मोदी ने वो किया जो वाजपेयी नहीं कर पाये ... रवीश कुमार | Modi did what Vajpayee could not do ... Ravish Kumar

विकास का मतलब पूरी दुनिया में अलग अलग तरीके से समझा गया है ।
जो इसके आलोचक हैं उनमें संवाद की ऐसी क्षमता नहीं है
जिससे वे किसी विकल्प को स्थापित कर सकें .... रवीश कुमार


नतीजा आ गया । वैसा ही आया जैसा आने की बात बीजेपी कह रही थी । इस नतीजे का विश्लेषण नाना प्रकार से होगा लेकिन जनता ने तो एक ही प्रकार से फ़ैसला सुना दिया है । उसने गुजरात का माडल भले न देखा हो मगर उस माडल के बहाने इतना तो पता है कि चौबीस घंटे बिजली मिलने में किसे एतराज़ है । अच्छी सड़कों से किसे एतराज़ है । इसीलिए एक तरफ़ मतों का बिखराव है तो दूसरी तरफ़ ज़बरदस्त जुटान । बीजेपी के विरोधी मत अलग अलग निष्ठाओं और समीकरणों में उलझे रहे और समर्थक मत की एक ही निष्ठा रही ।

जिन भी दलों को लगता है कि वे नरेंद्र मोदी से मुक़ाबला करना चाहते हैं उन्हें अपनी सरकारों के कामकाज का तरीक़ा बदल देना होगा । अब वो प्रचार की नक़ल कर मोदी का विकल्प नहीं बन सकते ।
          दुनिया जिस वक्त व्यक्तिवादी राजनीति के नाम पर आलोचना कर रही थी उसी वक्त जनता एक व्यक्ति में नेता ढूँढ रही थी । उसे एक ऐसी दिल्ली चाहिए थी जो शिथिल न लगे । काम करने वाली हो मगर पंचवर्षीय योजनाओं के हिसाब से नहीं । आकांक्षाओं का बखान करने वाले भी यह देखेंगे कि लोगों को अब गति चाहिए । वो किसी पुल को चार साल की जगह एक साल में बनते देखना चाहते हैं । नरेंद्र मोदी शायद उसी प्रबंधन और रफ़्तार के प्रतीक के रूप में देखे गए हैं ।

 नरेंद्र मोदी ने वो किया जो वाजपेयी नहीं कर पाये । मोदी ने बीजेपी से कांग्रेसी कल्चर को निकाल फेंका है ।
          एक तरह से यह अच्छा है । विकास का मतलब पूरी दुनिया में अलग अलग तरीके से समझा गया है । जो इसके आलोचक हैं उनमें संवाद की ऐसी क्षमता नहीं है जिससे वे किसी विकल्प को स्थापित कर सकें । जो भी विकास का माडल चल रहा है उस पर सवाल उठाने वाली शक्तियों के साथ ये जनता नहीं है । वो किसी स्थानीय जगहों पर हो सकती है मगर व्यापक रूप से जीडीपी और सेंसेक्स वाले माडल को स्वीकार चुकी है । उसी में अपना भला देखती है । यह दुखद तो है मगर यही हमारी राजनीति और जनता के दक्षिणपंथी होने की सच्चाई भी है । दक्षिणपंथी के साथ हम सांप्रदायिकता को जोड़ते हैं मगर यह उसका एकमात्र मुखर पक्ष नहीं है । हमारी राजनीति दक्षिणपंथी हो चुकी है । इसके होने का चक्र पूरा हो गया है । वैसे भी बाक़ी दल भी आर्थिक मामलों में दक्षिणपंथी ही हैं । हमारे देश में दक्षिणपंथी राजनीति की नई समझ पैदा करनी होगी ।


 जब आलोचक इस बात में मगन थे कि मोदी बीजेपी को बर्बाद कर रहे हैं उसी दौरान मोदी बीजेपी को न सिर्फ युवाओं से भर रहे थे बल्कि अपनी सक्रियता और हमलों से उन्हें विचारों से लैस कर रहे थे ।
          जिन भी दलों को लगता है कि वे नरेंद्र मोदी से मुक़ाबला करना चाहते हैं उन्हें अपनी सरकारों के कामकाज का तरीक़ा बदल देना होगा । अब वो प्रचार की नक़ल कर मोदी का विकल्प नहीं बन सकते । अगर जनता उन्हें लगातार काम करते देखेगी तभी प्रचार भी साथ देगा । इतना ही नहीं बिहार यूपी की बीजेपी विरोधी पार्टियों को अपना ढाँचा बदलना होगा । उनके पास विचार है न संगठन । बीजेपी के पास दोनों है । इनकी आलोचनाएं हो सकती है मगर आज भी बीजेपी जिन नए युवाओं से भरी है वो इसकी हिन्दुत्व की विचारधारा में माँजे गए हैं जबकि सपा राजद या जेडीयू में या तो कोई युवा है नहीं और जो है उसे न तो अपनी विचारधारा का पता है न इसका कि हिन्दुत्व की आलोचना कैसे की जाती है । जब आलोचक इस बात में मगन थे कि मोदी बीजेपी को बर्बाद कर रहे हैं उसी दौरान मोदी बीजेपी को न सिर्फ युवाओं से भर रहे थे बल्कि अपनी सक्रियता और हमलों से उन्हें विचारों से लैस कर रहे थे ।

