बिफिया उर्फ़ लव जिहाद का ग्रह वृहस्पत - पंखुरी सिन्हा की कहानी | Pankhuri Sinha Ki Kahani

पंखुरी सिन्हा कवि तो अच्छी हैं ही एक अच्छी कहानीकार भी बन गई हैं। पढ़िए 'बिफिया उर्फ़ लव जिहाद का ग्रह वृहस्पत' मधुर आंचलिक भाषा और सुंदर दृश्यों से सजी पंखुरी की बिल्कुल नई कहानी, प्रेम कहानी ! ~ सं० 





बिफिया उर्फ़ लव जिहाद का ग्रह वृहस्पत

~ पंखुरी सिन्हा

दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, 6 हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह। पुरस्कार - सी वी रमन विज्ञानं कथा प्रतियोगिता 2022 में पहला पुरस्कार, कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2016 का पहला पुरस्कार, कुमुद टिक्कू कथा पुरस्कार 2020, मथुरा कुमार गुंजन स्मृति पुरस्कार 2019, प्रतिलिपि कविता सम्मान 2018, राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, पहले कहानी संग्रह, 'कोई भी दिन' को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, 'कोबरा: गॉड ऐट मर्सी', डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यू जी सी, फिल्म महोत्सव में, सर्व श्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला, 'एक नया मौन, एक नया उद्घोष', कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान. अंग्रेजी लेखन के लिए रूस, रोमानिया, इटली, अल्बेनिया और नाइजीरिया, द्वारा सम्मानित, जिसमें चेखोव महोत्सव, याल्टा, क्रीमिया में कविता-कहानी दोनो को मिले पुरस्कार, और इटली में प्रेमियो बेसियो स्पैशल जूरी अवार्ड विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं! अभी अभी, इटली की एक कविता प्रतियोगिता में चौथे कविता संग्रह 'ओसिल सुबहें' की एक कविता द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित. कविताओं का देश और दुनिया की चौबीस से अधिक भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है. हंगरी और बुल्गारिया में राइटर इन रेजीडेंस रह चुकी हैं! स्वीडन के ट्रानस साहित्य महोत्सव २०२२ में कविता पाठ और साक्षात्कार के साथ शामिल। 
ए-204, प्रकृति अपार्टमेंट, सेक्टर 6, प्लॉट नंबर 26, द्वारका, नई दिल्ली 110075 | nilirag18@gmail.com

सबसे सुख से ब्याही बहन सनीचरी ही थी। जबकि शनि महाराज आसानी से प्रसन्न होने वाले ग्रह नहीं थे। लेकिन, सन्निच्चर को जनमी सनीचरी परम तृप्त थी ससुराल में। जी हाँ, वे छे बहनें थीं और सप्ताह के छेओ दिनों पर उनकी दादी द्वारा उनके नाम रखे गए थे, यही बताया जाता था। इस तरह, सनीचरी के बाद एतबरिया, सोमरिया, मंगली, बिफिया और सुकरी। भाई बुधना बुध को जनमा था। जनम और नामकरण का इतना सुन्दर संयोग गांव भर में और किसी परिवार में नहीं था। गाँव भर के लोग कहते ये अलग अलग दिन जनम का किस्सा उनका मनगढंत था जिसपर सातों भाई बहन आजी कसम खा कर कहते कि बिल्कुल सच्चा था। आजी यानि दादी, जिसे वे कभी दाई कहते, कभी आजी। बच्चों का आजी प्रेम बहुत मशहूर था। वे अक्सर अपने दूरा दालान, खेत पथार में क्या, रस्ते पैंरे चिचिआते हुए सुनाई दे जाते, 'गे आजीssssss! अजिया गे!’ लड़कपन की यह आदत वयस्क होने पर भी बनी रही थी। अजिया भी अति वृद्धावस्था में खेतों की मुंडेरों पर चलती हुई समूचे गाँव की पहरेदारी करती।

