ईसुरी की फाग और बुंदेलखंड की लोकसंस्कृति : सर्जक से आगे सृजन

ईसुरी और बुंदेलखंड की लोक परंपरा
बुंदेलखंड की लोक परंपरा में ईसुरी की फागों का विशेष स्थान है।

सर्जक से आगे सृजन

लेखक : रवीन्द्र त्रिपाठी


कहते हैं कल्पना कभी-कभी सच्चाई से भी आगे निकल जाती है। यानी वह सच्चाई को बदल सकती है, उसकी गति को परिवर्तित कर सकती है और कभी-कभी तो सच्चाई बनकर कल्पना को विस्थापित कर देती है। ऐसे में कल्पना और सच्चाई का फर्क मिट जाता है। कृष्ण काव्य के आरंभिक चरण में राधा का अस्तित्व नहीं था। दसवीं सदी के ई. निर्मित कृष्ण के साथ राधा जोड़ी गई। आगे चलकर कृष्ण के साथ ऐसी एकाकार हो गई कि कृष्ण उसके बिना अधूरे समझे जाने लगे। शेक्सपीयर का नाटक जूलियस सीज़र एक कल्पना है, लेकिन जूलियस सीज़र का नाम लेते ही इतिहास का यह नायक याद नहीं आता, शेक्सपीयर का चरित्र याद आता है। कभी-कभी काल्पनिक चरित्र इतने जीवंत हो जाते हैं कि ऐतिहासिक चरित्र पृष्ठभूमि में चले जाते हैं।

बुंदेलखंड में ईसुरी की फागें वहां की संस्कृति के नियामक तत्व हैं, खासकर लोक संस्कृति के। ईसुरी की फागों की बुंदेलखंड में क्या अहमियत है, इसका पता वहां प्रचलित इस लोकोक्ति से चलता है -‘रामायण तुलसी कही, सूरसार ज्यों राग, ऐसे ही कलिकाल में कही ईसुरी फाग।’ वैसे प्रसंगवश यहां यह कह देना उचित होगा कि तुलसीदास जन्मतः बुंदेली थे। बाद में उनका जन्म हुआ जो बुंदेलखंड के भूगोल और संस्कृति का अनिवार्य अंग है। लेकिन न तो बुंदेली कवि ने, न बुंदेलखंड के सांस्कृतिक पुरोधा। उस पद पर आसीन कवि का नाम है - ईसुरी। वे बुंदेलखंड की हवा में हैं। यदि आप झांसी स्टेशन पर उतरकर खुली जीप में खजुराहो जाएं, तो सफर के दौरान हवा आपको गुनगुनाती हुई ईसुरी की फागें सुनाएगी। इन्हीं फागों के बीच आपको रज्जु शब्द भी सुनने को मिल सकता है। रज्जु ईसुरी की फागों की संवेदिता है।

उनकी सभी फागें रज्जु नाम की स्त्री को संबोधित हैं:

रज्जु हंसती नजर पड़े से
नेह बिना करूँ में
हम तो मन खों मारे बैठे, बरके
रात अरसे
सांसज जिन्दा जिद आज है, चलो
एक धरे में
‘ईसुरी’ मिलौ प्रान मिल जांहें, के बिन
आंख भर के

(रज्जु नजर मिलते ही हंसती है। भले ही हमसे प्रेम न करती हो। हम तो अब तक मन मारे बैठे हैं, पर जिस दिन जिद आ जाएगी तो वह कैसे बचेगी? वह मिले तो प्राण मिल जाएं, या सजीव मरकर ही बात बनेगी।)

गौरतलब यह है कि रज्जु संवेदिता होते हुए भी अस्तित्वहीन है, यानी काल्पनिक है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि रज्जु नाम की किसी स्त्री का ईसुरी के जीवन में कोई अस्तित्व था। लेकिन अस्तित्वहीन होते हुए भी ईसुरी की फागों के साथ वह अनिवार्य रूप से जुड़ी है। मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘ईसुरी फाग’ इसी काल्पनिक रज्जु और वास्तविक ईसुरी के प्रेम का आख्यान है।

लेकिन रज्जु का प्रेम सिर्फ इतना ही नहीं है कि वह प्रेम-दिवानी होती है, बल्कि उसके व्यक्तित्व का संवर्द्धन होता है। लेखिका का मकसद यही है कि प्रेम किस तरह व्यक्ति को बदलता है, उसे सक्रिय बनाता है, साथ ही ईसुरी की तरह रचता भी है।

लेकिन कहीं ईसुरी फाग सिर्फ इतना ही नहीं है। इसमें स्त्री-सर्वस्व गाथा भी है। उपन्यास में कई प्रेम-स्त्री चरित्र हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में संघर्ष करते हैं। वे स्त्रियां या तो समाज या परिवार की सताई हैं, या प्रेम की मारी हैं। ऐसे चरित्रों में प्रमुख तो ईसुरी-रज्जु की कथा ढूंढने वाली मन्ना है, जो बुंदेलखंड में घूम-घूमकर ईसुरी और रज्जु की कहानी की फाग सुनती है।

