अथ श्री गिरगिटिया चश्मा कथा! - क़मर वहीद नक़वी Qamar Waheed - Naqvi Ath Shri Girgitiya Chasma Katha!


राग देश

अथ श्री गिरगिटिया चश्मा कथा!

- क़मर वहीद नक़वी

चुनाव गरम है. चाय ठंडी हो चुकी है! लड़ाई घनघोर है. कहते हैं, युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज़ है. जो भी जिताऊ हो, वही सही. नारा, मुद्दा, हथियार, सेना, सिपाही, सेनापति, सब जिताऊ होना चाहिए! भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है. घेरो, घेरो, सरकार को घेरो! 2जी, सीडब्ल्यूजी, कोयला और जाने क्या-क्या? कर यूपीए सरकार पर वार! दाग़ एक-एक दाग़ के गोले! भ्रष्टाचार हटाना है! देश बचाना है! और कर्नाटक भी बचाना है! तो चल, ले आ, ले आ, येदियुरप्पा को ले आ, फूल-माला पहना कर ले आ! स्वागतम्! आपके ऊपर भ्रष्टाचार के सब आरोप मीडिया की मनगढ़न्त कहानियाँ हैं! आप कर्नाटक में बीजेपी के खेवनहार हैं. आइए महाराज! और चल, रेड्डी बन्धुओं से भी दिलजोई कर ले. सुषमा स्वराज विरोध करती रहें, तो करें. श्रीरामुलु को बेल्लारी से लड़ाओ! यहाँ कर्नाटक को बचाना है, वहाँ देश को बचाना है! फ़र्क समझ में आया आपको!

          भ्रष्टाचार तो काँग्रेस को भी बिलकुल बर्दाश्त नहीं! देखिए न, लोकपाल के लिए कितना पसीना बहाया, कैसे जोड़-जुगत लगा कर लोकपाल बिल पास करवाया! भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए राहुल जी तो और भी कई बिल लाना चाहते थे. लेकिन क्या करें? सदन ही नहीं चल पाया! अध्यादेश वाला रास्ता भी पकड़ नहीं पाये. राष्ट्रपति जी का सिग्नल सही नहीं था! चलिए ख़ैर, जो अपने हाथ में है, वह तो कर लेते! अशोक चव्हाण को टिकट मिल गया. पवन बंसल को भी मिल गया. सुरेश कलमाडी को नहीं मिला. उनकी पत्नी को भी नहीं मिला! देख-देख कर भेजा फ़्राई हो रहा है. ये कौन-सा चमत्कारी चश्मा है? जो चाहोगे, वही दिखायेगा. जहाँ दाग़ देखना चाहोगे, दिख जायेगा. जहाँ नहीं देखना चाहोगे, वहाँ सब कुछ बेदाग़ दिखेगा! है न कमाल की बात!

          बीजेपी और काँग्रेस दोनों के पास एक ही छाप के चमत्कारी चश्मे हैं, जो मनचाहे दाग़ दिखाते हैं और अनचाहे दाग़ अदृश्य कर देते हैं!


          अपने शरद पवार जी को आजकल नमो में दाग़ ही दाग़ नज़र आ रहे हैं! अभी कुछ दिन पहले तक उन्हें भी और उनकी पार्टी के बड़े नेताओं को वह सारे दाग़ दिखना अचानक बन्द हो गये थे! बड़े भले-भले बयान आ रहे थे, जैसे राजनीति में कोई अछूत नहीं होता. फिर दंगों के मामले में अदालत को मोदी के ख़िलाफ़ ठोस सबूत नहीं मिल पाये. केस बन्द हो गया. पवार साहब को नयी लाइन खुलती दिखी! बोले, सबको अदालत के फ़ैसले का सम्मान करना चाहिए. फिर सुना गया कि नमो-पवार की कोई गुपचुप मुलाक़ात हुई है. एनसीपी ने ज़ोरदार खंडन किया. उनकी यात्रा कार्यक्रम का ब्यौरा जारी कर बताया गया कि पवार उस दिन किसी और जगह थे. अख़बार ने बिलकुल फ़र्ज़ी ख़बर छापी है. कई दिन बाद मान लिया कि मिले तो थे, और मिलने में क्या बुराई है? बीच में उनकी पार्टी तीसरे मोर्चे के मंच पर भी दिखी. लोग हैरान कि यह सब क्या हो रहा है? ज्ञानियों ने ज्ञान दिया, कुछ नहीं बच्चा, जी हलकान न कर, ये सब चुनाव की माया है, सीटों पर समझौते की सौदेबाज़ी चल रही है. बस. उसी लिए बोल, चाल कभी इधर, कभी उधर हो रही है. ज्ञानीजन सही थे. सीटों का मामला तय हो गया. अब आजकल पवार साहब नमो पर एक से एक ज़हरबुझे बाण छोड़ रहे हैं! पब्लिक का भेजा फ़्राई हो रहा है, तो हो! गिरगिटिया चश्मे की यही तो ख़ासियत है. जैसी धूप, वैसा रंग!