दरअसल, इस वज्जिकांचल में दाई को आजी कहने का रिवाज़ नहीं था लेकिन बच्चों की माँ बेगूसराय जिले से आती थी और दाई को इस तरह पुकारने का सलीका उसी ने सिखाया था। बच्चों की माँ उनके बचपन में ही गुज़र गयी थीं। बुढ़िया आजी का बेटा शहर गया था मजूरी खटने। घर आया तो लौटते में मेहरारू को साथ ले गया शहर दिखाने कि आगे पूरे परिवार को ले जाएगा। स्कूल में पढ़ायेगा। लेकिन, लौट ही नहीं सके वे दोनों। ठीक रेलवे स्टेशन के सामने हुआ था एक्सीडेंट। हाथ पकड़ कर सड़क पार करते में ऐसी टक्कर मारी मोटर गाड़ी ने कि वहीँ शहीद हो गए। बच्चों की आजी ने जब बेटे के ढ़ेर होने की खबर सुनी थी तो बेहोश हो कर गिर गयी थी। वह उसका इकलौता बेटा था। एक बेटी और थी जो पास के गांव में ब्याही थी। जब होश आया तब नाती पोते उसकी सेवा कर रहे थे। बेटी अपने धिया पूता के साथ दो दिनों के बाद अपने घर रवाना हो गयी। रह गईं आजी की छः नन्हीं पोतियां और एक उनसे भी छोटा बुधना पोता। उनका हाथ पकड़ कर और उन्हीं की खातिर, बुढ़िया आजी जो उठ खड़ी हुई तो फिर उसने दुबारा खाट नहीं पकड़ी।

बच्चे बड़े हो गए। लेकिन बुधना को उसने गांव से बाहर नहीं जाने दिया। शहर की फैक्ट्री तो बिल्कुल नहीं। जाति से वे कुर्मी थे। वही जिन्हें कुछ लोग कोइरी भी कहते थे। अब तो उस जाति का मनिस्टर भी बन गया था। फिर भी नहीं। मनिस्टर अपने दफ्तर में और लेबर अपनी झोपड़ियां में। थोड़ी-सी उनकी ज़मीन थी। बाकी बटैइया लेकर खेती करने लगा बुधना। खूब मिहनत करता। ढ़ेर उपजाता। साल भर खाता और ईमान का हिस्सा मालिक लोगन को दे देता। बचता तो बेच भी आता मंडी में। लेकिन, गांव ही की मंडी में। बुढ़िया आजी को शक था कि गरह की पूजा वाले नाम धरने और फिर उन बच्चों के लिए ऊँचा ख्वाब देखने के कारण गांव ही के बाभन, भुइंहार, राजपूत लोगन ने मिलकर हत्या करवा दी उसके बेटे की शहर में।

तब से बहुत बदल गया था ज़माना। गांव में बँटैया करने वाले कुछ मल्लाह और तेली कोदारी से बाबू लोगन की धीरे धीरे ज़मीन काट रहे थे। इसी तना तनी में गाँव में पहला दलित वध भी हुआ था। उसके बाद कुछ दिन शान्ति रही और फिर वही हाल। शायद समय ही संग्राम का आ चुका था।

