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सीता राम और रावण — हृषीकेश सुलभ की अतिमर्मस्पर्शी कहानी

5/28/2016 07:54:00 pm टिप्पणी करें



Sita Ram aur Ravana - Hindi Kahani

Hrishikesh Sulabh

वर्तमान समय के मेरे सबसे प्रिय कहानीकार हृषीकेश सुलभ की कथा शैली सुन्दर स्वप्न की भांति मनमोहक है. उनको पढ़ना हर बार बिलकुल-नया अनुभव देता है. 
आभारी हूँ उनका 'सीता राम और रावण' जैसी कहानी — जिसे पढ़ते हुए आँखें नम हो गयीं — शब्दांकन को उपलब्ध कराने के लिए. 

अतिमर्मस्पर्शी कहानी !  

भरत तिवारी

सीता राम और रावण 

एक थी ननद और एक थी उसकी भौजाई।

एक दिन ननद-भौजाई दोनों पानी भरने चलीं। नदी दूर थी। राह में चलते हुए दोनों आपस में हँसी-ठिठोली करती रहीं।

नदी किनारे पहुँचकर दोनों सुसताने लगीं। चलते-चलते थक गई थीं दोनों। नदी की झिर-झिर बहती धारा में अपने पाँव लटकाए दोनों घाट किनारे बैठी थीं। ननद ने अपनी भौजाई से कहा - ‘‘भौजी, जिस रावण ने तुम्हारा हरण किया था उसका चित्र उरेह कर दिखाओ।‘‘

‘‘ना। ......ना बाबा ना।‘‘ भौजाई बोली।

‘‘भौजी, हमारा मन एक बार उस पुरुख को देखने का कर रहा है, जो तुम्हें हरण कर ले गया।“ ननद ने भौजाई से इसरार किया।

‘‘अगर मैंने रावण का चित्र उरेहा........, तुम्हें दिखाया...... और जो तुम्हारे भाई को पता चला, मुझे देश निकाला मिल जाएगा। ......ना मेरी प्यारी ननद, ऐसी जिद न करो।‘‘ भौजाई ने ननद को समझाना चाहा।

ननद अपनी जिद पर अड़ी रही। अपनी भौजाई की एक न सुनी उसने। अपने पिता और भाइयों की सौगन्ध खाकर उसने बार-बार भौजाई को भरोसा दिलाया कि किसी को पता न चलेगा।

एक ओर ननद का हठ और दूसरी ओर पति का भय। अंततः ननद के लिए उसका नेह-छोह विजयी हुआ। बोली वह - ‘‘ जाओ, चित्र उरेहने के लिए कूची और रंग ले आओ।‘‘

ननद भागती-दौड़ती वृक्षों-वनस्पतियों और लताओं के पास गई। रंगों के लिए किसिम-किसिम के फूलों और पत्तों को चुना। क्षमा अरजती हुई वृक्षों से छाल लिया और कूची के लिए कोमल टहनियों को तोड़ा। वापस नदी तट पहुँची। नदी से जल ले आई। रंग बनाया। कूची तैयार किया। नदी-तट की भूमि को लीप कर चित्र के लिए भूमि-पट तैयार किया।

भौजाई चित्र उरेह रही थी और ननद उत्सुक भाव से रावण के बनते चित्र को निहार रही थी।

सीता ने सबसे पहले रावण के हाथ बनाए। हाथ के बाद पाँव रचे। हाथों और पाँवों के बीच के भाग - गरदन, छाती, पेट आदि को बनाया। फिर मुख उरेहना शुरु किया। आँखों को रच ही रही थी कि उसके पति राम वहाँ आ पहुँचे। वे अहेरी पर निकले थे। जंगल में भटकते-भटकते उन्हें और उनके घोड़े को प्यास लग आई थी, सो वे नदी-तट पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उनकी नज़र पत्नी और बहन पर पड़ी। वे हर्षित-मन उन दोनों के पास आए।

अचानक राम को अपने सामने पा कर सीता अचकचा गईं। सिहर उठी उनकी देह और थर-थर काँपा मन। सीता ने धरती पर अपना आँचल पसार दिया और उरेहे गए रावण के चित्र को ढँक दिया।

राम ने कुशल-क्षेम पूछा और अपने घोड़े को जल पिलाया। स्वयं भी नदी से अँजुरी में जल भर-भर कर पीने के बाद अहेरी के लिए जंगल में चले गए।

अब राम ही जानें कि उन्होंने सीता के उरेहे गए रावण के चित्र को देख लिया था और उस समय अनजान बने वापस लौट गए थे या अहेरी से वापस आने के बाद उनकी बहन ने चुगली की उनसे! सगरी अयोध्या के लोग-बाग आज भी मानते हैं कि उनकी बहन ने चुगली की, पर सीता को इस पर कभी भरोसा नहीं हुआ। सीता को यही लगा कि राम ने रावण के चित्र को देख लिया और पहले से ही संदेह का जो बीज उनके मन में अंकुरित हो रहा था, वही फूला-फला।

कुपित राम ने लक्ष्मण को बुलाकर कहा, ‘‘लक्ष्मण, मेरे भाई! तुम्हारी भौजाई सीता पर-पुरुष रावण का चित्र बनाती है। रावण, जो मेरा वैरी है। सीता को देश निकाला देना है। ले जाओ उसे और घनघोर वन में छोड़ आओ।‘‘

‘‘मेरी भौजाई सीता मुझे बहुत प्रिय हैं। भूखे को भोजन और नंगे को वस्त्र हां प्रिय जैसे, वैसे ही प्रिय हैं सीता मुझे। वे गर्भवती हैं। .........पूर्ण गर्भ की स्वामिनी हैं वे। भला मैं उनको कैसे घनघोर वन में छोड़ आऊँ?‘‘

राम फिर बोले, ‘‘तुम विपत्ति की घड़ी में नायक रहे हो प्रिय लक्ष्मण। वह मेरे वैरी पर आसक्त है, ...... रावण का चित्र उरेहती है। उसे हर हाल में देश निकाला देना है। जाओ, उसे वन में छोड़ आओ।‘‘

सीता के पास पहुँचे लक्ष्मण। बोले, ‘‘ मेरी भौजी सीता रानी! सुनो, तुम्हारे नइहर से बुलावा आया है। अन्न, ऋतुफल, स्वर्ण, वस्त्र लिये ब्राह्मण आया था बुलावा लेकर। कल की तिथि विदा के लिए तय हुई है। हमलोग कल भोरे-भिनसारे प्रस्थान करेंगे।‘‘

सीता सोचने लगीं। मन दुष्चिंताओं से भर गया।

दूसरे दिन अयोध्या से लक्ष्मण संग विदा हुईं सीता। विदा के समय सीता ने लक्ष्मण से कहा, ‘‘देवरजी, न तो मेरा कोई नइहर है और न मेरी कोई ससुराल है। न रहे जनक जैसे पिता अब इस दुनिया में जो अपनी बेटी को वर चुनने का अधिकार दे सके। .......मैं किसके घर जाऊँगी?‘‘

विदा के समय सीता को खोंईछा में जो अन्न मिला था, उसके दानों को एक-एक कर राह में छींटती हुई चल रही थीं वह। उन्होंने धरती माता से अरज किया, ‘‘हे माता! इन दानों को पाल-पोस कर बड़ा करना कि इनमें अन्न के दानों से भरी फलियाँ लगें, ताकि इन्हीं फलियों को तोड़ कर खाते हुए मेरे देवर लक्ष्मण वापस लौट सकें।‘‘

सीता ने पहला वन पार किया। दूसरा वन पार किया। तीसरा वन, .......मधुवन आया। इस वन में चन्दन, कदम्ब और लवँग के वृक्ष थे।

सीता ने लक्ष्मण से कहा, ‘‘हे देवर! मुझे प्यास लगी है। मेरा कंठ सूख रहा है। प्यास के मारे मेरा प्राण निकला जा रहा है। एक बूँद पानी लाओ।‘‘

लक्ष्मण ने प्यास से व्याकुल सीता को देखा। एक वृक्ष की ओर इशारा करते हुए बोले, ‘‘भौजी, तुम छिन भर यहाँ बिलमो। बैठो इस वृक्ष की छाँह में। मैं पानी खोज लाऊँ, तो तुम्हें पिलाऊँ।‘‘

चन्दन वृक्ष की शीतल छाँह। झिर-झिर बहती शीतल बयार। प्यास से व्याकुल सीता धरती पर सो गईं। उनके चेहरे की कांति मिट गई थी और देह कुम्हला गई थी। उनकी आँख लग गईं। सो गईं सीता।

हृषीकेश सुलभ Hrishikesh Sulabh

लक्ष्मण ने कदम्ब के पत्ते तोड़े। उनका दोना बनाया। नदी तट गए। दोने में पानी भरा और वापस लौटे। जिस चन्दन वृक्ष के नीचे सीता सोयी थीं, उसके पास था एक लवँग वृक्ष। लक्ष्मण ने इस लवँग वृक्ष की डाल में पानी से भरा दोना टाँग दिया और अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गए।

सीता की नींद टूटी। आँखें खुलीं। उन्होंने अचम्भित होकर चारों ओर देखा।

लक्ष्मण नहीं थे।

घनघोर वन में अपने को अकेला पाकर सीता दुखी हुईं। बिना बताए लक्ष्मण के छोड़कर  चले जाने का दुख उन्हें रुला गया। उन्हें दुख था कि वे बिना बताए चले गए और वे राम को कोई संदेश न भेज सकीं। उन्हें इस बात का मलाल था कि वे राम को जो  संदेश भेजना चाहती थीं, शायद अब कभी न भेज सकें।

सीता के गर्भ के दिन पूरे हो चुके थे। प्रसव-वेदना शुरु हो गई। सीता विलाप करने लगीं, ‘‘इस हालत में अब कौन बैठेगा मेरे आगे-पीछे? ............कौन खोलेगा मेरे बाल? इस विपत्ति की भयावह रात में कौन जागेगा मेरे साथ? कहाँ से पाऊँगी छुरी? कौन काटेगा मेरे बच्चे का नाभिनाल?‘‘

घनघोर वन की गहन कालिमा को भेद तपस्विनी देवी वनस्पति प्रकट हुईं। बोलीं, ‘‘ सीता! मैं बैठूँगी तुम्हारे आगे-पीछे। मैं खोलूँगी तुम्हारी लटें। विपत्ति की इस भयावह रात में मैं जागूँगी तुम्हारे साथ। मैं लाऊँगी छुरी और मैं ही काटूँगी तुम्हारे बच्चे का नाभिनाल।‘‘

आसमान में शुक्रतारा उदित हुआ। भोर हुई। सीता ने दो बेटों को जन्म दिया। सीता की कमर की टीस और पाँजर की पीर सिराई। तपस्विनी देवी वनस्पति ने कहा, ‘‘सीता, लकड़ियाँ जला कर प्रकाश करो और अपनी संतानों का मुख देखो।‘‘

समय अपनी गति से चलता रहा।

सीता ने अपने बेटों से कहा, ‘‘ पुत्रो! तुमने विपत्ति के दिनों और यातना के समय में जन्म लिया है। यह वन ही है तुम्हारा घर-दुआर। कुश की डंठलें और पात ही हैं तुम्हारा ओढ़ना-बिछौना। वन-फल ही तुम्हारा भोजन हैं।

सीता ने अयोध्या के लिए रोचन भेजा। रोचन यानी चन्दन और दूर्वादल के साथ पुत्रों के जन्म का संवाद। नापित से कहा, ‘‘इसे माता कौसल्या को देना। लक्ष्मण को देना। सगरी अयोध्या नगरी में बाँट देना, पर उस पापी राम को मत देना।‘‘

नापित ने अयोध्या पहुँच कर रोचन सौंपा। आभूषण, रेशमी वस्त्र और अश्व का उपहार पाकर प्रसन्नचित्त अपने घर लौटा।

एक चौकोर पोखर के तट पर बैठे राम दातुन कर रहे थे। उन्हें लक्ष्मण दिखे। उन्होंने लक्ष्मण से पूछा, ‘‘ प्रिय भाई, तुमने यह दिव्य चन्दन कहाँ से पाया? तुम्हारा ललाट दीपित हो रहा है इसकी आभा से। यह किसके जन्म का संवाद आया है तुम्हारे पास?‘‘

‘‘मेरी भौजी सीता रानी मधुवन में बसती हैं। उन्होंने ही पुत्रों को जन्म दिया है। उनका ही रोचन अपने ललाट पर धारण किया है मैंने।‘‘

राम को मानो काठ मार गया। हाथ की दातुन हाथ में ही रह गई और मुँह की बात मुँह में। सीता ने उनके लिए रोचन नहीं भेजा, यह बात उनके कलेजे में चुभ गई। पहले क्रोधित हुए। कुछ देर बाद जब क्रोध की अग्नि सिराई दुःख हुआ और उनकी आँखों से आँसू झरने लगे। आँसू की धार से पीताम्बर भींगने लगा। उन्होंने रूँधे कंठ से कहा, ‘‘सीता का हाल बताओ।..... मैं सीता को वापस लाऊँगा।‘‘

लक्ष्मण ने उत्तर दिया, ‘‘कुश ही उनका ओढ़ना-बिछौना है। वन का फल भोजन है। लकड़ी जला कर उन्होंने प्रकाश किया, तब कहीं अपनी संतान का मुँह देखा।‘‘

‘‘विपत्ति की घड़ी में मेरे नायक..... मेरे भाई लक्ष्मण! एक बार तुम मधुवन जाते और अपनी भौजी को लिवा लाते।‘‘ राम ने कातर भाव से कहा।

लक्ष्मण मधुवन पहुँचे। सीता से कहा, ‘‘भौजी, राम के मन में तुम्हारे लिए फिर दुलार आया है। तुम्हारे लिए बुलावा है। चलो अयोध्या।‘‘

सीता बोलीं, ‘‘मेरे प्रिय देवर! तुम अपने घर जाओ। मैं अब अयोध्या नहीं जाऊँगी।‘‘

माघ माह की नवमी तिथि आई। राम ने अष्वमेध यज्ञ का निरूपण किया। बिना सीता के यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकता, यह जान कर राम बेहद चिन्तित हुए। लक्ष्मण पहले ही सीता को वापस लाने में असफल हो चुके थे। चिन्तातुर राम गुरु वशिष्ठ के पास गए और बोले, ‘‘हे गुरु महाराज वशिष्ठ! बिना सीता के मेरा यज्ञ पूरा नहीं होगा और उसने न आने का हठ कर रखा है। लक्ष्मण भी वापस आ चुके हैं। अब आप ही मेरी मर्यादा की रक्षा कर सकते हैं। आप किसी भाँति उसे मना कर ले आएँ। ........हे मुनि! आप सीता से कहें कि वह अपने हिय का क्रोध त्याग दे। चल कर फिर से अयोध्या को बसा दे। उसके बिना मेरा जीवन अकारथ और मेरा संसार अँधियारा हो रहा है।‘‘

