कविता का कुलीनतंत्र (2) — उमाशंकर सिंह परमार | #आलोचना "हिंदी कविता का वर्तमान"


कविता का कुलीनतंत्र — उमाशंकर सिंह परमार
साम्प्रदायिकता विरोध की एक अवधारणा है कि "हिन्दुत्व की बुराई करना" जो हिन्दुत्व की बुराई करेगा वही धर्मनिरपेक्ष है। यह उथली समझ है और दूसरे किस्म की साम्प्रदायिकता है। 

भाग-२: सत्ता और पूँजी के संरक्षण में विकसित जमीन से विस्थापित कविता का कुलीनतंत्र 

— उमाशंकर सिंह परमार

इन कवियों में केवल नये कवि ही नहीं है कुछ ऐसे भी कवि हैं जो खुद को लोकधर्मी कहते हैं और पिछले तीन दशक से लोकधर्मिता की ठेकेदारी भी करते आ रहे हैं। अन्तर्विरोध यह रहा कि अपने आपको "लोक" का कवि भी कहते रहे और इनके तार दिल्ली की राजनीति से जुड़े रहे। दिल्ली के मठों और पीठों की परिक्रमा करते रहे और अपने ही लोक में रहने वाले श्रेष्ठ कवियों को अपमान की हद तक दबाते रहे। मैं ऐसे ही लेखकों से इस आलेख की शुरुआत करूँगा। ऐसे अभिजात्य छद्म लोकधर्मियों में नरेन्द्र पुण्डरीक, केशव तिवारी जैसे कवि हैं तो जीवन सिंह जैसे आलोचक भी हैं। नरेन्द्र पुण्डरीक "केदार सम्मान" के दाता कहे जाते हैं। यदि पुरस्कार न देते होते तो कवि के रूप में इन्हें कोई न जानता। पुरस्कार आकांक्षी महानगरीय लोगों की मिज़ाजपुर्सी ने इन्हें कवि बनाया। नब्बे के दशक से लिख रहे हैं मगर लिखने के लिए जिस वैचारिकता, परिपक्वता, और समझ की जरूरत होती है वह सब "कविता की राजनीति" में खर्च कर देते हैं लिहाजा नंगे पाँव का रास्ता (1992), सातों आकाशों की लाड़ली (2002), इन्हें देखने दो इतनी ही दुनिया (2014). इस पृथ्वी की विराटता में (2015) पाँच कविता संग्रह होने के बावजूद भी एक भी परिपक्व कविता इनके पास अब तक नहीं है। इनकी एक कविता है जो अभी की है। कुछ दिन पहले कविता कोश में भेजी थी "वे नाखून थे" इस कविता की शुरुआत तो ठीक है मगर अन्तिम बन्ध में कवि लोकधर्मिता और जनवादिता के मानकों को तोडकर "नंगापन" को ही क्रान्ति घोषित कर रहे हैं -
"यह सब और इस समय को देखकर /मुझे विष्णु नागर की कविता की /ये लाइनें याद आ रही हैं /‘दया राम बा /नंगे रहो और करो मज़ा’ /यानी अब हमारे लिए और उनके लिए कुछ नहीं बचा /यह नंगों का समय है /नंगे मज़ा कर रहे हैं। "। 
इनकी ताजा कविताओं में वैचारिकता का घोर संकट है। वैचारिकता का संकट इनकी अपनी वर्गीय अवस्थिति है। अपने लोक के प्रति इन्होने जीवन में कुछ नहीं किया जब वैचारिकता सीखने का समय था तब दिल्ली के दरबार में हाजिरी देते रहे अब जब उमर अधिक हो गयी है तब अपने अपनी पुरानी कविताओं को ही दोहराते जा रहे हैं। इसी तरह बाँदा के कवि हैं केशव तिवारी इनकी और पुण्डरीक की वैचारिक मनोनिर्मितियाँ एक जैसी हैं। केशव कलावादी हैं। कला का आग्रह मै बुरा नहीं मानता लेकिन किसी भी कलावादी के पास नया कुछ नहीं होता है वह केवल और केवल खुद को दोहराता है वही घिसी पिटी पेशवर रेडीमेड भाषा व भाव का दुराग्रह प्रस्तुत करता रहता है। केशव के तीन कविता संग्रह हैं पहला इसी मिट्टी का बना, दूसरा आसान नहीं विदा कहना, तीसरा तो काहे का मैं। तीनो कविता संग्रहों की भाषा और भाव परखिए सब कुछ साफ़ हो जाता है। पहली बात आपको दिखाई देगी कि केशव जो अपने आपको "वामपंथी" कहते हैं वह अतीतवादी हैं और अतीत भी ऐसा जो सामन्ती संरचनाओं और सुख सुविधाओं आग्रहों को बचाना चाहता है। इसका बडा उदाहरण इनकी कविता "औरंगजेब का मन्दिर है" इस कविता में इनके पाखण्ड को समझा जा सकता है। तो काहे का मै में बीसों कविताएँ हैं जब कवि अपने सामन्ती अतीत से ही रचनात्मकता ग्रहण करता है और उस अतीत को वर्तमान में देखना चाहता है मेंरा गाँव, विसेसर, सुगिरा काकी, अवध की रात, कंकरा घाट जैसी कविताएँ इसका उदाहरण हैं। देखिए एक कविता जोखू का पुरवा -