समूचे गांव को न्योत कर, धूम धाम से भोज करा कर, बारातियों की न्योता पेरान्हि करते हुए बुढ़िया आजी ने छेओ पोतियों को ब्याह दिया। बिलउकी मांगती दुल्हन के साथ ढोल तो ढोल, पिपही बजाने वाला भी साथ गया बाबू लोगन की बस्ती में। बिरादरी के बच्चों ने छककर पूड़ी जलेबी खाई। साथ ही, सब्ज़ी और दही चीनी का भी लुत्फ़ उठाया। जब छेओ निपट गयीं तो बुढ़िया आजी बुधने को ब्याह कर बहू भी ले आयी घर। ये महीने भर में ही साफ़ हो गया कि बहू को आजी बलाय लगने लगी। लेकिन आजी ने भी तय कर लिया था कि घर में और नगाड़े नहीं बजवायेगी सो पर-पुतोह के उपेक्षा भरे व्यवहार को स्वीकार किया और उसके दिए पर गुज़र बसर करने लगी। एकदम बचा खुचा देने की गुंजाइश नहीं थी क्योंकि बुध कुमार अपनी आजी के साथ ही खाते थे और ये नियम उन्होंने नहीं बदला। आजी जानती थी प्यार से दिए भोजन का स्वाद अलग होता है। लेकिन, दुनिया में सब कुछ नहीं मिलता। एक का प्यार ही बहुत आसरा था जीने के लिए। जल्दी ही, बहु ने दो बच्चे जने। एक बेटा और एक बेटी के बाद उन्होंने छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा बुलंद करने की ठानी और दोनों बच्चों की परवरिश में लग गए। उन दिनों गांव में स्वास्थ्य केंद्र के साथ साथ, स्कूल भी खुल गया था जहाँ पढ़ाई भी हो रही थी। बुढ़िया आजी पोते पोतियों के साथ धन्य धन्य बुढ़ापा गुज़ार रही थी। उसके अपने पति दो बच्चों के बाद सांप काटने से मर गए थे लेकिन यह गरहों की कृपा थी कि वह पर पोते पर पोती का सुख उठा रही थी।

सब ठीक था कि तभी बिफिया ससुराल से लौट आयी। पहले तो लोग उसे अचानक और अकेले देख कर ठिठके, फिर चकित मुस्कानों के साथ दुआ सलाम कर हाल चाल पूछा। सब ठीक है, बिफिया ने कहा, बस आजी के लिए मन घबरा रहा था। "क्यों रे, कोई बुरा सपना देखा क्या?" कहकर आजी ने उसे गले लगा लिया तो बिफिया फूट फूट कर रोने लगी। मायके की याद किसे नहीं आती? लेकिन, धीरे धीरे यह बात खुल गयी कि बिफिया वापस ससुराल जाना ही नहीं चाहती। दो टूक कह दिया अब नहीं जायेगी। सास इतनी निखोराह है कि हर सब्ज़ी या तो पहले या देर से तोड़ी हुई लगती है। बतिया नहीं तो जुआएल! छिल्का मोटा, बीज कड़े, या फिर गूदा कम, अज्जू अज्जू, ये रोज़ की सब्ज़ी की शिकायत होती, जिसपर पति उसे धुनता। पांच साल झेल ली धुनाई उसने, अब और नहीं। इन पांच सालों में प्यार के दो बोल तो छोड़ो, किसी ने नर्मी से बात नहीं की उससे। अपना कमाएगी, अपना खायेगी। किसी पर बोझ नहीं बनेगी बिफिया।

इतना कहने पर भी भाभी को संतोष नहीं हुआ, उसने ननद को ताने मारे, तो अलग हो गया बिफिया और आजी का चूल्हा! लेकिन ज़्यादा दिन चला नहीं यह साझा चूल्हा। लोगों ने कहा बिफिया के गम में आजी जल्दी मर गयी। आजी के बाद, भौजाई के ताने बढ़ गए। बुधना के आगे तो नहीं, लेकिन पीछे में कोई कसर नहीं छोड़ती। जबकि खेतिहर मज़दूरों की मांग बहुत थी। घरों में भी काम करने वालियों की ज़रूरत। बिफिया इतनी थकी होती, खाना जुटाती, पकाती, खाती और सो जाती। सोचती चार पैसे इकट्ठे हों तो अपनी छत भी अलग कर ले।

