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रविवार, 25 जनवरी 2015

कहानी: सिरी उपमा जोग - शिवमूर्ति

कहानी

सिरी उपमा जोग

शिवमूर्ति



किर्र-किर्र-किर्र घंटी बजती है।

एक आदमी पर्दा उठाकर कमरे से बाहर निकलता है। अर्दली बाहर प्रतीक्षारत लोगों में से एक आदमी को इशारा करता है। वह आदमी जल्दी-जल्दी अंदर जाता है।

सबेरे आठ बजे से यही क्रम जारी है। अभी दस बजे ए. डी. एम. साहब को दौरे पर भी जाना है, लेकिन भीड़ है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रही। किसी की खेत की समस्या है तो किसी की सीमेंट की। किसी की चीनी की, तो किसी की लाइसेंस की। समस्याएँ ही समस्याएँ।

पौने दस बजे एक लम्बी घंटी बजती है। प्रत्युत्तर में अर्दली भागा-भागा भीतर जाता है।

''कितने मुलाकाती हैं अभी?''

''हुजूर, सात-आठ होंगे''

''सबको एक साथ भेज दो।''

अगले क्षण कर्इ लोगों का झुंड अंदर घुसता है, लेकिन दस-ग्यारह साल का एक लड़का अभी भी बाहर बरामदे में खड़ा है। अर्दली झुँझलाता है, ''जा-जा तू भी जा।''

''मुझे अकेले में मिला दो,'' लड़का फिर मिनमिनाता है।

इस बार अर्दली भड़क जाता है, ''आखिर ऐसा क्या है, जो तू सबेरे से अकेले-अकेले की रट लगा रहा है। क्या है इस चिट्टी में, बोल तो, क्या चाहिए-चीनी, सीमेंट, मिट्टी का तेल?''

लड़का चुप रह जाता है। चिट्ठी वापस जेब में डाल लेता है।

अर्दली लड़के को ध्यान से देख रहा है। मटमैली-सी सूती कमीज और पायजामा, गले में लाल रंग का गमछा, छोटे-कडे़-खडे़-रूखे बाल, नंगे पाँव। धूल-धूसरित चेहरा, मुरझाया हुआ। अपरिचित माहौल में किंचित सम्भ्रमित, अविश्वासी और कठोर। दूर देहात से आया हुआ लगता है।

कुछ सोचकर अर्दली आश्वासन देता है, ''अच्छा, इस बार तू अकेले में मिल ले।'' लेकिन जब तक अंदर के लोग बाहर आएँ, साहब ऑफिस-रूम से बेड-रूम में चले जाते हैं।

ड्राइवर आकर जीप पोंछने लगता है। फिर इंजन स्टार्ट करके पानी डालता है। लड़का जीप के आगे-पीछे हो रहा है।

थोड़ी देर में अर्दली निकलता है। साहब की मैगजीन, रूल, पान का डिब्बा, सिगरेट का पैकेट और माचिस लेकर। फिर निकलते हैं साहब, धूप-छाँही चश्मा लगाए। चेहरे पर आभिजात्य और गम्भीरता ओढे़ हुए।

लड़के पर नजर पड़ते ही पूछते हैं, ''हाँ, बोलो बेटे, कैसे?''

लड़का सहसा कुछ बोल नहीं पा रहा है। वह सम्भ्रम नमस्कार करता है।

''ठीक है, ठीक है।'' साहब जीप में बैठते हुए पूछते हैं, ''काम बोलो अपना, जल्दी, क्या चाहिए?''

अर्दली बोलता है, ''हुजूर, मैंने लाख पूछा कि क्या काम है, बताता ही नहीं। कहता है, साहब से अकेले में बताना है।''

''अकेले में बताना है तो कल मिलना, कल।''

जीप रेंगने लगती है। लड़का एक क्षण असमंजस में रहता है फिर जीप के बगल में दौड़ते हुए जेब से एक चिट्ठी निकालकर साहब की गोद में फेंक देता है।

''ठीक है, बाद में मिलना'', साहब एक चालू आश्वासन देते हैं। तब तक लड़का पीछे छूट जाता है। लेकिन चिट्ठी की गँवारू शक्ल उनकी उत्सुकता बढ़ा देती है। उसे आटे की लेर्इ से चिपकाया गया है।

चिट्ठी खोलकर वे पढ़ना शुरू करते हैं- 'सरब सिरी उपमा जोग, खत लिखा लालू की मार्इ की तरफ से, लालू के बप्पा को पाँव छूना पहुँचे...''

अचानक जैसे करेंट लग जाता है उनको। लालू की मार्इ की चिट्ठी! इतने दिनों बाद। पसीना चुहचुहा आया है उनके माथे पर। सन्न!

बड़ी देर बाद प्रकृतिस्थ होते हैं वे। तिरछी आँखों और बैक मिरर से देखते हैं- ड्राइवर निर्विकार जीप चलाए जा रहा है। अर्दली ऊँघते हुए झूलने लगा है।

वे फिर चिट्ठी खोलते हैं-''आगे समाचार मालूम हो कि हम लोग यहाँ पर राजी-खुशी से हैं और आपकी राजी-खुशी भगवान से नेक मनाया करते हैं। आगे, लालू के बप्पा को मालूम हो कि हम अपनी याद दिलाकर आपको दुखी नहीं करना चाहते, लेकिन कुछ ऐसी मुसीबत आ गर्इ है कि लालू को आपके पास भेजना जरूरी हो गया है। लालू दस महीने का था, तब आप आखिरी बार गाँव आए थे। उस बात को दस साल होने जा रहे हैं। इधर दो-तीन साल से आपके चाचाजी ने हम लोगों को सताना शुरू कर दिया है। किसी न किसी बहाने से हमको, लालू को और कभी-कभी कमला को भी मारते-पीटते रहते हैं। जानते हैं कि आपने हम लोगों को छोड़ दिया है, इसलिए गाँव भर में कहते हैं कि 'लालू' आपका बेटा नहीं है।

वे चाहते हैं कि हम लोग गाँव छोड़कर भाग जाएँ तो सारी खेती-बारी, घर दुवार पर उनका कब्जा हो जाय। आज आठ दिन हुए, आपके चाचाजी हमें बड़ी मार मारे। मेरा एक दाँत टूट गया। हाथ-पाँव सूज गए हैं। कहते हैं- गाँव छोड़कर भाग जाओ, नहीं तो महतारी-बेटे का मूँड़ काट लेंगे। अपने हिस्से का महुए का पेड़ वे जबरदस्ती कटवा लिये हैं। कमला अब सत्तरह वर्ष की हो गर्इ है। मैंने बहुत दौड़-धूप कर एक जगह उसकी शादी पक्की की है। अगर आपके चाचाजी मेरी झूठी बदनामी लड़के वालों तक पहुँचा देंगे तो मेरी बिटिया की शादी भी टूट जाएगी। इसलिए आपसे हाथ जोड़कर विनती है कि एक बार घर आकर अपने चाचाजी को समझा दीजिए। नहीं तो लालू को एक चिट्ठी ही दे दीजिए, अपने चाचाजी के नाम। नहीं तो आपके आँख फेरने से तो हम भीगी बिलार बने ही हैं, अब यह गाँव-डीह भी छूट जाएगा। राम खेलावन मास्टर ने अखबार देखकर बताया था कि अब आप इस जिले में हैं। इसी जगह पर लालू को भेज रही हूँ।''

चिट्ठी पढ़कर वे लम्बी साँस लेते हैं। उन्हें याद आता है कि लड़का पीछे बंगले पर छूट गया है। कहीं किसी को अपना परिचय दे दिया तो? लेकिन अब इतनी दूर आ गए है कि वापस लौटना उचित नहीं लग रहा है। फिर वापस चलकर सबके सामने उससे बात भी तो नहीं की जा सकती है। उन्हें प्यास लग आर्इ है। ड्राइवर से कहते हैं, ''जीप रोकना, प्यास लगी है।'' पानी और चाय पीकर सिगरेट सुलगाया उन्होंने। तब धीरे-धीरे प्रकृतिस्थ हो रहे हैं। उनके मस्तिष्क में दस साल पुराना गाँव उभर रहा है। गाँव, जहाँ उनका प्रिय साथी था- महुए का पेड़, जो अब नहीं रहा। उसी की जड़ पर बैठकर सबेरे से शाम तक 'कम्पटीशन' की तैयारी करते थे वे। गाँव जहाँ उनकी उस समय की प्रिय बेटी कमला थी। जिसके लाल-लाल नरम होंठ कितने सुंदर लगते थे। महुए के पेड़ पर बैठकर कौआ जब 'काँ-काँ!' बोलता तो जमीन पर बैठी नन्ही कमला दुहराती- काँ ! काँ ! कौआ थक-हारकर उड़ जाता तो वह ताली पीटती थी। वह अब सयानी हो गर्इ है। उसकी शादी होने वाली हैं एक दिन हो भी जाएगी। विदा होते समय अपने छोटे भार्इ का पाँव पकड़कर रोएगी। बाप का पाँव नहीं रहेगा पकड़कर रोने के लिए। भार्इ आश्वासन देगा कंधा पकड़कर, आफत-बिपत में साथ देने का। बाप की शायद कोर्इ घुँधली-सी तस्वीर उभरे उसके दिमाग में।

