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गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

खुशियों की होम डिलिवरी - ममता कालिया (लम्बी कहानी भाग - 1) | Hindi Kahani by Mamta Kalia (Part 1)

Mamta Kalia's Hindi Kahani "Khushiyon ki Home Delivery" Part - I 

"खुशियों की होम डिलिवरी" भाग - 1 : ममता कालिया  


प्राक्कथन

कुछ समय पहले विदेश की एक लोकप्रिय पाककला विशेषज्ञ नाइजैला लॉसन और उसके पति साची के झगड़े की चर्चा सरेआम हुई थी। उसमें साची ने नाइजैला की गर्दन पकड़ ली। दोनों मशहूर हस्तियाँ थीं। मीडिया ने दृश्य कैमरे में कैद कर लिया और ख़बरों में खुलासा किया। मेरे मन-मस्तिष्क पर इस ख़बर का चकरघिन्नी असर हुआ। उठते-बैठते मुझे साची की उँगलियाँ नाइजैला के गले पर धँसती दिखाई देतीं। ऊपर से साची की हिमाकत यह कि वह अपनी सफाई में कहता रहा, ‘‘मैंने गर्दन पकड़ी थी लेकिन दबाई नहीं, यह देखो वह रो भी नहीं रही है।’’ मुझे धूमिल की पंक्तियों का ध्यान आया,

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है

नाइजैला-जैसी चपल, चंचल, वाक्चतुर महिला की इस घटना पर प्रतिक्रिया खुलकर उस वक्त सामने नहीं आई, किंतु अगले दिन उसने घर में अपना सामान समेटना शुरू कर दिया। शाम होते न होते वह अपने पुराने घर चली गई। उसके लाखों चाहनेवालों को संतोष हुआ कि उसने अपने स्वाभिमान के साथ समझौता नहीं किया।

यह तो एक उदाहरण है। महिलाओं के साथ दिनभर में जाने कितनी ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं जिन पर, यदि वे गंभीरता से सोचें तो भारतीय परिवारों की चिंदियाँ उड़ जाएँ। यह कहना कि स्त्री स्वभाव से सहनशील होती है, सहनशीलता का उपहास उड़ाना है क्योंकि दिन पर दिन इसका घेरा चुनौतीपरक होता जा रहा है।

दरअसल घटनाएँ, ख़बरें और जानकारियाँ मेरे ऊपर विद्युत् प्रभाव छोड़ती हैं। उन लमहों में, यह अच्छा होता है कि काग़ज़ और क़लम मेरे आसपास नहीं होते। लिखूँ तो काग़ज़ में सुराख़ हो जाए और नहीं लिखती तो चेतना में तडफ़ड़ और तिलमिलाहट। ‘खुशियों की होम डिलिवरी’ में इसका कुछ प्रतिशत ही आ पाया क्योंकि पात्र अपना विकास अपने आप कर लेते हैं, ट्रैफिक की तरह उनका रास्ता बार-बार मोड़ा नहीं जा सकता। रचना के साथ सबसे अजूबी चीज़ यही है। कभी तो लिखना इतना सरल लगता है कि मलाई की तरह क़लम से आखर अनंत निकले चले आएँ और कभी इतना कठिन कि काग़ज़ मुझे घूर रहा है, मैं काग़ज़ को घूर रही हूँ; चाय, कॉफी, वोदका किसी से भी क़लम का ताला नहीं टूट रहा। ऐसे दिनों को मैं अमावस की रैन मानती हूँ।



खुशियों की होम डिलिवरी - 1

ममता कालिया


मौजूदा वक्त में वह देश की मशहूर पाककला और व्यंजन विशेषज्ञ मानी जाती थी। उसके नाम से व्यंजन पुस्तकों की एक पूरी शृंखला पाँच भाषाओं में अनुवाद होकर छपती। उसका नाम ‘रुचि’  जोड़कर पुस्तकों के शीर्षक इस प्रकार थे—रुचि की रसोई, रुचि के रसीले व्यंजन, रुचि के नाश्ते, रुचिर पकवान और रुचि-रसना। दो टीवी चैनल पर उसका साप्ताहिक कार्यक्रम आता, ‘सुरुचि’ और ‘स्वाद’। दोनों कार्यक्रमों में रुचि को अत्याधुनिक रसोई में व्यंजन बनाते हुए दर्शाया जाता।