"कितनें दिनों बाद / जोखू का पुरवा आया हुँ / ये मेंरी माँ का गाँव है / यहीं पर गडी है मेंरी नाल" । 
कवि गाँव आया और उसे अपनी नाल ( बच्चा पैदा होने के बाद नाभि में जुडी एक मांस की नली) याद आ गयी। पूरी कविता पढ़ जाईए कवि कबड्डी, सुर्रा, मित्रों भंगेडी गंजेडियों का स्मरण करता है पर वर्तमान की एक भी अवस्थिति जो वास्तविक और यथार्थ हो सिरे से गायब है। जब यथार्थ आता है तो उसे अतीत से कमतर कहकर केशव अपना पल्ला झाड लेते हैं। आधुनिकता इन्हें कभी छू नहीं सकती है क्योंकी इनके लिए कविता शौक है उसका काम अपने सामन्ती अतीत को बचाना है। वैचारिकता का यह संकट उन सभी कथित लोकधर्मी कवियों में है जो लोक को आरामगाह और पिकनिट सेन्टर समझते हैं। बद्रीनारायण, बोधिसत्व, एकान्त श्रीवास्तव, पुण्डरीक, केशव जैसे कवियों ने लोकधर्मिता की समझ विकृत की और लोक को सनातन पाखण्डों का आश्रय बनाने में कोई कसर नहीं छोडी। केशव और पुण्डरीक तो दिल्ली से दूर हैं खुद को लोकधर्मी कहते हैं लेकिन कुछ मूर्तियाँ ऐसी भी हैं जिन्हे दिल्ली ने बनाया है और पुरस्कृत कर आगे बढ़ाया है। ऐसी मूर्तियाँ अपनी उपलब्धियों के कारण चर्चित हैं इनमें देवीप्रसाद मिश्र का नाम लिया जा सकता है। इनको पसंद करने वाले केवल दिल्ली के मठाधीश और ओढी हुई प्रतिबद्धता वाले संपादक और कवि हैँ यह उनकी अभिरुचि का लिखते हैं। अर्थात कविता में नारेबाजी और अतिवाद दोनो इन्हें बहुत प्रिय हैं। साम्प्रदायिकता पर खूब लिखा है मगर वह भावुकता और वैचारिकता की बजाय आतिवादी बौद्धिकता का शिकार प्रतिपक्ष बनकर आया है। साम्प्रदायिकता विरोध की एक अवधारणा है कि "हिन्दुत्व की बुराई करना" जो हिन्दुत्व की बुराई करेगा वही धर्मनिरपेक्ष है। यह उथली समझ है और दूसरे किस्म की साम्प्रदायिकता है। यही समझ इनकी कविताओं में हैं। देवी प्रसाद मिश्र की कविताओं में एक भी कविता मुझे ऐसी नहीं मिली जिसमें साम्प्रदायिकता के पक्ष में सक्रिय वर्चस्ववादी और पूँजीवादी शक्तियों की आलोचना हो जहाँ हिन्दुस्तानी साझा संस्कृति और समझ का संस्थापन हो। इनका एक कविता संग्रह है "प्रार्थना के शिल्प में नहीं" इस संग्रह की शीर्षक कविता में ही हिन्दू देवताओं पर व्यंग्य है। मुस्लिम लगाव होना बुरा नहीं पर "हिन्दू मुस्लिम एकता" व "साझा संस्कृति" पर चुप्पी और साम्प्रदायिकता के सन्दर्भ में वर्गीय संरचना और ओपनवेशिक प्रभावों पर भी कवि चुप्पी बौद्धिकता से भरी चालाक निरपेक्षता की पोल खोल देती है। इनकी कविता को कविता न कहकर गद्य कहना चाहिए और गद्य भी जो स्टेटमेंन्ट के रूप में है जहाँ वाक्रोक्ति का खिलदंड प्रयोग है इसी कलात्मक खिलदंडपन पर हमारे मठाधीश सम्मोहित हैं ऐसी कविताएँ कविता और विचारधारा दोनो के लिए संकट हैं देखिए एक कविता "सेवादार" और पढ़कर बताईए कि इसमें कितनी मात्रा है कविता की -
 "संजीवनी ने कहा कि सर घर के अन्दर आइये/ मम्मी से मिलिये l पापा के जाने के बाद /शी इज़ डेड अलोन ! सर ने कहा ओह ! /बट कीप इट द नेक्स्ट टाइम ! संजीवनी ने कहा कि/सर आप अन्दर नहीं आ रहे तो मेंरे कुत्ते से/ज़रूर मिल लीजिये ! शी इज़ जर्मन शेपर्ड ! प्लीज़ सर ! /सर ने कहा कि वे ज़रूर किसी दिन आएंगे ! फिर उन्होंने संजीवनी को याद /दिलाया कि वह खरिआर - हाउ टेरिबल द प्रननसिएशन /इज़ – खरिआर ज़िले" । 
यह सर्वहारा की कविता है ? सर्वहारा की भाषा है ? सर्वहारा का जीवन है ? यह उच्च घराने की शौकिया मध्यमवर्गीय महानगरीय कुलीन अभिव्यक्ति है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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