शकूर अली भी लोगों के खेतों में मज़दूरी करते थे। जिस खेत में बिफिया काम करती थी, उसी के ठीक बगल वाले खेत में! मालिक भी एक! एक दिन बिफिया देखती क्या है कि सूखी घास उखाड़ते हुए अली शकूर मियां उसे देखे जा रहे हैं। मतलब, ताक रहे हैं तो बस ताक रहे हैं! एकटक! मतलब मुस्कान उनके होठों से चलकर आँखों के पोरों तक बिछल रही है। पहले तो बिफिया को गुस्सा आया बहुत, फिर एक हरियाली की-सी लहर, सूखी घास उखाड़ते उसके हाथों के पास से ऊपर की ओर दौड़ी और कलेजे तक पहुँच कर, लगी फूलों का गुच्छा बन दिल पर लोटने! लेकिन अगले ही पल बिफिया के मुंह से हुंह की आवाज़ निकली, फूलों को उसने उसी बेरहमी से उखाड़ फेंका, जिससे अपने सारे अरमानों का गला उसे खुद घोंटने की आदत पड़ चुकी थी और लगी दूसरी तरफ मुंह कर दुगने वेग से घास उखाड़ने! पेट में चूहे कूद रहे हों तो क्या ख़ाक खिलेंगे दिल में फूल! ज़माना हो गया, बिफिया ने दिन में दो बार से ज़्यादा न खाया और खाया तो क्या? कभी खिचड़ी, कभी चार टुकड़े भाजी के साथ सूखी रोटियां! उगाने को ज़मीन मिले तो बिफिया सब्ज़ियों की टाल लगा दे! हुंह! दुबारा झुंझलाहट में मुंह बिचकाया बिफिया ने! उसके नसीब में औरों के खेतों में खटने के अलावा और लिखा क्या है?

लेकिन शकूर मियां भी धुन के पक्के! खेत बदलकर जा बैठे बिफिया के सामने! बिफिया ने देखा, औरों ने भी देखा, शकूर मियाँ बिफिया को देखे जा रहे हैं। एक दो दिनों तक बिफिया के मुंह फेरने, पीठ दिखाने और शकूर मियां के बार बार उसके आगे आने का सिलसिला जारी रहा। सब देख रहे थे। लेकिन, उन दिनों सब आँखें कम कान ज़्यादा हो गए थे। शकूर मियां जनम से खेत खट रहे थे। राम टहल जी अभी अभी छे लम्बे महीने लगातार आसाम खट कमाकर लौटे थे। किस्सों का पिटारा लिए! आसाम में गजब बातें हो रहीं थीं, नदी किनारे! रोज़ शाम मंदिर के पास वाले पीपल के नीचे चौपाल जुटती। राम टहल जी किस्से सुनाते, लोग आँखें फाड़े सुनते।

“गाय बहा देते हैं नदी की धारा में!”

राम टहल जी आँखें बड़ी बड़ी कर, हाथ के इशारों के साथ कहते, और लोग भौंचक सुनते!

“भला गाय-सी संपत्ति को कोई बहायेगा क्यों?” लोग समझ बूझ नहीं पाते!

"अरे, मांस खाने के लिए और क्या? उधेड़ने के लिए चमड़ी! बनाने के लिए चप्पल, बैग और क्या फैशन के सामान, गो-माता की देह से!"

खुलासा करते राम टहल जी!

"ये गाय की तस्करी है, चोरी भी! कोई अपनी गाय थोड़ी बहा रहे!"

"आह! गो माता को इतना कष्ट!" बूढ़े मुखिया बोल उठे!”

फिर तो लोगों के दिलो दिमाग पर यही बात चढ़ गयी। खेतों में काम करते वे अपने आगे देख कुछ भी रहे हों, उनके ख्यालों में बहती हुई गाय होती।

अव्वल तो रामटहल जी ने बताया कि ठीक सरहद के पास एक ऐसी जगह है, जहाँ क्रेन से गाय को उठाकर, मतलब शरीर का कोई भी हिस्सा उठाकर, फेंकते हैं, जाने सरहद पार या किसी ख़ुफ़िया जगह! फिर जानवर का जो हो! हड्डी टूटे, घिसटे, दर्द से चीखे, रोये बिलबिलाये, जब तक जान नहीं जाए!

