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रविवार, 1 मार्च 2015

कहानी: कतार से कटा घर- अनिलप्रभा कुमार

कहानी: कतार से कटा घर- अनिलप्रभा कुमार

कहानी 

कतार से कटा घर

अनिलप्रभा कुमार

स्कूल की बस सड़क के किनारे रुकी तो हम तीनो बस्ते सम्भाल कर खड़े हो गए । बस ड्राइवर ने बटन दबाया और एक तीन फ़ुट की लम्बी–सी लाल पट्टी खिंच कर बाहर निकल आई जैसे किसी ट्रैफ़िक-पुलिस वाले की बांह हो। उसके सिरे पर लाल अष्टकोण सा हाथ, जिस पर सफ़ेद अक्षरों से लिखा था - स्टॉप। दोनों तरफ़ की कारें जहां की तहां रुक गईं – बच्चे उतर रहे हैं। रुकना क़ानून है। ड्राइवर ने बस का दरवाज़ा खोल दिया। स्कॉट और अनीश मुझसे पहले उतरकर, पीठ पर बस्ता झुलाते, गप्पें मारते जा रहे थे और मैं उनके पीछे चुपचाप चलता गया। वह ऐसे चलते हैं जैसे मै होऊं ही नहीं ।

“होम-वर्क करने के बाद मेरे घर आ जाना, बेसबॉल खेलेंगे।“ स्कॉट ने बांयी ओर अपने घर की ओर मुड़ते हुए ज़ोर से कहा।

“हाँ, आ जाऊंगा। तेरे डैडी तो बॉल फेंक कर प्रैक्टिस करवा ही देंगे। कुछ बेचारों के घर में तो कोई मर्द ही नहीं होता । बेचारे ! च्च च्च। “ कहकर अनीश मेरी ओर देखकर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा।

जी में आया कि एक ज़ोर का घूंसा मारकर इसके सारे दांत तोड़ दूं। वह ऐसे घटिया तानों के बंटे मेरी ओर अक़्सर फेंकता रहता है । एक ही पड़ोस में रहते हैं हम सभी पर मुझे कभी खेलने के लिए नहीं बुलाते और न ही कभी मेरे घर आते हैं। हालांकि यह एक बड़ा निजी सा पड़ोस है, शहर के सबसे अमीर इलाक़े में। पांच घर दांये और पांच घर बांये और दोनों कतारों के बीच में ग्यारहवां घर हमारा जहां आकर सड़क रुक जाती है। मेरा घर न दांयी कतार में आता है और न बांयी कतार में । बस कतारों से कटा हुआ है ।

अनीश का घर दायी कतार में है । मुड़ने से पहले उसका हाथ मुझे बॉय करने के लिए उठा पर सामने गेट पर उसकी मम्मी खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी । अनीश ने अपना हाथ नीचे गिरा लिया और जल्दी से अन्दर भाग गया ।

मैं भी उन को अनदेखा कर अपने घर चला गया । शर्ली मम्मी हमेशा मेरे आने के लिए दरवाज़ा खुला छोड़ देती हैं पर उनके कान दरवाज़े की ओर ही होते हैं ताकि मेरे आने की आहट सुन सकें । मुझे बहुत अच्छा लगता है यह ।

मम्मी ने पास आकर मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा, “कैसा रहा मेरे बेटे का दिन?”

“ठीक था।“ कहकर मैं ऊपर अपने कमरे की ओर भाग गया। ज़मीन पर बस्ता फेंककर ख़ुद को भी पलंग पर फेंक दिया। रुलाई छूट रही थी। मिशेल मॉम और शर्ली मम्मी को क्या पता कि उनकी वज़ह से मेरे साथी मुझ पर कैसी तानाकशी करते हैं। आज मुझे अपनी दोनों मम्मियों पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा है। वे तो बहुत बहादुर हैं। कहती हैं हम अपनी शर्त्तों पर जी रही हैं पर मेरे बारे में कुछ नहीं सोचतीं कि लड़के मुझे कितना छेड़ते हैं। आज प्ले-ग्राउंड में डेविड और अनीश ने मुझे जान- बूझकर धक्का मार दिया । मेरी कोहनी छिल गई और आंखो में आंसू आ गए तो वे लोग हंसने लगे- “औरतों के साथ रहेगा तो रोएगा ही न ?’’

मै चुपचाप उठकर चलने लगा तो पीछे से जेरेमी ने भी चलते हुए मुझे अड़ंगी मार दी । मैं गुस्से से पलटा तो वह भी ऐसे ही हंसने लगा था। “ अरे ! तुझे शेव करना कौन सी मम्मी सिखाएगी ? ”

“ मेरे डैड सिखा देंगे, इसमें कौन सी बड़ी बात है।“ मैक्स ने बड़ी लापरवाही से कहा और मुझे खींचकर दूर ले गया।

मैं तो चुप रहता हूं। शर्ली मम्मी कहती हैं, “ध्यान ही मत दो। एक कान से सुनो और दूसरे से निकाल दो। इतना आसान होता है क्या? मिशेल मॉम तो नर्सरी राइम ही गुनगुनाना शुरु कर देती हैं । मैं भी तो मन ही मन यही कहता रहता हूं – ’स्टिक अंड स्टोन्स, मे ब्रेक माइ बोन्स, बट वर्डस विल नैवर हर्ट मी।’ तभी तो ढीठ बना मुस्कराता रहता हूं। पर बातें ही तो सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ देती हैं। कोई ऐसा दोस्त भी तो नहीं है मेरा जिससे मैं अपने दिल की बात करूं। मैक्स मेरा दोस्त है। वह अच्छा भी है पर उससे भी यह ख़ास बात कहते डरता हूं कि कहीं वह दोस्ती ही न तोड़ दे ।

मै अनमना सा अपनी किताबें और कॉमिक बुक्स पलटने लगा। मेरे हाथ में अपनी बनाई हुई तस्वीर आ गई “मेरा परिवार”। किन्डरगार्डन में था , तब की । इसकी वजह से ही क्लास में मेरा मज़ाक बना था। टीचर ने कहा था सभी बच्चे अपने परिवार की तस्वीर बनाओ। तभी मैने अपने परिवार की यह पेन्टिंग बनाई थी । जिसमें दोनों मम्मियां मेरा हाथ पकड़े हुए हैं और मै बेसबॉल हैट पहन कर बीच में मुस्करा रहा हूं । ज़ैरा पास ही घास पर लेटी है।

टोनी ने दीवार पर लगाने के लिए सब की तस्वीरें इकट्ठी कीं । अनीश मेरी पेंटिग देख कर ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आया।

“परिवार में दो मम्मियां थोड़े-ही होती हैं, बुद्धू ! “

“पर मेरी तो दो मम्मियां ही हैं ।“ मैं परेशान सा हो गया।

अनीश ने टोनी से चित्र खींच कर मेरे आगे फेंक दिया।

“नहीं, बिल्कुल नहीं होतीं !“ टोनी ने भी अनीश का साथ दिया।

मैने अपनी पेंटिंग वापिस बस्ते में रख ली। तब तक छुट्टी की घंटी बज चुकी थी।

उस दिन मैं बहुत चुप था। सोच रहा था कि किससे बात करूं? वैसे तो मेरी दोनो ही मम्मियां मुझे बहुत प्यार करती हैं। कभी-कभी सोचता हूं कि मैं कितना क़िस्मतवाला हूं कि मुझे दो-दो मांओ का प्यार मिलता है । स्कॉट के ममी डैडी तो हर वक्त लड़ते ही रहते हैं । कभी- कभी तो हमारे घर तक भी आवाज़ आ जाती है। एक बार सबके सामने ही उन्होंने स्कॉट को तमाचा जड़ दिया था । मैक्स ने बताया कि वह तो स्कॉट की मम्मी की भी पिटाई कर देते हैं। हमारे घर में तो कोई ऊंची आवाज़ में बात तक नहीं करता । दोनों ही मॉम मेरे होमवर्क में मदद करती हैं और जब वक्त मिले तो खेलती हैं, बातें करती हैं ।

मिशेल मॉम ने ही मुझे बताया था कि “गे” का मतलब क्या होता है? जब एक ही लिंग के दो लोग आपस में प्रेम करते हैं और अपना जीवन साथ बिताना चाहते हैं तो वे लोग “गे” कहलाते हैं। वे दो मॉम भी हो सकती हैं और दो डैड भी ।

बस, इतनी सी बात ! इसके बाद मुझे कुछ और जानने में दिलचस्पी ही नहीं हुई। मुझे क्या फ़र्क पड़ता है , जब तक हमारे परिवार में सब प्यार से रहते हैं। स्कॉट के मम्मी–डैडी की तरह हर वक्त लड़ते तो नहीं !

अगले दिन टीचर ने जब मेरी पेंटिंग के बारे में पूछा तो मैने धीरे से पास जाकर बता दिया कि अनीश और टोनी कहते हैं कि दो मम्मियां नहीं हो सकतीं पर मेरी तो दो मम्मियां हैं। इसलिए मैं अपनी पेंटिंग नहीं दे सकता !

टीचर चुप हो गई ! उसने सबकी तस्वीरें हाथ में पकड़ लीं और हम सबको अपने पास आने को कहा । एक-एक करके वह सब तस्वीरें दिखाने लगीं। सब तस्वीरें एक दूसरे से अलग थीं । किसी में एक मां और दो बच्चे ! किसी में एक बच्चा और दो मम्मी–डैडी ! किसी मे सिर्फ़ डैडी और दो बच्चे। ऐसे ही टीचर सब की तस्वीरें दिखाती गई ।

“देखा तुमने। हर परिवार अपने आप में ख़ास होता है । परिवार प्यार से बनता है इसलिए दो मम्मियों वाला परिवार भी हो सकता है और दो डैडियों वाला भी।“

मैने अपनी पेंटिंग टीचर को दे दी । उसके बाद से उस स्कूल में मुझे किसी ने कुछ नहीं कहा।

पर आज स्कूल वाली घटना से मुझे लगा कि हमारे घर में शायद कुछ अटपटा है। शाम को जब मैं मॉम और मम्मी के बीच बैठकर टेलीविज़न देख रहा था - कोई फ़ैमिली प्रोग्राम, तो वही एक बात मुझे तंग किए जा रही थी कि मेरी फ़ैमिली कुछ अलग है।

“मॉम, क्या हम लोग अजीब हैं ? औरों जैसे नहीं हैं ?”

दोनों मम्मियां चुप हो गईं। एक-दूसरे को देखने लगीं। मुझे लगता है कि दोनों मम्मियों के बीच कुछ है, कोई जादू जैसा। वह बस एक-दूसरे की ओर देखती हैं और आपस की बात समझ जाती हैं । कुछ है उन दोनों के रिश्ते के बीच कि उसका गुनगुनापन मुझे और ज़ैरा को भी छूता रहता है ।

शर्ली मम्मी ने खींच कर मुझे अपने पास बिठा लिया । मेरे बाल सहलाने लगीं।

“नहीं रॉबी, हम लोग बिल्कुल अजीब नहीं। जब से दुनिया बनी है, हर समय, हर समाज और हर धर्म में इस तरह के लोग होते हैं जिनकी पसन्द अलग- अलग होती है। वह जान-बूझ कर ऐसा नहीं करते। वह होते ही ऐसे हैं। बस, ज़्यादातर लोग इस बात को बर्दाश्त नहीं कर सकते कि कोई उनसे अलग तरह की सोच या पसन्द वाला इन्सान भी हो सकता है। इसलिए कई देशों में उन्हें जेल में डाल देते हैं , यातनाएं देते हैं।“

“रेत में सिर छुपा लेने से तो तूफ़ान को नहीं नकारा जा सकता। लोग इस बात को मानना ही नहीं चाहते इसीलिए ज़्यादातर लोग अपने सम्बन्धों को छिपाकर रखते हैं। हम क्योंकि खुले समाज में रहते हैं तो क़ोशिश कर रहे हैं कि जो हम हैं , उसी तरह से रहें ! हम अलग हैं पर ग़लत नहीं !“

दोनों मम्मियों ने मुझे इतना लम्बा भाषण दे दिया। मै तो कुछ और ही पूछना चाहता था। “मॉम , क्या सचमुच मेरा कोई डैडी नहीं है?” जो मैं पूछना चाहता था, वह वैसे का वैसे ही मेरे मुंह से निकल गया।

थोड़ी देर के लिए चुप्पी छा गई। मिशेल मॉम गम्भीर होकर कुछ सोचने लगी। मै जवाब के इन्तज़ार में मॉम के मुंह की ओर देख रहा था। मॉम मुझसे कभी झूठ नहीं बोलतीं, मुझे मालूम है ।

मिशेल मॉम धीरे से अपना हाथ मेरी पीठ पर रखकर मुझे देखती रहीं फिर धीरे – धीरे बोलीं जैसे मै उनके जितना ही बड़ा होऊं !

