फिल्म....पोस्टर कला के हवाले से हिंदी का हाल — नलिन चौहान


मिनर्वा मोव्हिटोन कृत

भारत में पोस्टर कला को एक दोयम दर्जे की कला माना जाता है जबकि इसके उलट पूरी दुनिया में इसे ललित कलाओं के समान सम्मान दिया जाता है

— नलिन चौहान

हिंदी समाज की दशा-दिशा बताते पोस्टर





नलिन चौहान
नलिन चौहान
भारत में हाथ से बने पोस्टर की अवधारणा का विकास सिनेमा के उद्भव के साथ ही हुआ। पोस्टर कला के  हस्तनिर्मित से ऑफसेट प्रिंटिंग और फिर डिजिटलीकरण तक का सफर, कलात्मक सौंदर्य और कारीगरी धीरे-धीरे ढलने की एक कहानी है। सरल शब्दों में, यह कला भारत में सिनेमा की यात्रा को बयान करती है। भारतीय सिनेमा के इतिहास को समझने के लिए फिल्म पोस्टर सबसे उपयुक्त है। वे इस लंबी यात्रा को दर्शाने वाले मील के पत्थर हैं। आरंभिक समय से ही पोस्टरों ने दर्शकों और फिल्म के बीच में आपसी जुड़ाव का काम किया। यह एक कड़वा सच है कि भारत में पोस्टर कला को एक दोयम दर्जे माना जाता है जबकि इसके उलट पूरी दुनिया में इसे ललित कलाओं के समान सम्मान दिया जाता है।

दुनिया में हिंदी सिनेमा शायद एक अकेला सिनेमा होगा जहां एक संवाद अदायगी से लेकर पोस्टर तक एक दूसरी भाषा, यहां अंग्रेजी, का वर्चस्व है।

हिंदी फिल्म पोस्टरों पर छपी एस एम एम औसजा की पुस्तक "बॉलीवुड इन पोस्टर्स" (ओम बुक इंटरनेशनल से प्रकाशित) Bollywood in Posters एक ऐसी ही अप्रतिम पुस्तक है। जिसमें न केवल पोस्टर के बारे में बल्कि हर फिल्म, उसके कलाकारों तथा लोकप्रिय गानों की सारगर्भित रूप से तथ्यात्मक जानकारी दी गई है। पुस्तक से पता चलता है कि हिंदी फिल्मों के पिछले सात दशकों के पोस्टर और पोस्टर बनाने की प्रवृति को गौर से देखने पर पता चलता है कि समय के साथ न केवल इनमें सौंदर्यशास्त्र बल्कि प्रस्तुतिकरण में भी परिवर्तन आया है। एक तरह से ये पोस्टर बदलते सामाजिक-राजनीतिक या सामाजिक-धार्मिक परिदृश्यों पर एक सटीक टिप्पणी है।




1930-1940 के दशक के शुरुआती फिल्म पोस्टरों में धार्मिक तत्व और शालीन पहनावे में महिलाएं दिखती हैं। तब फिल्म निर्माण का आरंभिक चरण था जब उसे सामाजिक मान्यता नहीं मिली थी। ऐसे पोस्टर दर्शकों के समक्ष एक स्वस्थ-पारिवारिक मनोरंजन की छवि पेश करते थे। फिर 1950-1960 के दशक में जब फिल्मों को सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी और कलाकारों को सितारा माने जाने लगा तब अशोक कुमार, नर्गिस और मधुबाला जैसे कलाकार प्रमुख चेहरों के रूप में उभरे। 1970 के दशक में अमिताभ बच्चन जैसे एक्शन नायकों के उदय के साथ सामाजिक विषयों पर अनेक फिल्मों का निर्माण हुआ। जबकि 1990-2000 का दशक में नई अवधारणाओं, प्रारूपों और प्रस्तुतिकरण से भरापूरा रहा। अगर सौंदर्यबोध को पैमाना माना जाए तो पोस्टरों ने लिथोग्राफ से लेकर आॅफसेट और अब डिजिटल प्रिंटिंग तक का सफर तय किया है। इनमें से हरेक की अपनी-अपनी विशिष्टताएं और खूबसूरती थीं।

मिनर्वा मोव्हिटोन कृत
मिनर्वा मोव्हिटोन कृत "मिर्जा गालिब" फिल्म के अंग्रेजी-हिंदी में नाम सहित निर्माता सोहराब मोदी का नाम छपा हुआ है