रुचि का बोलने का ढंग बहुत प्रभावशाली था। पहले शब्द ‘नमस्कार’ के साथ ही वह अपनी उत्फुल्ल मुद्रा से दर्शक को अपने आकर्षण में बाँध लेती। आधे घंटे के कार्यक्रम में रुचि दो व्यंजन प्रस्तुत करती। कमाल यह था कि पिछले डेढ़ साल में एक बार भी न उसने व्यंजन में दुहराव डाला, न प्रस्तुतीकरण में। कार्यक्रम शुरू होने के पूर्व एक सहायक, समस्त सामग्री क़रीने से गैस के पास रख देता। इस माहौल में व्यंजन बनाने में रुचि को आनंद आता, क्योंकि बनाने से पूर्व की तैयारी हमेशा उसे की हुई मिलती। हर बार गैस का चूल्हा चमचमाता हुआ दिखता, जैसे अभी शो-रूम से ख़रीदकर लाया गया हो! दोनों ही टीवी चैनलों में होड़ लगी रहती, किसका रसोईघर ज़्यादा सुंदर और आधुनिक लगे। ‘क’ चैनल में उसके सहायक का नाम कुर्बान अली था। रुचि को उसका नाम लंबा लगा तो उसने कहा, ‘‘कुर्बान अली, प्रोग्राम में आपको सिर्फ अली कहकर बुलाऊँ तो आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’’

‘‘क़तई नहीं मैम, जैसा आप चाहें।’’

‘म’ चैनल में उसका सहायक वीरेंद्र सिंह था। वीरेंद्र ने जयपुर के रेस्तराँ में सहायक के रूप में कुछ तजुर्बा हासिल किया था। रुचि को लंबे नामों से चिढ़ थी। उसने वीरेंद्र सिंह को वीर पुकारना शुरू कर दिया। दोनों सहायक समझदार थे और अपने काम में चुस्त। कार्यक्रम की आरंभिक तैयारी और परवर्ती समापन वे कुशलतापूर्वक सँभालते। उन्हें पता रहता कि सफेद नमक के पहलू में लाल मिर्च और फिर हल्दी रखी कितना अच्छा दृश्य  देगी या कौन-सी मिक्सी इतनी पारदर्शी है कि उसमें पीसा गया धनिया और मिर्च का पेस्ट कलात्मक दिखे। रसोईघर की दीवार पर टँगे करछुल, पौनी और कद्दूकस कभी काम न आते। व्यंजन की तैयारी में पारदर्शी शीशे के बर्तन इस्तेमाल होते और पकाने में चमचमाते हुए कैसरोल। ये अत्याधुनिक शैली के रसोईघर रुचि की अपनी उठवाँ रसोई से एकदम अलग और अद्भुत थे। रुचि के अपने वन बी.एच.के. फ्लैट में रसोई के नाम पर एक 3&3 स्क्वेयर फीट की जगह थी, जिसमें एक प्लैटफॉर्म और सिंक के सिवा और कोई उपकरण नहीं था। मकान मालिक से जब उसने पूछा था कि इतने छोटे रसोईघर में खाना कैसे बनेगा, न यहाँ चिमनी है न खिड़की; अँधेरा इतना कि बिना बिजली जलाए आप एक चम्मच भी नहीं उठा सकते। मकान मालिक शमशेर सिंह ने हैरानी से उसे देखकर कहा था, ‘‘क्या आप घर में खाना पकाएँगी?’’ उसके साथ आई सहेली जिज्ञासा ने कहा, ‘‘और खाना कहाँ बनाएँगे, क्या सड़क पर?’’