“देख रॉबी, मुझे शुरु से ही अपने बारे में मालूम था कि मैं कैसी हूं। हम जैसे होते हैं न, वैसे ही होते हैं। इसके अलावा कुछ और हो ही नहीं सकते। मुझे पुरुषों ने कभी आकर्षित किया ही नहीं।“

मैने सोचा यह तो बड़ी आसान सी बात है।

“मैं और शर्ली आपस में ऐसे ही प्रेम करती हैं जैसे बाक़ी जोड़े करते हैं। हमें एक-दूसरे का बहुत सहारा है। हमने बाक़ी की ज़िन्दगी एक साथ बिताने का वादा किया है।

“हुंह”। यह भी मेरी बात का जवाब नहीं हुआ। 

शर्ली मम्मी ने शायद मेरे चेहरे पर की उलझन समझ ली। मेरी ठुड्डी हाथ में लेकर बड़े प्यार से बोलीं , “हमें लगा कि  हमें एक प्यारा सा बच्चा चाहिए जिस पर हम अपना सारा प्यार उड़ेल सकें । “

तो वह प्यारा सा बच्चा मै हूं , जिस पर यह दोनों मम्मियां प्यार उड़ेलना चाहती थीं। मुझे अपने होने पर गर्व हुआ और मैं मुस्कुरा उठा।

“मिशेल तुम्हें जन्म देगी। हमने काफ़ी सोच- विचार के बाद निश्चय किया। फिर वह एक ख़ास डॉक्टर के पास गई जो बिना किसी आदमी के सम्पर्क में आए बच्चे पैदा करने में मदद करता था।“ शर्ली मम्मी बता रही थीं।

“वह कहने लगा कि वह सिर्फ़ स्त्री-पुरुष के उन जोड़ों की ही मदद करता है जिन्हें बच्चे पैदा करने में मुश्किल होती है। फिर वह डॉक्टर अपने हिसाब से मुझे बताने लगा कि सही क्या है और ग़लत क्या है। उसने साफ़ कह दिया कि मैं ऐसा नाजायज़ बच्चा पैदा करने में तुम्हारी मदद नहीं कर सकता।“ वह घटना याद करके मिशेल मॉम का मुंह उस वक्त भी तमतमा उठा था।

“ फिर ?” मुझे कहानी दिलचस्प लग रही थी।

“ फिर मेरी एक सीनियर डॉक्टर ने मेरी मदद की। उसने मुझे एक चार्ट दिखाया जिसमें नामों की जगह सिर्फ़ नम्बर लिखे थे, फ़ोटो भी नहीं !“ मॉम हंस पड़ी।

“उन्हीं में से मैने एक नम्बर तीन सौ बयालीस चुना । जिसका क़द छह फुट तीन इंच था । सुडौल शरीर और वह जीवाणुओं पर शोध कर रहा था । बस, इतनी ही सूचना उपलब्ध थी। मेरी उस सीनियर डॉक्टर ने बस उसके डोनेट किये स्‍पर्म ( दान किये हुए बीज )  को मेरे अन्दर डाल दिया और तू मेरी कोख में आ गया। “

मैने सिर हिला दिया तो मैं मॉम जो की टमी से आया हूं।

“मैने तुझे जन्म दिया तो मैं हुई तेरी जन्म मां और शर्ली ने क़ानूनन अर्ज़ी दे कर तुझे पालने का अधिकार ले लिया तो वह हुई तेरी सह-मां।“

“ शुक्र है कि हमारे स्‍टेट में यह सम्भव था । “ शर्ली मम्मी ने बात का आख़िरी वाक्य कह दिया ।

मॉम और मम्मी मुझसे ऐसे ही मिलकर बातें करती हैं तो मैं अपने आप को ख़ास समझने लगता हूं। मुझे लगता है कि मेरी मम्मियां भी ख़ास हैं। पर इस बड़े स्कूल में जब लड़के घुमा –फिरा कर मेरी मम्मियों के बारे में गन्दी बातें कहते हैं , मैं सुलग जाता हूं। तब मुझे दोनों मॉम के ऊपर भी बहुत ग़ुस्सा आता है। उन्हें क्या मालूम कि लोग उनके बारे में कैसी –कैसी बातें करते हैं। अनीश और टोनी तो मेरे मुंह पर ही कह देते हैं कि उनके मम्मी – डैडी ने कहा है कि “सिक” लोगों के घर नहीं जाना ! 

सिक ? मैं खौल जाता हूं। मेरी मिशेल मॉम, इतनी जानी-मानी डॉक्टर हैं और शर्ली मम्मी के लेख तो बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में छपते हैं । मै अपनी क्लास में सबसे अच्छे नम्बर लाता हूं और मेरी बेबी सिस्टर ज़ैरा तो दुनिया की सबसे प्यारी बच्ची है । हम लोग बीमार हैं क्या ? मम्मियां हमें इतना प्यार करती हैं बस हमें और कुछ भी नहीं चाहिए। रोज़ डिनर के वक्त बैठकर समझाती हैं कि क्या बात ग़लत होती है और क्या ठीक। मॉम कहती है कि कभी किसी को ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए जिससे उसका दिल दुखे । ये लोग तो रोज़ मेरा दिल दुखाते हैं फिर ये लोग मुझसे अच्छे कैसे हुए ? तभी तो मै अपने घर की बात किसी से करता ही नहीं, मैक्स से भी नहीं !

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ज़ैरा शायद आ गई थी। मिशेल मॉम अस्पताल से लौटते वक्त उसे लेकर आई हैं । ज़ैरा हर वक्त हंसती रहती है। उसकी बड़ी- बड़ी काली आंखे देखकर मै भी हंस पड़ता हूं । जब कोई भी मम्मी उसको स्ट्रॉलर में डालकर घुमाने निकलती हैं तो लोग अजीब सी निगाहों से उसे पलट कर देखते हैं शायद इसलिए कि ज़ैरा काली है और हम तीनों गोरे । मम्मियां कहती हैं कि वे दोनों “कलर ब्लाइंड” हैं, उन्हें तो रंग में फ़र्क नज़र ही नहीं आता ।

जब से ज़ैरा हमारे घर में आई है , हमें लगता है कि परिवार पूरा हो गया है ! ज़ैरा की असली मम्मी तो फ़्लोरिडा की जेल में है और उसके डैडी का तो उसकी मम्मी को भी नहीं मालूम। पर अब तो ज़ैरा मेरी बहन है , हमारे परिवार की सदस्य ।

मिशेल मॉम कहती हैं , शुक्र है कि हमारे राज्य मे हमे बच्चे गोद लेने का अधिकार है , दूसरे कई राज्यों में तो अभी भी दोनों मम्मियां या दोनो डैड बच्चे गोद नहीं ले सकते। अच्छा हुआ, नहीं तो बेचारी ज़ैरा कहां रहती ? मैं किस के साथ खेलता ?

ज़ैरा है तो भोली-भाली सी । एक बार मुझे रात को बहुर डर लगा तो मै मम्मियों के कमरे में सोने के लिए जा रहा था पर उनका दरवाज़ा अन्दर से बंद था। मॉम ने सिखाया है कि कभी किसी के बैड-रूम में नहीं जाते , गन्दी बात होती है। अगर दरवाज़ा खुला भी हो तो भी हमेशा खटखटा कर, पूछकर ही जाना चाहिए। मैने दरवाज़ा खटखटाया तो कोई आवाज़ नहीं आई। मैने ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीटना शुरु कर दिया। थोड़ी देर में मॉम की झल्लाहट भरी आवाज़ आई।

“क्या चाहिए रॉबी ? ” 

“मेरे कमरे में मॉन्सटर है, मैं वहां अकेला नहीं सो सकता।“ मै रो दिया था।

थोड़ी देर बाद मिशेल मॉम ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने हाथ बढ़ा कर मेरे गाल थपथपाए। फिर प्यार से पुचकार दिया।

“मेरा रॉबी बेटा तो बड़ा बहादुर है न, एकदम सुपरमैन!”

“हां”, मै फिर से ठुसका था।

मॉम ने हंसकर कहा, “अच्छा जा, ज़ैरा के कमरे में जाकर सो जा।”

मै ख़ुश हो गया क्योंकि यूं मम्मियां मुझे कभी भी सोई हुई ज़ैरा के कमरे में नहीं जाने देतीं कि वह जाग जाएगी। मै मुस्कराता हुआ ज़ैरा के कमरे मे आ गया। वह भी नींद में मुस्करा रही थी। क्रिब में तो वह लेटी थी और अपने लेटने की कोई जगह मुझे दिखी नहीं। मैने भी मौक़े का फ़ायदा उठाकर उसके स्टफ़ड भालू का तकिया बना लिया और वहीं उसके पास कार्पेट पर ही लेट गया। 

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शर्ली मम्मी कुछ दिनों से बीमार चल रही थीं । शायद उनकी तबियत ज़्यादा ही बिगड़ गई । उन्हें तेज़ बुख़ार था और कंपकंपी छूट रही थी। उनका जी मतला रहा था और कभी-कभी पेट पकड़ कर वह कराह उठतीं। मिशेल मॉम सारी रात उनके सिरहाने बैठी कभी उनका माथा और कभी हाथ-पांव सहलाती रहीं। मम्मी निढाल–सी थीं और मॉम परेशान। सुबह मॉम ने अपने अस्पताल फ़ोन किया। “मेरी पार्टनर बहुत बीमार है, मुझे उसका ख़याल रखने के लिए कुछ दिन के लिए फ़ैमिली-लीव चाहिए।”

उधर से कुछ जवाब आया और मॉम ज़ोर से चिल्लायीं, “क्यों नहीं, बाक़ी सब को तो मिलती है।“

फिर फ़ोन पर पता नहीं क्या बातें हुईं कि मॉम गुस्से से फ़ोन रखकर सीधे बाथरूम में घुस गईं। बाहर निकलीं तो उनकी आंखें सूजी हुई थीं। बिना किसी की ओर देखे उन्होंने शायद कुछ और फ़ोन किये। एमरजन्सी है, बच्चों को देखने वाला कोई नहीं जैसे शब्द सुनाई दिये।

मिशेल मॉम को छुट्टी नहीं मिली । उन्हें काम पर जाना ही पड़ा । उस दिन हम एक नई बेबी –सिटर के साथ रहे और शर्ली मम्मी अकेली अपने कमरे में ज़ोर-ज़ोर से कराहती रहीं । मॉम जल्दी काम से लौट आईं। वह कभी इतनी आसानी से परेशान होने वाली नहीं पर आज लगा वह कोई और ही मॉम हैं। अन्दर जाकर कभी शर्ली मम्मी को छूतीं, कभी उनके गले लगतीं, कभी आंखें पोंछतीं, मै बाहर से ही सब देख रहा था और सहमा हुआ था ।

मॉम एकदम सीधी होकर बैठ गईं , जैसे कुछ फ़ैसला कर रही हों । फिर उन्होंने बेबी-सिटर को मदद करने को कहा । शर्ली मम्मी को अपनी दांयी बांह से सहारा देकर, लगभग अपने ऊपर लादते हुए कार की पिछली सीट पर डाला और गाड़ी चलाकर अस्पताल ले गईं।

उस सारी रात हम बेबी-सिटर के साथ रहे । मॉम ने उसे ही दो-तीन बार फ़ोन किया। सिटर ने मुझे देखा और कहा, ”बुरी ख़बर । तुम्हारी मम्मी के पित्त में पथरी निकली है। ऑपरेशन की ज़रूरत है पर मिशेल की इन्श्योंरेन्स उसके अस्पताल का ख़र्चा देने को नहीं तैयार । मेरे डैडी की इन्श्योरेन्स ने तो मेरी मम्मी की बीमारी का सारा ख़र्चा दिया था।“ फिर थोड़ा सोचते हुए बोली, शायद ये लोग मैरिड नहीं हैं, इसलिए ।“

