मादा देह मुर्गे के एक किलो गोश्त से भी सस्ती — #ये_माताएं_अनब्याही — अमरेंद्र किशोर


टीआरपी के बिसातियों

न प्राइम टाइम में हंगामा मचा और न कोई कवर स्टोरी सामने आयी 

अनब्याही माता होने की पीढ़ीगत परम्परा के अनगिनत महीन और भद्दी वजहों को तलाशता कोई नौकरशाह नहीं मिला, कोई समाजसेवी भी नहीं और कोई पत्रकारनुमा सोशल एक्टिविस्ट भी नहीं दिखा। तब ऐसी खबरें लिखने की आत्मश्लाघा बिलकुल धराशायी हो गई — साफ़ सी बात है कि अख़बारों में चर्चित हुई लुचना टीआरपी के बिसातियों को रास नहीं आयी।
अमरेंद्र किशोर Amarendra Kishore

मादा देह मुर्गे के एक किलो गोश्त से भी सस्ती

— अमरेंद्र किशोर

ये माताएं अनब्याही हैं-1

लुचना जो आज से कोई १८ साल पहले बिनब्याही माँ हो गयी थी। वह मजदूरी करती थी और मेहनताना में उसे रोज ४५ रूपये मिलते थे। जिस रात ठेकेदार उसे रोक लेता था उस दिन उसकी कुल कमाई एक सौ रूपये की होती थी। मतलब एक रात के ५५ रूपये — उन दिनों कालाहांडी में मुर्गे के एक किलो गोश्त की कीमत थी ७० रुपये।


फ़ोटो: अमरेंद्र किशोर


उन दिनों भाषा संवाद एजेंसी से जारी इस खबर को देश भर के हिंदी अखबारों ने प्रकाशित किया था, 'लुचना की देह की कीमत मुर्गे के एक किलो गोश्त से भी कम' — मगर इतना हंगामा-हल्ला-हड़बोंग के बाद भी लुचना को न्याय नहीं मिला। क्योंकि उन अख़बारों की ख़बरों का रसायन अब पहले जैसा प्रभावी और तेजाबी नहीं रहा। तो तंत्र सोया रहा। आयोगों को पता नहीं चला। राज्य में एक नहीं कई लुचनायें यूँ ही एक किलो मुर्गे और दर्जन भर अंडे की कीमत से भी कम रेट पर समझौता करतीं रहीं।

अनब्याही माताओं के हालत से जुडी खबरों के आधार पर इंडियन कौंसिल ऑफ़ सोशल साइंस रिसर्च ने ज़मीनी अनुसन्धान के बाद अनुमान लगाया कि राज्य में चालीस हजार से ज्यादा की संख्या में अनब्याही माताएं हैं। लेकिन इसके बाद कुछ खबरें कवर स्टोरी बनकर चीखने लगीं लेकिन तूफ़ान टलने के बाद की ख़ामोशी पसरती चली गयी। फिर न प्राइम टाइम में हंगामा मचा और न कोई कवर स्टोरी सामने आयी। इतना ही नहीं अनब्याही माता होने की पीढ़ीगत परम्परा के अनगिनत महीन और भद्दी वजहों को तलाशता कोई नौकरशाह नहीं मिला, कोई समाजसेवी भी नहीं और कोई पत्रकारनुमा सोशल एक्टिविस्ट भी नहीं दिखा। तब ऐसी खबरें लिखने की आत्मश्लाघा बिलकुल धराशायी हो गई — साफ़ सी बात है कि अख़बारों में चर्चित हुई लुचना टीआरपी के बिसातियों को रास नहीं आयी।

मत दीजिये नारा 'बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ' का श्रीमान। पढ़ने जानेवाली बेटियां या पढ़ने केलिए विद्यालयों के छात्रावास में रहनेवाली बेटियां जिस दरींदेपन की शिकार हो रही हैं, उसे सो कर-गाकर और चिल्लाकर दूर नहीं किया जा सकता। अभी देश दरिंगबाड़ी की नवजात अनब्याही माँ को लेकर चर्चाएं थमीं भी नहीं है कि कालाहाँडी के नारला प्रखंड की एक छात्रा के गर्भवती होने की खबर आयी है। मीडिया ने फिर अपना दोगला रूप दिखाया। खबर आयी कि दलित कन्या मान बन गयी। क्या अनब्याही माँ को जाति के आधार पर देखा और जांचा जाए ? जिज्ञासा है कि ऐसी खबरें उभरतीं तो हैं लेकिन जातीं कहाँ हैं ?

