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अरविंद केजरीवाल - हिम्मत है तो पाकिस्तान पर दिखाओ ना @ArvindKejriwal

2/11/2016 02:53:00 pm

अरविंद केजरीवाल - हिम्मत है तो पाकिस्तान पर दिखाओ ना #शब्दांकन

बातचीत: अरविंद केजरीवाल सरकार के एक साल होने पर  

- मुकेश केजरीवाल, सर्वेश कुमार 

दिल्ली में ऐतिहासिक बहुमत से सत्ता में आई केजरीवाल सरकार रविवार 14 फरवरी को एक साल पूरे कर रही है। बड़े-बड़े वादों और एकदम नए तेवर-कलेवर के साथ मुख्यमंत्री बने अरविंद केजरीवाल पूरे साल चर्चा में रहे. विवाद भी उठे, उन्होंने पलटवार भी किया और दिल्ली से बाहर बिहार तक में राजनीति भी की. अपने अब तक के काम-काज और भविष्य की तैयारी पर उन्होंने दैनिक जागरण राष्ट्रीय ब्यूरो के विशेष संवाददाता मुकेश केजरीवाल और दिल्ली के इनपुट हेड सर्वेश कुमार के साथ खुलकर चर्चा की। साभार दैनिक जागरण पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश... ।


आप अफसर थे, सामाजिक कार्यकर्ता बने, फिर नेता बने। अब आप खुद को किस रूप में पहचाना जाना चाहेंगे?

अरविंद केजरीवाल : मेरी पहचान महत्वपूर्ण नहीं है। हम भ्रष्टाचार दूर करने के मकसद से लड़ रहे हैं। इसी लड़ाई में नियति, जनता और भगवान ने जो रास्ता दिखाया, उस पर चल पड़े। मैं अब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रहा एक आम आदमी हूं। पिछले एक साल का अनुभव भी यही रहा है। पहले सरकार बहाना करती थी कि पैसे नहीं हैं मगर कमी पैसे की नहीं सिर्फ नीयत की है। अपने यहां सरकारी काम पूरा होते-होते लागत दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है और समय भी। मगर हमने पिछले दिनों तीन फ्लाईओवर का काम समय से पहले पूरा करवाया है और इसमें साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये बचा लिए।

आपने चुनाव से पहले जो वादे किए थे..

अरविंद केजरीवाल : सब याद हैं। हमारे 70 वादे थे। हमने बिजली बिल आधा करने और पानी मुफ्त करने का वादा किया था तो हमारा मजाक उड़ाया गया कि पैसे कहां से आएंगे। सरकार बनने के एक महीने के अंदर कर दिखाया। भ्रष्टाचार रोक कर जो पैसे बचाए, उसी से सब्सिडी दे दी।

मगर अर्थशास्त्री संसाधनों को मुफ्त देने को गलत बताते हैं?

अरविंद केजरीवाल : जब हमने किया तो सबने कहा कि यह तो लोकप्रियता हासिल करने की चाल है, इसको अर्थव्यवस्था की समझ नहीं। दिल्ली जब बोर्ड को डुबा देगा, मगर दिल्ली जल बोर्ड का राजस्व पिछले साल के मुकाबले 176 करोड़ ज्यादा आया है। राजस्व भी बढ़ा और पानी भी फ्री हुआ। इसी तरह कहा जा रहा था पानी फ्री होगा तो बर्बादी होगी। मगर अब तीस लाख गैलन पानी प्रतिदिन की बचत होने लगी है। इससे सवा लाख लोगों को पानी अतिरिक्त दे सकते हैं।

फ्री वाईफाई का क्या हुआ?

अरविंद केजरीवाल : हम फ्री वाईफाई को अब तक लागू नहीं कर पाए हैं। दरअसल हम जितना आगे बढ़ रहे हैं, उतने ही नए-नए मॉडल्स सामने आ रहे हैं इसे बनाने के। ऑप्टिकल फाइबर और हॉटस्पॉट जैसे कई मॉडल्स हैं। कुछ में जीरो लागत है तो कुछ में हमें राजस्व भी मिल रहा है। दो-तीन महीने में तय हो जाएगा कि हम क्या मॉडल अपनाएंगे।

आपने भ्रष्टाचार घटाने का वादा किया था..?

अरविंद केजरीवाल : सब जानते हैं कि जब हमारी 49 दिन की सरकार थी, भ्रष्टाचार पूरी तरह बंद हो गया था। इस बार भी चार महीने तक किसी ने पैसे लेने की हिम्मत नहीं की। एक एसएमएस भी आ जाए तो तुरंत जांच करवा कर जेल भेज देते थे। मगर 8 जून को केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बल भेजकर हमारी एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) पर कब्जा कर लिया। मुझे बहुत दुख हुआ। हम पाकिस्तान हैं क्या? हमारे ऊपर पैरामिलिट्री भेजने की क्या जरूरत है। हिम्मत है तो पाकिस्तान पर दिखाओ ना, मैं तो मरा-कुचला मुख्यमंत्री हूं।


दिल्ली में भ्रष्टाचार बढ़ा है?

अरविंद केजरीवाल : दिल्ली सरकार के विभागों की तो मैं गारंटी ले सकता हूं। मगर एमसीडी, डीडीए, एनडीएमसी. इनमें चल रहा है। अगर कोर्ट के फैसले के बाद एसीबी दिल्ली सरकार को मिल गई तो एक हफ्ते के अंदर दिल्ली में भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त कर देंगे।

पहले की तरह खुद राशन की दुकान या अस्पताल जाकर जायजा लेने की जरूरत नहीं लगती?

अरविंद केजरीवाल : मैं सिर्फ अफसरों के भरोसे यह काम नहीं छोड़ता। हर योजना की हकीकत जांचने के लिए अपने वालंटियर्स को भेजता हूं। जरूरी लगेगा तो खुद भी जाऊंगा। उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया तो हमेशा ऐसे औचक दौरों पर जाते रहते हैं।

आप कहते हैं कि सरकार चलाने का काम मंत्रियों को दिया हुआ है और आप खुद...

अरविंद केजरीवाल : सरकार के काम में जो अड़चनें डाली जाती हैं तो मैं बीच में दीवार बन कर खड़ा होता हूं, जो तीर चलाए जाते हैं उनको रोक लेता हूं। शॉक एबजॉर्बर का काम करता हूं। मैंने कहा हुआ है कि केंद्र से जुड़े फैसले मैं लूंगा।

लेकिन शॉक एबजॉर्बर का जो काम आपने अपने लिए चुना, उसमें कामयाब तो नहीं हो पा रहे। आप खुद कहते हैं दिल्ली सरकार काम नहीं कर पा रही?

अरविंद केजरीवाल : जितने काम गिनाए हैं मैंने। आप ये बताइए कि किस सरकार ने साल भर के अंदर इतने काम किए हैं? दिल्ली में किसानों की करोड़ों की जमीन का अधिग्रहण 54 लाख रुपये प्रति एकड़ से हो रहा था। हमने सर्किल रेट रिवाइज कर दिए.. लेकिन जैसे ही हमारी सरकार ऐसा कोई फैसला करती है एलजी (उप राज्यपाल) साहब आदेश को रद घोषित कर देते हैं। तो इससे तो लड़ना ही पड़ेगा ना। हम कोई अपनी जमीन जायदाद का झगड़ा थोड़ी लड़ रहे हैं। हमारे लोगों के साथ गड़बड़ करेंगे तो लड़ना तो पड़ेगा। अधिकारियों का तबादला करता हूं तो रोक देते हैं, दो अफसर गड़बड़ी कर रहे थे, सस्पेंड किया.. तो कहते हैं आपके पास सस्पेंड करने की शक्ति नहीं है। ये मैंने भारत के इतिहास में पहली बार सुना है कि कोई सीएम गड़बड़ी कर रहे अधिकारियों को सस्पेंड नहीं कर सकता। अगर ऐसा ही है तो दिल्ली में चुनाव क्यों कराया। राष्ट्रपति शासन लगा रहने देते।

लेकिन यह तो कानूनी लड़ाई है?

अरविंद केजरीवाल : कोई कानून का सहारा नहीं ले रहे। आप ये बताइए कि क्या देश का सबसे भ्रष्ट आदमी मैं ही मिला था.. जो मुझ पर सीबीआइ की रेड डाली। इतने बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी बैठे हैं, उनको छोड़कर केजरीवाल के दफ्तर पर रेड मारी.. जरूर कुछ गड़बड़ है..।

आप तो कहते हैं मोदी सरकार काम नहीं करने देती। अगर वे काम करने देते फिर कितने नंबर देते?

अरविंद केजरीवाल : मैं दी गई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही यह कह रहा हूं। बाकी चीजें तो हो जाएंगी, लेकिन भ्रष्टाचार से मेरे तन-मन में आग लग जाती है। एक बार मेरे किसी मंत्री को घूस लेते हुए रिकॉर्ड किया गया। मैंने बिना किसी को बताए उसे मंत्रिमंडल से निकाल दिया, जबकि इसकी सूचना मीडिया को या विपक्षी पार्टियों को नहीं थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा समर्पण और जज्बा और किस सरकार ने दिखाया ?

केंद्र सरकार के भी 20 महीने हो गए उनको कितने नंबर देंगे ?

अरविंद केजरीवाल : हमसे तो हमारी सरकार के बारे में पूछिए। उनके काम के बारे में उनसे पूछिएगा। मैं तो सिर्फ यह कहूंगा कि जिस तरह भारत मां के दो बेटे हैं, एक केंद्र सरकार और एक राज्य। छोटा बेटा पढ़ रहा है तो बड़ा आता है, कभी पेंसिल छीन कर ले जाता है, कभी कॉपी छीन ले जाता है। तो छोटा कह रहा है कि भैया, पढ़ने दो और आप भी पढ़ो। वर्ना 2019 की परीक्षा में फेल हो जाओगे।

पंजाब में बहुमत मिला तो आप सीएम बनने को तैयार हैं?

अरविंद केजरीवाल : पंजाब कांग्रेस के प्रधान कैप्टन अमरिंदर सिंह को सपने में भी मेरा भूत दिखाई देता है। वह कहते हैं कि हरियाणा का आदमी यहां आ रहा है। मैं कहता हूं कि मैं पाकिस्तान से नहीं आया। भारत का ही हूं। भारत में ऐसी कोई रोक नहीं। किसी राज्य का आदमी कहीं जा सकता है।

यानी आप तैयार हैं?

अरविंद केजरीवाल : मैं दिल्ली में ही खुश हूं। लेकिन पंजाब में हम जीत रहे हैं 90 से 100 सीटों पर। दिल्ली जैसा ही नतीजा वहां भी दिखेगा। पंजाब का युवा जो अपनी ऊर्जा और शौर्य के लिए प्रसिद्ध था, उसे नशे में ढकेल दिया गया। भाजपा और अकाली यह सब करवा रहे हैं और कांग्रेस भी मिली हुई है। जब केंद्र में कांग्रेस सरकार थी तो भाजपा-अकाली सरकार के मंत्री मजीठिया के खिलाफ सीबीआइ जांच होने वाली थी, मगर कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर ने ही उसे रुकवा दिया। दोनों मिले हुए हैं। जब कैप्टन थे, उन्होंने अकालियों के खिलाफ केस रजिस्टर किए, गिरफ्तार नहीं किया। दिखाने के लिए सिर्फ करते रहे। फिर अकाली आए तो अपने खत्म करवा लिए और कैप्टन के खिलाफ केस कर दिए मगर गिरफ्तार नहीं किया।

आपने भी दिल्ली में कहा था कि शीला दीक्षित के खिलाफ आपके पास कितने सुबूत हैं, लेकिन गिरफ्तार तो वे भी नहीं हुईं?

अरविंद केजरीवाल : हमारी एंटी करप्शन ब्रांच छीन ली ना। दो तो सही आप हमें एसीबी।

एसीबी मिल गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लेंगे?

अरविंद केजरीवाल : बिल्कुल। जो गड़बड़ होगी.. जैसे ही हमारी दोबारा सरकार बनी थी, शीला दीक्षित और मुकेश अंबानी वाले केस में फिर से जांच शुरू कर दी थी। मगर इस दौरान एक साल तक इनकी सरकार थी, तो इन्होंने क्या किया? इन्होंने तो एक बार भी समन तक नहीं किया। केस दबाए। हमारे पास तो जब तीन महीने एसीबी रही तो रिलायंस के सीईओ को समन किया था। सबको समन कर रहे थे। मगर इन्होंने एसीबी छीन ली।

दिल्ली व पंजाब के अलावा किस राज्य में अपनी पार्टी की ज्यादा संभावना देखते हैं?

अरविंद केजरीवाल : मैं कोई नेपोलियन थोड़ी हूं कि घोड़े पर बैठ कर दुनिया जीतने चलें.. हम तो बस जितना काम मिला है, वही ईमानदारी से कर पाएं, वही बहुत है।

राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं तो फिर अन्ना के साथ अनशन कर रहा व्यक्ति लालू से गलबहियां क्यों कर रहा है?

अरविंद केजरीवाल : नीतीश से अच्छी दोस्ती है। ममता दीदी भी अच्छी मित्र हैं। अब उनके शपथ ग्रहण में जाओ और कोई मिल जाए तो क्या कर सकते हैं? नीतीश जी ने बिहार को बदल दिया है। उन्होंने बहुत अच्छा काम किया है।

14 फरवरी को एक साल पूरा करने पर क्या करेंगे?

अरविंद केजरीवाल : जनता को रिपोर्ट देंगे। मैं और सारे मंत्री दो घंटे बैठेंगे और जनता से सीधे फोन पर सवालों के जवाब देंगे।

वेलेंटाइन डे के मौके पर ऐसी रूखी तैयारी?

अरविंद केजरीवाल : (मुस्कुराते हुए) पिछले साल 14 तारीख को ही वेलेंटाइन डे पर दिल्ली को नई तरह की राजनीति से प्यार हो गया था.। अब यह और बढ़ रहा है।

एमसीडी हड़ताल पर बहुत देर लगा दी आपने?

अरविंद केजरीवाल : हमने ही शुरुआत से सबसे ज्यादा सक्रियता दिखाई है। सारी समस्या की जड़ भ्रष्टाचार है। मैंने हिसाब लगाया कि पूर्वी एमसीडी का विज्ञापन का राजस्व सालाना सिर्फ 12 करोड़ है। यानी एक करोड़ रुपये महीना। बड़े-बड़े होर्डिग्स जो लगते हैं उनकी एक महीने की औसत लागत एक लाख होती है। पूरी पूर्वी दिल्ली में तीन-चार हजार होर्डिग्स लगे हैं जिनका रिकॉर्ड नहीं है। वे गैरकानूनी हैं। 12 करोड़ नहीं यह राजस्व 500 करोड़ होना चाहिए। विज्ञापन, हाउस टैक्स, पार्किग और पता नहीं कितने तरह के संसाधन हैं, लेकिन सब मिलकर लूट रहे हैं। इन सबकी कमान किसी एक जगह तो होनी चाहिए।

आप तो विकेंद्रीकरण की बात करते थे?

अरविंद केजरीवाल : लेकिन कोई चेन ऑफ कमांड तो होगी ना। इस तरह खुली लूट नहीं होने दी जा सकती।

लोकपाल आंदोलन किया। मगर दिल्ली को लोकपाल अब तक नहीं दिला सके। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के खिलाफ कोई शिकायत कहां करे?

अरविंद केजरीवाल : हमने तो पास कर दिया। अब यह केंद्र के ऊपर है कि वो क्या करती है। हम तो खुद कह रहे हैं कि हमारे खिलाफ जांच का कानून बने।

आपने आरटीआइ कानून के लिए आंदोलन किया था। आज केंद्रीय सूचना आयोग आपके कार्यालय के रवैये पर नाराजगी जताता है।

अरविंद केजरीवाल : अगर कुछ गलत हो रहा है तो उसे ठीक करेंगे. अगर कोई दिक्कत हो तो बताइए सारी जानकारी दी जाएगी।

पहले आप प्रो एक्टिव थे आरटीआइ को लेकर, अब नहीं लगते?

अरविंद केजरीवाल : आप बताइए क्या करना है बिल्कुल किया जाएगा।

राजनीति में आने से पहले आपने बिहार सरकार के सहयोग से वहां फोन पर आरटीआइ लगाने की सुविधा शुरू करवाई। दिल्ली में क्यों नहीं की ?

अरविंद केजरीवाल : हम सभी जानकारी हमारी वेबसाइट पर डाल रहे हैं। केंद्र सरकार में तो यह हाल है कि किसी ने प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता पर सूचना मांगी तो वह भी नहीं मिली। हमारे तो सारे ब्योरे आप बिना मांगे खुद ले सकते हैं। मैने आदेश दिए हुए हैं, कोई सूचना रोकी नहीं जाए। फोन पर आरटीआइ आवेदन लेने की सुविधा भी देंगे। अगले एक यो दो साल में यह भी हो जाएगा।

सोशल मीडिया पर, चैनलों पर आप पर इतने मजाक बनाए जाते हैं, क्या प्रतिक्रिया होती है?

