स्त्री विमर्श और आत्मालोचन - मैत्रेयी पुष्पा

स्त्री विमर्श और आत्मालोचन

मैत्रेयी पुष्पा


स्त्री विमर्श और आत्मालोचन मैत्रेयी पुष्पा इस शब्दयुग्म से बहुत से लोगों का साहित्यिक जायका कड़ुवा हो जाता है। अगर ऐसा अनुभव है तो यह कोई विचित्र बात भी नहीं है। सबको अपनी तरह से सोचने का अधिकार है। बात यह भी है कि स्त्री विमर्श के चलते साहित्य में अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं, जैसे- यह विमर्श आखिर किसके हित में है? यह एक पुरुष-विरोधी अभियान है। तीसरी बात कि यह विचार विदेशों से आयातित है, जो भारतीय जीवन-मूल्यों को ध्वस्त कर रहा है।

       ऊपर की मान्यता प्राप्त बातों का उत्तर न सहज है, न आसान। नहीं बताया जा सकता कि स्त्री विमर्श स्त्री के हित में है और पुरुष वर्ग का अहित करने के लिए लागू हुआ है। मामला यहीं से उलझने लगता है, जब लिखित या व्यावहारिक तौर पर स्त्री पितृसत्ता के सौतेले और कठोर व्यवहारों पर सीधी नहीं, मरखनी गाय की तरह सींग हिलाने लगती है, यानी मुझे तुम्हारा निजाम मंजूर नहीं। हमारा पुरुष समाज देखता है, अरे यह क्या हुआ, त्यागमयी सहिष्णु नारी, सेवाभावी स्त्री, अपने स्वामी के इशारों पर उठने-बैठने और चलने-फिरने वाली औरत और अपनी दसों इंद्रियों को निग्रह के हवाले रखने वाली सती, आज कैसी उल्टी-सीधी बातें करने लगी है!

       मरखनी गाय को पीटने का विधान है, मुंहजोर और जिद्दी औरत की अक्ल ठिकाने लगाने वालों को भी दोषी नहीं माना जाता, क्योंकि औरत की जिद खुद एक अपराध है। जिद भी किन बातों की? उन बातों की, जिन पर पुरुष सत्ता का हुक्मनामा लागू रहा है। पिता, पति और पुत्र इन आज्ञा-पत्रों के मालिक माने गए हैं।
     
       मगर स्त्री विमर्श! यह पुरुष-विरोधी मुहिम नहीं, तो क्या है? वह अपने मनुष्यगत अधिकारों की मांग करती है- वह शिक्षा का अधिकार मांगती है, घर की चौखट लांघने का उच्छृंखल आचरण करती है। वह विवाह में अपना फैसला देना चाहती है, मतलब कि कन्यादान को चुनौती देती है। वह विवाह से भी पहले ‘करिअर’ बनाने की बात करती है, यानी परंपरा से चले आ रहे उम्र-विधान को टंगड़ी मारती है। वह वंश चलाने के लिए अपनी इच्छा की बात करती है। संतान कब और कितनी, यह सवाल उसका अपना है, क्योेंकि यह उसके तन-मन से जुड़ा मुद्दा है। वह कहां जाएगी, कहां नहीं, इसका फैसला भी खुद ही करेगी। किसी के साथ जाएगी या अकेली, वह खुद तय करेगी। क्या पहनेगी, यह भी उसी का अपना चुनाव होगा।

       यह औरत आजाद है या आवारा? यह भारतीय स्त्री कैसे हो सकती है? यह भारतीय औरत के रूप में विदेशिनी है। यह जो कुछ करना चाहती है, सब आयातित स्त्री विमर्श की देन है। इसे रोका जाना चाहिए। अगर ऐसा हमारे सामाजिक और साहित्यिक लोग मानते हैं तो हम उनको दोषी नहीं ठहरा सकते, क्योंकि व्यवस्था छिन्न भिन्न हो जाने का डर अपनी जगह मामूली नहीं होता। जमींदार की तरह रहे स्त्री के मालिक लोग उसको वे हक कैसे दे सकते हैं, जिन्हें बड़े कौशल से हथिया कर उन्होंने औरत को गुलाम बनाया है। धरती पर धन-दौलत, सोना-चांदी, महल-हवेली जैसी चीजें मिल जाती हैं। मगर गुलाम और दासी तो खुद ही पालने-पोसने पड़ते हैं, पालन भी ऐसा रहे कि वे भागने या छूटने के लिए खुद को अपाहिज समझें। ऐसा होता आया है।
     
