राजिंदर जी की नई किताब ‘पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफ़र’ पर वरिष्ठ लेखक हरियश राय ने सुंदर समीक्षा लिखी है.
चेतावनी: पुरानी दिल्ली को चाहने वालों को यह समीक्षा किताब ख़रीदने के लिए मजबूर कर सकती है!
: भरत तिवारी
राजिंदर अरोड़ा की यह किताब इंसानियत, भाईचारे और भारत की सामासिक संस्कृति का पाठ बार-बार पढ़ाती है—और आज के दौर में इसकी ज़रूरत शायद सबसे ज़्यादा है।
पुस्तक-समीक्षा: हरियश राय
पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफर
राजिंदर अरोड़ा की पहचान ग्राफ़िक डिज़ाइनर और पर्वतारोही के रूप में रही है। अपनी किताब ‘कैलाश मानसरोवर’ में उन्होंने कैलाश यात्रा का बेहद रोमांचक वर्णन किया है। जो लोग उन्हें नज़दीक से जानते हैं, वे यह भी जानते हैं कि वे अपने पिता को विभाजन के दौरान पाकिस्तान में छूट गए उनके घर को दिखाने के लिए पाकिस्तान ले गए थे। उस यात्रा के अनुभवों को उन्होंने ‘यार मेरा हज करा दे’ नाम की किताब में दर्ज किया है। अभी हाल ही में वाम प्रकाशन ने उनकी किताब ‘पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफर’ प्रकाशित की है। यह किताब हमें ऐसी यात्रा पर ले जाती है, जिसमें दिल्ली की साझा संस्कृति रची-बसी है और जो हमारे देश की सामूहिक चेतना में गहरे धँसी हुई है। पुरानी दिल्ली के बाशिंदे आज भी इस साझा संस्कृति को शिद्दत से याद करते हुए सुकून महसूस करते हैं। किताब की भूमिका में जाने-माने फ़िल्म निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा लिखते हैं,
पुरानी दिल्ली हमारे देश, हमारी ज़मीन, हमारे उपमहाद्वीप का एक छोटा-सा रूप लगती है—जहाँ संस्कृति, खाना, लोग और धर्म, सब कुछ साथ-साथ मौजूद है।
किताब का कवर जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र राम रहमान ने तैयार किया है।
राजिंदर अरोड़ा ने यह किताब लिखकर इस देश की उस साझा संस्कृति को पुरज़ोर ढंग से दर्ज किया है, जो आज हर हिंदुस्तानी की रगों में ख़ून बनकर दौड़ रही है। शायद इसीलिए अल्लामा इक़बाल ने कहा था:
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी,
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़माँ हमारा।
राजिंदर अरोड़ा इस किताब में देश के इतिहास में जाते हैं और बताते हैं कि शाहजहाँ की माँ जगत गोसाईं एक हिंदू राजघराने से थीं। उनका मूल नाम मानीबाई था। अपने शुरुआती वर्षों में शाहजहाँ ने धर्म के मामले में काफ़ी सहिष्णुता दिखाई। उनके दरबार में राजा-महाराजा, सूबेदार, कवि, पंडित और क़ाज़ी मौजूद थे। लेखक यह भी बताते हैं कि शाहजहाँ के शासनकाल में पैंतीस हिंदू मनसबदार दर्ज थे, जिन्हें पाँच सौ से पाँच हज़ार तक के ओहदों पर नियुक्त किया गया था। किताब के अनुसार, शाहजहाँ को कट्टर मुसलमान माना जाता था, लेकिन उन्होंने हिंदू पर्वों और परंपराओं का बहिष्कार नहीं किया। इसी संदर्भ में लेखक लाल क़िले के भीतर होली और दीपावली मनाए जाने की परंपराओं का ज़िक्र करते हैं।