ऐसे में कहना मुनासिब जरूर है कि राजनीति में तटस्थता के साथ ओढ़ा गया मौन-व्रत नवीन बाबू की खासियत हो सकती है लेकिन राज्य में नारी की अस्मिता और नौनिहालों की ज़िन्दगी के साथ खिलवाड़ का सिलसिला अभी जिस अंदाज में बढ़ता जा रहा है यह ओडिशा को वेलफेयर स्टेट कहे जाने की परम्परा का मजाक है—जैसे सरकार पोस्को अधिनियम लागू करवा पाने में असमर्थ है। लेकिन इस कालातीत मजाक को लेकर राज्य-देश की मीडिया किस हद तक जिम्मेवार है, यह सोचने का वक़्त आ गया है। ऐसे में नौनिहालों को सुरक्षित जिंदगी देने का विज्ञापन महज चोंचलेबाजी के अलावा कुछ भी नहीं है।

चूँकि प्रधानमंत्री दिल्ली में रहते हैं तो मानवाधिकारों से लेकर लोकतान्त्रिक मूल्यों में आयी गिरावट केलिए केवल केंद्र सरकार जिम्मेवार है, इसलिए देश के बाकी मुद्दे गौण है—ऐसे में सरोकार की पत्रकारिता की दुहाई देना श्मशान घाट में अश्लील चुटकुले सुनाने जैसी बात है। आज सवाल पूछने का वक़्त है — जो नाबालिग लडकियां माँ बनतीं है उन्हें पहले बहलाया-फुसलाया और डराया जाता है और उसके बाद उनके साथ सिलसिलेबार रेप होता है। क्योंकि नाबालिग के साथ परस्पर सहमति से सम्बन्ध बनने की दलील बेमानी है। लेकिन सवाल कौन पूछे और किससे पूछे ? काश, मीडिया का कोई मुख्तार चौथे खम्भे पर बैठकर कोई पहल करता।

सवाल पूछता, गुहार लगाता और गुजारिश करता कि बीजू बाबू के लाडले ! राज्य की लुचनाओं का क्या होगा। कृपया कन्यायों को लुचना होने से बचाइए। नवीन बाबू भी चुप और राष्ट्रीय मीडिया भी चुप— इस चुप्पी की कुछ तो वजह होगी ?


अमरेंद्र किशोर तक़रीबन २६ सालों से जन और वन के अन्योन्य रिश्तों की वकालत कर रहे हैं। ग्रामीण विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जान-सहभागिता की विभिन्न गतिविधियों में संलग्न अमरेंद्र सामाजिक वानिकी, रोजगारपरक तकनीक और स्थानीय स्व-शासन से आम जनता को जोड़ने में अपना ख़ास योगदान दिया है। ओडिशा की अनब्याही माताओं, झारखंड से महानगरों की ओर पलायन करतीं वनपुत्रियों और विकास से उपजे विस्थापन के मुद्दे पर अमरेंद्र किशोर ने इस मुल्क की मीडिया को दिशा दी है। अनब्याही माताओं की समस्याओं पर केंद्रित सेमीनार देश में पहली बार आयोजित करने का श्रेय इन्हें जाता है। 

अमरेंद्र ऊर्जा मंत्रालय, भारत सरकार के प्रस्तावित अल्ट्रा-मेगा पावर प्रोजेक्ट, सुंदरगढ़ (ओडिशा) के कम्युनिटी एडवाइजर भी रह चुके हैं और वनोपजों से जुड़े वन-अधिनयम, बाल-मजदूरी, शिक्षा के अधिकार के मुद्दे पर कई शोध कार्यों से जुड़े रहे हैं। इन दिनों अमरेंद्र विकास और पर्यावरण विषय पर केंद्रित अंगरेजी मासिक 'डेवलपमेंट फाइल्स' के कार्यकारी संपादक हैं।

इनकी सात किताबें 'आजादी और आदिवासी', 'सत्ता-समाज और संस्कृति', 'पानी की आस', 'जंगल-जंगल लूट मची है' (हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा सम्मानित), 'ये माताएं अनब्याही', और बादलों के रंग, हवाओं के संग' (लोकायत-- देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय सम्मान) प्रकाशित हो चुकीं हैं।




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००







nmrk5136

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
भवतु सब्ब मंगलं  — सत्येंद्र प्रताप सिंह | #विपश्यना
चित्तकोबरा क्या है? पढ़िए मृदुला गर्ग के उपन्यास का अंश - कुछ क्षण अँधेरा और पल सकता है | Chitkobra Upanyas - Mridula Garg
बिहारियों का विस्थापन: ‘समय की रेत पर’ की कथा
परिन्दों का लौटना: उर्मिला शिरीष की भावुक प्रेम कहानी 2025
 प्रत्यक्षा के उपन्यास शीशाघर पर राजीव कुमार का गहन पाठ
एक चुनाव और क़िस्मत की दो चाबियाँ! - क़मर वहीद नक़वी | Qamar Waheed Naqvi on Election 2014
महादेवी वर्मा की कहानी बिबिया Mahadevi Verma Stories list in Hindi BIBIYA
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل