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शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

आलोचकों की दृष्टि वहां तक नहीं पहुंच पाती जहां तक रचनाकारों की दृष्टि पहुंचती है - अनंत विजय

आलोचकों की दृष्टि वहां तक नहीं पहुंच पाती जहां तक रचनाकारों की दृष्टि पहुंचती है - अनंत विजय



यह वक्त आलोचना और आलोचकों के लिए गंभीर मंथन का है कि क्योंकर वो साहित्य की धुरी नहीं रह गया है  - अनंत विजय 
राग दरबारी’ तो घटिया उपन्यास है। मैं उसे हिंदी के पचास उपन्यासों की सूची में भी नहीं रखूंगा। पता नहीं ‘राग दरबारी’ कहां से आ जाता है? वह तीन कौड़ी का उपन्यास है। हरिशंकर परसाईं की तमाम चीजें राग दरबारी से ज्यादा अच्छी हैं। वह व्यंग्य बोध भी श्रीलाल शुक्ल में नहीं है जो परसाईं में है। उनके पासंग के बराबर नहीं है श्रीलाल शुक्ल और उनकी सारी रचनाएं – यह बात कही है हिंदी के बुजुर्ग लेखक और कथालोचक विजय मोहन सिंह ने। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की पत्रिका बहुवचन में कृष्ण कुमार सिंह ने विजय मोहन सिंह का साक्षात्कार किया है। इस इंटरव्यू में विजय मोहन सिंह ने और भी कई ऐसी मनोरंजक बातें कहीं हैं। एक जगह विजय मोहन सिंह कहते हैं – नागार्जुन का जिक्र मैंने अपनी किताब में काका हाथरसी के संदर्भ में भी किया था जो बाद में मैंने हटा दिया। केदारजी उसको पढ़कर दुखी हो गए थे। उन्होंने ही उसे निकलवा दिया। नागार्जुन की कमजोरियों का हाल तो यह है कि कई जगह उन्हें पढ़ते हुए लगा और मैंने लिखा भी कि उनसे बेहतर काका हाथरसी हैं। केदार जी इससे दुखी और कुपित हो गए थे कि ये क्या कर रहे हैं। मैने वह वाक्य हटा जरूर दिया लेकिन मेरी ऑरिजिनल प्रतिक्रिया यही थी। कुल मिलाकर नागार्जुन की कमजोरियां वह नहीं हैं जो निराला की हैं। इस तरह की कई बातें और फतवे विजय मोहन जी के इस साक्षात्कार में है जहां वो प्रेमचंद के गोदान से लेकर शिवमूर्ति तक को खारिज करते हुए चलते हैं। विजय मोहन सिंह के इस पूरे इंटरव्यू को पढ़ने के बाद लगता है कि वो हर जगह पर रचनाकारों का सतही मूल्यांकन करते हुए निकल जाते हैं। इसकी वजह से उनका यह साक्षात्कार सामान्यीकरण के दोष का भी शिकार हो गया है।
जिस तरह से विजय मोहन सिंह ने श्रीलाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास राग दरबारी को घटिया और तीन कौ़ड़ी का उपन्यास कहा है वह उनकी सामंती मानसिकता का परिचायक है। इस तरह की भाषा बोलकर विजय मोहन सिंह ने खुद का स्तर थोड़ा नीचे किया है। साहित्य में भाषा की एक मर्यादा होनी चाहिए। किसी भी कृति को लेकर किसी भी आलोचक का अपना मत हो सकता है, उसके प्रकटीकरण के लिए भी वह स्वतंत्र होता है लेकिन मत प्रकटीकरण मर्यादित तो होना ही चाहिए। अपनी किताब हिंदी उपन्यास का इतिहास में गोपाल राय ने भी राग दरबारी को असफल उपन्यास करार दिया है। उन्होंने इसकी वजह उपन्यास और व्यंग्य जैसे दो परस्पर विरोधी अनुशासनों को एक दूसरे से जोड़ने के प्रयास बताया है। गोपाल राय लिखते हैं – व्यंग्य के लिए कथा का उपयोग लाभदायक होता है पर उसके लिए उपन्यास का ढांचा भारी पड़ता है। उपन्यास में व्यंग्य का उपयोग उसके प्रभाव को धारदार बनाता है पर पूरे उपन्यास को व्यंग्य के ढांचे में फिट करना रचनाशीलता के लिए घातक होता है। व्यंग्यकार की सीमा यह होती है कि वह चित्रणीय विषय के साथ अपने को एकाकार नहीं कर पाता है। वह श्रृष्टा से अधिक आलोचक बन जाता है। श्रृष्टा अपने विषय से अनुभूति के स्तर पर जुड़ा होता है जबकि व्यंग्यकार जिस वस्तु पर व्यंग्य करता है उसके प्रति निर्मम होता है। यहां गोपाल राय ने किसी आधार को उभारते हुए राग दरबारी को असफल उपन्यास करार दिया है लेकिन उन्होंने भी इसे घटिया या तीन कौड़ी का करार नहीं दिया है। ऐसा नहीं है कि राग दरबारी को पहली बार आलोचकों ने अपने निशाने पर लिया है। जब यह 1968 में यह उपन्यास छपा था तब इसके शीर्षक को लेकर श्रीलाल शुक्ल पर हमले किए गए थे और उनके संगीत ज्ञान पर सवाल खड़े किए गए थे। आरोप लगाने वाले ने तो यहां तक कह दिया था कि श्रीलाल शुक्ल को ना तो संगीत के रागों की समझ है और ना ही दरबार की। लगभग आठ-नौ साल बाद जब भीष्म साहनी के संपादन में 1976 में आधुनिक हिंदी उपन्यास का प्रकाशन हुआ तो उसमें श्रीलाल शुक्ल ने लिखा था- दूसरों की प्रतिभा और कृतित्व पर राय देकर कृति बनाने वाले हर आदमी को बेशक दूसरों को अज्ञानी और जड़ घोषित करने का हक है, कुछ हद तक यह उसके पेश की मजबूरी भी है, फिर भी किताब पढ़कर कोई भी देख सकता है कि संगीत से इसका कोई सरोकार नहीं है और शायद मेरा समीक्षक भी जानता है कि यह राग उस दरबार का है जिसमें हम देश की आजादी के बाद और उसके बावजूद, आहत अपंग की तरह डाल दिए गए हैं या पड़े हुए हैं।

