जरा इस खेल को समझो बाबू - अमित मिश्रा



तार्किकता की आवश्यकता 

अमित मिश्रा

Amit Mishra Media
हमारे दक्षिणपंथी दोस्तों की तार्किकता की झोली खाली है। वह सिर्फ ‘ऐसा तो होता आया है’ या ‘यही परंपरा रही है’ टाइप के लॉजिक से ही काम चलाते आए हैं।


जब से एंटी रोमियो स्कवॉड की बातें चर्चा में आईं हैं तब से इसके विरोध में तरह-तरह की दलीलें दी जा रही हैं, जो काफी हद तक सही भी हैं। यह पुलिस के हाथ में उत्पीड़न के एक और हथियार के अलावा और कुछ भी नहीं है। लेकिन ऐसे में एक खास ट्रेंड देखने को मिला है। वह है इस एंटी रोमियो स्कवॉड पर बहस को हल्के तरह से पेश करना। मिसाल के तौर पर इसे भगवान कृष्ण की रासलीला, भगवान राम और शंकर भगवान से जोड़ कर कहना। ये गलत चलन है, और इससे एक जरूरी बहस को गैरजरूरी दिशा मिलती है।
सचाई यह है कि आजतक नोटबंदी के फायदों पर न  तो सरकार संसद में कोई श्वेत पत्र लायी है और न ही रिजर्व बैंक इस पर अपना रुख साफ कर रहा है। 

किसी सरकारी नीति के विरोध में धार्मिक दृष्टांत डालने से न सिर्फ तार्किकता में मोथरापन नजर आता है बल्कि लोगों की भावनाओं को ठेस भी पहुंच सकती है। इस तरह से बहस को हल्का करने से एंटी रोमियो स्कॉयड का नीतिगत विरोध करने वालों को छेड़छाड़ करने वालों के हितैशी की तरह पेश करने में भी लोगों को सहूलियत मिलती है।

(DNA - Gajanan Nirphale)


यह वैसा ही है जैसे नोटबंदी पर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले बुरे असर की बातें बताने-वालों को देश विरोधी बता कर खारिज कर दिया गया और आजतक खारिज किया जाता है। जबकि सचाई यह है कि आजतक नोटबंदी के फायदों पर न  तो सरकार संसद में कोई श्वेत पत्र लायी है और न ही रिजर्व बैंक इस पर अपना रुख साफ कर रहा है। असल में सरकारी नीति बनाने वाले और उसका समर्थन करने वाले यही तो चाहते हैं कि बहस को एक ऐसी दिशा में मोड़ दिया जाए कि उस पर बात करना बस मजाक भर बन जाए। इसे सही दिशा में बनाए रखने की जिम्मेदारी आपकी है।

हमारे दक्षिणपंथी दोस्तों की तार्किकता की झोली खाली है। वह सिर्फ ‘ऐसा तो होता आया है’ या ‘यही परंपरा रही है’ टाइप के लॉजिक से ही काम चलाते आए हैं। ऐसे में उनकी पूरी कोशिश रहती है कि बहस को तार्किकता से प्रतिक्रयावाद की तरफ मोड़ दिया जाए। अगर उनके बनाए जाल में फंस गए तो फिर यह उनकी पिच पर खेलने जैसा है। आपके सारे तर्क इस प्रतिक्रियावाद की पिच पर धरे के धरे रह जाएंगे और इस खेल के माहिर आपके हर तर्क को स्टेडियम के बाहर का रास्ता दिखा देंगे।

दूसरी सबसे जरूरी बात किसी की फेस वैल्यू पर उसके काम को न आंका जाए। भगवा कपड़े पहनने वाले बिजनेस मैन को कई मल्टीनैशनल कंपनियां हल्के में लेकर देश से अपना बोरिया बिस्तर समेटने की कगार पर आ चुकी हैं। ऐसे में किसी की वेषभूषा पर नहीं बल्कि काम पर ‘तार्किक’ टिप्पणी करें। मैं योगी की माला जपने को नहीं कह रहा, वो काम टीवी चैनलों के लिए छोड़ दें। आप तो बस हर गलत नीति के बदले सही तर्क पेश करें प्रतिक्रिया देने का काम ‘राष्ट्रभक्तों’ पर छोड़ दें।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००
nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

मृदुला गर्ग : मिलजुल मन (उपन्यास अंश)  Mridula Garg's 'Miljul Man' Sahitya Akademi Award Winner 2013
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
मृदुला गर्ग : मिलजुल मन (उपन्यास अंश -3)  Mridula Garg's 'Miljul Man' Sahitya Akademi Award Winner 2013
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
कहानी 'वो जो भी है, मुझे पसंद है' - स्वाति तिवारी | Hindi Kahani by Swati Tiwari
ईश्वर करे कोई लेखक न बने - प्रेम भारद्वाज | Prem Bhardwaj's Editorial
Book Review: मानस का हंस की आलोचना — विशाख राठी
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
अनामिका की कवितायेँ Poems of Anamika