पुरस्कार सब कुछ नहीं होते — कविता का कुलीनतंत्र (3) — उमाशंकर सिंह परमार

भाग-3: सत्ता और पूँजी के संरक्षण में विकसित जमीन से विस्थापित कविता का कुलीनतंत्र
— उमाशंकर सिंह परमार

यह समय विज्ञापन और प्रचार और समझौतों की राजनीति का है

जमीन में रहने वाले पद विहीन, पोजीशन विहीन, गाँव और कस्बे के एक्टिविस्ट लेखन को हासिए पर धकेलने के लिए "दिल्ली" ने पुरस्कारों का मायाजाल बिछाया और अतार्किक व अवैचारिक असंगत लेखन का गुणगान करते हुए कवियों को मुक्ति का मार्ग दिखाया। 

इनमें कुछ लेखक अपने पद और पोजीशन की वजह से चर्चित किए गये तो कुछ प्रतिरोध को मार्गच्युत करने के कारण चर्चित किए गये। मगर पुरस्कार सब कुछ नहीं होते लेखन भी जरूरी होता है पुरस्कार यदि अमर बनाते होते तो निराला, विजेन्द्र, जैसे कवि परम्परा में नहीं स्थापित हुए होते और केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण परम्परा से बाहर न हुए होते। इधर नये कवियों में दो ऐसे कवि हैं जिन्होंने अपने लेखन से अधिक पुरस्कार अर्जित किए दोनों दिल्ली के हैं, लेक्चरर हैं। शिक्षक होना मानो जन्मजात लेखक होना और फिर दिल्ली में शिक्षक होना तो बाकी हिन्दुस्तानियों से बड़ा लेखक होना। यह मान्यता लगभग पचास साल से चली आ रही है। इनमें से एक हैं जीतेन्द्र श्रीवास्तव और दूसरे हैं उमाशंकर चौधरी। जीतेन्द्र ने पाँच कविता संग्रह लिखे हैं इन दिनों हालचाल, अनभै कथा, असुंदर-सुंदर, बिलकुल तुम्हारी तरह, कायांतरण। आठ नौ पुरस्कार पाए हैं कृति सम्मान, रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार, भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार, विजयदेव नारायण साही पुरस्कार, डॉ रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान, भारतीय भाषा परिषद 'कोलकाता’ का युवा पुरस्कार, देवीशंकर अवस्थी सम्मान। इनके कविता संग्रहों में जहाँ यह रहते हैं वहाँ का लोक नहीं है। बल्कि जहाँ नहीं रहते वहाँ का लोक है।
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पुरस्कार यदि अमर बनाते होते तो निराला, विजेन्द्र, जैसे कवि परम्परा में नहीं स्थापित हुए होते और केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण परम्परा से बाहर न हुए होते। — उमाशंकर सिंह परमार | फ़ोटो (c) भरत आर तिवारी

जब हम पीछे छूट चुके स्मृतियों में दर्ज लोक को अपने रचनाकर्म का आधार बनाते हैं तो दो प्रकार का छल करते हैं। पहला छल है अपने वर्तमान को अस्वीकार करते हैं और दूसरा छल स्मृतिपरक लोक का मिथ्या चित्रण करते हैं। कविता में कवि के व्यक्तित्व को होने के लिए जरूरी नहीं कि हम आयातित और आभासी लोक की बात करें जिस जमीन में हैं वहीं का बिम्ब रखें। मगर जीतेन्द्र ऐसा नहीं कर पाते हैं। वह वर्तमान का घोर विरोध करते हैं। यही कारण है उनकी कविताएँ अपरिपक्व और कच्ची हैं। कभी कभी प्रतीत होता है जैसे बच्चों ने किसी प्रतियोगिता के लिए लिखा हो। उनकी एक कविता उदाहरण के रूप में देना चाहूँगा ‘कायान्तरण’। यह ‘कायान्तरण’ कविता संग्रह की शीर्षक कविता है। यहाँ दिल्ली के लोक में एक चरवाहे को भेज दिया गया है और चरवाहे का विस्तार से वर्णन करने की बजाय, दिल्ली की पूँजीवादी शोषक मनोवृत्ति को उजागर करने की बजाय "सपनों" को अपरिभाषित करते हुए, कविता में घृणा के स्तर तक लोक से चुने गये नेताओं की आलोचना कर दी गयी है। यह कवि की अभिजात्य और लोकविरोधी मनोवृत्ति है कि गाँव जवार के लोग दिल्ली आते हैं तो केवल "सपने" पूरा करने के लिए या नेतागिरी करने के लिए। भूख और पीड़ा का उल्लेख नहीं करते। भूख से मर रहा आदमी दिल्ली केवल रोटी की आस से जाता है न कि सुख सुविधा भरे सपनों के लिए जाता है। कविता का आरम्भ देखिए -
"दिल्ली के पत्रहीन जंगल में /छाँह ढूँढ़ता /भटक रहा है एक चरवाहा /विकल अवश /उसके साथ डगर रहा है / झाग छोड़ता उसका कुत्ता" 
चरवाहा के साथ गायबैल होते तो कुछ बात बनती मगर कवि ने कुत्ते को रख दिया। क्योंकी दिल्ली की अभिजात्य संस्कृति में कुत्ते रखना स्टेटस सिंबल है। कवि नहीं जानता की चरवाहा दुधारू जानवर चराता है कि कुत्ते चराता है। जीतेन्द्र ऐसी ही बेसिर पैर की कविताएँ लिखने के लिए कुख्यात हैं। और दूसरे हैं उमाशंकर चौधरी जी, इनका नाम कोई भी नया पुराना आलोचक नहीं लेता, इधर कुछ समय से अशोक बाजपेयी के युवा समागमों से भी जुड़ गये हैं तब भी कोई कवि कहने के लिए तैयार नहीं दिखता, पुरस्कार भी आधा दर्जन से अधिक पा चुके हैं, शिक्षक हैं तो शिष्य भी हैं। और शिष्यों का होना चर्चा का बढ़िया साधन है पत्रिकाओं में भले न हो लेकिन फेसबुक में शिष्यगण गुरू जी का गुणगान जरूर करते रहते हैं। मगर जानते सभी है यह गुणगान मजबूरी है महानता नहीं है। इनके कविता संग्रह का नाम है "कहते हैं तब शहंशाह सो रहे थे" इस कविता संग्रह की सभी कविताएँ भीषण असंगति का शिकार हैं। सामान्य विषयों को लेकर लिखी गयीं कविताओं में वैचारिक संस्कार देना और चरित्र का स्वरूप देना इन्होंने कभी नहीं सीखा। स्त्री विषयक कविताओं में घोर अश्लीलता व मर्दवादी वर्चस्ववाद के दर्शन होते हैं। चूँकि यह युवा समागमों के कवि हैं तो कला के रूप में यौन प्रतीकों का वीभत्स प्रयोग करते हैं। "पुरुष की स्मृति में कभी बूढ़ी नहीं होती लड़कियाँ" कविता में अन्धेरी सुरंग, काला साँप, नितम्ब, स्तन, सम्भोग, पानी की बूँदे जैसे प्रयोग सिद्ध कर देते हैं कि यह कवि अभिजात्य ऐशोआराम का शौकिया कवि है। वैचारिक प्रतिरोध को विस्थापित करने के लिए ही पूँजी और सत्ता अश्लीलता और रौमैन्टिसिज्म को बढ़ावा देती है। चिन्तन व चेतनाविहीन शौकिया लोगों को पुरस्कृत करती है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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