चौराहे का पेट्रोल पंप : रीता दास राम की मार्मिक कहानी

चौराहे का पेट्रोल पंप: एक स्त्री के अनकहे फैसलों की कहानी

चौराहे का पेट्रोल पंप रीता दास राम हिंदी कहानी

एक स्त्री, कई रास्ते, और अनकहे फैसले...

लेखिका: रीता दास राम

(डॉ. रीता दास राम समकालीन हिंदी साहित्य की सक्रिय और संवेदनशील रचनाकार हैं, जिनकी रचनाएँ स्त्री जीवन और समाज की जटिल परतों को सहज भाषा में उकेरती हैं।)


Hindi Short Story: रीता राम दास की कहानियों में गहराई बढ़ रही है, लेकिन एक और अच्छी बात यह है कि कथा, पात्रों और संदेश की सरलता बनी हुई है। एक स्त्री कितनी दुराहों भरी, दुरूह ज़िंदगी से गुज़रती है... पढ़िए चौराहे का पेट्रोल पंप। - भरत तिवारी


रोशनी का घर चौराहे के पेट्रोल पंप के पास ही था। वो अक्सर आते-जाते गाड़ियों को देखा करती और उनकी आवाजें सुनती रहती। जैसे कोई निश्चित संगीत की धुन, कुछ समय के अंतराल में बजनी होती है और वह बजती रहती है, बजती ही चली जाती है, अपनी आदत बनाती हुई। खाना बनाते, कपड़े धोते, सब्जी काटते गाड़ियों के चलने, रुकने, ब्रेक मारने, हॉर्न बजाने और चालू होते ही स्पीड से निकल जाने की आवाजों का संगीत जैसे रोशनी के रोज का साथी बन गया था। आवाजें ना आएं तो जैसे उसका काम ढीला हो जाता, उसे आलस आने लगता, सुस्ती चढ़ जाती, यूँ कहिए कि वो मशीनी रूप से उन आवाजों से बँधी अपनी दिनचर्या यंत्रवत करती रहती। रोशनी की सुबह, दोपहर, शाम, रात आवाजों के तेज और कम होते शोर से जुड़े रहते। जिस दिन भी गाड़ियाँ कम आतीं, रोशनी बेचैन-सी बार-बार बाहर आकर रास्ते को निहार जाती जैसे कि किसी की बाट जोह रही हो।

रोशनी का पति विराज चौराहे के पेट्रोल पंप में ही काम करता था। दिन-रात वह वहीं रहता। बीच-बीच में घर भी आता, आराम करता, फिर चला जाता। पेट्रोल पंप का मालिक उस पर बहुत भरोसा करता, तो वह भी मालिक का भरोसा रखने में कोई कसर नहीं छोड़ता।

विराज के माता-पिता और छोटा भाई साथ रहा करते थे। घर में कमाने वाला विराज अकेला शख्स था। छोटे भाई को नौकरी लगी तो धीरे-धीरे मनमुटाव होने लगे। एक की कमाई में सभी निभाते रहे थे, लेकिन अब अपनी-अपनी सुविधा पर भी बात होने लगी। बात इतनी बढ़ी कि भाई ने अलग रहने की बात की और माता-पिता भी उसके साथ रहने चले गए।

घरेलू बातों में रोशनी के कुछ भी कहने पर ताना मारकर उसका मुँह बंद कर दिया जाता। उसका इतना ही कसूर था कि शादी को चार-पाँच साल हो गए, लेकिन उसके कोई बच्चा नहीं था। उसका घर-परिवार के बीच में बोलने का जैसे कोई हक ही नहीं बनता था। रोशनी कटी-कटी-सी रहती। विराज उससे कुछ नहीं कहता, लेकिन उसका दुख समझता था। रोशनी को बाँझ होने के ताने सहने पड़ते और विराज मुँह फेरकर सब टालता जाता। ऐसा नहीं था कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, पर वह निष्क्रिय बना रहता। जैसे कोई बात उसके भीतर ही भीतर चल रही हो और उस आँधी को वह बाहर आने नहीं देना चाहता।

कई बार रोशनी ने चाहा, दोनों जाकर डॉक्टर से मिलते हैं, पर हर बार वह अनमना-सा चुप रह जाता या बात पलट देता। रोशनी बिना कुछ कहे उसकी बात समझने लगी थी। उसने तय कर लिया था—यदि विराज इस बारे में कुछ कहना-सुनना पसंद नहीं करता, तो वह कुछ ना कहेगी। दिन भर विराज काम में व्यस्त रहता और रात में अपने घर आकर सो जाता। दूसरे दिन समय अनुसार फिर काम पर चला जाता। रोशनी घर में रहती, घर के काम और समय मिलता तो टीवी सीरियल में समय व्यतीत करती। दोनों के बीच ना तनाव था, ना कोई नाराजगी। हालात और समय अपनी कहते और वे अपनी।

