धूल भरे शहर में गुलज़ार साहब का आना ~ कंचन जायसवाल | Gulzar in Faizabad

बीते दिनों बाबा, गुलज़ार साहब हमारे शहर फ़ैज़ाबाद गए थे. बड़ा मन था वहाँ उस समय होने का, जा नहीं सका लेकिन, शहर की उभरती लेखिका कंचन जायसवाल ने अपने (प्रस्तुत) संस्मरण के ज़रिये कुछ-कुछ वहाँ पहुँचा दिया. आप भी हो आइये ...  सं० 



गुलज़ार फ़ैज़ाबाद 

कंचन  जायसवाल  

पेशे से अध्यापक. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका 1857 से 1947 तक विषय पर पी.एच.डी. स्त्रियां और सपने कविता संग्रह प्रकाशित. कथादेश,रेवान्त, आजकल पत्रिकाओं में कविता, कहानी प्रकाशित. मो. न. 7905309214 


रास्ते   कब  गर्द हो  जाते हैं   और  मंज़िल  सराब
हर मुसाफ़िर पर तिलिस्म-ए-रहगुज़र खुलता नहीं
~ सलीम कौसर


शहर फ़ैज़ाबाद में गुलज़ार जब एक रोज़ जब आते हैं तो धूल-मिट्टी, तोड़-फोड़ से गुज़र  रहे शहर को, एक पल के लिए ही सही, थोड़ा क़रार आ जाता है। गुलज़ार अज़ीम फनकार, शायर, उम्दा इंसान, दिलकश आवाज़ के मालिक। वे जब सफेद लिबास में, अपने पुर-ख़ुलूस अंदाज़ में महफिल में आते हैं तो इक बारीक-सी खुशी वहाँ मौजूद हर आम-ओ-खास में पसर जाती है। 

उनके इस्तिक़बाल में जो महफिल सजाई गयी है, उसमें वे ख़ुद के ख़ास होने को दरकिनार करते हैं और मिलने के ख्वाहिश मंद लोगों के बीच वो खुद आ बैठते हैं। ऐसे हैं गुलज़ार मानो खुशबू, मानो ख़्वाब अपने समय का बेजोड़ नगीना अपनी चमक को, अपने चाहने वालों के रौशन चेहरों में खोजता है और बेशुमार पाता भी है।

गुलज़ार कहते भी हैं तमाम पुरस्कारो, इनामों से मुझे वो खुशी नहीं मिलती जो मुझे अपने चाहने वालों के बीच आकर मिलती है। उनका बचपन उनकी रचनात्कता का एक ज़रूरी हिस्सा हैं। फिर जब नर्सरी में पढ़ने वाली बच्ची बोस्की का पंचतंत्र खरीदने के लिए मचल उठती है और पापा से उनका पर्स निकलवा कर किताब खरीदवाती है तो ऐसा लगता है मानो वह गुलज़ार के लिखे को पहले से जानती है और उस किताब में उसे अपने बचपन को कोई नायाब खजाना मिल गया हो। बच्चों के प्यारे गुलज़ार ऐसे ही हैं।


आज बच्चें अपने बीच गुलज़ार को पाकर अभिभूत हैं।

वो उनके लिखे गानों को अपनी आवाज दे रहे हैं – 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी हैरान हूँ मैं, हैरान हूँ / तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ, मैं परेशान हूँ...' बच्चे खुश हैं, यह यादगार पल है, अपने फेवरेट 'मोगली' वाले गुलज़ार को अपने बीच पाकर। गुलज़ार भी बाँहे फैलाकर उन्हें अपने पास समेट लेते हैं। ये पल शायद उनके लिए भी यादगार है। वो ढ़ेर सारा निश्छल प्यार, छलछलाती खुशी अपनी बांहो में समेट लेना चाहते हैं।

मोहित कटारिया से अपनी बातचीत में गुलज़ार बताते चलते हैं कि ‘जंगल-जंगल बात चली है पता चला है’ गाने में चड्डी शब्द कितना मौजूं है क्योंकि जंगल में रह रहे उस बच्चे की देह पर केवल चड़ढी है और यह शब्द उस माहौल के औचित्य को निखारता है। 
इसी प्रकार ‘लकड़ी की काठी / काठी का घोड़ा’ गाने में घोड़े की जो पदचाप है टक बक-टक बक वह बंगाली रचना आबोल-ताबोल से प्रेरित है मगर गुलज़ार इस शब्द को रिक्रिएट करते हैं। घोड़े की पदचाप आते हुए टक बक-टक बक से जाते हुए बक टक, बक-टक में पुनरचित कर देते हैं। अनोखापन, भाषा का टटकापन गुलज़ार के रचना संसार की खासियत है। गुलज़ार बताते हैं कि भावों और भाषा की यह विविधता उनके सघन पढ़त का नतीजा है। अनुभवों की विशालता उनके भाव-संप्रेषण को मुखर और विविधवर्णी बनाती है।