फिर उनके दिमाग में पत्नी के टूटे दाँत वाला चेहरा घूम गया। दीनता की मूर्ति, अति परिश्रम-कुपोषण और पति की निष्ठुरता से कृश, सूखा शरीर, हाथ-पाँव सूजे हुए, मार से। बहुत गरीबी के दिन थे, जब उनका गौना हुआ था। इंटर पास किया था उस साल। लालू की मार्इ बलिष्ठ कद-काठी की हिम्मत और जीवट वाली महिला थी, निरक्षर लेकिन आशा और आत्मविश्वास की मूर्ति। उसे देखकर उनके मन में श्रद्धा होती थी उसके प्रति। इतनी आस्था हो जिंदगी और परिश्रम में तो संसार की कोर्इ भी वस्तु अलभ्य नहीं रह सकती। बी0 ए0 पास करते-करते कमला पैदा हो गर्इ थी। उसके बाद बेरोजगारी के वर्षो में लगातार हिम्मत बँधाती रहती थी। अपने गहने बेचकर प्रतियोगिता परीक्षा की फ़ीस और पुस्तकों की व्यवस्था की थी उसने। खेती-बारी का सारा काम अपने जिम्मे लेकर उन्हें परीक्षा की तैयारी के लिए मुक्त कर दिया था। रबी की सिंचार्इ के दिनों में सारे दिन बच्ची को पेड़ के नीचे लिटाकर कुएँ पर पुर हाँका करती थी। बाजार से हरी सब्जी खरीदना सम्भव नहीं था, लेकिन छप्पर पर चढ़ी हुर्इ नेनुआ की लताओं को वह अगहन-पूस तक बाल्टी भर-भर कर सींचती रहती थी, जिससे उन्हें हरी सब्जी मिलती रहे। रोज सबेरे ताजी रोटी बनाकर उन्हें खिला देती और खुद बासी खाकर लड़की को लेकर खेत पर चली जाती थी। एक बकरी लार्इ थी वह अपने मायके से, जिससे उन्हें सबेरे थोड़ा दूध या चाय मिल सके। रात को सोते समय पूछती, ''अभी कितनी किताब और पढ़ना बाकी है, साहबी वाली नौकरी पाने के लिए।''

वे उसके प्रश्न पर मुस्करा देते, ''कुछ कहा नहीं जा सकता। सारी किताबें पढ़ लेने के बाद भी जरूरी नहीं कि साहब बन ही जाएँ।''

ऐसा मत सोचा करिए,'' वह कहती, ''मेहनत करेंगे तो भगवान उसका फल जरूर देंगे।''

यह उसी के त्याग, तपस्या और आस्था का परिणाम था कि एक ही बार में उनका सेलेक्शन हो गया था। परिणाम निकला तो वे खुद आश्चर्यचकित थे। घर आकर एकांत में पत्नी को गले से लगा लिया था। वाणी अवरूद्ध हो गर्इ थी। उसको पता लगा तो वह बड़ी देर तक निस्पंद रोती रही, बेआवाज। सिर्फ आँसू झरते रहे थे। पूछने पर बताया, खुशी के आँसू हैं ये। गाँव की औरतें ताना मारती थीं कि खुद ढोएगी गोबर और भतार को बनाएगी कप्तान, लेकिन अब कोर्इ कुछ नहीं कहेगा, मेरी पत बच गर्इ।

वे भी रोने लगे थे उसका कंधा पकड़कर।

जाने कितनी मनौतियाँ माने हुए थी वह। सत्यनारायण... संतोषी... शुक्रवार... विंध्याचल... सब एक-एक करके पूरा किया था। जरा-जीर्ण कपडे़ में पुलकती घूमती उसकी छवि, जिसे कहते हैं, राजपाट पा जाने की खुशी।

सर्विस ज्वाइन करने के बाद एक-डेढ़ साल तक वे हर माह के द्वितीय शनिवार और रविवार को गाँव जाते रहे थे। पिता, पत्नी, पुत्री सबके लिए कपडे़-लत्ते तथा घर की अन्य छोटी-मोटी चीजें, जो अभी तक पैसे के अभाव के कारण नहीं थीं, वे एक-एक करके लाने लगे थे। पत्नी को पढ़ाने के लिए एक ट्यूटर लगा दिया था। पत्नी की देहाती ढंग से पहनी गर्इ साड़ी और घिसे-पिटे कपडे़ उनकी आँखों में चुभने लगे थे। एक-दो बार शहर ले जाकर फिल्म वगैरह दिखा लाए थे, जिसका अनुकरण कर वह अपने में आवश्यक सुधार ले आए। खड़ी बोली बोलने का अभ्यास कराया करते थे, लेकिन घर-गृहस्थी के अथाह काम और बीमार ससुर की सेवा से इतना समय वह न निकाल पाती, जिससे पति की इच्छा के अनुसार अपने में परिवर्तन ला पाती। वह महसूस करती थी कि उसके गँवारपन के कारण वे अक्सर खीज उठते और कभी-कभी तो रात में कहते कि उठकर नहा लो और कपडे़ बदलो, तब आकर सोओ। भूसे जैसी गंध आ रही है तुम्हारे शरीर से। उस समय वह कुछ न बोलती। चुपचाप आदेश का पालन करती, लेकिन जब मनोनुकूल वातावरण पाती तो मुस्कराकर कहती, ''अब मैं आपके 'जोग' नहीं रह गर्इ हूँ, कोर्इ शहराती 'मेम' ढूँढ़िए अपने लिए।''

''क्यों, तुम कहाँ जाओगी?''

''जाउँगी कहाँ, यहाँ रहकर ससुरजी की सेवा करूँगी। आपका घर-दुवार सँभालूँगी। जब कभी आप गाँव आएँगे, आपकी सेवा करूँगी''

''तुमने मेरे लिए इतना दुख झेला है, तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से आज मैं धूल से आसमान पर पहुँचा हूँ, गाढे़ समय में सहारा दिया है। तुम्हें छोड़ दूँगा तो नरक में भी जगह न मिलेगी मुझे?''

लेकिन उनके अंदर उस समय भी कहीं कोर्इ चोर छिपा बैठा था, जिसे वे पहचान नहीं पाए थे।

जिस साल लालू पैदा हुआ, उसी साल पिताजी का देहांत हो गया। क्रिया-कर्म करके वापस गए तो मन गाँव से थोड़ा-थोड़ा उचटने लगा था। दो बच्चों की प्रसूति और कुपोषण से पत्नी का स्वास्थ्य उखड़ गया था। शहर की आबोहवा तथा साथी अधिकारियों के घर-परिवार का वातावरण हीन भावना पैदा करने लगा था। जिंदगी के प्रति दृष्टीकोण बदलने लगा था। गाँव कर्इ-कर्इ महीनों बाद आने लगे थे। और आने पर पत्नी जब घर की समस्याएँ बताती तो लगता, ये किसी और की समस्याएँ हैं। इनसे उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है। वे शहर में अपने को 'अनमैरिड' बताते थे। इस समय तक उनकी जान-पहचान जिला न्यायाधीश की लड़की ममता से हो चुकी थी और उसके सान्निध्य के कारण पत्नी से जुड़ा रहा-सहा रागात्मक सम्बन्ध भी अत्यंत क्षीण हो चला था।

तीन-चार महीने बाद फिर गाँव आए तो पत्नी ने टोका था, ''इस बार काफी दुबले हो गए हैं। लगता है, काफी काम रहता है, बहुत गुमसुम रहने लगे हैं, क्या सोचते रहते हैं?''

वे टाल गए थे। रात में उसने कहा, ''इस बार मैं भी चलूँगी साथ में। अकेले तो आपकी देह गल जाएगी।''

वे चौंक गए थे, ''लेकिन यहाँ की खेती-बारी, घर-दुवार कौन देखेगा? अब तो पिताजी भी नहीं रहे।''

''तो खेती-बारी के लिए अपना शरीर सुखाइएगा?''

''तुम तो फालतू में चिंता करती हो,'' लेकिन वह कुछ और सुनना चाहती थी, बोली थी, ''फिर आप शादी क्यों नहीं कर लेते वहाँ किसी पढ़ी-लिखी लड़की से? मैं तो शहर में आपके साथ रहने लायक भी नहीं हूँ।''

''कौन सिखाता है तुम्हें इतनी बातें?''

''सिखाएगा कौन? यह तो सनातन से होता आया है। मैं तो आपकी सीता हूँ। जब तक बनवास में रहना पड़ा, साथ रही, लेकिन राजपाट मिल जाने के बाद तो सोने की सीता ही साथ में सोहेगी। लालू के बाबू, सीता को तो आगे भी बनवास ही लिखा रहता है।''

''चुपचाप सो जाओ।'' उन्होंने कहा, लेकिन सोर्इ नहीं वह। बड़ी देर तक छाती पर सिर रखकर पड़ी रही फिर बोली, ''एक गीत सुनाऊँगी आपको। मेरी माँ कभी-कभी गाया करती थी।'' फिर बडे़ करूण स्वर में गाती रही थी वह, जिसकी एकाध पंक्ति ही अब उन्हें याद है- '' सौतनिया संग रास रचावत, मों संग रास भुलान, यह बतिया कोऊ कहत बटोही, त लगत करेजवा में बान, सँवरिया भूले हमें...''