रोशनी और विराज ने अपनी पसंद से शादी की है। हर सुख-दुख साथ मिलकर बाँटने और मिलकर रहने की सफल कोशिश भी करते हैं। रोशनी माता-पिता की अकेली संतान थी। माँ उसकी शादी के बाद ही गंभीर बीमारी का शिकार हुईं और चल बसीं। पिता ने ज्यादा इंतजार ना करते हुए तुरंत ही दूसरी शादी कर ली और दूसरे शहर में जाकर रहने लगे। कुछ दिन उनका आना-जाना लगा रहा, फिर धीरे-धीरे वह लगभग बंद हो गया। नई माँ को रोशनी में कोई रुचि नहीं थी और फिर कहते हैं ना—‘जब माँ दूसरी हो तो बाप तीसरा हो जाता है’, बस रोशनी के लिए सब रिश्ते धीरे-धीरे जैसे सो गए। रोशनी और विराज अपनी सूनी-सी दुनिया में उदास, संतुष्ट, मस्त रहने लगे। ‘सूनी’ इसलिए कि उन्हें अब तक कोई बच्चा नहीं, वरना तो सुखद साथ हमेशा अच्छा ही होता है।

रोशनी ने पेट्रोल पंप और आसपास दुकानों के साफ-सफाई का काम भी अपने हाथ में ले लिया। रोज सुबह तड़के वह साफ-सफाई करने चौराहे जाती, बाद में विराज अपने काम पर चला जाता। फिर वह घर पर दिन भर अपनी अकेली दुनिया का ताना-बाना बुनती रहती। सुबह खासकर लंबी दूरी की ट्रकें और अन्य गाड़ियाँ पेट्रोल पंप पर आतीं, पेट्रोल भरातीं और अपनी लंबी यात्रा पर निकल जातीं। कुछ ट्रक रोज उसी रास्ते से निकलते और वहीं अपनी टंकी में पेट्रोल डलवाते।

कई चेहरे जैसे पुराने पहचाने लगते, जो अमूमन वहाँ आया करते, पर रोशनी की गहरी खामोशी किसी से नहीं खुलती। वैसे भी वह अपने काम से मतलब रखती और काम खत्म कर सीधे घर आ जाती। कई बार उसने सोचा और विराज से भी बात की कि ‘एक चाय की दुकान खोल लेते हैं’, पर विराज ना माना। फिर उसने भी कोई जिद नहीं की। कभी-कभार विराज के दोस्तों के लिए वह चाय बना लाती, कभी नाश्ता तो कभी खाना। उसके हाथ का खाना सभी पसंद करते। उसकी तारीफ करते, खाते, हँसी-खुशी और चले जाते। विराज भी खुश होता, पर वह रोशनी पर काम का अतिरिक्त बोझ डालना नहीं चाहता था।

यहीं, यानी पेट्रोल पंप पर, रोशनी की पहचान जसविंदर से हुई। जसविंदर ट्रक ड्राइवर नहीं, बल्कि अपनी ट्रक चलाता है। अमूमन इसी पेट्रोल पंप में पेट्रोल डलवाने आता। रोज सुबह वह रोशनी को देखा करता। पहचाने चेहरे तो रोज ही रोशनी देखा करती। जसविंदर ने धीरे-धीरे छोटी-मोटी बातों से बात बढ़ाई और दोनों के बीच दोस्ती हो गई। यह मित्रता रहते-रहते घनिष्ठ होती गई। रोशनी और जसविंदर सुबह जब भी मिलते, घर-परिवार की सुख-दुख की बातें किया करते।

जसविंदर शादीशुदा है। बातचीत से ही रोशनी को पता चला। जसविंदर की साल-दो साल की शादी में ही पत्नी को कैंसर हुआ। डॉक्टर के कहने पर इलाज किया गया। पत्नी अब ठीक है, पर उदासी उसकी नहीं छूटती। जसविंदर बच्चे के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। वह सतनाम से बहुत प्यार करता है, पर सतनाम गुमसुम-सी बनी रहती। कहने के लिए हँसती-बोलती, पर दोनों के बीच वह खुशी नहीं जो जोड़े में हुआ करती है। जसविंदर पत्नी को हर संभव खुश रखने की कोशिश करता और खुद को हारता महसूस करता। वह पत्नी से दूरी बर्दाश्त ही नहीं कर पाता। कभी पत्नी दुखी भी हो जाए तो तड़प जाता है। पति-पत्नी के आपसी रिश्ते देख घर वाले भी कुछ नहीं कहते, बल्कि उसे पत्नी को खुश रखने की सलाह ही देते रहते हैं।