       इस व्यवस्था का कमाल देखिए कि इसने कितना लंबा जीवन पाया है और आज जब व्यवस्थाओं के लिए खतरा खड़ा होता है कि उनके गुलाम विरोध ही नहीं, विद्रोह पर उतारू हैं, तो उन्होंने अपना निजाम और भी कठोर तथा क्रूर बना दिया है। विदेशों में शिक्षा पाने और कमाने वाले सपूतों के पिताओं का वश चले तो वे स्त्री को भारतीय नियमावली के बमों से उड़ा दें। ‘आदर्श बहू’ के खंजर तो औरत पर रोज ही चलते हैं। समाज में स्त्री के लिए दरिंदगी का जो सिलसिला चला है, वह इसी डर का परिणाम है कि औरत उनके हाथ से निकल रही है। यहां हम यह कह कर मर्दों को माफी नहीं दे सकते कि वे अनपढ़, अशिक्षित या बेहाल, कंगाल हैं जो औरत पर जुल्म करते हैं। नहीं, उनमें कोई भूखा-नंगा नहीं होता।
     
       तुम अपने हक मांगोगी, जिसमें तुम्हारी आजादी होगी कि तुम खुले आसमान के नीचे निकलोगी तो हम तुम्हें रोकेंगे नहीं, तुम्हारा शिकार करेंगे, अपनी ताकत दिखाएंगे। फिर भी अगर तुम हमें पराजित करने की ठानोगी तो हम झुंड बांध कर आएंगे और तुम्हें धराशायी कर देंगे। औरत मर्द के लिए दहशत का विषय बने? धिक्कार है ऐसी मर्दानगी पर!

       हमारे समाज का ऐसा चेहरा और स्त्रियों की जांबाज मुहिम!
     
       मुहिम में रणनीतियों का उपयोग न किया गया हो तो दरिंदगी भरे समाज से, सड़ी-गली परंपराओं की बजबजाती दल-दल से और आजकल शानदार चमकदार तस्वीर दिखाते बाजार से खतरों के उफान उमड़ते ही रहेंगे। क्या स्त्रियों, नवयुवतियों को अपने लिए ऐसे संकल्प नहीं लेने होंगे, जो उनकी मुहिम को मजबूत कर सकें? रूढ़ियों का सड़ांध भरा कीचड़ औरत का रास्ता रोक देता है, इसका उल्लेख हमें आज ही नहीं, पिछली शताब्दी के शुरुआती दौर से ही मिलने लगता है। बात बस गौर करने की है।
     
       साहित्य में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर उनके समय की लेखिकाओं ने अपनी गद्य रचनाओं में उसी आग के दर्शन कराए हैं, जिसे आज हम स्त्री विमर्श के नाम से जानते हैं। उनके भीतर वही विरोध-प्रतिरोध थे, मर्दानी व्यवस्था के प्रति जो आज हमारे हैं। हां, उनके प्रतिकार के ढंग थोड़े भिन्न थे। फिर भी स्त्री नाइंसाफियों के खिलाफ बोल रही थी और पुरुष परंपरा को बाकायदा चुनौती देती है, पुलिस से जूझती है, जेल जाती है, यानी घर की चौखट हर हालत में लांघती है।

       यही धारा तो बहती चली आई कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी से लेकर मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, गीतांजलीश्री, अनामिका से और आगे तक। स्त्री की वह छवि साहित्य में अपना होना दर्ज करती गई, जो अपने मनुष्यगत अधिकारों के लिए सजग है और उनको हासिल करने के लिए अग्रसर। स्त्री द्वारा लागू किए गए इस विधान को आप किसी नाम से पुकारिए, जब वरक खोलेंगे तो एक चेतना संपन्न लोकतांत्रिक स्त्री का दर्शन होगा।

       साहित्य के ऐसे सफे ही सामाजिक स्तर पर अपना असर छोड़ते हैं। पढ़ने वाले के अंतरमन में जीवित रहते हैं, क्योंकि इनका वास्ता पाठक से उसके एकांत में होता है। अगर आप गौर करें तो पाएंगे कि स्त्रियों का ऐसा लेखन, जिसमें वे अपनी नागरिकता का दावा करती हैं। किसी या किन्हीं पुरुषों के विरोध में नहीं है, बस ऐसा लगता है कि क्योंकि हक छीनने वालों से अधिकार वापस लेना उनसे दुश्मनी ठानने जैसा हो जाता है। सही मायने में तो बात यह है कि स्त्रियों को पुरुषों के रूप में शासक नहीं, सहयोगी और साथी चाहिए, यही स्त्री लेखन का मकसद है और होना भी चाहिए।
     