वे अंदर से हिल गए और उसे दिलासा देते रहे कि वह भ्रम में पड़ गर्इ है, पर वह तो जैसे भविष्यद्रष्टा थी। आगत, जो अभी उनके सामने भी बहुत स्पष्ट नहीं था, उसने साफ देख लिया था। उनके सीने में उसने कहीं 'ममता' की गंध पा ली थी।

उस बार गाँव से आए तो फिर पाँच-छह महीने तक वापस जाने का मौका नहीं लग पाया। इसी बीच ममता से उनका विवाह हो गया। शादी के दूसरे तीसरे महीने गाँव से पत्नी का पत्र आया कि कमला को चेचक निकल आर्इ है। लालू भी बहुत बीमार है। मौका निकालकर चले आइए। लेकिन गाँव वे पत्र मिलने के महीने भर बाद ही जा सके। कोर्इ बहाना ही समझ में नहीं आ रहा था, जो ममता से किया जा सकता। दोनों बच्चे तब तक ठीक हो चुके थे, लेकिन उनके पहुँचने के साथ ही उसकी आँखें झरने-सी झरनी शुरू हो गर्इ थीं। कुछ बोली नहीं थी। रात में फिर वही गीत बड़ी देर तक गाती रही थी। उनका हाथ पकड़कर कहा था, ''लगता है, आप मेरे हाथों से फिसले जा रहे हैं और मैं आपको सँभाल नहीं पा रही हूँ।''

वे इस बार कोर्इ आश्वासन नहीं दे पाए थे। उसका रोना-धोना उन्हें काफी अन्यमनस्क बना रहा था। वे उकताए हुए से थे। अगले ही दिन वे वापस जाने को तैयार हो गए थे। घर से निकलने लगे तो वह आधे घंटे तक पाँव पकड़कर रोती रही थी। फिर लड़की को पैरों पर झुकाया था, नन्हे लालू को पैरों पर लिटा दिया था। जैसे सब कुछ लुट गया हो, ऐसी लग रही थी वह, दीन-हीन-मलिन।

वे जान छुड़ाकर बाहर निकल आए थे। वही उनका अंतिम मिलन था। तब से दस साल के करीब होने को आए, वे न कभी गाँव गए, न ही कोर्इ चिट्टी -पत्री लिखी।

हाँ, करीब साल भर बाद पत्नी की चिट्ठी जरूर आर्इ थी। न जाने कैसे उसे पता लग गया था, लिखा था-कमला नर्इ अम्मा के बारे में पूछती है। कभी ले आइए उनको गाँव। दिखा-बता जाइए कि गाँव में भी उनकी खेती-बारी, घर-दुवार है। लालू अब दौड़ लेता है। तेवारी बाबा उसका हाथ देखकर बता रहे थे कि लड़का भी बाप की तरह तोता-चश्म होगा। जैसे तोते को पालिए-पोसिए, खिलाइए-पिलाइए, लेकिन मौका पाते ही उड़ जाता है। पोस नहीं मानता। वैसे ही यह भी...तो मैंने कहा, 'बाबा, तोता पंछी होता है, फिर भी अपनी आन नहीं छोड़ता, जरूर उड़ जाता है, तो आदमी होकर भला कोर्इ कैसे अपनी आन छोड़ दे? पोसना कैसे छोड़ दे? मैं तो इसे इसके बापू से भी बड़ा साहब बनाऊँगी...'

उन्होंने पत्र का कोर्इ उत्तर नहीं भेजा था। हाँ, वह पत्र ममता के हाथों में जरूर पड़ गया था, जिसके कारण महीनों घर में रोना-धोना और तनाव व्याप्त रहा था।... और करीब नौ साल बाद आज यह दूसरा पत्र है।

पत्र उनके हाथों में बड़ी देर तक काँपता रहा और फिर उसे उन्होंने जेब में रख लिया। मन में सवाल उठने लगे- क्या मिला उसको उन्हें आगे बढ़ाकर? वे बेरोजगार रहते, गाँव में खेती-बारी करते। वह कंधे से कंधा भिड़ाकर खेत में मेहनत करती। रात में दोनों सुख की नींद सोते। तीनों लोकों का सुख उसकी मुट्ठी में रहता। छोटे से संसार में आत्मतुष्ट हो जीवन काट देती। उन्हें आगे बढ़ाकर वह पीछे छूट गर्इ। माथे का सिंदूर और हाथ की चूड़ियाँ निरंतर दुख दे रही हैं उसे।

सारे दिन किसी कार्यक्रम में उनका मन नहीं लगता।

शिवमूर्ति

2/325, विकास खंड, गोमती नगर, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
Mobile: 09450178673
Email: shivmurtishabad@gmail.com


शाम को जीप वापस लौट रही है। उनके मस्तिष्क में लड़के का चेहरा उभर आया है- जैसे मरूभूमि में खड़ा हुआ अशेष जिजीविषा वाला बबूल का कोर्इ शिशु झाड़, जिसे कोर्इ झंझावात डिगा नहीं सकता। कोर्इ तपिश सुखा नहीं सकती। उपेक्षा की धूप में जो हरा-भरा रह लेगा, अनुग्रह की बाढ़ में जो गल जाएगा।

जीप गेट के अंदर मुड़ती है तो गेट से सटे चबूतरे पर लड़का औंधा लेटा दिखार्इ देता है। मच्छरों से बचने के लिए उसने अंगौछे से सारा शरीर ढँक लिया है। जीप आगे बढ़ जाती है।

अंदर उनकी चार साल की बेटी टी.वी. देख रही है। आहट पाकर दौड़ी आती है और पैरों से लिपट जाती है। फिर महत्वपूर्ण सूचना देती है तर्जनी उठाकर, ''पापा, पापा, ओ बदमाश लड़का, बरामदे तक घुस आया था। मम्मी पूछती, तो बोलता नहीं था। भगाती तो भागता नहीं था। मैंने अपनी खिलौना मोटर फेंककर मारा, उसका माथा कटने से खून बहकर मुँह में जाने लगा तो थू-थू करता हुआ भागा। और पापा, वह जरूर बदमाश था। जरा भी नहीं रोया। बस, घूर रहा था। बाहर चपरासियों के लड़के मार रहे थे, लेकिन मम्मी ने मना करवा दिया।''

वाश-बेसिन की तरफ बढ़ते हुए वे ममता से पूछते हैं, ''कौन था?''

''शायद आपके गाँव से आया है। भेंट नहीं हुर्इ क्या?''

''मैं तो अभी चला आ रहा हूँ, कहाँ गया?''

''नाम नहीं बताता था, काम नहीं बताता था, कहता था, सिर्फ साहब को बताऊँगा। फिर लड़के तंग करने लगे तो बाहर चला गया।''

''कुछ खाना-पीना ?''

''पहले यह बताइए, वह है कौन?'' एकाएक ममता का स्वर कर्कश और तेज हो गया, ''उस चुड़ैल की औलाद तो नहीं, जिसे आप गाँव का राज-पाट दे आए हैं? ऐसा हुआ तो खबरदार, जो उसे गेट के अंदर भी लाए, खून पी जाऊँगी।''

वे चुपचाप ड्राइंगरूम में आकर सोफे पर निढाल पड़ गए हैं। चक्कर आने लगा है। शायद रक्तचाप बढ़ गया है।

बाहर फागुनी जाड़ा बढ़ता जा रहा है।

सबेरे उठकर वे देखते हैं- चबूतरे पर 'गाँव' नहीं है।

वे चैन की साँस लेते हैं।


यह कहानी सारिका कथापत्रिका के दिसम्बर (द्वितीय) 1984 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2015

रवीश की रिपोर्ट नहीं 'लप्रेक' के साथ जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में होगी राजकमल प्रकाशन की 'सार्थक' पहल

‘सार्थक’ पहल के साथ जेएलएफ में उतरेगा राजकमल प्रकाशन

रवीश की लप्रेक (लघु प्रेम कथा) श्रृंखला की पहली किताब इश्क़ में शहर होना

गुलाबी शहर में साल की शुरूआत में ही आयोजित होने वाले सबसे बड़े साहित्य महोत्सव- जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में राजकमल प्रकाशन अपने नए और ख़ास प्रयोगों के साथ अपनी उपस्थित दर्ज़ करने जा रहा है। सार्थक- राजकमल प्रकाशन का उपक्रम, के बैनर तले लप्रेक (लघु प्रेम कथा) श्रृंखला की पहली किताब ‘इश्क़ में शहर होना’ का लोकार्पण जेएलएफ में 24 जनवरी को होगा। इसके लेखक हैं वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ‘रवीश की रिपोर्ट’ से लोगों के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाने वाले - रवीश कुमार। प्रेम में होना सिर्फ हाथ थामने का बहाना ढूँढना नहीं होता। दो लोगों के उस स्पेस में बहुत कुछ टकराता रहता है। लप्रेक उसी कशिश और टकराहट की पैदाइश है।
राजकमल प्रकाशन के निदेशक आमोद आमोद महेश्वरी ने बताया कि पुस्तक प्रेमियों के लिए एक खुशखबरी यह है कि लप्रेक प्री-बुकिंग के लिए Amazon पर उपलब्ध है। 13 फरवरी तक 99 रू की लप्रेक 80 रू में खरीदी जा सकती है बगैर किसी डाक खर्च के और इनका वितरण 28 जनवरी से शुरू हो जायेगा।
लप्रेक श्रृंखला में अन्य दो प्रमुख लप्रेककार हैं - विनीत कुमार और गिरीन्द्र नाथ झा। श्रृंखला में पहली किताब रवीश कुमार की आ रही है जिसका नाम है- 'इश्क़ में शहर होना'। इन सभी पुस्तकों की खास बात यह है कि ये सभी कहानियां चित्रात्मक हैं। यानी चित्रों के साथ शब्दों का बेहतरीन मेल इन किताबों में देखने को मिलने जा रहा है। इन किताबों के लिए चित्रकारी की है चित्रकार, कार्टूनिस्ट, छायाकार और जाने- माने फ़िल्मकार विक्रम नायक ने।

'इश्क़ में शहर होना'  के लेखक रवीश कुमार जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में 23-24 जनवरी को मौजूद रहेंगे। अपनी किताब के बारे में 'कहानी की नई करवट' सत्र में वह पत्रकार और लेखिका अनु सिंह चौधरी से 24 तारीख को 3:30 बजे दोपहर में बातचीत करेंगे। सत्र की शुरुआत किताब के लोकार्पण से होगी। लोकार्पण जयपुर के नौजवान विद्यार्थी करेंगे।


गुरुवार, 22 जनवरी 2015

'वर्तमान साहित्य' दिसम्बर 2014

वर्तमान साहित्य

साहित्य, कला और सोच की पत्रिका

वर्ष 31 अंक 12  दिसम्बर, 2014
dowload vartman sahitya 2014 / वर्तमान साहित्य का दिसम्बर 2014 अंक डाउनलोड करें सलाहकार संपादक:
रवीन्द्र कालिया
संपादक:
विभूति नारायण राय
कार्यकारी संपादक:
भारत भारद्वाज