मैं जब यशवंत व्यास से मुखातिब हो कहती हूँ बहुत दिलचस्प रही आपकी और गुलज़ार साहब की बातचीत। वो झट से कहते हैं - वो शायर ही ऐसा है। अगर मैं सिर्फ पत्ता कहूँ तो वे पूरे पेड़ की रचना कर देंगे। व्यास जी बार-बार गुलज़ार से इसरार कहते हैं कि कैसे आपके भावों में इतने मौजूं किस्म के शब्द चले आते हैं गुलज़ार बताते हैं मान लो किसी बीच पर हजारों लोग डूबते हुए सूरज का नजारा कर रहे हों और फिर हजारों लोग इस नजारे को अपने-अपने तरीके से बयान करेंगे। 
कोई कहेगा कि 
डूबते हुए सूरज की लालिमा लाल चुनरी सी फैली हुई है, 
कोई इसे गुलाल कहकर अपनी हथेलिये में ले अपनी माशूका के गाल लाल कर देगा और कोई कहेगा कि 
कैसे पानी में लाल गोला डूब गया और लाल आग का सागर पल भर को बन गया। 
सब के अपने-अपने तजुर्बे हैं और इन तजूर्बो को वजन - जीवन के तमाम पड़ावों से.


गुज़र कर ही मिलता है

जीवन में अनुशासन और अपने काम से बेशुमार प्यार को गुलज़ार ज़रूरी मानते हैं। व्यास जी जब हंसते हुए पूछते हैं कि ‘बीड़ी जलइले जिगर से पिया’ जैसा गाना भी आपने लिखा। ये कैसे संभव हुआ। गुलज़ार बताते हैं कि गाने के बोल में बीड़ी की जगह सिगार जलइले या सिगेरेट जलइले कर देता तो यह बड़ा ही अटपटा लगता है। बीड़ी जलइले ही सटीक लगा इसलिए यह संभव हुआ।

गुलज़ार सचेत, रचनारत तमाम स्त्रियों को अपने शानदार अंदाज़ में कहते हैं कि ‘कितनी हांडियाँ डबल रही हैं, जरा देखो तो।‘ अपनी तमाम फिल्मों में गुलज़ार ने स्त्री संसार की जटिलता, उनके संघर्ष उनके सवालों और उनकी आजादी को विषय बनाया है। ‘लेकिन’, ‘मीरा’, ‘आंधी’, ‘ख़ामोशी’, ‘इजाज़त’, ‘रूदाली’ बहुत लंबी लिस्ट है, स्त्री जीवन को दर्शाती उनकी फिल्मों की।

गुलज़ार एक पूरा जीवन हैं, पूरा दर्शन है। गुलज़ार मानते हैं कि इंसान का अच्छा होना सबसे ज़रूरी है। ख़राब शायर हो तो चल जाएगा, मगर इंसान ख़राब नहीं होना चाहिए। अगर वो इंसान ख़राब होगा तो यकीनन शायर तो वो बहुत ख़राब होगा। यही सादगी गुलज़ार को गुलज़ार बनाती है।

दूर से सफेद एक छाया सी हिलती, उन्हें दूर से देखना मानों हवा में फैली खुशबू को छूना। सफेद कागज सी तिरती नाव का देर तक हिलना-डुलना बस .............।

‘हमने देखी है इन आँखों की महकती खूशबू’ इस खूबसूरत गाने की तरह ही गुलज़ार भी एक महक की तरह इसी आबोहवा में रह जाने वाले हैं। उनके लिखे को सुनकर, गुनगुनाकर इस पल को जिसमें गुलज़ार हैं, उनकी सादगी है उनके वजूद की लकीर है उसे जिए जाना है बस। और जीवन है भी क्या, गुलज़ार के ही शब्दों में, ‘नाम गुम जाएगा, चेहरा ये बदल जाएगा, मेरी आवाज ही पहचान है, गर याद रहे...’

आपके बाद हर घड़ी हमने
आप के साथ ही गुज़ारी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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