          पवार ही क्यों, बरसों बरस तक सेकुलर टोपी पहन कर नमो को पानी पी-पी कर कोसने वाले बहुत-से नेता अब नमो के क़सीदे पढ़ रहे हैं. रातोंरात पार्टी बदल गयी, बोली बदल गयी. नयी-नयी बोली बोलते कुछ दिन ख़ुद उन्हें भी अटपटा लगता है और पब्लिक को भी. फिर बिसर जाता है. हमारे यहाँ कहा जाता है, बीती ताहि बिसार दे! भूलो भई भूलो! जो बात आज काम की नहीं, वह याद रखने से भी क्या फ़ायदा? और यह कोई पहली बार हो रहा है क्या कि कोई लजाये-सकुचाये! छगन भुजबल, नारायण राणे, संजय निरुपम शिव सेना से बरसों पहले निकल कर 'सेकुलर' हो चुके हैं कि नहीं! अपने कल्याण सिंह भी जब ठौर-ठिकाने की तलाश में दर-दर धक्के खा रहे थे तो 'मुल्ला मुलायम' के घर भी कुछ दिन मेहमान बने थे! दो 'भाइयों' के मिलन का वह कैसा अद्भुत नज़ारा था कि लोग आँखें मल-मल देख रहे थे कि जो वह देख रहे हैं, वह सच है या कोई दुःस्वप्न! बहरहाल, कई गलियाँ घूम कर वह अब फिर 'अपने घर' वापस आ चुके हैं.

          उधर, वह 'आप' वाले हैं. जुमा-जुमा आठ दिन की पार्टी! बड़ी-बड़ी बातों वालों पार्टी. आठ दिन, अठारह बातें! कल जो बोला, वह कल था. आज जो बोल रहे हैं, वह आज है. कल जो बोलेंगे, वह कल देखेंगे! राखी बिड़लान को टिकट देंगे. हल्ला मचा. अरे....रे.... किसने कह दिया, देंगे? नहीं देंगे. महेन्द्र सिंह को टिकट दे दिया. कुछ दिन बाद महेन्द्र सिंह ने टिकट वापस कर दिया. फिर 'मजबूरन' राखी बिड़लान को टिकट देना ही पड़ा! इधर से कान न पकड़ कर उधर से पकड़ लियया! टिकटों पर हंगामा मचे, यह कोई बड़ी बात नहीं है. बड़ी बात यह है कि जगह-जगह पार्टी कार्यकर्ता कह रहे हैं कि पार्टी ने जो नियम बनाये थे, वह सब कहीं धूल फाँक रहे हैं! बातें अभी ही बदलती जा रही हैं तो आगे कौन हवाल? गिरगिटिया चश्मा पहने बिना राजनीति नहीं हो सकती! मान गये हम भी!

          अभी 56 इंच वाली हुँकारी पार्टी के एक विज्ञापन पर नज़र पड़ी. महिलाओं के ख़िलाफ़ अत्याचार रोकने हों, देश में बलात्कार रोकने हों, तो हमें वोट दीजिए! समझ में नहीं आया. केन्द्र की सरकार देश में बलात्कार कैसे रोकेगी? राज्यों की पुलिस को केन्द्र सरकार कैसे कसेगी? किस जादुई चिराग़ से ऐसा होगा? बलात्कार किसी राज्य में हुआ तो दिल्ली का प्रधानमंत्री कार्यालय या गृह मंत्रालय उसमें कैसे दख़ल देगा? आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई को तो आप सबने मिल कर इसीलिए भोथरा बना दिया न कि एनआइए को राज्यों में जा कर तलाशी-छापा-गिरफ़्तारी का अधिकार आपको मंज़ूर नहीं था. अब हो सकता है कि आप सरकार में आ जायें तो आपको इसकी बड़ी ज़रूरत महसूस हो! तब आप विपक्ष में थे. तब की बोली अलग, अब की अलग!

          देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? भ्रष्टाचार? कालाधन? ग़रीबी? पिछड़ापन? लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था? बेरोज़गारी? ढुलमुल विदेश नीति? राजनीति का अपराधीकरण? ये सब तो है. लेकिन पहली समस्या क्या है? अपनी अल्प बुद्धि कहती है कि पहली समस्या है, गिरगिटिया चश्मा! जिस दिन नेताओं की आँखों से यह चश्मा उतर गया, बाक़ी सारी समस्याएँ अपने आप हल होने लगेंगी! इतनी छोटी-सी बात हमको समझ में आ जाय तो बात बन जाये! वरना तो बस बजाते रहिए इसकी या उसकी ढपली!

http://raagdesh.com (लोकमत समाचार, 29 मार्च 2014)

nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
चित्तकोबरा क्या है? पढ़िए मृदुला गर्ग के उपन्यास का अंश - कुछ क्षण अँधेरा और पल सकता है | Chitkobra Upanyas - Mridula Garg
 प्रत्यक्षा के उपन्यास शीशाघर पर राजीव कुमार का गहन पाठ
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने — कहानी — मधु कंकरिया | Hindi Story on Stranded Pakistanis by Madhu Kankaria
वह बुद्धिमान है और… : अनामिका अनु की तीखी कहानी
मृदुला गर्ग : मिलजुल मन (उपन्यास अंश)  Mridula Garg's 'Miljul Man' Sahitya Akademi Award Winner 2013
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
समीक्षा: मुजीब रिज़वी की किताब ‘सब लिखनी कै लिखु संसारा: पद्मावत और जायसी की दुनिया’ — दिव्या तिवारी | Padmavat Aur Jayasi Ki Duniya
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل