निकलो अँधेरे कमरों से — पूछो !!! — शबनम हाश्मी | #JusticeLoya


प्रख्यात मानवाधिकार कार्यकर्ता शबनम हाशमी

ढूँढो अँधेरे कोनों से बाहर निकलो और आवाज़ बुलन्द करो — हमें यह मंज़ूर नहीं

— शबनम हाश्मी 


सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना 
ना होना तड़प का सब कुछ सहन कर जाना 
घर से निकलना काम पर और काम से लौट कर घर आना 
सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना
पाश 




ज़्यादातर मकड़ी के जाल में एक कीड़ा फंसता है और मकड़ी उसके चारों तरफ जाल बुनकर उसको इतना फंसा देती है के वह वहाँ से जिंदा बाहर ही न जा पाए। कीड़ा अपने पंख फड़फड़ाने की कोशिश करता है लेकिन उस जाल का चिपचिपापन उसके पंखों की क्षमता को ख़तम कर देता है और वह अपनी सांस उसी जाल में तोड़ देता है। अब हाल यह है के सैकड़ों मकड़ियाँ अपने कोनो खुद्रों से बाहर निकल आयी है, कुछ छोटी, कुछ दुबली, कुछ मोटी, कुछ बड़ी, कुछ भयानक, कुछ देखने में सुन्दर लेकिन उतनी ही शातिर और वह सब बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से जाल बुन रही हैं। सब शिकार ढूँढ-ढूँढ कर अपने अपने जालों के चिपचिपे और गलीज़ पदार्थों में उन्हें लपेटती जा रही हैं। एक भयानक दृश्य है चारों तरफ, अगला वार किस पर, अगला कौन शिकार, अगला कौन उस गलीज़ पदार्थ के लपेट में आने वाला है। जो बचे हैं वह डरे हैं, कहीं दुबक कर बैठे हैं, ज़रा सी आहट की तो कहीं मकड़ियों की नज़र उन पर न पड़ जाये। किवाड़ बंद हैं, रोशनियाँ गुल हैं, मोटे परदे पड़े हैं, बात सिर्फ फुसफुसा के करते हैं, कहीं सुनायी न दे जाये।

दुबक जाओगे, अंधेरा कर लोगे, बोलना बंद कर दोगे लेकिन दिल की धडकनों का क्या करोगे? क्या जानते नहीं मकड़ियाँ शिकार का पता लगाती हैं धडकनों से। वो जाल बुनती हैं और बहुत तेज़ी से अपने जाल के एक कोने से फुदक कर धडकनों के आहट को सुनते हुए शिकार तक पहुँच जाती है।

हाँ बहुत मकड़ियाँ हैं, हाँ बहुत जाल हैं, हाँ बहुत चिपचिपाहट है।

हाँ साथी जाल में फंसते रहेंगे, शिकार होते रहेंगे लेकिन जब तक जिंदा हो दिल को धडकने तो दो। दुबकने से कुछ नहीं होगा। उनसे निबटने का तरीक़ा ढूँढना ही होगा। जाल काटने की कोशिश तो करो, चिपचिपे पदार्थ को अपने बदन और अपने दिमाग पर लिपटने से रोकने की दवा तो ढूँढो अँधेरे कोनों से बाहर निकलो और आवाज़ बुलन्द करो — हमें यह मंज़ूर नहीं

पूछो 30 नवम्बर 2014 की रात नागपुर में क्या हुआ था?

पूछो वह कौन जज थे जो जस्टिस लोया के बावजूद मना करने के बावजूद दबाव डाल के नागपुर ले गए?
पूछो क्यों जस्टिस लोया की सिक्यूरिटी VIP गेस्ट हाउस में नहीं थी?
पूछो रात के 12 बजे नागपुर शहर में कौन और कहाँ से ऑटो ढूँढ कर लाया ?
पूछो जस्टिस लोया को क्यों एक छोटे से निजी हस्पताल में ले जाया गया ?
पूछो कौन उनके साथ था जो उन्हें वहाँ ले गया?
पूछो जब दिल का दर्द हुआ तो परिवार को फ़ोन क्यों नहीं किया?
पूछो जब मृत्यु हुयी तब परिवार को फ़ोन क्यों नहीं किया ?
पूछो अगर मृत्यु दिल के दौरे से हुयी तो पोस्ट मार्टम क्यों किया ?
पूछो अगर पोस्ट मार्टम करना था तो परिवार से क्यों नहीं पूछा ?
पूछो पंचनामा क्यों नहीं बना ?

   पूछो पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के हर पन्ने पर किसके दस्तखत हैं?
   पूछो दस्खत करने वाले का नाम, बाप का नाम, घर का पता?
   पूछो जस्टिस लोया का मोबाइल फोन आर आर एस के कार्यकर्ता को किसने दिया ?
   पूछो मोबाइल फोन से सारा डाटा ख़तम किसने किया ?
   पूछो दिल का दौरा था तो कमीज़ पर खून के धब्बे कहाँ से आये ?
   पूछो जस्टिस लोया के मृत शरीर को सिर्फ एम्बुलेंस के ड्राईवर के साथ भेजने का फ़ैसला किसने लिया?
   पूछो उसका नाम, उसके बाप का नाम और घर का पता।
   पूछो जस्टिस लोया के शरीर को पैतृक गाँव गेटगाँव भेजने का फ़ैसला किसने किया ?
   पूछो आरएसएस कार्यकर्ता ईश्वर बहेती को कैसे पता चला की जस्टिस लोया की बहन सरिता मंदधाने उस समय, लातूर में किस हस्पताल में थीं।
   पूछो ईश्वर बहेती का पता उसके बाप का नाम उसकी शाखा के संघ संचालक का नाम।
   पूछो जस्टिस लोया की बहन अनुराधा बियानी का बयान, कि बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह ने अमित शाह के हक़ में फ़ैसला सुनने के लिए 100 करोड़ की पेशकश की, से जस्टिस लोया की मौत का क्या रिश्ता है?




हाँ बहुत मकड़ियाँ, बहुत जाल, बहुत चिपचिपाहट है। हाँ बहुत मायूसी, बहुत डर, बहुत उदासी है

सवाल यह है के क्या डर और अँधेरे में दुबक के ही मर जाना है या मैदान में सामना करके जीना है। क्या अपने दिल ओ दिमाग को गिरवी रख के जीते जीते ही भूतकाल हो जाना है या सोच को जिंदा रखना है?

डरते वह भी हैं।
वह सोच से डरते हैं, वह बुलन्द आवाजों से डरते हैं, वह निहत्थे लोगों से डरते है, वह अहिंसा से डरते हैं, वह संविधान से डरते हैं, वह एकजुटता से डरते हैं, वह अलग अलग विचारों से, अलग अलग बोलियों से, अलग अलग सवालों से डरते है।

निकलो अँधेरे कमरों से, परदे खोलो धुप आने दो, फुसफुसाना बंद करो और अपनी आवाज़ बुलन्द करो।

कहो कि अब कोई कातिल अगर इधर आया, 
तो हर कदम पे ज़मीं तंग होती जायेगी। 
हर एक मौजे हवा रुख बदल के झपटेगी, 
हर एक शाख रगे-संग होती जायेगी॥
साहिर


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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