गुरु वशिष्ठ मुनि अश्व पर सवार हो वन की ओर चले। मधुवन पहुँच कर ऋषि की उस कुटिया को खोजने लगे, जहाँ तपस्विनी सीता का वास था।

गुरु वशिष्ठ को अपने आँगन में पाकर सीता ने शीश नवाया। पत्तों का दोना बनाया और उसमें गंगाजल भर लाईं। सीता ने गुरु महाराज वशिष्ठ के पाँव पखारे और चरणामृत लिया। मुनिवर बोले, ‘‘सीता, तुम तो बुद्धिमति हो। श्रेष्ठ बुद्धि वाली हो, पर किसने तुम्हारी बुद्धि हर ली जो तुमने राम को बिसार दिया? ......चलो, अयोध्या चलो।‘‘

धीर-गम्भीर सीता ने विनय से शीश नवाया। कहा, ‘‘हे गुरु! आप सबका हाल जानते हैं। क्यों अनजान बन सवाल कर रहे हैं? .........हे मुनि! राम ने मुझे इस तरह सताया है कि अब मेरा चित्त उनसे कभी नहीं मिल सकता। राम ने मुझे अग्नि में डाला। अग्नि में डाल कर जलाया और मरने भी नहीं दिया। निकाल लिया। घर लाए। नइहर के लिए विदा करने का छल किया और पूर्ण गर्भ की दशा में मुझे घर से निकाल बाहर किया। अब आप ही बताएँ कि मेरा चित्त उनसे कैसे मिल सकता है? .........सो हे गुरुवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगी। दो पग घर की ओर चलूँगी। अयोध्या के लिए पयान करूँगी, ........पर अयोध्या नहीं जाऊँगी।‘‘

सीता के मुख पर न हर्ष था, न विषाद।

वह गुरु वशिष्ठ के साथ दो पग चलीं और फिर उन्होंने अपने पाँव धरती में रोप दिए।

(एक लोक गीति-कथा की पुनर्रचना)

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रूमानी कहानी 'ट्राम नंबर 5 और बोहेमियन धुन' — गीताश्री

5/26/2016 09:46:00 pm टिप्पणी करें

रूमानी कहानी 'ट्राम नंबर 5 और बोहेमियन धुन' — गीताश्री

“तुम जिसे खिलाने की कोशिश कर रहे हो, मेरा नाम वही है। इसकी उत्तेजना मत बढ़ाओ। इतना मत छुओ इसे, डालियां गर्भवती हो जाएंगी।” 

Romantic Hindi Kahani

Tram No. 5 aur Bohemian Dhun - GeetaShree 


कहानी को पढ़ता पाठक कहानी के शिल्प में डूब जाए और शब्द चित्र बन जाएँ, छोटा सा वाक्य दृश्य बन जाए और कहानी में लिखी प्रकृति उसके फूल-बादल-और-हवाएं उसे छूने लगें... ऐसी है गीताश्री की ‘ट्राम नंबर 5 और बोहेमियन धुन’। हिंदी कहानी में नयी-बासंती-बयार उतर रही है। इनदिनों गीताश्री की कहानियों में आया नयापन विस्मृत किये जा रहा है, यह वही नयापन है जिसे मैंने शब्दांकन पर उनकी पिछली कहानी  'डाउनलोड होते हैं सपने' के समय भी बताया था. गीताश्री की कहानी पर कथाकार उषाकिरण खान ने अपनी फेसबुक वाल पर कहा है —

जनसत्ता मे गीताश्री की चमत्कृत करनेवाली कहानी पढ गयी । पात्रों के साथ लेखक का ग़जब तादात्म्य है।
अलग से -- मै वंदना राग के आकलन की तसदीक करती हूँ। तुम्हारा बढा हुआ क्षेत्र बहुत सारी अच्छी कहानियाँ लिखवायगा।
बधाई गीताश्री !

कथाकार वंदना राग के जिस आकलन की उषाजी तसदीक कर रही हैं वह उन्होंने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा था, जो कुछ यों है —

हाल ही में गीताश्री की कहानी जनसत्ता में पढ़ी और वासंती बयार से मानो छू गयी. गीता का नायक, चेक संगीत का जादूगर दोज़र्क, नायिकाओं के दोहरे चरित्र वाली दो नायिकाओं का प्रतिबिम्ब मन में धंस गया . जैसे धंस गया है मैगनोलिया. मैग्नोलिया जो आशा का परम द्योतक है और , अवसाद में भी इच्छा और कामना का बेहतर भविष्य सृजित करता है. सुन्दर कहानी की बधाई गीताश्री .सोचा था अपनी बात तुम्हारी कहानी डाउनलोड होते सपने से शुरू करुँगी लेकिन, देर होती चली गयी और एक युवा लड़की के संघर्ष और शोषणकारी मान्यताओं से मेरी मुठभेड़ कराती तुम ले आई मुझे एक ऐसे संसार में जहाँ सबकुछ सुन्दर तो है, अहलदा भी है इस देश से लेकिन फिर भी स्त्री के सवालों की connectivity और निरंतरता वैसे ही बनी हुई है जैसे सृष्टि के अन्य व्यापक कोनों में. इसी स्त्री की बात तुम तरह तरह से कहती हो. अच्छा लगता है. Marx की बात याद आ रही है" हमारे पास कुछ भी नहीं है खोने के लिए अपनी जंज़ीरों के अलावा" , यह युक्ति हर उस व्यक्ति के लिए है जिसे संघर्ष कर एक नयी दुनिया बनानी है. इसीलिए तोड़ना तो होगा ही बहुत कुछ ... गर्व से तोड़ डालो सारे ब्राह्मणवादी और शुचितावादि फरमान. पुनः बधाई.


आपका बहुत वक़्त तो नहीं लिया न ? कहानी पढ़िए... और अपनी टिप्पणी भी दीजियेगा.

दिल से

भरत तिवारी


ट्राम नंबर 5 और बोहेमियन धुन — गीताश्री


वह मुस्कुराती हुई सामान समेटने लगी। उसे जल्दी थी। उसका ट्राम छूट रहा था। उसने हौले से बाय कहा... उसने जोर से थैंक्यू कहा। गेस्ट हाउस की हवा में कुछ आत्मीय संवादों की गुंजाइश बनी। वह भी पीछे-पीछे ट्राम के लिए निकला पर गली में कहीं वह नजर नहीं आई। 
रोज की तरह वह सुबह-सुबह उस वीरान से ‘लतुस्का’ गेस्ट हाउस में घुसी और खाली पड़े रसोई में रौनक भरने लगी। अपने साथ लाई गई चीजें उसने टेबल पर सजाना शुरु कर दिया। गेस्ट हाउस में दस गेस्ट ठहरे हैं, सुबह उनके नाश्ते का इंतजाम उसी के जिम्मे हैं। सारे अतिथि सुबह उठते तो टेबल पर सबकुछ सजा होता। अकेली एक स्त्री उन्हें इशारा करती। जब सब खा चुके होते तो वह चुपचाप सारा सामान समेटती और गेस्ट हाउस से निकल जाती। किसी से बात नहीं करती और न किसी को मौका देती कि कोई सवाल पूछे। उसका यहां के लोगों से बस इतना-सा ही रिश्ता था कि वह सुबह-सुबह सबकी भूख मिटा देती थी। वह खामोश-सी औरत मुसकुराना भी नहीं जानती थी। एक कोने में बैठ कर वह अतिथियों के खाने का नजारा लेती और बीच में कभी न पड़ती। सब कुछ जैसे अपनी जगह पर धरा होता था। सीमित व्यंजन थे। रोज वहीं मेन्यू। लोग भले नए। पहली बार कोई वहां लंबे समय के लिए ठहर गया। वह आम लोगों जैसा नहीं था कि चुपचाप कुछ भी खा लेता। वह खाने को ऐसे घूरता जैसे सामने कोई चुनौती रखी हो और जिसका सामना उसे मजबूरन करना है। ठंडे बन्स, उबले अंडे और उबली हरी सब्जियों को देख कर वह ठंडी सांसे छोड़ देता। वह देखती कि बेमन से अपनी प्लेट में सारी चीजें लेता और उसी अंदाज में खाता। बाकी लोग बातें करते और खाते जाते। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि खाने में फाइव स्टार होटल जैसा प्रचुर भंडार नहीं है। इस वीराने गेस्ट हाउस में जो मिल जाता, उसे खा कर संतुष्ट थे। सिर्फ एक आदमी को छोड़ कर जो हर सुबह आतंकित रहता। वह समझ रही थी और ऊब और परेशानी की लकीरें उस आदमी के चेहरे पर साफ दिखने लगी थीं।

वह रोज सुबह कमरे से निकलता तो थोड़े रंग और एक माउथ-आर्गन जेब में रख लेता। यूरो रखना भले भूल जाए पर पेंट और ब्रश रखना नहीं भूलता। पिछले एक महीने में जान गया था कि पेंट और माउथ -आर्गन ज्यादा कीमती है किसी भी रुपये, पौंड और यूरो से। हुसैन-सी दीवानगी का शिकार तो था उसकी दीवानगी कुछ अलग तरह से निकलती थी। ठंड से सिहरती आंखों से वह उस सुंदर शहर में रोज खाली वस्तुएं ढूंढता है। उस शहर में अपनी छवि रंग टपकाते पेंटर की तरह नहीं छोड़ना चाहता था। हाथ में मोटा ब्रश लेकर, रंग टपकाती कनस्तर लेकर चलने के खुमार से वह खुद को ऊपर उठा चुका था। इस शहर में न कोई लावारिस कार दिख रही थी न किसी की टूटी-फूटी बदरंग दीवार जिसे पोत -पोत कर अपने मन का गुबार निकाल सके। पिछले एक हफ्ते से आवारा आंखें आवारा चीजों की तलाश में हैं।  सुबह का उबाऊ, ठंडा नाश्ता किसी तरह गटक कर गेस्ट हाउस से बाहर निकल आया। अप्रैल के महीने में भी बाहर हल्की ठंडी हवाएं चल रही थीं। मफलर की जगह अपने देसी गमछे को गले में लपेटता हुआ वह लंबी गली पर चल पड़ा जो कुछ दूर जा कर पक्की सड़क से मिल जाती थी। वहीं से उसे प्राग के नेशनल आर्ट गैलरी में जाने की ट्राम मिल जाती थी। पिछले कुछ दिनों से यही उसका रुटीन था। नेशनल गैलरी में उसकी पेंटिग्स की प्रदर्शनी एक महीने तक चलेगी। रोज वहां जाना अनिवार्य था। ट्राम नंबर 5 आ चुकी थी। झट से ऊपर चढ़ गया। सड़क पर चलती ट्राम उसे बहुत मजेदार लगती। रोज इसी से सफर करता था। ट्राम ने देवप्रकाश को और देव ने ट्राम को अच्छे से पहचान लिया था। खिड़की से लगातार बाहर देखता रहता। वह हरियाली ढूंढ रहा था। चारों तरफ पेड़-पौधे निर्वस्त्र दिखाई दे रहे थे।

“ओह... कैसे समय में मैं आया कि प्रकृति इतनी वीरान...” वह मन ही मन झुंझला उठा। एक महीने में अगर प्राग में प्रकृति का यही हाल रहा तो वह यहां का लैंडस्केप कैसे बना पाएगा... क्या भरेगा इन पेड़ों के चित्रों में... पत्ते कैसे होंगे... फूल कैसे आते होंगे... खिलते होंगे तो शहर का चेहरा कितना बदल जाता होगा। अपने लैंडस्केप के लिए वह प्राग के लैंडस्केप को जी भर जीना चाहता था। उसे कैमरे में कैद करके भारत लौटना चाहता था ताकि वहां बड़े कैनवस पर उन्हें उतार सके। ट्राम से उतरने के बाद गैलरी तक पैदल पांच मिनट की दूरी थी। गैलरी से पहले एक छोटा सा मकान पेड़ो से घिरा हुआ दिखता था। खूब पेड़ लगे हुए पर सब पत्रहीन गाछ। निर्वस्त्र पेड़ों को देखकर उसे अजीब-सी वितृष्णा होती। बेवजह उदासी चुपचाप उसके चेहरे पर पसरने लगती। फिर भी उधर से गुजरते हुए रोज वहां ठिठकता, उन्हें छूता और कुछ देर वहां बैठना चाहता। पेड़ों के पास एक टूटी हुई बेंच रखी नजर आई। वह धम्म से वहां बैठ गया। उसे बैठना अच्छा लगा। बेंच को एक पेड़ की टहनियां छू रही थीं। उसने हौले से उसे खींचा... उसे सहलाया... बहुत कोमल थी जैसे प्राची की हथेलियां। प्राची उसके करीब आई ही क्यों, क्या सिर्फ एक बच्चे के लिए उसका इस्तेमाल किया और छोड़ गई ? या उसे पेंटर से फैशिनेशन था? उसने बहुत कुछ छिपाया मुझसे। अपना शादीशुदा होना भी और बच्चे की चाहत भी। जाते समय वह व्यथित नहीं, बहुत शांत और भरीपूरी दिख रही थी। सबकुछ खत्म हो रहा था उसकी तरफ से, मैं टूट रहा था दूसरी तरफ। अपने किरचों से ही लहूलुहान, उसका बहाना भी अजीब, पति की नई नौकरी मैड्रिड में लगी है। जाओ प्राची, किसी दिन आऊंगा पीछा करता हुआ, तुमसे जवाब मांगने और शायद उसे देखने जिसकी आशंका प्रबल है मुझे। हो न हो... वो मेरा ही अंश है... उसका चेहरा देखूंगा एक बार... आऊंगा। ओह... प्राची यहां भी साथ चली आई। उसने पेड़ को भरपूर निगाहों से देखा। उसके तने को, शाखों को छू-छू कर देखता रहा, पेंट निकाला और उसके मोटे तने पर रंग-बिरंगे फूलों का गुच्छा बना दिया। थोड़ी देर बाद वह माउथ-आर्गन पर कोई दर्द भरा नगमा बजा रहा था।

सुबह नाश्ते से पहले भी यही धुन बजाने लगा। वह स्त्री प्लेट उठाती हुई ठिठक गई। पलट कर उसे देखा, चेहरे पर पहली बार उसे हरियाली नजर आई। भावहीन चेहरे पर स्मित-सी आई और लोप हो गई। फिर काम में लग गई। काम में जरा तेजी जरूर आ गई। वह और उत्साह में भर कर बजाने लगा। उसे लगा कि कोई कद्रदान मिल गई। वह उसे टोकना चाहता था। कहे तो क्या? क्या पता अंग्रेजी आती भी है या नहीं ? यहां तो भाषा बड़ी समस्या है। या तो चेक बोलते हैं या थोड़े बहुत जर्मन। अंग्रेजी बोलने-समझने वाले कम हैं। फिर भी वह उस स्त्री को कुछ कहेगा। माउथ-आर्गन जेब में रखता हुआ उसके पास गया —

“हैलो मादाम ! यू नो इंगलिश ?”