डॉ अनिलप्रभा कुमार


जन्म: दिल्ली में
शिक्षा: पी.एच डी."हिन्दी के सामाजिक नाटकों में युगबोध" विषय पर शोध।
कार्यक्षेत्र:  विद्यार्थी-जीवन में ही दिल्ली दूरदर्शन पर हिन्दी 'पत्रिका' और “नई आवाज़” कार्यक्रमों में व्यस्त रही।  'झानोदय' के 'नई कलम' विशेषांक में 'खाली दायरे' कहानी पर प्रथम पुरस्कार पाने पर लिखने में प्रोत्साहन मिला। कुछ रचनाएँ 'आवेश', 'संचेतना', 'झानोदय' और 'धर्मयुग' में भी छ्पीं।

अमरीका आकर,  न्यूयॉर्क में 'वॉयस आफ अमरीका' की संवाददाता के रूप में काम किया और फिर अगले सात वर्षों तक 'विज़न्यूज़' में तकनीकी संपादक के रूप में। इस दौर में कविताएँ लिखीं जो विभिन्न पत्रिकाओं में छपीं।

न्यूयॉर्क के स्थानीय दूरदर्शन पर कहानियों का प्रसारण। पिछले कुछ वर्षों से कहानियां और कविताएं लिखने में रत। कुछ कहानियां वर्त्तमान - साहित्य के प्रवासी महाविशेषांक में छपी है।

वागर्थ, हंस, अन्यथा, कथादेश, शोध-दिशा, परिकथा, पुष्पगंधा, हरिगंधा, आधारशिला और वर्त्तमान– साहित्य आदि पत्रिकाओं के अलावा, “अभिव्यक्ति” के कथा महोत्सव में “फिर से” कहानी  पुरस्कृत हुई।                        
“बहता पानी” कहानी संग्रह (२०१२), भावना प्रकाशन से प्रकाशित।
“उजाले की क़सम” कविता संग्रह (२०१३) भावना प्रकाशन


संप्रति:  विलियम पैट्रसन यूनिवर्सिटी, न्यू जर्सी में हिन्दी भाषा और साहित्य का प्राध्यापन और लेखन।
संपर्क:  Dr. Anil Prabha Kumar
119 Osage Road, Wayne, NJ 07470.
Phone: 973 628 1324
ईमेल: aksk414@hotmail.com
मॉम का फिर फ़ोन आया था। उन्होंने बताया कि उन्हें शर्ली मम्मी के इलाज के लिए ऑपरेशन की इजाज़त देने का अधिकार नहीं है, उनके हस्ताक्षर मान्य नहीं। वह प्रतीक्षा कर रही हैं।

मॉम ने मुझसे भी बात की। “रॉबी घबराना नहीं, ज़ैरा का ख़याल रखना। सब ठीक हो जाएगा।’

“तुम कहां हो मॉम?” मेरी रुलाई छूट रही थी।

“वेटिंग–रूम में बैठी हूं। शर्ली के कमरे में जाने की मुझे इजाज़त नहीं।“

“क्यों?”

“क्योंकि मैं उसकी फ़ैमिली में नहीं आती।“ मुझे लगा मॉम फ़ोन पर शायद सिसकी थीं।

दूसरे दिन शाम को दोनों मम्मियां लौट आईं। शर्ली मम्मी बहुत कमज़ोर लग रही थीं और मिशेल मॉम बेहद थकी हुईं। रात को जब मै गुडनाइट करने उनके कमरे की ओर जा रहा था कि कॉरीडोर में ही रुक गया। मिशेल मॉम के ज़ोर –ज़ोर से बोलने की आवाज़ आई। वह शायद गुस्से में थीं , नहीं तो वह कभी इतने ज़ोर से बोलती नहीं।

“ यह बिल्कुल बे-इन्साफ़ी है। बाक़ी सब को परिवार का सदस्य बीमार होने पर छुट्टी मिल सकती है तो मुझे क्यों नहीं? हमेशा हमसे क्यों दोयम दर्ज़े का बर्ताव किया जाता है? एक तो औरत होने के नाते वैसे ही भेद-भाव। ऊपर से जब पता चलता है कि मैं उनके तय किए गए सम्बन्धों के सांचे में फ़िट नहीं बैठती तो और भी कहर टूटता है। पूरे टैक्स देते हैं हम , पर हमें क्यों वह लाभ नहीं मिलते जो किसी भी आम शादी-शुदा जोड़े को मिलते हैं। मेरी बीमा कम्पनी क्यों तुम्हारी बीमारी का ख़र्चा नहीं दे सकती ? आज मुझे कुछ हो जाए तो न तुम्हें मेरी नौकरी की पेन्शन मिलेगी और न ही दूसरे हक़-फ़ायदे जो कि आम तौर पर दूसरे जोड़ों को मिलते हैं। इस घर से भी निकाल दी जाओगी । वारिस बनकर पता नहीं कौन-कौन आ जाएगा।“

शर्ली मम्मी ने भी शायद जवाब में कुछ कहा।

मुझे उनकी बातें कुछ समझ में नहीं आईं सिवाए इसके कि मॉम परेशान है। मै घबरा गया और बिना गुडनाइट किए ही चुपचाप आकर अपने बिस्तर पर लेट गया।

मैं मम्मियों को नहीं बताता और ज़ैरा तो अभी है ही छोटी। पर मैं इस बात से बहुत घबराता हूं कि कोई मेरी मॉम को तंग न करे , कोई उनकी बेइज़्ज़ती न करे। कोई ऐसी बात न हो जिससे वह दुखी हों । मुझे मालूम है कि मिशेल मॉम वाले नाना- नानी तो कभी-कभी मिलने आ जाते हैं पर शर्ली मम्मी वाली नानी कभी नहीं आतीं, मम्मी इससे दुखी होती हैं।

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मम्मियां मुझे संडे स्कूल नहीं भेजतीं जहां धर्म की शिक्षा दी जाती है पर मेरे स्कूल के कई बच्चे जाते हैं । मैं और मैक्स लंच टाइम में खाना खा रहे थे तभी जॉन और उसके दोस्त दबंगई के मूड में हमारे पास ही आकर बैठ गए। वे सभी मुझसे दो कलासें आगे हैं। जॉन हमारी तरफ़ मुंह करके कहने लगा ,

“हमारी चर्च में कहते हैं, जो भी रिश्ता एक आदमी और एक औरत के अलावा होता है, वह पाप होता है। ऐसे लोग नर्क में जाते हैं। वे जलते अलावों पर भूने जाते हैं और गर्म सलाखों से दागे जाते हैं।“ फिर वे सभी ठहाके मार-मार कर हंसने लगे।

मुझसे लंच नहीं खाया गया। शायद मेरे चेहरे पर कुछ था जो मैक्स ने देख लिया।

“चल बाहर चलते हैं।“ वह मुझे स्कूल कैफ़े से बाहर घसीट लाया।

मेरा चेहरा तप रहा था और माथे पर पसीना छलछला आया। बाहर आकर वॉटर फ़ाउन्टेन से मैने पानी पिया और मुंह भी धोया।

“मैक्स, तुझे अपनी एक बहुत निजी बात बतानी है। पहले प्रॉमिस कर किसी को नहीं बताएगा।“

“प्रॉमिस।“ मैक्स ने अपने सीने पर क्रॉस का निशान बनाया।

“पक्का वादा?”

“हां, दोस्ती का पक्का वादा।“

“मेरी दोनों मम्मियां गे हैं।“ मैने अपनी सारी हिम्मत बटोरकर इतनी जल्दी से कहा कि अगर एक पल के लिए, सांस लेने के लिए भी रुकता तो शायद कह नहीं पाता।

मैक्स के चेहरे पर कोई भाव नहीं बदला। मुझे अचरज हुआ। 

“मुझे मालूम है। मेरे डैड ने कहा था कि लगता है रॉबी की दोनों मांओं का समलैंगिक रिश्ता है पर जब तक रॉबी ख़ुद न बताए, तुम मत पूछना ताकि वह असहज न महसूस करे।“

“तुम्हें अजीब नहीं लगा?”

“नहीं, अनीश का अंकल भी गे है।“

“तुम्हें कैसे मालूम?”

“मुझे कैसे मालूम होगा ? वह तो भारत में है। अनीश ने ही बताया ।“

मेरी फटी हुई आंखें देखकर बोला, “ अरे हर जगह के लोग “गे” हो सकते हैं। अनीश का अंकल शादी नहीं करना चाहता था । उसके माता-पिता ने ज़बरदस्ती सुन्दर सी लड़की से उसकी शादी करवा दी । शादी के बाद वह उसको मारता था। कहता था , तू मुझे अच्छी ही नहीं लगती । एक दिन धक्का दे दिया तो वह रोती हुई वापिस अपने मां–बाप के पास चली गई । अनीश की मम्मी कहती है शायद वह “गे” है। अनीश ने चोरी से यह बात सुन ली थी फिर मुझे बता रहा था। ख़ैर, हमें क्या लेना है इन बातों से। मेरे डैड कहते हैं , जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार करना चाहिए।“

मुझे मैक्स की बात अच्छी लगी। एकदम पूछ बैठा, “तो फिर तुम मेरे घर खेलेने आओगे?”

“हां आऊंगा। पर एक बात तुम भी मेरी मानोगे?”

“क्या?” मैं इस वक्त उसकी हर बात मानने को तैयार था – दोस्ती के नाम पर।

“प्लीज़ स्कूल की कौंसलर मिसेज़ रिचर्डसन से मिल लो और जो- जो बातें तुम्हें परेशान करती हैं, उन्हें बता दो। तुम्हें अच्छा लगेगा।“

अगले दिन ही मै मिसेज़ रिचर्डसन से मिला। वह मुझे बहुत अच्छी लगीं। उन्होंने प्यार से मेरी बातें सुनीं। मुझे लगा कि जो बातें मैं दोनो मॉम से नहीं कह सकता वह बातें, अपने सभी डर, चिंताएं, सरोकार मैं उनसे कह सकता हूं।

मैने उन्हें जॉन ओर उसके दोस्तों की कही बात बताई। क्या सचमुच मेरी मम्मियां पाप वाली ज़िन्दगी जी रही हैं? क्या वे सचमुच नरक की यातना भोगेंगी? मेरी दोनों मॉम इतनी अच्छी और प्यारी हैं कि उन्हें कोई तकलीफ़ हो, इस ख़्याल से ही मेरी आंखें डबडबा आईं।

मिसेज़ रिचर्डसन ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मुस्कराईं। 

“वे सब लोग ग़लत मतलब निकालते हैं। अच्छा रॉबी, तुम बताओ, जीसस क्या कहते हैं?”