       अपने इस मकसद के लिए उन रचनाकारों को भी सचेत होना पड़ेगा, जिनको हम लेखिका कहते हैं। उनको भी आत्मालोचन की जरूरत है। जरूरत है कि जिस मुहिम को हमारी पूर्वज लेखिकाओं ने पूरे साहस के साथ छेड़ा, बिना समझौते और सौदेबाजी के निभाया, उसी मुहिम को हम यहां तक किस रूप में लाए हैं? क्या हमने उस बहादुर लेखन का फलक विस्तृत किया है या उतना ही रहने दिया? या नया भी कुछ जोड़ा है? समाज में स्त्री के लिए फैली हुई नियमों की कुरूपता, सजाओं की सजावट या सजावटों की वीभत्सता को खुली आंखों देखते हुए हमने क्या फैसले किए?

       इक्कीसवीं सदी में जबसे ‘युवा लेखन’ का फतवा चला है, लेखन की दुनिया में खासी तेजी आई है। लेखिकाओं की भरी-पूरी जमात हमें आश्वस्त करती है। किताबें और किताबें। लोकार्पण और लोकार्पण। इनाम, खिताब, पुरस्कार जैसा बहुत कुछ। प्रकाशक, संपादक भी अपने-अपने स्टाल लेकर हाजिर। अपने-अपने जलसों की आवृत्तियां। कैसा उत्सवमय समां है। कौन कहता है कि यह दरिंदगी और दहशत भरा समय और समाज है? साहित्य जगत तो यहां आनंदलोक के साथ है। नाच-गाने और डीजे। शानदार पार्टियां और आपसी रिश्तों के जश्न। ऐसा लगता है जैसे कितनी ही कालजयी रचनाएं आई हैं।
     
       मगर इस समय की कलमकार के अपने रूप क्या हैं? युवा के सिवा कुछ भी नहीं, यह युवा लेखिका का फतवा किस दोस्त या दुश्मन ने चलाया कि इस समय की रचनाकार अपनी उम्र का असली सन तक अपने बायोडाटा में दर्ज नहीं करतीं, क्योंकि उम्र जगजाहिर करना युवा लेखन के दायरे से खारिज होना है। वे लेखन के हल्केपन की परवाह नहीं करतीं, जवानी को संजोए रखने की चिंता में हैं। इसी तर्ज पर कि रचना में कमी-बेसी से डर नहीं लगता साब, वयस्क कहे जाने से डर लगता है। परवाह नहीं उम्र पैंतालीस से पचास पर पहुंच जाए, युवा कहलाने का अनिर्वचनीय सुख मिलता रहे।

       हम बड़े गौर से देखते हैं, कोई रचना मिले जो अपनी गंभीरता के साथ मेच्योर हो, जो देश के सामाजिक हालात से संबंधित राजनीतिक दायरों के अनुभवों पर आधारित हो, जो स्त्री का हस्तक्षेप पंचायतों से लेकर विधानसभा और संसद तक रेखांकित करे। जो धार्मिक और राजनीतिक गठजोड़ का परदाफाश करे। यानी जो ‘जिंदगीनामा’, ‘महाभोज’, ‘अनित्य’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘आंवा’ से आगे का आख्यान बने। नहीं तो इक्कीसवीं सदी का रचनात्मक इतिहास दर्ज कौन करेगा? क्या इसका जिम्मा भी युवा लेखिकाओं ने उन पर ही छोड़ा है, जिन्हें वे बीतती हुई पिछली पीढ़ी मानती हैं। संभव है यह, क्योंकि आज की रचनाओं में लिव इन रिलेशनशिप, अफेयर, मैरिज, डाइवोर्स और कितने-कितने लोगों से यौन सुख का रिफ्रेशमेंट यहां तक कि एग्जाम के लिए भी बायफ्रेंड से यौन सुख की खुराक... उफ यह स्त्री विमर्श! स्त्री का मनुष्य रूप केवल यही है? उसने अपने हक-हकूक केवल इसी स्थिति के लिए लेने चाहे थे?