वह सिर हिलाई-

“यू नो... दिस सॉंग... हिंदी फिल्मी... ये अपना दिल...”

वह मुस्कुराती हुई सामान समेटने लगी। उसे जल्दी थी। उसका ट्राम छूट रहा था। उसने हौले से बाय कहा... उसने जोर से थैंक्यू कहा। गेस्ट हाउस की हवा में कुछ आत्मीय संवादों की गुंजाइश बनी। वह भी पीछे-पीछे ट्राम के लिए निकला पर गली में कहीं वह नजर नहीं आई। वह गली में मस्त धुन बजाता हुआ चलता रहा। उसे उन फूलों की याद आ रही थी जो अभी तक खिले नहीं थे, जिसका नाम तक नहीं जानता था और जिसके खिलने का इंतजार था ताकि उसकी पेंटिंग बना सके।
Tram No. 5 aur Bohemian Dhun - GeetaShree

गैलरी जाते समय शाखों को हिला गया। बड़बड़ाते हुए- “तुम अब खिल भी जाओ... मेरे जाने का वक्त आ रहा है।“ डालियां हिलीं तो कोंपले कंपकंपाई होंगी। शाम को उसके साथ बैठना था। दिन भर कला-प्रेमियों का तांता लगा रहता है। गैलरी के ठीक सामने सिटी सेंटर है और उसके एक छोर पर ओपेरा-हाउस। शाम तक आर्ट गैलरी भरी रहती है। कला-प्रेमियों और संगीत प्रेमियों से। कुछ पर्यटक भी होते हैं जो टाइमपास के लिए गैलरी का चक्कर लगा लेते हैं। इंडियन तो बिल्कुल अंदर नहीं आते। कुछ इंगलिश स्पीकिंग लोगों को चित्रों के बारे में समझाना पड़ता है। कुछ लोग कैटलौग लेकर पढ़ते हुए घूमते हैं तो कुछ लोग चित्रकार को खोजते हैं। फोटो खिंचवाते हैं... यह सब दिन भर चलता है। बीच बीच में वाई-फाई का फायदा उठाते हुए दिल्ली के कला समीक्षक विनय सरदाना से बात कर लेता है।

उसने चैट से नजर ऊपर उठाई । उसकी पेंटिग के सामने एक औरत की पीठ दिखी। सफेद और बादामी रंगों की लंबी पतली जैकेट पहन रखी थी। लंबी बूट और छोटा-सा पर्स। वह पीठ कुछ जानी पहचानी-सी लगी। गैलरी के कोने से उठा और उस औरत तक पहुंच गया। वह उत्सुक था कि देर से वह एक ही पेंटिग को देख रही थी। वह सोल्ड थी। उस पर लाल बिंदी चिपकी हुई थी। औरत की पीठ स्थिर थी। अपलक उसे देख रही थी। देव ने चकित होकर अपनी पेंटिग को उस औरत की निगाह से देखा।

“आप... यहां ?” उसने हाथ बढ़ाया मुस्कुराते हुए। हक्का-बक्का देव ने हाथ मिलाया। उसे सहसा यकीन ही नहीं हुआ कि वह सुबह वाली स्त्री यहां मिल जाएगी।

“मेरा घर यही पास में है। मैं अक्सर शाम को यहां आती हूं।”

वह टूटी फूटी अंग्रेजी में यही बता रही थी।

उसने गैलरी के सामने चौराहे की तरफ इशारा किया-“वहां चलें, बीयर हो जाए।“

सामने हार्ड रॉक कैफे दिख रहा था।

“आपने अपना नाम नहीं बताया?”

देव ने सकुचाते हुए पूछा। बियर की ठंडक गले के अंदर लकीर-सी खींचती चली गई थी। भीतर मौसम बदल रहा था।

“आपने भी तो अपना नाम नहीं बताया मि. देव”

वह शरारती हंसी थी।

”आप मेरा नाम जानती हैं? ओ एम जी !!  देव ने माथा ठोका।

उसने अपना हाथ बढ़ाया, बियर का ग्लास थामी हुई हथेलियां खाली न थीं कि हाथ मिलातीं। देव ने अपना हाथ वापस ले लिया। कुछ देर चुप्पी छाई रही। जैसे उसके होंठ नाम बताना नहीं चाह रहे हो। देव को लगा, उसे यहां से उठ कर सीधे वहां चला जाना चाहिए, जहां कुछ डालियां, कुछ तने और एक बेंच उसका इंतजार करते हैं हर शाम। अचानक इस तरह उठ कर जाना अभद्रता होगी। उसके चेहरे पर असमंजस और ऊब के भाव वह पढ़ सकती थी।

“आप जा सकते हैं... मैं यहां कतई बोर नहीं होऊंगी। मैं यहां कुछ पढ़ लूंगी या दोजार्क की सिंफनी सुनूंगी।”

“दोझार्क की सिंफनी न. 7 मेरी फेवरेट है, मैं उसे माउथ-आर्गन पर बजाने की कोशिश करता हूं, सुनाऊंगा कभी।”

उसने हाथ पकड़ लिए। बियर के मग से ठंड़ी हथेलियां उसे कंपकंपा गई। नस-नस में ठंड घुसी चली जा रही थी। बमुश्किल हाथ छुड़ा कर वह निकल पाया। वहां सरपट भागता हुआ उन पेड़ों के पास आकर रोज की तरह उन्हें छूने, सहलाने लगा। देर तक वहां बैठा रहा।

“तुम जिसे खिलाने की कोशिश कर रहे हो, मेरा नाम वही है। इसकी उत्तेजना मत बढ़ाओ। इतना मत छुओ इसे, डालियां गर्भवती हो जाएंगी।”

देव चौंक गया। कोई स्त्री स्वर था, जिसे हजारों की भीड़ में भी पहचान सकता था। वह आवाज यहां कैसे... पलट कर गेट की तरफ देखा। कोई स्त्री साया धीरे-धीरे इमारत की तरफ जाते ही लोप हो गया। गेट हौले-हौले हिल रहा था। देव उठकर गेट के अंदर भागा। वह साये का पीछा करना चाहता था। घर का दरवाजा बंद था। क्या वो यहां रहती है? क्या वह रोज उसे यहां देख रही है ? उसके पागलपन को, उसके दीवानेपन को, एक पेड़ के प्रति, फूल के प्रति। रोज वह माउथ-आर्गन सुनती है पर उसने कभी भनक न लगने दी। कल सुबह उससे बात करूंगा। मन में आया कि दरवाजा खटखटा दे। कुछ सोच कर सहम गया। पता नहीं अंदर कौन-कौन हो और फिर अनजाने देश में कोई समस्या खड़ी हो जाए। मन मार कर देव लौटने लगा। ट्राम नं.5 का वक्त हो गया था।

सुबह नाश्ते के लिए झटपट वह उठ कर डाइनिंग हौल की तरफ भागा। आज बात करेगा उससे। नाम पूछ कर रहेगा। नहीं तो उसके सहयोगी से पूछेगा।

कल शाम की रहस्यमयी आवाज उसका पीछा कर रही थी। नाश्ता वैसे ही सजा हुआ था पर वह नदारद थी। सब लोग चुपचाप नाश्ता कर रहे थे। उसका सहयोगी चीजों को करीने से सजाने में लगा था।

“वो मैडम क्यों नहीं आईं ?”

 “फिलहाल कुछ दिन नहीं आएंगी हाना मैम। उनके बेटे की तबियत खराब है। घर पर कोई देखने वाला नहीं। क्रेच में बीमार बच्चे को रखते नहीं।“

उबले अंडे, सूखे ब्रेड के साथ मुंह में ठूंसता हुआ गैलरी के लिए चल पड़ा। उसे कुछ खाली-खाली-सा लग रहा था। वह ट्राम नं. 5 पकड़ कर देविश्का चौराहे पर उतरा और सीधा पेड़ के पास बेंच पर बैठ गया। गैलरी जाने और किसी से मिलने, बात करने का मूड नहीं हो रहा था। शाखों पर कोंपले आ चुकी थीं। उसके अंदर से गुलाबी-सफेद कलियां झांक रही थीं। माउथ-आर्गन पर कोई इंगलिश धुन बजाने लगा।


“तुम बसंत जल्दी ले आए... तुमने उसे खिला दिया। मैंने कहा था न ज्यादा उत्तेजित मत करो “

पीछे से पहचानी-सी आवाज आ रही थी। देव सुखद आश्चर्य में गोते लगा रहा था।

“हाय... मेरा नाम मैगनौलिया उर्फ् हाना है। तुमने जिसे खिला दिया, उस फ्लावर का नाम भी यही है। मैं बसंत के दिनों में ही पैदा हुई थी, इसलिए मेरे माता-पिता ने यह नाम रखा। गुलाबी-सफेद रंगों वाली मैगनौलिया। वह बेंच पर उससे सट कर बैठी थी। कोई मादक-सी खूशबू उसके बदन से निकल रही थी।

“मेरा ब्वायफ्रेंड मुझे छोड़ गया, जब मैं प्रिगनेंट थी। वह काफ्का के लिटरेचर पर रिसर्च कर रहा था।“

देव ने माउथ-आर्गन पर सिंफनी बजाने की कोशिश करने लगा। हाना ने रोका-

“तुम पक्के बोहेमियन हो, कहां 19वीं शताब्दी में पहुंच गए हो? इस धुन को आज छोड़ दो, आज तो हमें दोर्जाक की “न्यू वर्ल्ड सिंफनी” सुननी चाहिए। बजाओ ना... सुना है या नहीं... सिंफनी नं.9। मैं सुनाऊं... बसंत का स्वागत इस धुन से करो”

हाना ने मोबाइल पर वह सिंफनी बजा दी। देव को लगा अचानक वह बियावां से निकल कर घने जंगल में पहुंच गया है, पेड़ों से पानी की बूंदें झर रही हैं, झाड़ियों से रोशनी फूट रही है, हिरनें कुलांचे भर रहे हैं... गुलाबी-सफेद फूलों से प्राग के सारे पेड़ लद गए हैं। यह सब एक बड़े कैनवस पर कोई पेंट कर रहा है।

वह सुनने के बजाय देख रहा था ।
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जल रही है धरती उबल रहे हैं लोग — सोशलिस्ट फैक्टर — भरत तिवारी

5/25/2016 02:52:00 pm 1 > टिप्पणी

Editorial on 'global warming and photography' in 'Socialist Factor' weekly by Bharat Tiwari.

Socialist Factor 22 May 2016

जल रही है धरती उबल रहे हैं लोग - भरत तिवारी

आग और पानी से हम बहुत खेले. यह भूल के कहीं उन्होंने हमारे साथ खेला तब क्या होगा. आग आसमान से भी बरस रही है और ज़मीन से भी, और ये सिर्फ हमारे शहर, हमारे प्रदेश या देश में नहीं हो रहा है, कमोबेश सारी दुनिया में ऐसा हो रहा है. राजधानी क्षेत्र दिल्ली में आग ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया दफ़्तर पर हमला किया, यह खुशकिस्मती रही की कोई आहत नहीं हुआ और अगले रोज़ का टाइम्स ऑफ़ इंडिया प्रकाशित भी हुआ. मगर ग़ाज़ियाबाद में इंडिया मार्ट के दफ़्तर में लगी आग से पाँच युवा झुलस के मर गए.  उत्तराखंड और हिमाचल के जंगलों की तरफ़ देखें तो हालात बार-बार बेक़ाबू होते नज़र आते हैं। जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती पुंछ के जंगलों में आग से बारूदी सुरंगों में विस्फोट होने की ख़बर है। एक वाक्य में कहा जाये तो सारे देश में आग लगी हुई है या फिर सारे विश्व में ? कैनाडा के अलबर्टा के जंगल में लगी आग की भीषणता को कैसे लिखा जाए, यहां आग के चलते पूरे शहर को ख़ाली कराना पड़ा, ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ऐसी हज़ारों घटनाएँ हैं और उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। नासा से आने वाली ख़बर डरा और चेता दोनों रही है, बीते अप्रैल का महीना मौजूद आंकड़ों के हिसाब से अब तक का सबसे गर्म अप्रैल रहा है। इसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता था लेकिन नहीं क्योंकि बात सिर्फ इस एक महीने की नहीं है, इसके पहले बीते एक-के-बाद-एक ६ महीनों ने भी गर्म महीनों के रिकॉर्ड को तोड़ा है। मतलब विश्व में गर्मी का स्तर लगातार विस्मयकारी रूप से बुरी दिशा में बढ़ रहा है। इसे प्राकृतिक मानना खुद को धोखा देना होगा। और ऐसा क्यों हो रहा है यह पूछना मूर्खता। जिम्मेदारी फौरन समझने पर ही कुछ हो सकता है, वरना आप खुद समझदार हैं  क्योंकि जो तस्वीर बन रही है वह बहुत भयावह है।