’सब से प्यार करो।” मै धीमे से बुदबुदाया।

“तो जीसस सब से प्यार करता है।“ उन्होंने “सबसे” शब्द पर ज़ोर दिया।

मै चुप।

“तो वह सबसे प्यार करता है चाहे वह कोई भी क्यों न हो। उनका प्यार कुछ ख़ास लोगों के लिए नहीं है, अपने सब बच्चों के लिए है। अगर जॉन की मम्मी के लिए है तो तुम्हारी मम्मियों के लिए भी है।“

मुझे सुनकर अच्छा लगा। मैं मुस्करा दिया।

मै उनके ऑफ़िस से बाहर निकला तो लगा जीसस की बात का असली मतलब तो मिसेज़ रिचर्डसन ही समझती हैं। अब मैं भी यही करूंगा। सबसे प्यार करूंगा, जॉन, स्कॉट, अनीश, टोनी और मैक्स सभी से।

दोनों मम्मियां एक रैली पर गई थीं। शायद कोई बहुत ही ज़रूरी बात होगी नहीं तो वे हमें यूं अकेला कम ही छोड़ती हैं। मै और ज़ैरा बेबी सिटर के साथ घर पर थे – टेलीविज़न देखते हुए।

मॉम लोग तो बस एक या दो प्रोग्राम ही देखने देती हैं पर आज बेबी-सिटर थी, टेलीविज़न देखने की पूरी छूट भी।
समाचार चल रहे थे। बहुत से लोग नारे लगा रहे थे।

“समलैंगिकों को भी क़ानूनी विवाह की अनुमति मिलनी चाहिए।“

“हमारे साथ भेद-भाव बन्द करो।“

“हमें भी वही अधिकार मिलने चाहिएं जो किसी भी वैवाहिक जोड़े को मिलते हैं।“

भीड़ में मुझे मिशेल मॉम  और शर्ली ममी के जोश से भरे तमतमाते चेहरे दिखे। 

फिर टेलीविज़न पर एक आदमी दूसरी ही ख़बर बताने लगा। 

“कैनसास सिटी में एक समलैंगिक लड़के को कुछ लोगों ने सता-सता कर जान से ही मार डाला।“ फिर कुछ पुलिस के लोग दिखाई दिये, उस लड़के की रोती हुई मां और उसके भौचक्के दोस्त।

मैने ज़ैरा को अपने से सटा लिया।

“पता है, कुछ लोग समलैंगिकों को बहुत नफ़रत करते हैं। होमोफ़ोबिक होते हैं ये लोग ! अरे बाबा, जियो और जीने दो।“ बेबी-सिटर अपनी कमेन्ट्री देती जा रही थी ।

अगर किसी ने मेरी मम्मियों को भी....? मैं कांपता हुआ अपने बेडरूम में आ गया। आंखों तक कम्बल खींच लिया। मेरी सांस बहुत तेज़-तेज़ चल रही थी। मुझे लगा कि कुछ लोग मेरी मम्मियों को रस्सियों से बांध रहे हैं। उन पर पत्थर फेंक रहे हैं। उन्हें गन्दी-गन्दी गालियां दे रहे हैं। मम्मियों के बदन से ख़ून ही ख़ून बह रहा है और उनकी गर्दनें एक ओर लुढ़क गई हैं।

मैने घबरा कर आंखे खोल दीं। शायद मै सपना देख रहा था। पसीने से तरबतर मेरे बदन में मेरा दिल इतने ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा अभी मेरे शरीर से बाहर आ जाएगा। मैने मम्मी को आवाज़ देनी चाही पर लगा मेरी अपनी आवाज़ भी ऐसे मौक़े पर डर के मारे गूंगी हो गई थी।

मै चुपचाप छत की ओर देखता रहा। फिर मन ही मन प्रार्थना करने लगा। धीरे से पर्दा उठाकर खिड़की के बाहर देखा। मॉम की गाड़ी ड्राइव-वे पर खड़ी थी इसका  मतलब मम्मियां घर में आ चुकी हैं।

मैं थोड़ा-सा शांत हो गया। मैक्स के डैडी कहते हैं कि दुनिया में बहुत से ऐसे पाग़ल लोग भी रहते हैं जिन्हें पहचान पाना आसान नहीं होता। वे लोग अपने अलावा सब को ग़लत समझते हैं। दूसरों की ग़लती सुधारने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं । ऐसे ग़लती- सुधारक लोगों से मुझे दहशत होती है। अक़्सर रात को मेरी नींद खुल जाती है। मैं किसी से कहता नहीं पर रात को सोने से पहले जाकर सभी दरवाज़े देख लेता हूं कि ठीक से बन्द हैं न ! पता नहीं क्यूं रात को ही डर ज़्यादा लगता है। शर्ली मम्मी से भी कह दिया है कि वह मेरे लिए दरवाज़ा खुला न रख छोड़ा करें पर उनको समझ ही नहीं आता।

आजकल तो दोनों मम्मियां लगता है किसी बड़े काम में व्यस्त हैं। फ़ोन पर लोगों से बातें करती हैं तो एक ही शब्द बार-बार सुनाई देता है-”गे राइट्स’। आए दिन रैली में भाग लेने जाती हैं। शर्ली ममी तो पता नहीं क्या-क्या दस्तावेज़ तैयार करती रहती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि वे कोई बहुत बड़ी लड़ाई की तैयारी कर रही हैं। 

शर्ली मम्मी उस दिन किसी से फ़ोन पर कह रही थीं यह लड़ाई हम सिर्फ़ अपने लिए नहीं बल्कि दुनिया में रहने वाले सभी सम-लैंगिकों के लिए लड़ रहे हैं। इस आन्दोलन की शुरुआत किसी ने तो करनी ही है। हम झंडा लेकर चलेंगे तो बाक़ी भी फॉलो करेंगे । हमारी रुचि और आकर्षण अलग हो सकते हैं पर ग़लत नहीं। सही बात के लिए हम पूरी ताक़त से लड़ेंगे ।“

मैं ये सब बातें ठीक से नहीं समझता । पर मम्मियां जो भी करेंगी, मैं उनका साथ दूंगा। यह मेरा भी अपने से वादा है । 

उस दिन शर्ली मम्मी कोई फ़ॉर्म भर रही थीं तो एकदम नाराज़ होकर पेन ही फेंक दिया।

“ बारह साल हो गए हमे साथ रहते हुए और अभी तक “सिंगल” पर ही निशान लगा रहे हैं। अलग-अलग दुगुना इन्कम-टैक्स भरना पड़ता है।“ 

मिशेल मॉम के चेहरे पर दुख और बेबसी का भाव था। मैं यह जान जाता हूं पर समझ नहीं पाता कि मै कैसे दोनो मम्मियों को ख़ुश करूं? मैने मॉम जो के गले में बांहे डाल दीं और गाल पर किस्सी दी । मॉम ने मुझे अपने सीने से चिपका लिया । मुझे लगा कि मै कम से कम यह तो कर ही सकता हूं ।

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सुबह स्कूल जाने से पहले  मै आंखे मलता हुआ नीचे आया तो वहीं का वहीं ठिठक गया।  किचन टेबल पर आज का अख़बार बिखरा पड़ा था और दोनो मॉम एक- दूसरे के गले से लिपटकर ख़ुशी से गोल-गोल घूमे जा रही थीं।

मुझे देखा तो शर्ली ममी ने  दौड़कर मुझे भी गोदी में उठा लिया और झूम गईं।

“रॉबी ! बिल पास हो गया।“

मै अभी भी उन्हें हक्का- बक्का देख रहा था। पाग़ल हो गई हैं क्या दोंनो ?

“अब न्यूयॉर्क में भी “गे-मैरिज बिल” पास हो गया है । अब हम दोनो शादी कर सकेंगी ।

मम्मियों को इतना ज़्यादा ख़ुश आज मैने पहली बार देखा ।

“कब होगी शादी?” मै भी ख़ुश था क्योंकि दोनो मॉम ख़ुश थीं ।

“जल्दी, बहुत जल्दी।“मिशेल मॉम बस अब और इंतज़ार नहीं करना चाहती थीं ।

और हमारे घर में शादी की तैयारियां शुरु हो गईं । सबको निमन्त्रण भेजे जा रहे थे। मेरे और ज़ैरा के नए कपड़े भी आ गए। मैक्स के डैड ने कहा कि वह शादी की रस्म के बाद मॉम और मम्मी को अपनी बड़ी वाली कार में घर ले आएंगे ।

ममी और मॉम थोड़ी खुस-पुस करती रहती थीं । लगा कोई बात है जो इन्हें पूरी तरह ख़ुश नहीं होने दे रही। मै अपना होमवर्क कर रहा था तो मैने सुना कि शर्ली ममी अपनी मासी से बात कर रही हैं ।

“ मेरी मां को समझाओ। यह दिन मेरे लिए बहुत ख़ास है। अगर वे इस शादी में नहीं आएंगी तो ....” और मम्मी सुबकने लगीं।

शादी वाले दिन मैने अपना काला टक्सीडो पहना और ज़ैरा ने लेस वाला गुलाबी फ़्रॉक। मिशेल मॉम ने क्रीम रंग का पैंट-सूट और शर्ली मम्मी ने भी उसी रंग का स्कर्ट- सूट। मिशेल मॉम वाली नानी ने दोनो अंगूठियों के डिब्बे अपने पर्स में सम्भाल कर रख लिए। सभी घर आने वाले मेहमान आ चुके थे और मम्मियों के दोस्तों ने हमें सिटी हॉल के बाहर ही मिलना था। मॉम के ऑफ़िस का कोई आदमी हमारी तस्वीरें ले रहा था  कि इतने में दरवाज़े की घंटी बजी।

मेहमान को देखकर शर्ली मम्मी की खुशी से चीख निकल गई। वह दौड़कर उस बुज़ुर्ग  महिला से लिपट गईं। वह रोती जा रही थीं और बोलती जा रही थीं- “थैंकयू मॉम, थैंक यू। थैंक यू सो मच।“ 

मैं समझ गया ज़रूर दूसरी वाली नानी होंगी।

रजिस्ट्रार के दफ़्तर में मॉम और मम्मी ने दस्तख़्त किए। नानी ने मुझे और ज़ैरा को एक-एक अंगूठी पकड़ा दी और हमें मम्मियों को दे देने का इशारा किया। मिशेल और शर्ली मम्मी ने एक दूसरे की उंगली में अंगूठी पहनाई तो वहां खड़े सभी लोगों ने तालियां बजानी शुरु कर दीं। मॉम और मम्मी ने सबके सामने एक-दूसरे को किस्स किया तो मॉम की मम्मी ने उन पर फूल फेंके ।

मैक्स के डैड अपनी कार बिल्कुल दरवाज़े तक ले आए। उस पर दो बड़े- बड़े बैलून बंधे थे और पीछे के शीशे पर सफ़ेद रंग से लिखा था – “ न्‍यूली मैरिड”

मिशेल मॉम और शर्ली ममी एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए पीछे की सीट पर बैठ गईं। उनके पीछे की कार में मिशेल मॉम वाले नाना ड्राइवर सीट पर और नानी उनके बगल में बैठे। ज़ैरा को बच्चों वाली सीट पर पेटी से बांधने के बाद दूसरी वाली नानी मेरे साथ पिछली सीट पर  बैठ गईं।

“तुमने आख़िरी वक्त पर आने का इरादा कैसे बना लिया?’’ बड़ी नानी ने पूछा तो दूसरी नानी खो सी गईं।

“क्योंकि ... क्योंकि मेरी बहन ने कहा कि जैसे तुम अपने स्वर्गीय पति से अभी तक इतना प्रेम करती हो, शर्ली भी वैसे ही मिशेल से प्यार करती है। अपने पूर्वाग्रहों की वजह से उसे किसी भी तरह से कमतर न आंको। सोचती रही, बस फिर लगा कि शर्ली की ख़ुशी के लिए मुझे आना चाहिए। आ गई । “

अचानक हम सबका ध्यान बंटा। बड़ी नानी के मुंह से तो हल्की-सी चीख़ ही निकल गई। एकदम हमारे आगे खड़ी नव-विवाहित जोड़े वाली कार के ऊपर एक आदमी कुछ फेंक कर तेज़ी से भाग गया। हम सब सकते में आ गए- कहीं बम तो नहीं? मुझे लगा कि मेरी सांस रुक रही है।

कार के पिछले शीशे पर लिखा “न्यूली मैरिड” शब्द, अंडे की ज़र्दी और सफ़ेदी के नीचे दब गया।

हमारी वाली गाड़ी में सब लोग लोग एकदम चुप थे पर आगे वाली गाड़ी झटके से हिली और बेपरवाही से अपने घर की तरफ़ बढ़ गई।

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शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

मन्नू भंडारी: कहानी - ईसा के घर इंसान Manu Bhandari - Hindi Kahani - Isa Ke Ghar Insaan

ईसा के घर इंसान

मन्नू भंडारी: कहानी - ईसा के घर इंसान Manu Bhandari - Hindi Kahani - Isa Ke Ghar Insaan

मन्नू भंडारी


फाटक के ठीक सामने जेल था।


बरामदे में लेटी मिसेज़ शुक्ला की शून्य नज़रें जेल की ऊँची-ऊँची दीवारों पर टिकी थीं। मैंने हाथ की किताबें कुर्सी पर पटकते हुए कहा ”कहिए, कैसी तबीयत रही आज?“

एक धीमी-सी मुस्कराहट उनके शुष्क अधरों पर फैल गई। बोलीं ”ठीक ही रही! सरीन नहीं आई?“

”मेरे दोनो पीरियड्स ख़ाली थे सो मैं चली आई, सरीन यह पीरियड लेकर आएगी।“ दोनों कोहनियों पर ज़ोर देकर उन्होंने उठने का प्रयत्न किया, मैंने सहारा देकर उन्हें तकिए के सहारे बिठा दिया। एक क्षण को उनके जर्द चेहरे पर व्यथा की लकीरें उभर आईं। अपने-आपको आरामदेह स्थिति में करते हुए उन्होंने पूछा ”कैसा लग रहा है कॉलेज? मन लग जाएगा ना?“

”हाँ.. मन तो लग ही जाएगा। मुझे तो यह जगह ही बहुत पसन्द है। पहाड़ियों से घिरा हुआ यह शहर और एकान्त में बसा यह कॉलेज। जिधर नज़र दौड़ाओ हर तरफ हरा-भरा दिखाई देता है।“ तभी मेरी नज़र सामने की जेल की दीवारों से टकरा गई। मैंने पूछा ”पर एक बात समझ में नहीं आई। यह कॉलेज जेल के सामने क्यों बनाया? फाटक से निकलते ही जेल के दर्शन होते हैं तो लगता है, सवेरे-सवेरे मानो ख़ाली घड़ा देख लिया हो; मन जाने कैसा-कैसा हो उठता है।“

रूख़े केशों की लटों को अपने शिथिल हाथों से पीछे करते हुए मिसेज़ शुक्ला की कान्तिहीन आँखें जेल की ऊँची-ऊँची दीवारों पर टिकीं। बोलीं ”सरीन जब आई थी तो उसने भी यही बात पूछी थी।’’

पता नहीं क्यों कॉलेज के लिए जगह चुनी गई।“ फिर उनकी खोई-खोई दृष्टि दीवारों में जाने क्या खोजने लगी पैरों को कुछ फैलाकर उन्होंने एक बार फिर अपनी स्थिति को ठीक किया, और बोलीं ”तुम लोग जब कॉलेज चली जाती हो तो मैं लेटी-लेटी इन दीवारों को ही देखा करती हूँ, तब मन में लालसा उठती है कि काश! ये दीवारें किसी तरह हट जातीं या पारदर्शी ही हो जातीं और मैं देख पाती कि उस पार क्या है!