अंदर की बात
गुफ़्तगू: ‘जा चुके थे जो बहुत दूर, करीब आए हैं /भारत भारद्वाज/3
नोबेल व्याख्यान
साहित्य की प्रसंशा में / मारियो वगार्स लोसा/ 5
आपबीती
विभाजन की त्रासदी/ हुरा ख़लीक /10
कहानी
एक अद्भुत दोपहर /गैब्रियल मारक्वजे /14
जमीं आग की आसमां आग का / ज़ाहिदा हिना/18
अबरोध–बासिनी/ रुक्य्या सखखवत हुसैन /29
कविताएं
मेरा जनाजा/नाज़िम हिकमत/26
तुम कहां चले गए, नाज़िम ?/पाब्लो नेरुदा/26
तुम पुस्तकें / पाब्लो नेरुदा /26
जनरल तुम्हारा टैंक एक मजबूत... / बर्तोल्त ब्रेख्त/27
विदाई / बर्तोल्त ब्रेख्त/27
यह कैसा शहर है ? / बर्तोल्त ब्रेख्त/27
स्पेनी कविताएं / लोर्का /27
पाचं कविताएं/ महमदू दरवीश/45
तीन कविताएं/  लैंगस्टन ह्यजू /45
हरा कुर्ता/ 46
हथेली में प्रभात/ हो कान/46
फागुनी धान /ते हान्ह/46
पारभासक हरी नदी/न्यएून दिन थो/47
सूरज की बात में/ फाम ही/47
संस्मरण
सीमाओं को तोड़ने के सपने फातमा मरनेसी /38
लघु उपन्यास
खलनायक/यी मनु यालॅ /48

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तकनीकी पक्ष : भरत तिवारी

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वार्षिक  : 350/– संस्थाओं व लाइब्रेरियों के लिए 500/–
आजीवन : 11000/–
विदेशों में वार्षिक  : 70 डॉलर ।
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मंगलवार, 20 जनवरी 2015

कहानी- नये साल की धूप : सुभाष नीरव

कहानी

नये साल की धूप

सुभाष नीरव

 स्मृतियाँ अकेले आदमी का पीछा नहीं छोड़तीं। बूढ़े अकेले लोगों का सहारा तो ये स्मृतियाँ ही होती हैं जिनमें खोकर या उनकी जुगाली करके वे अपने जीवन के बचे-खुचे दिन काट लेते हैं। वह भी अपनी यादों के समन्दर में गोते लगाने लगा।
रोज की तरह आज भी बिशन सिंह की आँख मुँह-अँधेरे ही खुल गई, जबकि रात देर तक पति-पत्नी रजाई में घुसे टी.वी. पर अलविदा होते साल और नव वर्ष के आगमन को लेकर होने वाले कार्यक्रम देखते रहे थे और अपने जीवन के बीते वर्षों के दु:ख-सुख साझा करते रहे थे। रात्रि के ठीक बारह बजे दोनों ने रेवड़ी के दानों से मुँह मीठा करते हुए एक-दूसरे को नये वर्ष की शुभकामनाएं दी थीं। फिर सुखवंती अपनी बिस्तर में घुस गई थी।

      एक बार आँख खुल जाए, फिर बिशन सिंह को नींद कहाँ। वह उठकर बैठ गया था। ठिठुरते-कांपते अपने बूढ़े शरीर के चारों ओर रजाई को अच्छी प्रकार से लपेट-खोंस कर उसने दीवार से पीठ टिका ली थी। एक हाथ की दूरी पर सामने चारपाई पर सुखवंती रजाई में मुँह-सिर लपेटे सोई पड़ी थी।
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सुभाष नीरव

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      'कहीं तड़के जाकर टिकी है। बिस्तर पर घुसते ही खांसी का दौरा उठने लगता है इसे। कितनी बार कहा है, जो काम करवाना होता है, माई से करवा लिया कर, पर इसे चैन कहाँ! ठंड में भी लगी रहेगी, पानी वाले काम करती रहेगी, बर्तन मांजने बैठ जाएगी, पौचा लगाने लगेगी। और नहीं तो कपड़े ही धोने बैठ जाएगी। अब पहले वाली बात तो रही नहीं। बूढ़ा शरीर है, बूढ़ा शरीर ठंड भी जल्दी पकड़ता है।' सुखवंती को लेकर न जाने कितनी देर वह अपने-आप से बुदबुदाता रहा।

      बाहर आँगन में चिड़ियों का शोर बता रहा था कि सवेरा हो चुका था। बिशन सिंह ने बैठे-बैठे वक्त का अंदाजा लगाया। उसका मन किया कि उठकर खिड़की खोले या आँगन वाला दरवाजा खोलकर बाहर देखे - नये साल की नई सुबह ! पर तभी, इस विचार से ही उसके बूढ़े शरीर में कंपकंपी की एक लहर दौड़ गई। कड़ाके की ठंड! पिछले कई दिनों से सूर्य देवता न जाने कहाँ रजाई लपेटे दुपके थे। दिनभर धूप के दर्शन न होते। तभी वह चिड़ियों के बारे में सोचने लगा। इन चिड़ियों को ठंड क्यों नहीं लगती? इस कड़कड़ाती ठंड में भी कैसे चहचहा रही हैं बाहर। फिर उसे लगा, जैसे ये भी चहचहाकर नये साल की मुबारकबाद दे रही हों।

      हर नया साल नई उम्मींदें, नये सपने लेकर आता है। आदमी साल भर इन सपनों के पीछे भागता रहता है। कुछ सपने सच होते हैं, पर अधिकांश काँच की किरचों की तरह ज़ख्म दे जाते हैं। जिन्दर को लेकर उन दोनों पति-पत्नी ने कितने सपने देखे थे। पर क्या हुआ?

      तभी, सुखवंती ने करवट बदली थी। करवट बदलने से रजाई एक ओर लटक गई थी। उसका मन हुआ कि वह आवाज़ लगाकर उसे जगाये और रजाई ठीक करने को कहे। पर कुछ सोचकर उसने ऐसा नहीं किया। इससे उसकी नींद में खलल पड़ता। उसने खुद उठकर सुखवंती की रजाई ठीक की, इतनी आहिस्ता से कि वह जाग न जाए। जाग गई तो फिर दुबारा सोने वाली नहीं। वैसे भी सुखवंती, ठीक हो तो इतनी देर तक कभी नहीं सोती।

     वह फिर अपने बिस्तर में आकर बैठ गया था।

      स्मृतियाँ अकेले आदमी का पीछा नहीं छोड़तीं। बूढ़े अकेले लोगों का सहारा तो ये स्मृतियाँ ही होती हैं जिनमें खोकर या उनकी जुगाली करके वे अपने जीवन के बचे-खुचे दिन काट लेते हैं। वह भी अपनी यादों के समन्दर में गोते लगाने लगा।

      सुखवंती ब्याह कर आई थी तो उसके घर की हालत अच्छी नहीं थी। बस, दो वक्त की रोटी चलती थी। गाँव में छोटा-मोटा बढ़ई का उनका पुश्तैनी धंधा था। पर सुखवंती का पैर उसके घर में क्या पड़ा कि उसके दिन फिरने लगे। फिर उसको शहर के एक कारखाने में काम मिल गया। हर महीने बंधी पगार आने से धीरे-धीरे उसके घर की हालत सुधरने लगी। कच्चा घर पक्का हो गया। भांय - भांय करता घर हर तरह की छोटी-मोटी ज़रूरी वस्तुओं से भरने लगा। उसने गाँव में ही ज़मीन का छोटा-सा टुकड़ा खरीद लिया। चार दुकानें निकाल लीं। एक अपने पास रखकर बाकी तीन किराये पर चढ़ा दीं। हर महीने बंधा किराया आने लगा। कारखाने की पगार और दुकानों का किराया, और दो जीवों का छोटा-सा परिवार। रुपये-पैसे की टोर हो गई।

      सुखवंती ने फिर करवट बदली। अब उसने मुँह पर से रजाई हटा ली थी। बिशन सिंह उसके चेहरे की ओर टकटकी लगाये देखता रहा।

      ईश्वर ने हर चीज़ का सुख उनकी झोली में डाला था। बस, एक औलाद का सुख ही नहीं दिया। बहुत इलाज करवाया, पर कोई लाभ नहीं हुआ। सुखवंती चाहकर भी यह सुख बिशन सिंह को न दे पाई। लोग बिशन सिंह को समझाते-उकसाते, दूसरा विवाह करवा लेने के लिए यह कहकर कि औलाद तो बहुत ज़रूरी है, जब बुढ़ापे में हाथ-पैर नहीं चलते तब औलाद ही काम आती है। पर उसने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया कभी।

      इस बार, सुखवंती ने करवट बदली तो उसकी आँख खुल गई। मिचमिचाती आँखों से घरवाले को बिस्तर पर बैठा देखा तो वह उठ बैठी। पूछा, ''क्या बात है? तबीयत तो ठीक है?''