शमशेर ने उसके तंज का कोई जवाब न देकर कहा था, ‘‘हमारे सारे किराएदार केटरिंग सर्विस से खाना मँगाते हैं। खुद हमारी मिसेज़ ने आज तक खाना नहीं पकाया। आप एक माइक्रोवेव ओवन रख लीजिए और दो-चार ओवनप्रूफ़ बर्तन।’’

रुचि को हल्की-सी तसल्ली भी हुई थी कि जीने का यह बड़ा आसान तरीका होगा। फिर हफ्ते में दो-दो दिन दोनों चैनलों पर पाककला के नमूने प्रस्तुत करने के बाद उसके अंदर इतनी ऊर्जा ही नहीं बचती थी कि वह अपने खाने के बारे में सोचे।

जिज्ञासा ने सुझाया, ‘‘आजकल तो खाना बनाना बड़ा आसान हो गया है। तू ढेर-से तैयार व्यंजनों के पैकेट ख़रीद लेना और एकदम शाही अंदाज़ में दावत खाना। हमें भी बुला लिया करना। मैं किसी को बताऊँगी नहीं कि राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यंजन रानी रुचि कैसे रहती है।’’ रुचि चाहती तो बड़ा मकान ले सकती थी लेकिन इस इमारत का रख-रखाव उसे पसंद आया। एक तो दोनों चैनलों के स्टूडियो यहाँ से क़रीब थे, दूसरे ओशिवरा स्थित यह ‘विक्टोरिया चेंबर्स’ मशहूर बिल्डर सनटॉप वालों के थे, जिनकी सुरक्षा-व्यवस्था के बारे में कहा जाता था कि यहाँ ताले-चाबी का क्या काम! फाटक पर कड़ा सुरक्षा प्रबंध था। हर फ्लैट फाटक के इंटरकॉम से जुड़ा हुआ था।

रुचि के अनेक प्रशंसक और प्रशंसिकाएँ थीं। वे उसे सराहना के ख़त लिखते, फोन करते और ईमेल भी। टीवी चैनल के माध्यम से भी पत्र आते। कभी किसी दिलचस्प ख़त का जवाब कार्यक्रम के दौरान दिया जाता। इससे कार्यक्रम की टी आर पी बढ़ जाती। महीने में एक दिन, सबसे दिलचस्प ख़त लिखनेवाले दर्शक को कार्यक्रम में आमंत्रित किया जाता। उससे उसी की पसंद का व्यंजन बनवाया जाता। ज़्यादातर ऐसी आगंतुक महिलाएँ या लड़कियाँ होतीं। कभी-कभी ऐसा पुरुष प्रशंसक भी आ पहुँचता जो खाने या खिलाने का शौकीन होता। ऐसे ही एक आमंत्रित आयोजन में सर्वेश नारंग को बुलाया गया था।

नहीं, सर्वेश नारंग, ‘सुरुचि’ कार्यक्रम का प्रशंसक नहीं था। उसने चैनल को लिखे अपने पत्र में रुचि के व्यंजन को चुनौती दी थी। रुचि के लिए यह पहला मौका था कि किसी ने उसकी पाककला पर प्रश्नचिह्न लगाया। कार्यक्रम निर्देशक ने निर्णय लिया कि ऐसे दर्शक को कार्यक्रम में बुलाकर शांत अवश्य किया जाए, नहीं तो वह नकारात्मक वातावरण बनाता रहेगा। के. के. जोशी बोले, ‘‘किसी के मुँह पर तो टेप नहीं लगाया जा सकता, उसे जो बोलना है, हमारे कार्यक्रम में बोले, जगह जगह विषवमन न करे।’’

रुचि ने याद किया, पिछले हफ्ते उसने ‘दलिया भरी आलू टिक्की’ व्यंजन की विधि प्रस्तुत की थी। व्यंजन इस प्रकार था :

उबले आलू 4
जीरा 1/2
दलिया 25 ग्राम
चाट मसाला 1/4
ब्राउन ब्रेड 2 स्लाइस
हरी मिर्च 1
नमक स्वादानुसार
हरा धनिया थोड़ा-सा
थोड़ी-सी सूजी
रिफाइंड तेल
लाल मिर्च 1/2 चम्मच