शकूर मियां का तो पूरा खानदान गायों की सेवा में लगा था। गाँव का एकमात्र मुसलमान परिवार जिसकी खटाल थी, जो दूध बेचने का काम करता था। यों ग्वालों की कमी नहीं थी और कुछ ग्वारिये बगल के गाँव से भी आकर दूध बेचते पर शकूर मियां के घर वाली खटाल के दूध का कोई जवाब न होता। वैसे तो शकूर मियाँ का पुश्तैनी कारोबार, मुर्गियों के अण्डों का था, फिर मुर्गियों का हुआ, लेकिन एक दिन किसी ने कह दिया 'अमा यार, बस नमकीन नमकीन ही बेचते रहोगे कि कभी कुछ मीठा भी खिलाओगे, पिलाओगे?' तो मियां शकूर के किसी बाप दादे ने न केवल गाय खरीद ली बल्कि चाय की टपरी खोल ली और गिलौटी कबाब बेचने लगे! हाई वे की इस टपरी से, खानदान का वह परिवार मालामाल हो गया। अलबत्ता, मियां शकूर को इतनी नेमत ज़रूर मिली कि कभी टपरी पर मुफ्त के कबाब खा आते, कभी खटाल वाले चाचा के यहाँ दूध पी लेते! उनके हिस्से न खेत थे, न खटाल थी, न टपरी!

हो क्यों नहीं सकता? मियां शकूर के भाई के हिस्से भी तीनों में से कुछ नहीं था। भाई की पत्नी जब शकूर के लिए, एक रोटी भी बेलती तो बिना दस गालियां निकाले नहीं! नतीजतन, मियां शकूर घर पर सोने के अलावा, कम से कम वक़्त बिताते। गाँव में बैठने के लिए जगह की कमी न होती, और फिर उन्हें इधर उधर डोलना भी बहुत पसंद था।

ऐसे ही, एक दिन डोलते हुए वो उठे और पीठ फेरे, खेत से घास गढ़ती बिफिया के आगे उन्होंने दिल की पोटली खोल दी! गिलौटी कबाब की खुशबू, जाने कहाँ से कहाँ तक पहुंची, और कुछ देर तक बिफिया ने डट कर ना नुकुर की, लेकिन, फिर सब ने देखा कि शकूर मियां, हंस हंस कर बातें कर रहे हैं और बिफिया दनादन ऐसे खा रही है कि जैसे भोज के पकवान!

वैसे लोग इन दिनों, आसाम के किस्सों में मशगूल थे। खेतों पर काम करने के अलावा, उन्हें राम टहल जी के किस्सों में घट रही घटनाओं पर चर्चा करने से फुर्सत न थी। रोटी खाने का वक़्त होता तो सब मेड़ों से दूर, कुँयें की जगत पर मिल बैठते। अपना दुःख दर्द बाँटते या राम टहल जी के किस्से! बहुत-सी स्त्रियां कहाँ जा पातीं थीं, रामटहल जी की चौपाल पर? वे सब फटी आँखों से सुनतीं!

इस सब के बावजूद, लोगों ने गौर किया कि शकूर मियां रोज़ खींसे निपोड़ बोलते रहते हैं और बिफिया गबा गब ऐसे खाती है कि जैसे छप्पन व्यंजन जीवन में पहली बार! कहीं यह, शकूर के चाचा के कबाब तो नहीं उड़ा रही? लोगों के ज़ेहन में सवाल कौंधा, और साथ ही उन्होंने देखा कि बिफिया तो हंस हंस कर दुहरी हुई जाती है, मानों गिर पड़ेगी और शकूर मियां ऐसे झुके जाते हैं मानों वह गिरे और वह उठाये!

फटी की फटी रह गयीं लोगों की आँखें और वो कुछ पूछते, इससे पहले, दोनों संभल कर अलग हुए और ऐसे खेत में काम करने लगे, जैसे एक दूसरे को जानते ही न हों!

