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तीन फिल्मों की समीक्षायें: फैंटम / बांके की क्रेजी बारात / कौन कितने पानी में | Movie Review: Phantom / Baankey Ki Crazy Baraat / Kaun Kitne Paani Mein दिव्यचक्षु

9/03/2015 10:09:00 pm टिप्पणी करें

तीन फिल्मों की समीक्षायें: फैंटम / बांके की क्रेजी बारात / कौन कितने पानी में  | Movie Review: Phantom / Baankey Ki Crazy Baraat / Kaun Kitne Paani Mein दिव्यचक्षु


तीन फिल्मों की समीक्षायें: 

फैंटम / बांके की क्रेजी बारात / कौन कितने पानी में

फैंटम

निर्देशक - कबीर खान
कलाकार  -सैफ अली खान, कैटरीना कैफ, सोहेला कपूर, सव्यसाची मुखर्जी

जिसे भारत में 26/11 कहा जाता है (यानी 2008 का वो हादसा जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल सहित कुछ ठिकानों पर हमला किया था और जिसमें कई लोगों के अलावा पुलिस अधिकारी भी मारे गए थे) की चर्चा अक्सर होती है और भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत की हर संभावना-आशंका के बीच वो मसला उठता है। अक्सर ये सुनने को आता है कि उस हमले में मारे गए लोगों को इंसाफ नहीं मिला है। वो इंसाफ क्या होगा ये बहसतलब है, लेकिन फिलहाल उसका फिल्मी इंसाफ हो गया है। कबीर खान की फिल्म `फैंटम’ एक तरह से फिल्मी पर्दे पर भारत के खिलाफ पाकिस्तान की उस आतंकवादी कार्रवाई का बदला है। हुसैन जैदी कि किताब `मुंबई अवेंजर्स’ पर बनी फिल्म का ताना बाना ह़ॉलीवुड की `मिसन इंपॉसिबल’ श्रृंखला की फिल्मों जैसी है। हालांकि कई फर्क है। सबसे बड़ा तो यही कि टाम क्रूज (मिशन इंपॉसिबल के नायक की भूमिका निभानेवालो) जैसा दम सैफ अली खान में नहीं है। 

सैफ ने दानियाल खान के नाम के एक शख्स का किरदार निभाया है जो भारतीय गुप्तचर एजेंसी रॉ की तरफ से अमेरिका जाकर डेविन कोलमेन हेडली को खत्म कर देता है और लंदन में एक अन्य पाकिस्तानी को भी, जो 26/11 की साजिश में शामिल था। इसमें उसका साथ देती है नवाज (कैटरीना कैफ)। आखिर में दानियल के निशाने पर हैं हैरिस सईद (ये किरदार हाफिज सईद की तरह है)  और उमवी (जखीउर्रहमान लखवी जैसा)। दानियल और नवाज की जोड़ी उन दोनों को खत्म कर देती है। ये सब इतना सरल लगता है कि दर्शक को महसूस होता है कि आखिर हकीकत में भारतीय खुफिया एजंसियां इतना सरल काम क्यों नहीं कर देती? जाहिर है कि फिल्म में कई तरह के सरल नुस्खे  हैं। हालांकि फिल्म में पाकिस्तान की स्टीरियोटाइपिंग नहीं है जैसा `गदर’ जैसी फिल्म में दिखाया गया था। इसमें सोहेला कपूर ने ऐसी पाकिस्तानी मां का किरदार निभाया है जिसका जवान बेटा आतंकवादियों (लश्कर ए तैयबा) के साथ रहने की वजह से मारा गया। वो दानियाल और नवाज का साथ देती है और फिल्म के लगभग अंत में जब पाकिस्तानी सैनिक उससे पूछते हैं तुमने ऐसा क्यों किया तो वो कहती है- `पाकिस्तान की खातिर’। यानी ऐसे पाकिस्तानी भी यहां दिखाए गए हैं तो आतंकवाद के खिलाफ हैं।

फिल्म दर्शक को लंदन और शिकागो के अलावा सीरिया और पाकिस्तान की सैर करा देती है। दानियल और नवाज का पाकिस्तान जाना तो समझ में आता है क्योंकि वो कहानी की मांग है लेकिन सीरिया किसलिए? क्या सिर्फ इसलिए कि वहां के गृहयुद्ध के कुछ दृश्य दिखा सके?  इससे कहानी लंबी जरूर होती है लेकिन उसका कोई सकारात्मक प्रभाव  नहीं पड़ता है। फिल्म में दानियल और नवाज के बीच रोमांटिक रिश्ता बनता है लेकिन उसके दृश्य ज्यादा नहीं है। सैफ अली खान के एक्शन वाले दृश्य भी सामान्य है और अगर निर्देशक ने उन पर खास काम किया होता तो शायद ये और बेहतर हो जाती। जिनको 26/11 को लेकर पाकिस्तान से मलाल है उनको ये थोड़ी मनोवैज्ञानिक संतोष देगी कि चलो न सही वास्तविक रूप से लेकिन फिल्मी तरीके से बदला तो ले लिया गया।