      ''हाँ, पर तू अपनी बता। आज डॉक्टर के पास चलना मेरे साथ।''

      ''कुछ नहीं हुआ मुझे।'' सुखवंती ने अपना वही पुराना राग अलापा, मामूली-सी खाँसी है, ठंड के कारण। मौसम ठीक होगा तो अपने आप ठीक हो जाएगी। पर मुझे तो लगता है, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं। कांपे जा रहे हो।''

      ''बस, ठंड के कारण कांप रहा हूँ। इस बार तो ठंड ने रिकार्ड तोड़ डाला।'' बिशन सिंह ने रजाई को अपने चारों ओर खोंसते हुए कहा।

      ''बैठे क्यों हो? लेट जाओ बिस्तर में। मैं चाय बनाकर लाती हूँ।''

      ''लेटे-लेटे भी जी ऊब जाता है। धूप निकले तो बाहर धूप में बैठें। तीन दिन हो गये धूप को तरसते। पता नहीं, आज भी निकलेगी कि नहीं।''

      ''नहीं, अभी पड़े रहो बिस्तर में। बाहर हवा चल रही होगी। जब धूप निकलेगी तो चारपाई बिछा दूँगी बाहर।'' घुटनों पर हाथ रखकर सुखवंती उठी और 'वाहेगुरु - वाहेगुरु' करती हुई रसोई में घुस गई। कुछ देर बार वह चाय का गिलास लेकर आ गई। बिशन सिंह ने गरम-गरम चाय के घूंट भरे तो ठिठुरते जिस्म में थोड़ी गरमी आई। उसने सुखवंती को हिदायत दी, ''अब पानी में हाथ न डालना। अभी माई आ जाएगी। खुद कर लेगी सारा काम। आ जा मेरे पास, चाय का गिलास लेकर।''

      सुखवंती ने पहले अपना बिस्तर लपेटा, चारपाई को उठाकर बरामदे में रखा और फिर अपना चाय का गिलास उठाकर बिशन सिंह के पास आ बैठी, उसी के बिस्तर में। बिशन सिंह अपनी ओढ़ी हुई रजाई को खोलते हुए बोला, ''थोड़ा पास होकर बैठ, गरमाहट बनी रहेगी।''

      सुखवंती बिशन सिंह के करीब होकर बैठी तो उसे बिशन सिंह का बदन तपता हुआ-सा लगा।

      ''अरे, तुम्हें तो ताप चढ़ा है।'' सुखवंती ने तुरन्त बिशन सिंह का माथा छुआ, ''तुमने बताया नहीं। रात में गोली दे देती बुखार की। आज बिस्तर में से बाहर नहीं निकलना।''

      ''कुछ नहीं हुआ मुझे। यूँ ही न घबराया कर।'' बिशन सिंह ने चाय का बड़ा-सा घूंट भरकर कहा।

      फिर, वे कितनी ही देर तक एक-दूसरे के स्पर्श का ताप महसूस करते रहे, नि:शब्द! बस, चाय के घूंट भरने की हल्की-हल्की आवाजें रह-रहकर तैरती रहीं।

      फिर, पता नहीं सुखवंती के दिल में क्या आया, वह सामने शून्य में ताकती हुई बड़ी उदास आवाज में बुदबुदाई, ''पता नहीं, हमने रब का क्या बिगाड़ा था। हमारी झोली में भी एक औलाद डाल देता तो क्या बिगड़ जाता उसका। बच्चों के संग हम भी नया साल मनाते। पर औलाद का सुख...।''

      ''औलाद का सुख?'' बिशन सिंह हँसा।

      सुखवंती ने उसकी हँसी के पीछे छिपे दर्द को पकड़ने की कोशिश की।

      बिशन सिंह अपने दोनों हाथों के बीच चाय का गिलास दबोचे, चाय में से उठ रही भाप को घूर रहा था।

      ''औलाद का सुख कहाँ है सुखवंती। जिनके है, वह भी रोते हैं। अब चरने को ही देख ले। तीन-तीन बेटों के होते हुए भी नरक भोग रहा है। तीनों बेटे अपना-अपना हिस्सा लेकर अलग हो गए। बूढ़ा-बूढ़ी को पूछने वाला कोई नहीं।''

      कुछ देर की ख़ामोशी के बाद वह बोला, ''वो अपने परमजीत को जानती हो? अरे वही, शिन्दर का बाप। औलाद के होते हुए भी बेऔलाद-सा है। रोटी-टुक्कड़ को तरसता। जब तक औलाद नहीं थी, औलाद-औलाद करता था। जब रब ने औलाद दी तो अब इस उम्र में कहता घूमता है- इससे तो बेऔलाद अच्छा था। सारी जायदाद बेटों ने अपने नाम करवा ली। अब पूछते नहीं। कहता है- मैं तो हाथ कटवा बैठा हूँ। अगर रुपया-पैसा मेरे पास होता, तो सेवा के लिए कोई गरीब बंदा ही अपने पास रख लेता।''

      ''पर सभी औलादें ऐसी नहीं होतीं।'' सुखवंती बिशन सिंह के बहुत करीब सटकर बैठी थी, पर बिशन सिंह को उसकी आवाज़ बहुत दूर से आती लग रही थी।

      चाय के गिलास खाली हो चुके थे। सुखवंती ने अपना और बिशन सिंह का गिलास झुककर चारपाई के नीचे रख दिया। उघड़ी हुई रजाई को फिर से अपने इर्दगिर्द लपेटते हुए वह कुछ और सरककर बिशन सिंह के साथ लगकर बैठ गई। बिशन सिंह ने भी अपना दायां बाजू बढ़ाकर उसे अपने संग सटा लिया।

      ''जिन्दर ने भी हमें धोखा दिया, नहीं तो...।'' कहते-कहते सुखवंती रुक गई।

      ''उसकी बात न कर, सुखवंती। वह मेरे भाई की औलाद था, पर मैंने तो उसे भाई की औलाद माना ही नहीं था। अपनी ही औलाद माना था। सोचा था, भाई के बच्चे तंगहाली और गरीबी के चलते पढ-लिख नहीं पाए। जिन्दर को मैं पढ़ाऊँगा-लिखाऊँगा। पर...'' कहते-कहते चुप हो गया वह।

      ''जब हमारे पास रहने आया था, दस-ग्यारह साल का था। कोई कमी नहीं रखी थी हमने उसकी परवरिश में। इतने साल हमने उसे अपने पास रखा। अच्छा खाने - पहनने को दिया। जब कोई आस बंधी तो उसने यह कारा कर दिखाया...।'' सुखवंती का स्वर बेहद ठंडा था।

      ''सबकुछ उसी का तो था। हमारा और कौन था जिसे हम यह सब दे जाते। जब उसने तुम्हारे गहनों पर हाथ साफ किया, तो दु:ख तो बहुत हुआ था, पर सोचा था, अपने किये पर पछतायेगा।'' बिशन सिंह ने सुखवंती का दायां हाथ अपनी दोनों हथेलियों के बीच दबाकर थपथपाते हुए कहा, ''पर जब उसने दुकानें और मकान अपने नाम लिख देने की बात की तो लगा, यह तो अपना कतई नहीं हो सकता।''

      ''अच्छा हुआ, अपने आप चला गया छोड़कर।'' सुखवंती ने गहरा नि:श्वास लेते हुए कहा।

      ''सुखवंती, आदमी के पास जो नहीं होता, वह उसी को लेकर दु:खी होता रहता है उम्र भर। जो होता है, उसकी कद्र नहीं करता।'' कहकर बिशन सिंह ने सुखवंती का मुँह अपनी छाती से सटा लिया। सुखवंती भी उसके सीने में मुँह छुपाकर कुछ देर पड़ी रही। यह सेक, यह ताप दोनों को एकमेक किए था। इधर बिशन सिंह ने सोचा, ''जीवन का यह ताप हम दोनों में बना रहे, हमें और कुछ नहीं चाहिए'' और उधर सुखवंती भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी।

      तभी, धूप का एक छोटा-सा टुकड़ा खिड़की के कांच से छनकर कमरे में कूदा और फर्श पर खरगोश की भांति बैठकर मुस्कराने लगा। सुखवंती हड़बड़ाकर बिशन सिंह से यूँ अलग हुई मानो किसी तीसरे ने उन दोनों को इस अंतरंग अवस्था में देख लिया हो! फिर वे दोनों एक साथ खिलखिलाकर मुस्करा दिए, जैसे कह रहे हों, ''आओ आओ... नये साल की धूप... तुम्हारा स्वागत है।''
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शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

