सोनू, धर्म का मार्केटिंग-प्रमोशन तो तुमने भी किया है — अमित मिश्रा #SonuNigam


सोनू, धर्म का मार्केटिंग-प्रमोशन तो तुमने भी किया है

— अमित मिश्रा

ट्विटर पर सोनू निगम की कारस्तानी पर मैंने भले ही मज़ाक किया था -- 'नि गम नि कर सोनू... की होया त्वानू' लेकिन असली बात अमित मिश्रा ने अपने इस ब्लॉग में कही है. अमित और मेरी, जब हम पश्चिमी उत्तरप्रदेश के चुनावों के सिलसिले में साथ ट्रेवल कर रहे थे, बात हुई है. अमित ने आईने को सामने रख दिया है, अब हम आप लाख मुंह छिपाते रहें, वो सच ही बोलेगा.
भरत तिवारी

सोनू, धर्म का मार्केटिंग-प्रमोशन तो तुमने भी किया है — अमित मिश्रा
उस वक्त शायद सोनू निगम यह भूल गए थे कि जब वह किसी इलाके में जोर आवाज में माता का जयकारा लगवाते थे तब वहीं किसी बिल्डिंग में कोई बीमार सोने की कोशिश कर रहा होता था
इस ब्लॉग को पढ़ने से पहले मैं एक बात की ताकीद दे देना चाहता हूं कि मैं नास्तिक नही हूं लेकिन मेरा धर्म को लेकर किसी भी तरह की मॉब प्रैक्टिस (भीड़ में प्रार्थना) में भरोसा नहीं है।

पंडितजी ने साफ कह दिया कि यहां से भाग जाएं वरना पिटाई करके सही कर दिए जाएंगे

सोनू निगम को ट्विटर पर ट्रेंड करते देख कर लगा कि शायद कोई नया म्यूजिक अलबम आया है। लेकिन जब चेक किया तो पता चला उन्होंने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया है। सोनू निगम ने उस मसले पर ट्वीट किया जिसे लेकर मैं बचपन से आजतक पशोपेश में पड़ा रहा हूं। घर के आसपास होने वाला भागवत पाठ हो या दिल्ली में रहने के बाद सुबह-सुबह कानों में पड़ने वाली गुरबानी, मेरे लिए यह सिर्फ डिस्टर्ब करने वाले ढकोसले ही रहे हैं। हालांकि इसकी वजह से मैं कई बार परेशानी में पड़ चुका हूं। चंद किस्से पेश हैं-
मेरा धर्म को लेकर पहला क्रांतिकारी एक्सपेरिमेंट ही भारी पड़ गया था। पिताजी डांट के श्लोक बुदबुदाने लगे थे और इससे पहले कि वह मेरी टेढ़ी हरकतों की चालीसा पढ़ते मैं दूसरे पंडित को ढूंढने निकल पड़ा। 