सवेरे शाम इन दीवारों को बेधकर आती हुई कैदियों के पैरों की बेड़ियों की झनकार मेरे मन को मथती रहती है और अनायास ही मन उन कैदियों के जीवन की विचित्रा-विचित्रा कल्पनाओं से भर जाया करता है। इस अनन्त आकाश के नीचे और विशाल भूमि के ऊपर रहकर भी कितनी सीमित, कितना घुटा-घुटा रहता होगा उनका जीवन! चाँद और सितारों से सजी इस निहायत ही ख़ूबसूरत दुनिया का सौंदर्य, परिवार वालों का स्नेह और प्यार, ज़िन्दगी में मस्ती और बहारों के अरमान क्या इन्हीं दीवारों से टकराकर चूर-चूर न हो जाया करते होंगे?

इन सबसे वंचित कितना उबा देने वाला होता होगा इनका जीवन न आंनद, न उल्लास, न रस।“ और एक गहरी निःश्वास छोड़कर वे फिर बोलीं ”जाने क्या अपराध किए होंगे इन बेचारों ने, और न जाने कि न परिस्थितियों में वे अपराध किए होंगे कि यूँ सब सुखों से वंचित जेल की सीलन भरी अँधेरी कोठरियों में जीवित रहने का नाटक करना पड़ रहा है...।“

तभी दूधवाली के कर्कश स्वर ने मिसेज शुक्ला के भावना-स्त्रोत को रोक दिया। मैं उठी और दूध का बर्तन लाकर दूध लिया। मिसेज शुक्ला बोली ”अब चाय का पानी भी रख ही दो, सरीन आएगी तब तक उबल जाएगा।“

मैं पानी चढ़ाकर फिर अपनी कुर्सी पर आ बैठी। बोली ”मदर ने आपको पूरी तरह आराम करने के लिए कहा है। आपकी जगह जिन्हें रखा गया है, वे कल से काम पर आने लगेंगी। आज शाम को शायद मदर खुद आपको देखने आएँ।“ ”मदर यहाँ की बहुत अच्छी हैं रत्ना! जब मैं यहाँ आई थी तब जानती हो, सारा स्टाफ नन्स का ही था। मेरे लिए तो यही समस्या थी कि इन नन्स के बीच में रहूँगी कैसे। पर मदर के स्वभाव ने आगा-पीछा सोचने का अवसर ही नहीं दिया, बस यहाँ बाँधकर ही रख लिया। फिर तो सरीन और मिश्रा भी आ गई थीं। मिश्रा गई तो तुम आ गईं।“

”मुझे तो सिस्टर ऐनी और सिस्टर जेन भी बड़ी अच्छी लगीं। हमेशा हँसती रहती हैं। कुछ भी पूछो तो इतने प्यार से समझाती हैं कि बस! बड़ी अफेक्शनेट हैं। हाँ, ये लूसी और मेरी जाने कैसी हैं? जब देखो चेहरे पर मुर्दनी छाई रहती है, न किसी से बोलती हैं, न हँसती हैं।“

मिसेज शुक्ला ने पीछे से एक तकिया निकालकर गोद में रख लिया और दोनों कोहनियाँ उस पर गड़ाकर बोली ”ऐनी और जेन तो अपनी इच्छा से ही सब कुछ छोड़-छाड़कर नन बनी थीं, पर इन बेचारियों ने ज़िन्दगी में चर्च और कॉलेज के सिवाय कुछ देखा ही नहीं। कॉलेज में काम करती हैं, बस यही है इनका जीवन! अब तुम्हीं बताओ, कहाँ से आए मस्ती और शोखी।“ ”वाह, यह भी कोई बात हुई। सिस्टर जूली को ही लीजिए, वह भी उम्र में इनके ही बराबर होंगी, पर चहकती रहती हैं। बातें करेगी तो ऐसी लच्छेदार कि तबीयत भड़क उठे। हँसेगी तो ऐसे कि सारा स्टाफ- रूम गूँज जाए, उसका तो अंग-अंग जैसे थिरकता रहता है।“

”वह अभी नई-नई आई है यहाँ, थोड़े दिन रह लेने दो, फिर देखना, वह भी लूसी और मेरी जैसी ही हो जाएगी।“ और एक गहरी साँस छोड़कर उन्होंने आँखें मूंद ली। तभी सरीन हड़बड़ाती-सी आई और बोली ”गजब हो गया शुक्ला आज तो! अब जूली का पता नहीं क्या होगा?“

”क्यों, क्या हुआ?“ सरीन की घबराहट से एकदम चैंककर शुक्ला ने पूछा। ”जूली फोर्थ इयर का क्लास ले रही थी। कीट्स की कोई कविता समझाते- समझाते जाने क्या हुआ कि उसने एक लड़की को बाँहो मे भरकर चूम लिया। सारी क्लास में हल्ला मच गया और पाँच मिनिट बीतते-न-बीतते बात सारे कॉलेज मैं फैल गई। मदर बड़ी नाराज़ भी हुईं और चिंतित भी। जूली को उसी समय चर्च भेज दिया और वे सीधी फादर के पास गईं।“ और फिर बड़े ही रहस्यात्मक ढंग से इन्होंने शुक्ला की ओर देखा। ”लगता है, अब जूली के भी दिन पूरे हुए!“ बहुत ही निर्जीव स्वर में शुक्ला बोलीं। मुझे सारी बात ही बड़ी विचित्रा लग रही थी। लड़की-लड़की को किस कर ले! जूली के दिन पूरे हो गए कैसे दिन? दोनों के चेहरों की रहस्यमयी मुद्रा...मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी। पूछा ”फादर  क्या करेंगे, कुछ सज़ा देंगे?“ मेरा मन जूली के भविष्य की आशंका से जाने कैसा-कैसा हो उठा।

”अभी-अभी तो रत्ना, जूली की ही बात कर रही थी और अभी तुम यह खबर ले आईं। सुनते हैं, जूली पहले जिस मिशनरी में थी, वहाँ भी इसने ऐसा ही कुछ किया था, तभी तो उसे यहाँ भेजा गया कि फिर कभी कोई ऐसी-वैसी हरकत करे तो फादर का जादू का डंडा घुमवा दिया जाए।“

और शुक्ला के पपड़ी जमे शुष्क अधरों पर फीकी-सी मुस्कराहट फैल गई।

”जादू का डंडा? बताइए न क्या बात है? आप लोग तो जैसे पहेलियाँ बुझा रही हैं।“ बेताब होकर मैंने पूछा।

”अरे, क्यों इतनी उत्सुक हो रही हो?“ थोड़े दिन यहां रहोगी तो सब समझ जाओगी। यहाँ के फादर एक अलौकिक पुरूष हैं, एकदम दिव्य! कोई कैसा भी पतित हो या किसी का मन जरा भी विकार-ग्रस्त हो, इनके सम्पर्क में आने से ही उसकी आत्मा की शुद्धि हो जाती है। दूर-दूर तक बड़ा नाम है इन फादर  का। बाहर की मिशनरीज़ से कितने ही लोग आते है। फादर के पास आत्म-शुद्धि के लिए।“

”चलिए, मैं नहीं मानती। मन के विकार भी कोई ठोस चीज़ हैं कि फादर  ने निकाल दिए और आत्म शुद्धि हो गई।“ मैंने अविश्वास से कहा। कमरे से चाय के प्याले बनाकर लाती हुई सरीन से शुक्ला बोलीं

”लो, इन्हें फादर की अलौकिक शक्ति पर विश्वास ही नहीं हो रहा है।“ ”इसमें अविश्वास की क्या बात है? हमारे देश में तो एक-से-एक पहुँचे हुए महात्मा हैं, तुमने कभी नहीं सुना ऐसी महान आत्माओं के बारे में?“

”सुनने को तो बहुत कुछ सुना है पर मैंने कभी विश्वास नही किया।“

”अच्छा, अब जूली को देख लेना, अपने आप विश्वास हो जाएगा। लूसी, जो आज इतनी मनहूस लगती है, यहाँ आई थी तब क्या जूली से कम चपल थी? फिर देखो! फादर ने तीन दिन में ही उसका काया पलट कर दिया या नहीं?“ शुक्ला ने सरीन की ओर देखते हुए जैसे चुनौती के स्वर में पूछा।

तभी डॉक्टर साहब आए। मिसेज़ शुक्ला ने इंजेक्शन लगाया और पूछताछ करने लगे। सरीन मुझे गरम पानी की थैली का पानी बदल देने का आदेश देकर नहाने चली गई। इंजेक्शन लगाने के बाद करीब घंटे-भर तक शुक्ला की हालत बहुत खराब रहती थी, मैंने उन्हें गर्म पानी की थैली देकर आराम से लिटा दिया। उनके चेहरे पर पसीने की बूँदें झलक आई थीं, उन्हें पोंछ दिया। वे आँखें बन्द करके चुपचाप लेट गईं।

मन में अनेकानेक प्रश्न चक्कर काट रहे थे और रह-रहकर जूली का हँसता चेहरा आँखों के सामने घूम रहा था। फादर उसके साथ क्या करेंगे? यह प्रश्न मेरे दिमाग को बुरी तरह मथ रहा था। मैंने दूर से फादर को देखा है। ऊपर से नीचे तक सफ ेद लबादा पहने वह कभी-कभी चर्च जाते हुए दीख जाया करते थे। इतनी दूर से चेहरा तो दिखाई नहीं देता था, पर चाल-ढाल से बड़ी भव्य मूर्ति लगते थे। मन श्रद्धा से भर उठे, ऐसे। फादर में कौन सी शक्ति है जो आत्मा की शुद्धि कर देती है, यही बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी। अगले दिन जूली नहीं आई। मैंने सिस्टर ऐनी से कुछ पूछना चाहा तो उन्होंने धीरे-से अंगुली मुँह पर रखकर चुप रहने का आदेश कर दिया। मैंने देखा कि लूसी और मेरी इस घटना से काफी सन्तुष्ट-सी नज़र आ रही थीं। कल से उनके खिजलाहट भरे चेहरों पर हल्के से सन्तोष की झलक नज़र आ रही थीं। दो दिन और इसी प्रकार बीत गए, तीसरे दिन मैं कुछ जल्दी ही कमरे से रवाना होने लगी तो सरीन ने पूछा ”अरे, अभी से चल दी!“