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पिछले दिनों तस्वीरों की एक प्रदर्शनी में जाना हुआ। इंडिया फोटो आर्काइव फाउंडेशन द्वारा, नौ नवोदित छायाकारों को ‘world of recycle’ यानी ‘कूड़ा-कबाड़ की दुनिया’ जैसे ज़मीनी मगर समाज से कटे मुद्दे की तस्वीरें उतारने के लिए दी गयी ग्रांट का नतीजा, इस प्रदर्शनी में बहुत सुन्दर फ़ोटोग्रा़फ्स देखने को मिले। फोटोग्राफी, समय को चित्रों में बाँधने-वाली अतिमहत्वपूर्ण कला है। ऐसी कला जो सभी-को आकर्षित करती है और जैसा अन्य कलाओं के साथ है छायाकारी भी गंभीर साधना मांगती है – यह कैमरे से खींची गयी कोई-भी तस्वीर नहीं है। कुछेक वर्ष हुए, मुझसे देश के एक बड़े छायाकार ने कहा था – जब तुम 10,000 फोटो खिंच लेना उसके बाद ही यह सोचना कि तुम तस्वीरें खींचना सीख सकते हो... आज मुझे लगता है कि इसमें एक-दो जीरो और बढ़ा देने पर भी, कोई तब तक छायाकार नहीं बन सकता यदि उसके पास लैंस से दुनिया देखने की नज़र और गुरु का साथ नहीं मिले। जहाँ तक गुरुओं की बात है, तक़रीबन सारी दुनिया में ही फोटोग्राफी-कलाक्षेत्र में गुरुओं की कमी है खासकर नए छायाकारों के मार्गदर्शन के लिए। और यदि कोई सिखाने वाला होता भी है तो उसकी मोटी-फीस बीच में आ जाती है नतीज़तन नए छायाकारों और फोटोग्राफी-कला दोनों को ही नुकसान पहुँचता है। ऐसे समय में निराशा को दूर करने वाले ‘इंडिया फोटो आर्काइव फाउंडेशन’ के आदित्य आर्या और पार्थिव शाह इस प्रोजेक्ट के जूरी सरीखे लोग भी हैं जो अनुदान दे कर फोटोग्राफी और फोटोग्राफर दोनों की सहायता कर रहे है। उनको दिल से धन्यवाद वरना इतनी जिंदा तस्वीरें पैदा ही नहीं हो पातीं।

भरत तिवारी
mail@bharattiwari.com

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कैंपस लव - बेहतरीन प्रेम कहानी - आकांक्षा पारे

5/22/2016 08:30:00 am 1 > टिप्पणी

Campus love कैंपस लव - बेहतरीन प्रेम कहानी - आकांक्षा पारे

Campus love 

a beautiful love story by Akanksha Pare

मैंने मिताली को फोन किया और पहले दो-चार यहां-वहां की बातें करने के बाद बताया कि ‘उसका’ फोन आया था। मैंने उसका पर कुछ अतिरिक्त दबाव बनाया मगर यह मिताली काहिल ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। मैं फोन पर भी महसूस कर सकती थी कि वह निकम्मी उछल कर बिस्तर पर नहीं बैठी और न ही उसने अपनी आंखें चौड़ी कर कहा, ‘हें। क्यों। बता न। पूरी बात बता न प्लीज।’ 
कैंपस लव


मैंने अपने दोनों हाथों की बीच की उंगलियां तर्जनी उंगली पर चढ़ाई और इस ‘क्रॉस द फिंगर’ के टोटके के साथ उसका मोबाइल नंबर डायल कर दिया। इससे पहले भी कई बार उससे बात कर चुकी हूं, लेकिन उस दिन कुछ खास था। कई बार होता है कि उसे फोन नहीं लगता, नेटवर्क बिज़ी आता है। धड़कते दिल के साथ मन कह रहा था, फोन न लगे तो ही अच्छा। पर मन का हमेशा हो जाए ऐसा कहीं संभव है क्या। मेरे कान से ज्यादा दिल उसके फोन पर बज रही घंटी सुन रहा था। घंटी जाते ही मन किया फोन काट दूं। पसोपेश में पड़ी काटूं या चालू रखूं कि खुद से बहस में पड़ी कोई फैसला लेती उससे पहले ‘हां बोल’ की उसकी आवाज कानों में पड़ गई। सेकंड भर के लिए मेरे हाथ कांप गए। मैंने बहुत संभलते हुए कहा, ‘तुमसे कुछ बात करनी है।’

‘हां बोल।’

‘नहीं वो क्या है न कि बात थोड़ी लंबी है। जब समय हो तब कहना।’ मैं किसी भी सूरत में फोन रख देना चाहती थी।

‘टाइम है मेरे पास। तू बोल।’

‘मैं कह रही थी कि... कि मैं जो भी पूछूंगी, बस हां या न में ही जवाब देना। और कुछ मत बोलना।’

‘ओए सुबह भांग पी है क्या। हां या न में बोलना। पुलिस भी ऐसे नहीं बोलती। चल छोड़ बोल, क्या हुआ।’

‘नहीं बस मेरी यही छोटी सी शर्त है। सिर्फ हां या न। दोनों में से जिसे चुनो मुझे कोई तफसील नहीं चाहिए।’

‘अब बोल भी दे रे बाबा। सुबह-सुबह पका मत।’ यह उसका स्टाइल है। धैर्य नाम की चिड़िया से तो उसका कोई संपर्क ही नहीं है।

‘क्या हम... मेरा मतलब है क्या मैं तुम्हारे साथ हमेशा रह सकती हूं’

‘सुन तू...’

‘मैंने कहा न हां या न’

‘देखो तू जास्ती होशियार मत बन...’

‘हां या न’

‘...’

लगभग आठ-नौ मिनट ऐसी ही खामोशी छाई रही और जब कोई और हलचल नहीं हुई तो मैंने फोन काट दिया। यह मेरी उससे आखिरी बातचीत थी लेकिन यही मेरी प्रेमकथा का आखिरी चैप्टर भी था। कॉलेज के पूरे साल भर जो खुमारी मुझ पर तारी रही थी उसका अंत हो गया था। इसके बाद होना तो यह चाहिए था कि मुझे बिसूरना था, टसुए बहाने थे, ये मोटे-मोटे। अंधेरे कमरे में बंद हो कर दर्दभरी गजलें सुननी चाहिए थी या आत्महत्या की एक तरकीब तो सोचनी ही चाहिए थी। पर मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने मिताली को फोन लगाया और बस इतना ही कहा, ‘मेरे को भी मना कर दिया।’ हां यह बोलते हुए मेरी आवाज जरा उदास थी। फिर भी मिताली हंसी और जब मैंने ऐतराज जताया तो उसने आवाज थोड़ी संजीदा करते हुए बस इतना ही कहा, ‘तेरे को भी।’ उसकी आवाज में दुख कम और अचरज ज्यादा था। मुझे दुख हुआ कि वह मेरे दुख में अच्छी तरह शामिल नहीं हो रही है, पर ठीक है जब उसने मिताली को मना किया था तब मैंने कौन सा किलो-दो-किलो दुख जता दिया था। सो मिताली ने ‘टिट फॉर टैड’ यानी जैसे को तैसा टाइप व्यवहार मुझ से कर दिया था। उसके बाद मैंने और मिताली ने थोड़ी गमभरी बातें की, अपने भाग्य को कोसा और दुख जताया कि आखिर हम में क्या कमी है जो उसने मना कर दिया। अगर रविवार का दिन होता तो हम इस रिजेक्शन पर लंबा तफसरा कर सकते थे। पर हम दोनों को ही दफ्तर पहुंचना था सो हमने बातचीत की दूसरी किस्त के लिए रात का समय तय किया और मैंने अपने ताजे रिजेक्शन को बासी ब्रेड के दो पीस के बीच दबाया और गम चबाते हुए चल दी।
हिंदी कहानी: डियर पापा - आकांक्षा पारे | Hindi Kahani

हां तो आज उस गमनुमा रिजेक्शन की याद इसलिए कि कुछ नहीं तो कम से कम तेरह साल बाद आज मैंने उसकी आवाज सुनी। आवाज उतनी बेपरवाह लग रही थी, पर कुछ जिम्मेदार भी नहीं लगी मुझे तो। अब इसे कोई मेरी जलनखोरी कहे तो कहे। भई जो सच्चाई है वह तो वही रहेगी। इस बार भी मैंने वही किया जो तेरह साल पहले किया था। पर उतनी उतावली में नहीं। मैंने मिताली को फोन किया और पहले दो-चार यहां-वहां की बातें करने के बाद बताया कि ‘उसका’ फोन आया था। मैंने उसका पर कुछ अतिरिक्त दबाव बनाया मगर यह मिताली काहिल ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। मैं फोन पर भी महसूस कर सकती थी कि वह निकम्मी उछल कर बिस्तर पर नहीं बैठी और न ही उसने अपनी आंखें चौड़ी कर कहा, ‘हें। क्यों। बता न। पूरी बात बता न प्लीज।’ उसने उतने ही रूखेपन से कहा, ‘अच्छा है चल दोबारा दोस्ती हो गई।’ ‘दोस्ती नहीं हुई उसे मुझ से काम है। इसलिए उसने फोन किया।’ ‘हां तो ठीक है न काम के बहाने ही सही बात तो की।’ ‘अरे चोर तुझे बिलकुल गुस्सा नहीं आ रहा है। तेरह साल बाद उसने मुझे फोन किया है। तेरह साल बाद। तू भूल गई उसने हमें अपनी शादी में भी नहीं बुलाया था।’ ‘तो हमने कौन सा उसे बुला लिया।’ ‘पर शुरुआत उसने की न। पहले उसने नहीं बुलाया तो हमने नहीं बुलाया।’ ‘अच्छा चल छोड़। तू तो ये बता उसे काम क्या आ गया उससे।’ ‘जब तेरे को कोई मन ही नहीं सुनने का तो मैं क्यों बताऊं।’ ‘अब ये नखरे तू अपने मियां को ही दिखाया कर। बात बतानी है तो बता वरना मैं फोन रख रही हूं। कल माही की पिकनिक है, उसे सुबह जल्दी स्कूल भेजना है।’ मैंने फिर भी नखरे का एक कतरा रख दिया तो मिताली ने मुझे बहुत प्यार से गुड नाइट बोला और फोन काट दिया। ये मिताली को कोई मन ही नहीं है जानने का कि उसका फोन क्यों आया था। हुंह। मैं कल फिर मिताली को फोन करूंगी और याद दिलाऊंगी कि एक वक्त था कि कैसे तुम उसके पीछे भोपाल तक चली गई थीं और आज उसके बारे में सुनना भी नहीं चाह रही हो। आज भले मिताली उसके बारे में बात नहीं कर रही पर जब भी उसकी बात निकलती मैं और मिताली खूब हंसते। उस हंसी के बीच भी मिताली और मेरे मन में एक जैसी हूक उठती थी। कुछ अनकही सी। हमें उसका प्रेम न मिलने से ज्यादा इस बाद का दुख था कि हम नकारे गए थे। यानी हमें रिजेक्ट कर दिया गया था। हम यानी मैं और मिताली।

उम्र के चालीसवें साल में यह हरकत भले ही बचकानी लगती है कि मुझे और मिताली को एक ही लड़का पसंद था, न सिर्फ पसंद बल्कि हम दोनों ही उस पर जान दिया करते थे। पर उस वक्त यही जीने का सहारा हुआ करती थी। पक्की सहेलियों का तमगा मिला होने के बावजूद जो एक बात हम दोनों ने एक-दूसरे से राज रखी थी वह बस यही बात थी। और जब हमने एक-दूसरे को नहीं बताई थी। और जब बताई तो बहुत देर हो चुकी थी। पर आश्चर्य कि जब हम दोनों ने उसके इश्क में गले-गले डूबे हुए एक-दूसरे पर अपने राज जाहिर किए तब भी हम झगड़े नहीं। अब हम दोनों के सामने एक प्रश्न आ खड़ा हुआ कि क्या किया जाए। पुरानी हिंदी फिल्मों की नायिका निम्मी की तरह हम दोनों में से कोई भी ‘त्याग देवी’ बनने को तैयार नहीं था। ‘और बनना भी नहीं चाहिए। आखिर हम दोनों को ही अपने प्यार को परखना चाहिए।’ नितांत घटिया फिल्मी किस्म का संवाद था पर मिताली ने बहुत संजीदगी के साथ कहा था। तो हम दोनों ने तय किया कि पहले मिताली अपने दिल की बात कहेगी उसके बाद मैं। पर परेशानी यह थी कि कॉलेज खत्म हो चुका था और हम सब अपने काम-धंधे पर लग चुके थे। मैं और मिताली अभी भी अपने शहर में ही थे जबकि वह अपने शहर भोपाल चला गया था। प्रेम का ऐसा ताप चढ़ा था हम पर कि हमने उससे पूछने के लिए भोपाल जाना तय किया। एक अखबार में इंटरव्यू का झूठ बोला और सुबह की बस पकड़ कर लो जी उसके शहर में। पर तब तक हमें पता नहीं था कि ‘बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले’ टाइप का कुछ हमें शाम को दोहराना पड़ेगा। एक और दोस्त को मैंने सारी बात बताई और उसने कहा कि वह उसे अपने कमरे पर बुला लेगा और हम सीधे उसके कमरे पर पहुंच जाएं। पूछते-पाछते जब हम वहां पहुंचे तो वह बगल में अपना हेलमेट दबाए धूप में खड़ा बतिया रहा था। हाय उसे देख कर मन फिर डोल गया। लगा कि मिताली को कहूं, डील कैंसल पहले मैं इसे अपने दिल का हाल बताऊंगी। पर ये शिवानी के उपन्यास पढ़-पढ़ कर दिमाग इतना बौरा गया था कि लगता था सच्चा प्रेम कहीं से भी ढूंढ निकालता है तो मिताली जैसे ही उसे अपने दिल की बात बताएगी वह फौरन कहेगा, मुझे तुमसे नहीं प्रियंका से प्यार है। वह दौड़ कर मेरे पास आएगा और मेरा हाथ पकड़ लेगा। मैं मिताली से कहूंगी कि देख यह होता है सच्चा प्यार। और फिर मैं घर जाकर पापा को सब बता दूंगी और बस एक-दूसरे के साथ जीवन भर।

मेरी सोच को झटका लगाते हुए कपिल ने कहा कि हम दोनों बाहर बैठते हैं और मिताली को उसके साथ कमरे में रहने देते हैं। मैं बाहर दालान में रखे स्टूल पर बैठ गई और मिताली अंदर चली गई। अंदर पता नहीं क्या हुआ पर जब वह बाहर निकली तो उसके चेहरे पर बारह बज रहे थे और हम फौरन ही वहां से निकल गए। उसके बाद बस वह हमारे किस्सों तक सिमट गया। हम जब भी उसके बारे में बात करते, एक-दूसरे को दोष देते, ‘तू वक्त पर बता देती तो कम से कम एक को तो मिल जाता।’ पर हम दोनों ही जानते हैं वह किसी को नहीं मिलता। हम उसकी गिनती में कहीं नहीं थे। न पहले न अब।