अगली सुबह, गाँव में खबर आग की तरह फैली कि बिफिया शकूर के साथ भाग गयी!

 'ऐ! भाग गयी?' '

'कब?' 'कैसे?'

 'पकड़ो!'

'अब क्या पकड़ो, जब चिड़िया चुग गयी खेत!'

सारा गाँव उन्हें पकड़ने को व्याकुल हो उठा, जैसे उनके अपने लड़के लड़की भागे हों और वो भी रूपये पैसे उठाकर!

‘अरे कोई तुम्हारे अपने बाल बच्चे हैं जो पकड़ोगे, तीस साल की बुढ़िया चालीस के बूढ़े के साथ भागी है, उन्हें पकड़ना अपना हाथ गन्दा करना है।’

एक ने कहा तो 'गाँव का नाक कटा दिया दोनों ने!' दूसरे ने कहा! फिर, सब सहमत हो गए कि 'गाँव का नाक कटा दिया दोनों ने!' और पूरा गाँव मुजरिमों की भाँति उन्हें पकड़ने को व्याकुल हो उठा!

'अरे! भागना ही था, तो अपने अपने धरम वालों के साथ भागते, ये तो हमारे मुंह पर कालिख पोतने वाली बात हुई!' सब तैश में आये।

'ऐसे नहीं होगा। पुलिस में कम्प्लेन करो!'

'अरे तुम कौन होते हो, पुलिस में कम्प्लेन करने वाले? उसके भाई को कहो'

और भाई को राज़ी कर लिया गया। जो भौजाई, बिफिया को झाड़ू से मारने को तत्पर रहती, वह गाँव क्या अपने घर की इज़्ज़त की नीलामी पर, मूसल उठा कर खड़ी हो गयी।

मामला थाने पहुंचा तो, लेकिन रफ़ा दफ़ा हो गया। 'भागने वाले बालिग़ नहीं पूरे वयस्क हैं, हम क्या कर सकते हैं? अपनी मर्ज़ी से गए हैं। हमारे पास बहुत काम हैं, हमारा वक़्त न ज़ाया करो!' थानेदार ने टाँगे टेबल पर चढ़ाई और पुलिस फ़ोर्स ने हाथ धो लिया।

लेकिन, गाँव वाले इतनी आसानी से मानने वाले न थे! किसी को खूब सूझी कि दोनों ब्याहता हैं।

‘ब्याहता हों तो रहें, हम तो कुछ तब कर सकते हैं, जब उनके आदमी या औरत शिकायत करें। हमें क्या मालूम उनके आदमी या औरत ने दूसरा घर न बसा लिया हो?’ थानेदार जो भगोड़ों के पक्ष में अड़ा, तो गाँव वालों को धमकी भी दे बैठा, 'अब अगर थाने का वक़्त ख़राब किया तो तुम्हें सज़ा होगी!' फिर जाने क्या सोच कर पलटा और बोला, 'क़ानून , क़ानून  के हिसाब से चलता है, तुम्हारे हिसाब से नहीं! क़ानून अपने हाथ में लेने की कोशिश मत करना!'

थाने का दरवाज़ा तो बंद हो गया लेकिन गाँव वालों का गुस्सा परवान चढ़ गया। आखिर, थानेदार कौन होता है गाँव की इज़्ज़त का मामला सलटाने वाला? आज यहाँ, तो कल वहां! उसे भला गाँव से क्या मतलब?

गाँव वालों के मन में खौलते पानी-सा उबाल और उफान!

आखिर, गाँव उनका, इज़्ज़त उनकी, नाक उनकी, जो यों बैठे बिठाये कट गयी! सिपाही का क्या गया भला?

आज बिफिया भागी, कल अगर हमारी बेटी भाग गयी तो?