”कुछ कॉपियाँ देखनी हैं, यहाँ लेकर नहीं आई, अब स्टाफ -रूम में बैठकर ही देख लूँगी। आज नम्बर देने ही हैं।“ और मैं चल पड़ी। यों हमारे कमरों और कॉलेज के बीच में भी एक छोटा-सा फाटक था, पर वह अक्सर बन्द ही रहा करता था सो मेन गेट से ही जाना पड़ता था। जैसे ही मैं कॉलेज के फाटक में घुसी, मैंने देखा जूली चर्च का मैदान पार कर नीची नज़रें किए धीरे-धीरे कॉलेज की तरफ आ रही है। एक बार इच्छा हुई कि दौड़कर उसके पास पहुँच जाऊँ, पर जाने क्यों पैर बढ़े ही नहीं। मैं जहाँ-की-तहाँ खड़ी रही। वह मेरे पास आई, पर बिना आँख उठाए, बिना एक भी शब्द बोले वैसी ही शिथिल चाल से गुज़र गई। मैं अवाक्-सी उसका मुँह देखती रही। दो दिन में ही क्या हो गया इस जूली को? मै नहीं जानती, फादर ने उसके ऊपर जादू का डंडा घुमाया या उसे जन्तर मन्तर का पानी पिलाया, पर जूली हँसना भूल गई। इसकी सारी शोखी, सारी हँसी, सारी मस्ती जैसे किसी ने सोख ली हो। उस दिन किसी ने जूली से बात नहीं की, शायद मदर का ऐसा ही आदेश था। पर जूली के इस नए रूप ने मेरे मन में विचित्रा-सा भय भर दिया। लगता था जैसे जूली नहीं, उसकी ज़िंदा लाश घूम रही है। सिस्टर ऐनी ने इतना जरूर कहा कि फादर ने उसकी आत्मा को पवित्रा कर दिया, उसकी आत्मा के विकार मिट गए; पर मुझे लगता था जैसे जूली की आत्मा ही मिट गई थी, मर गई थी।

अपने कमरे पर आकर मैंने मिसेज शुक्ला को सारी बात बताई तो बिना किसी प्रकार का आश्चर्य प्रकट किए वे बोलीं ”मैं तो पहले ही जानती थी। पता नहीं, कैसी शक्ति है फादर  के पास।“ रात में सोई तो बड़ी देर तक दिमाग़ में यही सब चक्कर काटता रहा। कभी लूसी और कभी मेरी की शक्लें आँखों के सामने घूम जातीं। उन्हें देखकर लगता था मानो वे अपने से ही लड़ रही हैं, अपने को ही कुतर रही हैं, एक अजीब खिझलाहट के साथ, एक अजीब आक्रोश के साथ। कॉलेज की बड़ी लड़कियों को हँसी-ठिठोली करते देख उनके दिलों से बराबर ही सर्द आहें निकल जाया करती थीं। उनके जवान दिलों में उमंगों और अरमानों की आंधियाँ नहीं मचलती थीं और उनकी आँखों में वह कान्ति और चमक नहीं थी, जो इस उम्र की खासियत होती है। ऐसा लगता था इनकी आँखें, आँखें न होकर दो कब्र हैं जिनमें उनके मासूम दिलों की सारी तमन्नाओं को, सारे अरमानों को मारकर सदा-सदा के लिए दफ ना दिया हो। पहले ये भी जूली जैसी ही चंचल थीं तो अब जूली भी हमेशा के लिए ऐसी ही हो जाएगी? और जूली का आज वाला रूप मेरी आँखों के सामने घूम जाता है। मैंने ज़ोर से तकिए में अपना मुँह छिपा लिया और इन सारे विचारों को दिमाग से निकालकर सोने की कोशिश करने लगी।

मैं नहीं जानती क्या हुआ, पर आँख खोली तो देखा मैं पसीने से तर थी और साँस जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रही थी। मिसेज शुक्ला मुझे पकड़े हुए थीं और बार-बार पूछ रही थीं ”क्या सपना देखकर डर गईं?“ एक बार तो भयभीत सी नज़रों से मैं चारों ओर देखती रही, फिर कमरे की परिचित चीज़ों और मिसेज़ शुक्ला को देखकर आश्वस्त सी हुई। ”क्या हो गया? क्यों चिल्लाई थीं इतनी ज़ोर से? कोई सपना देखा था क्या?“

उन्होंने फिर पूछा।

”हाँ! मुझे ऐसा लगा कि एक बड़ी-सी सफ ेद चिड़िया आकर मुझे अपने पंजे में दबोचकर उड़े जा रही है और उसके पंजों के बीच मेरा दम घुटा जा रहा है।“

”चलो, थी चिड़िया ही, चिड़ा तो नहीं था, तब कोई बात नहीं। चिड़ियाँ कहीं नहीं ले जाने की, ले जानेवाले तो चिड़े ही होते हैं।“ हँसते हुए उन्होंने कहा!

”चलिए, आपको मज़ाक सूझ रहा है, यहाँ डर के मारे जान निकल गई। वह दम घुटने की फीलिंग जैसे अभी भी है।“

मैंने पानी पिया और फिर सो गई।

और फिर वही ढर्रा चल पड़ा। जब कभी बाहर से कोई सिस्टर या ब्रदर आत्म शुद्धि के लिए फादर के पास आते तो सिस्टर ऐनी मुझे यह ख़बर सुनाया करती थी। मैं बड़ी उत्सुकता से सारा किस्सा सुनती और विश्वास से अधिक आश्चर्य करती सिस्टर ऐनी और जेन को मेरा यह अविश्वास करना अच्छा नहीं लगता था और उसे मिटाने के लिए ही वे और भी जोर-शोर से, घंटों फादर  के अलौकिक गुणों का बखान करतीं। मन्दगति से चलती- फिरती फादर की वह सौम्य मूर्ति मेरे लिए श्रद्धा से अधिक कौतूहल और भय का विषय बनी रही।

महीने भर बाद एक दिन मदर ने मुझे बुलाया और बोलीं ”मैं चाहती हूँ कि नन्स के लिए भी हिन्दी पढ़ाने की कुछ व्यवस्था कर दी जाए। अब हिन्दी जानना तो सबके लिए बहुत ज़रूरी हो उठा है क्योंकि मीडियम भी हिन्दी हो रहा है, नहीं तो सारा स्टाफ हमें दूसरा रखना होगा। क्यों?“

”तो आप सिस्टर्स के लिए भी एक क्लास खोल दीजिए, बहुत ही जल्दी सीख लेंगी। यों बोल तो सभी लेती हैं, लिखना- पढ़ना भी आ जाएगा।“

”इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है। शुक्ला तो बीमारी से उठने के बाद काफी कमज़ोर हो गई है, सो मैं उस पर यह बोझ डालना ठीक नहीं समझती। तुम शाम को एक घंटा चर्च में आकर सिस्टर्स को हिन्दी पढ़ाने का काम ले लो, उसके लिए तुम्हें अलग से पे किया जाएगा।“

चर्च में जाकर पढ़ाना होगा, यह बात सुनते ही एक बार मेरे सामने फादर का चेहरा घूम गया। उनको और दूसरी नन्स को और अधिक निकट से जानने की लालासा को एक राह मिल रही थीं मैं बोल पड़ी ”मुझे कोई ऐतराज नहीं, मैं बड़ी खुशी से यह काम करूँगी।“

”तब पहली तारीख से शुरू कर दो!“

मदर के पास से लौटी तो देखा, सरीन और शुक्ला चाय पर बैठीं मेरा इन्तज़ार कर रही है। मैंने आकर उन्हें सारी बात बताई तो सरीन हँसकर बोली ”चलो, तुम तो सपने में भी फादर  को देखा करती थीं।“ अब पास से देखना। बहुत कौतूहल है ना फादर  को लेकर तुम्हारे मन में।

”फादर  अपने कॉटेज में ही रहते हैं या चर्च जाते हैं? सिस्टर्स के कमरों की तरफ तो वे शायद कभी जाते नहीं, तुम देखोगी क्या?“ शुक्ला ने कहा।

”अरे, कभी चर्च में आते-जाते ही दीख जाया करेंगे।“ सरीन बोली। फिर एकाएक प्रसंग बदलकर कहा ”क्यों शुक्ला, आजकल तुमने एक नई बात मार्क की या नहीं?“

”क्या?“ मिसेज़ शुक्ला ने पूछा।

”लूसी में कोई चेंज नज़र नहीं आता? आजकल उसके चेहरे पर पहले जैसी मुर्दनी नहीं छाई रहती। वह अनिमा है ना थर्ड इयर की, उसका भाई आजकल अक्सर कॉलेज में आया करता है, कभी कोई बहाना लेकर तो कभी कोई बहाना लेकर। विजिटर्स को अटैंड करने का काम लूसी पर ही है। मैं कई दिनांें से नोटिस कर रही हूँ कि जिस दिन वह आता है, लूसी का मूड बड़ा अच्छा रहता है।

”ख़्याल नहीं किया, अब देखेंगे।“ शुक्ला ने कहा।

पता नहीं, मिसेज़ शुक्ला ने ख़्याल किया या नहीं, पर मैंने इस चीज़ को अच्छी तरह से मार्क किया कि अनिमा का भाई सप्ताह में दो बार आ ही जाता है और काफी देर तक वह उसके पास बैठती है। उसके जाने के बाद भी लूसी का मूड इतना अच्छा रहता है कि कोई हल्का-फुल्का मज़ाक भी कर लो तो बुरा नहीं मानती। पर जाने क्यों लूसी का यह नया रूप देखकर मेरा मन भर उठता। दो महीने पहले की हँसती, थिरकती जूली की तस्वीर आँखों के सामने नाच जाती और मैं सिहर उठती।

पहली तारीख की शाम को मैं चर्च गई। इसके पहले मैंने कभी चर्च की सरहद में पाँव नहीं रखा था। कॉलेज के दाहिनी ओर वाला लंबा मैदान पार करने पर एक नाला पड़ता था, वही चर्च और कॉलेज की विभाजक रेखा थी।

उसे पार करके ही चर्च का मैदान आरम्भ होता था। चर्च के पीछे रैवरेंड फादर और मदर के लिए दो छोटी सुन्दर कॉटेजेज़ बनी हुई थीं और बाईं ओर सिस्टर्स के लिए एक कतार में कमरे बने हुए थे। कमरों के सामने लम्बा-सा बरामदा था। जाकर देखा कि क्लास के लिए उसी बरामदे में व्यवस्था की गई है। मैं पढ़ाने लगी। चर्च, कॉलेज और हमारे कमरों के सामने कोई तीन फीट ऊँची लम्बी सी दीवार थी, यों सबके प्रवेश द्वार अलग-अलग थे, पर चर्च से कॉलेज जाने के लिए सब लोग नाला पार करके ही जाया करते थे। पढ़ाने बैठी तो फाटक की ओर ही मेरा मुँह था और अनायास ही यहाँ भी मेरी नज़रें सामने जेल की ऊँची-ऊँची दीवारों से टकराईं। जबर्दस्ती अपनी नज़रों को उस ओर से हटाकर मैंने पढ़ाना आरम्भ किया।

चर्च में सिस्टर्स को पढ़ाते-पढ़ाते मुझे क़रीब एक महीना हो गया था। रोज़ की तरह उस दिन भी जब मैं जाने लगी तो शुक्ला बोलीं ”आज जरा जल्दी आ सके तो अच्छा हो रत्ना! बाज़ार चलेंगे। सरीन से कहा तो बोली कि उसे ज़रूरी नोट्स तैयार करने हैं, अकेले जाते मुझे अच्छा नहीं लगता, तुम आ जाना!“

”ठीक है, मैं जल्दी ही चली जाऊँगी। आप तैयार रहिएगा, आते ही चल पड़ेंगे।“ और मैं चल दी। चर्च के मैदान में पहुँचते ही किसी स्त्राी के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें सुनकर एक क्षण को मैं स्तब्ध सी खड़ी हो गई, सोचा जाऊँ या नहीं। पर मन का कौतूहल किसी तरह ठहरने नहीं दे रहा था। जैसे ही बरामदे में पैर रखा, मैं हैरत में आ गई। एक बहुत ही खूबसूरत नन हाथ पैर पटक-पटककर बुरी तरह चिल्ला रही थी। सारी सिस्टर्स उसे संभाले हुए थीं, मदर बड़ी बेचैनी से उसे शान्त करने की कोशिश कर रही थीं, पर वह थी कि चिल्लाए चली जा रही थी।