हिंदी के आलोचकों के निशाने पर होने के बावजूद राग दरबारी अब तक पाठकों के बीच लोकप्रिय बना हुआ है। अब भी पुस्तक मेलों में राग दरबारी और गुनाहों का देवता को लेकर पाठकों में उत्साह देखने को मिलता है। इसकी कोई तो वजह होगी कि अपने प्रकाशन के छियालीस साल बाद भी राग दरबारी पाठकों की पसंद बना हुआ है। अब तक इसके हार्ड-बाउंड और पेपरबैक मिलाकर बहत्तर से ज्यादा संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इनमें छात्रोपयोगी संस्करणों की संख्या शामिल नहीं है। यह सही है कि आजादी के बाद हिंदी लेखन में सरकारी तंत्र पर सबसे ज्यादा व्यंग्य हरिशंकर परसाईं ने किया और उनके व्यंग्य बेजोड़ होते थे, मारक भी। लेकिन हरिशंकर परसाईं के व्यंग्य की तुलना श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी के व्यंग्य से करना उचित नहीं लगता है और इस आधार पर राग दरबारी को घटिया और तीन कौड़ी को कह देना तो अनुचित ही है। रेणु के उपन्यासों में सरकारी तंत्र का उल्लेख यदा कदा मिलता है। कुछ अन्य लेखकों ने भी सरकारी तंत्र को अपने कथा लेखन का विषय बनाया लेकिन पूरे उपन्यास के केंद्र में सरकारी तंत्र को रखकर श्रीलाल शुक्ल ने ही लिखा। इसके बाद गिरिराज किशोर ने यथा प्रस्तावित और गोविन्द मिश्र ने फूल इमारतें और बंदर में सरकारी तंत्र के अधोपतन को रेखांकित किया। इस पूरे उपन्यास को व्यंग्य के आधार पर देखने की भूल विजय मोहन सिंह जैसा आलोचक करे तो यह बढ़ती उम्र का असर ही माना जा सकता है। दरअसल हिंदी में आलोचकों को लंबे अरसे से यह भ्रम हो गया है कि वो किसी लेखक को उठा या गिरा सकते हैं। इसी भ्रमवश आलोचक बहुधा स्तरहीन टिप्पणी कर देते हैं और विजय मोहन सिंह की राग दरबारी और नागार्जुन के बारे में यह टिप्पणी उसकी एक मिसाल है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने बहुत कोशिश की थी वो जायसी को हिंदी कविता की शीर्ष त्रयी- सूर, कबीर और तुलसी – के बराबर खड़ा कर दें। रामचंद्र शुक्ल ने जायसी पर बेहतरीन लिखा है, इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन बावजूद इसके लोक या पाठकों के बीच वो जायसी को सूर कबीर और तुलसी की त्रयी के बराबर खड़ा नहीं कर सके। दरअसल आलोचकों की जो दृष्टि है वो वहां तक नहीं पहुंच पाती है जहां तक रचनाकारों की दृष्टि पहुंचती है। या फिर कहें कि आलोचकों की दृष्टि रचनाकारों के बाद वहां तक पहुंच पाती है। आलोचकों के उठाने गिराने के खेल के बारे में विजय मोहन सिंह ने अपने इसी इंटरव्यू में इशारा भी किया है। आलोचकों की अपनी एक भूमिका होती है, उनका एक दायरा होता है लेकिन जब उनके दंभ से यह दायरा टूटता है तो फिर इस तरह की फतवेबाजी शुरू होती है कि फलां रचना दो कौड़ी या तीन कौड़ी की है। इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि आलोचना में संवाद कम वाद विवाद ज्यादा होने लगे हैं। यह वक्त आलोचना और आलोचकों के लिए गंभीर मंथन का है कि क्योंकर वो साहित्य की धुरी नहीं रह गया है। एक जमाने में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने कहा था कि यदि उनकी कविताएं आचार्य रामचंद्र शुक्ल सुन रहे हैं तो जैसे समूचा हिंदी जगत सुन रहा है। आज लेखकों और आलोचकों के बीच में यह विश्वास क्यों खत्म हो गया। क्या इसके पीछे आलोचक के पूर्वग्रह हैं या फिर विजय मोहन सिंह जैसी फतवेबाजी का नतीजा है। विजय मोहन सिंह ने अपने उसी इंटरव्यू में कहा है कि मापदंड और कसौटी उनको कर्कश लगते हैं। उनके मुताबिक रचना के समझ के आधार पर रचना का मूल्यांकन किया जाता है। तो क्या यह मान लेना चाहिए कि विजय मोहन सिंह ना तो राग दरबारी को समझ पाए और ना ही नागार्जुन की अकाल पर लिखी कविता को। जिस तरह से उन्होंने अपने इंटरव्यू में लेखकों के लिए शब्दों का इस्तेमाल किया है वह आपत्ति जनक है – राग दरबारी तीन कौड़ी की, नागार्जुन बेहतर काका हाथरसी, शिवमूर्ति औसत दर्जे का कहानी कार। आलोचना और रचना के बीच विश्वास कम होने की यह एक बड़ी वजह है।