मिताली के उसे प्रपोज करने के कोई दो साल बाद जब मेरे घर मेरी शादी की बातचीत शुरू हुई तो मुझे भी इश्क के उस कीड़े की याद आई जो अब तक मेरे दिमाग में कुलबुला रहा था। मैंने मिताली को कहा, कि वह आज भी मुझसे बात तो करता ही है न। तो मुझे लगता कि मुझे भी एक बार उससे पूछ लेना चाहिए। मिताली ने समझाया भी कि यदि ऐसा कुछ होता तो वह अब तक कह चुका होता। पर मैं उसकी याद में ऐसी लैला बनी थी कि मैंने भी फोन पर उससे पूछ ही लिया। होना तो क्या था, कद्दू की जड़ उसके बाद मेरी भी उससे बाद बंद हो गई। यहां तक रहता तो ठीक था, पर उसने यह बात अपने परम मित्र को बताई और उस परम मित्र ने हमारे पूरे ग्रुप को। उसके बाद मैं और मिताली एक तरफ बाकी सब दूसरी तरफ। सुना उसकी शादी हो रही है। हमें उम्मीद थी कि व हमें जरूर बुलाएगा। हमारे सभी दोस्त गए पर उसने हमें शादी में नहीं बुलाया। उस पूरे ग्रुप में मैं तो फिर भी कई दोस्तों से बात करती रही पर मिताली की दोस्ती बस मुझ तक सिमट गई।

पहले हमें भी लगता था कि वह कैंपस लव था। पर जब कॉलेज छोड़ देने के बाद भी, नौकरी में आ जाने के बाद भी वह बदस्तूर वैसे ही याद आता रहा, उतनी ही शिद्दत महसूस होती रही तो लगा नहीं कुछ तो था उस रिश्ते में। कोई कशिश तो थी कि आज भी यदि वह फोन करे तो लगता है, कॉलेज का वहीं गलियारा है और उसे अकेला खड़ा देख कर मैं उसके पास जाकर अपना परिचय दे रही हूं। वह झिझकते हुए से मुस्कराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा कर कह रहा है, ‘हाय आय एम परितोष। परितोष कुलकर्णी।’

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कहानी — सम्पन्नता — राजेन्द्र दानी | Hindi Kahani by Rajendra Dani

5/20/2016 07:30:00 am टिप्पणी करें

कहानी — सम्पन्नता — राजेन्द्र दानी | Hindi Kahani by Rajendra Dani

क्या से क्या और कैसे
ये 'क्या' हो गए हम, 
सोचने को मजबूर करती कहानी है वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र दानी की 'सम्पन्नता'.

सम्पन्नता

— राजेन्द्र दानी


अब तो जवाहरलाल जी के बच्चों के बच्चे भी कहने लगे हैं कि ‘सब कुछ बदल रहा है’ । वैसे वे स्वयं भी जानते रहे हैं कि ‘परिवर्तन ही जीवन है’ और यह उनके समय के पाठ्यक्रम में भी था । पर बच्चे क्यों उन्हें इस बात पर चिढ़ाते रहते हैं? क्या उनकी हरकतें ऐसी है कि वे बदलाव के खिलाफ हैं, और बच्चे बदल रहे हैं? एक बार इसी बात पर उन्होंने बेटे के बड़े बेटे आकाश से चिढ़ में पूछ लिया था- ‘‘तुम लोग क्या बदलना-बदलना की रट लगाए रहते हो, मैं यह मानता हूं कि तुम्हारा कम्प्यूटर बदलकर लैपटाप हो गया था फिर लैपटाप से टेबलेट हो गया है, तुम्हारा मोबाइल फोन अब एन्ड्रायड और स्मार्ट फोन हो गया है लेकिन तुम्हारा बाप तो वही देवी प्रसाद है न मेरा बड़ा बेटा कि वह भी बदल गया?’’

बेटे का बड़ा बेटा आकाश तब थोड़ी दर जवाब देने के लिए असमंजस में रहा पर आखिर में उसने लगभग हंसते हुए कहा- ‘‘ध्यान से देखें और गौर करें तो वे भी तो बदल गये हैं ।’’

इतना बोलकर वह उनके सामने से खिसकने ही वाला था कि उन्होंने कई तरह के संशय में पड़कर फिर चिल्लाकर कहा- ‘‘ऐ आकाश रूको, तुम कहना क्या चाहते हो?’’

आकाश छोटा नहीं था कि डर जाता उनके रूख से, सत्ताइस साल से कम तो वह न था । वह रूक गया और थोड़ी देर सोचने के बाद पूर्ववत हंसते हुए ही कहा- ‘‘आपके बनाए पुराने मकान में जब हम सब थे तो पापा क्या थे... कुछ नहीं, पर ये नया मकान उन्होंने बनाया है, जो कम से कम पांच करोड़ का होगा, तो वे अब करोड़पति हुए कि नहीं... पहले कुछ नहीं थे अब करोड़पति हैं... बदले कि नहीं?’’

आकाश इस तरह का जवाब देगा, उन्हें आशा नहीं थी । वे तो सोच रहे थे कि वह अपने बाप पर कोई तोहमत लगाने वाला है । उसके जवाब में छिपे इस सत्य से वे इंकार नहीं कर सकते थे कि आकाश के बाप यानि उनके बड़े बेटे देवी प्रसाद ने पिछले पन्द्रह बीस वर्षों में बहुत तरक्की की और अब सब कुछ सुखद है । वे उसके रहते हुए कोई शिकायत नहीं कर सकते कि उसने उनकी फलां-फलां इच्छा पूरी नहीं की । हालांकि वे यह भी जानते-समझते हैं कि उन्होंने उड़ने जैसी कोई इच्छा उसे नहीं जतायी, तब भी वह सब कुछ करता है और यह भी कि उसे उनकी पेंशन से कोई सरोकार कभी नहीं रहा । वे स्वतः स्फूर्त होकर ही उसे घर की चीजों के लिए खर्च करते रहते हैं पर हमेशा बहुत सी बचत बैंक में ही रही आती है ।

राजेन्द्र दानी

वरिष्ठ कथाकार ‘दूसरा कदम’, ‘उनका जीवन’, ‘कछुए की तरह’, ‘एकत्र’ और ‘भूलने का रास्ता’ जैसे कथा-संग्रहों को मिलाकर अब तक नौ कहानी संग्रह प्रकाशित। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन तथा ‘पहल’ पत्रिका के संपादन में सहयोग।
संपर्क:
15, के.जी. बोस नगर
गढ़ा, जबलपुर - 482003 (म.प्र.)
मोबाइल नं. 09893881396
rajendradani003@gmail.com

वे यह सब और उससे जुड़ी तमाम चीजों को सोचते रहे बड़ी देर तक और उनकी आंखें नम होती रहीं । पत्नी के निधन के बाद वे अक्सर खुद से बतियाते हुए यही सब हरदम सोचते रहते हैं । उनकी तन्द्रा जब टूटी तो उन्होंने देखा कि आकाश जा चुका था । वे सोचने लगे, उसने वे दिन कभी नहीं देखे जो उन्होंने स्वयं देखे थे । उन दिनों को याद करना वे नहीं भूलते पर न जाने क्यों बच्चों को नहीं बताना चाहते। यहां तक कि उन्होंने देवी प्रसाद या उसके छोटे भाई को भी कभी नहीं बताया कि उनकी छोटी सी बाबूगिरी की नौकरी लगने के पहले वे अपनी टुटली साइकिल चलाते हुए अगरबत्ती बेचा करते थे । केवल रूपये दो रूपये की कमाई के लिए वह साइकिल दिन भर में पचास-साठ किलोमीटर तक का चक्कर लगाती थी और शाम होते-होते उनकी पिंडलियां में दम नहीं रह जाता थी । वे बेइंतहा दुखती थीं, जिसे दबाने की इल्तजा वे माता-पिता से नहीं कर सकते थे ।

वे उन दिनों के करोड़पतियों के यहां भी अगरबत्तियां पहुंचाते थे । अगरबत्तियां पहले सजी सजायी दुकानेां मे बहुत कम मिलती थीं । उनके जैसे बहुत सारे लोग ही यह काम करते थे । वे गरीबी के दिन थे । उससे निजात के लिए केवल जवाहरलाल जी ही नहीं छटपटाते थे बल्कि उनके साथ के सभी लोगों के अंदर यह छटपटाहट रही आती थी। जिन बड़े घरों में वे अगरबत्ती पहुंचाते थे वहां के वैभव को विस्मय से देखते । इस विस्मय के पीछे चाहतें और हसरतें आहों के नीचे दबी रह जाती थीं ।

अगरबत्ती के कारखाने पर जवाहरलाल जी जैसे लगभग बीस-पच्चीस साइकिल सवार देर शाम कारखाने के मालिक के पास हिसाब-किताब के लिए इकट्ठे होते, जहां अपना कमीशन काटकर उन्हें भुगतान करना होता, अक्सर भुगतान के बाद निराशा घिर आती, क्योंकि जो कमीशन उन्हें मिलता वह उनकी जरूरतों से बहुत कम होता । वे मंत्रणा करते कमीशन बढ़वाने के लिए, कमीशन बढ़ाने की विनम्र मांग कारखाने का मालिक कभी नहीं सुनता । तभी उन लोगों में से एक ने भैरव सिंह से सबको मिलवाया था । भैरव सिंह लाल झण्डे वाले थे । जब वे सब अपनी चाहतें और हसरतें भैरव सिंह को बताते और तदन्तर अपनी आहों को प्रकट करते तो वे अक्सर यही कहते कि ‘‘इन्हीं आहों के पीछे वास्तविक वर्ग संघर्ष छिपा है । उसे पहचानने और उसके अनुरूप सक्रियता की जरूरत है । एक तुम्हारा वर्ग है और एक कारखाने के मालिक का । इसमें जमीन आसमान का अन्तर है । इस अंतर को तुम लोग ठीक से पहचान लोगे तब तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारी मेहनत से तुम्हारा मालिक बेइन्तहा पैसे कमाता है । मेहनत तुम्हारी पैसे उसके । इसे कहते हैं शोषण ।’’ अपनी जरूरत से ज्यादा कमाना तभी संभव होता है जब आप किसी का जायज हक छीनते हैं, उसका शोषण करते हैं ।

शायद उन्हीं भैरव सिंह के नेतृत्व में एकाध बार के संघर्ष के बाद कारखाने के मालिक ने उनके कमीशन को बढ़ाया था ।

न जाने क्यों? भैरव सिंह की बातों पर तब बाईस साल के नवजवान जवाहरलाल जी रोमांचित हो उठते थे । उन्हें लगता, उनकी रीढ़ में विद्युत तरंगें दौड़ रही हैं और शरीर में एक तेज उर्जा का संचार हो रहा है । वे ज्यादा से ज्यादा समय भैरव सिंह के साथ रहना चाहते पर अपनी मुफलिसी और उस पर बूढ़े मां-बाप की देखभाल की वजह इस बात की छूट नहीं मिल पाती । अक्सर जिस वैचारिक सिद्धान्त और अनुशासन की बात भैरव सिंह करते जवाहरलाल जी को हमेशा लगता कि वे भी तो इसी तरह सोचते रहे हैं । हालांकि वे आश्चर्य में भी पड़े रहते कि यह सब उनके भीतर स्वाभाविक रूप से कैसे है ।

पर जवाहरलाल जी की यह इच्छा, कि वे भैरव सिंह के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजारें, पूरी नहीं हो सकी । उनको एक स्थायी रोजगार दिलाने के लिए सक्रिय उनके आत्मीय लोग एक दिन सफल हो गये और एक सरकारी महकमे में उन्हें बाबूगिरी की नौकरी मिल ही गई । वह छोटा शहर छूटा और साथ में वहां के लोग भी । नौकरी लगने के डेढ़ वर्ष बाद जवाहरलाल जी का विवाह हो गया । फिर उनके पास सिर्फ गतिमान वर्तमान और स्मृतियां रह गईं । उसके बाद जीवन में एक तरह की आपा-धापी शुरू हो गई । वे फिर कभी समझ न सके कि समय दौड़ रहा है या वे खुद बदहवास से दौड़ रहे हैं ।

शायद विवाह के बाद चार वर्ष गुजरे होंगे जब देवी प्रसाद का जन्म हुआ । उसके दो ही वर्ष बाद दूसरे बेटे ने जन्म लिया । अब परिवार का बोझ दुगना हो गया। जवाहरलाल जी ने इसे अपने मजबूत कंधों से उठा लिया और चल पड़े । विरासत में कुछ मिला नहीं था इसलिए सब कुछ खुद ही करना था । उन्होंने भरसक किया भी । यह उनकी बड़ी खुशनसीबी थी कि अभाव और असुविधाओं में भी उनके दोनों बेटे मेधावी निकले । जब तक वे बड़े नहीं हो गये तब तक जवाहरलाल जी ने अभावों में रहते हुए भी बड़ी मशक्कत की । लेकिन इस बीच देश की अर्थव्यवस्था कुछ करवटें ले रही थी इसलिए शायद यह मशक्कत संभव हो सकी । सरकार की ओर से शिक्षा के लिए कर्ज आदि मिलना शुरू हुए जिससे दोनों बेटों की उच्च शिक्षा और आधुनिक शिक्षा संभव हो सकी । इस शिक्षा के चूंकि वे पहले-पहले प्रवीण हुए थे इसलिए नौकरियां मिलने में ज्यादा कठिनाईयों का सामना नहीं करना पड़ा । तब जाकर जवाहरलाल जी निश्चिंत हुए । पर यह निश्चिंतता उनकी सेवा निवृत्ति आते-आते ही उन्हें मिल पायी और अब वे आयु के पचहत्तर वर्ष पार कर गये हैं । घर में सब कुछ है । एक उच्च मध्यम वर्ग का वैभव घर में चारों ओर दिखता है । हालांकि यह वैभव उनका बनाया हुआ नहीं, यह सब बेटों की वजह से सम्भव हो पाया है । इन सब कारणों से जवाहरलाल जी पूरा वक्त अब खुद को परम सौभाग्यशाली मानते हैं ।