कार्यक्रम के पूर्व रुचि ने यह व्यंजन बनाने की रिहर्सल भी की थी। विधि संतोषजनक पाने पर ही वह दर्शकों के सामने पहुँची थी। सर्वेश नारंग की शिकायत थी कि यह टिक्की इतनी गरिष्ठ थी कि सामान्य अमाशय का आदमी इसे पचा नहीं सकता। उसने घर पर यह टिक्की बनाई। उसकी माँ ने यह व्यंजन खाकर रातभर करवटें बदलीं। उन्हें वायु और बदहज़मी का दौरा पड़ गया।

सर्वेश नारंग ने बेहद गुस्से में पत्र लिखा, ‘‘अव्वल तो आपके कार्यक्रम में यह बताना चाहिए कि किस व्यंजन को कितने साल का आदमी खा सकता है। मधुमेह, रक्तचाप और बदहज़मी वालों के लिए अलग से निर्देश होने चाहिएँ। आपकी विशेषज्ञा आधे घंटे में मुश्किल से मुश्किल व्यंजन बनाकर, पर्स लटकाकर चली जाती हैं। यह दर्शकों के प्रति सरासर अन्याय है।’’ मीटिंग में रुचि भी मौजूद थी। उसने कहा, ‘‘उन्हें उत्तर दे दीजिए, हम कोई हेल्थ फूड प्रोग्राम नहीं करते। यह शुद्ध रूप से स्वस्थ, नॉर्मल, खाने-पीने के शौकीन लोगों के लिए कार्यक्रम है।’’

निर्देशक के.के. जोशी ने सिर हिलाया, ‘‘नो मिस रुचि, हम कोई लफड़ा नहीं माँगते! आप उसको अपनी बात से कायल करो, तभी जमेगा।’’

रुचि को चुनौती मिल गई। उसने कमर कस ली। रातभर उसने विचार किया। वह मान गई कि सर्वेश नारंग को उसके कार्यक्रम में अतिथि की हैसियत से बुलाया जाए।

रुचि अकसर पाश्चात्य पहनावे में स्क्रीन पर आती। उस दिन उसने पारंपरिक साड़ी-ब्लाउज़ पहना और माथे पर बड़ी-सी बिंदी लगाई। स्टूडियो के मेकअप रूम में लगे आईने ने उसे बताया कि वह खूब फ़ब रही थी। कार्यक्रम से बीस मिनट पहले सर्वेश नारंग अपनी सफेद कार में प्रकट हुआ। वह कोई युवा तुर्क नहीं, बल्कि तक़रीबन पचास साल का प्रौढ़ व्यक्ति था। अपने पत्र के तेवर से अलग वह नपा-तुला बोलनेवाला आदमी लगा।

पूर्व योजना के अंतर्गत निर्धारित वाक्य बोलते हुए रुचि ने बताया, कैसे ‘सुरुचि’ कार्यक्रम महिलाओं के साथ-साथ पुरुषों और बच्चों का भी पसंदीदा है। उसने सर्वेश नारंग का परिचय देते हुए कहा कि सर्वेश हमारे व्यंजन में अपनी ओर से परिवर्तित विधि प्रस्तुत करने जा रहे हैं।

सर्वेश ने कार्यक्रम के प्रस्तुतीकरण में काफी आत्मविश्वास का परिचय दिया। उसने तयशुदा आलेख से हटकर कहा, ‘‘आलू की टिक्की हम सबका मनपसंद नाश्ता है। इसलिए यह ज़रूरी है कि इसे ऐसे बनाया जाय जिससे वह हल्का और सुपाच्य हो और हर उम्र के खाने वाले को हज़म हो जाय।’’

‘‘रुचि मैम की व्यंजनविधि में मेरी तरफ़ से यह बदलाव पेश है।’’ सर्वेश ने आलू की पिट्ठी उठाकर उसे गोल टिक्की का आकार दिया और दर्शकों को संबोधित किया, ‘‘इसमें दलिये की जगह आप उबली हुई मूँग दाल और हरा धनिया भर सकती हैं। दूसरा सुझाव है इसमें बारीक कटा प्याज़ भर सकती हैं। तीसरा तरीका है कि आप इसमें कॉर्नफ्लेक्स भर सकती हैं। इसे तलने की बजाय छिछले तवे पर एक चम्मच तेल में सेंक सकती हैं।’’ सर्वेश ने बड़े सुथरेपन से समस्त विधि का डैमो दिया।