बुधवार, 17 दिसंबर 2014

कवितायेँ: स्पर्श के गुलमोहर - संगीता गुप्ता

स्पर्श के गुलमोहर

लाँघना मुश्किल 


अपने चित्रों एवं फिल्मों के लिए विख्यात संगीता गुप्ता के पास निश्चय ही असीम का वरदान है, वे चित्रकार होने के साथ-साथ कवि भी हैं। कला, साहित्य व वृत्त चित्र जैसे बहुआयामी क्षेत्रों में उनकी सक्रियता इस तथ्य को ही इंगित करती है। जीवन में उनकी गहरी आस्था है, विषमताओं से गुजरते हुए भी उनका स्वर सदा सकारात्मक ही रहा है। उनका प्रेम व्यक्ति विशेष तक सीमित नहीं, वह जीवन से जुड़े हर छोटे-बड़े तत्वों तक व्याप्त है। इस संग्रह की कविताएं जीवनोन्मुखी हैं। उल्लास व आनन्द से भरी कविताएँ उनकी जिजीविषा को उनके चित्रों की भांति मूर्त से अमूर्त की ओर ले जाती हैं।

‘‘स्पर्श के गुलमोहर’’ संगीता गुप्ता का छठा काव्य संकलन है। 1988 में प्रकाशित उनके पहले काव्य संग्रह ‘‘अन्तस् से’’ अब तक की रचनात्मक सक्रियता में उनके सरोकार निरन्तर परिपक्व हुए हैं। निश्चय ही यह कवि की रचना यात्रा का एक अहम पड़ाव है।

राजकमल प्रकाशन से शीध्रप्रकाश्य ‘‘स्पर्श के गुलमोहर’’ कविता संग्रह के लिए संगीता गुप्ता को शब्दांकन परिवार की अनंत बधाइयाँ और शुभकामनायें। 


परिचय

कवयित्री, चित्रकार एवं फिल्म निर्माता

जन्म: 25 मई, 1958, गोरखपुर

शिक्षा बी.एसी.सी, एम.ए., एल.एल.बी

प्रकाशित कृतियाँः ‘‘वीव्ज़ ऑफ टाईम’’ (2013) विज़न एण्ड ईल्यूमिनेशन (2009) लेखक का समय (2006) ‘‘प्रतिनाद‘‘ (2005) समुद्र से लौटती नदी (1999) इस पार उस पार (1996) नागफनी के जंगल (1991) अन्तस् से (1988)

