एक पत्र मैत्रेयी पुष्पा के नाम - युवा कथाकार कविता | Kavita on Maitreyi Pushpa

पिछले दिनों मैत्रेयी जी ने अपने एक लेख में ( लिंक) समकालीन महिला कहानीकारो की खूब लानत मलामत की थी। उनकी उम्र और उनके लेखन को लेकर व्यक्तिगत टिपण्णी भी की थी। बैड टेस्ट में और बैड  इनटेंशन से लिखे गए उस लेख ने हमेशा के लिए नई पीढी की महिला रचानकारो और मैत्रेयी पुष्पा के बीच एक गहरी खाई खोद दी है। अब भी ये विवाद खत्म नहीं हुआ है।

       उनका लेख बहुत विवादस्पद है। जो बिना समकालीन पीढी को पढे हुए फतवा जारी करने जैसा है।

       अब तक कई महिला कहानीकारो ने इस पर आपत्ति जताई है। इस बार युवा कथाकार कविता का एक खुला पत्र मैत्रेयी जी के नाम...

कविता राकेश kavita rakesh lekhika writer लेखिका

एक पत्र मैत्रेयी पुष्पा के नाम

युवा कथाकार कविता 

आदरणीया मैत्रेयी जी!

मैं आपके इस लेख को पढ़कर सचमुच अचंभित हूँ, बहुत हद तक विस्मित भी। मुझे आश्चर्य है कि ये सारी बातें आप लिख रही हैं। आप, जो कि मंदा, सारंग और अल्मा जैसी चरित्रों की जन्मदात्री हैं।

 बिना  पढ़े  ही  `सब  धन  बाईस  पसेरी ' के हिसाब  से  पूरी  पीढ़ी  को  खारिज  कर  देने  के  फतवों  से  असहमत  होने  का  हमारा  लोकतान्त्रिक  हक  तो  है  ही  न ! 

       बहुत सारे लेखकों द्वारा रचित मेरे प्रिय पात्रों की तरह मंदा और सारंग मेरे व्यक्तित्व का एक हिस्सा रही हैं, उनके भीतर की वह आग भी, जिसे मैं बहुत हद तक आपके भीतर की आग से जोड़ कर देखती रही हूँ और यह मानती रही हूँ कि हम स्त्रियाँ अगनपाखी होती हैं।

       लेकिन आपके इस लिखे से हैरतज़दा मैं यह सोचने को विवश हूँ कि क्या उम्र और परिस्थितियाँ कई बार क्रांतिकारी व्यक्तित्वों को भी पुरातनपंथी और थोथे आदर्शवादी चरित्रों में ढाल देती हैं? कैसे भविष्य में हम उन्हीं बातों की वकालत करने लगते हैं जिसके हम कल तक विरोधी हुआ करते थे? यह एक भयानक स्थिति है कि हमे हमारे आगे या कि हमारे पीछे कुछ भी नहीं दिखे... आत्मश्लाघा की यह स्थिति बहुत हद तक हमारे आंतरिक भय का परिचायक होती है, हमारे असुरक्षाबोध का भी।