रज्जु माधव नाम के एक युवक से प्रेम करती है, जो ईसुरी-रज्जु की कहानियों में उसके साथ है, लेकिन बाद में पारिवारिक दबावों की वजह से उसे छोड़कर चला जाता है। अगली स्त्री-चरित्र सरस्वती देवी है, जो बुंदेलखंड में घूम-घूमकर फाग मंडली बनाती हैं। सरस्वती देवी खुद अपने परिवार से यातनाएं झेलती हैं। मीरा सिंह है, जो पारिवारिक यातनाओं की वजह से मीरा बाई बन जाती है। इनके अलावा गंगिया बेड़नी और करिश्मा बेड़नी, व आबादी बेगम और अनवरी बेगम हैं।

लेखिका का कौशल इस बात में है कि ये सभी स्त्री-चरित्र रज्जु की कहानी से जुड़े हैं। गंगिया बेड़नी ईसुरी-रज्जु की समकालीन है और वह उसे देशपात दीवान से मिलती है। आबादी बेगम वह चरित्र है, जिसका संबंध ईसुरी के आदिवासी समाज से है। अनवरी बेगम और हकीमा बेगम सहेरे मृत, ईसुरी और रज्जु की कहानी ढूंढती हैं। लेखिका ने रचना का ताना-बाना ऐसा बुना है कि पाठक बुंदेलखंड के कई गांवों और कस्बों-जैसे जहां मृत का गांव, खजारी (जहां का मृत रज्जु के बारे में बताती है), मदनपुरा, पठरिया गांव, औरैया, छतरपुर--से वास्ता होता जाता है।

इस तरह यह उपन्यास बुंदेलखंड की लोक-संस्कृति के साथ लोक-स्मृतियों को सुरक्षित रखने वाले स्थलों की सैर भी कराता है। लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। लेखिका यह बताना चाहती है, और यह सच भी है, कि ईसुरी और रज्जु सिर्फ किसी स्थान-विशेष के ही नहीं, किसी खास कालखंड के भी नहीं हैं। बुंदेलखंड की धरती के हर गांव, हर घाट और हर मिट्टी में उनकी कथा की सुगंध मिलेगी। और यह भी कि किसी एक जगह पर जाकर ईसुरी और रज्जु की कहानी का पूरा स्वाद नहीं पाया जा सकता। दोनों की कहानी हर जगह बिखरी-बिखरी है, लेकिन एक होती हुई भी अलग-अलग रूपों और भंगिमाओं में है।

किसी एक गांव में ईसुरी के फाग को सुनकर उससे आनंदित तो हो सकते हैं, लेकिन उसके संपूर्ण को नहीं पा सकते। और यह संपूर्ण भी कोई निश्चित इकाई नहीं है, बल्कि जितना ही आप इस कहानी के भीतर प्रवेश करेंगे, यह बढ़ता जाता है। उसकी परिधि विस्तृत होती जाती है। उसमें समता भी आती है और साथ-साथ फैलाव भी आता है। यह परस्पर-विरोधिता एक साथ घटित होती है।

बुंदेलखंड में लोकसंस्कृति जितनी समृद्ध है, उतना ही ताकतवर यहां का सामंतवाद है। बिहार, झारखंड, पूर्वी व पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना में बुंदेलखंड (जिसका आधा हिस्सा उत्तर प्रदेश में है और आधा मध्यप्रदेश में) का सामाजिक जीवन सामंतवाद की जकड़न में है। यह तब भी था, जब ईसुरी थे, और आज भी है। धीरे-धीरे सामंत मुसाहिब ईसुरी को अपने यहां बुलाता है एक कलाकार के रूप में, पर ईसुरी वहां जाकर एक तरह से बंध जीवन बिताते हैं।

मुसाहिब की बेटी रज्जु रज्जा उनकी फागें सुनकर मोहित होती है, तो इसकी सजा ईसुरी को मिलती है। ईसुरी और रज्जु राजा दोनों एक-दूसरे के शिकारी होते हैं। रज्जु राजा संदर्भात्मक परिस्थितियों में मर जाते हैं और ईसुरी को धैर्य छोड़कर भागना पड़ता है। आबादी बेगम के यहां ईसुरी को पनाह मिलती है, लेकिन तब तक ईसुरी के भीतर बहुत कुछ बदल चुका रहता है।

उपन्यास की खासियत यह है कि यह ईसुरी की कविता (जिन्हें फाग का नाम मिला) के मर्म को उद्घाटित करता है। ईसुरी उस काल के कवि हैं, जिसे हिंदी कविता में गीतिकाल कहा जाता है, लेकिन वे किसी राजदरबार से जुड़े कवि नहीं हैं। हिंदी की रीतिकालीन कविता की सूची में उनका नाम नहीं है। उन्हें लोककवि की मान्यता मिली है, कवि की नहीं। क्यों? ईसुरी की कविता को सिर्फ फाग कहा जाता है। इन कविताओं का कोई अध्ययन या संकलन नहीं है, क्योंकि इन्हें शामिल नहीं किया गया। ईसुरी आज तक साहित्यकारों की बिरादरी में नहीं हैं।