अरविंद केजरीवाल : मुझे बुरा नहीं लगता। (हंसते हुए) पर जिस इंजीनियर ने जूते के लिए पैसे भेजे थे मैं उनको कहना चाहता हूं कि 364 रुपये में तो जूते भी नहीं आते। वैसे वर्ष 2000 के बाद से मैंने जूते नहीं पहने।

ऑड-इवेन क्या फिर होगा?

अरविंद केजरीवाल : यह इसलिए कामयाब हुआ क्योंकि जनता ने सहयोग किया। हम फिर जनता से बात कर रहे हैं। अब उनकी राय के साथ ही शुरू करेंगे। पिछली बार तीन दिन के लिए स्कूल बंद करने पड़े थे। अबकी बार इसकी जरूरत नहीं होगी।

33 फीसद प्रदूषण तो दोपहिया वाहनों से होता है फिर इसे क्यों बाहर रखा गया?

अरविंद केजरीवाल : अभी हाल फिलहाल में इसे दोपहिया वाहन पर लागू नहीं कर सकेंगे। हमने पाया है कि सम-विषम फामरूले में जब इतनी बड़ी संख्या में कार सड़कों से हटी तो वे कार वाले लोग अधिकांशत: कार पूलिंग कर रहे थे। लेकिन बाइक वाले मेट्रो और बस का ही सहारा ले सकते हैं। एक साथ इतने यात्रियों की हमारे पास क्षमता नहीं है। हम तीन हजार नई बसें भी ले रहे हैं।


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Millions of faces in a face - Priyadeep Kaur

2/11/2016 01:08:00 pm

The novel ‘Millions of faces in a face’ is a love story of today’s world. #shabdankan

Millions of faces in a face 

- Priyadeep Kaur

19 yeaers old, Priyadeep Kaur is an exuberant writer from Banaras. She is doing her graduation in commerce. She has managed to intrigue the youth by her blog ‘Philosophical Pergola’. She is the younget member as the Jt secretary at 'The first step trust', Varanasi and her personal library of more than 1000 books has a range varying from literature to psychology to vastu. Priyadeep is a trained classical singer and have shared stage with prominent artists. She teaches kids of villagers and labors free being the half-mother of her younger brother and her bubbly dogs. Apart from creativity, spirituality, meditation, love, and virtues are what she dies for.

‘Millions of faces in a face’ is her debut novel which is getting launched on Saturday, February 20, 2016 at Oxford Book stores New Delhi. The synopsis, I liked so much that I couldn't resist sharing it with you. And am sure that after reading this story-outline , like me, you too would like to read the young author's 1st book - ‘Millions of faces in a face’. 

Bharat Tiwari





The novel ‘Millions of faces in a face’ is a love story of today’s world. It is alike all run of the mill love stories apart from its characters who are in misery from some social diseases which are on go in youngsters, in this era.


Characters...

“Dimple Ahluwalia” is a single child with a mobile phone, the single way to get in finger with her love…

“Mangesh Rahangdale” lives his life fullest, He is handsome, and fun loving, possibly, loves for fun…

“Sumit Sharma”, a born genius but fails to crack IITs. Finally, he is in love with cigarette…

‘Nainsi’ and ‘Tasaffur’ are born in struggling families with a dream of winning poverty…

Some ill-omened one loose their parents and do not understands the kismet, So as is ‘Gurmeet’…
Beside these bits and pieces, it is the sole propose called love…

Will they find the true face of their lives or these youngsters will have to appoint a good psychiatrist???



Story Outline ... 

A ‘Banarasi’ girl with the portrayal of Kashi, the city of Lord Shiva with the eyes of a juvenile and stock-still girl. It starts with a facebook notification in Dimple Ahluwalia’s mobile phone about Sumit Sharma, which makes her give elucidation about it to her only friend, Nainsi Raj. She tells her about her school batch mate, Sumit Sharma who was the arrogant and conceited school topper. He was in another section, but they became partners for two events, in lieu of their school in class 3rd and 9th. Dimple imparts her experience about those events, which were so dodgy to forget because of Sumit’s misconduct. As for the pry opens by Nainsi, she talks with him and finds him so changed. He is broken down by failure in IITs and falls for addiction everyday for the sake of some relief. People who have bitter episodes in their life can absorb other’s pain and sorrows. Dimple tries to make Sumit feel energize again, and work hard in his target course to crush all records of IIT JEE ADVANCE. During this journey of friendship, they also meet Tasaffur and Avantika in some places in Banaras who are living their life, on the other hand, dying in poverty. Again, after years, those meetings with Dimple makes Sumit Sharma comprehend that Dimple is suffering from her inner. He doesn’t unearth her jolly and fun-loving as she was in her school days. Sumit Sharma whips her up to share what are the reasons and clauses behind this change, which cannot be consider as a change because of maturity. Then she tells her about her love, Mangesh Rahangdale whom she saw in a bakery, in Gondia, Maharashtra while she was in her grandmother’s place in summer vacations. He was attractive. In the first meeting, she apprehended what actually love at first sight means, unerringly. However, her cousin, Gurmeet who is an egotistical orphan, feels the same infatuation for him. Dimple and Gurmeet with their cousin, Saheb tried so rigid to find the boy, Mangesh whom they saw in the bakery.

She tries her greatest to put out of her mind her feelings for him and tries her preeminent to settle some love scenes between Mangesh and Gurmeet.

Mangesh never showed any interest for Gurmeet and always admire Dimple. His rejection hurts Gurmeet and she blames Dimple for everything. The end of the lovely relationship between two sisters makes Dimple to return Banaras back. From here, phone conversation starts between Mangesh and Dimple and after some months Mangesh finally proposes her to be his girlfriend. While driving and talking over the phone with Dimple, Mangesh faces a road accident. From the day of his accident, his phone is switch off. Dimple is in Banaras and she cannot do anything presently to make sure that he is alive or not. This drawback of a distance relationship makes Dimple a depression patient. Soon, she creates anxiety because of which her body parts shivers in any kind of uncomfortable situation. In the next vacations, she returns to Gondia and searches Mangesh in each road but fails. At the end of the vacations, she finally sees him near a mobile store, but, because of her sudden shivering anxiety, she runs away from him. Mangesh didn’t witness her. After some months of her return, she receives a call from Mangesh who gets her number from one culprit but a common friend. They cry together telling their situations to each other and then laugh because the bloom of their lives is back again. For the reason that Mangesh was over the bed for months in that accident, the incident makes him feel that distance relationship does not stays. The physical disappearance of Dimple sinks in always to him, which causes the formation of detachment for Dimple and her love. Dimple tries her best to sort out his discrimination but it does not work. With two years of her sufferings and her fight for her love from a distance relationship tag, which is not everyone’s cup of tea, at last, they end it up with her last conversation with him from a P.C.O. booth. Dimple, in astonishment, crying drives her scooty. She again gets an attack of anxiety while she is riding her scooty and she fells over the road, shivering. At last, Mangesh, in his height of detachment, refuses to recognize her when she is in the hospital. That is how her love story ends.

After going through the happenings with Dimple, Sumit Sharma finds her to be beautifully perfect girl, outers, and inners. He promises himself to make her cheerful again either getting her love back or by loving her, himself. The blossom for Dimple makes him explore himself as a successful IITian.

May be,a partner? Let Dimple to think over it. The story ends with an epilogue with the marriage ceremony of Tasaffur’s sister that is organized by Sumit, Dimple, and Nainsi with the cash reward Sumit gets from an organization over his research work in IIT electrical engineering department. Dimple is wearing a lehenga. Tasaffur comes to Dimple with her phone and she sees, “Mangesh Rahangdale wants to be your friend.”


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मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव — गीताश्री

2/10/2016 11:44:00 pm


मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव

गीताश्री

मैं सोचती कि मन्नूजी इस मामले में वाकई खुशनसीब हैं। लेखन को सपोर्ट करने वाले पति लेखिकाओं के भाग्य में कम ही होते हैं। जिनके होते हैं वे आसमान छू लेती हैं। मैं मन्नूजी को बता नहीं सकी ये सब — गीताश्री 

गीताश्री ने मन्नूजी पर यह जो संस्मरण लिखा है, इसमें एक बेमिसाल शिल्प दिखता है... हम कहानियों में प्रथम पुरुष, द्वितीय पुरुष व तृतीय पुरुष संवाद को तो जानते हैं लेकिन यहाँ ... यहाँ गीताश्री ने – मन्नूजी के बारे में अपनी सारी जानकारियाँ'/धारणाएं राजेंद्रजी के साथ हुए अपने सवादों से – इतनी खूबसूरती से कही हैं जो कम से कम मेरे लिए बेमिसाल है... वाह गीताश्री वाह !!!
पढ़िए – संस्मरण लेखन की एक अद्भुत मिसाल जिसमे एक मन्नूजी के बारे में दूसरे राजेंद्रजी के माध्यम से तीसरी गीताश्री किस तरह एक ही समय में दो इंसानों के एक-दूसरे के होने का पता देती हैं. 

भरत तिवारी



मैं काम की बात कम करुंगी, आपकी तरफ से लड़ जाऊंगी | मन्नू भंडारी वाया राजेन्द्र यादव — गीताश्री #शब्दांकन





“सुना है, तुम मुझसे बहुत डरती हो...?”

वह मुस्कुरा रही थीं।

“जी...नहीं… बस ऐसे ही… किसने कहा आपको...?”

अपने स्वभाव के अनुरूप मैं शरारती हंसी हंस रही थी। पहली बार अनौपचारिक माहौल में मिल रही थी। धुंधली सी याद है उस मुलाकात की। उसके पहले जब भी मिलती थी, उन्हें नमस्ते करके खिसक जाया करती थी। वे गंभीर लगती थीं और अतिरिक्त और सायास गंभीरता मुझे भयभीत कर देती है। ओढ़ी हुई गंभीरता मैं तुरत पकड़ लेती हूं और उससे भय नहीं खाती, उस पर तरस खाती हूं। मन्नूजी हमेशा मुझे आंतरिक रुप से गंभीर लगती रहीं। राजेन्द्रजी ने कई बार फोन पर भी बातें करवाईं और मिलवाया भी, मौके पर। मैं उनसे बात करने के लिए कभी इच्छुक नहीं हुई। नमस्कार करके खिसक लेने का मन होता था। यही करती थी। एकाध बार उनके पास बैठने का मौका मिला तो मैं बहुत असहज महसूस करती रही।

जाने क्यों मैं सहज नहीं रह पाई उनके सामने। इसकी पड़ताल बाद में करुंगी। पहले इस संवादी मुलाकात के बारे में।

वे मुझसे पूछ रही थीं—

“तुम मुझसे डरती क्यों हो ?”

“किसने कहा आपको... राजेन्द्रजी ने...?”

“अपने सहयोगी को तुमने भेजा था न इंटरव्यू के लिए, वह आई थी, वही बता रही थी... मुझे बहुत हंसी आई, तुम्हें डरने की क्या जरूरत...?”

और मैं खिलखिला पड़ी। यह सब मेरी सहयोगी का किया धरा। मजे-मजे में उसने कहा होगा। सारा भय हवा। मैं वहां कह नहीं पाई कि भय और संकोच में महीन रेखा होती है। वही सालो खींची रही हमारे बीच। वे सवाल पूछ कर चली गईं लेकिन कई और सवाल जगा गईं। मैंने उनसे भय की बात अपनी कुलीग से की थी। आउटलुक, हिंदी के साहित्य विशेषांक का मैं संपादन कर रही थी। हिंदी साहित्य के टाप टेन कथाकारों का चयन होना था, पाठकों के वोट से। उदय प्रकाश और मन्नू भंडारी दो नाम सबसे आगे चल रहे थे। आखिर परिणाम भी इसी तरह आया। मन्नूजी लोकप्रियता में दूसरे नंबर पर रहीं। यह वोटिंग श्रेष्ठता के आधार पर नहीं, लोकप्रियता के आधार पर हुई थी। इसके लिए मैंने और मेरी पत्रिका ने बहुत आलोचना झेली। कुछ दोस्तों ने ब्लॉग पर मेरे खिलाफ खूब जहर उगला।

इस तरह की हेडिंग लगाई गई — गीताश्री की समझ बकरी चरने चली गई...

जिसने लिखा, वे तब मुझे नहीं जानते थे। उन्होंने साहित्य विशेषांक की घोषणा देखी और अंक के संपादक की धज्जियां उड़ा दी। बाजार में साहित्य को देख कर सब हाय-हाय कर उठे थे।

हम आलोचनाओं से बेपरवाह अंक की तैयारी में लगे थे। उदय प्रकाशजी से संवाद करने का मेरा जिम्मा था और मैंने अपने सहयोगी को कहा कि मन्नूजी से बात कर ले। इससे पहले मैंने राजेन्द्रजी को पूरा मामला बताया और कहा कि मैं मन्नूजी से बात नहीं कर पाऊंगी। राजेन्द्रजी चाहते थे मन्नूजी से मैं बात करुं। मैंने उन्हें तर्क दिया —

“मैं काम की बात कम करुंगी, आपकी तरफ से लड़ जाऊंगी। बेहतर हो मैं उनसे दूर ही रहूं, जैसे अब तक रही।“

यादवजी हंसे—

“अबे, तुझे खा जाएगी क्या... जा मिल कर आ। कुछ नहीं कहेगी तुझे। तुझे ही जाना चाहिए। तेरे मन में जितनी भड़ांस है निकाल लेना... बिना मिले इमेज बना कर बैठी है... गीता की बच्ची...”

और एक प्यारी गाली उन्होंने उछाल दी जो अक्सर फोन करते ही दिया करते थे। जिसके बिना बात शुरु होती नहीं थी। वह गाली नहीं, हैलो टयून थी मेरे लिए। जो हमारे संबंधों की ऊष्मा मापक यंत्र की तरह काम करती थी।

इस अंक के आने तक यादवजी रोज फोन करके वोटिंग ट्रेंडस के बारे में पूछते। रोज दो तीन उत्सुकताएं होतीं कि कितनी चिट्ठियां आईं, मन्नू को कितने वोट मिले...कौन आगे चल रहा है...

मुझे हैरानी होती कि टॉप टेन की प्रतियोगी सूची में खुद राजेन्द्र यादवजी का नाम शामिल है पर किसी रोज फोन करके ये नहीं पूछा कि मेरे लिए कितने खत आए या मुझे कितना वोट मिला... उनकी सारी चिंताएं मन्नूजी को लेकर थीं और वे रोज खबर रख रहे थे। ज्यादातर चिट्ठियों में मन्नूजी को वोट मिलता था। लोकप्रियता में वे अपने समकालीनों में बहुतों को पीछे छोड़ रही थीं। राजेन्द्रजी तो वोट में हमेशा मन्नूजी से बहुत पीछे रहे। मैं उनसे कहती — देखिए, मन्नूजी ने आपको पीछे छोड़ दिया। वे आपसे ज्यादा पॉपुलर साबित हो रही हैं।

वे हंसते —

“मन्नू तो है ही पॉपुलर। इसमें कोई शक। मन्नू ने मुझसे अच्छी कहानियां लिखीं हैं...”

मैं पूछती — “आप इतने बेचैन क्यों है रिजल्ट के लिए ? जिस दिन फाइनल होगा, छपने से पहले आपको बता दूंगी (ये अलग बात है कि हमने फाइनल रिजल्ट उनको नहीं बताया)।“ पर वे नहीं माने. रोज सुबह की आदत थी फोन करना, सो करते और कहते, आफिस जाकर चिट्ठियां देख कर बताना। उनकी उत्सुकता और बेचैनी चरम पर थी। यह बात मुझे हैरानी के साथ-साथ सुख से भर देती थी। अलगाव के बावजूद इतना कन्सर्न... नामुमकिन। वह भी तब जब खुद भी प्रतियोगिता में शामिल हों। मेरा मन होता कि मन्नूजी को फोन करके या मिल कर ये बातें बताऊं कि देखिए... कितने चिंतित रहते हैं आपके लिए। अपने बारे में कभी नही पूछते, सिर्फ आपके बारे में चिंता है। संकोचवश नहीं कह पाती कि पता नहीं वे इस बात को किस तरह लें।

एकाध बार मैंने यादवजी को उनका वोट बताने की कोशिश की तो वे निर्विकार भाव से सुनते रहे, जैसे अरुचि हो रही हो। वे अपनी लोकप्रियता के दम पर मन्नूजी को कमतर नहीं करना चाहते थे। शायद वे मन ही मन पाठकों को धन्यवाद भी दे रहे थे, जो उन्हें कम वोट कर रहे थे। मैं सोचती कि मन्नूजी इस मामले में वाकई खुशनसीब हैं। लेखन को सपोर्ट करने वाले पति लेखिकाओं के भाग्य में कम ही होते हैं। जिनके होते हैं वे आसमान छू लेती हैं। मैं मन्नूजी को बता नहीं सकी ये सब। उनके रिएक्शन से भय लगता था। हो सकता वे इस पूरी प्रतियोगिता को ही खारिज करके हमें फटकार दें। उस दौर में कई साहित्यकारों ने बहुत फटकारा और बाजारवाद का प्रभाव बताकर इस सर्वे को ही खारिज कर दिया।

इसी कारण यादवजी के बार-बार आग्रह पर भी मैं मन्नूजी के पास नहीं जा पाई। उन्हें नमस्ते करके खिसक जाना चालू रहा। उस शाम जब वे मुझसे पूछ रही थी तब मैं भीतर से हल्की हो रही थी। मेरे मन में बर्फ-सी जमी थी उन्हें लेकर, वो पिघलने लगी। कुछ शब्द गुस्से में लरजने लगते थे कि इतने साल निभाया तो कुछ साल और निभा लेतीं। इस उम्र में अलग होने का फैसला हमें रास नहीं आया...।

बोल फूटते नहीं थे।

उसके बाद कई मुलाकातें हुईं, हल्की बातें हो जाती थीं। मैं उनके बहुत करीब कभी नहीं जा पाई। मैं जितनी यादवजी के करीब थी, उतनी ही मन्नूजी से दूर थी। पर क्या सचमुच मैं उनसे दूर थी...