साझी संस्कृति की इस यात्रा में राजिंदर अरोड़ा चाँदनी चौक पहुँचते हैं, जिसे औरंगज़ेब की बहन जहाँआरा ने बसवाया था। उनका सपना था कि शाहजहानाबाद के दिल में ऐसा बाज़ार बने, जिसे सारी दुनिया देखे। हक़ीक़त में ऐसा बाज़ार बना भी। इसके बारे में वह लिखते हैं,
यहाँ माल की ख़रीद-फ़रोख़्त ही नहीं, तहज़ीब परोसी जाती थी, ज़ायका बिखरा रहता था और दुकानें इस तरह सजी-सँवरी होती थीं, जैसे ख़ुदा की इबादत का ठिकाना हों। इस बाज़ार में औरतें डोलियों में आती थीं, मर्द घोड़ों पर या पालकियों में, और बाज़ार में एक ख़ामोश शाइस्तगी होती थी। कहीं से कोई ऊँची आवाज़ नहीं आती थी, कोई धक्का नहीं, कोई धूल नहीं, कोई शोर नहीं।
लेकिन, जैसा कि गुलज़ार साहब ने कहा है, “वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर, आदत इस की भी आदमी-सी।” वक़्त बदला। अंग्रेज़ इस देश में आए और उन्होंने बहुत कुछ ध्वस्त किया। देखते ही देखते चाँदनी चौक का गौरव भी कम होने लगा। उसकी हवाओं में भीड़, शोर और धुआँ समा गए। घड़ियों की पुरानी दुकानें, मिठाइयों की सदियों पुरानी दुकानें और किताबों की पुरानी अलमारियाँ गाइडों की ज़ुबान तक सिमटकर रह गईं। सड़कों को चौड़ा करने के नाम पर कई हवेलियाँ ढहा दी गईं और चाँदनी चौक की उस विरासत को चोट पहुँचाई गई, जो उसे अलग पहचान देती थी। नए हिंदुस्तान के निर्माण के दौर में भी यह सिलसिला जारी रहा। इसीलिए आज चाँदनी चौक के दुकानदार अफ़सोस से कहते हैं कि उन्होंने यहाँ तीन पीढ़ियों तक दुकान चलाई, लेकिन अब ख़ुद वहाँ आना मुश्किल हो गया है; ग्राहक मॉल और ऑनलाइन ख़रीदारी की दुनिया में चले गए हैं और चाँदनी चौक में बची हैं पुरानी दीवारें, धूल, बदबू और एक अधूरी याद। जहाँआरा का देखा ख़्वाब बिखर गया, लेकिन लेखक उम्मीद करता है कि
जब तक लोग याद रखेंगे कि एक राजकुमारी ने चाँद की रोशनी में बाज़ार बसाया था, तब तक यह मुमकिन है कि किसी दिन फिर से वह रोशनी लौट आए।
‘दिल नाउम्मीद तो नहीं, नाकाम ही तो है।’
आज भले ही वह चाँदनी चौक नहीं रहा, जो किसी ज़माने में था, लेकिन उसकी पहचान अब भी उसके अतीत से जुड़ी है। आज भी चाँदनी चौक अपने दामन में परमात्मा, अल्लाह और ईश्वर के अनेक घर समेटे हुए है। लाल क़िले के ठीक सामने जहाँआरा बेगम का बसाया बाज़ार है; पास ही जामा मस्जिद, दिगंबर जैन लाल मंदिर, सीसगंज साहिब गुरुद्वारा, सेंट्रल बैपटिस्ट चर्च, सुनहरी मस्जिद, लाडलीजी का बड़ा मंदिर, महादेव मंदिर, गुरुद्वारा मजनूँ का टीला, शंकर मंदिर, घंटेश्वर महादेव शिवालय और सूफ़ी संतों की अनेक दरगाहें व मज़ारें हैं। इन्हें देखकर वे लिखते हैं,
शाहजहानाबाद की तंग गलियाँ, भीड़-भाड़ वाले बाज़ार और दीवारों से झाँकते इबादतगाहों के गुंबद, ये सब मिलकर एक ऐसी दुनिया रचते हैं, जहाँ हर रोज़ धर्म, संस्कृति और परंपरा के सुर एक साथ गूँजते हैं। ये इबादतगाहें बताती हैं कि इंसानियत सबसे ऊपर है।
राजिंदर अरोड़ा की यह किताब इंसानियत, भाईचारे और भारत की सामासिक संस्कृति का पाठ बार-बार पढ़ाती है—और आज के दौर में इसकी ज़रूरत शायद सबसे ज़्यादा है।
