प्रवासी फिल्म:: वर्तमान दौर में डायस्पोरिक सिनेमा — सक्षम द्विवेदी



प्रवासी भारतीय फिल्म dysphoric-cinema

प्रवासी फिल्म

प्रवासी भारतीय फिल्म



वर्तमान  दौर में डायस्पोरिक सिनेमा

 — सक्षम द्विवेदी


प्रवासन एक ऐसी प्रक्रिया है जो कि मनुष्य की उत्पत्ति के साथ से ही जारी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट बताती है कि सन 2005 में विश्व की कुल आबादी की 3 प्रतिशत जनसंख्या प्रवासितों की है। प्रवासन के फलस्वरूप जिस समुदाय का निर्माण हुआ उसे डायस्पोरा कहा गया।

डायस्पोरा का शाब्दिक अर्थ बिखराव है, परन्तु यहूदियेां के बेबीलोन से पलायन के बाद पलायित समूह को डायस्पोरा की संज्ञा दी गयी। वर्तमान में प्रवासन तथा प्रवासित समूहों के अध्ययन हेतु ‘डायस्पोरा’ शब्द ही एकडमिक जगत में ग्रहण कर लिया गया है।

कोहेन तथा सैफरसन जैसे विद्वानों का मानना है कि प्रवासित समूह अपने मूल निवास, परंपरा, भाषा सहित अपनी संस्कृति के प्रति झुकाव रखता है तथा उसे संरक्षित और संवर्धित करने का प्रयास करता है। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण इन तमाम बिन्दुओं की अभिव्यक्ति गंतव्य स्थलों में विभिन्न माघ्यमों द्वारा की जाने लगी। अर्जुन अप्पादुराई के अनुसार प्रवासित लोग अपने क्रिया-कलापेां और स्मृतियों को लिखित माघ्यम, श्रव्य माघ्यम तथा द्श्य-श्रव्य माघ्यम में संरक्षित रखने का प्रयास करते हैं । इसको उन्होने ‘मीडिया स्केप’ के रूप में दर्शाया।

वीडियो के माघ्यम से स्मृति सरंक्षण, संस्कृति संरक्षण और उसकी अभिव्यक्ति ही डायस्पोरा तथा फिल्म के बीच की कड़ी बनती है। विभिन्न फिल्मों में प्रवासियों के जीवन को अभिव्यक्त किया गया है। मीरा नायर, ईश अमितोज, विमल रेड्डी आदि ने प्रवासियों की समस्या पर आधारित फिल्मों का निर्माण कर सफलता भी प्राप्त की।

मीरा नायर की नेमसेक जहां बंगालीयों के पहचान संकट को वैश्विक स्तर पर दिखाने का प्रयास है, वहीं मनमोहन सिंह की फिल्म असां नू मान वतनां दा पंजाबी डायस्पोरा पर आधारित कहानी है। यह फिल्म दर्शाती है कि यदि एक प्रवासित व्यक्ति वापस अपनी स्वभूमि में लौटकर बसना चाहता है तब उसे किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है इसके अलावा बेंड इट लाइक बेकहम, मानसून वेडिंग, अधूरा सपना अलग-अलग तरह की प्रवासियों की समस्या को उजागर करती है।

विमल रेड्डी फिजी में रह रहे भारतीय डायस्पोरा की समस्याओं पर केन्द्रित फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। इनके द्वारा निर्मित अधूरा सपना, घर-परदेश और हाई वे टू सूवा फिजी में रह रहे प्रवासी भारतीयों की अभिव्यक्ति है। ईश अमितोज की कंदबी कलाई प्रवासीयों पर आधारित एक चर्चित फिल्म रही। इस फिल्म में सिख डायस्पोरा की समस्याओं को उजागर किया गया है।

अतः इतना तो स्पष्ट है कि फिल्मेां तथा प्रवासी जीवन का गहरा संबध रहा है। परन्तु ऐकेडमिक अघ्ययन के दृष्टीकोण से इसे कैसे देखा जाए और समाज को इसका क्या लाभ है तथा आज के समय में इस प्रकार के अघ्ययन का क्या उपयोग है, इसको जानना भी आवश्यक हो जाता है।