यही राय मशविरा चल रहा था कि अचानक साइकिल पर दूध के डब्बे खड़काता, तबरेज़ गुज़रता दिखाई दिया!

'साला, भाई हमारी बेटी भगा ले गया, और ये साला हमें ही दूध बेच रहा है! चोट्टा कहीं का!'

'मारो साले को!'

पलक झपकते, तबरेज़ साइकिल से नीचे ज़मीन पर, और घिरा हुआ पूरी तरह! चेहरे पर हवाइयां उड़ती हुईं!

'अरे! शकूर तुम्हारी लड़की भगा ले गया, इसमें मेरा क्या कसूर? मेरी तो उससे, दिनों क्या, हफ़्तों से बात तक न हुई! हमारा तो चूल्हा तक नहीं जलता साथ!'

एक ज़बरदस्त घूँसा उसके पेट पर पड़ा और वह दर्द से दुहरा हो गया। "अबे साले, बताते हैं तुझे, कहाँ जलता है तुम सब का सांझा चूल्हा! साले, सड़क किनारे जाने कौन कौन-सा मांस बेचता है, कबाब में तलकर? कहीं हमारी गौ माता को तो नहीं बेच रहा? सारी गुज़रती हुई दुनिया को कबाब बनाकर, हमारी माँ को तो नहीं परोस रहा? बोल साले! हमें अव्वल दर्ज़े का बेवकूफ समझा है! हमें ही गरज पड़ी है, चलती फिरती दुनिया को रोक रोक कर कबाब खिलाने की? और मुनाफा कमाए तुम्हारा खानदान! अबे साले, हमारी बहन को कबाब खिलवाकर, बरगलाया कि नहीं? बोल कुत्ते, नहीं तो खाल खींच कर भूसा भरवा दूंगा! आज तेरी खैरियत नहीं है बोल!"

यह गाँव के ठाकुर का लड़का था, जो पहलवानी और कुश्ती के नाम पर गुंडा गिरी किया करता था। सुबह उठते ही, अखाड़े में पहुंचकर दंड बैठक, व्यायाम और बस चले तो पूरे गाँव पर लगाम! आज उसे मौका मिला था। अनुशासन के नाम पर गाँव का पुराना ज़मींदार बन गया था।

आक्रोश से भी अधिक, नफ़रत भरे इन शब्दों के साथ लगातार, पीठ के बल औंधे पड़े तबरेज़ पर, वह अपनी लात से प्रहार कर रहा था। उसके शब्दों ने, उसके साथ इकट्ठी भीड़ को भी इतना उन्मत्त, उतावला बना दिया था कि आव न ताव, सारे के सारे लोग अपने पैरों से तबरेज़ को रुई-सा धुन रहे थे। इतने से काम न चला और पहलवान को भी थकान महसूस हुई हो, उसी ने लाठी के लिए आवाज़ लगाई। पलक झपकते, हवा की राह, लाठी हाज़िर हो गयी।

सारा गांव, धूप में खटता, बैंक में अपने अंगूठे का निशान लगाने की लम्बी लाइन में खड़ा प्रतीक्षा करता, शहर की बस में धक्के खाता, जनेरा बोता-काटता, एक नया तमाशा देखने के लिए हाज़िर होने लगा। सबने अपने अपने लिए छाँव की जगह तलाश ली, कहीं दूर, कहीं पास।

इस गाँव में, कितना समय हुआ, किसी सर्कस को आये, किसी मेला को तम्बू लगाए! इस गाँव में निजी उत्सवों और शोक पर्वों के अलावा दो ही घटनाएं घटीं हैं, बाढ़ और सूखे की। इस साल, जेठ आधा बीत चुका है और पानी की एक बूँद, इस गाँव की धरती पर नहीं गिरी। लोगों का पारा ऐसे ही सातवें आसमान पर है।