          फ़िलहाल बीजेपी ने अपने तमाम विरोधियों और आलोचकों को निहत्था कर दिया है । उनकी कमज़ोरियों को उजागर कर दिया है । अब उनके लिए यहाँ से उठना एक दिन का काम नहीं होगा । बीजेपी आज पहले से कहीं संगठित है । उसके पास कई राज्य हैं जो कांग्रेस सिस्टम की तरह संघ सिस्टम में काम करते हैं । अब पहले की तरह उसकी सरकारें नहीं बिखरती हैं बल्कि सत्ता पर पकड़ बनाए रखने का गुर आ गया है । ऐसे मज़बूत माहौल में कांग्रेस के सहारे बीजेपी को टक्कर नहीं दिया जा सकता । अब बीजेपी को टक्कर कोई दक्षिणपंथी ही दे सकता है । कांग्रेस को अब भुला दिया जाना चाहिए । इसलिए नहीं कि वो आज हार गई है या कमज़ोर हालत में है बल्कि कांग्रेस बदल भी जाएगी तो भी कुछ मामलों में वैसी ही रहेगी । शिथिल और विचारधारा के नाम पर विचार विहीन । फ़िलहाल कांग्रेस के पास जो भी राज्य हैं उन्हें कांग्रेस के ब्रांड एंबेसडर की तरह उच्च कोटी का काम करना होगा । कांग्रेसी कल्चर का वर्क कल्चर बदलना होगा जो संभव होता नहीं दिख रहा ।

          सोलह मई का दिन राजनीति को नए तरीके से देखने का दिन है । उसने कई संभावनाओं को जन्म दिया है । जो इन संभावनाओं के लिए लड़ेगा पंद्रह साल बाद बीजेपी बन पाएगा । बीजेपी भी कांग्रेस की तरह चलते-बनते आज बीजेपी बनी है । नरेंद्र मोदी ने वो किया जो वाजपेयी नहीं कर पाये । मोदी ने बीजेपी से कांग्रेसी कल्चर को निकाल फेंका है । दूसरी तरफ राहुल गांधी ने वो वो कर दिया जो कांग्रेस में कोई ग़ैर गांधी परिवार वाला भी नहीं कर पाया । कांग्रेस के नाश में  मनमोहन सिंह का कम योगदान नहीं है । इस नेता को ढो कर कांग्रेस ने अपनी पीठ पर घाव भर लिये हैं । एक ऐसे नेता का बचाव अंत-अंत तक करती रही जो लोगों के ग़ुस्से का कारण था । खुद कांग्रेस का यह परिवार मोदी के सामने बैठ गया । परिवार में भी लड़ने की ताक़त नहीं बची है ।

          जो भी हो नया नतीजा आया है । उम्मीदों के साथ स्वागत किया जाना चाहिए । आशंकाओं से लदकर देखने का वक्त चला गया । सारी बहसों पर लंबे समय के लिए विराम लग गया है । सवाल हैं और रहेंगे लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कौन करेगा । तब तक के लिए सबको बधाई ।

रवीश कुमार
http://naisadak.blogspot.in/

ये पढ़ी हैं आपने?

नासिरा शर्मा के उपन्यास 'शाल्मली’ के बहाने स्त्री विमर्श पर चर्चा —  रोहिणी अग्रवाल
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
वह कलेक्टर था। वह प्रेम में थी। बिल उसने खुद चुकाया। | ग्रीन विलो – अनामिका अनु
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
संस्मरण : मैं महाकवि निराला जी से मुखातिब हुआ था - प्राण शर्मा Memoirs : Mai Mahakavi Nirala Se mukhatib Hua - Pran Sharma
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा
पंकज सुबीर की सुधा ओम ढींगरा से बेबाक बातचीत