वे कभी-कभी सोचते हैं कि वे सौभाग्यशाली इसलिए भी हो गये कि उन्हेांने जीवन संघर्ष में कभी हताशा को अपने इर्द-गिर्द आने नहीं दिया, तभी तो जीवन की शुरूआत के असहनीय अभावों को वे झेलते चले गये । एक प्रश्न यह भी उनके मन में अक्सर उठता कि आज के ये बच्चे क्या इतने सक्षम हैं कि आज जरूरत पड़े तो उस तरह के कष्टों को झेल सकें । इसका जवाब अक्सर उन्हें ‘नहीं’ में मिलता। तब किंचित चिंता में डूबकर वे शुभ की कामना करने लगते हैं । बावजूद इसके विस्मृतियों की गर्द में इतने लम्बे अरसे में भैरव सिंह कहां खो गये, उन्हें पता न चला। वे वर्तमान में जी रहे हैं, उनकी विचार सरणी उससे अनुकूलित है ।

अब तो सारे करीबी रिश्तेदार उन्हीं की तरह सम्पन्न हैं या होते जा रहे हैं । अब ऐसे में भैरव सिंह याद आंए भी तो कैसे? अब तो एकांत में बैठकर वे एक-एक के बारे में विचार करते हैं तो पाते हैं कि उनकी दोनों बहनों के बच्चे भी बेहद कर्मठ निकले । उनके पिताओं ने भी कष्ट झेले और जवाहरलाल जी की ही तरह बेहद संघर्ष किया । वह नैतिकताओं और संतोष के साथ चलने का वक्त था, शायद इसीलिए आज की तरह आर्थिक अराजकता उस दौर में नहीं थी । आज तो वे चीजें भी खरीदी बेची जा रही हैं जिनकी कोई आवश्यकता नहीं है । उन्हें यह खलता भी है तो वे किसी से कह नहीं पाते । पूरे समय तो वे अपने-आप को आज के समय में जी रहे लोगों से घिरा पाते हैं । चाहे वह बेटा देवी प्रसाद हो या उसके दो लड़के और दो ही लड़कियां, जो उनकी दृष्टि में सीमा से अधिक खर्च करते हैं । आश्चर्य उन्हें इस संबंध में बच्चों की खुशी देखकर नहीं अपने बेटे की खुशी देखकर होता है, जिसने अपने समय में कभी इस तरह खर्च नहीं किया और न ही अपने माता पिता पर कभी भार बना । वैसे अब तो घर के अधिकांश लोगों का अधिकांश वक्त खरीददारी करने में ही जाता है और सबके चेहरे खिले हुए दिखते हैं । जवाहरलाल जी इस बात को कभी नहीं समझ पाते कि खुशी और खरीददारी में कैसा रिश्ता है अबके दौर में?

यही सब और इसी तरह सोचते हुए वे एक रात एकांत में बैठे थे तो घर के मेन गेट के खुलने की आवाज आई । उन्होंने सामने की खिड़की से देखा तो देवी प्रसाद की कार को अंदर करने के लिए आकाश ने गेट खोला था । कार जब अंदर हुई तो खिलखिलाहटों के साथ देवी प्रसाद का पूरा परिवार उससे उतरा । उन्होंने देखा कार के अंदर हो जाने के बाद देवी प्रसाद का बड़ा बेटा आकाश सेल फोन पर खुशी-खुशी किसी से बात कर रहा था । वह बड़ी देर तक बात करता रहा । तब तक पूरा परिवार घर के भीतर प्रवेश कर चुका था । वे लगातार बाहर आकाश को देखते रहे । आकाश की बात जब समाप्त हुई तो वह लगभग दौड़ते हुए घर में घुसा और एक पल बाद वह उनके सामने हंसते हुए खड़ा था - ‘‘दादाजी !... कल सुबह, इंदौर वाले दादा जी आ रहे हैं ।’’ उसने जल्दी-जल्दी कहा ।

‘‘क्या कहा?’’ उनके चेहरे पर अकस्मात तेज खुशी की लहर दौड़ गई ।

‘‘वही जो आपने सुना ।’’ आकाश का जवाब था । वह जवाहरलाल जी का लाड़ला था इसलिए इसी तरह उनसे बात करता था । वह जाने ही वाला था कि जवाहरलाल जी ने पूछा - ‘‘यह किसने बताया तुम्हें ?’’

‘‘अरे आपने सुना नहीं उन्हीं से तो अभी बात कर रहा था सेल पर ।’’ उसने जवाब दिया और तेजी से कमरे से बाहर हो गया ।

जवाहरलाल जी का रक्त संचार तेज हो गया खुशी से । वे आगे और कुछ पूछने के लिए आकाश को रोक न सके ।

इंदौर वाले दादाजी यानी जवाहरलाल जी के चचेरे भाई कृष्ण कुमार दुबे जिन्हें सार्वजनिक रूप से के.के. के नाम से सादर बुलाया जाता है । वे उम्र में जवाहरलाल जी से दो ढाई वर्ष बड़े हैं, पर पूरी तरह स्वस्थ हैं और पूरे वक्त व्यस्त रहने वाले हैं । उनकी सामाजिक राजनैतिक हैसियत बहुत बड़ी है । जवाहरलाल जी को याद है कि जब उन्होंने मेट्रिकुलेशन किया था तब कृष्ण कुमार सिविल इंजीनियरिंग की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके थे ।

पहले तो नहीं पर बाद में इसी सिविल इंजीनियरिंग ने उन्हें आर्किटेक्ट बनाया और बाद में एक प्रख्यात बिल्डर भी । उनका यह काम अब प्रदेशव्यापी विस्तार में है। दरअसल के.के. अपने जीवनमें यह सब नहीं करना चाहते थे । उनकी रूचि शोषितों के पक्ष में राजनीति करने की थी और वे करते चले आ रहे हैं । लेकिन सिविल इंजीनियरिंग ही उनकी रोजी रोटी का सहारा थी इसलिए एक सिविल ठेकेदार जैसा काम उन्हें शुरू करना पड़ा । लेकिन शोषितों के पक्ष में राजनीति वे आज भी करते हैं भले ही उनकी स्थिति अरबपति की है ।

जवाहरलाल जी उनके आने की सूचना से ही बहुत खुश हुए, उनके आने के बाद खुशी कहां जाकर ठहरेगी यह कहना मुश्किल था । वे के.के. को उस वक्त ठीक उस तरह याद करने लगे जब भैरव सिंह के साथ रहते हुए याद किया करते थे। भैरव सिंह की बातें, हाव-भाव, उनका आक्रोश सब कुछ के.के. से एकदम मिलते-जुलते थे। के.के. दूर-दूर की रिश्तेदारियों में इसलिए भी याद किए जाते हैं कि उन्होंने लोगों की विपत्तियों में हरसम्भव मदद की थी और आज भी करते रहते हैं । उनकी स्थिति हरदम देने वालों में रही, लेने वालों में नहीं । उदार, दयालु, विनम्र, मेहनतकश, जुझारू और न जाने कितनी अलंकृतियां उनके नाम के साथ जुड़ती रहती हैं ।

कुल मिलाकर जवाहरलाल जी के.के. को अपना आदर्श मानते रहे हैं । वही आदर्श वर्षों बाद कल उनके साथ होगा, इस एहसास की सिहरन उनके अंदर रह-रह कर उठना तब से ही शुरू हो गई थी जब उनके आने की सूचना आकाश ने दी थी ।

उस रात वे अनजान बेसब्री में रहे आए । स्मृतियों में अनगिनत गोता लगाती रात अनिद्रा सहित कट गई । पर अजीब थी यह बात कि उस अनिद्रा ने उन्हें थकाया नहीं ।

वे सो तो नहीं पाये थे इसलिए और दिनों की अपेक्षा जल्दी ही उठे । हालांकि उन्हें यह बात पता चल गई थी कि के.के. इन्दौर से सुबह अपनी कार से छह के आसपास चलकर दस-साढ़े दस तक वहां पहुंचेंगे। पर वहां तक का समय गुजारना मुश्किल हो रहा था । मिलने की एक अजीब बेचैनी घर कर गई थी । इस बीच एक बार देवी प्रसाद से भी उन्होंने सारी पूछताछ कर ली थी । वैसे वह छुट्टी का दिन था इसलिए घर में काफी चहल-पहल थी और उसे के.के. के आगमन की सूचना ने और बढ़ा दिया था । के.के. अपने एक काम के सिलसिले में आ रहे थे पर दोपहर का भोजन वहीं करने वाले थे और दिन ढलने पर उनकी वापसी थी ।

साढ़े दस के पहले ही के.के. पहुंच गये । सेल फोन से उनके लोकेशन की जानकारी आकाश लेता रहा था । उसने जब आखरी बार फोन लगाया तो वे घर से एक फर्लांग की दूरी पर थे । इसकी सूचना जब उसने घर के लोगों को दी तो जवाहरलाल जी समेत सारा परिवार घर के मुख्य द्वार पर के.के. के स्वागत के लिए पहुंच गया ।

कार से जब वे उतरे तो जवाहरलाल जी ने देखा, उनका पहनावा चिरपरिचित था, वही खादी का कुर्ता-पायजामा, जिसमें चरक किया गया था, मोटे लैंस वाला मोटे फ्रेम का चश्मा, तनी हुई रीढ़, सफेद हो चुके हुए पर घने बाल और चेहरे पर चिरस्थायी मुस्कराहट । देवी प्रसाद सहित घर के सारे बच्चों ने उनके चरण स्पर्श किए जिसके बदले में उन्होंने सबकी पीठ ठोक-ठोक कर आशीर्वाद दिया । घर के पोर्च की सीढि़यों से सारे लोग उतरकर के.के. का स्वागत कर रहे थे पर जवाहरलाल जी मुस्कुराते हुए नम आंखों सहित पहली सीढ़ी पर खड़े थे । सारे बच्चे जब सामने से हट गये तब जवाहरलाल जी ने भी बढ़कर के.के. के चरण स्पर्श करने का प्रयास किया पर के.के. ने उनके दोनों हाथों को रोक लिया और बेहद गर्मजोशी से जवाहरलाल जी को अपने गले से लगा लिया ।

दो बुजुर्गों की ऐसी अभूतपूर्व मुलाकात बच्चे विस्मय सहित देख रहे थे । के.के. ने जवाहरलाल जी के कंधे पर मित्रवत हाथ रखा फिर सब लोग घर के भीतर आ गये।

घर का बड़ा ड्राइंग रूम खूबसूरत फर्नीचर से सुसज्जित था । थोड़ी देर बाद जवाहरलाल जी और के.के. ही उस कमरे में रह गये । वे दोनों अब आमने-सामने बैठे थे । बड़ी देर तक के.के. की निगाहें ड्राइंग रूम की सज्जा को निहारती रहीं और जवाहरलाल जी की निगाहें उनका अनुसरण करती रहीं । फिर किसी क्षण अचानक के.के. ने जवाहरलाल जी से पूछा - ‘‘और जवाहरलाल तुम्हारा सेवा निवृत्त जीवन कैसे गुजर रहा है?’’ दोनों चूंकि हम उम्र जैसे थे, इसलिए उन लोगों के बीच मित्रों जैसी ही बातचीत होती थी ।

कई क्षण तक जवाहरलाल जी सोचते रहे कि इस प्रश्न का क्या जवाब दें फिर हंसते हुए कहा -- ‘‘सब मजेदारी में कट रहा है, किसी बात की कोई तकलीफ नहीं है, कोई कमी नहीं है, सिर्फ एक अजीब सा अकेलापन कभी-कभी परेशान करता है ।’’

‘‘मैं समझता हूं जवाहर कि तुम्हें यह क्यों होता है । इस उम्र में पत्नी का साथ छूट जाये तो ये स्वाभाविक है... पर मुझे लगता है कि देवी प्रसाद तो तुम्हारा अच्छा ख्याल रखता है ।’’

‘‘अरे-अरे के.के., उस जैसा बेटा तो कोई नहीं मिलेगा, इस मामले में मैं सौभाग्यशाली हूं कि वह मुझे मिला... वह इतना ख्याल रखता है कि कभी-कभी मुझे संदेह होता है कि मैं क्या परजीवी होता जा रहा हूँ?’’ जवाहरलाल जी ने हंसते हुए जवाब दिया ।

‘‘बहुत अच्छी बात है इस तरह के बेटे नहीं हैं अब... तुम्हें मालूम है कि नहीं मेरा वह ममेरा भाई है न दीनदयाल... ?’’ वे जवाहरलाल जी के चेहरे पर प्रकट होती अनभिज्ञता को देखकर रूक गये और याद दिलाने की कोशिश सहित आगे कहा - ‘‘अरे यार वह देवास वाला दीनदयाल दीक्षित नहीं है... जो पुलिस में डी.वाय.एस.पी. था... ।’’

‘‘अच्छा अच्छा याद आ गया गुड्डू दीक्षित की बात कर रहे हो न तुम? जवाहरलाल जी याद करते हुए बोले -

‘‘हां ऽऽऽऽऽ, यार गुड्डू की बहुत हालत खराब है ।’’

‘‘क्यों क्या हुआ उसे, हम लोगों से उम्र में तो वह छोटा होगा, क्या बीमार है?’’

‘‘नहीं-नहीं, वह बात नहीं है ।’’ के.के. ने जवाब में कहा फिर एक पल रूककर बोलते चले गये - ‘‘उसके तीन बेटे हैं । दो छोटे वाले विदेशों में हैं और बड़ा वहीं देवास में, और वही समस्या है गुड्डू की... गुड्डू ने, तुम तो जानते होगे, पुलिस में रहते हुए बेइंतहा कमाई की थी... और शायद वही कमाई इसकी जड़ में है । बड़े बेटे ने घर से निकाल दिया है... अब दोनों पति-पत्नी बेचारे एक किराये के छोटे से मकान में रहते हैं । बुढ़ापे में उन्हें दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं... ।’’

इतना कहकर के.के. रुके और जवाहरलाल जी के चेहरे पर आते-जाते भावों को पढ़ते रहे । जवाहरलाल जी का चेहरा यह सब सुनकर उदास होता दिख रहा था। वे किसी गहरी सोच में डूब गये थे ।

जब बड़ी देर तक वे मौन ही बने रहे तो के.के. ने कुछ सोचते हुए कहा- ‘‘क्या सोचने लगे तुम?’’

जवाहरलाल जी तन्द्रा में थे इसलिए चौंकते हुए कहा- ‘तुमने कुछ इन्टरफियर नहीं किया उन लोगों के बीच में, ताकि कोई समाधान निकल सके?’