करीम और जावेद निहारी के होटलों को याद किए बिना शाहजहानाबाद को याद नहीं किया जा सकता। अरोड़ा हर शाम इन दुकानों पर लगी भीड़ देखकर हतप्रभ रह जाते हैं। वहाँ उन्हें ऐसे ब्राह्मण मिलते हैं, जो साल भर सब्ज़ी खाते हैं, लेकिन ईद के दिन मटन और सीख़ कबाब पर टूट पड़ते हैं। कायस्थ मिलते हैं, जो यह कहकर दो प्लेट क़ोरमा खा जाते हैं, “देखता हूँ, यहाँ का अच्छा है या घर का।” पंजाबी आते हैं, जिन्हें खाने की इबादत आती है; सरदारों के झुंड रोटी छोड़कर बोटी-कबाब पर उतर आते हैं। गुजराती और सिंधी, जिनके लिए ‘नो अनियन, नो गार्लिक’ की दुनिया है, ईद पर खाने का भरपूर लुत्फ़ लेते हैं। मलयाली भी आते हैं और कहते हैं, “अरे भा, गोश्त तो अपना पुराना प्यार है।” वे इस नज़ारे को धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि “साझा तहज़ीब का सालाना मेला” मानते हैं। यही ईद का गंगा-जमुनी ज़ायका है।
शाहजहानाबाद की रंगत उर्दू ज़बान से रही है। किसी ज़माने में इस ज़बान की आहट यहाँ हर वक़्त महसूस की जाती थी। पुरानी दिल्ली के सरताज मीर तकी मीर, मिर्ज़ा ग़ालिब, मोमिन ख़ाँ मोमिन, बहादुर शाह ज़फ़र और दाग़ देहलवी जैसे शायर रहे हैं, जिनके अल्फ़ाज़ पुरानी दिल्ली से निकलकर देश-दुनिया में फैल गए। इन शायरों को याद करते हुए लिखते हैं कि “इन शायरों ने दिल्ली का ज़िक्र जिस जज़्बाती अंदाज़ में किया, वह पढ़ने से ज़्यादा महसूस करने की शय है।”
लेखक ने माइक्रो लेंस से चाँदनी चौक की गलियों और कूचों को देखा है। उन्होंने वहाँ की कलाओं, हुनरों, पेशों और कबूतरबाज़ी व पतंगबाज़ी जैसे शौक़ों को दर्ज किया है। इस नज़र से वे उर्दू बाज़ार में किताबों के जादू और जिल्दसाज़ों को, गुज़रे ज़माने के चेहरे रहे भिश्तियों को, क़व्वालों, हकीमों और वैद्यों को, कान का मैल निकालने वाले ‘ईयर स्पेशलिस्टों’ को, हाथ में उस्तरा और ज़ुबान में मुहब्बत रखने वाले हज्जामों को, हड्डी जोड़ने वाले उन लोगों को जो न डॉक्टर थे, न हकीम, गहनों पर मीनाकारी करने वाले कारीगरों, नक़्क़ाशों, रफ़ूगरों, रंगरेज़ों, दर्ज़ियों, ज़रदोज़ी के कारीगरों, बुनकरों, हवा से भी पतले चाँदी के वर्क बनाने वालों, कलई करने वालों, रिक्शा चालकों और पल्लेदारों को आत्मीयता और आदर से याद करते हैं। इन्हीं की वजह से चाँदनी चौक रौशन मीनार की तरह चमकता रहा।
किताब में अरोड़ा उन कोठों का भी ज़िक्र करते हैं, जो कला, तहज़ीब और अदब के गढ़ माने जाते थे। वे बताते हैं कि
ये तवायफ़ें सिर्फ़ गाने-बजाने वाली औरतें नहीं होती थीं, बल्कि पढ़ी-लिखी, तहज़ीबदार और हुनरमंद कलाकार होती थीं।
चाँदनी चौक की तवायफ़ों—बेगम समरू, मुबारक बेगम, गौहर जान और नूर बाई—के बारे में विस्तार से बताते हुए वे इतिहासकार राणा सफ़वी को उद्धृत करते हैं। सफ़वी के अनुसार, तवायफ़ शब्द की व्युत्पत्ति अरबी शब्द ‘तवाफ़’ से मानी जाती है, जिसका अर्थ किसी जगह के चारों ओर चक्कर लगाना है। समय के साथ यह शब्द गायन, नृत्य, संस्कृति, संगीत और शिष्टाचार में दक्ष कलाकारों के लिए प्रचलित हुआ।