रोशनी की दोस्ती ने जसविंदर को इस दुख से जैसे कुछ-कुछ ही सही, उबार दिया। दोनों के बीच दुख-दर्द की बातें साझा होतीं। लंबी बातचीत होती। दोनों एक-दूसरे को समझते, समझाते, राह निकालते। आपस में आँसू पोंछते। महीनों बीते। साल बीते। दोस्ती के साझा प्रयास ने रिश्ते का रूप ले लिया। दुख साझा हुए। बातें साझा हुईं। अब खुशियों ने साझा होने की गुजारिश की। दोनों ने खुशियाँ बाँटना चाहा। दोनों मिले और मिलने लगे। रिश्ता परिपक्व होता चला गया।

रोशनी ने गर्भवती होना स्वीकारा, बावजूद इसके कि ये आने वाली औलाद रोशनी की ही रहेगी और रोशनी के घर ही पलेगी, बढ़ेगी, जसविंदर पिता होते हुए भी हक नहीं जता पाएगा। जसविंदर ने रोशनी से संबंध स्थापित किए। इस तरह संबंध का परिणाम था कि दो बच्चे हुए—दोनों ही बेटे। जसविंदर बिटिया का इंतजार कर रहे थे, लेकिन वाहे गुरु ने रोशनी को दो फूल-से बेटे दिए। रोशनी ने तीसरे की आशा नहीं की। बच्चे बड़े होने लगे। जसविंदर का दिल अपने बच्चों के लिए तड़पता। बच्चे उससे दूर नहीं थे। वह बच्चों के पास आता, मिलता, पर तड़प बनी रहती। वह जानता था, वह अपने बच्चों को अपना नाम नहीं दे पाएगा। ये बिना किसी शर्त के रिश्ते थे।

समय बीतने लगा। जसविंदर की पत्नी अधिक बीमार रहने लगी। उसका कैंसर अब शरीर के दूसरे हिस्सों में भी फैलने लगा। जसविंदर ने पत्नी का साथ नहीं छोड़ा। उसकी जी-जान लगाकर देखभाल की। पैसा पानी की तरह बहाया, पर वो नहीं बची—चल बसी। जसविंदर जीवन में जैसे अकेला पड़ गया। उसने ट्रक के अपने धंधे को और बढ़ा लिया। जहाँ वह कभी-कभार शहर के बाहर जाता था, वहाँ अब अक्सर जाने लगा। वह हफ्ते में एक बार आता और फिर हफ्ते भर गायब रहता। रोशनी के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में वह पैसों की मदद किया करता। वह अक्सर बच्चों से मिलने के लिए ही लौट आता और फिर चला जाता।

बच्चे जसविंदर के थे और विराज के घर पल रहे थे। कहने के लिए विराज उनका पिता था और वह बच्चों को भरपूर प्यार भी करता। बच्चे जसविंदर को अंकल कहते। बढ़ते बच्चों के रंग-रूप ने जसविंदर के व्यक्तित्व को जैसे कॉपी करना शुरू किया। विराज का दबा रंग और दबे नाक-नक्शे बच्चों का पिता होने पर प्रश्न उठाते-से नजर आते। आस-पड़ोस में खुसफुस होती, फिर भी सर नहीं उठा पाती। रोशनी तटस्थ अपने रिश्ते को संभालते, बिना किसी से कुछ कहे, अडिग रहती। दिन बीते। बच्चे स्कूल से कॉलेज चले गए। जसविंदर करीब दो सालों से नहीं आया। विराज अब भी बच्चों और रोशनी के साथ अपने पति और पिता होने का धर्म निभा रहा है। उसने कभी रोशनी को सवालों के कठघरे में खड़ा नहीं किया। विराज का यह खामोश आश्वासन रोशनी और विराज के रिश्ते की संजीवनी था और घर में जसविंदर की खामोश जगह बनाए हुए था।