तीन-चार सिस्टर्स ने उसे पकड़ रखा था, उसके बावजूद वह बुरी तरह हाथ-पैर पटक रही थी। उसे मैंने जो पास से देखा तो लगा कि ऐसा रूप मैंने आज तक नहीं देखा। संगमरमर की तरह सफेद उसका रंग था और मक्खन की तरह मुलायम देह। चेहरे पर ऐस लावण्य कि उपमा देते न बने! और उस लावण्यमय चेहरे पर वे दो नीली आँखें, जैसे समुद्र की गहराइयाँ उतर आई हों। मैं सच कहती हूँ कि यदि कोई एक बार भी उन नीली आँखें को देख ले तो कम से कम इस ज़िंदगी में तो वह उन्हें चाहकर भी न भूल पाए। मेरे घुसते ही उसकी नज़र मेरी ओर घूम गई, मुझे लगा वे नीली आँखें मेरे शरीर को भेदकर मेरे मन को कचोटे डाल रही हैं। और फिर वह एकाएक चिल्ला उठी ”देखो मेरे रूप को...“ और वह अपने कपड़ों को बुरी तरह फाड़कर इधर-उधर करने लगी। सबने बड़ी मुश्किल से उसे संभला मदर ने उसके कपड़ों को जल्दी से ठीक-ठाक कर दिया। वे बड़ी ही परेशान नज़र आ रही थीं। हाथ रुकने पर भी उसकी जीभ चल रही थी ”मैं अपनी ज़िंदगी को, अपने इस रूप को चर्च की दीवारों के बीच नष्ट नहीं होने दूँगी। मैं ज़िंदा रहना चाहती हूँ, आदमी की तरह ज़िंदा रहना चाहती हूँं। मैं इस चर्च में घुट-घुटकर नहीं मरूँगी... मैं भाग जाऊँगी, मैं भाग जाऊँगी...। हम क्यों अच्छे कपड़े नहीं पहनें? हम इन्सान ही है..? मैं नहीं रहूँगी यहाँ, मैं कभी नहीं रहूँगी। देखो मेरे रूप को...“

तभी बाहर से सिस्टर ऐनी हड़बड़ाती- सी आई ”फादर  ने एकदम बुलाया है, लिए इसे वहीं ले चलिए!“ सबने मिलकर उसे जबर्दस्ती उठाया। वह चिल्लाती जा रही थी ”मैं फादर को भी दिखा दूँगी कि ज़िन्दगी क्या होती है, यह सब ढोंग है मैं यहाँ नही रहूँगी... आधी से अधिक सिस्टर्स उसे उठाकर ले गई। जो बची थीं, उनमें से इस घटना के बाद कोई भी इस मूड में नहीं थी कि बैठकर पढ़ती। सो मैं लौट जाने को घूमी तो देखा कि इस सबसे दूर एक खिड़की के सहारे लूसी खड़ी है। उसके चेहरे पर एक विशेष प्रकार की चमक आ गई थी, जैसे मन-ही-मन वह इस सारी घटना से बड़ी प्रसन्न हो।

मन में अपार विस्मय, भय और दुख लेकर मैं लौटी तो शुक्ला बोलीं ”लो, तुम तो अभी से लौट आईं, अभी तो तैयार भी नहीं हुई।“

”आज क्लास ही नहीं हुई।“ और मैंने सारी बातें उन्हें बताईं। मैं जितनी इस घटना से विचलित हो रही थी, वे उतनी नहीं हुईं। स्वाभाविक से स्वर में बोलीं ”शायद बाहर से कोई सिस्टर आई होगी! क्या बताएँ, इन बेचारियों की ज़िंदगी पर भी बड़ा तरस आता है।“

रात भर मेरे दिमाग़ में उस नई सिस्टर का खूबसूरत चेहरा और उसका चीखना- चिल्लाना गूँजता रहा। वह फादर के पास भेज दी गई है। अब फादर उसका क्या करेंगे, शायद जूली की तरह उसके हृदय का यह बवंडर भी सदा-सदा के लिए शान्त हो जाएगा और फिर जिन्दगी-भर उसका यह चाँद को लजाने वाला रूप चर्च की दीवारों के बीच ही घुट-घुटकर नष्ट हो जाएगा और वह अपनी इस बर्बादी पर एक ठंडी साँस भी नहीं भर सकेगी। दूसरे दिन स्टाफ रूम में घुसते ही सबसे पहले मेरी नज़र लूसी पर पड़ी।

बिना पूछे ही बड़े उत्साह से उसने मुझे कल की बात बताई ”जानती हो, यह जो नई सिस्टर आई है, इसका नाम एंजिला है। कहते हैं यह चर्च से भाग गई थी, पर फिर पकड़ ली गई। इसके बाद पागलों जैसा व्यवहार करती थी, सो इसे फादर के पास भेज दिया। देखा कितनी खू़बसूरत है?“ और एक सर्द-सी आह उसके मुँह से निकल गई।

”अब क्या होगा? फादर  आखिर करते क्या हैं?“

”देखो क्या होता है? आज तो मदर भी नहीं आईं। कल से वे फादर की कॉटेज़ पर ही हैं। सुनते हैं। एंजिला काबू में नही आ रही है, उसका पागलपन वैसे ही ही जारी है। हम लोगों को भी उधर जाने की इजाज़त नहीं है।“

दो दिन तक कॉलेज के वातावरण, विशेषकर स्टाफ-रूम के वातावरण में एक विचित्रा प्रकार का तनाव आ गया। कोई किसी से कुछ नहीं बोलता। बस मैं, शुक्ला और सरीन आपस में ही थोड़ा-बहुत बोल लेते थे, बाकी सारी सिस्टर्स तो ऐसे काम कर रही थीं मानो मौन-व्रत ले रखा हो, जैसे आॅपरेशन रूम में कोई बहुत बड़ा आॅपरेशन हो रहा हो और बाहर नर्सें व्यस्त, चिंतित-सी, परेशान इधर-उधर घूम रही हों। उनकी हर बात से ऐसा लग रहा था जैसे कह रही हों चुप-चुप! शोर मत करो, आॅपरेशन बिगड़ जाएगा! मदर थोड़ी देर के लिए कॉलेज आतीं और जरूरी काम करके चली जाती थीं। हाँ लूसी मौका पाकर और एकान्त देखकर चुपचाप यह ख़बर दे देती थी कि एंजिला किसी प्रकार शान्त नहीं हो रही है, फादर सबकुछ करके हार गए। यह कहते समय लूसी का मन प्रसन्नता से भर उठता था, मानो फादर की नाकमयाबी पर उसे परम सन्तोष हो रहा है।

चैथे दिन सवेरे मैं और मिसेज़ शुक्ला घूमने निकले तो देखा, सामने से एंजिला चली आ रही है। मैं देखते ही पहचान गई। बिल्कुल स्वस्थ, स्वाभाविक गति से वह चल रही थी। पास आते ही मैं पूछ बैठी, ”सिस्टर एंजिला! आप कहाँ जा रही हैं?“

एक क्षण को एंजिला रूकी मुझे पहचानने का प्रयास-सा करते हुए बोली ”मुझे कोई नहीं रोक सकता, जहाँ मेरा मन होगा, मैं जाऊँगी। मैंने तुम्हारे फादर  ...“ फिर सहसा ओंठ चबाकर बात तोड़कर वह बोली ”अब वे कभी ऐसी फालतू की बातें नहीं करेंगे।“ और एक बार अपनी नीली आँखों से उसने भरपूर नज़र मेरे चेहरे पर डाली, सिर को हल्का-सा झटका दिया और एक ओर चली गई। मैं अवाक्- सी उसकी ओर देखती रही।

”यही है एंजिला?“ शुक्ला ने पूछा

”हाँ, पर यह तो जा रही है, किसी ने इसे रोका नहीं?“

”फादर  का जादू-मंतर इस पर चला नहीं दीखता है। बड़ी खूबसूरत है। आँखें तो गजब की है, बस देखने लायक!“

पर मिसेज शुक्ला की बातें मेरे कानों में ही नहीं पहँचु रही थी। मैं कभी दूर जाती एंजिला को और कभी मौन, शान्त खड़ी चर्च की इमारत को देख रही थी। मेरा मन हो रहा था कि दौड़कर चर्च पहुँच जाऊँ और लूसी को बुलाकर सारी बातेन पूछ लूँ। लौटते समय भी मैंने चर्च के मैदानों पर नज़र दौड़ाई, पर वहाँ सभी कुछ शान्त था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। बड़ी मुश्किल से उस दिन दस बजे मैं एक तरफ दौड़ पड़ी और स्टाफरूम से लूसी को घसीटकर पीछे लाॅन में चली गई। लूसी स्वयं सब कुछ बताने के लिए बैठी थीं।

लानॅ में पहुँचते ही बोले ”एंजिला चली गई फादर  कुछ नहीं कर सके। उनकी खुद की तबीयत बड़ी खराब हो रही है। मदर उनकी देखभाल कर रही हैं। सवेरे तो हम लोग भी वहाँ गए थे। कमरे में तो नहीं जाने दिया हमें, पर बाहर से फादर को देखा था। फादर हम सब पर भी बड़ा रोब जमाया करते थे, एंजिला ने उनका नशा डाउन कर दिया। एंजिला को सुधार नही सके, अपनी इस असफलता का ग़म उन्हें बुरी तरह साल रहा है, आत्मग्लानि से बार-बार उनकी आँखों में आँसू आ रहे हैं, मदर बड़ी परेशान और दुखी हैं, उन्हें बहुत तसल्ली दे रही हैं बार-बार ईसा मसीह से उनकी शान्ति के लिए प्रार्थना भी कर रही हैं।“ और एक बड़ी ही व्यंग्यात्मक मुस्कुराहट उसके होठों पर फैल गई।

इसके तीसरे दिन ही रात में सबसे आँख बचाकर, चर्च की छोटी-छोटी दीवारों को फांद कर कब और कैसे लूसी भाग गई, कोई जान ही नहीं पाया।

बड़ी विचित्रा स्थिति थी उस समय वहाँ की। एंजिला फादर की उस अलौकिक शक्ति को जैसे चुनौती देकर चली गई, जिसके बल पर उन्होंने कितने ही पतितों की आत्मा शुद्ध की थी। फादर इस असफलता पर आत्म-ग्लानि के मारे मेरे जा रहे थे। मदर बेहद परेशान थीं। कभी फादर के पास, कभी कॉलेज तो कभी चर्च में दौड़ती फिर रही थीं। तभी लूसी भाग गई। एक तो चर्च जैसी पवित्रा जगह, फिर लड़कियों का कॉलेज, क्या असर पड़ेगा इस घटना का लड़कियों पर!

दो दिन बाद ही चर्च और कॉलेज के चारों ओर की दीवारें ऊँची उठने लगीं और देखते-ही-देखते चारों ओर ऊँची-ऊँची दीवार खिंच गईं।

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

विपक्ष हाशिए से बाहर और देश के बुद्धिजीवी चुप - अरविन्द जैन

संविधान, देश और अध्यादेश

अरविन्द जैन

     दिल्ली से आते हैं- 
     आदेश !
     अध्यादेश !! 

आठ महीने में, आठ अध्यादेश। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण हो या कोयला खदान। यह सब तो पहले से ही संसदीय समितियों के विचाराधीन पड़े हुए हैं। क्या यही है आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? क्या यह ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता नहीं? क्या ये अध्यादेश अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार नहीं? क्या ऐसे ही होगा राष्ट्र का नवनिर्माण? देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान हैं।

संविधान, देश और अध्यादेश अरविन्द जैन

अबू अब्राहम कार्टून 10-12-1975 इंडियन एक्सप्रेस
अबू अब्राहम का चर्चित  कार्टून जिसमे राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद अपने बाथ टब से आपातकालीन घोषणा पर हस्ताक्षर करते दिखाये गए हैं ।

संविधानानुसार तो अध्यादेश ‘असाधारण परिस्थितियों’ में ही, जारी किये जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट तक कह चुकी है कि ‘अध्यादेशों’ के माध्यम से सत्ता बनाए-बचाए रखना, संवैधानिक धोखाधड़ी है’। राज्यसभा में बहुमत नहीं है तो, संसद का संयुक्त सत्र बुलाया जा सकता था/है। हालांकि 1952 से आज तक केवल चार बार, संयुक्त सत्र के माध्यम से विधेयक पारित किए गए है। संयुक्त सत्र बुला कर विधेयक पारित कराना, भले ही संवैधानिक है लेकिन व्यावहारिक बिलकुल नहीं। जानते हो ना! संविधान के अनुच्छेद 123 (दो) के तहत छह महीने के भीतर ‘अध्यादेश’ के स्थान पर विधेयक पारित करवाना पड़ेगा और अनुच्छेद 85 के तहत छह महीने की अवधि संसद सत्र के अंतिम दिन से लेकर, अगले सत्र के पहले दिन से अधिक नहीं होनी चाहिए। लोकसभा और राज्यसभा से मंजूरी नहीं मिली तो?

