामेला और प्रतिरोध की परंपरा
'विरासत' स्तंभ के अंतर्गत प्रो. माधव हाड़ा का आलेख 'ऐसा ही है मेरा जीवन: चोखामेला के अभंगों का हिंदी भाव रूपांतर' भक्ति-आंदोलन के उपेक्षित और सबाल्टर्न पृष्ठों का एक साहसिक पुनराविष्कार है। संत चोखामेला का यह शाश्वत भाव कि "गन्ना टेढ़ा हो सकता है, पर उसका रस टेढ़ा नहीं होता; उसी प्रकार शरीर अछूत हो सकता है, पर आत्मा अछूत नहीं होती," इस आलेख की मूल दार्शनिक आत्मा है।
माधव हाड़ा ने मध्यकालीन भारत के इस मूक प्रतिरोध को, जो ईश्वर से अधिक व्यवस्था से टकरा रहा था, आधुनिक विमर्श की मुख्यधारा में लाकर एक महती अकादमिक रिक्ति को भरा है। रेणु व्यास का आलेख 'पथेर दाबी: शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय—ऊबड़-खाबड़ रास्ता और इसके निराले दावेदार!' औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र क्रांति, राष्ट्रवाद की जटिलताओं और मानवीय अंतर्द्वंद्वों का अत्यंत बेबाक एवं तथ्यपरक विश्लेषण करता है। यह आलेख बड़ी ही सूक्ष्मता से प्रमाणित करता है कि स्वाधीनता संग्राम में साहित्य महज़ एक मूक दर्शक नहीं था, बल्कि वह एक ज्वलंत वैचारिक अस्त्र था, जिसने पीढ़ियों को उद्वेलित किया।
समकालीन कविता: प्रतिरोध और यथार्थ
अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब
—गजानन माधव 'मुक्तिबोध' की इस उद्घोषणा की अनुगूँज और दुष्यंत कुमार के तेवर इस अंक के कविता-खंड में अत्यंत स्पष्टता से सुने जा सकते हैं। अदनान कफील दरवेश, देवेश पथ सारिया, राही डूमरचीर, मनोज कुमार झा, विवेक चतुर्वेदी और अम्बिकादत्त की कविताएँ किसी काल्पनिक रोमानियत से नहीं, बल्कि समकालीन यथार्थ की पथरीली और खुरदुरी ज़मीन से उपजती हैं।
इन युवा और वरिष्ठ हस्ताक्षरों की भाषा में रूपकों और बिंबों की जो सघनता और नवीनता है, वह कविता को महज़ भावोच्छ्वास या नारों से बचाकर समय के एक प्रामाणिक और शाश्वत दस्तावेज़ में रूपांतरित कर देती है।
कहानियों में जीवन, त्रासदी और जिजीविषा
फणीश्वरनाथ रेणु का कथन है कि 'कहानी जीवन की धड़कन है'। 'बनास जन' के इस अंक में यह धड़कन अपने पूरे स्पंदन, दर्द और प्रतिरोध के साथ मौजूद है। यहाँ संकलित कहानियाँ मानव जीवन के विभिन्न स्याह-सफ़ेद पहलुओं, मानवीय त्रासदी, एकाकीपन और जिजीविषा को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती हैं।
राहुल श्रीवास्तव ('सलाम-सलाम-सलाम'), सोनू यशराज ('घर सुन रहा है...'), सविता पाठक ('तुम्हें पहचानने की कोशिश कर रही हूँ'), विजयशंकर चतुर्वेदी ('यह कोई विकल्प नहीं') तथा हरि भटनागर ('उड़ती चिड़िया के पर') की कहानियाँ सामाजिक पदानुक्रम, सामंती मानसिकता के क्रूर यथार्थ और कृत्रिम आधुनिकता के आभामंडल तले छटपटाते मानवीय संबंधों की प्रतीकात्मक प्रस्तुति हैं।
वर्जीनिया वूल्फ के 'अपने कमरे' (A Room of One's Own) की तलाश का यथार्थवादी अंकन तथा समकालीन राजनीतिक दिशाहीनता, मूल्यहीनता और अंदर से खोखले होते लोकतांत्रिक मूल्यों का स्पष्ट स्वर इन कहानियों में सुना जा सकता है।
कथेतर साहित्य, आलोचना और सिनेमा
कथेतर साहित्य में सपन सारण, शीर्ष खरे, हेमंत द्विवेदी, सुधीर विद्यार्थी और अशोक अग्रवाल के निबंध वैचारिक क्षितिज को असीम विस्तार देते हैं। ये निबंध समाज, संस्कृति और कला के अंतर्संबंधों की गहरी पड़ताल करते हैं।
'साहित्यिकी' खंड में शम्भुनाथ, रीता सिन्हा, विनोद तिवारी, रमाशंकर सिंह और मुस्कान गिरि जैसे प्रखर आलोचकों के आलेख इस पत्रिका की अकादमिक गंभीरता और भाषाई-दार्शनिक ऊँचाई को प्रमाणित करते हैं। इसके अतिरिक्त, सिनेमा खंड में सुभाष शर्मा और स्मृति सुमन के लेख सिनेमा को महज़ मनोरंजन के पर्दे से हटाकर सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श के एक महत्त्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखने का अवसर देते हैं।
लघु पत्रिकाओं की प्रासंगिकता और 'बनास जन' का महत्त्व
वर्तमान समय में, जहाँ साहित्य 'बेस्टसेलर' की अंधी दौड़ और संस्कृति बाज़ारीकरण का शिकार हो रही है, पल्लव का सजग और वैचारिक संपादन यह सिद्ध करता है कि यदि दृष्टि में स्पष्टता हो, संकल्प में दृढ़ता हो, तो सीमित संसाधनों के बावजूद मुख्यधारा के उपभोक्तावादी साहित्य और संस्कृति को सशक्त बौद्धिक और नैतिक चुनौती दी जा सकती है।
यह अंक अपनी वैचारिकी, भाषाई लालित्य, दार्शनिक गहराई और आलोचनात्मक प्रखरता के कारण शोधार्थियों, साहित्य-रसिकों और समाजशास्त्र के अध्येताओं के लिए एक अत्यंत संग्रहणीय, संदर्भ-युक्त और उपयोगी दस्तावेज़ प्रस्तुत करता है। 'बनास जन' का यह अंक एक बार फिर रेखांकित करता है कि लघु पत्रिकाएँ केवल रचनाओं के प्रकाशन का माध्यम नहीं, बल्कि वैकल्पिक साहित्यिक चेतना, आलोचनात्मक विवेक और जनपक्षधर संवाद की उर्वर भूमि भी हैं।
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