सौरभ राय एक अथक सामाजिक कार्यकर्ता हैं। राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी उनका दिल सही जगह पर है—और उसी दिल ने उनकी कलम चलवाकर यह सच्चाई हमारे सामने रखी है। अब आप बताइए, आपका दिल कहाँ है? ~ संपादक
संसद भवन से महज़ 250 मीटर दूर...
कल शाम नई दिल्ली स्थित भारत के राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री आवास और संसद भवन से महज़ कुछ सौ मीटर दूर टहल रहा था। साथ में एक बड़े भाई भी थे।
थोड़ा आगे बढ़े तो एक महिला दिखाई दीं। उम्र करीब 45–50 वर्ष रही होगी।
आँखों में आँसू थे, लेकिन अभी गिरे नहीं थे। ऐसा लग रहा था मानो ये बूँदें भी किसी के आने का इंतज़ार कर रही हों।
वहाँ चारों तरफ़ कबाड़ बिखरा पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरी ज़िंदगी को एक झटके में उजाड़कर सड़क किनारे फेंक दिया हो।
साथ चल रहे भाई ने पूछा—
“क्या हुआ? कल तक तो यहाँ आपकी छोटी-सी टपरी हुआ करती थी?”
महिला बोल नहीं पा रही थीं। फिर भी हिम्मत जुटाकर फफकते हुए बोलीं कि वह 2005 से वहीं अपना गुज़ारा कर रही थीं। कोरोना महामारी की चपेट में रोज़गार पूरी तरह छिन गया। तब बड़ी मुश्किल से उन्होंने छोटा-सा काम शुरू किया था—चाय-बिस्कुट बेचकर अपना गुज़ारा करने लगी थीं। आज वह भी उजाड़ दिया गया।
फिर उन्होंने एक ऐसी बात कही, जिसने हम दोनों को भीतर तक हिला दिया—
“इस नल में पानी आता है… सरकार इसमें ज़हर घोलकर हमें पिला क्यों नहीं देती? हम ही ख़त्म हो जाते। वैसे भी न मेरे पति हैं, न अब जीने का कोई सहारा…”
इतना कहते-कहते उनकी आँखों से बेकाबू आँसू बाहर निकल आए।
और यह सुनते ही हमारा कलेजा मानो मुँह को आ गया।
उस महिला के आसपास न कोई पुरुष खड़ा था, न कोई बच्चा। बस कुछ साफ़-सफ़ाई करने वाले मजदूर दिखाई पड़ रहे थे, जो जाहिर है सरकारी कर्मचारी लग रहे थे, परिवार के लोग नहीं।
हम दोनों उनके सामने हाथ बाँधे लाचार खड़े थे। मदद करना चाहते थे, लेकिन बेबस थे। कुछ नहीं कर सकते थे। बस खुद को और सरकार को कोसते हुए उन खूबसूरत, यूरोपीय शैली की कोठियों की ओर बढ़ गए, जिन्हें यही मजदूर बनाते हैं और जिनमें इस देश की तक़दीर बदलने वाले नेता, मंत्री और अधिकारी आकर रहते हैं।
उस क्षेत्र के विधायक (मंत्री), मुख्यमंत्री, सांसद और प्रधानमंत्री—सब एक ही दल के हैं। और शायद अपने वोट से इन सबको उसी महिला ने भी बनाया होगा।
पर सनद रहे—इस लोकतंत्र में हर एक वोट का अपना महत्व है।
इमारतों में रह रहे लोगों को यह एक बहुत ही आम घटना महसूस हो सकती है। पर ऐसा नहीं है।
आपके घर में पंखे और एसी चल रहे हों, आप चैन से सो रहे हों, और आपके पड़ोस में ही ऐसे लोग भी रहते हों जिनके पास अपना सिर छुपाने की जगह नहीं है। और जब उन्हें वह भी नसीब नहीं होता, तो समाज में रोष पैदा होता है। और इसी रोष से कभी-कभी क्रांति जन्म लेती है।
जिसे देश का प्रबुद्ध जन, पार्टी पॉलिटिक्स में बँटा हुआ समाज और आज की मीडिया नक्सली, अर्बन नक्सल, आतंकी, बागी आदि-आदि शब्दों से नवाज़ती है।
विडंबना देखिए—जो देश बनाते हैं, वही अपने ही देश में उजाड़ दिए जाते हैं।
हम विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं और इसका गर्व भी करते हैं। लेकिन सवाल यह है—
क्या हमारे पास हर हाथ को सम्मानजनक रोज़गार और हर सिर को सुरक्षित छत देने की क़ुब्बत है?
क्या उस महिला का इस देश की तरक्की में कोई हाथ नहीं है?
क्या वह टैक्स नहीं देती? क्या उसे सरकारी व्यवस्थाओं का लाभ नहीं मिलना चाहिए?
क्या उसे इस देश में सिर उठाकर जीने का अधिकार नहीं है?
गरीबी हटाने का सपना तब अधूरा है, जब गरीब ही शहरों और सड़कों से हटा दिए जाएँ।
देश सिर्फ़ बड़ी इमारतों से नहीं बनता। देश उन लोगों से बनता है, जो उन इमारतों को अपने हाथों से खड़ा करते हैं।
सोचने की बात है कि लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन से मात्र ढाई सौ मीटर दूर अगर यह ज्यादती किसी के साथ हो सकती है, तो 250 या 2500 किलोमीटर दूर रहने वाले देशवासी की सुनवाई तो क्या ही होती होगी इस देश में!
सचमुच... अंदर तक हिल गया हूँ मैं।
शायद इसलिए किसी ने बहुत ख़ूब लिखा है—
“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ उजाड़ने में।”
अंत में एक बात तो रह ही गई—
भारत माता की जय। 🇮🇳
वंदे मातरम्। 🙏🏻
यह लेखक के अपने विचार और आपबीती है, जिसका वह चश्मदीद गवाह है।
लेखक एक राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हुए भी सबसे पहले इस विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का नागरिक है।
सादर,
सौरभ राय
सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता
+91-9958838655
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