‘‘अरे यार ये तुम कौन सी बात कर रहे हो... किया क्यों नहीं... अवश्य किया... पर उसका बेटा करोड़ों में खेलता है आज । उसकी जबर्दस्त ऐंठ है । मुझसे वह अब पहले की तरह आदरपूर्वक बात नहीं करता । मैंने कोशिश की तो उसने इशारों-इशारों में मुझे समझा दिया कि मैं उन लोगों के बीच में न पड़ूं । ... मैं क्या करता अपनी इज्जत बचाई और चुप हो गया ।’’ इतना कहकर के.के. ठहर गये और बड़ी देर तक शून्य में ताकते रहे, शायद कुछ सोचते हुए... फिर निर्णायक स्वर में कहा- ‘‘... मैं जहां तक समझ पाया हूं सम्पन्नता कोई अच्छी बात नहीं है । जहां जरूरत से ज्यादा पैसा होता है या आता है वहां यह सब होने लगता है । ... क्या कहा जाए ।’’ यह सब कहते हुए अन्त में उन्होंने एक आह सी भरी ।

लेकिन के.के. के अंतिम दो-तीन वाक्यों को सुनकर जवाहरलाल जी के अन्दर एक अजीब सी बेचैनी घर करने लगी । वे चौंककर अवाक् से हो गये । वे कुछ कह पाते कि उसी समय देवी प्रसाद ने कमरे में प्रवेश किया और के.के. से अचानक कहा - ‘‘चाचा जी आइये आपको पूरा घर दिखा दूं, आप पहली बार इस घर में आए हैं मेरे ख्याल से... ?’’

‘‘हां-हां, पहली बार ही ।’’ के.के. ने उठते हुए कहा । फिर एक पल बाद जवाहरलाल जी को सम्बोधित करते हुए कहा - ‘‘मैं आया जवाहर, तुम बैठना ।’’

जवाहरलाल जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, वे उस वक्त कहीं और थे । अतीत बहुत तेजी से उनके अंदर घुमड़ रहा था । वहां एक चलचित्र था, जीवन को परिभाषित करने का प्रयास करता हुआ, जहां एक जगह पर वह बार-बार अटक रहा था और जहां बहुत पहले विस्मृत भैरव सिंह खड़े थे । वे अपने विश्वास, अपनी विचारधारा, अपने सिद्धान्तों को बुदबुदाते हुए लग रहे थे । जवाहर लाल जी उस बुदबुदाहट को सुनने में असमर्थ हो रहे थे । सम्भवतः भैरव सिंह वहीं थे जहां पहले थे लेकिन पता नहीं क्यों उनकी आवाज स्पष्ट नहीं आ रही थी । लगता था जैसे बहुत दूर से आ रही है। लेकिन उस चलचित्र से अलहदा जवाहरलाल जी की स्मृतियों का संसार उस तरह से ओझल नहीं हुआ था । अभी-अभी वह पहले से ज्यादा स्पष्ट हो रहा था । अपनी गरीबी के दिनों के रंग ज्यादा गाढ़े हुए लग रहे थे । वे चाहते थे कि अभी के रंगों से उसे मैच करें और पुराने रंगों के आज तक के रंगों के विस्तार की पड़ताल करें । वे इस पड़ताल में बार-बार असफल हो रहे थे । ऐसा होना उन्हें सम्भव नहीं लग रहा था, पर वास्तव में हो तो गया ही था । इस हो गये को लगभग समझ लेने के बाद उनकी बेचैनी जैसे सौ गुना बढ़ गई । वे उठकर ड्राइंग रूम में टहलने लगे । वे अपने अतीत से जोड़कर के.के. के इस बयान को भी देखना चाह रहे थे कि ‘‘सम्पन्नता कोई अच्छी बात नहीं है ।’’ क्या गुड्डू दीक्षित के बेटे की सम्पन्नता हमारी सम्पन्नता से मिलती जुलती है? और क्या हमारे घर में देवी प्रसाद की वजह से आई सम्पन्नता और उसका सम्पन्नता में फर्क नहीं है? उन्हें संदेह हुआ कि के.के. क्या शायद हम लोगों को भी इंगित कर रहे थे? अगर ऐसा है तो वे अपनी खुद की अथाह सम्पन्नता को क्या कहेंगे? अगर के.के. अपनी सोच में ऐसे नहीं तो क्या वे बहुत पीछे जाकर सोच रहे हैं, इतने पीछे कि जब उनकी कोई पहचान नहीं थी । उन्हें यदि वे छोड़ भी दें तो अपने बारे में क्या कहेंगे? क्या अभी रूककर ये सोचा जा सकता है कि जो बातें भैरव सिंह कहते थे कि ‘‘अपनी जरूरत से ज्यादा कमाना तभी सम्भव होता है जब आप किसी का जायज हक छीनते हैं ।’’... हम लोगों ने किसका हक छीना है? भैरव सिंह के शब्दों में यह शोषण है तो हमारे आसपास शोषित कहां हैं? हम कितने दिनों से बाहर नहीं निकले कि कु्छ दिखे?

इस प्रश्न पर उनके अंदर उस वक्त नकार की ‘‘नहीं-नहीं’’ भले ही उठ रही थी पर वह बेहद कमजोर थी । देश की कई स्तरों की आर्थिक स्थितियों में निःसंदेह उनके अपने घर की स्थिति बेहद अच्छी थी इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता था।

इससे आगे उन्हें याद आया कि देवी प्रसाद को शाबासी देने पर वह अक्सर उनसे कहता रहता है कि ‘‘पिताजी देखना हमारे बच्चों को, बहुत आगे जायेंगे ।’’ यह सुनकर वे बहुत खुश हो जाते थे पर आज वह सब अचानक याद करके वे खुद को किसी अवसाद की तरफ जाते हुए महसूस क्यों कर रहे हैं? उन्हें समझ नहीं आया । उससे मुक्ति के लिए उन्होंने अपने सिर को एक जोरदार झटका दिया, साथ ही सोफे पर निढाल से धंस गये ।

और तभी के.के. सारा घर देखकर लौट आए और सोफे पर बैठते हुए विस्मय से जवाहरलाल जी की ओर देखा और कहा - ‘‘क्या बात है जवाहर, तुम कुछ थके से लग रहे हो?’’

एक अजीब सी निराशा से फूटती मुस्कान सहित जवाहरलाल जी ने मौन आह भरी और कहा - ‘‘हां-हां अतीत की लम्बी यात्रा से अभी-अभी लौटा जो हूं?’’

के.के. का विस्मय यह सुनकर और बढ़ गया । एक पल के लिए वे जवाहरलाल जी की बात समझ न सके और कहा - ‘‘मैं समझा नहीं, तुम कहना क्या चाहते हो?’’

‘‘दरअसल मैं विपन्नता से सम्पन्नता की लम्बी यात्रा पर था इसलिए जाहिर है थक तो गया ही हूं ।’’ जवाहरलाल जी की मुस्कान यथावत थी ।

जवाहरलाल जी के इस कथन से, जो कि वास्तव में उनकी पूर्व में सम्पन्नता संबंधी धारणा की प्रतिक्रिया थी, के.के. सब कुछ समझ गये । पर बड़ी देर तक उन्हें अपनी प्रतिक्रिया के लिए कुछ सूझा नहीं । वे जटिलता में उलझना नहीं चाहते थे । इसलिए वे सहज होना चाह रहे थे पर वह उस वक्त बेहद कठिन था । वे किंचित शर्मिंदगी से फर्श की ओर देखने लगे । इस बीच कनखियों से उन्होंने कई बार जवाहरलाल जी की ओर भी देखा और अचानक बोल पड़े - ‘‘अरे जवाहरलाल तुम कहां उलझ रहे हो, सहज हो जाओ, सच मानो मैंने सम्पन्नता के मामले में तुम्हारे लिए कुछ नहीं कहा था । ... और फिर... ।’’

‘‘मैं जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि तुमने वह बात जनरलाइज करके कही थी, पर बात तो सही थी ।’’ जवाहरलाल जी ने बीच में टोकते हुए कहा । वे तमतमा गये थे।

‘‘तो फिर... ।’’ के.के. के चेहरे पर प्रसन्नता लौटने लगी ।

‘‘तो फिर क्या... क्या मुझे इस बात को उसी परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए, जिसमें तुम लेकर सहज हो गये हो?’’

‘‘नहीं, मेरे कहने का मतलब यह था कि अब कुछ हो नहीं सकता, अपने और दूसरों के जिस समय में हम लोग फिलहाल हैं... वहां क्या सम्भावनाएं हैं... ? ... मुझे तो कुछ सूझता नहीं... ।’’ ‘‘हम लोगों के पास वैचारिक तर्कों के साथ आगे बढ़ने का समय कहां बचा ... तुम बताओ ।’’ के.के. ने काफी विचार करने के बाद कहा और जवाहरलाल जी के चेहरे पर तेजी से आते-जाते भावों को एकटक देखने लगे ।

के.के. के इस तरह पूछने पर जवाहरलाल जी की तमतमाहट बढ़ गई और उन्होंने तत्काल पूछा - ‘‘तुम्हारे कहने का मतलब... आत्मसमर्पण के अलावा कोई चारा नहीं है अब?’’

के.के. शायद कुछ जवाब देते इसके पहले ही अंदर के कमरों से तेज स्त्री स्वर सुनाई पड़ा - ‘‘दो बज रहे हैं लंच के लिए बुलाओ दादा जी लोगों को ।’’ यह देवीप्रसाद की बड़ी बेटी की आवाज थी । इसके बाद दूसरे ही पल देवीप्रसाद ने ड्राइंग रूम में प्रवेश किया और जवाहरलाल जी सहित के.के. से हाथ जोड़कर कहा- ‘‘चलिए भोजन करें ।’’

देवी प्रसाद की इस विनती से के.के. प्रसन्न होकर तत्काल उठ खड़े हुए और जवाहरलाल जी के पास पहुंचकर उनके कंधे पर हाथ रखा - ‘‘अच्छा अभी चलो जवाहर, भोजन करते हैं ।’’

जवाहरलाल जी बेमन से खड़े हो गये फिर के.के. के साथ डायनिंग रूम में आकर बैठ गये । परिवार के सारे सदस्य भोजन परोसने में व्यस्त थे ।

बड़े से डाइनिंग रूम में स्प्रे की गई मन्द खुशबू बिखरी थी साथ में ताजे भोजन की महक ने के.के. को तरोताजा कर दिया पर जवाहरलाल जी की स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ा था । विचारों से प्रसूत उद्वेलन का शमन वे तब भी नहीं कर पाये थे ।

प्लेटों के लगते ही के.के. ने तेजी से भोजन शुरू कर दिया । पर जवाहरलाल जी की गति बहुत मंद थी । इसे देखकर के.के. ने उनसे कहा - ‘‘यार जवाहर अब तुम सोचना बंद करो और एकचित्त होकर भोजन करो ।’’ ‘‘... आखिर अब क्या सोच रहे हो तुम?’’

एक कटोरे में परसी गई सब्जी में रोटी के टुकड़े से सब्जी पकड़कर निवाला मुंह में डालते हुए जवाहरलाल जी ने के.के. से कहा - ‘‘मैं यह सोच रहा था कि जब से हम लोगों ने होश सम्हाला है तब से हम एक बेईमान और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था में जी रहे हैं... क्या तुम इसे मानते हो?’’

के.के. के भोजन करते हाथ एक घड़ी को थम गये फिर कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा - ‘‘हां यह तो सभी मानते हैं ।’’

‘‘नहीं-नहीं, तुम मानते हो कि नहीं?’’ जवाहरलाल जी ने टोकते हुए पूछा ।

‘‘हां-हां भाई मैं भी मानता हूं ।’’ के.के. ने बिना रुके जवाब दिया ।

‘‘तो यह जानते हुए भी इस व्यवस्था में हम लोग कैसे सम्पन्न हो गये?... क्या तुम इसका भी जवाब दे सकते हो?’’ जवाहरलाल जी ने के.के. की आंखों में आंखें डालते हुए पूछा ।

यह सुनकर एक हाथ में पकड़ी चम्मच के.के. से छूट गई । थोड़ी देर उसके गिरने की टनटनाहट की आवाज कमरे में गूंजती रही । वे बिना कुछ बोले कुर्सी से उठ गये और वाश बेसिन में हाथ धोने लगे ।

किसी तरह की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में जवाहरलाल जी बड़ी देर तक उनकी ओर देखते रहे । पर के.के. मौन रहे आए और मुंह पोंछते हुए फिर से कुर्सी पर आकर बैठ गये । पर तभी उन दोनों को भोजन से फुर्सत देखकर आकाश ने डायनिंग रूम में लगे होम थियेटर का स्विच रिमोट से ऑन कर दिया ।

कमरे में तेज आवाज गूंजने लगी - ‘‘पुराना जायेगा तभी तो नया आयेगा... ।’’ (और अंत में)... बेच दे ।’’

जवाहरलाल जी और के.के. इस अप्रत्याशित भीषण आवाज से बुरी तरह चौंक गये । उनकी छातियां कांपने लगीं । जवाहरलाल जी ने तब गुस्से में चिल्लाकर आकाश से कहा - ‘‘बंद करो इसे... ऽऽऽ ।’’

आकाश ने बुरी तरह डरकर उन्हें देखा और स्विच ऑफ कर दिया । अब वहां केवल जवाहरलाल जी की चिल्लाहट गूंज रही थी ।




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हिन्दी में प्रतिरोध कविता की लम्बी परपरा रही है