कार्यक्रम ख़त्म होने के बाद जैसा रिवाज था, पूरी इकाई ने व्यंजन चखा। इसमें शक नहीं कि आलू की यह नई टिक्की स्वादिष्ट और हल्की थी। इस सिलसिले में रुचि को थोड़ी-सी तकलीफ़ हुई, पर ज़्यादा नहीं। उसे पता था कि ‘क’ चैनल के पास उसका विकल्प नहीं था। कई अख़बार और पत्र-पत्रिकाएँ उससे व्यंजन स्तंभ लिखवातीं और सचित्र छापतीं। उसकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी थीं। दर्शकों और पाठकों के बीच वह घर-घर में रचा-बसा नाम हो गई थी। उसके कितने ही व्यंजन इतने लोकप्रिय थे कि चैनल उन्हें बार-बार दिखाता।

उस दिन सर्वेश और रुचि के बीच विजि़टिंग कार्ड का आदान-प्रदान महज़ औपचारिकता रही। दोनों में से किसी को भी परस्पर कोई अदम्य आकर्षण अनुभव नहीं हुआ। वैसे सर्वेश उसका कार्यक्रम दोनों चैनलों पर देखता रहा। उसे यही लगता कि रुचि की व्यंजन विधियों से ज़्यादा जानदार उसकी प्रस्तुति-विधि है। उसकी मुस्कान और हँसी में जीवंतता थी, आवाज़ में माधुर्य। वह जिस अदा से कड़ाही में करछुल चलाती, माइक्रोवेव ओवन खोलकर उसमें व्यंजन की ट्रे लगाती या जैसे वह प्लेट में खाना सजाती, उसके आगे व्यंजन का स्वाद क्या चीज़ था!

आठ हफ्ते बाद यकायक ‘स्वाद’ कार्यक्रम के लिए उसे बुलावा मिला। ‘म’ चैनल के इस कार्यक्रम में सर्वेश नारंग को ‘मेहमान का पकवान’ प्रस्तुत करना था। उसे लगा, इस बुलावे में रुचि शर्मा का हाथ हो सकता है।

सर्वेश नारंग खाना बनाने और खाने को गैरज़रूरी कामों की फेहरिस्त में रखता था। उसे लगता जो काम दूसरे लोग हमसे ज़्यादा सुघड़ तरीके से कर सकें, उसमें अपनी ऊर्जा लगाना फ़िज़ूल है। इतने अच्छे रेस्तराँ और टेकहोम सर्विसों के रहते खाना बनाना समय की बरबादी है। लेकिन उसका खोजी मन रुचि शर्मा को उतना गैऱज़रूरी मानने को तैयार नहीं था। इन दिनों माँ उसके पास आई हुई थीं। उन्होंने भी कहा, ‘‘पुत्तर जा के देख तो सही, वो कुड़ी पु_े-सीधे की पकवान सिखांदी है! तू टीवी पर दिसेगा तो मैनूँ बौत चंगा लगेगा!’’

अगस्त का महीना था, सावन का मौसम। सर्वेश ने कहा, ‘‘रिमझिम फुहारों में आप कुछ मीठा, कुछ नमकीन खाना चाहते हैं तो आज मैं आपको पुए और पकौड़े बनाने की विधि बताता हूँ। पुए को कई शहरों में गुलगुले भी कहा जाता है। अंग्रेज़ी में इसे डोनट कहते हैं। इसे बनाने का तरीका बहुत आसान है।’’

सर्वेश नारंग की सक्रियता और दक्षता दर्शनीय थी। उसने बिलकुल पेशेवर अंदाज़ में कहा, ‘‘थोड़ी-सी सूजी, पिसी हुई चीनी, छोटी इलायची और सौंफ़ आधे दूध, आधे पानी के साथ घोल लें। दस मिनट घोल को ढककर रखें। तब तक हम कड़ाही चढ़ाते हैं।

लीजिए हो गए दस मिनट। एक बार फिर घोल को फेंट लीजिए। कड़ाही में रिफाइंड तेल गर्म करें। गोल चम्मच से गर्म तेल में पुआ छोड़ें। फूलते ही, आँच धीमी करें। एक-एक पुए को अलग-अलग उलटें-पलटें। लीजिए, पुए तैयार हैं।’’

सहायक वीरेंद्र सिंह ने प्लेट आगे रखी, किंतु लीक से हटकर सर्वेश ने पुओं को एक छोटी ट्रे में रखा और कहा, ‘‘चखकर देखिए मैडम!’’