उनकी 27 एकल एवं 200 से अधिक सामूहिक चित्रकला प्रदर्शनियाँ आयोजित।

अनुवाद: ‘‘इस पार उस पार’’ बंगला में एंव ‘‘प्रतिनाद’’ अंग्रेजी, जर्मन और बंगला में अनुवादित।

सम्मान पुरस्कार: 2013 - ‘‘नेशनल वूमन एक्सीलेन्स अवार्ड’’ सौजन्य योग कन्फेडरेशन ऑफ इंडिया और इंटरनेशनल वूमन एक्सीलेन्स अवार्डस ऑरगेनाईजेशन, ‘‘राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’’, ’’वूमेन एचीवर अवार्ड‘‘ सौजन्य इण्डियन कांउसिल फॉर यू0 न0 रिलेशन्स, ‘‘विश्व हिंदी प्रचेता अलंकरण’’ सौजन्य उत्तर प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन एंव उत्कर्ष अकादमी, कानपुर। 2012 - ‘‘उद्भव शिखर सम्मान’’ सौजन्य उद्भव सामाजिक सांस्कृतिक एंव साहित्यिक संस्थान, दिल्ली। 2005 - ‘‘77वाँ वार्षिक चित्रकला सम्मान’’ सौजन्य ऑल इण्डिया फाइन आर्टस एण्ड क्राफ्ट सोसाईटी, दिल्ली। 1999 - ‘‘हिन्द प्रभा पुरस्कार’’ सौजन्य उत्तर प्रदेश महिला मंच, मेरठ। 1998 - ‘‘69वाँ वार्षिक चित्रकला पुरस्कार’’ सौजन्य ऑल इण्डिया फाइन आर्टस एण्ड क्राफ्ट सोसाईटी, दिल्ली।

सम्पर्क: संगीता गुप्ता, सी-4, टॉवर-10, एनबीसीसी परिसर, न्यू मोतीबाग, नई दिल्ली 110021


हमारे बीच पसरे
सन्नाटे को
पर असम्भव भी नहीं

कभी पुकार कर देखना
या
अपने मौन में ही
सुन सको
तो सुनना
मेरी धड़कन

जानती हूँ
तुम्हारी आँखों की प्यास
गहरी 
पर मेरे
आँसुओं की नदी भी 
कहाँ कभी सूखती 

पलकें झपकाओ तो ज़रा
मेरी नदी 
वहीं कहीं बहती है

तुमने सौंपीं थी
चुपचाप, सबसे चुरा
एक दहकती दोपहर
और मैं
अपनी कविताएँ रोप आई थी
तुम्हारे धधकते मन में
ज़रा अपने में झाँको
देखना 
अग्निफूल खिले होंगे वहाँ
बाँझ तो नहीं थीं
मेरी कविताएँ 

एक पल
कभी ठिठको 
तो अपने पाँव देखना
मेरे स्पर्श के गुलमोहर
अब भी दहकते होंगे वहाँ

बर्फ़-सी सुन्न 
उंगलियाँ
रखना कभी उन पर
और महसूसना
मेरा होना 
सर से पाँव तक



ज़िन्दगी भर

ज़िन्दगी भर
बड़ी शिद्दत से
उस वादे को निभाया
जो कभी किया न था
तुम ने कब जाना
तुम्हें चाहा, सराहा
साँसों में तुम्हारी महक 
चुपचाप जीती रही
बरसों बरस



नन्ही परी

नन्ही परी
ज़रा आँखें खोलो
देखो तो ज़रा 
एक मीठी सुबह
तुम्हारे दरवाज़े पर 
दस्तक दे रही
तुम्हें गले लगाने को 
मचल रही

बर्फ़ सी ठिठुरती हवा 
तुम्हें छू कर
गरमाना चाहती

सूरज किरणों में
तुम्हारी नूरानी हँसी भरने की
प्रतीक्षा कर रहा

धरती तुम्हारे क़दमों को 
चूमना चाहती
आकाश बाँहों में भरना चाहता तुम्हें
और तुम इनसे
बेख़बर सोई हुई हो



पत्थर भी 

पत्थर भी 
पत्थर की आँच से
पिघलते हैं
कभी - कभी

पथराये शरीर के 
भीतर
उनके मन क्या
मोम के बने होते हैं

तुम ने कहा था 
किसी पत्थर में
इतनी आब तो हो 
जो दूसरे पत्थर को 
पिघला दे 

दो पत्थरों के 
मिलने से 
क्या कोई कहानी 
बनती है 
ज़माने भर के पत्थर 
उनके पीछे 
उनकी बात करते हैं
क्या तुम्हें पता है

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