बीते हुए दिन कुछ ऎसे भी थे - राजेन्द्र राव

संस्मरण


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बीते हुए दिन कुछ  ऐसे भी थे

- राजेन्द्र राव

उन दिनों हिंदी समाज के मध्य वर्ग में साहित्यिक रुचि को सम्मानपूर्वक दृष्टि से देखा जाता था
लिखना शुरू किया तो मेरी उम्र करीब छब्बीस बरस थी और प्रेम तथा कुछ अन्य असफलताओं के बाद, रोजी रोटी की जद्दोजहद से उबर कर कुछ स्थिर हो चुका था। इस लिहाज से उन दिनों की रवायत के मुताबिक मुझे लेट एंट्री मानते हुए युवा लेखक के टाइटिल से नवाजा नहीं गया। उन दिनों (सत्तर के दशक में) युवा लेखक बीसेक साल के कच्चे छोरों को माना जाता था जिनके दूध के दांत न टूटे हों। हर युवा जल्दी से जल्दी इस उपाधि से छुटकारा पाने को आतुर रहता था। आज तो एकदम उल्टी स्थिति है - पचास पचास साल के युवा हैं और किसी भी सूरत में प्रौढ़ता की ओर कदम बढ़ाने के लिए तैयार नहीं हैं। खैर बात उन दिनों की हो रही है जब आज के मुकाबले गिनी चुनी पत्रिकाएं थीं और संपादक बहुत सख्तजान होते थे। साहित्य जगत में प्रवेश पाना आसान नहीं था। आज के कुछ जाने माने और अत्यधिक प्रतिष्ठित लेखकों को अपनी प्रथम रचना के प्रकाशन के लिए बरसों खटना पड़ा था। एक छपी हुई पर्ची होती थी- “संपादक के अभिवादन और खेद सहित”, वह रचना से साथ नत्थी होकर बार बार लौटती थी। कोई उसका न तो बुरा मानता था न हतोत्साहित होता था। हर रिजेक्शन और अधिक संलग्नता और मेहनत की प्रेरणा लेकर आता था क्योंकि उन दिनों हिंदी की लोकप्रिय पत्रिकाओं पर पाठकों का भारी दबाव रहता था। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका और कादम्बिनी जैसी पत्रिकाओं की पहुंच अधिकांश हिंदीभाषी मध्यवर्गीय घरों में थी। अपनी पहली रचना के प्रकाशन के साथ ही लेखक के रूप में पहचान मिल जाती थी। पहली रचना के साथ ही फोटो और परिचय दिया जाता था और लोग सड़क, बाजार, स्टेशन या सिनेमा हाल में भी लेखक-लेखिकाओं को पहचान लेते थे। – मुझे याद है कि १९७३ में ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के लिए फार्म जमा करवाने मैं आर टी ओ आफिस की एक खिड़की के सामने लगी लंबी लाइन में खड़ा था, जब नंबर आया तो संबंधित कर्मी ने मेरा फार्म देख कर पूछा – क्या आप कथाकार राजेंद्र राव हैं ?  मेरे हां कहने पर उसने साग्रह अंदर बुला लिया, बिठाया, चाय पिलाई और बगैर किसी दिक्कत के लाइसेंस बन गया।
एक बात अच्छी तरह से समझ में आ गई कि अपने प्रेम प्रसंगों की अक्सर डींग हांकने वाले ज्यादातर हिंदी लेखक नारी संसर्ग को तरसते हुए शब्दवीर (लफ्फाज) हैं और निरे कल्पना जगत में टहला करते हैं। हालांकि यह उनकी शक्ति भी है। मैं समझता हूं कि स्थिति आज भी ज्यादा बदली नहीं है। –कहीं नारी गंध सूंघ भर लें तुरंत फौजें मुड़ जाती हैं-उसी ओर।
उन दिनों न तो मोबाइल फोन थे और न फेसबुक जैसे त्वरित संपर्क के माध्यम सो चिट्ठी पत्री का ही बोलबाला था। कोई भी रचना छपते ही पाठकों की प्रतिक्रियाएं डाक से आने लगती थीं। पत्रिकाओं की पहुंच और प्रसार इतना अधिक कि आज की तरह फोन कर कर के मित्रों और परिचितों को बताना और पढ़ कर राय देने का आग्रह नहीं करना पड़ता था। – चूंकि साठोत्तरी कहानी के केंद्र में आम आदमी, उसका संघर्ष और उसकी विडंबनाएं रहती थीं इसलिए लक्ष्य पाठक वर्ग में पढ़ने की रुचि का अभाव नहीं था। उन्हें कहानियों में परिवेश, जीवन स्थितियां और पात्र जाने पहचाने से लगते थे। कई बार तो  ऐसा लगता कि लेखक ने उनकी ही कहानी लिख डाली है।  ऐसे में कथाकारों और पाठकों के बीच तादात्म्य स्थापित होने में देर नहीं लगती थी। अक्सर पहली कहानी से ही सैकड़ों जुड़ाव के इच्छुक पाठक सहज रूप से मिल जाते थे। आमने सामने नहीं, डाक के जरिये, पोस्टकार्ड-अंतर्देशीय पत्र और लिफाफे में बंद चिट्ठी के माध्यम से। लेखक भी सबको आभार प्रगट करते हुए पत्र लिखता था। इनमें से कुछ लेखक के पत्र को पाने के बाद चिट्ठी पत्री के सिलसिले को जारी रखते थे। कहानी के संदर्भ से इतर सूचनाओं का आदान प्रदान होने लगता था और एक विशुद्ध साहित्यिक और भावनात्मक संबंध की नींव पड़ जाती। यूं तो अधिकतर पत्राचार औपचारिक और अल्पकालिक होते लेकिन कुछ संवाद लंबे खिंच जाते थे। महीनों और कभी कभी तो बरस दर बरस इनका सिलसिला चलता रहता। कुछ मामलों में तो दोनों ओर पत्र के आगमन की आतुर प्रतीक्षा रहने लगती थी। दो चार दिन की देरी भी गिले शिकवे का बायस बन जाती। इन दीर्घसूत्री पत्राचारों का कलेवर भी निरंतर विशद होता जाता था। आज उनको पढ़ा जाए तो हंसी आएगी और युवा मानसिकता के अधकचरेपन पर शायद तरस भी लेकिन उन दिनों तो कल्पना के घोड़ों की सवारी का शौक अपने चरम पर था। जी हां, आपका अनुमान सही है- ऐसे हृदय स्पर्शी खतो किताबत अधिकतर पाठिकाओं से होती थी तथा संवाद का बौद्धिक स्तर अक्सर ऊंचा और आच्छादित (कुछ कुछ रहस्यमय सा) हुआ करता था। शुरुआत कहानी की विशेषताओं से होती और फिर साहित्यिक मुद्दों पर तर्क वितर्क का आदान प्रदान, कभी कभी तो घनघोर सैद्धांतिक बहस, सहमतियां और असहमतियां.....इसके बीच धीरे धीरे उभरता एक लगभग अदृष्य सा अपरिभाषित संबंध-सूत्र। साथ में ही अनेकानेक शंकाएं भी क्योंकि एक ओर जहां कृपालु पाठिका ने लेखक का चित्र और परिचय खूब मनोयोग से देखा समझा है वहीं लेखक सिर्फ अंधेरे में तीर चला रहा होता है। चलिए परिचय तो मान लीजिये झूठा-सच्चा जैसा भी लिखा गया हासिल हो जाता लेकिन चित्र तो कम से कम प्रारंभिक दौर में मांगा नहीं जा सकता था। और कोई भी पत्र लेखिका स्वयं अपना नख शिख वर्णन करने से रही तो सिवा अनुमान लगाने के कोई चारा नहीं था। और अनुमान के आधार (मसलन-हैंड राइटिंग, लिखने के कागज का चुनाव, उससे उठती भीनी भीनी खुशबू, स्याही का रंग, लिफाफे का रंग रूप आदि) आज की तारीख में भले ही हास्यास्पद लगें मगर कोई चारा नहीं था।

 ऐसा नहीं कि पत्र मित्रता केवल सुधी पाठिकाओं से ही होती थी। कुछ गंभीर किस्म के पुरुष पाठक भी निरंतर संवाद करते थे। इसके अलावा समकालीन लेखक लेखिकाओं का पत्राचार भी महत्वपूर्ण समझा जाता था। लेखक भले ही कम रहे हों, उनके पास आने वाली डाक बहुत ज्यादा होती थी। यही तत्कालीन सोशल मीडिया था। लोगों के साहित्य से जुड़ाव को इस तरह समझा जा सकता है कि उन दिनों हिंदी समाज के मध्य वर्ग में साहित्यिक रुचि को सम्मानपूर्वक दृष्टि से देखा जाता था। औसतन हिंदी भाषियों की अंग्रेजी चूंकि दयनीय होने की हद तक कमजोर होती थी इसलिये उनकी बौद्धिकता को हिंदी साहित्य की छतरी के तले ही प्रश्रय मिल सकता था। इक्कीसवीं सदी आते आते जैसे जैसे द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास का अंग्रेजी ज्ञान निखरता गया, हिंदी साहित्य से उसका लगाव कम होता गया । अब न तो गुनाहों का देवता के नये नये संस्करण छपते हैं न शेखर एक जीवनी के। अब तो चेतन भगत या अमीष की किताबों पर नेह और पैसा दोनों बरस रहे हैं। अंग्रेजी के एकदम नये लेखकों की ‘चिक लिट’ विशेषण वाली हास्यास्पद किताबें भी बिक्री और लोकप्रियता के प्रतिमान रच रही हैं। पहले इसका ८०% हिंदी की अच्छी किताबों के हिस्से में जाता था।

तो उस स्वर्ण काल में युवा लेखक होने के इस वैशिष्ट्य का अनुभव मुझे भी हुआ। साप्ताहिक हिंदुस्तान और धर्मयुग में धारावाहिक छपी कथा श्रंखलाओं, सारिका-कहानी-नई कहानियां आदि में छपी कहानियों के चलते बड़ी संख्या में पाठकों के पत्र आते थे। अभी भी एक अलमारी में पीले पड़ गये हजारों पत्र फाइलों में अपने उद्धार की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस पत्र विहीन युग में यह अविश्वनीय लगे तो कुछ ताज्जुब नहीं मगर सचाई यही है। इस चर्चा के चलते अनायास ही फाइलों में कैद कुछ पत्र प्रसंग जीवंत हो उठते हैं। पहले यह स्पष्ट करना जरूरी लग रहा है कि पत्राचार में संलिप्त होने से पहले बरती जाने वाली सावधानी का भी जिक्र किया जाए। उन दिनों लेखकों के बीच फर्जी पाठिकाओं के सुलिखित-सुगंधित और सरस पत्रों के किस्से खूब सुने जाते थे। होता यह था कि कुछ शरीर किस्म के युवा लेखक महिलाओं के छद्म नामों से अपनी उर्वर कल्पना शक्ति का भरपूर प्रयोग करते हुए अत्यंत भाव विह्वल और प्रेम-पगे पत्र कुछ वरिष्ठ लेखकों और संदिग्ध संपादकों को लिखा करते थे और उनसे प्राप्त उत्साहजनक उत्तरों का, मजा ले लेकर, सामूहिक पाठ करते थे। ज्यादातर लेखक और संपादक इस पत्र जाल में फंस कर  ऐसी  ऐसी हास्यास्पद चिठ्ठियां लिख बैठते थे कि पूछिये मत। मुझे एक लेखक मित्र ने उस युग के लगभग सभी महारथियों के  ऐसे मूर्खतापूर्ण नमूने दिखाए तो एक बात अच्छी तरह से समझ में आ गई कि अपने प्रेम प्रसंगों की अक्सर डींग हांकने वाले ज्यादातर हिंदी लेखक नारी संसर्ग को तरसते हुए शब्दवीर (लफ्फाज) हैं और निरे कल्पना जगत में टहला करते हैं। हालांकि यह उनकी शक्ति भी है। मैं समझता हूं कि स्थिति आज भी ज्यादा बदली नहीं है। –कहीं नारी गंध सूंघ भर लें तुरंत फौजें मुड़ जाती हैं-उसी ओर। खैर कहने का तात्पर्य यह है कि किसी बिन बुलाई मेहमान से कोई शब्द व्यापार करने से पहले अच्छी तरह तसल्ली करना जरूरी था कि दूसरे सिरे पर सचमुच कोई साहित्य समर्पिता है या कोई चंडूल जाल बिछाए बैठा है।