बांके की क्रेजी बारात


निर्देशक- एजाज खान 
कलाकार-राजपाल यादव, टिया वाजपेयी, सत्यजीत दुबे, संजय मिश्रा, विजय राज

ये एक कॉमेडी है । फिल्म का नाम मजेदार है और कहानी भी। दर्शक को हंसने के लिए काफी मसाला पेश किया गया है।

खैर, सबसे पहले जान लीजिए कि निर्देशक ने कहना क्या चाहा है। आजकल प्राक्सी यानी छद्म का जमाना है। जो चीज जैसी है वैसी दिखती नहीं है। फिल्म में बांके (राजपाल यादव) नाम का एक शख्स है। उसकी शादी होनेवाली है। लेकिन उसकी कुंडली में कोई दोष निकल आता है। अब मामले को कैसे सटलाया जाए? आखिर उसे कुंवारा तो ऱखा नहीं जा सकता? तो परिवार वाले तय करते हैं कि दूल्हा के वेष मे किसी और भेज दिया जाए और शादी के बाद दुल्हन बांके की हो जाए। इसलिए विराट (सत्यजीत) नाम के नौजवान को ढूंढा जाता है जो पैसे के एवज मे ये काम करने को तैयार हो जाता है। शादी हो भी जाती है। लेकिन शादी के बाद दुल्हन अंजलि (टिया वाजपेयी) को इस सबसे बडा धक्का लगता है। वो विराट को काफी बुरा भला कहती है। विराट अपनी मजबूरी बताता है। और फिर अंजलि  एक ऐसा खेल खेलती है कि बांके मुंह ताकता रह जाता है।

फिल्म में संजय मिश्रा और विजय राज में काफी अच्छा काम किया है। लेकिन जबसे ज्यादा जमे राजपाल यादव। फिल्म में व्यंग्य थोड़ा कमजोर हो गया है। पर खिलखिलाने के अवसर काफी हैं। 


कौन कितने पानी में 

निर्दशक –नीला माधव पांडा
कलाकार- राधिका आप्टे, कुणाल कपूर,  सौरभ शुक्ला, गुलशन ग्रोवर

कह सकते हैं कि इसमें पानी की समस्या को राजनीति और सामंतवाद में मिलाया गया है। और जब इतनी मिलावट को क्या बनेगा?  अनुमान लगाइए।

सौऱभ शुक्ला ने एक ऐसे राजा साहब का किरदार निभाया हो जो काफी खस्ता हाल है। उनका महल अब गिरा तब गिरा की हालत में है। गांव में (जिसका नाम ऊपरी गांव है) में रहनेवाले राजा साहब के यहां पानी की समस्या है किंतु पास के गांव में पानी बहुत है। राजा साहब का बेटा राजेश (कुँणाल कपूर) विदेश जाना चाहता है लेकिन राजा साहब पैसा कहां से लाएं? कोई जमीन भी खरीदने के तैयार नहीं है। फिर राजेश सुझाव देता है कि साथ वाले गांव खारू पहलवान (गुलशन ग्रोवर) की बेटी जाह्नवी (राधिका आप्टे) से शादी करने के लिए पटा लें तो पैसा मिल जाएगा। जाह्नवी पढ़ी लिखी है और अपने गांव की तरक्की के लिए काम कर रही है। राजेश उसे पटा तो लेता है लेकिन ऐसे में उसे उससे प्रेम हो जाता है और वो सच में उससे शादी करना चाहता है। राजा साहब को ये स्वीकार नहीं। और न ही जाह्नवी के पिता को। दोनों तरफ से तलवारे निकल जाती हैं और लेकिन तभी एक चमस्कार होता है और सब कुछ ठीक हो जाता है।

 फिल्म में सामंतवाद का उत्पीड़क रूप भी दिखाया है। और उस ध्वस्त रूप भी। लेकिन चमत्कार की वजह से फिल्म का अंत कमजोर हो जाता है। सौरभ शुक्ला और राधिका का काम बहुत अच्छा है। लेकिन निर्देशक नीला माधव पांडा के लिहाज से ये बहुत अच्छी फिल्म नहीं कही जाएगी।



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'वर्तमान साहित्य' सितम्बर 2015 'Vartman Sahitya' September