यही सारे सवाल तो वो जगा गईं थीं।

नहीं...! कैसे दूर हो सकती थी ? स्थानों की दूरियां थीं, पर मैं मन्नूजी को जानती थी... मार्फत राजेंद्रजी। बहुत जानती थी... अच्छे से जानती थी। मन्नूजी मेरी उत्सुकताओं में शामिल थीं। बातचीत में जिक्रे-यार जरूर होता। चूंकि अनगिन अकेली शामें मैंने राजेन्द्रजी के साथ घर पर बिताईं हैं, जहां हम साहित्य से लेकर दुनिया भर की बातें करते थे। हर बार दो स्त्रियां चर्चा में जरूर आती, वो भी मेरी तरफ से। एक मन्नूजी और दूसरी मीता। मीता से कई बार उन्होंने फोन पर मेरी बात भी करवाई। मैं उनसे मिलने आगरा जाने की सोचती रह गई। जिन दिनों यादवजी पर किताब संपादित कर रही थी, उन्हीं दिनों मीता से भी बातचीत करके किताब में शामिल करने की योजना थी। उन्हें मैंने खत भी लिखा था। बात बन भी जाती पर यह बात रह ही गई। शायद मेरे भीतर यादवजी जितना साहस नहीं था कि मीता से मिल आऊं। मन्नूजी क्या सोचेंगी... यही सोचती रह गई। क्योंकि मैं मन्नूजी का स्वभाव यादवजी के जरिए जान चुकी थी। वे निडर थे, भयहीन । मुझे लगता था कि मैं मन्नूजी के सामने पड़ूंगी तो कहीं गिल्ट न महसूस करुं... यादवजी चाहते थे कि मैं आगरा जाकर उनसे मिल आऊं। कहीं भीतर में सहज स्त्रीसुलभ संकोच था, जो रोक रहा था।

उस दौर में मन्नूजी की आत्मकथा के अंश छपे थे। जिसमें उन्होंने यादवजी के आरोपों का जवाब गिन-गिन कर दिया था।

मुड़-मुड़ के देखता हूं के बदले मुड़-मुड़ के देखा था तो इसे भी देखते... जवाब की शक्ल में मुझे शाम को पहुंचते ही यादवजी ने थमा दिया।

“ले पढ़... मन्नू ने बहुत बढिया लिखा है...”

“ये बढिया लिखा है... आपको धो डाला है.... क्या भिगो-भिगो कर मारा है...”

“मन्नू के साथ सबसे बड़ी समस्या है कि वह हर चीज के लिए मुझे ही कसूरवार समझती है। दुनिया में कहीं कोई घटना घट जाए, उसके लिए मैं ही कसूरवार हूं... सबके पीछे मुझे ही दोष देगी...”

बोलते हुए हंसने लगते। इतने आराम से वह ये सब कह जाते थे। मैं सुखद आश्चर्य से भर जाती कि अलग होने के बाद भी इतना प्रेम बचा रखा है।

“सच बताइएगा... कौन-सी बात है जो आपको मन्नूजी से बांधे हुए है... आप अलग नहीं हो पाते उनसे...?”

“मेरी आत्मकथा पढ़ लो...सारे सवालों के जवाब हैं वहां... मन्नू ने मुझे हमेशा कुंठारहित साथ दिया। उसने उस वक्त मुझसे शादी की जब मैं लंगड़ा था। वह असाधारण साहस की महिला है, उसने मेरे लिए बहुत सुना और सहा है…”

मेरे मन में मन्नूजी “आपका बंटी” और “महाभोज” की लेखिका के तौर पर दर्ज थीं। “रजनीगंधा” फिल्म की खुमारी इस दौर में भी हावी थी। राजेन्द्र यादव से ज्यादा कहूं तो मन्नूजी का असर था। हम जब बड़े हो रहे थे तब लेखिकाएं ही हमारा आदर्श रहीं। कमला दास, अमृता प्रीतम, मृदुला गर्ग और मन्नू भंडारी सबसे ज्यादा हमारे जीवन और सोच में घुसी हुई थीं। “आपका बंटी” ने तो हमें खूब रुलाया। परसाद की तरह बांट-बांट कर होस्टल में हमने कुछ किताबें पढ़ीं जिनमें एक “आपका बंटी” रहा। वह दौर था जब समाज में बदलाव की आहट सुनाई दे रही थी। लड़कियां बदल रही थीं और उनका साहित्य भी। मन्नूजी ने उसी समय हमारे कच्चे मन पर दस्तक दिया और वहां छप गईं।

“आपका बंटी” की लेखिका से कभी मिल पाएंगे, ये छोटे शहर की धुर सामंती, गैर साहित्यिक परिवार की लड़की कभी नहीं सोच सकती थी। अमूर्त चाहतें भीतर बहुत पोसाती रहती हैं अपने आप। दिल्ली में आने के बाद क्या पता था कि लेखिका से नहीं, उनके पति से मित्रता हो जाएगी वो भी इतनी ज्यादा कि मेरी प्रिय लेखिका के बारे में बिन मिले ही सबकुछ जान सकूंगी।

पहली बार किसी स्त्री को किसी पुरुष के मुंह से इतना सुना और समझा जाना। जितनी रुचि लेकर वह मन्नूजी के बारे में बताते वह बहुत भावुक कर देने वाले पल होते। कई बार हम झल्ला कर कहते कि उन्होंने तो आपको नकार दिया, अपनी जिंदगी और साथ से बेदखल कर दिया, आप क्यों अब भी नहीं बदले उनके प्रति...।

यह तस्वीर का एक ही पक्ष था जो मैं देख रही थी। दूसरा राजेन्द्रजी दिखा रहे थे। मुझे हजम नही होती थी ये बात कि वे मन्नूजी को लेकर खुद से ज्यादा चिंतित रहें। मैं सचमुच नादां थी कि रिश्तों की गहराई समझ नहीं पा रही थी। मैंने अब तक रिश्तों को टूटते, उनकी छीछालेदर होते देखा था। वे बड़े साधारण लोग थे। यहां दो असाधारण लोगों से मेरा पाला पड़ा था। जो दूर रह कर भी एक दूसरे के लिए इतने बेचैन और चिंतित थे। जो रोज बात करते और एक दूसरे का हाल पूछते थे। मैं एक तरफ की बेचैनी और चिंताएं देख रही थी, दूसरी तरफ के बारे में अंदाजा लगा सकती थी। उम्र के इस पड़ाव पर राजेन्द्रजी का अकेलापन मुझे खलता और मैं चिढ़ कर कहती –

 “आप दोनों को साथ रहना चाहिए। दोनों को एक दूसरे का साथ देना चाहिए... क्यों अकेले-अकेले...”

“नहीं... अब संभव नहीं। यह अकेलापन मन्नू का चयन है और मैं निर्वाह करुंगा। उसने बहुत साल निभाया। मुझे झेलना-सहना बहुत आसान काम नहीं... अच्छा ही हुआ हम अलग हुए, खुशी और सुकून से हैं… कम से कम घरेलू कलह में हम दोनों की रचनात्मकता नष्ट तो नहीं हो रही है...”

“आप फिर से साथ क्यों नहीं रहना चाहते...?”

“अब हम रह भी नहीं सकते... मैं हूं महफिलबाज, मन्नू को शांति पसंद। वो ये सब पसंद नहीं करती। मुझे चौपाल बहुत पसंद है, खाना पीना, शोर शराबा... बहुत लोगबाग मिलने-जुलने वाले आते हैं... इसीलिए बीमार पड़ने पर भी नहीं जाता वहां...”

“मन्नू तो बहुत बुलाती है...मैं नहीं जाना चाहता… उसे मेरी वजह से दिक्कत होगी... मैं ये नहीं चाहता... हम अलग अलग रुटीन जीने वाले लोग बन चुके हैं... मेरी स्वतंत्रता उसके लिए विरोध की वजह है, मुझे अपने लिए अलग स्पेस चाहिए था, मन्नू को मुझमें समर्पित पति की तलाश थी... जो मैं कभी हो न सका...”

मुस्कुराते हुए सिगार मुंह में लगा लेते।

“क्या आप मन्नूजी को लेकर गिल्ट में रहे हैं...?”

“हां, बहुत ज्यादा... हमेशा मन में बना रहा... मैं सचमुच घरेलू किस्म का जीव नहीं था... मन्नू टिपिकल स्त्री है, खोंटी घरेलू, इतनी बड़ी लेखिका होते हुए भी उसका पारिवारिक मूल्यों में अगाध विश्वास रहा है, मैं ही पकड़ में नहीं आ सका। हमेशा छिटकता रहा... ये सब मैं लिख चुका हूं... किताब में पढ़ लेना...”

सिगार के धुएँ में उनके चेहरे की सिलवटें छुप जातीं। चश्मे के भीतर आंखें बरसती रही होंगी शायद। मैं गौर से देख नहीं पाती थी। क्योंकि हमारी बातचीत का मुद्दा मन्नूजी के अलावा भी बहुत कुछ था।

मन में हमेशा एक बात खटकती कि मन्नूजी इन पर इतना आरोप लगाती हैं, क्या उनके जीवन में कभी कोई पुरुष नहीं आया। कोई दूसरा आदमी...!

राजेन्द्र यादव की लोकतांत्रिकता ही इस तरह के सवाल पूछने की अनुमति दे सकती थी। किसी और महिला के पति से आप ये सवाल नहीं पूछ सकते। यह असाधारण जोड़ा था।

“ये कैसे हो सकता है कि यादवजी की इतनी बेवफाई झेलने और लेखन में उच्चतर मुकाम पाने के वावजूद मन्नूजी की किसी पुरुष से दोस्ती की बात कहीं नहीं सुनाई देती।“

इस बात पर राजेंद्रजी की अबूझ मुस्कान फूटती।

“मन्नू के मित्र रहे हैं। कमलेश्वर, मोहन राकेश से खूब अच्छी दोस्ती रही है, मन्नू ने दोनों पर लिखा भी है, जिस दौर में हमारी राकेश से खटपट चलती थी उस दौर में मन्नू ने राकेश की सराहना की थी। मैं हमेशा इस बात का पक्षधर रहा हूं कि पति पत्नी हुए तो क्या हुआ, दोस्ती अपने हिसाब से की और निबाही जानी चाहिए। ये ना हो कि पति की लड़ाई हो तो पत्नी भी रुठ जाए उनसे। लेखकीय दोस्तियां होती हैं। इसमें सनसनी मत ढूंढो तुम लोग...”

इतना कह कर वे डांटने लगते–

“क्यों जानना है तुमलोगो को ये सब…?”

“आप लगातार उनके आरोप झेलते रहे, पलट कर कोई ऐसा आरोप जड़ा नहीं तो हमें हैरानी हुई... आमतौर पर दोतरफा आरोप-प्रत्यारोप होते हैं... आप पर तो घाघरा पल्टन के सरगना होने के आरोप तक लगे हैं...”

“लगने दे... क्या फर्क पड़ता है, क्या इससे हमारा मूल्यांकन होगा कि हमारे कितनों से संबंध रहे हैं, हम कितनों के साथ सोए-जागे रहे। हिंदी पट्टी की सारी चिंताएं मुद्दो से हटकर इसी के ईर्दगिर्द रहती है। इस सब में मत घुसो तुम लोग।“

लेकिन आप दोनों ने अपने संबंधों की हर बात सावर्जनिक कर दी। साहित्य में पर्सनल संबंध पहली बार इस तरह उछले। हिंदी पट्टी क्या करे...

मेरा संकेत मन्नूजी की आत्मकथा – एक कहानी यह भी – की तरफ था। जिसे मैं तब तक पूरा पढ़ चुकी थी। मन्नूजी से पूछ नहीं सकी थी, लेदे के राजेन्द्रजी थे जिनसे आप कुछ भी पूछ सकते थे और जवाब की उम्मीद कर सकते थे।

वह हमेशा उकसाते कि तुझे मन्नू से पूछना चाहिए। इंटरव्यू कर सकती हो। मैं खुद पर आश्चर्य कर रही हूं कि कौन सी बात थी जो मन्नूजी तक जाने से रोकती थी। कहीं मन में उनके प्रति गुस्सा कि वे अलग क्यों हुईं या उन्हें लेखक पति के प्राइवेट स्पेस की चाहत का सम्मान करना चाहिए था। या उनकी बेटी रचना की तरह सोच रही थी कि दोनों को बहुत पहले अलग हो जाना चाहिए था। अब जबकि दोनों शिखर पर थे, उम्र के इस दौर में जहां साथी की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब अलग होने का फैसला मुझे जंचा नहीं। शायद पारिवारिक मूल्य मुझे जकड़ कर रखते हैं इसलिए इन दोनों के संबंधों पर मैंने हमेशा भावुक होकर सोचा और मन्नूजी से हल्की नाराजगी रखती आई।

मन्नूजी की इमेज के पीछे राजेन्द्रजी का ही तो हाथ है जो गाहे-बगाहे चर्चा करके, कुछ लिख-पढ़ कर मेरे मन में उन्होंने बनाई थी जिसके तहत मन्नूजी परिवार पसंद महिला रही हैं। मेरे हमदम मेरे दोस्त में राजेन्द्रजी ने लिखा भी है –

“अक्सर मन्नू उन्हीं लोगो से मेरा मिलना-जुलना पसंद और प्रोत्साहित करती है जो सदगृहस्थ हों, पति लोग सज्जन हों, पत्नियों का हर कहना मानते हों, उनके साथ बाजार जाकर बेड-कवर, क्राकरी, साड़ी पर्दे लाते हों। कभी अकेले बाहर घूमने न जाते हों और सिनेमा के पास से तो बिना पत्नी को साथ लिए निकलते भी न हो । ठीक साढे पांच बजे घर आ जाते हों, रोज बता देते हों कि आज यह पकेगा...।“

पति पर पूरी तरह न्योछावर पत्नी मन्नूजी और आदर्श पति की जिद रही उनकी। जो पूरी न हो सकी। कहीं न कहीं मन टूटा होगा। इसका अहसास राजेन्द्रजी को विछोह के बाद हुआ और मन्नूजी को...? जिनके लिए दुनिया का सबसे “अधम आदमी” राजेन्द्र यादव और दुनिया का “सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति” भी राजेन्द्र यादव रहे...। उनके मन की थाह पर्सनली नहीं मिली। उनकी आत्मकथा में गहरे अवसाद हैं, तकलीफें हैं। उन्होंने लिखा भी है कि ठीक-ठीक उन तकलीफों के शायद न पकड़ पाऊं पर यह तो लिख ही दिया—

“आज जब मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूं, पर राजेन्द्र के साथ रहते हुए भी तो मैं बिल्कुल अकेली ही थी। पर कितना भिन्न था वह अकेलापन जो रातदिन मुझे त्रस्त रखता था । साथ रह कर भी अलगाव की, उपेक्षा और संवादहीनता की यातनाओं से इस तरह घिरी रहती थी सारे समय कि कभी साथ रहने का अवसर ही नहीं मिलता था। आज सारे तनावों से मुक्त होने के बाद अकेले रहकर भी अकेलापन महसूस ही नहीं होता। कम से कम अपने साथ तो हूं।“

उनके अकेलेपन और खुद के साथ होने ने उन्हें मुझसे जोड़ दिया है। उनकी सफरिंग और पीड़ा के अध्याय खुल रहे हैं। मेरे भीतर नाराजगी की गांठ खुलने लगी है। लेखन और जीवन का अंतर एक स्त्री के लिए कभी सह्य नहीं हो सकता।

और यही एक बात... राजेन्द्रजी के मार्फत पता नहीं चली।

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प्रेम भारद्वाज - सुंदरता दुनिया को बचा सकती है, आदमी को नहीं