अगर हम विगत 20 वर्षो पर नजर डालते हैं तो साफ दिखाई देता है कि ऐसे विषयों पर अनेक शोध हुऐं हैं जो कि फिल्मों तथा डायस्पोरा के अंतरसंबधों पर आधरित हैं। रेखा शर्मा ने फिल्मों द्वारा दक्षिण एशियाई जीवन को कैसे दिखाया जा रहा है अपने शोध पत्र का विषय बनाया। रेखा शर्मा ने अमेरिकन देसी फिल्म का विश्लेषण कर दक्षिण ऐशियाई प्रतिनिधित्व को फिल्मों के माध्यम से देखने का प्रयास किया। सृजा सान्याल ने नेमसेक में यह परीक्षण किया कि एक स्त्री प्रवासित होने पर किस प्रकार की समस्याओं का सामना करती है। सुब्रता दास ने बंगाली डायस्पोरा की समस्याओं को नेमसेक फिल्म को आधार बनाकर देखा। अर्जुन अप्पादुराई ने मीडिया तथा फिल्म के अंर्तसंबधों की व्याख्या की है। इसी प्रकार करीम एच करीम ऐथेनिक मीडिया पर विमर्श प्रस्तुत करते हैं। अनीता शर्मा अपने डायस्पोरिक फिल्म से जुड़े शोध में यह निष्कर्ष प्राप्त करतीं हैं कि प्रवासीयों की द्वितीय पीढ़ी में कल्पित स्वभूमि की भावना तथा पहचान संकट पाया जाता है। उन्होने अपना शोध नेमसेक फिल्म के पात्र गोगोल को केन्द्र में रखकर किया। गोगोल एक प्रवासित व्यक्ति की संतान है,जिसका प्रवासन भारत से अमेरिका में हुआ है।

आज भारत में भी प्रवासियों के जीवन पर आधारित फिल्में सफलता प्राप्त कर रहीं हैं। हाल ही में रीलीज हुयी एअर लिफ्ट की सफलता यह दर्शाती है कि अब आम जनमानस भी कहीं न कहीं न कहीं प्रवासियों से जुड़े जीवन को देखना चाहता है। एअल लिफ्ट खाड़ी देशेां के अराजक महौल में फंसे भारतीयों को वापस लाने की कहानी पर आधारित फिल्म है। भारत में बनी प्रवासी फिल्मों मे नमस्ते लंदन, पूरब-पश्चिम, तमस, ट्रेन टू पाकिस्तान प्रमुख है। शोएब मंसूर की निर्देशित ‘खुदा के लिए’ अमेरिका और ब्रिटेन में रह रहे प्रवासी पाकिस्तानीयों के पहचान संकट को अभिव्यक्त करती है। यह फिल्म खास तौर पर 11 सितंबर के बाद अमेरिका पाकिस्तान और अफगानिस्तान के प्रति दृष्टीकोण और उसके आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभावों को दर्शाती है।

भारत के तीन केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में जहां डायस्पोरा अध्ययन हो रहा है - महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय तथा गुजरात विश्वविद्यालय है। इन तीनो ही संस्थानों में डायस्पोरा तथा फिल्म के अंतरसंबधों पर शोध कार्य हो चुके हैं तथा अनवरत जारी भी हैं।

हैदराबाद में सुब्राता दास ने फिल्म तथा बंगाली डायस्पोरा को आधार बनाकर तथा रूपाली अलोने ने फिजी में निर्मित फिल्म अधूरा सपना को आधार बनाकर शोध किया वहीं गुजरात में अनुज सिंह मीडिया तथा डायस्पोरा के अंतरसंबधों पर शोध कर रहें हैं। जो यह दर्शाता है कि व्यहवारिक समाज सहित ऐकेडमिक संस्थानों में भी प्रवासियो तथा फिल्म के संबधों पर गहनता से चर्चा की जा रही है तथा समाज में इस प्रकार की फिल्मों के प्रभाव को जानने का प्रयास किया जा रहा है।

फिल्म तथा डायस्पोरा के अंतरसंबधों का अध्ययन और खास तौर पर प्रवासियों के जीवन पर बनी उन फिल्मों का तुलनात्मक अध्ययन जिनका निर्माण प्रवासी देशों में हुआ है तथा जिनका निर्माण स्वभूमी में हुआ है। लोगों को यह बताने में अहम भूमिका निभा रहा है कि स्वभूमि मे रहने वाले लोग प्रवासियों के बारे में किस प्रकार की सोच रखते हैं और स्वयं प्रवासी अपने जीवन के बारे में किस प्रकार की सेाच रखते हैं।

हांलाकि यह सच है कि इस प्रकार की फिल्मों पर डायस्पोरिक दृष्टीकोण से शोध शुरू हुये अभी अधिक समय नहीं बीता है, परन्तु यह स्पष्ट है कि फिल्म तथा डायस्पोरा के अंतरसंबधांे के महत्व को एक महत्वपूर्ण विषय के रूप में मान्यता मिल चुकी है।

सक्षम द्विवेदी,
एम0फिल0 प्रवासन एवं डायस्पोरा विभाग।
महात्मागांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा,महाराष्ट्र।
mob- ७५८८१०७१६४ .

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