विराज सब जानते हुए भी रोशनी की खुशी की खातिर चुप रहते। खुद के अक्षम होने ने उन्हें जिंदगी के इस मार्ग पर चलने के लिए हिम्मत और धीरज बख्शी। यह ऐसा रिश्ता था जिसका कोई नाम नहीं था। सहूलियतें अपनी सांसें ले रही थीं। किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी। जसविंदर बच्चों के लिए निश्चिंत था। बच्चे विराज और रोशनी के साथ खुश थे। रोशनी को अब कोई बाँझ होने का ताना नहीं सहन करना पड़ता, ना ही अब विराज की अक्षमता का प्रश्न ही रह गया था। जसविंदर के अब नहीं आने पर आस-पड़ोस के लोग भी उसे भूल गए।

ये स्त्री-पुरुष के संबंध स्त्री-पुरुष ही समझ सकते थे, जिन्होंने समाज की पेचीदगियों से खुद को अलग कर अपने लिए बेहतरीन रास्ते बुने थे। खुशियों के पल आपस में सहारा देते, जीवन में तरंग बोते रहे। इंसानों ने इंसानों को समझा और एक-दूसरे के सपनों में इच्छानुसार रंग भरने का काम किया। कभी-कभी जीवन भी ख्वाबों के रास्ते से गुजरता है। ख्वाबों को धुएँ में बदलते देखना या हकीकत का जामा पहनाना इंसानों का अपना चुनाव ही होता है, जिसमें सफलता और असफलताएँ अपना स्थान रखती हैं। कई बार रीति-रिवाजों की गर्द इंसानों के जीवन और रहन-सहन से टकराती है। समय बदलाव को अंकित कर अपनी शक्ति का परिचय देता है।

रोशनी ने जीवन के अद्भुत फैसले लिए और नवीनता का स्वागत किया। हालात ने उसे नई दिशा दिखाई। आज भी गाड़ियों की आवाजें सुनाई देती हैं। एक इंतजार अब भी उसके द्वारे खड़ा रास्ता तकता है। वह समझ नहीं पाती... जाने क्यों जसविंदर ने आना कम कर दिया। विराज अपने जवान होते बच्चों के साथ बूढ़ाने लगा है। रोशनी की आँखों में अब भी एक उदासी छिपी है, जो अब चश्मे के पीछे छुप-सी गई है। जिसका रंग कत्थई हरा है, जो रोशनी को जीवन से जुड़ी सच्चाइयों का एहसास कराता है। रोशनी ने कई बार जसविंदर के लिए एक अतिरिक्त कमरे का जुगाड़ करना चाहा। कमरा तो बन गया, पर उसकी रिक्तता कई प्रश्न उठाती, खामोश उसे ताकती खड़ी रहती है, जिसका रोशनी के पास कोई जवाब नहीं।

अब भी पेट्रोल पंप से आती पेट्रोल की गंध रोशनी से जसविंदर का पता पूछती है। रोशनी अनमनी-सी सोचती रह जाती है—उसने एक पुरुष से अपने जीवन के लिए खुशियाँ लीं, बिना किसी मोलभाव के।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

लेखिका परिचय

डॉ. रीता दास राम | कवयित्री एवं लेखिका
जन्म: 1968, नागपुर | निवास: मुंबई, महाराष्ट्र
शिक्षा: एम.ए., एम.फिल., पीएच.डी. (हिंदी), मुंबई विश्वविद्यालय
ईमेल: reeta.r.ram@gmail.com | मो.: 9619209272

प्रमुख कृतियाँ:
कविता संग्रह: अर्थबोध के सान्निध्य में (2026), गीली मिट्टी के रूपाकार (2016), तृष्णा (2012)
उपन्यास: पच्चीकारियों के दरकते अक्स (2023)
कहानी संग्रह: चेक एंड मेट (2025), समय जो रुकता नहीं (2021)
आलोचना: आलोचना और वैचारिक दृष्टि (2024), हिंदी उपन्यासों में मुंबई (2023)

लेखन व प्रकाशन:
कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, लेख आदि में सक्रिय लेखन। हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, पाखी, नवनीत सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन।

सम्मान:
शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान (2013), अभिव्यक्ति गौरव सम्मान (2016), हेमंत स्मृति सम्मान (2017), आचार्य लक्ष्मीकांत मिश्र राष्ट्रीय सम्मान (2019), हिंदी अकादमी मुंबई के विभिन्न सम्मान (2021–2025), कादंबरी सम्मान (2024) सहित अनेक पुरस्कार।

और पढ़ें:
एक स्त्री हलफनामा | उर्मिला शिरीष | हिन्दी कहानी
टूटे हुए मन की सिसकी - गीताश्री

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