बिना वक्त गँवाएँ सर्वेश ने अगला आइटम पेश किया, ‘‘पकौड़े आप सब खाते-खिलाते होंगे। आपने गौर किया होगा कि हर घर के पकौड़ों का स्वाद कुछ अलग, कुछ खास होता है। अकसर लोग अपना टे्रड सीक्रेट बताते नहीं हैं।

लीजिए, पकौड़ों की विधि ये है :

एक — फूलगोभी जिसके फूल अलग किए हुए हों।
दो — बेसन
तीन — नमक, अजवायन स्वादानुसार
चार — हरी मिर्च-2
पाँच — अनारदाना पिसा हुआ—एक चम्मच
छह — चुटकी भर खाने का सोडा।’’

सर्वेश धड़ल्ले-से बोल रहा था। उसका आत्मविश्वास देखकर लग रहा था वह पेशेवर रसोइया है। कार्यक्रम रोचक रहा, प्रस्तुति भी जानदार थी। आधे घंटे की समय-सीमा में उसने दो व्यंजन बनाकर दिखा दिए। निर्देशक के.के. जोशी ने प्रोग्राम के बाद सर्वेश से पूछा भी, ‘‘क्या आप भी किसी होटल वगैरह से जुड़े हुए हैं?’’

‘‘नहीं,’’ सर्वेश हँसा, ‘‘मैं तो खोजी पत्रकार हूँ, सारा दिन ख़बर सूँघता हूँ, रात को रिपोर्ट करता हूँ।’’

जोशी थोड़ा सहम गया। समय ऐसा था कि मीडिया से सब डरते। समाचार चैनलों पर कभी-कभी किसी नेता या व्यवसायी का रँगे हाथों पकड़ा जाना दिखाया जाता और उस दिन आरोप-प्रत्यारोप का वितंडा रहता और उसके बाद उन खोजी पत्रकारों से परिचय करवाया जाता, जिन्होंने उस ख़बर को अंजाम दिया। ये पत्रकार स्क्रीन के सामने ऐसे खड़े होते जैसे उन्होंने नंगे हाथों शेर मारा हो! कुछ दिनों के लिए घूसखोरों, कालाबाज़ारियों और भ्रष्ट नेता-अफ़सरों के जलठंडे रहते।

खोजी पत्रकारिता पाँचवीं सत्ता बनती जा रही थी।

रुचि ने स्टूडिओ से बाहर आते हुए कहा, ‘‘आज आपने दोनों व्यंजन तले हुए बनाए हैं जबकि उस दिन आपको इसी बात पर एतराज़ था कि मेरा व्यंजन तला हुआ है।’’

सर्वेश ने कहा, ‘‘आपके व्यंजन में तलना ज़रूरी नहीं था, वह ऊपर से थोपा गया था।’’

‘‘इस पर लंबी बहस हो सकती है।’’

‘‘मैं इतना वक्त आपको नहीं दे सकता,’’ जेब से मोबाइल निकालकर सर्वेश ने घड़ी देखी और कहा, ‘‘फिर मेरे लिए खाना-पीना इतना अहम काम नहीं।’’ सर्वेश बिना विदा का संकेत या शब्द किए चला गया। रुचि को इस आदमी से चिढ़ हुई। अच्छा-भला पत्रकार है, अपने अख़बार से मतलब रखे। उसके कार्यक्षेत्र में अपनी टाँग क्यों अड़ाता है?’’