जो लोग गौर करते रहे हैं वे जानते हैं कि लड़कियों की लिखावट कुछ अलग किस्म की होती है, उनके बात करने के अंदाज की तरह-कुछ तिरछापन, कुछ लटके झटके कुछ महीन किस्म की कलमकारी और अक्षरों के कलात्मक नख-शिख। मुझे इसका अनुभव अपने स्कूल के दिनों से रहा था इसलिये मेरे पास जब भी  ऐसी चिट्ठियां आईं ज्यादा शशोपंज नहीं हुआ। बेखटके खतो किताबत आगे बढ़ती गई। –तो एक थीं संध्या राय(नाम थोड़ा बदला है), वह हमेशा अंतर्देशीय पत्र लिखती थीं। रहती थीं रांची में जो कि उन दिनों बिहार में था। पत्राचार का आरंभ हुआ रामकथा वाचक पं.राम किंकर जी के मेरे द्वारा लिए गए एक बोल्ड साक्षात्कार के कारण जो साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपा था। संध्या राय बचपन से ही फादर कामिल बुल्के के सानिंध्य में रही थीं और उन्हें तुलसी कृत रामचरित मानस से काफी लगाव था। मुझे लगा कि वह कोई साध्वी टाइप हैं मगर फिर एक कहानी छपी और उसकी अनोखी व्याख्या करता हरे रंग का अंतर्देशीय आया तो पता चला कि हिंदी की शोध छात्रा हैं। कहानी में सेक्सुअल ओवरटोन्स या अंडरटोन्स से उन्हें कोई खास परेशानी नहीं है। यह अत्यंत उत्साहवर्धक सूचना थी । जल्दी ही खांटी साहित्यिक संवाद होने लगा, समसामयिक कथा परिदृष्य पर टिप्पणियों के आदान प्रदान में जितनी चतुराई से मैं अवांतर प्रसंग डाल देता था उतनी ही बारीकी से बिटवीन द लाइंस उनका सधा हुआ जवाब आ जाता था। देखते ही देखते उनके पत्रों की फाइल सुदीर्घ नजर आने लगी। एक प्रच्छन्न आत्मीयता हरे रंग के सुलेख में एकदम निराकार होकर समाई हुई थी जो कि गाहे बगाहे इस युवा लेखक के असंतोष का कारण बनती। अति बौद्धिकता की कड़ी धूप में रस तत्व का तत्काल वाष्पीकरण होते देख कभी कभी आत्मिक क्लेश होने लगता मगर संबंध की इस विलक्षण प्रौढ़ता से भला कैसे बचा जा सकता था ? मेरे कंधों पर बचपन से ही भद्रता का बैताल सवार रहा है इसलिए इधर से तो कुछ होना नहीं था सो एक पारम्परिक पहल उनकी तरफ से ही हुई- पहली बार बजाए अंतर्देशीय पत्र के लिफाफा आया, उसमें पत्र के साथ रसीदी टिकट के बराबर श्याम-श्वेत फोटो था जिसमें दो चोटियों वाली एक दुबली पतली लड़की धूप का चश्मा लगाए हुए किसी उद्यान में खड़ी थी। पत्र में लिखा था कि आप भी सोचते होंगे कि यह दिमाग खाने वाली लड़की न जाने कैसी है। अब मैं जैसी हूं आपके सामने हूं। आपका फोटो तो हम लोग पत्रिकाओं में देखा ही करते हैं अब आप भी देख लीजिये। –मैंने बहुत आंख फाड़ फाड़ कर देखा मगर उस रसीदी टिकट में भला क्या और कितना देखा जा सकता था। ताव में आकर लिख भेजा कि अगर फोटो भेजना ही था तो कम से कम  ऐसा भेजतीं कि कुछ दृष्टव्य हो…..। लौटती डाक से एक और लिफाफा तीर की तरह आया जिसमें पोस्टकार्ड साइज का वही चित्र था। –‘ सौरी, गलती से आपको प्रूफ कापी भेज दी। ‘खैर, दिल को बेपनाह तसल्ली हुई। जाने क्यों ?

कुछ ही दिनों बाद दफ्तर के काम से कोलकाता जाने का प्रोग्राम बना । जिस ट्रेन से जाना था वह रांची होकर जाती थी। संध्या से मिलने का अच्छा मौका हो सकता था मगर दिक्कत यह हुई कि गाड़ी रात को दो बजे रांची स्टेशन पर पहुंचती थी। इतनी रात गए महज दस मिनट की मुलाकात के लिए किसी को (वह भी एक लड़की को) स्टेशन बुलाने का ख्याल ही बेतुका था। हां, एक तरीका यह हो सकता था कि जर्नी ब्रेक करके एक दिन वहां रुका जाता और संध्या ही नहीं फादर कामिल बुल्के से भी भेंट की जाती। गहराई से सोचने पर लगा कि यह भी एक तरह से ज्यादती होगी कि महज एक छोटे से पत्र संबंध के आधार पर मान न मान मैं तेरा मेहमान बन कर लद लिया जाए। इसलिए बगैर किसी संभावना का उल्लेख किये यात्रा की सूचना मात्र दे दी। उधर से जवाब आया कि वे लोग (? ) स्टेशन पर मिलने आएंगे। उनका घर स्टेशन के पास ही है।

जाड़े के दिन थे। उन दिनों ए.सी. डिब्बों का चलन शुरू ही हुआ था। मैं फर्स्ट क्लास में कंबल ओढ़े जागता और करवटें बदलता रहा। अन्य सहयात्री सो रहे थे, बत्ती बुझा कर इसलिए पढ़ते रहने की सुविधा भी नहीं थी। खैर, किसी तरह रात के दो बजे और गाड़ी सही समय पर रांची स्टेशन पहुंच गई। मैं उतर कर इधर उधर देखने लगा लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सही बात तो यह थी कि जो धूप का चश्मा लगाए हुए (उसकी एकमात्र फोटो से) उसकी छबि मस्तिष्क पटल पर गड्ड मड्ड हो रही थी उसके आधार पर पहचानना मुश्किल था। जेब में हाथ डाले डिब्बे के सामने खड़ा रहा, समय बीता जा रहा था और स्टापेज कुल दस मिनट था। सोचता रहा कि इस बेढ़ब समय पर किसी को मिलने बुलाना निरी मूर्खता नहीं तो और क्या है! कुछ निराशा भी हुई कि पत्र रोमांस भी कैसा रेत का घरौंदा है, एक ही आघात से ढ़ह जाएगा। उन दिनों सार्वजनिक स्थानों पर यहां तक कि ट्रेन में भी धूम्रपान न तो गैरकानूनी था न ही आपत्तिजनक। जेब से सिगरेट का पैकेट निकाला ही था कि दाईं ओर से आवाज आई-“ वो रहे राजेन्द्र जी !”कहते हुए एक लंबी और कृषकाय चश्मेवाली सांवली लड़की एक गोरे चिट्टे-गोल मटोल छोटे लड़के के साथ हांफती हुई आ खड़ी हुई। बहुत खुश होते हुए उसने कहा-“सौरी राजेन्द्र जी! आपको वेट करना पड़ा। इतने समय आटो नहीं मिला तो हम लोग पैदल ही चले आए। ये है मेरा छोटा भाई, पलाश। ..। ”पलाश ने बहुत सम्मान प्रदर्शित करते हुए नमस्ते किया। –“चलिये एक कप चाय पीते हैं। वो सामने स्टाल देख रहे हैं न, चाय के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सत्यजित राय जब यहां शूटिंग के लिए आए थे तो इसी स्टाल पल चाय पीते थे। “मैं उनके साथ चल पड़ा। सिगरेट का पैकेट वापिस जेब में रख लिया। पलाश के हाथ में एक बैग था। संध्या ने उसमें से एक प्लास्टिक का टिफिन बाक्स निकाल कर खोला और मेरी ओर बढ़ाया, “लीजिए यह केक हम लोगों ने खास तौर पर आपके लिए बनाया है। मैं चाहती थी कि आपको इस टी स्टाल की चाय के साथ यह आफर करूं। खाकर बताइये तो कैसा बना है ?”केक वाकई बहुत अच्छा और ताजा था। मैंने तारीफ में कुछ जुमले कहे मगर जमे नहीं। खाना और बोलना एक साथ हो नहीं पाता। वह बराबर, अपने चश्मे के पीछे से, मेरा मुंह देखे जा रही थी। अचानक मुझे घबराहट और उलझन होने लगी। इससे पहले किसी शायद ही किसी ने मुझे इस तरह घूरा हो। और यह भी अच्छी तरह पता था कि आंखों में बसा लेने लायक चेहरा तो वह नहीं ही था। तो फिर यह क्या हो रहा है ? मैंने बमुश्किल उससे नजरें चुराईं और ट्रेन के पिछले हिस्से की ओर देखने लगा। कि गार्ड हरी झंडी दिखाए और जान छूटे । ……..मेरे बार बार घड़ी देखने को लेकर उसने मुस्कुराते हुए कहा, आप बिल्कुल चिंता न करें, आज ट्रेन देर तक रुकेगी। उधर से राजधानी आ रही है, उसके विदा होने के बाद ही जाएगी यहां से। हम लोग पूछ कर आए हैं। “चाय आई तो अनुभव हुआ कि उसने यूं ही तारीफ नहीं की थी, उम्दा फ्लेवर वाली चाय थी। बहुत ही साफ सुथरा और सज्जित स्टाल था। संध्या लगातार बोलती जा रही थी, अपने बारे में, अपने परिवार के बारे में, फादर कामिल बुल्के के बारे में। वह एक कालेज में हिंदी पढ़ाती थी। वे लोग पंजाबी थे मगर पार्टीशन के बाद यहां आ बसे थे। यहां पर खानदानी व्यवसाय था और अच्छा चल रहा था। संध्या ने बताया कि उसका और कुछ लेखकों से भी पत्र व्यवहार चल रहा था मगर मुलाकात पहले पहल मुझसे ही हुई थी।

