कवितायेँ ... अरुण आदित्य | Poems... Arun Aditya (hindi kavita sangrah)


कवितायेँ ...

अरुण आदित्य 



संदर्भ


एक दिन सपने में
जब नानी के किस्सों में भ्रमण कर रहा था मैं
गंगा घाट की सीढ़ियों पर मिला एक दोना
चमक रहा था जिसमें एक सुनहरा बाल
मैं ढूंढ़ता हूं इसका संदर्भ
फिलहाल मेरे लिए इसका संदर्भ महज इतना
कि घाट की सीढ़ियों में अटका मिला है यह
पर सीढ़ियों के लिए इसका संदर्भ वे लहरें हैं
जिनके साथ बहता, हिचकोले सहता आया है यह
और लहरों के लिए इसका संदर्भ
उन हाथों में रचा है, जिन्होंने रोमांच से कांपते हुए
पानी में उतारी होगी पत्तों की यह नाव
हाथों के लिए क्या है इसका संदर्भ
वह पेड़, जहां से तोड़े गए थे हरे-हरे पत्ते?
पर यह सब तो उस दोने का संदर्भ हुआ
असल तत्व यानी बाल का नहीं
बाल का हाल जानना है
तो उस पानी से पूछिए
जिसकी हलचल में छिपा है
उस सुमुखि का संदर्भ
जिसका अक्स अब भी
कांप रहा है जल की स्मृति में
दूसरे पक्ष को भी अगर देखें
तो इसका संदर्भ उस राजकुमार से भी है
जिसके लिए सुरसरि में तैराया गया है यह
पर अब तो इसका संदर्भ मुझसे भी है
जिसे मिला है यह
और यह मिलना संभव हुआ स्वप्न में
सो इसका एक संदर्भ मेरे सपने से भी है
इस तरह दूसरों की चर्चा करते हुए
अपने को
और अपने सपने को संदर्भ बना देना
कला है या विज्ञान?





नींद


वो दिन भर लिखती है आपकी गोपनीय चरित्रावली
और उसी के आधार पर करती है फैसला
कि रात, कैसा सुलूक करना है आपके साथ
वो रात भर आपके साथ रही
तो इसका मतलब है, दिन में
बिलकुल सही थे आपके खाता बही
अगर वह नहीं आई रातभर
तो झांकिए अपने मन में
जरूर दिखेगा वहां कोई खोट
या कोई गहरी कचोट
यानी आप खुद हैं अपनी नींद के नियामक
पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें मुगालता है
कि वे ही हैं सबके नींद-नियंता
समय के माथे पर निशाना साधने के लिए
कुछ सिरफिरे एक खंडहर से निकालते हैं चंद र्इंटें और भरभरा कर
ढह जाता है एक ढांचा
जिसके मलबे में सदियों तक
छटपटाती है कौम की लहूलुहान नींद
लाखों की नींद चुराकर एक सिरफिरा सोचता है
कि उसके हुक्म की गुलाम है नींद
और ऐसे नाजुक वक्त में भी
उसके सोच पर हंस पड़ती है वह
कि वही जानती है सबसे बेहतर
कि दूसरों की नींद चुराने वाला
सबसे पहले खोता है अपनी नींद
बेचैनी में रात-रात भर बदलता है करवट
उसके दिमाग पर हथौड़े की तरह बजती है
चौकीदार के डंडे की खट-खट
खट-खट के संगीत पर थिरकती नींद
रात भर गिनती है सिरफिरों के सिर
करती है चौकीदार की सुबह का इंतजार

अरुण आदित्य
संपर्क: संपादक—‘अमर उजाला’
रामघाट रोड, तालानगरी, अलीगढ़—202001
मो. 08392945707


मनाली

एक
सांप-सी लहराती चली जाती है सड़क
सड़क के साथ जुगलबंदी करती बलखाती नदी
बस की खिड़की में हिचकोले खाता हमारा चेहरा
नदी में चांद
लहरों की लय पर उछलता
हमारे साथ-साथ चलता है चांद
बहुत दूर तक हमारे साथ नहीं चल पाता चांद
कि धारा के बीच सिर उठाए किसी शिलाखंड से
टकराती है लहर
और बिखर जाती है चूर-चूर होकर
लहर के साथ ही बिखर जाता है चांद
चांद के साथ ही बिखरता है कुछ हमारे भीतर
अगले ही पल
बिखरी हुई लहर संभालती है खुद को
समेटती है बिखरे हुए चांद को
बिठाती है अपनी पीठ पर
और चल पड़ती है पहले की तरह
क्या हम भी हो पाते हैं पहले की तरह?


दो
पहाड़ झांकता है नदी में
और उसे सिर के बल खड़ा कर देती है नदी
लहरों की लय पर
हिलाती-डुलाती, नचाती-कंपकंपाती है उसे
पानी में कांपते अपने अक्स को देखकर भी
कितना शांत निश्चल है पहाड़
हम आंकते हैं पहाड़ की दृढ़ता
और पहाड़ झांकता है अपने मन में-
अरे मुझ अचल में इतनी हलचल
सोचता है और मन ही मन बुदबुदाता है-
किसी नदी के मन में झांकने की हिम्मत न करे कोई पहाड़


तीन
साथ-साथ चलती नदी
अचानक मुड़ जाती है किसी ओर
हो जाती है हमारी आंख से ओझल
फिर भी हमारे भीतर बहता रहता है उसका जल
आगे किसी मोड़ पर फिर सामने है नदी
वही शुभ्र जल
वही कलकल
पर कहां गई मेरे अंतस् की हलचल
कहीं सूख तो नहीं गई मेरे भीतर की नदी
अरे मेरा गला भी तो सूख रहा है
कहां गई मेरी बिसलेरी की बोतल ?

००००००००००००००००

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