यह तो कई दिन बाद रुचि पर उद्घाटित हुआ कि हज़ारों प्रशंसकों के बावजूद इस एक आलोचक सर्वेश नारंग की असहमति उसके लिए क्यों अहम हो गई।

मौसम बदले। व्यंजन तालिका बदली। ‘सुरुचि’ और ‘स्वाद’ कार्यक्रमों की सफलता बढ़ती गई। रुचि खुद विस्मित थी। इन कार्यक्रमों में ऐसा क्या है कि इनकी टी आर पी ए-ग्रेड कार्यक्रमों से टक्कर लेती है। पैसा उस पर बरस रहा था, आयकर की राशि हर साल बढ़ रही थी लेकिन कभी-कभी रुचि अवसादग्रस्त हो जाती। उसे लगता, उसका जीवन मशीनी बनता जा रहा है। उसके जीवन में अब सिर्फ पाकशास्त्र ही पाकशास्त्र रह गया है। इतने साल बीत गए, इतनी उच्च शिक्षा बरबाद गई। पता नहीं कैसे वह क़लम की जगह करछुल से जीविका चलाने लगी। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह थी कि टेलीविज़न की पाककला विशेषज्ञा, अपने घर में खाना बनाने में ज़रा भी यकीन नहीं करती। वह चाय, कॉफी और ठंडे पेय पदार्थों पर दिन निकालती। कभी-कभी वह चावल उबालती अथवा आलू। ओशिवरा में ‘टेकहोम’ केटरिंग सर्विस का बोलबाला था। रही-सही कमी उन फूड-गिफ्ट के पैकेटों से पूरी हो जाती, जो विभिन्न डिब्बा बंद आहार तथा मसाला कंपनियाँ उसे इस गुज़ारिश के साथ भेजतीं कि वह इन उत्पादों के विज्ञापन में मॉडलिंग करना क़बूल कर ले। वह देख सकती है कि उसी के बताए व्यंजन इन मसालों अथवा सामग्री के साथ कितने लज़ीज़ बने हैं। अकसर उसका फ्रिज़ ऐसे आहार-उपहारों से भरा रहता।

तभी कूरियर ने आकर उसे एक कार्ड थमाया। उसके दस्तख़त लिए और चला गया।

रुचि ने बेमन से कार्ड निकाला कि होगा किसी प्रशंसिका का। कार्ड में लिखा था, ‘‘क्या तुम मेरी वेलेंटाइन बनोगी?’’

एकदम घसीटकर हस्ताक्षर किए गए थे, जो पढऩे में नहीं आ रहे थे। बड़ी मुश्किल से पहला अक्षर ‘स’ और अंतिम अक्षर ‘ग’ समझ आया। चकरघिन्नी खा गई रुचि। उसने एप्स पर लिखा, ‘‘ग़लत पते पर तो नहीं भेज दिया कार्ड?’’

सर्वेश ने जवाबी मैसेज किया, ‘‘पता सही है।’’

रुचि ने मैसेज किया, ‘‘मैं तुम्हें नहीं जानती।’’

‘‘जान जाओगी,’’ जवाब आया।

एकाकी जीवों के जीवन में इस एस एम एस बाज़ी की बड़ी भूमिका होती है। इसमें फासले फलाँग लगाकर मिटते हैं। जो बात मुँह पर कहने में ज़माने लग जाएँ, वह एप्स या एस एम एस से खट् से कह ली जाती है। रुचि के जीवन में यह घटित हुआ।

जब भी वह अकेली बैठती, वह सर्वेश को एप्स पर मैसेज कर डालती। सर्वेश कितना भी व्यस्त हो, तत्काल उत्तर देता, साथ कोई चुटकुला या चित्र अपलोड कर देता। रुचि का मन उत्फुल्ल हो जाता। यह मिलते हुए न मिलना और न मिलते हुए मिलना-जैसा अनुभव था। संदेशों की इन छोटी-छोटी पंक्तियों ने उनके बीच की कई दीवारें तोड़ दीं। सबसे बड़ी दीवार अपरिचय की थी। अगर कभी रुचि पूछती, ‘‘कल का शो कैसा रहा?’’

उसे उत्तर मिलता, ‘‘कैसा शो, मैंने तो सिर्फ तुम्हें देखा!’’

ऐसे संदेश में रुचि को पूरा वाक्य नहीं दिखता। बस यही याद रह जाता, ‘‘मैंने तो सिर्फ तुम्हें देखा।’’

"खुशियों की होम डिलिवरी" भाग - 2


 
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