ईसुरी की कविताएं बांसुरी की तरह हैं, जिसे सुनकर गोपिकाएं अनायास ही सुध-बुध खो देती हैं और उसकी ओर खिंची चली आती हैं। ईसुरी की कविताओं में अपना मन नहीं होता। कौन है, जो नहीं चाहता कि ईसुरी की फागों की संवेदना बने। गांव की स्त्रियों का रज्जु से प्रेम इस बात का है कि सिर्फ वही क्यों ईसुरी की फागों की संवेदना बने। धीरे-धीरे रज्जु राजा भी ईसुरी की फागों को सुनकर सम्मोहित होते हैं और फाग उसी को कहे गए हैं।

मुसाहिब की नौकरी चापलूसी चाहती है, ईसुरी उसे लेकर फाग कहे। ईसुरी की कविताओं या फागों में श्रृंगार का उद्दाम वेग है, प्रेम का संदेश है। अकेले रज्जु नहीं हैं, जो ईसुरी की फागों को सुनकर लोकलाज त्याग देती हैं। गांव की बेड़िनी भी ईसुरी की फागों को सुनकर सब कुछ भूल जाती है।

ऐसे कितने कवि हुए, जिनकी कविता का ऐसा असर हुआ? कहा जा सकता है कि यह सब लेखिका की कल्पना है, सच्चाई नहीं है। लेकिन गंगिया का चरित्र भले काल्पनिक हो सकता है, लेकिन ईसुरी की फागों के असर का जो वृत्तांत इस उपन्यास में पेश किया गया है, वे काल्पनिक नहीं हैं। गंगिया, चंपाकली या रज्जा राजा प्रभाव के प्रतीक हैं, जो ईसुरी की फागों को सुनकर पड़ते हैं।

ईसुरी योद्धा का कवि है। ईसुरी और रज्जु युवा प्रेम के आदि बिंदु बन जाते हैं, कम से कम बुंदेलखंड में। लेखिका ने तुलसीराम और उनके ग्रंथ, सूरदास, माधव, गाइड सालिराम कटरे-साखी जैसे युगल चर्चाओं के माध्यम से यह दिखाया है कि ईसुरी-रज्जु की कहानी आज भी जीवित है। इस कहानी के कई रूप बदल गए हैं, चरित्र बदल गए हैं, समय और परिस्थितियां बदल गई हैं, पर उसका मूल रूप अभी भी मौजूद है।

हालांकि इस उपन्यास का केंद्र ईसुरी है, लेकिन उपन्यास खत्म होते-होते रज्जु इसकी केंद्रीय चरित्र बन जाती है। ईसुरी एक गुणगान है या प्रेमकथा है, जहां रज्जु का प्रेम उन्हें बदलता है। एक जगह वे कहते हैं--मैं भी कहां ऐसा था कि एक औरत के लिए सैकड़ों फाग करता जाता। रज्जु की प्रेमिका आंखों का करिश्मा था, उसका गीत गाने का ढंग था, हम दोनों का विद्रोह का प्यार था।

हम फाग रचते जाते और भूल जाते कि मैं मर्यादा से बंधा समाज के बीच हूं। सच, मैंने उसके सामने धर्म, मान और अहंकार के हथियार डाल दिए थे। जैसे ‘फाग’ की तरह मैं एक आजाद छंद हूं, जिसे शास्त्रीय नियम बांध नहीं पाते। ईसुरी आजाद होकर भी उतने आजाद नहीं हो पाते, जितनी रज्जु होती है।

प्रेमासक्त होकर आजाद हुए ईसुरी एक समय के बाद अपने में ही सिमटकर रह जाते हैं। सही मायने में आजाद होती है रज्जु, जो न सिर्फ घर की चौखट लांघकर निकल जाती है, बल्कि प्रेम से बड़े एक और उद्देश्य--देश की आजादी--से जुड़ जाती है। फाग के रचयिता रज्जु प्रेम के कुछ देर तक चलते हैं, फिर टूट जाते हैं और मुसाफिर हो जाते हैं। लेकिन रज्जु वह तो गायिका बनकर घर से निकलती है, लेकिन आखिर में एक जुझारू सिपाही बन जाती है। कवि की संवेदना अपने रचनाकार से भी आगे बढ़ जाती है?


संपर्क : ई-102, जनसत्ता अपार्टमेंट्स, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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2 टिप्पणियाँ

  1. आपने कल्पना और सच्चाई का जो मेल दिखाया, वह सच में सोच बदल देता है। मुझे ईसुरी और रज्जु वाला हिस्सा सबसे ज्यादा दिलचस्प लगा, क्योंकि आपने एक काल्पनिक चरित्र को इतना जीवंत बना दिया। आपने यह बात साफ कर दी कि कहानी सिर्फ प्रेम की नहीं, बल्कि बदलाव और संघर्ष की भी है।

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