वीरेन्द्र यादव: चिदंबरम, सलमान रुश्दी और प्रतिबन्ध | Virendra Yadav


सलमान रुश्दी की पुस्तक पर प्रतिबन्ध का गलत होना - वीरेन्द्र यादव | I have no hesitation in saying that the ban on Salman Rushdie's book was wrong - P Chidambaram

'How Many Years to Correct Mistake,' Asks Salman Rushdie After Chidambaram's Remark

चिदंबरम, सलमान रुश्दी और प्रतिबन्ध पर वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव की टिप्पणी






असहिष्णुता के विरुद्ध और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में जब देश का वृहत्तर बौद्धिक समाज आंदोलित हो देश के पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी .चिदंबरम द्वारा ‘सैटनिक वर्सेज’ पर अट्ठाईस वर्ष पूर्व अपनी ही सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबन्ध को गलत कहना एक नयी लेकिन जरूरी बहस की शुरुआत है. सलमान रुश्दी की यह प्रतिक्रिया भी उचित ही है कि अब इस प्रतिबन्ध को हटाने में कितने वर्ष और लगेंगें .कहना न होगा कि पी. चिदम्बरम का यह बयान आहत भावनाओं की राजनीतिक खेती के विरुद्ध सृजनात्मकता के पक्ष में एक जरूरी हस्तक्षेप की संभावनाओं से भी युक्त है. यहाँ यह सवाल भी उचित ही उठेगा कि आखिर पश्चिम बंगाल की वामपंथी सरकार ने मजहबी कट्टरपंथियों के दबाव में तसलीमा नसरीन को कोलकता छोड़ने के लिए क्यों विवश किया ? और आखिर क्यों ममता बनर्जी की सरकार तसलीमा नसरीन की आत्मकथा के विमोचन की अनुमति कोलकाता पुस्तक मेले में नही देती और बंगला अखबारों ने तसलीमा के लेख आदि छपने पर अघोषित प्रतिबंध लगा रखा है. दरअसल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जोखिम का इलाका इन सवालों से होकर गुजरता है . अच्छा यह है कि देश की सर्वोच्च न्यायालय का इस विषय पर स्पष्ट मत है कि “हमें सिर्फ उन्हीं विचारों का सम्मान नहीं करना चाहिए जो हमें पसंद है,बल्कि उन विचारों को भी जिनसे हम घृणा करते हैं.

यदि हम आज के असहिष्णु समय पर लौटें तो यह सुस्पष्ट है कि आज हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी ताकतें इसीलिए अधिक आक्रामक और मुखर हैं क्योंकि उनका और केन्द्र सरकार का डीएनए एक ही है. एक की आहत भावनाओं का तर्क दूसरे की राजनीति का खाद-पानी है. यहाँ यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जहाँ भाजपा आरएसएस से अपनी नाभिनालबद्धता के चलते हिन्दू भावना आहत होने का खुला खेल खेलती है वहीं कांग्रेस और सपा सरीखे दल अब बहुसंख्यकवाद की राजनीति से सीधी मुठभेड़ करने से बचते हैं. महाराष्ट्र में कांग्रेस शासन के ही दौर में तो शिव सेना और मनसे के हौसले बुलंद हुए हैं. और यह अकारण नही है कि सपा सुप्रीमो के ‘परिंदा भी पर नही मार सकता’ के तेवर अब इतिहास के पन्नों में कैद हो गए हैं. दलितों की राजनीति करते हुए मायावती को न तो गुजरात में भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार से गुरेज हुआ और न ही साझा सरकार बनाने से. नंगा सच यह है कि अब राजनीतिक दलों ने गांधी, नेहरु, अम्बेदकर ,लोहिया सरीखे प्रतीक पुरुषों को पवित्र बुत बनाकर ‘धूप, दीप, नैवेद्य’ की भेंट चढ़ा दिया है. ज्यों ज्यों बुत बड़े हो रहे हैं त्यों त्यों सरोकार तिरोहित हो रहे हैं. यह हादसा भी हम देख ही रहे हैं कि संविधान का कदम-दर-कदम उल्लंघन करने वाले अब संविधान को ‘पवित्र ग्रन्थ’ का दर्ज़ा देने में अग्रणी है. ऐसे समय में चिदम्बरम का यह बयान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक गंभीर चर्चा की शुरुआत करने के साथ साथ सिद्धांत, विचार और राजनीतिक सुचिता की बहस के भी नए गवाक्ष खोलता है. कालबुर्गी, पानसरे और दाभोलकर की शहादत ने तर्क , वैज्ञानिकता और वैचारिक सहिष्णुता के पक्ष में जिस तरह भारत के बौद्धिक समाज को अभूतपूर्व ढंग से आंदोलित किया है उम्मीद की जानी चाहिए कि आज का राजीतिक समुदाय भी इस समूची बहस को सलमान रश्दी के उपन्यास पर प्रतिबन्ध को गलत ठहराए जाने की चिदम्बरम की आत्मस्वीकृति को एक नये अवसर के रूप में अंगीकार कर अपनी वोट बैंक की राजनीति पर पुनर्विचार करेगा .


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