5/18/2016 07:30:00 am 1 > टिप्पणी

हत्या से आत्म हत्या तक — विमल कुमार का नया कविता संग्रह

हत्या से आत्महत्या तक — विमल कुमार का नया कविता संग्रह 

सोलह मई केवल एक तारीखभर नहीं है देश के इतिहास में बल्कि वह एक ऐसी लकीर है जो भारतीय राजनीति के अँधेरे को बयाँ करती है जबकि भारतीय समाज मीडिया और लेखकों का एक वर्ग इसे नयी रौशनी के रूप में भी देख रहा है . यही कारण है कि सच के लिए लडाई और कठिन हो गयी है . कलबुर्गी , पंसारे धभोलकर जैसे लोग मारे गए और देश में असहिष्णुता के विरोध में लेखकों कलाकारों की पुरस्कार वापसी का एक ऐतिहासिक सिलसिला शुरू हुआ . आज भले ही यह सिलसिला थम गया है लेकिन अब देश के छात्र यह लडाई लड़ रही है और भीतर ही भीतर यह आग धधक रही है . रोहित वेमुला की आत्महत्या इसी जलती हुई भीतर की आग की आंच एक प्रतीक है . हिन्दी के कवियों ने इस आंच को कविता रूप देने की कोशिश की है . वरिष्ट कवि विमल कुमार ने अपने नए काव्य संग्रह हत्या से आत्महत्या तक में इस आंच को कविता में उतरने की कोशिश की है . वे संभवतः पहले कवि हैं जिन्होंने लगातार फेसबुक पर सीधे ये कवितायेँ लिखी और सोलह मई २०१४ के बाद लिखी गयी कविताओं को अपनी वाल पर पोस्ट करने का जो सिलसिला शुरू किया वह अब भी जारी है . इस तरह दो साल पूरे हो गए और उनकी इन कविताओं का यह संग्रह आपके सामने है . दो साल मोदी सरकार के भी हो गए . इन दो सालों में झूठ का लगातार प्रचार किया गया . विमल कुमार ने अपनी इन कविताओं में इस झूठ को बेनकाब किया है . ये कवितायेँ केवल मोदी के खिलाफ नहीं बल्कि उन प्रवृतियों के खिलाफ है जिसकी एक झलक इंदिरा जी में भी नज़र आयी थी और इसकी थोड़ी झलक केजरीवाल जी में भी दिखाई पड़ती है यद्यपि ये तीनो तीन तरह की राजनीतिक सोच वाले हैं. विमल कुमार ने अपने पांचवें कविता संग्रह में सीधी मुठभेड़ का रास्ता और जोखिम उठाया है . शायद उन्हें संसद में एक पत्रकार के रूप में इस राजनीति के अँधेरे की भयावहता को करीब से देखने का मौका मिला है . हिन्दी में निराला, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा और धूमिल ने राजनीतिक ताने बाने के अंतर्विरोधों को तीखे ढंग से उजागर किया है . बाद में अलोक धन्वा, राजेश जोशी, गोरख पाण्डेय, मनमोहन, वीरेन डंगवाल, विष्णु नागर, मंगलेश, देवीप्रसाद मिश्र और कुमार अम्बुज ने इस परम्परा को आगे बढाया है . विमल कुमार ने इस परम्परा को पुख्ता बनाते हुए इन कविताओं में . अपनी बात प्रखर ढंग से कही है .उनका कहना है कि अब हर जगह नए भेडिये और निर्वाचित हत्यारे सामने आ गए है और हत्यारों को हत्यारा कहना मुश्किल हो गया है . सेल्फी युग के नायक ही वास्तविक नायक हैं और सब कुछ इवेंट में बदल गया है राजनीति की एक पैकेजिंग होने लगी है .

vimal kumar

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लगा साहित्य में इंस्टैंट प्रसिद्धि का रोग — अनंत विजय @anantvijay

5/17/2016 10:02:00 am टिप्पणी करें

Hindi Literary Criticism  Vs  New Generation

Hindi Literary Criticism  Vs  New Generation

— Anant Vijay

आलोचना से बचती युवा पीढ़ी  — अनंत विजय


अभी पिछले दिनों एक अनौपचारिक साहित्यक गोष्ठी में एक लेखक मित्र ने कहा कि इन दिनों हिंदी के युवा लेखक बहुत जल्दबाजी में हैं और वो इंस्टैंट कॉफी और टू मिनट नूडल्स की तरह साहित्य की रचना कर रहे हैं । उनकी यह बात सोलह आने सच ना भी हो तो चौदह पंद्रह आने तो सही है ही । ज्यादातर युवा लेखक थोक के भाव से कहानियां और कविताएं लिख रहे हैं और उनकी चाहत मशहूर होने की भी होती है । साहित्य को अगर साधना कहा गया है तो उसके पीछे कोई ना कोई सोच रही होगी । अगर हम ये मान भी लें कि ये साधना जैसा कठिन कर्म नहीं भी है तो कम से कम श्रमसाध्य तो है ही । साहित्य को हल्के तरीके से नहीं लिया जा सकता है, यह एक बेहद गंभीरकर्म है और इसमें लेखकों को उनका दाय कभी उनके जीवन काल में मिल पाता है तो कभी मरणोपरांत ही उनके लेखन पर चर्चा हो पाती है । इन दिनों हमारे युवा लेखक लिखना शुरू करते ही चाहते हैं कि उनको साहित्य जगत में गंभीरता से लिया जाए और वो स्थान मिले जो उनके वरिष्ठों को हासिल है । यह अपेक्षा और महात्वाकांक्षा सही है लेकिन इसके लिए जितने प्रयास किए जाने चाहिए उतने दिखाई नहीं देते हैं । युवा लेखकों की इस महात्वाकांक्षा को परवान चढाया है कुछ वैसी पत्रिकाओं ने जो लेख की तरह कहानीकारों से कहानियां लिखवाते हैं । आठ सौ शब्दों में दे दीजिए, हजार शब्दों में दे दीजिए या ज्यादा से ज्यादा पंद्रह सौ शब्दों की कहानी होनी चाहिए । पत्रिकाओं की मजबूरी हो सकती है लेकिन लेखकों की क्या मजबूरी है, ये समझ से परे हैं । जब लेखकों की रचनाओं और उसकी कल्पना को शब्द संख्या में बांधा जाने लगे और लेखक उसको स्वीकार भी करने लगे तो माना जाना चाहिए कि साहित्य के सामने संकट काल है । कई युवा लेखकों ने मुझे बताया कि अमुक पत्रिका ने उनसे उतने शब्दों में कहानी मांगी और हमने फौरन उनको लिखकर दे दिया । गोया कहानी ना हो किसी समसमायिक विषय पर लेख हो । जरूरत इस बात की है कि साहित्य को इंस्टैंट प्रसिद्धि की चाहत के इस रोग से मुक्त किया जाए ।

Anant Vijay अनंत विजय
दूसरी बात जो समकालीन साहित्य में रेखांकित की जानी चाहिए वो है युवा लेखकों का अपने साथी लेखकों की रचनाओं पर टिप्पणी करने से बचना । मौखिक या फेसबुकिया टिप्पणियां यदा कदा देखने को मिल जाती है लेकिन ज्यादातर युवा लेखक अपने समकालीनों पर लेख आदि लिखने से बचते हैं । इसका एक नुकसान यह होता है कि नई सोच सामने आने से रह जाती है । नए विमर्श को स्थान नहीं मिलता है । मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेन्द्र यादव का जब कहानी की दुनिया में डंका बज रहा था तो सभी एक दूसरे की रचनाओं पर लिख रहे थे । उसका लाभ तीनों को मिला था और वो लगातार चर्चा में बने रहे थे । युवा लेखक क्यों नहीं अपने साथियों पर गंभीरता से लिखते हैं इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए । ऐसा प्रतीत होता है कि युवा पीढ़ी अपने साथियों पर आलोचनात्मक टिप्पणियों से बचना चाहती है । तू पंत, मैं निराला जैसी टिप्पणियां तो यदा कदा देखने को मिल जाती हैं पर किसी रचना को आलोचना की कसौटी पर उसके औजारों से कसता हुए लेख दुर्लभ है । यह सही है कि हिंदी में आलोचनात्मक टिप्पणियों का असर व्यक्ति संबंधों पर पड़ता है लेकिन क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कही जानी चाहिए । 
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तानाशाह व अन्य कवितायेँ — मंगलेश डबराल | Manglesh Dabral 4 poems

5/16/2016 04:00:00 pm 2 > टिप्पणी
manglesh dabral


मंगलेश डबराल - कवितायेँ


आसान शिकार



मनुष्य की मेरी देह ताकत के लिए एक आसान शिकार है
ताकत के सामने वह इतनी दुर्बल है और लाचार है
कि कभी भी कुचली जा सकती है
ताकत के सामने कमजोर और भयभीत हैं मेरे बाल और नाखून
जो शरीर के दरवाजे पर ही दिखाई दे जाते हैं
मेरी त्वचा भी इस कदर पतली है कि उसे पीटना बहुत आसान है
उसके ठीक नीचे ही बहता है ऱक़्त
और सबसे अधिक नाजुक और ज़द में आया हुआ है मेरा हृदय
जो इतना आहिस्ता धड़कता है
कि उसकी आवाज भी शरीर से बाहर नहीं सुनाई देती

मिट्टी हवा पानी ज़रा सी आग
थोड़े से आकाश से बनी है मेरी देह
उसे मिट्टी हवा पानी आग और आकाश में मिलाना है आसान
एक पुराने भुरभुरे काग़ज़ की तरह है मेरी आत्मा
जो हल्के दबाव से ही फट सकती है
पूरी तरह भंगुर है मेरा वजूद
उसे मिटाने के लिए किसी हरबे-हथियार की जरूरत नहीं होगी
किसी ताकतवर की एक फूंक ही मुझे उड़ाने के लिए काफ़ी होगी
मैं उड़ जाऊं गा सूखे हुए पत्ते या नुचे हुए पंख की तरह

मनुष्य की मेरी देह हमेशा उपलब्ध है
वह सड़क पार करती है दूर तक पैदल चलती है
सांस लेती है प्रेम करती है
थक कर बैठती है और फिर उठ खड़ी होती है
दुनिया के संभावित ताक़तवरों अत्याचारियों आततायियो को
उसे कहीं खोजने की ज़रूरत नहीं होती
मनुष्य की मेरी देह खड़ी रहती है उनके ठीक सामने
निष्कवच बिना किसी हथियार के।

तानाशाह


तानाशाह को अपने किसी पूर्वज के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता। वह उनकी
पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखता या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखता। यह स्वतःस्फूर्त
तरीके से होता है कि हवा में बंदूक की तरह उठा हुआ उसका हाथ या बंधी हुई
मुट्ठी के साथ पिस्तौल की नोक की तरह उठी हुई अंगुली किसी पुराने तानाशाह की
याद दिला जाती है या एक काली गुफा जैसा खुला हुआ उसका मुंह इतिहास
में किसी ऐसे ही खुले हुए मुंह की नकल बन जाता है। वह अपनी आंखों में
काफी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करता है लेकिन क्रूरता
कोमलता से ज्यादा ताकतवर होती है इसलिए वह एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है
और इतिहास की सबसे ठंढी क्रूर आंखों में तब्दील हो जाती है। तानाशाह मुस्कुराता है
भाषण देता है और भरोसा दिलाने की कोशिश करता है कि वह एक मनुष्य है
लेकिन इस कोशिश में उसकी मुद्राएं और भंगिमाएं उन दानवों-दैत्यों-राक्षसों की
मुद्राओं का रूप लेती रहती हैं जिनका जिक्र प्राचीन ग्रंथों-गाथाओं-धारणाओं-
विश्वासों में मिलता है। वह सुंदर दिखने की कोशिश करता है आकर्षक कपड़े पहनता है
बार-बार बदलता है लेकिन इस पर उसका कोई वश नहीं कि यह सब
एक तानाशाह का मेकअप बन कर रह जाता है।

इतिहास में तानाशाह कई बार मर चुका है लेकिन इससे उस  पर कोई फर्क नहीं पड़ता
क्योंकि उसे लगता है उससे पहले कोई नहीं हुआ है।

मोबाइल


वे गले में सोने की मोटी जंजीर पहनते हैं
कमर में चौड़ी बेल्ट लगाते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे एक आधे अंधेरे और आधे उजले रेस्तरां में घुसते हैं
और खाने और पीने का ऑर्डर देते हैं
वे आपस में जाम टकराते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं

उनके मोबाइलों का रंग काला है या आबनूसी
चांदी जैसा या रहस्यमय नीला
उनके आकार पतले छरहरे या सुडौल आकर्षक
वे अपने मोबाइलों को अपनी प्रेमिकाओं की तरह देखते हैं
और उन पर बात करते हैं
वे एक दूसरे के मोबाइल हाथ में लेकर खेलते हैं
और उनकी विशेषताओं का वर्णन करते हैं
वे एक अंधेरे-उजले रेस्तरां में घुसते हैं
और ज़्यादा खाने और ज़्यादा पीने का ऑर्डर देते हैं
वे धरती का एक टुकड़ा ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
वे जंगल पहाड़ नदी पेड़
और उनमें दबे खनिज को ख़रीदने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं

वे पता करते रहते हैं
कहां कितना खा और पी सकते हैं
कहां कितनी संपत्ति बना सकते हैं
वे पता करते रहते हैं
धरती कहां पर सस्ती है खाना-पीना कहां पर महंगा है
वे फिर से एक अंधेरे-उजले रेस्तरां में बैठते हैं
वे सस्ती धरती और महंगे खाने-पीने का ऑर्डर देते हैं
और मोबाइलों पर बात करते हैं
वे फिर से जंजीरें ठीक करते हैं बेल्ट कसते हैं
वे अपने मोबाइलों को अपने हथियारों की तरह उठाते हैं
और कुछ जीतने के लिए चल देते हैं।

मुलाक़ात

(रंगकर्मी और चित्रकार मित्र विजय सोनी के निधन पर)


अब ऐसी ही जगहों में मुलाक़ात होती है
जहां कोई जा रहा होता है ज़्यादातर असमय

वहां चारों ओर आग जलाई जा रही होती है
या एक गड्ढा खोदा जा रहा होता है

लोग हड़बड़ाते हुए आते हैं कहते हैं
उम्मीद नहीं थी कि समय पर पहुंच पायेंगे
रास्ते में बहुत भीड़ है
हर कोई  कुछ खाने या कुछ ख़रीदने में जुटा है

कुछ तब आते हैं जब आग बुझ गयी होती है
गड्ढा भर दिया गया होता है

कभी-कभी मृतक के पास पहुंचने में कई दिन लग जाते हैं
कभी महीने या साल
कभी आख़िरी सलाम भी मन में ही कहना पड़ता है

यह ऐसा ही समय है
हर ख़बर बाज़ार से गुज़र कर आती है
और बाज़ार हमेशा हादसों को छिपाने की कोशिश करता है

जीते जी लोगों का होना भी पता चलता
वे पता नहीं किस दुनिया में रहने जाते हैं
या फिर हम ही जा चुके होते हैं कहीं और

अब संवेदनाएं भी पहले जैसी कहां रहीं
आंखें जितना देखती हैं दिल उससे भी कम महसूस करता है
अभाव कितना ही बड़ा हो दब जाता है किसी और चीज़ से

और दुख के जो आधे-अधूरे वाक्य बोले जाते हैं
उनका संबंध हमारे भीतर के हादसे से है
जो बाहर नहीं आता और दिखाई नहीं देता।


मंगलेश डबराल 

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