राजिंदर अरोड़ा अपनी किताब में बँटवारे के दंश को भी याद करते हैं, जिसमें करोड़ों लोग बेघर हुए। पंजाब के लाहौर, गुजराँवाला, झंग, डेरा ग़ाज़ी ख़ाँ, मुल्तान, पेशावर और सिंध से आए लोग पुरानी दिल्ली और आसपास के इलाक़ों में आकर बस गए। इन्हीं लोगों में कुंदन लाल गुजराल भी थे, जिनकी दास्तान इस किताब में दर्ज है। वे पंजाब के गद्दी परिवार से थे और तंदूर में पकवान बनाने का हुनर रखते थे। उन दिनों दिल्ली में मांसाहारी लोगों के बीच तंदूरी चिकन लोकप्रिय था। कुंदन लाल ने देखा कि होटल में शाम को काफ़ी तंदूरी चिकन बच जाता है, जिसे अगले दिन फेंक दिया जाता है। एक दिन उन्होंने बचे हुए चिकन को मक्खन, टमाटर की ग्रेवी, क्रीम और मसालों के साथ पकाया। इस पकवान ने नया रूप लिया और लोगों को इतना पसंद आया कि आगे चलकर यह बटर चिकन या मुर्ग़-मख़्खनी के नाम से मशहूर हुआ। बटर चिकन की इस दास्तान के साथ-साथ अरोड़ा चाँदनी चौक के लोकप्रिय व्यंजनों—दाल मख़नी, मुर्ग़ तंदूरी, पनीर मख़नी, चिकन टिक्का मसाला, राजमा मसाला और नीमचुरी मुर्ग़ कबाब—का दिलचस्प वर्णन करते हैं। इस तरह किताब में चाँदनी चौक का बड़ा परिदृश्य सामने आता है।
राजिंदर के पास चाँदनी चौक को देखने का अपना विज़न है और उनकी दृष्टि में खुलापन व साझापन है। इसी दृष्टि से वे चाँदनी चौक के गौरवशाली इतिहास, खान-पान की धूम, वहाँ काम करने वाले और हमारी धरोहर सँजोए रखने वाले कारीगरों, उनके पेशों और हुनरों तथा सदियों से चली आ रही साझा संस्कृति को किताब में दर्ज करते हैं।
अरोड़ा 1857 से 1947 तक का सफ़र भी तय करते हैं। वे बताते हैं कि 1857 में हिंदुस्तान की जनता, सिपाही और नवाब एक साथ उठ खड़े हुए। बहादुर शाह ज़फ़र को गिरफ़्तार कर रंगून भेज दिया गया। विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने सैकड़ों हवेलियाँ उजाड़ दीं। 1864 में दिल्ली को कलकत्ता और अंबाला से जोड़ने वाली रेल सेवा शुरू हुई। 1870 में चाँदनी चौक में सत्तर फ़ुट ऊँचा घंटाघर और फ्लोरा फ़ाउंटेन बना। ट्राम चलीं, शहर को साफ़-सुथरा रखने के लिए बाग़-बगीचे बनाए गए और आसपास के बाज़ार फैले। 1911 में जॉर्ज पंचम के आगमन ने दिल्ली की तक़दीर ही नहीं, हिंदुस्तान की राजनीति की धुरी भी बदल दी। ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने दिल्ली की इमारतों के ऐसे नक़्शे तैयार किए, जो औपनिवेशिक ताक़त और शाही वैभव का एहसास कराते थे।
इस किताब में वे चाँदनी चौक के सफ़र के क्रम में उसके इतिहास और आज की पुरानी दिल्ली के बड़े वितान को हमारे सामने रखते हैं। उनकी लिखी बातों से गुज़रते हुए हम कुछ देर के लिए वहाँ पहुँच जाते हैं, जहाँ वे हमें ले जाना चाहते हैं। इस दौरान वे यह भी कहते हैं,
दिल्ली ने तख़्त खोया, तामीर पाई, बादशाह नहीं बचे, पर इमारतें खड़ी हुईं, ज़बानें बदलीं, नाम बदले, नक़्शे बदले—लेकिन दिल्ली नहीं बदली। वह आज भी सब कुछ समेटे खड़ी है अपनी तहज़ीब के साथ, अपने ज़ख़्मों के साथ और सबसे बढ़कर अपने अटूट वजूद के साथ।
शायद शमशेर बहादुर सिंह ने चाँदनी चौक के इसी बाज़ार को अपनी स्मृति में समेटकर कहा होगा:
इल्मो-हिकमत, दीनो-ईमाँ, मुल्को-दौलत, हुस्नो-इश्क़;
आपको बाज़ार से जो कहिए, ला देता हूँ मैं!