2/10/2016 05:22:00 pm

इस निर्मम समय में हम निराश-हताश लोगों से बचते हैं - प्रेम भारद्वाज #शब्दांकन

इस निर्मम समय में हम निराश-हताश लोगों से बचते हैं

- प्रेम भारद्वाज


वसंत के हत्यारों की खोज


हम सब जो जीवित हैं
अपना एक जीवन गुजारते हैं इसे जीने में
और एक दूसरा जीवन उस बारे में सोचने में
और जो इकलौता जीवन हमारे पास होता है
वह बंटा होता है 
सच्चे और झूठे जीवन के बारे में
लेकिन कोई नहीं बता सकता
कौन-सा सच्चा है
और झूठा कौन-सा
जैसे-जैसे हम जीते जाते हैं
वह अभिशप्त होता है सोचने के लिए
'फर्नांदो पैसोआ'


अगर ईश्वर है (जो कि नहीं है) और वह प्रार्थनाएं सुनता है (जानता हूं वह पत्थर है) तो मैं इस दुनिया के वास्ते अभी और इसी वक्त यह प्रार्थना करता हूं (इसे मेरी इच्छा समझा जाए) कि अगला क्षण आने से पहले दुनिया की तमाम भाषाओं-बोलियों के शब्द जलकर भस्म हो जाएं। शब्दों की मलिनता और उनके बढ़ते फरेब से घबराकर मैं यह कहने को मजबूर हूं कि शब्दों ने जितना इस सभ्यता को दिया है उससे ज्यादा मनुष्यता से छीना है। आप आजाद हैं मेरी इस सोच को अव्यावहारिक, अवैज्ञानिक और पागलपन करार देने के लिए। लेकिन शब्दों के दोगलेदन के खिलाफ उनके मिट जाने की कामना को मेरा प्रतिरोध माना जाए।

भूख रोटी से मिटती है
शब्द रोटी नहीं बनते


शब्द की ईजाद आदमी को आदमी से जोड़ने, भावों की अभिव्यक्ति और सभ्य होने के लिए हुई थी। लेकिन शब्दों ने आदमी को अदमीयत से दूर कर दिया। सभ्यता एक मुखौटा, एक पोशाक बनकर रह गई। इस पोशाक के नीचे हम एक आदिम युग की तरह बर्बर और असभ्य हैं। शब्द नहीं होते तो विद्यालय नहीं होते, विश्वविद्यालय नहीं होते। वहां रोहित वेमुला नहीं होता। ‘राष्ट्रवाद’ के रस्से से बांधकर उसका निष्कासन नहीं होता, उसका खत नहीं होता। खत आखिरी नहीं होता। और उसके दर्द को बयां करने के लिए मुझे फिर से दिलफरेब शब्दों की शरण में नहीं जाना पड़ता।

खामोश होने से पहले उसकी पसलियों के नीचे धड़कते दिल में सपने थे। 26 साल पहले जिसकी नाभिनाल से काटकर अलग कर दिया गया वह मां थी। वह महज टुकड़ा नहीं, पूरा का पूरा जिगर था अपनी इस मां का। अब मां है। जिगर नहीं है। जिगर के बगैर जीना क्या होता है, अगर आप यह जानना चाहते हैं तो रोहित की मां के चेहरे को देखिए जहां दर्द ने अपनी आवाज खो दी है।

जिस तरह से बासठ लोगों ने दुनिया की आधी संपदा पर कब्जा जमा लिया है। उसी तरह से चंद लोगों ने खुद को मंच पर स्थापित कर बाकी लोगों को मैदान पर धकेल दिया है

दक्षिण के कन्याकुमारी के इलाके से ठीक उल्टी दिशा में स्थित कश्मीर है। वहां भी वसंत में अंत की कथाएं हैं। वहां भी मां है। उसकी आंखों में इंतजार है। इंतजार कश्मीर का दर्द है। पच्चीस सालों से वह अपने जवान बेटे का इंतजार कर रही है। मगर कमबख्त दिल है कि हकीकत को कबूल करने से खौफ खाता है। हौलनाक सच को स्वीकारने का साहस नहीं होता। उम्मीद को आप भरम का नाम दे दीजिए। लेकिन इस दुनिया में करोड़ों लोग हैं, जिनके लिए मृत्यु की तंग स्याह कोठरी में उम्मीद रोशनी की एक बेहद महीन लकीर है जो उनको यह भरोसा देती है कि कोठरी के बाहर सूरज है, उजाला है। यह भरोसा ‘कजा’ और ‘सजा’ के स्याहपन को कम कर देता है। यह एक सांस से अगली सांस तक के सफर को आसान तो नहीं मगर जारी रखने में मददगार जरूर साबित होता है।

अब सामने इस साल का नया कैलेंडर है। इसके बारह महीनों में  दर्द के बारह चेहरे हैं। इसे बारहमासा समझने की भूल मत कीजिएगा। बारह जख्मों का चेहरा है, जिनके नाम हैं, हर चेहरे की कहानी है जो एक-सी ही मालूम होती हैं। इन कथाओं में कोई नायक नहीं है और खलनायक के चेहरे में कई चेहरे घुले-मिले हैं जिनमें से असली को पहचानना कठिन है। यह वक्त का सितम नहीं है। न बदनसीबी का उलझा जाल। ये कहानियां उस कश्मीर की हैं जो सियासत की सलीब पर टंगा वह जिस्म है जो जीने-मरने के फर्क को

भूलकर ‘सहने’ को अपना मुस्तकबिल नहीं मान पा रहा है। खैर ठाकुर प्रसाद, कालनिर्णय और विजय माल्या के नंगी तस्वीरों वाले कैलेंडर से जुदा इस ‘इंतजार कैलेंडर’ को तैयार किया है एपीडीपी ने। इसके मुताबिक 1989 से अब तक कश्मीर में 8,000 से लेकर 10,000 लोग लापता हुए हैं जिनमें अधिकतर युवा हैं। लापता हुए हजारों लोगों में से बारह युवाओं की तस्वीर इस कैलेंडर के बारह पन्नों पर लगाई गई है। हर तस्वीर के साथ उस शख्स के लापता होने की कहानी भी लिखी गई है। दुख की कथाएं अलग होती हैं। उसका रंग एक होता है। अलग-अलग दिनों में शरणार्थी बनकर रहने वाली पीड़ा और अलग-अलग आंखों से बहने वाले आंसुओं का रंग एक होता है। भूगोल और काल इसमें फर्क नहीं कर पाते। सृष्टि में प्रथम बार रोने वाले वियोगी के आंसू और रोहित के लिए रोने वाली उसकी मां के आंसुओं में कोई फर्क नहीं है।

शब्द ही वह पनाहगाह हैं, जहां झूठ छिपता है

रोहित और कश्मीर में ‘इंतजार कैलेंडर’ और प्रकाश के अंत के बीच कुछ घटनाएं जो आहत करती हैं। सिनेमा-रंगमंच के एक अभिनेता ‘थे’ राजेश विवेक। वह इस कदर खामोशी से कूच कर गए कि कहीं किसी ने नोटिस तक नहीं ली। युवा रंग समीक्षक अमितेश कुमार ठीक लिखा, ‘‘रंगमंच उन्हें जीविका नहीं दे सका और सिनेमा उनकी प्रतिभा का समुचित उपयोग नहीं कर सका। कई मौकों पर हम जान भी नहीं पाते कि ऐसा अभिनेता किस आत्मसंघर्ष से गुजरा होगा।’’ हम सामने खड़़े आदमी को देखते है, उसके भीतर छटपटाते-जूझते असहाय-बेबस आदमी को नहीं। हम सब अपनी बेबसी को सबसे छिपाकर ढोते रहते हैं। जबकि हम कहार नहीं होते। पालकी समाज से गायब है। वह सिर्फ तस्वीरों-फिल्मों में रह गई। मगर हम सब ऐसे कहार हैं जो अपने-अपने दुखों की ‘पालकी’ चुपचाप ढो रहे हैं। हमें  यह डर भी है कि हमें कोई कहार न समझ ले, हमारे कंधे  पर  पड़े बोझ को देख हमें  ‘दीन-हीन’ न मान ले। हम सब ‘हार’ से बचने के लिए गुमनाम कहार बन गए हैं।

प्रेम भारद्वाज - सुंदरता दुनिया को बचा सकती है, आदमी को नहीं #शब्दांकन
इन पंक्तियों के लिखे जाने के बीच ही हमारा युवा कवि-मित्र प्रकाश भी हताशा के अंधेरे में फना हो गया। शब्दों ने उसका साथ नहीं दिया। उसे शब्द से ज्यादा अर्थ की जरूरत थी जो नहीं मिला। वह आगरा में ताजमहल के पीछे दस हजार महीने में पत्नी-बच्चे समेत अपनी जिंदगी जीने के नाम पर थेथरई कर रहा था। वह अपनी कविता दिखाता था। दुःख छिपाता था। ताजमहल की ऐतिहासिक सुंदरता भी उसके संत्रास को कम नहीं कर सकी। सुंदरता दुनिया को बचा सकती है, आदमी को नहीं। संवेदनहीन होते समय में वह खालिश संवेदना से लबरेज था। अगर ज्यादा भावुक नहीं होता तो कुछ भी कर लेता। जिंदगी को अभी और जी लेता। रोहित की तरह प्रकाश की इच्छा भी बड़ा लेखक बनने की थी। बड़े लेखक की समाज में क्या हैसियत है, इसे भी जरा देख लिया जाए। जिस दिन प्रकाश ने दुनिया को अलविदा कहा उसी दिन दोपहर को हिंदी के एक बड़े लेखक अपने युवा मित्रा के साथ रोजगार ढूंढ़ रहे थे। सत्तर साल की उम्र में उनको दिल्ली में  रहने के लिए न्यूनतम धन  की दरकार है। इसके लिए वह बेहद परेशान हैं। वह पिछले चालीस साल से शब्द रच रहे हैं- नाम मिला, मगर नाम से क्या होता है। भूख रोटी से मिटती है। शब्द रोटी नहीं बनते।

शब्द रचकर चहकने वालों की एक अलग जमात है। जो जितनी मेले में है, उससे ज्यादा बाहर। उनके लिए सब कुछ मेला है। माॅल है। उत्सव है। ऐसे लोग हाथ में चिराग नहीं एलईडी बल्ब लेकर अँधेरे  ढूंढ़ रहे हैं। अपने कुत्तों पर एक महीने में हजारों रुपए खर्च करने वाले भूख पर कविता लिखते हैं। साए-सुकून का जीवन बसर करने वाले धूप का ताप बताते हैं। होगी हमारे लिए यह जिंदगी दोजखनामा, मगर उनके लिए वक्त का हर हर्फ मोहब्बतनामा है- ऐसी मोहब्बत जिसमें न ‘म’ से मर्म है, न ‘त’ से तड़प। बाकी सब कुछ है। नहीं बंधु। इसे जजमेंटल होना मत मानिए, इतना जरूर है कि यह बात सौ फीसदी नहीं सत्तर फीसदी लोगों पर लागू होती है जिस तरह से बासठ लोगों ने दुनिया की आधी संपदा पर कब्जा जमा लिया है। उसी तरह से चंद लोगों ने खुद को मंच पर स्थापित कर बाकी लोगों को मैदान पर धकेल दिया है। बात बस मैदान तक होती तो फिर भी गनीमत थी, लेकिन अब उन्हें मैदान से ‘मसान’ की और धिकयाया जा रहा है। ‘मंच’ का विपरीतार्थक शब्द ‘मसान’ तो नहीं। मंच, मैदान और मसान। मसान बनते मैदान। मंच वाले बेशक वहां करतब दिखाएं। मगर मैदान को मसान तो न बनने दें।

मां-बाप ने जाने क्या सोचकर उसका नाम प्रकाश रखा जो अंधेरे से निकलने की ताउम्र जद्दोजहद करता रहा। अंततः अंधेरे ने ही उसको निगल लिया। पिता फायर बिग्रेड में मकानों-भवनों में लगी आग बुझाते रहे। बेटे के भीतर की आग को नहीं शांत कर पाए। चालीस साल की उम्र, एमए, पी-एचडी, नेट, प्रतिभा, कविता-संग्रह, आलोचना, सच्चाई, ईमानदारी... ये सब मिलकर उसको एक अदद नौकरी नहीं दिला सके।

रोहित और प्रकाश तो एक बानगी हैं। विश्वविद्यालय में ढेरों ऐसे युवा हैं जिनके तकिए की नीचे स्यूसाइड नोट लिखा रखा है, जो हत्या-आत्महत्या के बीच तनी रसी पर जीने का भरम रच रहे हैं। वे लोग मुगालते में हैं जो रोहित-प्रकाश की हत्या को आत्महत्या का नाम दे रहे हैं। ये हत्याएं हैं। हम सब भी हत्यारों की सूची में दर्ज हैं। इन हत्याओं में जितनी दोषी सत्ता-व्यवस्था है, उससे जरा भी कम हम नहीं हैं। रोहित को हमारी कायरता ने मारा तो प्रकाश को हमारी संवेदनहीनता ने। सितम तो यह है कि इस निर्मम समय में हम निराश-हताश लोगों से बचते हैं। जीने के लिए हौसला ही सबसे बड़ी ताकत  होती है, ‘मंजिल न दे, चिराग न दे, हौसला तो दे।’ हम हौसला देना भी भूल गए हैं। हम आवाज नहीं हैं । हमारे भीतर आवाज देने वाला शख्स कोई और है। ‘करो या मरो’ बोलने वाले गांधी होते हुए भी गांधी नहीं कोई और ही थे। गुलजार साहब माफ करेंगे, मगर हमारी आवाज ही हमारी पहचान नहीं है। अगर वह शब्द है। शब्द हमारा साथ नहीं देते। शब्दों के धुंध में अर्थ भटक जाता है- उलट-पुलटकर घायल हो जाता है। आंसुओं में लिपटा खारापन सच है, उनका बहना झूठ। लहू में घुला लोहा सच है, उसका रिसना झूठ। मेरी मौलिकता मेरा झूठ है। मेरी हंसी मेरा सुरक्षा-कवच। मेरे हाथों का चिराग मेरे मन के अंधेरे में अनगिनत मृतात्माओं के भटकाव को छिपाए रहता है। अकेले रोहित ही नहीं इस देश-दुनिया के अधिकश युवाओं-लोगों की सबसे बड़ी यंत्रणा उनका खाली हो जाना है। उस दुनिया में खुद को मिसफिट समझना है। उस दुनिया के लिए खुद को दयनीय मानना है जहां आदमी की अहमियत महज एक संख्या, वोट तक सीमित कर दी गई है। बेबसी की यही पगडंडी युवाओं को कभी अपराध, तो कभी आत्महत्या की अंधी गलियों में ले जाती है। रोहित-प्रकाश इसकी नवीनतम कड़ी हैं। अगर खिलने से पहले ही खत्म होने का सिलसिला जारी रहे, वसंत में अंत की परंपरा महफूज रहे तो हमें यह मान लेना चाहिए कि अब हम सबमें ‘अंध युग’ उतर आया है। अंधी सत्ता कुरुक्षेत्रा में मारे गए लोगों के शव गिनती है। आंखों में पट्टी बांधकर सत्ता की सहयोगी स्त्री सिर्फ लाशों से लिपटकर विलाप करती है। कोई महाविनाश रोकने के लिए जान की बाजी नहीं लगाता। आज न कुरुक्षेत्र है, न हस्तिनापुर। अब युद्ध  मैदानों में नहीं, मन में लड़े जाते हैं। महाभारत मन में होता हैं, और वह महज अठारह दिनों का नहीं होता। वहां हम ही पांडव हैं, हम ही कौरव। दोनों तरफ हम ही हैं- जीतता कोई भी हो, लहूलुहान तो मन ही होता है। हारते तो हम ही हैं।

फिर शब्दों के जरिए शब्दों पर लौटता हूं। दुनिया का सबसे खूबसूरत वह शिशु होता है जिसके पास भाव हैं, प्यार है, रोना है, हंसना-खेलना है मगर शब्द नहीं हैं। जैसे ही शब्द उसके भीतर दाखिल होते हैं, उसकी मासूमियत कम होती जाती है। पक्षी, दरख्त, फूल, नदी, सागर... किसी के पास शब्दों की मलिनता नहीं। समृद्धि मलिनता को बढ़ाती है। वह रिश्ता और वह प्रेम बहुत गहरा होता है जिसमें कम से कम शब्द होते हैं। शब्द ही वह पनाहगाह हैं, जहां झूठ छिपता है। शब्द नहीं होते तो झूठ नहीं होता, झूठ नहीं होता तो हम बहुत सारी अनिवार्य बुराइयों से बच जाते। जानता हूं सभ्यता के जिस मुकाम और विकास की जिस दहलीज पर दुनिया पहुंच गई है, वहां शब्दविहीन दुनिया और जीवन की कामना में कयामत से पहले ही कयामत होगी। एक ऐसे वसंत में जिसका माहौल कई संभावनाओं के अंत से निर्मित हुआ है, हम ख्वाब तो बुन ही सकते हैं। बुनना ही चाहिए, क्या ही अच्छा होता कि शब्द के जिस्म से झूठ-फरेब अलग हो जाते।

खैर, अब प्रधनमंत्री  रोहित की खुदकुशी पर आंसू बहा रहे हैं जिन्हें मगरमच्छी बताया जा रहा है। रोहित के आंदोलनकारियों के दर्द को भी कुछ लोग नकली साबित कर रहे हैं। कौन सही है, कौन गलत... यह तय करना कठिन है। हम ऐसे मुकाम पर हैं जहां कुछ भी अच्छा नहीं है, कुछ भी बुरा नहीं। मिट गया है अच्छे-बुरे का भेद। कोई साथ नहीं दे रहा है। किसी भी चीज पर विश्वास करने का कोई ठोस आधार नहीं। हम शब्दों की पोटली लेकर दुनिया के मेले में ‘जिंदगी ढूंढ़ रहे हैं।’ ...और अब हम शोकसभा करेंगे, लेख लिखेंगे, जिसमें मैं खुद भी शुमार हूं। हम बहस करेंगे, फिर अगली आत्महत्या या हत्या का इंतजार करेंगे... ताकि फिर किसी शोकसभा में शरीक हो सकें। दो शोकसभाओं के बीच का समय ही हमारा जीवन है, संघर्ष है।

'पाखी' फरवरी -2016 अंक का संपादकीय 
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कृष्णा अग्निहोत्री - 90 प्रतिशत पुरुष सामंती धारणा के हैं

2/10/2016 01:29:00 pm

कृष्णा अग्निहोत्री - 90 प्रतिशत पुरुष सामंती धारणा के हैं #शब्दांकन

पक्षपात का शिकार तो हुई, परंतु सम्मान पूरे देश में मिला

- कृष्णा अग्निहोत्री


वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णा अग्निहोत्री जी से हुई डॉ ऋतु भनोट की इस लम्बी बातचीत को शब्दांकन पर आपके लिए प्रकाशित करते हुए यह सोच रहा हूँ कि आख़िर क्यों ऐसा है कि हिंदी साहित्य जगत अपने-ही साहित्यकारों के साथ कई दफ़ा दोगला व्यवहार करता है? एक लेखक जिसे पाठकों का भरपूर प्यार मिलता हो उसे-ही आलोचक नज़रअंदाज़ किये जाए ... ज्यादा क्या कहूं आप सब समझदार हैं हाँ इतना ज़रूर कहना चाहुँगा कि कम से कम हम बीती ताहि बिसार दें और आगे की सुधि लें - और ऐसा न होने दें.