       माना कि श्लील-अश्लील, मर्यादा, नैतिकता और चारित्रिक दृढ़ता के पैमाने औरत को लेकर बदलने की जरूरत थी और वे बदले भी हैं। यौन सुख को स्त्री के दमन का आधार बनाया जाता रहा है, इससे भी औरत ने इनकार किया है। उसके व्यक्तित्व के विकास के लिए जो बाड़ें, बंदिशें थीं, उनको तोड़ा है। नतीजे हमारे सामने हैं कि वह हर कहीं उन क्षेत्रों में है, जिनको अब तक पुरुषों के लिए आरक्षित माना जाता था। यह स्वागतयोग्य कदम है, यह स्त्री विमर्श का चमकदार इलाका है। इस इलाके पर रचनाएं आनी चाहिए।
     
       लेकिन सोचना यह भी पड़ता है कि इस उपलब्धियों के इलाके को धूमिल कौन कर रहा है? हमारी रचनाएं क्यों नहीं कहतीं कि दहेज का विरोध करने वाली दुल्हनों, यह भी कहो कि बाजार की गुलामी नहीं करोगी। शादी का पैकेज बेचते दुकानदार तुमको गुलामी के मंच पर ऐसे वीभत्स शृंगार में पेश कर देते हैं, जहां तुम्हारा वजूद बचता ही नहीं। बचती है एक चमकीले सुनहरे जेवरों में मढ़ी और रेशमी कपड़ों के गोटे-पट्टे, सलमा-सितारे जैसे चमकते पत्थरों से जड़े लहंगे ओढ़नी के तंबू में ढंकी युवती, जिसके वास्तविक चेहरे को पहचानना मुश्किल होता है। कमाल है कि साहित्य और समाज में आप अपनी पहचान की बात करती हैं। देखती नहीं, हर चौराहे पर होर्डिंग में स्त्री का अधनंगा और लगभग नंगा शरीर लटका रहता है? कभी इसके खिलाफ भी लेखकीय मुहिम छेड़ो और इसे बाजार की नीतियों से लेकर सरकार के नियमों से जोड़ो। जोड़ो कि आखिर औरत किस कानून के तहत विज्ञापनों में अपनी देह के साथ बिक्री पर चढ़ी हुई है? इन बिकने वाली युवतियों में इनकार का साहस भरो। मत भूलो कि साहित्य में भी तुम्हारे सामने पुरुष वर्ग का वह बड़ा हिस्सा होगा, जो तुम्हारा ध्यान कलम से हटा कर वहीं ले जाएगा, जहां उसकी मस्ती का इलाका है। वह तुम्हें तारीफों का नशा पिलाएगा और मदहोश कर देगा। स्त्री विमर्श जब न तब ऐसे ही तो ढेर होता रहा है। इक्कीसवीं सदी में हिंदी साहित्य के स्त्री लेखन की पस्तमिजाजी का यही कारण तो नहीं कि औसत रचनाओं का धूम धड़ाका!

       कितना चंचल वक्त है, ऊपर से आपकी उम्र भी युवा युवा! हाथ में कलम है और माहौल जवां जवां! फिर क्या-क्या न लिख दे कोई? बस स्त्री अगर अपनी प्रखरता में शोषितों, वंचितों और छद्म के शिकारों की कथाएं लिखने में लिहाज करती रही तो उन आशिकों और साहित्य के मालिकों की मेहरबानी कि उसकी कलम ने वे तेवर नहीं पकड़े जो ‘दिलोदानिश’ लिखते। क्या जो लेखिकाएं अपने आप को मुक्ति की मशाल लिए हुए दिखा रही हैं, उस मशाल की लौ धुंआ-धुंआ नहीं है? मशाल तो उनकी ही लौ दे रही है, जिनको आज पिछली पीढ़ी माना जा रहा है, क्योंकि रचनाओं को उम्र की दरकार नहीं होती। भले आप सोलह साल की बनी रहें, रचना तो अपने परिपक्व रूप को ही धारण करने का आग्रह रखती है और उसका नाम भी तभी साहित्य में मुकम्मल रूप से दर्ज होता है। नहीं तो, यों तो फिल्में भी सिनेमाघरों में हर हफ्ते लगती हैं और उतर जाती हैं।
जनसत्ता से साभार
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