9/01/2015 11:32:00 am टिप्पणी करें

वर्तमान साहित्य

साहित्य, कला और सोच की पत्रिका

वर्ष 32 अंक 9,  सितम्बर, 2015

सलाहकार संपादक:  रवीन्द्र कालिया | संपादक: विभूति नारायण राय | कार्यकारी संपादक: भारत भारद्वाज | कला पक्ष: भरत तिवारी
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धारावाहिक उपन्यास–4
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रचना संसार / सूरज प्रकाश
तेरी मेरी सबकी बात / नमिता सिंह
सम्मति - इधर–उधर से प्राप्त प्रतिक्रियाएं


आवरण के छायाकार ऋत्विक भारद्वाज
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मैत्रेयी पुष्पा को रचना यादव का जवाब | Rachana Yadav's reply to Maitreyi Pushpa

8/31/2015 04:36:00 pm 1 > टिप्पणी

राजेन्द्र यादव का सहारा लेकर बहुतों ने यश कमाया 

~ रचना यादव

राजेन्द्र जी के जन्मदिन पर फेसबुक पर अपना बयान लिखते समय मैत्रेयी जी को शायद रचना यादव से जवाब की उम्मीद नहीं रही होगी; उन्ही को क्या शायद किसी को नहीं रही होगी... शायद हम भूल गए थे कि रचना , मन्नू भंडारी और राजेन्द्र यादव की रचना हैं, उनसे यह नाउम्मीदी रखना कि वह लिख नहीं सकतीं या उनके पास जवाब देने के लिए भाषा नहीं होगी - गलत है. वैसे मैत्रेयीजी को धन्यवाद कहना चाहुँगा क्योंकि यदि वह ऐसा निजी-हमला नहीं करतीं तो हमें रचना जी की लेखन-शैली की धार का पता नहीं चलता. मैत्रेयीजी हम सबकी प्रिय हैं, अब दिल्ली हिंदी अकादमी की उपाध्यक्ष हैं, उनसे बड़ी उम्मीदें हैं और कम से कम मेरी समझ में, इन उम्मीदों में उनके हालिया फेसबुक बयान बिलकुल फिट नहीं बैठते... बहरहाल 28 अगस्त को मैत्रेयीजी ने अपने फेसबुक अकाउंट पर लिखा - 

Maitreyi Pushpa | August 28 at 8:53am
 
आज आपका जन्मदिन है राजेन्द्र जी !!
काश आप देख सकते होते कि जिस परिवार की ओर अपने लिये एक छोटी सी क्षमा -दृष्टि के लिये याचक की तरह देखते रहे वही परिवार आप की मृत्यु के बाद आपकी तस्वीर लगाकर गर्व के साथ जन्मदिन मना रहा है । जो लोग आपका नाम गुनाह के खाते में डालते रहे हैं , वे अब यश गा रहे हैं । इस सब के लिये मृत्यु ज़रूरी थी राजेन्द्र जी ...कि हमारे लिये दुनिया वीरान ...

उनके लिखे पर कई टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण हैं लेकिन जिस परिवार के लिए उन्होंने इसे लिखा था वहां से आया जवाब पारदर्शी होने के साथ कुछ सवाल भी लिए हुए है और इस उम्मीद के साथ दिया गया है कि मैत्रेयीजी जवाब देंगी... 

आपका 
भरत तिवारी

मैत्रेयी पुष्पा को रचना यादव का जवाब | Rachana Yadav's reply to Maitreyi Pushpa

राजेन्द्र यादव के और हंस के असली शुभचिन्तक कौन हैं 

~ रचना यादव



Hindi Academy Vice Chairperson , Maitreyi Pushpa posted a very derogatory post against my family on the 28th of august. Though I dont like to get into the politics of Hindi Literary world , but since it was a personal attack, I feel the need to give a reply. I have posted the reply under her post also on her page but I am just copying it here as well .
This is for Maitreyi ji :
(अनुवाद: हिंदी अकादमी उप अध्यक्ष, मैत्रेयी पुष्पा ने अगस्त 28 को मेरे परिवार के खिलाफ एक बहुत ही अपमानजनक टिप्पणी पोस्ट की। यद्यपि मुझे  हिंदी साहित्य की दुनिया की राजनीति में शामिल होना पसंद नहीं है, लेकिन चूंकि यह एक व्यक्तिगत हमला था, मैं इसका जवाब देने की जरूरत महसूस करती हूँ। मैंने यह जवाब उनकी पोस्ट (फेसबुक) पर दिया है और उसे ही यहाँ (अपनी फेसबुक वाल) कॉपी कर रही हूँ ।
यह मैत्रेयी जी के लिए है :)

28 अगस्त को फेसबुक पर लिखी आपकी पोस्ट काफी व्यक्तिगत थी, इसलिए कम से कम एक बार उसका जवाब देना ज़रूरी समझती हूँ।