भरत तिवारी


Krishna Agnihotri Interview


ऋतु: कृष्णा, द्रोपदी को भी कहते हैं और जो कृष्ण प्रेम में तदाकार होकर कृष्णमय हो जाये उसे भी कृष्णा कहते हैं। जहाँ तक मैं आपको जानती हूं, आपके जीवन में प्रेमपक्ष तो क्षीण ही रहा क्योंकि आपके जीवन में आने वाले पतिनामधारी दोनों पुरुष प्रेम की परिभाषा तक से भी अपरिचित थे। तो क्या मैं यह समझूं कि देवी माँ की अनुकम्पा की छत्रछाया ने ही आपको आज की कृष्णा बनने का सम्बल दिया?

कृष्णा अग्निहोत्री : कृष्णा द्रौपदी का भी नाम है और कृष्णा राजस्थान की एक देशप्रेमी राजकुमारी का भी नाम था जिसने देश को बचाने हेतु विष का प्याला पिया था। जहाँ तक मेरी बात है, प्रेम मेरे लिये आज तक अपरिभाषित ही है। वैसे यह कहना तो असत्य होगा कि कभी भी, किसी भी क्षण में मैंने उसे अनुभूत नहीं किया। 16 वर्ष की थी, तब तो नहीं समझी थी जब शिवकुमार ने प्रेम व विवाह का प्रस्ताव रखा, वह जिज्ञासा का विषय रहा। डर-भय ने उसे समझने व अनुभूत होने का समय ही नहीं दिया।

विवाह पश्चात् मां की संस्कारी भावनावश भी मैं अजनबी, अनजाने, रूखे पति से प्यार नहीं कर सकी। तानाशाह, माँ व परिवार को ही सत्य मानने वाले पति ने प्यार नहीं किया अपितु एक दिन कह ही दिया कि वे मुझे प्यार नहीं करते तो अंतःमन की किसी कृष्णा ने धीरे से अन्याय के विरुद्ध सोचना आरंभ किया व जो मुझे अप्रिय माने और शक्ति प्रदर्शन करे, उसके विरुद्ध मैंने खामोशी से विद्रोह कर दिया। प्यार न पाने की व्यथा पाने के पूर्व ही अहसासी।

श्रीकांत के समय में उनकी नाटकीयता मेरे लिये कुछ समय तक अनोखी थी। न चाहकर भी मैंने यही अनुभूत किया कि जो एक चाहत है व भीतर पनपी है, वही प्यार है। कुछ समय बाद श्रीकांत के स्वार्थ, बच्चों के माध्यम से कही बातें, झूठ, तिरस्कार, अपमान, प्रतिष्ठा छीनने का प्रयास, लेखन को मिटाने के प्रयास, रुपये का लालच, मेरी एक-एक पल की चाहत को कुचलते ही गये। दुःखी, तिरस्कृत कृष्णा ने स्वयं व अपनी बच्ची को एक नरक से दूसरे नरक में रहने से बचाने का कठोर मन बना लिया। वो कदम उठाया जो बेहद कांटों भरा था। कह दिया, “मैं आपसे नहीं मिलना चाहती”। दुष्परिणाम भोगे, दो पतियों से अलग होने की सज़ा भरपूर भोगी। उस दुर्भाग्य के छींटे मेरी बेटी ने भी सहे।

मेरी अन्तर्रात्मा ने नाटकीयता, झूठ व आरोपित शोषण की पुनरावृत्ति से छुटकारा ले लिया। आप ठीक समझ रही हैं कि दुर्गा माँ की अदृश्य छाया के तले मैं उनकी अनुकम्पा से खाई व कुएं दोनों से बाहर आ आज की कृष्णा बन गई।


ऋतु: महिला आत्मकथा लेखन बेहद चुनौतीपूर्ण तथा जोखिम भरा है। अपनी आत्मकथा लिखते समय क्या आपको कभी दुविधा अथवा संकोच का सामना करना पड़ा? क्या आप कभी यह सोचकर द्विधाग्रस्त हुईं कि एक स्त्री के जीवन की नग्न सच्चाइयों पर पाठकों की प्रतिक्रिया कैसी होगी?

कृष्णा अग्निहोत्री : मुझे आत्मकथा हेतु मेरे मित्र वीरेन्द्र सक्सेना ने प्रेरित किया। उस समय सारी आत्मकथाएं पढ़ीं तो मेरे मन में सच्चाई से सच लिखने की हौंस, उत्साह था, जो कई आत्मकथाओं में नहीं है। मेरी दोनों आत्मकथाएं सच और सच से भरी हैं। उस समय जोश में कुछ लोगों के नाम भी लिख दिये, बचपन की घटनाएं साफगोई से लिखीं ताकि दूसरे उसे समझें व उनके बच्चे बचें।

कुछ पुरुषों ने व मेरे साथ की लेखिकाओं ने कहा, ‘‘आपको नाम लेकर नहीं लिखना था।’’ मुझे आश्चर्य है कि लेखिकाएं ही शोषणकर्ता का नाम नहीं जानना चाहतीं या उसे रुष्ट नहीं करना चाहतीं जबकि राजेन्द्र यादव, अवस्थी जी ने ही बुरा नहीं माना। हां प्रभाकर क्षोत्रिय, नामवर जी, हिमांशु नाराज़ है और मेरे लेखन को पसंद नहीं करते। मैं समझौतावादी नहीं रही।

मेरी बेटी को भड़काया गया, सूर्यकांत नागर ने मुझे अश्लील व दिनेश द्विवेदी जैसे अवसरवादी ने सिनिकल तक कह दिया। पाठकों ने सराहा और मेरी आत्मकथा पर जम्मू से लेकर कुमाऊँ तक पी-एच. डी हो रही है।


ऋतुः प्रकाशन से पुरस्कृत होने की राजनीति के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी? साहित्यिक खेमेबाजी, गुटबंदी का क्या आपको कभी शिकार होना पड़ा? यदि हाँ, तो इस पैंतरेबाजी से विलग रहकर साहित्य में अपनी पहचान बनाने की यात्रा आपने कैसे तय की?

कृष्णा अग्निहोत्री : प्रकाशकों की गुटबाजी व तानाशाही का पूरी तरह शिकार रही जिसके कारण विलम्ब से मेरा मूल्यांकन हो रहा है। इस संदर्भ में अरविंद बाजपेयी जी, अमन प्रकाशन, अलग हैं, उन्होंने न मुझे देखा, न मिले, तब भी वे मुझे प्रोत्साहन देकर छाप रहे हैं व प्रसार, प्रचार भरपूर है।

उनके प्रयास से ‘आना इस देश’ कोल्हापुर विश्वविद्यालय के तीसरे वर्ष में पाठ्यक्रम के कोर्स में लगा है। गुटबाजी से तो अलग हूं ही। परन्तु ठप्पेबाजी ने तो सताया। इन्दिरा गांधी पर उपन्यास लिखा ‘बित्ता भर की छोकरी’ जो निहायत अच्छा बना पर क्रांग्रेस के ठप्पे ने उसे पछाड़ दिया।

पक्षपात का शिकार तो हुई, परंतु सम्मान पूरे देश में मिला। अब लिखना तो भीतर से संबंधित है। छोटे से छोटे प्रकाशक ने किताबें छापीं और मैं अनवरत् लिखती जा रही हूं।

पक्षपात का शिकार तो हुई, परंतु सम्मान पूरे देश में मिला- कृष्णा अग्निहोत्री #शब्दांकन


ऋतुः महिला रचनाकार अपनी रचनाओं में जब भी शारीरिक संबंधों की चर्चा करती हैं तो अधिकतर उनके लेखन को ‘बोल्ड’ अथवा ‘अश्लील’ कहकर खारिज करने की कोशिश की जाती है। महिला लेखन के संदर्भ में आप बेबाक बयानी और अश्लीलता के महीन अंतर को कैसे परिभाषित करेंगी?

कृष्णा अग्निहोत्री : स्वतन्त्रता के पश्चात् भी भारत के पुरुष समाज में आज भी 90 प्रतिशत पुरुष सामंती धारणा के हैं। अब तक वे ही नारी के नख-शिख का जैसा चाहे विवरण कर आनंद उठाते रहे और उसे शृंगार भावना के अंतर्गत तौलते रहे, अब उन्हें अपना यह अधिकार पुरुषों के अतिरिक्त स्त्री को सौंपते बुरा लगता है, इसीलिये उन्हें हमारा छोटा सा भी विवरण काटता है कि यह चौके की दासी हमसे भी अच्छा चित्रण करती है, मेरी कहानी ‘अंतिम स्त्री’ को नागर ने अश्लील कहा पर मैं भारत के कुछ तटस्थ समीक्षकों से प्रार्थना करुंगी कि वे मेरे 17 कहानी संग्रहों में से रोमानी चित्र के अतिरिक्त कोई अश्लीलता ढूंढ दें

यही कथन उपन्यास तईं है, लेकिन कुछ तो लोग कहेंगे, तो कहना है, आरोपित करना ही है तो करो, कुछ भी बोलो, बिना पढ़े बोलो। अश्लीलता के खुले चित्रण से भावनाएं प्रभावित होती हैं जैसे पागल नग्न घूमेगा तो हम उसे अश्लील नहीं कहेंगे परन्तु छोटे, झीने, उभारने वाले वस्त्र पहने युवती का चित्रण अश्लीलता होगी।


ऋतुः कृष्णा जी, आप वैचारिक धरातल पर किस राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़ी हैं?

कृष्णा अग्निहोत्री : किसी राजनीतिक पार्टी के साथ मेरा कोई जुड़ाव नहीं रहा। मेरे माता-पिता कांग्रेस से जुड़े थे इसलिये लोगों ने सोचा कि मैं भी कांग्रेस से हूँ, परंतु वास्तविकता यही है कि कांग्रेस के प्रति मेरा झुकाव कभी नहीं था ।


ऋतुः आपका उपन्यास ‘बित्ता भर की छोकरी’ श्रीमती इंदिरा गांधी के जीवन व व्यक्तित्व पर केन्द्रित है, इंदिरा जी पर आधारित उपन्यास लिखने के पीछे क्या विशेष कारण रहे?

कृष्णा अग्निहोत्री : इंदिरा जी मेरी प्रिय राजनेत्री रहीं हैं, जिसका सम्बंध उनके व्यक्तित्व से अधिक है। मेरा उनकी राजनीतिक पार्टी के साथ कोई लगाव नहीं था। मेरा विचार है कि भले ही वे किसी भी राजनीतिक दल से क्यूँ न जुड़ी होतीं, उनका किरदार ऐसा ही शानदार होता। श्री राजेन्द्र यादव ने किसी प्रसंग में एक बार कहा था कि महिला रचनाकार किसी राजनेता पर उपन्यास क्यूं नहीं लिखती? उनके शब्दों ने भी अवचेतन में ‘बित्ता भर की छोकरी’ का बीजवपन होने में अपनी भूमिका निभाई। राजेन्द्र जी ने प्रस्तुत उपन्यास को बहुत सराहा व इसकी समीक्षा भी ‘हंस’ में छापी।


ऋतुः हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक पुस्तकों का योगदान देने वाली महिला लेखिका होने पर भी आपका वैसा मूल्यांकन नहीं हो पाया, जिसकी आप अधिकारिणी हैं, इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगी?

कृष्णा अग्निहोत्री : एक कड़वी सच्चाई है कि प्रचार-प्रसार उन साहित्यकारों का होता है, पुरस्कार उन्हें मिलता है जो राजनीति से जुडे़ हैं। यद्यपि यह बात सब पर लागू नहीं होती परंतु अधिकतर लोग इस श्रेणी में आते हैं। मानती हूँ, अपने समर्थकों की कमी से जितना मूल्यांकन होना था- नहीं हो रहा- क्योंकि आज की समीक्षा व पत्रकारिता अपने-अपने ही को रेवड़ी बांट रही है - तब भी माँ दुर्गा की दया है कि मैं चुप नहीं, बौखलाती हूं गलत से, कुछ देर तक धराशायी हो जाती हूँ, पुनः उठ खड़ी होती हूं और लिखने के लिए तख्ती हाथ में उठा लेती हूं।

मेरे सर पर कभी कोई वरदहस्त नहीं रहा। बड़ी लम्बी संघर्षपूर्ण लेखन यात्रा है मेरी- पता नहीं लोग कैसे एक कहानी- एक लेख लिखकर विज्ञप्ति पा लेते हैं। मैं तो इतना लिखकर भी अपने आस-पास सही मूल्यांकन की दृष्टि भी नहीं पा सकी। मेरा लेखन परंपरावादी नहीं पूर्ण मानव मूल्यों से भरा है और शनैः-शनैः उसका मूल्यांकन हो रहा है और आगे भी होता रहेगा।




ऋतुः कृष्णा जी, आपको समकालीन महिला रचनाकारों से विलग करके कैसे आँका जा सकता है? लेखन के क्षेत्र में आपकी कौन सी ऐसी उपलब्धि है जो आपको विलक्षण अथवा अद्वितीय बनाती है?

कृष्णा अग्निहोत्री : आपने सही पूछा कि लेखिकाएं अच्छा लिख रही हैं, फिर मैं उनसे अलग कैसे कही जा सकती हूँ? आपके प्रश्न के उत्तर में मैं इतना ही कहना चाहूंगी कि मेरे लेखन में विविधता बहुत है। अधिकतर महिलाओं ने प्रेम संबंधों, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर साहित्य रचना की परंतु मैंने अपनी रचनाओं में मानव जीवन के सभी रंग समेटे हैं।


ऋतुः मैं चाहूंगी कि आप अपनी कुछ मुख्य रचनाओं के आधार पर अपनी बात को थोड़ा और विस्तार से स्पष्ट करें?

