मीडिया - भारी–भरकम पूंजी का हरकारा : अशोक मिश्र Media - Ponderous Harbinger of Capital : Ashok Mishra

मीडिया का अतिरेकी आचरण  - अशोक मिश्र



देखते ही देखते वर्ष 2013 धीरे से विदा हो गया और एक नए साल के साथ ही हम वर्ष 2014 में आ पहुंचे हैं । अगर हम सोचें तो लगता है कि साल ही बदल रहा है न हम बदल रहे हैं न हमारा समाज । आजादी के बाद से कम से कम छह दशक का वक्त गुजर चुका है लेकिन आज देश अपने समय के सबसे खराब दौर से गुजर रहा है । देश में ही दो देश साफ दिखते हैं पहला भारत और दूसरा शाइनिंग इंडिया ।
क्या मीडिया अपने इस अतिरेकी आचरण में कोई बदलाव लाएगा या फिर टीआरपी के खेल के लिए लोगों को मरने पर मजबूर करता रहेगा ? क्या मीडिया को अपनी सीमा का ज्ञान नहीं है कि वह जज या कोर्ट के अंदाज में काम नहीं कर सकता है ।
          नई शताब्दी इस मायने में पिछली कई शताब्दियों से भिन्न रही है कि इस दौर में संचार और संप्रेषण और तकनीक ने हमारी दुनिया बिल्कुल बदलकर रख दी है । आज तकनीक का इस्तेमाल करके किसी भी व्यक्ति के खिलाफ दुष्प्रचार का काम या अफवाह फैलाने या उसका चरित्र हनन कुछ मिनटों में किया जा सकता है । अब तो यह संचार दंगा भड़काने में भी काफी काम आ रहा है । तकनीक का बेहतर उपयोग कर हम सकारात्मक दिशा में आगे जाते हैं लेकिन समाज के कुछ खुराफाती दिमाग इसका गलत इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे एक नए तरह के अपराध का जन्म हो रहा है जिसका किसी भी कीमत पर समर्थन नहीं किया जा सकता । तकनीक आधारित झूठा और मनगढ़ंत प्रचार कई बार सच को पीछे ढकेलने का काम भी कर रहा है । सबसे बड़े दु:ख की बात यह है कि मीडिया जिसके ऊपर समाज को सचेत, साक्षर और जागरूक बनाने की जिम्मेदारी थी वह निवेशित भारी–भरकम पूंजी का हरकारा बन बैठा है । जाहिर है कि यह दौर मिशन पत्रकारिता का नहीं है । इन वजह है कि मीडिया में भारी पूंजी निवेश लाभ कमाने के उद्देश्य से किया जा रहा है । अभी हाल में ही यह देखने में आया कि दिल्ली में एक सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ दुराचार के आरोपों को टीवी चैनलों ने बेहद गैरजिम्मेदारना अंदाज में परोसा और परदे के पीछे या अंदरूनी सच्चाई की तह तक पहुंचे बिना अपना फैसला इस तरह से सुनाया कि एक संवेदनशील आदमी ने आत्महत्या कर ली । इस इनसान की मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा ? क्या मीडिया अपने इस अतिरेकी आचरण में कोई बदलाव लाएगा या फिर टीआरपी के खेल के लिए लोगों को मरने पर मजबूर करता रहेगा ? क्या मीडिया को अपनी सीमा का ज्ञान नहीं है कि वह जज या कोर्ट के अंदाज में काम नहीं कर सकता है । यह जिम्मेदारी न्यायपालिका के कंधों पर है और उसे ही इसका निर्वाह करने दिया जाए तो ज्यादा अच्छा है । मीडिया को अपनी भूमिका पर विचार करने की जरूरत है । मुझे लगता है कि आज ऐसे संपादकों का भी अभाव है जो मीडिया को जिम्मेदारी का पाठ पढ़ा सकें । ऐसे लोग आज भी हैं लेकिन बाजार का हिस्सा बन चुका मीडिया सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता करने वाले संपादकों को अपने संस्थान का हिस्सा नहीं बनाना चाहता । यह कुछ ऐसा ही है जैसे मेरे यहां तो सलमान खान जैसा बच्चा जन्मे और क्रांतिकारी भगत सिंह जैसा बच्चा तो पड़ोसी के घर जन्म ले । जाहिर है कि देश का मानस बदलेगा तो मीडिया को भी अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य का अहसास करना होगा और तदनुकुल आचरण करना होगा ।
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          एक और सच यह है कि मुक्त बाजार व्यवस्था ने जिस तरह आर्थिक असंतुलन की लकीर खींची है वह समाज में गहरे क्षोभ और आक्रोश को जन्म देने का काम कर रही है । हमारे समाज में तेजी से बढ़े नव धनाढ्य वर्ग के आचरण ने हमारे सारे सामाजिक मूल्यों को ध्वस्त करने का काम किया है । आज हमारे अपने परिवार हों या पूरा समाज एक किस्म की अराजकता और अपसंस्कृति की दिशा में तेजी से बढ़ता चला जा रहा है । इस पर हम अपनी पीठ खुद ठोंक ले रहे हैं । लाखों के पैकेज लेने वाली पीढ़ी के कई जन्मदाता मां–बाप या तो रैनबसेरों के मोहताज हैं या वृद्ध आश्रमों में रहकर बची खुची जिंदगी का शेष समय काट रहे हैं । जाहिर है कि समाज में पुराने मूल्यों को बचाने और उन्हें नई पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की भी जरूरत है । यह चुनौतियों से भरा समय है और ऐसे अंधेरे समय में साहित्य की मशाल टिमटिमा तो रही है लेकिन उसे और अधिक प्रज्वलित करने की जरूरत है ।