आप मुझसे बड़ी हैं, अतः सादर यह जानना चाहूँगी कि आप किस परिवार की बात कर रही हैं? क्या आपका संकेत मेरे और मेरी माँ (मन्नू भंडारी) की ओर है? या उन समस्त लोगों की ओर- जैसे हंस के कार्यकर्ता;... उनके कुछ बहुत आत्मीय मित्र और शुभचिंतक। क्योंकि उनका परिवार तो बहुत बड़ा था। खैर, जिसकी ओर भी हो, मैं सिर्फ. यह बताना चाहूँगी कि यह वही परिवार है जो हर दुःख-सुख के क्षणों में उनके साथ खड़ा रहा था। चाहे वो बीमारी और हस्पताल का दौर हो; या आर्थिक संकट हो; या कुछ और निजी परेशानियाँ। उनका यह परिवार ही था जो दिन-रात उनकी एक बुलाहट पर मुस्तैदी से हाज़िर हो जाता था ! और यह वही परिवार है, जो आज हंस को उसी स्तर पर कायम रखने, बल्कि उसको और आगे बढ़ाने में जी-जान से जुटा पड़ा है। केवल इसलिए क्योंकि ‘हंस’ राजेन्द्रजी का सपना था। आसान काम नहीं है यह मैत्रेयीजी, यह तो आप भी समझती होंगी। 

काम कर रहा है यह परिवार मैत्रेयीजी- केवल जन्मदिन पर आकर यश और गर्व नहीं लूट रहा। राजेन्द्रजी की एक-एक इच्छा को पूरा करने में ईमानदारी से लगा हुआ है। क्योंकि यह हम सब का वादा था उनसे।

और हाँ, यह वही परिवार है जिसके सारे सदस्य मिलकर उनका जन्मदिन मनाते थे- जब वे जीवित थे तब भी, और उसे परम्परा मानकर अब भी। उसी गर्व से, उसी हक़ से। और जब तक संभव होगा, मनाते रहेंगे।

वैसे, यह जरूर कहूँगी कि यदि आपको लगता है कि राजेन्द्र यादव द्वारा यश बटोरने के लिए हमें उनके जन्मदिन की पार्टी की आवश्यकता है, तो हमारी नहीं, आप राजेन्द्र यादव की तौहीन कर रही हैं।

रही बात मन्नूजी की (क्योंकि मैं समझती हूँ कि आपका इशारा बहुत स्पष्ट रूप से उस तरफ भी है), तो राजेन्द्रजी की हर तकलीफ़ और जरूरत के समय, मौजूद होने के बावजूद, वे इन जन्मदिन की पार्टियों में न पहले कभी आईं (केवल मेरे बहुत ज़िद करने पर शायद एक बार के अलावा), ना ही अब आती हैं। 

यह शायद हिन्दी जगत का हर व्यक्ति जानता होगा कि राजेन्द्र यादव का सहारा लेकर बहुतों ने यश कमाया (नाम नहीं गिनाना चाहूँगी), पर सब यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि उस सूची में मन्नू भंडारी का नाम न कभी शामिल था और न अब है। मुझे आश्चर्य होगा, यदि आपको यह लगता है कि मन्नूजी को यश कमाने के लिए राजेन्द्र यादव की जन्मदिन की पार्टी का सहारा लेना पड़ रहा है।

खैर, आपने किसी सज्जन की पोस्ट के जवाब में ठीक ही कहा कि आप इस परिवार का हिस्सा नहीं थीं, इसलिए शायद आप तक सारे तथ्य पहुंच भी नहीं पाए। और इसलिए भी, कि इस परिवार ने राजेन्द्रजी के लिए जो किया- उसे जताने की आवश्यकता कभी महसूस नहीं की। जो किया- अपनी और उनकी खुशी के लिए किया।

तो मैत्रेयीजी, आपसे मेरा विनम्र निवेदन है कि तथ्यों को पूरी तरह जाने बिना किसी के परिवार पर इस तरह उंगली उठाना कितना उचित है, यह बात खुद आप जानती होंगी।

आप आज एक महत्वपूर्ण पद पर हैं, कृपया अपनी सोच को भी उस पद की गरिमा के अनुसार रखिए। 

मुझे जो कहना था, मैंने दिल से कह दिया। आप चाहे इस पर रिस्पॉन्ड करें या न करें, मैं और कुछ नहीँ कहना चाहूँगी। बस इतना ही कि जब परिवार का कोई एक व्यक्ति पीड़ा से गुजरता है, तो उतनी ही पीड़ा अन्य सदस्यों को भी होती है। खासकर जब परिवार आपस में बहुत मजबूती से जुड़ा हो। जो कि हम लोग थे और हमेशा रहेंगे।और इसे आपको साबित करने की आवश्यकता मैं नहीं समझती। 

हाँ, आपकी एक बात से जरूर कुछ सहमत हूँ- राजेन्द्र यादव के और हंस के असली शुभचिन्तक कौन हैं, इस तथ्य को सामने लाने के लिए शायद उनकी मृत्यु ज़रूरी थी।

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