कृष्णा अग्निहोत्री : टपरेवाले’ उपन्यास में टपरे वालों की छिछलन भरी दुःखद स्थिति है। ‘नीलोफर’ उपन्यास में पहली बार अरब की गुलाम प्रथा, आदिवासी क्षेत्र के अंधकार व विदेशों के मशीनीकरण का चित्रण है। ‘बित्ताभर की छोकरी’ राजनीतिक उपन्यास है जिसमें इंदिरा जी का व्यक्तिगत जीवन वर्णित है, उनके संघर्ष को एक पत्रकार के माध्यम से अंकित करते हुए देश की समकालीन समस्याओं का चित्रांकन कठिन कार्य रहा। ‘मैं अपराधी हूं’ उपन्यास के माध्यम से मैंने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि हम हमेशा देश की परिस्थितियों के लिए राजनीति व नेताओं को दोषी ठहराते हैं, जबकि दोषी हम स्वयं हैं क्योंकि हमारी निष्क्रियता ही देश की मौजूदा परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी है। ‘बात एक औरत की‘ में एक पत्नी का मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण व महिला अधिकारों को प्रस्तुत किया है तथा ‘कुमारिकाएँ’ में भारत में परिस्थितिवश कुमारी रह जाने वाली लड़कियों की स्थिति का पारिवारिक व सामाजिक चित्र है। ‘आना इस देश’ उपन्यास में भारत-पाकिस्तान की भौगोलिक सरहदों से बंटे परंतु मानवता के सूत्र में बंधे लोगों की पीड़ा का चित्रण है।

डॉ. ऋतु भनोट

एम.ए., पी-एच.डी. (हिंदी) पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़.
यू.जी सी. की ओर से हिंदी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में पोस्ट डॉक्टोरेल रिसर्च फेलो
संपर्क:
4485, दर्शन विहार सेक्टर-68, मोहाली
ritubhanot@yahoo.com

इतिहास हो या अंचल या विदेश, बिना पूरा अध्ययन व उसमें डूबे मैं कुछ नहीं लिखती। मैंने मध्यप्रदेश, झाबुआ, जलगाँव का दौरा किया। अरब के आदिवासियों की कहानी भी प्रस्तुत की। मेरा नवीनतम उपन्यास ‘प्रशस्तेकर्माणी’ इसी कड़ी की अगली रचना है जिसमें आदिवासी, कालबेलिया, बसोड़, कुम्हार तक मैंने दलित चेतना को बढ़ाया है। किसी भी महिला रचनाकार का रचना फलक इतना विस्तृत नहीं है। नाटक भी लिखा, बाल साहित्य की रचना भी की, डायरी भी छप रही है, निबन्ध भी प्रकशित हो रहे हैं। मैं चाहती हूँ मेरे साहित्य के मूल्यांकन में इस बात को विशेष रूप से ध्यान में रखा जाये।


ऋतुः  अपनी प्रिय लेखिकाओं के बारे में कुछ बताएं?

कृष्णा अग्निहोत्री :  महिला रचनाकार बहुत अच्छा लिख रही हैं परन्तु यदि मुझे अपनी प्रिय लेखिकाओं के बारे में बताना है तो  मन्नू भंडारी, उषा प्रियंवदा का लेखन मुझे बहुत प्रिय है। मेरी समकालीन लेखिकाओं में से ममता कालिया तथा नासिरा शर्मा मेरी प्रिय लेखिकाएं हैं। आधुनिक लेखिकाओं में से नीलिमा सिंह, नीलिमा कुलश्रेष्ठ, प्रतिभा मिश्र तथा इंदिरा दांगी बहुत अच्छा लिख रही हैं।


ऋतुः आपके लिए साहित्य क्या है, क्या आप साहित्य का उपयोग जीवन यापन हेतु करती हैं?

कृष्णा अग्निहोत्री : साहित्य एक सोद्देश्यपूर्ण संवेदना है, जो अमूल्य है। मैंने आर्थिक संकट वर्षों झेला है परन्तु न तो कभी अर्थ की मांग रखी और ना ही पुरस्कारों की जोड़-तोड़ से उसे कमाने की लालसा रखी। पढ़ी, प्राध्यापक बनीं और लिखती रही। लघु पत्रिकाओं व सभी छोटे प्रकाशकों से अर्थ की आशा न रख प्रकाशन करवाया। बाजारवाद साहित्य का विघटन है, मैं इस दौड़ में शामिल नहीं हूं। लेखन मेरा व्यवसाय नहीं, मेरा जीवन है- और जीवन किसी लाभ की आशा के साथ नहीं जिया जाता। लेखन मेरा प्रियतम, मित्र, आत्मीय है।


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बैजू बावरा 'Baiju Bawra' ध्रुपद उत्सव

2/09/2016 09:08:00 pm


बैजू बावरा




ग्यारहवीं सदी के भारत के एक महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर चंदेरी को आजकल लोग उसके मशहूर सिल्क के कपड़ों की वजह से जानते हैं, हालांकि उसकी एक और महत्वपूर्ण पहचान हैं जिस पर आमतौर पर लोगों का ध्यान कम ही जाता है।  चंदेरी वो जगह भी है जहां विश्वविख्यात संगीत सम्राट बैजू बावरा ने अंतिम सांस ली थी और यहां उनकी समाधि भी है। एक तरह से चंदेरी बैजू बावरा की कर्मस्थली भी रही है, क्योंकि ये भी कहा जाता है कि रियासत ग्वालियर के राज-दरबार से उनको  कुछ दिनों तक राज्याश्रय भी हासिल हुआ, जहां उस समय मान सिंह तोमर गद्दी-नशीं थे। बैजू बावरा का जिक्र वृदांवनलाल वर्मा ने अपने उपन्यास मृगनयनी में भी किया है। एक अन्य कथा के मुताबिक ग्वालियर की गूजरी रानी मृगनयनी ने भी बैजू बावरा से संगीत की शिक्षा ली थी। कहते हैं बैजू बावरा को 'बावरा' नाम उनके संगीत में डूब जाने और कभी-कभार विक्षिप्तों सा व्यवहार करने के लिए दिया गया।
बैजू बावरा स्मृति सम्मान - ध्रुपद गायक पंडित उमाकांत गुंदेचा एवं रमाकांत गुंदेचा को

“बैजू बावरा स्मृति सम्मान” - 2016 

ध्रुपद गायक पंडित उमाकांत गुंदेचा एवं रमाकांत गुंदेचा को 

बैजू बावरा एक प्रख्यात ध्रुपद कलाकार थे और मध्य-काल के ही एक अन्य प्रसिद्ध संगीतकार तानसेन के समकालीन माने जाते हैं। बल्कि कई लोग तो उन्हें तानसेन से भी महान मानते हैं। क्योंकि बैजू बावरा की ख्याति तानसेन के समान नहीं फैली क्योंकि उन्होंने देर से दरबारों में जाना शुरू किया। इसकी एक वजह ये भी माना जाता है कि बैजू बावरा ध्रुपद की तरह ही गहरे और गंभीरता में डूबे हुए थे, वे अपने गुरु को छोड़कर बहुत काल तक दरबारों में नहीं जा पाए।

बैजू बावरा का जन्म गुजरात के चम्पानेर में एक गरीब ब्राह्मण के घर हुआ था और उनके बचपन का नाम बैजनाथ मिश्र था और गायन में प्रसिद्धि की वजह से उन्हें बैजू कहा जाने लगा। उनके सही जन्म-वर्ष पर विवाद है, हालांकि ये तय है कि वे 15वीं से 16वीं शताब्दी के बीच पैदा हुए थे।  उन्होंने वृंदावन में संगीत के प्रसिद्ध आचार्य हरिदास से शिक्षा ग्रहण की और ये भी कहा जाता है कि तानसेन उनके गुरुभाई थे। शुरु में कुछ दिन बैजू बावरा चेंदेरी के राजदरबार में रहे, फिर राजा मान सिंह तोमर ने उन्हें ग्वालियर बुला लिया।

कहा जाता है कि बैजू बावरा ऐसे राग गाते थे कि आसमान में बादल छा जाते थे और पानी बरसने लगता था। उनके गाए राग दीपक के समाप्त होने तक दिए जल जाते थे और राग मृगरंजिनी सुनकर जंगल से हिरण सम्मोहित होकर दौड़े चले आते थे! लेकिन वर्तमान में आमजन में बैजू बावरा को लेकर बहुत जानकारी नहीं है। सदियां बीत जाने के बाद हम आज कथित रूप से बहुत आधुनिक तो हुए हैं लेकिन इस आधुनिकता में जब हम अपनी विरासत की बात करते हैं तो ज्यादातर हम उन इमारतों और शासकों का ही जिक्र करते हैं जो किसी न किसी हिंसा से प्रभावित हैं या हिंसा के कारण थे। हम भूल जाते हैं कि हमारे पास विरासत के तौर पर संगीत, नाट्यशास्त्र, चित्रकला, साहित्य, मूर्तिकला, नृत्य आदि बहुत सी कलाओं का भण्डार है। लेकिन हम जब भी जिक्र करते हैं तो इन कलाओं को हमेशा पीछे ही रखते हैं। हम भूल जाते हैं कि कला के जरिए जो आन्दोलन समाज में होता है वो कभी हिंसात्मक नहीं होता। शायद इसलिए जायसी, रसखान, मीरा, कबीर, हरिदास, बैजू बावरा, ग़ालिब, टैगोर जैसे कई कलाकारों ने अपनी कलाओं के जरिये सामाजिक आन्दोलन करने का कार्य किया।

बैजू बावरा स्मृति सम्मान

अपनी इसी संस्कृति और विरासत को सहेजने के प्रयास में 13 फरवरी 2016 (बसन्त पंचमी के दिन, इसी दिन बैजू बावरा कि मृत्यु हुई थी) को चंदेरी स्थित बैजू बावरा के समाधि पर “बैजू बावरा ध्रुपद उत्सव” का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें देश के महान ध्रुपद गायक गुंदेचा बंधु ध्रुपद गायन प्रस्तुत करेंगे। इस उत्सव में जाने-माने कलाविद एवं कवि अशोक वाजपेयी, संगीत समीक्षक मंजरी सिन्हा और ध्रुपद गायक पंडित उमाकांत गुंदेचा “विरासत का अर्थ” विषय पर व्याख्यान भी देंगे और बच्चों और युवाओं को इस विधा से परिचय कराने  के लिए कार्यशाला का भी आयोजन किया जाएगा।

इस साल का “बैजू बावरा स्मृति सम्मान” ध्रुपद गायक पंडित उमाकांत गुंदेचा एवं रमाकांत गुंदेचा को दिया जा रहा है। गुंदेचा बंधुओं ने ध्रुपद में काफी प्रयोग कर इसे देश-विदश तक लोगो से जोड़ा है। 

इस कार्यक्रम का आयोजक श्री अचलेश्वर महादेव मन्दिर फाउंडेशन, डाला, उत्तर प्रदेश है। यह संस्था कई वर्षों से ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में कला और संस्कृति के लिए काम कर रही है जिसका उद्देश्य कलाओं को अभिजात्य वर्ग से निकालकर आम जन से जोड़ना है, समाज को कलात्मक दिशा देकर सांस्कृतिक साक्षरता का विकास करना है। संस्था के सचिव चन्द्र प्रकाश तिवारी कई वर्षों से सोनभद्र के ग्रामीण क्षेत्रो में संगीत, कला, रंगमंच और साहित्य को लेकर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। चंदेरी में इस कार्यक्रम को करने का मुख्य उद्देश्य ध्रुपद संगीत है जिसे वैदिक संगीत भी कहते हैं। यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन विधा है, जिससे बहुतेरे लोग अपरिचित भी हैं। इसलिए इससे लोगों को जोड़ने और उनकी विरासत से परिचय करने के लिए इस फाउंडेशन ने “ध्रुपद यात्रा” आरम्भ की है जिसकी शुरुवात चंदेरी और बैजू बावरा जैसे महान ध्रुपद कलाकार की स्मृति में उत्सव के माध्यम से किया जा रहा है।

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सचिन गर्ग - वी नीड ए रिवोल्युशन - लोकार्पित @GargSachin

2/08/2016 01:01:00 pm

 'वी नीड ए रिवोल्युशन' में जारवा जनजाति के अधिकारों के लिए संघर्ष को दर्शाया गया है #शब्दांकन

सचिन गर्ग ने तीन साल के अंतराल के बाद पुस्तकों की श्रृंखला के साथ वापसी की

जाने-माने लेखक सचिन गर्ग की पांचवी पुस्तक "वी नीड ए रिवोल्युशन" का 7 फ़रवरी को राष्ट्रीय राजधानी में लोकार्पण हुआ। तीन साल के अंतराल के बाद सचिन गर्ग की यह पुस्तक पाठकों के सामने आ रही है। सचिन गर्ग ने आज कनाट प्लेस स्थित ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर्स में इस पुस्तक का लोकार्पण किया। दिल्ली के पाठकों के समक्ष उन्होंने इस पुस्तक के कुछ अंश का पाठ किया तथा अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही जारवा जनजाति के बारे में भावनाप्रद व्याख्यान दिया।

अपने पूर्व के प्रशंसित रोमांटिक उपन्यास से बिल्कुल अलग हटकर सचिन गर्ग ने अपनी इस नई पुस्तक में पुस्तक के मुख्य किरदार सुभ्रोदीप श्याम चौधरी के साथ मानव सफारी तथा अंडमान और निकोबार की लुप्तप्रायः जनजाति के बारे में चर्चा की है। इस पुस्तक को लिखने के सिलसिले में उन्होंने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत एक आरटीआई भी दाखिल की लेकिन उसका उन्हें जवाब नहीं मिला। उन्होंने करीब तीन साल तक अनुसंधान किया और एक महीने से अधिक समय तक अंडवान निकोबार में निवास किया। जारवा जनजाति के प्रति उनका लगाव "वी नीड ए रिवोल्युशन" नामक पुस्तक के रूप में सामने आया।

अपनी पुस्तक के बारे में चर्चा करते हुए लेखक सचिन गर्ग कहते हैं, "यह पुस्तक न केवल जारवा जनजाति के बारे में है, बल्कि यह पुस्तक यह सवाल भी उठाती है कि क्या आज के लड़के-लड़कियों का कोई समूह उस मकसद के लिए संघर्ष करने को तैयार होगा जिसमें वे विश्वास करते हैं और यह समूह इसके लिए कितना आगे जाने को तैयार होगा।"
सचिन गर्ग और अनुराग बत्रा - वी नीड ए रिवोल्युशन #शब्दांकन
सचिन गर्ग और अनुराग बत्रा 

"वी नीड ए रिवोल्युशन" एक यात्री सुभ्रोदीप श्याम चौधरी के जीवन तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह की जनजातियों के बारे में आश्चर्यजनक खोजों के आसपास घुमती है।

"वी नीड ए रिवोल्युशन" ...
शुभ्रो दीप श्याम चौधरी पूरे भारत की सैर करने वाले घुमक्कड़ हैं। उनकी एक कमजोरी यह है कि जब भी वह किसी के साथ अन्याय होते देखते हैं तो वह अन्याय का विरोध करने के लिए सक्रिय हो जाते हैं।

जब वह अंडमान पहुंचते हैं तो वह एक बड़ी चुनौती का सामना करते हैं, जिसके बारे में उन्होंने पहले सोचा नहीं था। वहां देखते हैं कि जारवा जनजाति के लोग बलात्कार, बीमारियों, हिंसा और अमानवीय अत्याचार से जूझ रहे हैं।

अपने दोस्तों के एक समूह के साथ वह इन लोगों के लिए कुछ करने का फैसला करते हैं। लेकिन वह कितना बर्दाश्त करने को तैयार हैं? क्या नियमित जीवन जीने वाले लोग सभी बाधाओं से ऊपर उठकर अपने विचारों के लिए खड़े हो सकते हैं ?