          वर्ष 2013 के दौरान हिंदी के कई वरिष्ठ साहित्यकार हमारे बीच नहीं रहे । जाहिर है कि इस पर शोक के अलावा कुछ प्रकट नहीं किया जा सकता । हम कह सकते हैं कि बीता साल हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के बजाए रिक्तता देकर चला गया । वरिष्ठों के असामयिक निधन से जो शून्य उपजा उससे साहित्य संस्कृति की दुनिया में एक सन्नाटा सा पसर गया जिसकी भरपाई कर पाना लगभग असंभव है । अक्टूबर में राजेंद्र यादव से कुछ पहले वरिष्ठ आलोचक शिवकुमार मिश्र से यह सिलसिला शुरू हुआ तो परमानंद श्रीवास्तव, ओमप्रकाश वाल्मीकि, विजयदान देथा, हरिकृष्ण देवसरे और केपी सक्सेना तक चलता ही रहा । इत्तफाक से राजेंद्र यादव से मेरा काफी करीबी रिश्ता रहा । कह सकता हूं कि लेखन और सांस्कृतिक पत्रकारिता की दुनिया से सक्रिय रूप से जुड़े रहने के कारण यह संभव हुआ । संपादक के रूप में राजेंद्र यादव ने एक लंबी पारी खेली और हिंदी साहित्य की बंद संकुचित दुनिया को नए विमर्शों की ओर उन्मुख किया । राजेंद्र यादव की सिर्फ संपादक की भूमिका इतनी बड़ी है कि उसका मूल्यांकन करने में अभी काफी समय लगेगा । अपनी रचनाओं और संपादकीय लेखों के माध्यम से वे हमारे बीच रहेंगे ही । मैं कह सकता हूं कि शायद हमारे वरिष्ठजनों ने यह संदेश दे दिया है कि नौजवान साथियों अब साहित्य की दुनिया संभालो हम तो सफर करते हैं । दिवंगत अग्रज साहित्यकारों का अनकहा संदेश यह भी है कि हम लोगों ने एक लकीर खींची है उस पर चलना और उसे बनाए और बचाए रखने के साथ–साथ आगे बढ़ाने का काम भी तुम्हारे कंधों पर है । बहुवचन के प्रस्तुत अंक में दिवंगत साहित्यकारों पर आदरांजलि स्वरूप सामग्री दी जा रही है दूसरी तरह से यह अंक स्मृति शेष अंक है ।

          नए साल में हिंदी भाषा और भाषाई साहित्य मजबूत, हो विश्व मंच पर हिंदी का प्रसार बढ़े और साहित्य में समाज की समस्याओं की अनुगूंजें ध्वनित हों और साहित्य की लोकप्रियता का वातावरण बने और रचनात्मकता नई बुलंदियों पर पहुंचे इसी कामना के साथ नव वर्ष की ढेरों शुभकामनाएं । नया साल हमारी उम्मीदों का साल हो और बदलाव का भी, यही कामना है ।

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