लेखक ने जिस गंभीरता, तल्लीनता, विज़न और गहराई के साथ इस किताब की संकल्पना को आकार दिया है, वह उल्लेखनीय है। उन्होंने पुरानी दिल्ली की रूह में बसी साझा संस्कृति के संदर्भ और तथ्य जुटाए हैं और उन्हें रचनात्मक रूप में दर्ज करते हुए इस संस्कृति को बचाए रखने की वकालत की है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की भूमिका के अलावा किताब में बारह अध्याय हैं। इसमें स्थानीय शब्दों के अर्थ समझाए गए हैं और उन पुस्तकों का भी उल्लेख है, जो इसे लिखने के मूल स्रोत रही हैं।
राजिंदर अरोड़ा ने यह किताब पुरानी दिल्ली के दिल में बसी साझा संस्कृति को केंद्र में रखकर लिखी है। वे उस विरासत को ईमानदारी से याद करते हैं, जिसे लाख कोशिशों के बावजूद मिटाया नहीं जा सकता। बहुलतावादी, मिली-जुली संस्कृति ही हमारे देश की पहचान है; यह किसी एक समुदाय या धर्म तक सीमित नहीं है। इसकी परंपरा बहुआयामी और बहुस्तरीय रही है, जिसे उन्होंने किताब के पन्ने-दर-पन्ने समेटा है। ऐसी रचनात्मक किताब के लिए उन्हें बहुत-बहुत बधाई।
पुस्तक विवरण
पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफर (LeftWord Books से खरीदें)
लेखक: राजिंदर अरोड़ा
प्रकाशक: वाम प्रकाशन
पहला संस्करण: जून 2026
मूल्य: ₹250
लेखक के बारे में
राजिंदर अरोड़ा पेशे से ग्राफ़िक डिज़ाइनर और स्वभाव से कहानीकार हैं। ट्रेकिंग, पर्वतारोहण और फ़ोटोग्राफ़ी के शौकीन राजिंदर उन जगहों और नज़ारों से जुड़ते हैं, जहाँ वे जाते हैं और जिन्हें अपनी तस्वीरों में सँजोते हैं। उनके एडवेंचर ट्रैवलॉग ‘इंडियन माउंटेनियर’ और कई प्रमुख डिजिटल पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उनकी पुस्तकों में ‘कैलाश: ज्वेल ऑफ़ द स्नोज़’ (निराला पब्लिशर्स), ‘टू सम इट!—एवरेस्ट’, ‘लाहौर सफ़रनामा: यार मेरा हज करा दे’ (सेतु प्रकाशन), ‘पुरानी दिल्ली: साझा संस्कृति का सफ़र’ (लेफ़्टवर्ड बुक्स) और ‘वहाँ कौन है तेरा!’ (लोकमित्र प्रकाशन) शामिल हैं। ‘वहाँ कौन है तेरा!’ लेखक और डिमेंशिया से जूझ रही उनकी माँ के बीच हुई बातचीत और यादों का भावुक संग्रह है। उन्होंने बच्चों के लिए सचित्र हिंदी कविता की पाँच किताबें भी लिखी हैं, जो सहमत से प्रकाशित हुई हैं। उनकी लघुकथाएँ और कविताएँ अक्सर हिंदी और अंग्रेज़ी की ऑनलाइन पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। पढ़ने के शौकीन राजिंदर की दृश्य कला की समझ उनके लेखन को गहराई से प्रभावित करती है। वे अपनी पत्नी और बच्चों के साथ गुड़गाँव में रहते हैं।
[लेखक का संपर्क: 98100-18857]
समीक्षक के बारे में
हरियश राय हिंदी के अग्रिम पंक्ति के कथाकारों में शामिल हैं और पिछले तीन दशकों से कथा-लेखन में सक्रिय हैं। अपने समय के जीवन-यथार्थ को गहरे मानवीय सरोकारों के साथ दर्ज करना उनके लेखन की विशेषता है। सहजता और सादगी उनकी रचनाओं की विशिष्ट पहचान हैं। उनके पाँच उपन्यास नागफनी के जंगल में, मुट्ठी में बादल, दहन, माटी राग और दूब तथा आठ कहानी-संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें बर्फ होती नदी, उधर भी सहरा, अंतिम पड़ाव, वजूद के लिए, सुबह-सवेरे, किस मुकाम तक, महफ़िल और कलम शामिल हैं। उन्होंने भीष्म साहनी : सादगी का सौंदर्यशास्त्र और कथा-कहानी : एक पुस्तकों का संपादन भी किया है। उनकी अन्य प्रकाशित कृतियों में विभाजन की विभीषिका और भारतीय कथा साहित्य, समय के सरोकार, शिक्षा, भाषा और औपनिवेशिक दासता, कथा : एक यात्रा, कथा-सानिध्य और कहानी : आज शामिल हैं। हिंदी के प्रतिनिधि कथा-संग्रहों में उनकी कहानियों को स्थान मिला है और वे उर्दू, तेलुगु, ओड़िया, गुजराती तथा पंजाबी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं।
संपर्क: V-27/15, डीएलएफ़ फ़ेज़-3, क़ुतुब एन्क्लेव, गुरुग्राम, हरियाणा – 122002
ईमेल: hariyashrai@gmail.com | मोबाइल: 09873225505
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