सुभ्रो दीप श्याम चौधरी ने 20 साल पहले पूरे भारत में घूमने का फैसला किया। उन्होंने तय किया कि वह देश के प्रत्येक राज्य एवं प्रत्येक केन्द्र शासित प्रदेश में छह माह रहेंगे। उन्होंने अपनी इस यात्रा को "मूव ऑन थ्योरी" नाम दिया। वह अन्य लोगों की सोच की तुलना में कहीं अधिक गंभीर प्रतीत होते हैं।

प्रत्येक राज्य और प्रत्येक केन्द्र शासित प्रदेश में वह उस राज्य के सामाजिक मुद्दों के साथ या आदिवासियों के साथ जुड़ते हैं और स्थिति में बदलाव लाने के लिये यथासंभव पूरी कोशिश करते हैं।

इस श्रृंखला की पहली पुस्तक "वी नीड ए रिवोल्युशन" में जारवा जनजाति के अधिकारों के लिए संघर्ष को दर्शाया गया है। इस श्रृंखला की दूसरी पुस्तक में, एक स्टील कारखाने में काम करने वाले मजदूरों के अधिकारों के लिए संघर्ष को दिखाया जाएगा। तीसरी पुस्तक में पंजाब में नशीली दवाओं की लत की समस्या को सामने लाया जाएगा।


सचिन गर्ग ने 29 साल पहले अपनी सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक ‘‘आई एन नॉट ट्वेंटी फोर ... आई हैव विन नाइंटिन फॉर फाइव इयर्स’’ (2010) में लिखी थी। इसके बाद उन्होंने ‘‘इट इज फर्स्ट लव, जस्ट लाइन द लास्ट वन’’ (2011), ‘‘नेवर लेट मी गो’’ (2012) और ‘‘कम ऑन इनर पीस ... आई डांट हैव ऑल डे’ (2013)’’

अब तक उनकी सभी पुस्तकों की पांच लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी है और वह भारत के अग्रणी प्रकाशक ग्रैपवाइन इंडिया पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक भी हैं। 

सचिन गर्ग का जन्म दिल्ली में हुआ और यहीं वह पले-बढ़े। सचिन गर्ग शिक्षा और परियोजनाओं के लिए पेरिस, एक्स - इन प्रांत (फ्रांस) तथा उत्तरी कर्नाटक के छोटे से गाव तोरानागुलु में रहे। 

दिल्ली कालेज ऑफ इंजीनियरिंग से उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में स्नातक किया। उन्होंने गुडगांव के एमडीआई तथा फ्रांस के एक्स-एन प्रांत के आईएई से मैनेजमेंट की पढ़ाई की। 

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अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान @anantvijay | Bad Hindi Kahani

2/08/2016 12:14:00 pm

अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान - अनंत विजय #शब्दांकन

कविता के बाद कहानी पर नजर

- अनंत विजय


अनंत विजय, नामवर सिंह की बात करते हुए बताते हैं कि नामवर जी ने एक बार कहा था – "हिंदी में अच्छी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं, यह चिंता का विषय नहीं है, बल्कि चिंता का विषय यह है कि उसमें अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान लुप्त होती जा रही है..." उसके बाद वह लिखते हैं – "अब तो ये खतरा पैदा होने लगा है कि अच्छी कहानियां बुरी कहानियों दबा ना दें..." पाठकों ! मेरी समझ में जिस ख़तरे की बात अनंत कर रहे हैं वह ख़तरा पैदा हो चुका है और छुटभैया पत्रिकाओं से होता हुआ अब वह उन साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रवेश पा चुका है, जिसके प्रवेशद्वार पर एक समय में संपादक स्वयं बैठा होता था. पहले भी हज़ारों कहानियाँ संपादक के पास आती रही हैं लेकिन वे कहानी हैं या नहीं-हैं यही संपादक और पत्रिका का मानक होता है - यह अनायास ही नहीं है कि हम राजेन्द्र यादव और रवीन्द्र कालिया जैसे संपादकों की कमी महसूस कर रहे हैं. अच्छा होगा कि हिंदी के संपादक, वापस संपादक बनें और पाठकों को अपनी पत्रिका और हिंदी साहित्य से दूर न होने दें

भरत तिवारी
   
कविता के बाद कहानी पर नजर

समकालीन साहित्यक परिदृश्य में इस बात को लेकर सभी पीढ़ी के लेखकों में मतैक्य है कि कविता भारी मात्रा में लिखी जा रही है । यह हिंदी साहित्य का सौभाग्य है कि कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह जैसे बुजुर्ग कवि अब भी रचनारत हैं वहीं बाबुषा कोहली जैसी एकदम युवा कवयित्री भी कविता कर्म में लगी है । किसी भी साहित्य के लिए ये बेहतर बात हो सकती है कि एक साथ करीब पांच पीढ़ियां कविकर्म में सक्रिय हैं । लेकिन जब हम कवियों की संख्या पर नजर डालते हैं तो एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त करीब पंद्रह बीस हजार कवि एक साथ कविताएं लिख रहे हैं । इंटरनेट और सोशल मीडिया के विस्तार ने हिंदी में कवियों की एक नई पौध के साथ साथ एक नई फौज भी खड़ी कर दी है । जब देश में नब्बे के दशक में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ था तो दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में मैनेजमेंट पढ़ानेवाले संस्थानों की भरमार हो गई थी । उस वक्त ये जुमला चलता था कि दिल्ली के भीड़भाड़ वाले बाजार, करोलबाग, में अगर पत्थरबाजी हो जाए तो हर दूसरा जख्मी शख्स एमबीए होगा । कहने का मतलब ये था कि उस वक्त एमबीए छात्रों का उत्पादन भारी संख्या में हो रहा था क्योंकि हर छोटी बड़ी कंपनी में मैनजमेंट के छात्रों की मांग बढ़ रही थी । मांग और आपूर्ति के बाजार के नियम को देखते हुए मैनजमेंट के कॉलेज खुलने लगे थे और उत्पाद की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं गया था । नतीजा हम सबके सामने है । नब्बे के दशक के आखिरी वर्षों में पांच से छह हजार के मासिक वेतन पर एमबीए छात्र उपलब्ध थे । बाद में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए मैनजमेंट के ये संस्थान धीरे-धीरे बंद होने लगे । सोशल मीडिया और इंटरनेट के फैलाव ने कविता का भी इस वक्त वही हाल कर दिया है । एमबीए छात्रों पर कहा जानेवाले जुमला कवियों पर लागू होने लगा है । साहित्यक गोष्ठियों में कहा जाने लगा है कि वहां उपस्थित हर दूसरा शख्स कवि है । दरअसल सोशल मीडिया ने इसको अराजक विस्तार दिया। साठ के दशक में जब लघु पत्रिकाओं का दौर शुरू हुआ तो कवियों को और जगह मिली लेकिन उनको पत्रिकाओं के संपादकों की नजरों से पास होने के बाद स्तरीयता के आधार पर ही प्रकाशित होने का सुख मिला था । कालांतर में लघु पत्रिकाओं का विस्तार हुआ और हर छोटा-बड़ा लेखक पत्रिका निकालने लगा । यह इंटरनेट का दौर नहीं था । साहित्यक रुझान वाले व्यक्ति की ख्वाहिश साहित्यक पत्रिका का संपादक बनने की हुई । ज्यादातर तो बने भी । चूंकि इस तरह की पत्रिकाओं के सामने आवर्तिता को कायम रखने की चुनौती नहीं होती थी और वो अनियतकालीन होती थी लिहाजा एक अंक निकालकर भी संपादक बनने का अवसर प्राप्त हो जाता था । संपादक को अपनी कविताएं अन्यत्र छपवाने में सहूलियत होने लगी । सत्तर से लेकर अस्सी के अंत तक सहूलियतों का दौर रहा । इक्कीसवीं सदी में जब इंटरनेट का फैलाव शुरु हुआ और फेसबुक और ब्लॉग ने जोर पकड़ा तो कवियों की आकांक्षा को पंख लग गए । संपादक की परीक्षा से गुजरकर छपने का अवरोध खत्म हो गया । हर कोई स्वयं की मर्जी का मालिक हो गया । जो लिखा वही पेश कर दिया । इस सुविधा ने कवियों की संख्या में बेतरह इजाफा कर दिया । एक बड़ी लाइन और फिर एक छोटी लाइन की कविता लिखने के फॉर्मूले पर कविता धड़ाधड़ सामने आने लगी । वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने अपने एक साक्षात्कार में कहा भी था कि - हिंदी कविता को लेकर एक तरीके का भ्रम व्याप्त है और इस भ्रम को वामपंथी आलोचकों ने बढ़ावा दिया । वामपंथी आलोचकों ने इस बात पर जोर दिया कि कथ्य महत्वपूर्ण है और शिल्प पर बात करना रूपवाद है । नरेश सक्सेना ने कहा था कि कथ्य तो कच्चा माल होता है और शिल्प के बिना कविता हो नहीं सकती । इन दिनों कविता का शिल्प छोटी बड़ी पंक्तियां हो गई हैं । नरेश सक्सेना के मुताबिक इन दिनों खराब कविताओं की भरमार है । वो साफ तौर पर कहते हैं कि बगैर शिल्प के कोई कला हो ही नहीं सकती है । वो कहते हैं कि सौंदर्य का भी एक शिल्प होता है । नरेश सक्सेना के मुताबिक इंटरनेट और सोशल मीडिया में कोई संपादक नहीं होता, वहां तो उपयोग करनेवाले स्वयं प्रकाशक होते हैं । प्रकाशन की इस सहूलियत और लोगों के लाइक की वजह से लिखने वाला भ्रम का शिकार हो जाता है ।  कवियों की संख्या में इजाफे की एक और वजह हिंदी साहित्य में दिए जानेवाले पुरस्कार हैं । कविता पर जिस तरह से थोक के भाव से छोटे बड़े, हजारी से लेकर लखटकिया पुरस्कार दिए जा रहे हैं उसने भी कविकर्म को बढ़ावा दिया । खैर ये तो रही कविता की बात लेकिन अब साहित्य में एक नई प्रवृत्ति सामने आ रही है ।

हिंदी के ज्यादातर कवियों में अब कहानी लिखने की आकांक्षा और महात्वाकांक्षा जाग्रत हो गई है । कविता के बाद अब कहानी पर कवियों की भीड़ बढ़ने लगी है । दरअसल इसके पीछे प्रसिद्धि की चाहत तो है ही इसके अलावा उनके सामने खुद को साबित करने की चुनौती भी है । कविता की दुनिया से कहानी में आकर उदय प्रकाश, संजय कुंदन, नीलेश रघुवंशी, सुंदर ठाकुर आदि ने अपनी जगह बनाई और प्रतिष्ठा अर्जित की । उदय प्रकाश ने तो एक के बाद एक बेहतरीन कहानियां लिखकर साहित्य जगत में विशिष्ठ स्थान बनाया । उनकी लंबी कहानियां उपन्यास के रूप में प्रकाशित होकर पुरस्कृत भी हुई । इसी तरह से संजय कुंदन ने भी पहले कविता की दुनिया में अपना मुकाम हासिल किया और फिर कहानी और उपन्यास लेखन तक पहुंचे । लेकिन पद्य के साथ साथ गद्य को साधना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा काम है । हाल के दिनों में जिस तरह से फेसबुक आदि पर सक्रिय कविगण कहानी की ओर मुड़े हैं उससे कहानी का हाल भी कविता जैसा होने की आशंका पैदा हो गई है । लघु पत्रिकाओं के धड़ाधड़ छपने और बंद होने के दौर में नामवर सिंह ने एक बार कहा था – हिंदी में अच्छी कहानियां नहीं लिखी जा रही हैं, यह चिंता का विषय नहीं है, बल्कि चिंता का विषय यह है कि उसमें अच्छी और बुरी कहानियों की पहचान लुप्त होती जा रही है । नामवर जी की वो चिंता वाजिब थी । बल्कि अब तो ये खतरा पैदा होने लगा है कि अच्छी कहानियां बुरी कहानियों दबा ना दें । 

आज लिखी जा रही कहानियों को देखें तो दो तीन तरह की फॉर्मूलाबद्ध कहानियां आपको साफ तौर पर दिखाई देती हैं । एक तो उस तरह की कहानी बहुतायत में लिखी जा रही है जो बिल्कुल सपाट होती है । इन कहानियों में रिपोर्ताज और किस्सागोई के बीच का फर्क धूमिल हो गया है । भोगे हुए या देखे हुए यथार्थ को नाम पर घटना प्रधान कहानी पाठकों के सामने परोसी जा रही है जिसके अंत में जाकर पाठकों को चौंकाने की तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है । इसके अलावा कुछ कहानियों में भाषा से चमत्कार पैदा करने की कोशिश की जाती हैं। ग्राम्य जीवन पर लिखनेवाले कहानीकार अब भी रेणु की भाषा के अनुकरण से आगे नहीं बढ़ पाए हैं । ग्राम्य जीवन चाहे कितना भी बदल गया हो हिंदी कहानी में गांव की बात आते ही भाषा रेणु के जमाने की हो जाती है । इस दोष के शिकार बहुधा वरिष्ठ कथाकार भी हो जा रहे हैं । सुरेन्द्र चौधरी ने एक जगह लिखा भी था कि – रचनाधर्मी कथाकार जीवन के गतिमान सत्य से अपने को जोड़ता हुआ नए सत्यों का निर्माण भी करता है । नए सत्यों के निर्माण पर कुछ लोग मुस्कुरा सकते हैं । उनके अनुसार सत्य का निर्माण तो वैज्ञानिकों का क्षेत्र है साहित्यकार का नहीं ।  सत्य के निर्माण से हमारा तात्पर्य भाव-संबंधों के निर्माण से है, वस्तु निर्माण से नहीं । रचनाधर्मी कथाकार समाज द्वारा गढ़े गए नए सत्यों से भावात्मक संबंध स्थापित करता हुआ उन्हें नए परिप्रेक्ष्य के योग्य बना देता है । सामयिकता का शाब्दिक रूप से पीछा करनेवाले लोग रचनाधर्मी नहीं होते ।‘ सुरेन्द्र चौधरी ने ये बातें काफी पहले कही थीं लेकिन आज भी वो मौजूं है । ग्राम्य जीवन से इतर भी देखें तो आज की कहानी में आधुनिकता के नाम पर वर्तमान का पीछा करते हुए कहानीकार लोकप्रिय बनने की चाहत में दिशाहीन होता चला जा रहा हैमानवीय संबंधों को नए सिरे से परिभाषित करने के चक्कर में ऊलजूलल लिखकर पाठकों और आलोचकों का ध्यान खींचने की जुगत शुरू हो गई है ।  जिसकी वजह से आज हिंदी कहानी के सामने पठनीयता का संकट खड़ा होने की आशंका बलवती हो गई है । दरअसल साहित्य में इस तरह के दौर आते जाते रहते हैं लेकिन इस बार ये दौर सोशल मीडिया के अराजक प्लेटफॉर्म की वजह से गंभीर खरते के तौर पर सामने है । यह देखना दिलचचस्प होगा कि अच्छी कहानी खुद को किस तरह से बचा पाती है ।
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मन्नू भंडारी - एक प्लेट सैलाब - Mannu Bhandari in Hindi

2/07/2016 12:12:00 pm

चर्चित कहानी 'एक प्लेट सैलाब'- मन्नू भण्डारी #शब्दांकन

चर्चित कहानी 'एक प्लेट सैलाब'

- मन्नू भण्डारी

मन्नू भंडारी की कहानियाँ, मन्नू भंडारी की रचनाएँ, मनु भंडारी की कहानी, मन्नू भंडारी की भाषा शैली, मन्नू भंडारी अकेली, मन्नू भंडारी की आत्मकथा, मन्नू भंडारी की जीवनी... इन्टरनेट पर भी मन्नू जी के लेखन से प्यार करने वालों की तादाद बहुत है... 




मई की साँझ!

साढ़े छह बजे हैं। कुछ देर पहले जो धूप चारों ओर फैली पड़ी थी, अब फीकी पड़कर इमारतों की छतों पर सिमटकर आयी है, मानो निरन्तर समाप्त होते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए उसने कसकर कगारों को पकड़ लिया हो।

आग बरसाती हुई हवा धूप और पसीने की बदबू से बहुत बोझिल हो आयी है। पाँच बजे तक जितने भी लोग ऑफि़स की बड़ी-बड़ी इमारतों में बन्द थे, इस समय बरसाती नदी की तरह सड़कों पर फैल गये हैं। रीगल के सामनेवाले फुटपाथ पर चलनेवालों और हॉकर्स का मिला-जुला शोर चारों और गूँज रहा हैं गजरे बेचनेवालों के पास से गुज़रने पर सुगन्ध भरी तरावट का अहसास होता है, इसीलिए न ख़रीदने पर भी लोगों को उनके पास खड़ा होना या उनके पास से गुज़रना अच्छा लगता है।

टी-हाउस भरा हुआ है। उसका अपना ही शोर काफ़ी है, फिर बाहर का सारा शोर-शराबा बिना किसी रुकावट के खुले दरवाज़ों से भीतर आ रहा है। छतों पर फुल स्पीड में घमू ते पंखे भी जैसे आग बरसा रहे हैं। एक क्षण को आँख मूंद लो तो आपको पता ही नहीं लगेगा कि आप टी-हाउस में हैं या फुटपाथ पर। वही गमी, वही शोर।

गे-लॉर्ड भी भरा हुआ है। पुरुष अपने एयर-कण्डिशण्ड चेम्बरों से थककर और औरतें अपने-अपने घरों से ऊबकर मन बहलाने के लिए यहाँ आ बैठे हैं। यहाँ न गरमी है, न भन्नाता हुआ शोर। चारों ओर हल्का, शीतल, दूधिया आलोक फैल रहा है और विभिन्न सेण्टों की मादक कॉकटेल हवा में तैर रही है। टेबिलों पर से उठते हुए फुसफुसाते-से स्वर संगीत में ही डूब जाते हैं। गहरा मेक-अप किये डायस पर जो लड़की गा रही है, उसने अपनी स्कर्ट की बेल्ट खूब कसकर बाँध रखी है, जिससे उसकी पतली कमर और भी पतली दिखाई दे रही है और उसकी तुलना में छातियों का उभार कुछ और मुखर हो उठा है। एक हाथ से उसने माइक का डण्डा पकड़ रखा है और जूते की टोसे वह ताल दे रही है। उसके होठों से लिपस्टिक भी लिपटी है और मुसकान भी। गाने के साथ-साथ उसका सारा शरीर एक विशेष अदा के साथ झूम रहा है। पास में दोनों हाथों से झुनझुने से बजाता जो व्यक्ति सारे शरीर को लचका-लचकाकर ताल दे रहा है, वह नीग्रो है। बीच-बीच में जब वह उसकी ओर देखती है तो आँखें मिलते ही दोनों ऐसे हँस पड़ते हैं मानो दोनों के बीच कहीं ‘कुछ’ है। पर कुछ दिन पहले जब एक एंग्लो-इण्डियन उसके साथ बजाता था, तब भी यह ऐसे ही हँसती थी, तब भी इसकी आँखें ऐसे की चमकती थीं। इसकी हँसी और इसकी आँखों की चमक का इसके मन के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। वे अलग ही चलती हैं।