"बाॅलीवुड इन पोस्टर्स" में हिंदी सिनेमा के 78 वर्षों (1930-2008) की प्रमुख 208 फिल्मों का लेखा-जोखा है। इन फिल्मों में दिल्ली से संबंधित कथानक वाली फिल्मों में राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित सोहराब मोदी की "मिर्जा गालिब" (1954) सबसे पुरानी फिल्म है। फिल्म के पोस्टरों (रंगीन और श्वेत श्याम दोनों) में सुरैय्या और भारत भूषण की फोटो के साथ मिनर्वा मोव्हिटोन कृत "मिर्जा गालिब" फिल्म के अंग्रेजी-हिंदी में नाम सहित निर्माता सोहराब मोदी का नाम छपा हुआ है।




फिल्म का नाम तीन भाषाओं, हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी में छपा हुआ है
फिल्म का नाम तीन भाषाओं, हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी में छपा हुआ है


जबकि दिल्ली के ऐतिहासिक कथानक वाली फिल्म "हुमायूं" (1945) के पोस्टर में एक किलेनुमा इमारत की पृष्ठभूमि में अशोक कुमार, नरगिस और वीणा के चेहरे प्रमुखता से बने हुए हैं जबकि फिल्म का नाम तीन भाषाओं, हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी में छपा हुआ है।

हिंदी... ऊपर छोटे से कोने में
हिंदी...  ऊपर छोटे से कोने में


इसी तरह, बाप-बेटे और महानगर में जमीन के कारोबार की कहानी वाली "त्रिशूल" (1978) के पोस्टर में संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के चेहरों की प्रमुखता हिंदी सिनेमा में सितारा परंपरा के मजबूत होने और अंग्रेजी के बढ़ते दबदबे, जहां निर्देशक-गीतकार-संगीतकार-निर्माता के नाम अंग्रेजी में छपे हैं, का संकेत है। यह बात एक दूसरे पोस्टर से साबित होती है जिसमें अंग्रेजी में त्रिशूल प्रमुखता से छपा है तो हिंदी में छोटे से ऊपर कोने में।

हिंदी की उपेक्षा!?
हिंदी की उपेक्षा!?


गानों के लिए मशहूर हुई "रजिया सुल्तान" (1983) के पोस्टर में अंग्रेजी में छपा फिल्म का नाम भी उर्दू लिपि में लिखा गया है जबकि निर्देशक कमाल अमरोही और संगीतकार ख्ययाम के नाम भी अंग्रेजी में छपे है। यहां भी तुलनात्मक रूप से हिंदी के प्रति उपेक्षा साफ है।


अंग्रेजी का वर्चस्व
अंग्रेजी का वर्चस्व




शाहरूख खान की "चक दे इंडिया" (2007) के पोस्टर में अंग्रेजी का पूरा वर्चस्व नजर आता है, जहां हिंदी सिरे से ही गायब है। अधिकतर दिल्ली में फिल्माई गई इस फिल्म की दर्शकों तक पहुंचने की भाषा भी अंग्रेजी है जो कि हमारे दौर के महानगर की शर्मनाक सच्चाई है। यही सच मणिरत्नम की "गुरू" (2007) में भी झलकता है जहां फिल्म के नाम से लेकर निर्देशक के नाम तक सब अंग्रेजी में है। दुनिया में हिंदी सिनेमा शायद एक अकेला सिनेमा होगा जहां एक संवाद अदायगी से लेकर पोस्टर तक एक दूसरी भाषा, यहां अंग्रेजी, का वर्चस्व है। अब यह अनायास है या सायास यह समझने की बात है, जिसकी जड़े नक़ल और भाषाई आत्महीनता वाले हिंदी समाज के दोगलेपन में निहित है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
चित्तकोबरा क्या है? पढ़िए मृदुला गर्ग के उपन्यास का अंश - कुछ क्षण अँधेरा और पल सकता है | Chitkobra Upanyas - Mridula Garg
हिन्दी कहानी 'अज़ाब' - विजयश्री तनवीर | Vijayshree Tanveer - Hindi Story - Azab
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने — कहानी — मधु कंकरिया | Hindi Story on Stranded Pakistanis by Madhu Kankaria
Hindi Story: 'शतरंज के खिलाड़ी' — मुंशी प्रेमचंद की हिन्दी कहानी
हिलाल अहमद 'आतिफ' की दस कविताएं | भाषा, समय, संवेदनाओं की हिंदी कविताएँ | शब्दांकन
समीक्षा: मुजीब रिज़वी की किताब ‘सब लिखनी कै लिखु संसारा: पद्मावत और जायसी की दुनिया’ — दिव्या तिवारी | Padmavat Aur Jayasi Ki Duniya