धैर्य पसीने की तरह, बेकार ज़ाया हो रहा है। जिनकी बोरिंग नहीं है, उनकी रातों की नींद हराम है। धान रोपे खेत में दरारें हैं। रातों की नींद हराम है। जी करता है सल्फास की टिकिया खाकर सो रहें। किन्तु, तबरेज़ पर तो सबसे पहले अपना गुस्सा निकालने वाले ठाकुर की तो कबसे बोरिंग चल रही। वहां जुटे औरों की भी। खींच ले रहे धरती का सारा पानी। उन्हीं के खेतिहर मज़दूर भी जुटे हैं, क्या अपना धरम करम, ईमान बेच आये बाज़ार में? क्या ठाकुर ने कोई लगान माफ़ किया है गुप चुप? कहीं पैसों का वादा तो नहीं किया? लोगों के चेहरों पर अजीब सवाल टंग गए।

लाठी जब पड़ी और तबरेज़ की चीत्कार उठी, स्त्रियों ने आँचल से अपना मुंह ढंक लिया। एक बच्चा रोने लगा। उसका रोना सुनकर दूसरे बच्चे रोने लगे। गाँव में एक अजीब-सा कुहराम मच गया। हो हल्ला सुनकर गांव की सरहद पर बनी एकमात्र पाठशाला का सबसे जवान मास्टर, जो पड़ोस के गांव से साइकिल चला कर आता था और अक्सर तबरेज़ और शकूर मियां के चाचा के ढाबे से लौटते में पूरे परिवार के लिए कबाब पैक करवा कर ले जाता था, जितनी तेज़ी से साइकिल चलाकर आ सकता था, घटना स्थल पर पहुँच गया। उसी समय, किसी तरह खबर पाकर, रामटहल जी भी हाँफते दौड़ते पहुँच गए। उन दोनों के पास, अवाक होने का भी समय न था। हिंसा पर उतारू उस घेराव को चीरते हुए, वे किसी तरह लहूलुहान तबरेज़ तक पहुंचे, और उसपर होने वाले वार को रोकने का उपक्रम करने लगे।

“क्या कर रहे हो? अपने गांव के भाई को मार रहे हो? क्यों?”

“जेल जाओगे सब! जब तक बिफिया यहाँ थी, उसे दो जून की रोटी देना किसी को गवारा न था और अब प्रेमी के साथ भाग गयी है तो प्रेमी के भाई को मार डालोगे?”

“भगवान् का डर नहीं, तो क़ानून  से डरो! गाय की सेवा करने के बदले आदमी की हत्या करने लगे तुम?”

दोनों ने अचानक, न जाने कहाँ से गूँज उठे, 'जय श्री राम' के नारे के ऊपर, अपनी आवाज़ के तर्क को बुलंद किया और तबरेज़ पर पड़ती लाठियों और लातों की बौछार को हाथ और लात से रोकते, तबरेज़ पर गिर पड़े।

इस बीच, मास्टर ने बिफिया के भाई को दो तमाचे रसीद किये, "यह कहते कि जेल जाओगे सबसे पहले तुम। बहन के नाम पर इतना ही हुआ कि दूसरे की जान ले लो। कभी पेट भर खाना दिया उसे?"

रामटहल जी ने ठाकुर के पहलवान बेटे पर कसकर एक धौल जमाई।

लेकिन, हिंसा जब एक बार भड़कती है, उसे थमने में वक़्त लगता है। दो चार नहीं, कम से कम दस लाठियों के प्रहार मास्टर और राम टहल जी ने खाये। लेकिन, तबरेज़ के ऊपर डटे रहे।

अंततः, लातों के साथ साथ, लाठियों का प्रहार भी रुका।

पुलिस आयी, गिरफ्तारियां हुईं। अस्पताल की गाडी आई और लहूलुहान तबरेज़ के साथ साथ जख्मी मास्टर और राम टहल जी को अस्पपताल ले गयी।

उस रात, बिफिया के भाई समेत अनेकों घरों में चूल्हा न जला।

गाँव में पहली बार प्रेम हुआ था।


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