डायस की बग़लवाली टेबिल पर एक युवक और युवती बैठे हैं। दोनों के सामने पाइन-एप्पल जूस के ग्लास रखे हैं। युवती का ग्लास आधे से अधिक खाली हो गया है, पर युवक ने शायद एक-दो सिप ही लिये हैं। वह केवल स्ट्रॉ हिला रहा है।

युवती दुबली और गौरी है। उसके बाल कटे हुए हैं। सामने आ जाने पर सिर को झटक देकर वह उन्हें पीछे कर देती है। उसकी कलफ़ लगी साड़ी का पल्ला इतना छोटा है कि कन्धे से मुश्किल से छह इंच नीचे तक आ पाया है। चोलीनुमा ब्लाउज़ से ढकी उसकी पूरी की पूरी पीठ दिखाई दे रही है। ”तुम कल बाहर गयी थीं?“ युवक बहुत ही मुलायम स्वर में पूछता है। ”क्यों?“ बाँयें हाथ की लम्बी-लम्बी पतली उँगलियों से ताल देते-देते ही वह पूछती है।

”मैंने फ़ोन किया था।“

”अच्छा? पर किसलिए? आज मिलने की बात तो तय हो ही गयी थी।“ ”यों ही तुमसे बात करने का मन हो आया था।“ युवक को शायद उम्मीद थी कि उसकी बात की युवती के चेहरे पर कोई सुखद प्रतिक्रिया होगी। पर वह हल्के से हँस दी। युवक उत्तर की प्रतीक्षा में उसके चेहरे की ओर देखता रहा, पर युवती का ध्यान शायद इधर-उधर के लोगों में उलझ गया था। इस पर युवक खिन्न हो गया। वह युवती के मुँह से सुनना चाह रहा था कि वह कल विपिन के साथ स्कूटर पर घूम रही थी। इस बात के जवाब में वह क्या-क्या करेगा-यह सब भी उसने सोच लिया था और कल शाम से लेकर अभी युवती के आने से पहले तक उसको कई बार दोहरा भी लिया था। पर युवती की चुप्पी से सब गड़बड़ा गया। वह अब शायद समझ ही नहीं पा रहा था कि बात कैसे शुरू करे। ”ओ गोरा!“ बाल्कनी की ओर देखते हुए युवती के मुँह से निकला - ”यह सारी की सारी बाल्कनी किसने रिजर्व करवा ली?“

बाल्कनी की रेलिंग पर एक छोटी-सी प्लास्टिक की सफ़ेद तख्ती लगी थी, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था - ‘रिज़र्व्ड’।

युवक ने सिर झुकाकर एक सिप लिया - ”मैं तुमसे कुछ बात करना चाहता हूँ।“ उसकी आवाज़ कुछ भारी हो आयी थी, जैसे गला बैठ गया हो।

युवती ने सिप लेकर अपनी आँखें युवक के चेहरे पर टिका दीं। वह हल्के-हल्के मुसकरा रही थी और युवक को उसकी मुसकराहट से थोड़ा कष्ट हो रहा था।

”देखो, मैं इस सारी बात में बहुत गम्भीर हूँ।“ झिझकते-से स्वर में वह बोला।

”गम्भीर?“ युवती खिलखिला पड़ी तो उसके बाल आगे को झूल आये। सिर झटककर उसने उन्हें पीछे किया।

”मैं तो किसी भी चीज़ को गम्भीरता से लेने में विश्वास ही नहीं करती। ये दिन तो हँसने-खेलने के हैं, हर चीज़ को हल्के-फुल्के ढंग से लेने के। गम्भीरता तो बुढ़ापे की निशानी है। बूढ़े लोग मच्छरों और मौसम को भी बहुत गम्भीरता से लेते हैं....और मैं अभी बूढ़ा होना नहीं चाहती।“ ओर उसने अपने दोनों कन्धे जोर से उचका दिये। वह फिर गाना सुनने में लग गयी। युवक का मन हुआ कि वह उसकी मुलाक़ातों और पुराने पत्रों का हवाला देकर उससे अनेक बातें पूछे, पर बात उसके गले में ही अटककर रह गयी और वह खाली-खाली नज़रों से इधर-उधर देखने लगा। उसकी नज़र ‘रिज़र्व्ड’ की उस तख्ती पर जा लगी। एकाएक उसे लगने लगा जैसे वह तख्ती वहाँ से उठकर उन दोनों के बीच आ गयी है और प्लास्टिक के लाल अक्षर नियॉन लाइट के अक्षरों की तरह टिप-टिप करने लगे।

तभी गाना बन्द हो गया और सारे हालॅ में तालियों की गडग़डा़हट गूँज उठी। गाना बन्द होने के साथ ही लोगों की आवाजें धीमी हो गयीं, पर हॉल के बीचों-बीच एक छोटी टेबिल के सामने बैठे एक स्थूलकाय खद्दरधारी व्यक्ति का धाराप्रवाह भाषण स्वर के उसी स्तर पर जारी रहा। सामने पतलून और बुश-शर्ट पहने एक दुबला-पतला का व्यक्ति उनकी बातों को बड़े ध्यान से सुन रहा है। उनके बोलने से थोड़ा-थोड़ा थूक उछल रहा है जिसे सामनेवाला व्यक्ति ऐसे पोंछता है कि उन्हें मालूम न हो। पर उनके पास शायद इन छोटी-मोटी बातों पर ध्यान देने लायक़ समय ही नहीं है। वे मूड में आये हुए हैं - ”गाँधीजी की पुकार पर कौन व्यक्ति अपने को रोक सकता था भला? क्या दिन थे वे भी! मैंने बिज़नेस की तो की ऐसी की तैसी और देश-सेवा के काम में जुट गया। फिर तो सारी जि़न्दगी पॉलिटिकल-सफ़र की तरह ही गुजार दी!“

सामनेवाला व्यक्ति चेहरे पर श्रद्धा के भाव लाने का भरसक प्रयत्न करने लगा। ”देश आज़ाद हुआ तो लगा कि असली काम तो अब करना है। सब लोग पीछे पड़े कि मैं खड़ा होऊँ, मिनिस्ट्री पक्की है, पर नहीं साहब, यह काम अब अपने बस का नहीं रहा। जेल के जीवन ने काया को जर्जर कर दिया, फिर यह भी लगा कि नव-निर्माण में नया खून ही आना चाहिए, सो बहुत पीछे पड़े तो बेटों को झोंका इस चक्कर में। उन्हें समझाया, जि़न्दगी-भर के हमारे त्याग और परिश्रम का फल है यह आज़ादी, तुम लोग अब इसकी ल़ाज रखो, बिज़नेस हम सम्भालते हैं।“

युवक शब्दों को ढेलता-सा बोला- ”आपकी देश-भक्ति को कौन नहीं जानता?“

वे संतोष की एक डकार लेते हैं और जेब से रूमाल निकालकर अपना मुँह और मूँछों को साफ करते हैं। रूमाल वापस जेब में रखते हैं और पहलू बदलकर दूसरी जेब से चाँदी की डिबिया निकालकर पहले खुद पान खाते हैं, फिर सामनेवाले व्यक्ति की ओर बढ़ा देते हैं।

”जी नहीं, मैं पान नहीं खाता।“ कृतज्ञता के साथ ही उसके चेहरे पर बेचैनी का भाव उभर जाता है।

”एक यही लत है जो छूटती नही। “ पान की डिबिया को वापस जेब में रखते हुए वे कहते हैं ”इंग्लैण्ड गया तो हर सप्ताह हवाई जहाज़ से पानों की गड्डी आती थी।“

जब मन की बेचैनी केवल चेहरे से नहीं संभलती तो वह धीरे-धीरे हाथ रगड़ने लगता है।

पान को मुँह में एक ओर ठेलकर वे थोड़ा-सा हकलाते हुए कहते हैं, ”अब आज की ही मिसाल लो। हमारे वर्ग का एक भी आदमी गिना दो जो अपने यहाँ के कर्मचारी की शिकायत इस प्रकार सुनता हो? पर जैसे ही तुम्हारा केस मेरे सामने आया, मैंने तुम्हें बुलाया, यहाँ बुलाया।“

”जी हाँ।“ उसके चेहरे पर कृतज्ञता का भाव और अधिक मुखर हो जाता है। वह अपनी बात शरू करने के लिए शब्द ढूंढऩे लगता है। उसने बहुत विस्तार से बात करने की योजना बनायी थी, पर अब सारी बात को संक्षेप में कह देना चाहता है।

”सुना है, तुम कुछ लिखते-लिखाते भी हो?“

एकाएक हाल में फिर संगीत गूँज उठता है। वे अपनी आवाज-को थोड़ा और ऊँचा करते हैं। युवक का उत्सुक चेहरा थोड़ा और आगे को झुक आता है। ”तुम चाहो तो हमारी इस मुलाक़ात पर एक लेख लिख सकते हो। मेरा मतलब...लोगों को ऐसी बातों से नसीहत और प्रेरणा लेनी चाहिए...यानी...“ पान शायद उन्हें वाक्य पूरा नहीं करने देता।

तभी बीच की टेबिल पर ‘आई...उई’... का शोर होता है और सबका ध्यान अनायास ही उधर चला जाता है। बहुत देर से ही वह टेबिल लोगों का ध्यान अनायास ही खींच रही थी। किसी के हाथ से कॉफ़ी-का प्याला गिर पड़ा है। बैरा झाड़न लेकर दौड़ पड़ा और असिस्टेण्ट मैनेजर भी आ गया। दो लड़कियाँ खड़ी होकर अपने कुर्तों को रूमाल से पोंछ रही हैं। बाक़ी लड़कियाँ हँस रही हैं। सभी लड़कियों ने चूड़ीदार पाजामे और ढीले-ढीले कुर्ते पहन रखे हैं। केवल एक लड़की साड़ी में है और उसने ऊँचा-सा जूड़ा बना रखा है। बातचीत और हाव-भाव से सब ‘मिरेण्डियन्स’ लग रही हैं। मेज़ साफ़ होते ही खड़ी लड़कियाँ बैठ जाती हैं और उनकी बातों का टूटा क्रम (?) चल पड़ता है।

”पापा को इस बार हार्ट-अटैक हुआ है सो छुट्टियों में कहीं बाहर तो जा नहीं सकेंगे। हमने तो सारी छुट्टियाँ यहीं बोर होना है। मैं और ममी सप्ताह में एक पिक्चर तो देखते ही हैं, इट्स ए मस्ट फ़ॉर अस। छुट्टियों में तो हमने दो देखनी हैं।“

”हमारी किटी ने बड़े स्वीट पप्स दिये हैं। डैडी इस बार उसे ‘मीट’ करवाने मुम्बई ले गये थे। किसी प्रिंस का अल्सेशियन था। ममी बहुत बिगड़ी थीं। उन्हें तो दुनिया में सब कुछ वेस्ट करना ही लगता है। पर डैडी ने मेरी बात रख ली एंड इट पेड अस ऑलसो। रीयली पप्स बहुत स्वीट हैं।“

”इस बार ममी ने, पता है, क्या कहा है? छुट्टियों में किचन का काम सीखो।“

मुझे तो बाबा, किचन के नाम से ही एलर्जी है! मैं तो इस बार मोराविया पढ़ूंगी!

हिन्दीवाली मिस ने हिन्दी-नॉवेल्स की एक लिस्ट पकडा़यी है। पता नही, हिन्दी के नावेल्स तो पढ़े ही नहीं जाते!“ वह ज़ोर से कन्धे उचका देती है।

तभी बाहर का दरवाजा खुलता है और चुस्त-दुरुस्त शरीर और रोबदार चेहरा लिये एक व्यक्ति भीतर आता है। भीतर का दरवाज़ा खुलता है तब वह बाहर का दरवाज़ा बन्द हो चुका होता है, इसलिए बाहर के शोर और गरम हवा का लवलेश भी भीतर नहीं आ पाता।

सीढ़ियों के पासवाले कोने की छोटी-सी टेबल पर दीवाल से पीठ सटाये एक महिला बड़ी देर से बैठी है। ढलती उम्र के प्रभाव को भरसक मेकअप से दबा रखा है। उसके सामने कॉफ़ी का प्याला रखा है और वह बेमतलब थोड़ी-थोड़ी देर के लिए सब टेबिलों की ओर देख लेती है। आनेवाले व्यक्ति को देखकर उसके ऊब भरे चेहरे पर हल्की-सी चमक आ जाती है और वह उस व्यक्ति को अपनी ओर मुखतिब होने की प्रतीक्षा करती है। खाली जगह देखने के लिए वह व्यक्ति चारों ओर नजर दौड़ा रहा है। महिला को देखते ही उसकी आँखों में परिचय का भाव उभरता है और महिला के हाथ हिलाते ही वह उधर ही बढ़ जाता है।

”हल्लोऽ! आज बहुत दिनों बाद दिखाई दीं मिसेज रावत!“ फिर कुरसी पर बैठने से पहले पूछता है, ”आप यहाँ किसी के लिए वेट तो नहीं कर रही हैं?“ ”नहीं जी, घर में बैठे-बैठे या पढ़ते-पढ़ते जब तबीयत ऊब जाती है तो यहाँ आ बैठती हूँ। दो कप कॉफी के बहाने घण्टा-डेढ़ घण्टा मज़े से कट जाता है। कोई जान-पहचान का फ़ुरसत में मिल जाये तो लम्बी ड्राइव पर ले जाती हूँ। आपने तो किसी को टाइम नहीं दे रखा है न?“

”नो...नो... बाहर ऐसी भयंकर गरमी है कि बस। एकदम आग बरस रही है। सोचा, यहाँ बैठ कर एक कोल्ड काफॅी़ ही पी ली जाये। “ बैठते’ हुए उसने कहा। जवाब से कुछ आश्वस्त हो मिसेज़ रावत ने बैरे को कोल्ड कॉफ़ी का ऑर्डर दिया - ”ओर बताइए, मिसेज आहूजा कब लौटनेवाली हैं? सालभर तो हो गया न उन्हें?“

”गॉड नोज।“ वह कन्धे उचका देता है और फिर पाइप सुलगाने लगता है। एक कश खींचकर टुकड़ों-टुकड़ों में धुआँ उड़ाकर पूछता है, ”छुट्टियों में इस बार आपने कहाँ जाने का प्रोग्राम बनाया है?“

”जहाँ का भी मूड आ जाये चल देंगे। बस इतना तय है कि दिल्ली में नहीं रहेंगे। गरमियों में तो यहाँ रहना असम्भव है। अभी यहाँ से निकलकर गाड़ी में बैठेंगे तब तक शरीर झुलस जायेगा! सड़कें तो जैसे भट्टी हो रही है।“

गाने का स्वर डायस से उठकर फिर सारे हॉल में तैर गया... ‘ऑन सण्डे आइ एम हैप्पी...’

”नॉन सेन्स! मेरा तो सण्डे ही सबसे बोर दिन होता है!“

तभी संगीत की स्वर-लहरियों के साये में फैले हुए भिनभिनाते-से शोर-को चीरता हुए एक असंयत सा कोलाहल सारे हॉल में फैल जाता है। सबकी नज़रे दरवाजे की ओर उठ जाती है। विचित्र दृश्य है। बाहर और भीतर के दरवाजे एक साथ खुल गए हैं और नन्हें-मुन्ने बच्चों के दो-दो, चार-चार के झुण्ड हल्ला-गुल्ला करते भीतर घुस रहे हैं। सड़क का एक टुकड़ा दिखाई दे रहा है, जिस पर एक स्टेशन-बैगन खडी़ है, आस-पास कुछ दर्शक खडे़ हैं और उसमें-से बच्चे उछल-उछलकर भीतर दाखिल हो रहे हैं- ‘बॉबी, इधर आ जा!’ - ‘निद्धू, मेरा डिब्बा लेते आना...!’ बच्चों के इस शोर के साथ-साथ बाहर का शोर भी भीतर आ रहा हैं बच्चे टेबिलों से टकराते, एक-दूसरे को धकेलते हुए सीढि़यों पर जाते हैं। लकड़ी की सीढ़ियाँ कार्पेट बिछा होने के बावजूद धम्-धम् करके बज उठी है।

हॉल की संयत शिष्टता एक झटके के साथ बिखर जाती है। लड़की गाना बन्द करके मुग्ध भाव से बच्चों को देखने लगती हैं। सबकी बातों पर विराम-चिन्ह लग जाता है और चेहरों पर एक विस्मयपूर्ण कौतुक फैल जाता है। कुछ बच्चे बाल्कनी की रेलिंग पर झूलते हुए-से हॉल में गुब्बारे उछाल रहे हैं कुछ गुब्बारे कार्पेट पर आ गिरे हैं, कुछ कन्धों पर सिरों से टकराते हुए टेबिलों पर लुढ़क रहे हैं तो कुछ बच्चों की किलकारियों के साथ-साथ हवा में तैर रहे है।.... नीले, पीले, हरे, गुलाबी...

कुछ बच्चे ऊपर उछल-उछलकर कोई नर्सरी राइम गाने लगते हैं तो लकड़ी का फर्श धम्-धम् बज उठता है।

हॉल में चलती फि़ल्म जैसे अचानक टूट गयी है।



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