मैं इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रवेश पाकर साइंस की पढ़ाई के साथ मार्क्स-लेनिन के साथ ही कबीर औऱ रहीम को भी पढ़ने लगा था। धर्म को लेकर मेरे फंडे काफी साफ होते जा रहे थे। इसी दौरान घर जाना हुआ। माताजी ने घर पर भागवत पाठ रखा था। मैं पहले ही आसपास भागवत के लाउडस्पीकर से परेशान रहा था सो मैंने बिना लाउडस्पीकर के भागवत कराने के लिए व्यवस्था करना शुरू किया। तय वक्त पर पंडितजी घर पर आ गए। बाकी पूजा की सामग्री चेक करने के बाद उन्होंने लाउडस्पीकर को लेकर अपनी जिज्ञासा सामने रखी। मैंने कहा कि हम लोग बिना लाउडस्पीकर के ही भागवत करवाएंगे। पंडितजी तो हत्थे से उखड़ गए। बोले, ‘आप खुद को ज्यादा काबिल समझते हैं। कही बिना लाउडस्पीकर के भी भागवत पाठ होता है।‘ हमने कहा, ‘कहीं और नहीं होता होगा, यहां तो होगा।‘ वह भी कम जिद्दी नहीं थे। अपना झोला समेटने लगे और पैर पटक कर चले गए। माताजी काफी उदास और पिताजी पूरी इंटेसिंटी में उग्र नजर आ रहे थे। मेरा धर्म को लेकर पहला क्रांतिकारी एक्सपेरिमेंट ही भारी पड़ गया था। पिताजी डांट के श्लोक बुदबुदाने लगे थे और इससे पहले कि वह मेरी टेढ़ी हरकतों की चालीसा पढ़ते मैं दूसरे पंडित को ढूंढने निकल पड़ा। बहुत मुश्किल से एक पंडित बिना लाउडस्पीकर के भागवत करवाने को राजी हुआ और वह भी इसलिए कि अभी उनकी नई पंडिताई थी और दुकान कुछ जमी नहीं थी। मैंने उनसे ही पूछा कि अगर लाउडस्पीकर नहीं लगेगा तो दिक्कत क्या होगी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, अरे आसपास के लोग आएंगे नहीं तो हमारा प्रमोशन कैसे होगा। न ही से दक्षिणा मिलेगा और जजमानों की संख्या भी नहीं बढ़ेगी। धर्म और लाउडस्पीकर के गठबंधन का पहला पाठ मुझे मिल चुका था।
आखिरकार एक दिन ग्रंथी साहब के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचा
ऐसा ही दूसरा वाकया दिल्ली में रहने के दौरान हुआ जब अनजाने में एक ऐसा घर किराए पर ले लिया जिसके पास वाला घर असल में गुरुद्वारा था। रात को देर से ऑफिस से वापस आने के बाद भोर में ही गुरुबानी सुनने से मुझे किसी भी तरह की आध्यात्मिक अनुभूत की जगह सिर्फ खीज होती। दिक्कत तब और बढ़ी जब मेरे बेटी पैदा हुआ और रात-रात भर उसे संभालने के बाद थोड़ी झपकी लगते ही भोर का पाठ शुरू हो जाता। मैं बहुत परेशान हुआ और आखिरकार एक दिन ग्रंथी साहब के पास अपनी फरियाद लेकर पहुंचा। उन्होंने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को बंद करने से सिरे से नकार दिया। हां, इस बात पर राजी जरूर हो गए कि साउंड कुछ नीचे किया जा सकता है। इस फरियाद का असर भी चंद हफ्तों तक रहा और मुझे मजबूरन वह घर बदलना पड़ा।

इसी दौरान अपने छोटे भाई के इंजीनियर दोस्त ने अपना वाकया सुनाया। वह गाजियाबाद में जहां रहता था वहां पर मंदिर सुबह-सुबह ही जोर आवाज में भजन पाठ चलाने लगता था। जब उसने वहां जाकर विरोध दर्ज कराया और कानूनी समझाने की कोशिश की तो पंडितजी ने साफ कह दिया कि यहां से भाग जाएं वरना पिटाई करके सही कर दिए जाएंगे। उसने पुलिस में जाकर शिकायत दर्ज करवाने की कोशिश की तो पुलिस ने उसे मकान बदलने की सलाह दे डाली।

सभी दृष्टांत ये बताने के लिए काफी हैं, धर्म के नाम शोर-शराबा किसी एक धर्म की बपौती नहीं है। सभी का इसमें बराबर का हिस्सा है। असल में यह खालिस धर्म की मार्केटिंग का मामला है। चूंकि इस मार्केटिंग के जरिए तैयार हुए क्लाइंट बेस का इस्तेमाल राजनेता भी करते हैं इसलिए सरकार चाहें जो भी हो इस पर किसी भी तरह का कार्रवाई होना तकरीबन नामुमकिन है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त गाइडलाइंस के बाद भी इनका कोई बाल-बांका नहीं कर सकता।

अब बात सोनू निगम की

उन्होंने बड़ा ही मौजूं सवाल उठाया है, लेकिन अगर मुझे सही याद है तो अपने करियर के शुरुआती दिनों में वह खुद जगराता और कीर्तन मंडली का हिस्सा रह कर दिल्ली और एनसीआर की अलग-अलग जगहों पर धर्म की इस कानफोड़ू मार्केटिंग का हिस्सा रहे हैं। उस वक्त शायद सोनू निगम यह भूल गए थे कि जब वह किसी इलाके में जोर आवाज में माता का जयकारा लगवाते थे तब वहीं किसी बिल्डिंग में कोई बीमार सोने की कोशिश कर रहा होता था या कोई स्टूडेंट अपने करियर को संवारने के संघर्ष में जुटा था। ऐसे में धर्म स्थल से जुड़ी एक कहावत सोनू पर बिल्कुल फिट बैठती है। ‘सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।‘

Performing at the Mata Ki Chowki at the New Delhi Chhatarpur Mandir Navratra Celebrations tonite!
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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