चाय पीकर हम फिर डिब्बे तक आए। मैं उसे अपना कहानी संग्रह भेंट करना चाहता था। किताब लेकर उसने कहा, ”इस पर मेरे लिए कुछ लिख दीजिये ना। पहली बार कोई लेखक मुझे अपनी कृति दे रहा है। मेरे लिए यह एक स्मरणीय क्षण है। मैं लिखने से पहले सोच में पड़ गया कि संबोधन में किस हद तक आत्मीयता जताई जा सकती है। कुछ भी तो स्पष्ट नहीं था। मैंने लिखा- ‘संध्या जी के लिए, शुभकामनाओं सहित’। उसने खुशी खुशी किताब हाथ में लेकर पढ़ा और एक क्षण के लिए चेहरा फीका पड़ गया। उसने धीरे से कहा, ”आप कुछ ज्यादा ही फार्मल हो गए !”मुझे बात समझ में आ गई लेकिन तीर छूट चुका था। उसने गंभीर होकर कहा, ”आप बड़े कथाकार हैं। मेरे जैसी जाने कितनी प्रशंसिकाएं मिलती होंगी आपको। हो सके तो रिटर्न जर्नी में एक दिन ब्रेक करके रांची में रुकिये। यहां बहुत कुछ है देखने को…फादर तो खैर हैं ही। मैं उनके पास आपको ले चलूंगी। …मेरे घर के लोगों से भी मिलियेगा। वे बहुत उत्सुक हैं आपसे मिलने के लिए। आपका पत्र आता है तो मम्मी हमेशा आपका हालचाल पूछती हैं। पापा ने भी आपकी कहानियां पढ़ी हैं। …….”वह कहते कहते अचानक रुक गई । चश्मे के लेंस के पार उसकी बड़ी बड़ी आंखें कुछ आगे की बात कहतीं कि ट्रेन ने बहुत तीखी सीटी बजाई जैसे बहुत खफ़ा हो, इस तरह रोक रखे जाने पर। प्लेटफार्म पर आराम से टहल रहे लोगों में खलबली मची। कुछ लोग तो लपक कर सवार हो गए। मेरी बैचेनी भांप कर संध्या ने हंसते हुए कहा –‘अभी यह जा नहीं पाएगी। राजधानी निकलने के बाद ही इसका नंबर लगेगा। अभी कुछ देर और हम लोगों को झेलिये लेखक महोदय !’मैंने चौंक कर उसके चेहरे पर यह पढ़ने की कोशिश की कि यह शिकायत है या शरारत। उसने आगे कहा-‘सच बताइये आपने जैसी स्मार्ट और सुंदर लड़की की कल्पना की होगी मैं वैसी नहीं निकली ना? ....मुझे देख कर आप निराश हुए हैं ना? ’और फिर से हंसना शुरू कर दिया। मेरी हालत  ऐसी कि जैसे कोई चोर पकड़ा गया हो। यह आक्रामकता एकदम अप्रत्याशित थी। अनपेक्षित भी। मैं शायद निराश दिख भी रहा होऊं। तुरंत बचाव की मुद्रा में आकर कहा-‘आप यह क्या कह रही हैं। मुझे तो यह सब चेखोव की कहानी की तरह अत्यंत रूमानी और रहस्यमय सा लग रहा है। विश्वास नहीं हो रहा कि यह स्वप्न है या वास्तविकता। ‘मैंने भले ही यह त्वरित डायलाग अपनी सफाई में गढा़ हो मगर वह खिल उठी-‘जो भी हो मगर मुझे तो आप बिल्कुल वैसे ही लगे जैसा मैंने सोचा था। बस बोलने में जरा संकोची हैं। …सुनिये हम लोग जब आ रहे थे तो आप सिगरेट सुलगाने जा रहे थे फिर जेब में रख लिये, अब जला लीजिये ना। मुझे सिगरेट की भीनी भीनी गंध बहुत भाती है। मेरे पापा पीते हैं तो मैं चुपके से उनके पास पहुंच कर पैसिव स्मोकिंग करने लगती हूं। मुझे गहरी सांस लेते हुए देख कर बहुत डांट पड़ती है। ‘मैंने सिगरेट का पैकेट निकाला और आज्ञा का पालन करते हुए एक गहरा कश लिया। उसने सचमुच गहरी सांस भरना शुरू कर दिया और मदहोश होने का अभिनय करने लगी। मैं याद करने की कोशिश करने लगा कि यह प्रसंग किस उपन्यास या कहानी में पढ़ा था। उसने भी पढ़ा होगा, शायद यह कोई गूढ़ संकेत हो । मेरी स्मॄति ने साथ नहीं दिया मगर यह जाहिर हो गया कि वह एक स्प्रिंग की तरह खुलती जा रही थी। मामला उतना सीधा साधा नहीं था जितना मैं समज रहा था। यह एहसास होते ही मेरी दिलचस्पी का स्तर यकायक ऊंचा उठ गया।
मेरे चेहरे पर किसी सूक्ष्म भाव को मुग्धता मान कर उसने इतराते हुए कहा- ‘आपकी सिगरेट के धुएं में कितना नशा है!....तभी न आप  ऐसी कहानियां लिख पाते हैं। ‘ यह प्रहसन कुछ और आगे बढ़ता कि राजधानी एक्सप्रेस आ धमकी और दृश्यभंग हो गया। संध्या ने गंभीर होकर कहा-‘आप मानेंगे कि आपके आने से पहले कितना कुछ सोचा था कि आप मिलेंगे तो ये कहूंगी, वो कहूंगी…जाने क्या क्या सोच लिया था। इतना कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते । ….बाबा रे!राजेंद्र जी सच बताऊं लड़कियां जो हैं एकदम पागल होती हैं। और देखिये न, सामने आए तो सब भूल गयी। ….अच्छा आप बताइये कि आपने जो बोलने के लिये सोचा था सब बोल दिया या कुछ बचा कर लिये जा रहे हैं? अरे राम, मैं भी कितनी पागल हूं…आप तो कुछ बोले ही नहीं। ‘और वह मुंह पर हाथ रख कर चुप हो गई। –अब होना तो यह चाहिये था कि इस दुर्लभ मुग्धाभाव में निहित राग तत्व की परख की जाती मगर लेखकों के साथ यही दिक्कत है- उनमें एक कृत्रिम वार्धक्य युवावस्था में ही जड़ जमा लेता है। मुझे उसके लटके झटके बाल सुलभ और हास्यास्पद लगे जबकि मैं उन दिनों मुश्किल बत्तीस-तैंतीस का रहा होऊंगा। अटपटे वचन सुन कर बेवजह एक किस्म का अभिभावक भाव मेरे में जाग उठा और मैं उससे कैरियर और शोधकार्य जैसे कतई अप्रासंगिक विषयों पर बात करके अपना और उसका समय नष्ट करता रहा। हालांकि मुझे इस बात का पूरा पूरा एहसास था कि  ऐसा करके मैं एक अत्यंत सात्विक किस्म के रूमानी और संभावनाशील क्षण की निर्मम हत्या करने का पोंगापन कर रहा हूं। ….लेकिन मित्रों  ऐसा होता है, हो जाता है। और कोई लेखक एक बार अपने हाई होर्स पर सवार हो जाए तो उसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं होता। मैं उसे पैरेंट ईगो में समझाता रहा कि कल्पना और यथार्थ में चलने वाला अनवरत द्वंद्व लेखक के मन और मस्तिष्क को कैसे मथता रहता है। …सहसा राजधानी एक्सप्रेस छूट गई तो मेरे प्रवचन पर ब्रेक लगा। संध्या सकपका सी गई थी। मेरे चुप होते ही वह मुझे घूर कर देखने लगी। इस बार मुझे जरा भी अटपटा नहीं लगा क्योंकि मैं समझ गया था कि मुझे देखते हुए भी नहीं देख रही है और अपने ख्यालों की दुनिया में खोई हुई है। मुझे तीव्रता से यह अनुभूति हुई कि अब मेरी गाड़ी छूटने की बारी है। किसी भी क्षण सीटी बजा कर या चीख कर ट्रेन हमेशा हमेशा के लिये चल देने वाली थी। ….उसने अपने भाई के हाथ से बैग लिया और एक कापी निकाल कर मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ” मैंने भी एक कहानी लिखी है। आप पढ़ कर बताइयेगा कि कैसी बन पड़ी है और इसे कहां भेजा जा सकता है। काट छांट की जरूरत समझें तो निस्संकोच कर दें। हां इसका अंत मत बदलवाइयेगा। …मैं वैसा ही चाहती हूं। “

राजेन्द्र-राव-साहित्‍य-संपादक-दैनिक-जागरण-पुनर्नवा-rajendra_rao_kanpur_dainik_jagran_hindi-writer-kahani-shabdankan

राजेन्द्र राव

साहित्‍य संपादक
दैनिक जागरण पुनर्नवा

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तभी गाड़ी ने सीटी दी। उसने केक वाला डिब्बा मुझे पकड़ा दिया-“सुबह आपके नाश्ते के लिये। ..और देखिये अगर लौटते में यहां रुकने का मन बन जाए तो फोन कर दीजियेगा। उस कापी में फोन नंबर लिखा है। और…..”वह बोलते बोलते अटक गई, जैसे गला रुंध आया हो। मेरे पीछे से गाड़ी चल दी, मैं पलट कर अपने डिब्बे में जा चढ़ा। दरवाजे पर खड़ा होकर संध्या और पलाश को हाथ हिलाते हुए देखता रहा….जब तक वे ओझल नहीं हो गए।

मेरा मानना है कि पाठक भी कम कल्पनाशील नहीं होते। वे जान जाएंगे कि लौटते समय वहां कोई पड़ाव बनता था कि नहीं। और संध्या की उस कहानी का कथ्य क्या था, यह भी आसानी से समझ लेंगे। – ऐसे कुछ यादगार किस्से और भी हैं जिनमें लेखकों का मुलम्मा उतरता है और जो एंटी क्लाइमेक्स में जाकर विश्राम पाते हैं। फिर कभी……..।



 
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