       एक तरफ से एक ही साथ एक पूरी पीढ़ी को खारिज कर देने और एक ही लाठी से सब को हांकने की घटनाएँ साहित्य समाज में गाहे बगाहे घटती रही हैं। कभी नाम लेने की जरूरत भी हुई तो हम उन्हीं लोगों का नाम लेते हैं जो हमारे आगे पीछे घूमे, जी हजूरी करे... व्यस्तता भरी दिनचर्या में पढ़ने की फुर्सत कितनों के पास होती है! वैसे भी जब मूल्यांकन का काम सिर्फ लेखकों की तस्वीर और बायोडाटा ही देखकर चल जाये तो फिर उसकी जरूरत भी कहाँ है! यदि ऐसा नहीं है तो इक्कीसवीं सदी का रचनात्मक इतिहास खंगालते हुये आपको इतनी निराशा नहीं होती। यदि कभी अवकाश मिले तो हम  तथाकथित युवा कथाकारों की कहानियों से गुजर के देखिएगा, मुझे पूरा विश्वास है कि आपको दुलारी (टेक बे त टेक न त गो), दीवानबाई (रंग महल में नाची राधा), मुन्नी सिंह (शहादत और अतिक्रमण), दामिनी (औरत जो नदी है), नदीन और शर्मिला (दिल, दो लड़कियां और इतना-सा नश्तर), तूलिका (बूढ़ा चांद), रुम्पा (सोन मछरी) अप्पू (उलटबांसी) और इन जैसी दर्जनों अन्य चरित्रों में आपको मित्रो (मित्रो मरजानी), महकबानो (दिलो-दानिश), रत्ती (सूरजमुखी अंधेरे के), शकुन (आपका बंटी), नमिता (आवां), रीता (कठगुलाब), मनु (चितकोबरा), मनीषा (उसके हिस्से की धूप), राधिका (रुकोगी नहीं राधिका), सारंग (चाक) आदि का युगीन विस्तार और विकास जरूर दिखाई पड़ेगा। अपनी अग्रज लेखिकाओं के स्वप्न और संकल्पों का यह विस्तार इक्कीसवीं सदी के रचनात्मक इतिहास का जरूरी हिस्सा है। और हां, मेरी नज़र में पीढ़ियां कभी बीतती नहीं। माफ कीजिएगा, ये शब्द आपके ही हैं और मुझे इन्हें दुहराते हुये भी तकलीफ हो रही है। हम तो इन्हें अपनी अग्रज पीढ़ी कहकर पुकारती हैं जिनकी रचनाओं ने हमारे मांस मज्जा मे मिलकर हमारा निर्माण किया है। हम अपनी इस कृतज्ञता के बदले आपसे किसी चरित्र प्रमाण-पत्र की अनुकंपा भी नहीं चाहतीं। आप किसे पढ़ें या किसे नहीं का चुनाव भी पूरी  तरह से आपकी अभिरुचि और अधिकार क्षेत्र का मामला है। पर बिना पढ़े ही `सब धन बाईस पसेरी' के हिसाब से पूरी पीढ़ी को खारिज कर देने के फतवों से असहमत होने का हमारा लोकतान्त्रिक हक तो है ही न!

       आपने अपने लेख में कुछ कुप्रवृत्तियों की तरफ भी इशारा किया है। सच कहूं तो हमें भी तकलीफ होती है जब हम छोटे-छोटे लाभों के लिए अपने ही बीच से कभी-कभार सांप-सीढ़ी के कुत्सित खेलों की अनुगूंजे सुनती हैं, लेकिन साहित्य की राजधानी और कुछ राजघरानों से दूर बैठ कर चुपचाप रचनारत हम अधिकांश लेखिकाओं का तो इससे दूर-दूर तक का कोई नाता भी नहीं होता है। मेरे भीतर वर्षों से पल रहा आपके लिए बहनापे का भाव अब भी मुझे विश्वास नहीं होने दे रहा कि यह सब आपने हम जैसी लेखिकाओं के लिए लिखा है। मैं ठीक कह रही हूँ न! यदि हाँ तो काश आप अपने लिखे में पूरी पीढ़ी के बजाय सिर्फ और सिर्फ वैसे ही अपवादों को संदर्भ सहित प्रश्नांकित करतीं! तब सारंग और मंदा जैसी नायिकाओं के अचानक हमसे इतनी दूर जा बैठने का एहसास तो हमें नहीं होता!

       यह सब लिखते हुये भीतर कहीं बहुत तकलीफ है। पर क्या करूँ जो इस पीढ़ी में मैं भी शामिल हूँ... चुप रही तो आपसे सहमत मान ली जाऊंगी, जो कि मैं बिलकुल भी नहीं। 

       यह असहमति सिर्फ मेरी या मेरे साथ की अन्य तथाकथित युवा लेखिकाओं की ही नहीं, उन पाठिकाओं की भी हैं, जो हमारी अग्रज लेखिकाओं के पात्रों-चरित्रों से बोल-बतिया कर अपने भविष्य का रोड मैप तैयार करती रही हैं। इस तरह ये सवाल मंदा, सारंग, अल्मा आदि चरित्रों के भी है, कारण कि आपने इस लेख में सिर्फ हमें ही नहीं, उन्हें भी खारिज कर दिया है।

       सादर आपकी

       कविता

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