निश्चय ही संसद का कामकाज ठप होने की बढ़ती घटनायें, गहरी चिन्ता का विषय हैं। विपक्ष को विरोध का अधिकार है, पर संसद में हंगामा करके बहुमत को दबाया नहीं जा सकता। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि मिल बैठ कर आम सहमती बनायें। विपक्षी हंगामे या हस्तक्षेप से बचने के लिए, अध्यादेश का रास्ता बेहद जोखिमभरा है। अपनी भूमिका और विवेक के माध्यम से विपक्ष का सहयोग जुटाते। क्या आये दिन अध्यादेश जारी करने का, कोई व्यावहारिक समाधान या विकल्प नहीं? भूमि अधिग्रहण से जुड़े अध्यादेश को लाने की तत्काल जरूरत पर सवाल खड़े हुए मगर फिर अध्यादेश...क्यों? 

हाँ! हाँ! हम जानते हैं कि जिस दिन (26 जनवरी,1950) संविधान लागू हुआ, उसी दिन तीन और उसी साल 18 अध्यादेश जारी करने पड़े। नेहरु जी ‘जब तक रहे प्रधानमंत्री रहे’ और उन्होंने अपने कार्यकाल में 102 अध्यादेश जारी किये। इंदिरा गाँधी ने अपने कार्यकाल में 99, मोरार जी देसाई ने 21, चरण सिंह ने 7, राजीव गाँधी ने 37, वी.पी.सिंह ने 10, गुजराल ने 23, वाजपेयी ने 58, नरसिम्हा राव ने 108 और मनमोहन सिंह ने (2009 तक) 40 अध्यादेश जारी करे-करवाए। सत्ताधारी दलों के सभी नेता संविधान को ताक पर रख, अनुच्छेद 123 का ‘राजनीतिक दुरूपयोग’ करते रहे हैं। क्या ‘अध्यादेश राज’ कभी खत्म नहीं होगा? 

क्या राष्ट्रपति महोदय के ‘संकेत’ काफी नहीं है कि अगली बार किसी भी अध्यादेश पर, महामहिम अपने संवैधानिक अधिकारों, राष्ट्रीय हितों, राजनीतिक दायित्वों और संसदीय परम्पराओं का हवाला देकर गंभीर सवाल खड़े कर सकते हैं। एक बार किसी भी विधेयक, अध्यादेश या मंत्रीमंडल की सलाह को मानने से इनकार भी कर सकते हैं या पुनर्विचार के लिए भेज सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो, यह मौजूदा सरकार के लिए सचमुच मुश्किल की घड़ी होगी। आखिर राष्ट्रपति कब तक ‘रबर की मोहर’ बने रहेंगे? 

*कोयले सम्बंधित अध्यादेश 2014 को चुनौती देते हुए, जिंदल पावर एंड स्टील, बीएलए पावर और सोवा इस्पात लिमिटेड ने दिल्ली, मध्य प्रदेश और कोलकाता उच्च न्यायालय में पांच अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई। इन सभी याचिकाओं में कोयला अध्यादेश की संवैधानिक वैधता पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। केंद्र सरकार ने उच्च न्यायालयों के अंतरिम आदेश पर रोक लगाने और सभी याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय में ट्रांसफर करने की गुहार लगाईं। कोयला मंत्रालय की तरफ से अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि सभी लंबित याचिकाओं में कानूनी मुद्दे एक जैसे ही हैं। इसका विरोध करते हुए वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि कंपनी के शेयर होल्डिंग पैटर्न में तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है। मगर मुख्य न्यायाधीश एच. एल. दत्तू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने (3 फरवरी, 2015) हस्तक्षेप करने से साफ़ इनकार कर दिया। अध्यादेशों के संदर्भ में कानूनी लड़ाई का आरम्भ हो चुका है, अंत ना जाने कब और किस रूप में होगा।

बताने की जरुरत नहीं कि आर.सी. कूपर बनाम भारतीय संघ (1970) में संविधान के अनुच्छेद 123 की वैधता को चुनौती दी गई तो, सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप करने से ही मन कर दिया और ‘तत्काल आवश्यकता’ के सवाल पर निर्णय लेने के काम राजनेताओं पर छोड़ दिया। अध्यादेशों को लेकर राज्यपालों की भूमिका पर अनेक बार गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। इस संदर्भ में डॉ. डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (ए.आई.आर. 1987 सुप्रीम कोर्ट 579) में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक दस्तावेज है*, जिसमें कहा गया है कि बार-बार ‘अध्यादेश’ जारी करके कानून बनाना अनुचित और गैर संवैधानिक है। अध्यादेश का अधिकार असामान्य स्थिति में ही अपनाना चाहिए और राजनीतिक उदेश्य से इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती। कार्यपालिका ऐसे अध्यादेश जारी करके, विधायिका का अपहरण नहीं कर सकती। 

अरविन्द जैन अरविन्द जैन
इंडियन  चैंबर ऑफ़ लॉ , सुप्रीम कोर्ट के वकील
संपर्क:
फोन: 011-23381989
मोबाइल: 09810201120
ईमेल: bakeelsab@gmail.com
पता: 170, वकीलों के चैंबर्स, दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली -110003

लगता है कि विपक्ष हाशिए से बाहर हो गया है और देश के बुद्धिजीवी चुप हैं। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक मुद्दों पर, कहीं कोई हस्तक्षेप नजर नहीं आ रहा। मिडिया-टेलीविज़न सनसनीखेज ख़बरों, बेतुकी बहसों और ‘व्यक्ति विशेष’ की छवि संवारने-सुधरने में व्यस्त है। मगर मज़दूरों में असंतोष और दलितों, आदिवासीयों और किसानों में जनाक्रोश बढ़ रहा है। खेत-खलियान सुलग रहे हैं। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी, देश के तमाम संसाधनों पर कब्ज़ा करने में लगी है। आर्थिक सुधार और विकास के सारे दावे अर्थहीन सिद्ध हो रहे हैं। काला धन अभी भी देशी-विदेशी बैंकों या जमीनों में गडा है। सपनों के घर हवा में झूल रहे हैं। ना जाने कितने ‘बेघर’ ठिठुरती सर्दियों में मारे गए। चुनावी राजनीति लगातार मंहगी हो गई है। न्यायपालिका मुकदमों के बोझ तले दबी है और राष्ट्रीय न्यायधीश नियुक्ती विधेयक अधर में लटका है। धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का संकट, निरंतर गहरा रहा है। ऐसे में सरकार के सामने अनंत चुनौतियाँ और चेतावनियाँ हैं। निसंदेह ‘अध्यादेशों’ के सहारे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को चलाना-बचाना मुश्किल है। राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना, समय और समाज की अपेक्षाएँ पूरी कर पाना असंभव है।

'मेरी कविता मेरे जुनून' - रेणु हुसैन की पाँच कवितायेँ

रेणु हुसैन की पाँच कवितायेँ


मेरी कविता मेरे जुनून


मैंने लिखी थी
एक कविता तुम पर
तुम्हें सुनाना चाहती थी,

रेणु हुसैन के कविता संग्रह 'जैसे' का लोकार्पण 23 फरवरी 2015 को कॉन्स्टीट्युशन क्लब, नई दिल्ली में डॉ. रामेश्वर राय की अध्यक्षता  में हुआ
तुम्हें बुलाया,
तुम्हारा इंतजार किया
तुम नहीं आए।
सदियाँ बीत गई।
आज मैंने जाना
तुम्हें अपनी कविता सुनाना
मेरी एक धुन थी,
जज़्बा था, जुनून था।
दरअसल मेरी कविता फकत एक कविता नहीं
एक खत था,
एक दस्तावेज था,
एक आगाज था
एक एलान-ए-जंग था,
मेरी कविता पीड़ा नहीं दर्द नहीं अहसास नहीं
आवाज थी।
मेरी कविता में प्यार था, पानी था,
लहरें थीं समन्दर था,
चिनगारियाँ थीं शोले थे,
पंख थे पखेरू थे,
फूल नहीं उनकी महक नहीं
पर रंग थें,
तुम क्या सुनते।
वो चंद पंक्तियाँ नहीं
जीवन पर्यंत थीं, जोवनोत्तर थीं,
उसमें भूख थी प्यास थी,
आत्मा थी, विसर्जन था,
उत्थान था पतन था
सितारे थे उनके चमक थी,
पत्थर थे और दूब की नरमी थी,
उसमें राह थी और मंजिल भी,
विचलन और बेचैनी थी,
वह किसी तंत्र के पुर्जे  हेतु नहीं
जीवट थी, आस्था थी,
उसमें संकल्प थे संकल्पों की दृढ़ता थी।
      क्या तुम आज भी पढ पाओगे
फिजा में फैले धूप के रंग,
संध्या-समय घर लौटती
सैकड़ों चिड़ियों के गीतों के स्वर,
क्या पढ़ लोगे तुम
लहरों से साहिल की बातें
तन्हाइयाँ और आहटो की रातें,
मीलों तय की गई, कदमों की कहानियां
आज भी वहीं अपने रास्ते बनाती,
गर तुम आओगे......
वहीं मिली, इन सब के साथ
राह देखती
     मेरे कविता......।





सच का सामना

एक दिन मैंने कन्फेशन किया
खुद ही किया
सोचा कभी न कभी तो करना ही होगा
अन्यथा दिल पर बोझ रहता।
मैंने उनसे कहा
क्या आप जानते हैं आपकी नजरें बचाकर
आपकी पीठ पीछे
मैंने बहुत कुछ किया है।
"अच्छा!" "क्या"!
आपके जाने के बाद
मैं बहुत खिलखिलाकर हँसती हूँ,
बारिश से बने कीचड़ में छपाक-छपाक
             नंगे पाँव, घूमती हूँ,
बडे तपाक से लोगों से मिलती हूँ
बड़ी बेबाकी से पराए मर्दों से बात करती हूँ,
और सुनिए, ऊंची आवाज में गीत गाती हूँ,
कुछ उपन्यास भी पढ़ डाले हैं,
और छुपकर एक नाटक में भी काम किया है
अब आप अपने चेहरे पर प्रश्नचिन्ह मत बनाइए
क्योंकि मुझे आपसे जवाब नहीं चाहिए।




मुखर हुआ मौन

सुन यायावर
पत्थरों पर लहरों के लिखे स्वर पढो
जंगली हवा की फुसुफुसाहट सुन,
झरनों के लड़ने-झगड़ने का संगीत सुन,
साहिल पर सीप और रेत के महलों का
                     इतिहास सुन,
तारों के टूटने की व्यथा सुन,
अंधियारी काली रात में जुगनुओं से गाथा सुन
सुन तू चीत्कारों का गीत
खोज रूदन में नाच,
विलाप में नाद,
बाज़ारों में भीख माँगते आदमी का राग
खोज वेश्या के गान में मंदिरों का कर ताल,
और मंदिर की प्रतिमा में अट्ठाहास
खोज यायावर खोज स्वंयं में......
तुझे मिलेगी हंसती गाती एक नन्ही
                       चिनगारी
तू बादलों की गड़गड़ाहट ले,
नदी के तल का पानी ले,
पहाड़ों के पत्थरों की स्थिरता ले,
लहरों से टकराने की बारम्बारता ले,
फूलों से खुशबु ले, रंग ले, कोमलता ले,
बचपन से अबोध् ले,
यायावर रूक मत
जीवन चल रहा है
तुम से पहले भी,
पंछियों की उड़ान से ऊपर
चांद की रोशनी के भीतर
जीवन मिल चुका है
तू बस कर मौन का आह्वान
    कर दे मौन का आह्वान.....।


वो दिन अच्छे थे


वो दिन अच्छे थे जब हम खुद को भूले थे
मदहोश समां था हम खोने लगे थे।
वो मुहब्बत की सदाएँ इंतजार की तलखियाँ
फिर किस्सों के बहाने मेरे दिल को टटोलना
हम चुप थे मगर इकरार होने लगे थे।
अजब नशा था आवाज का भी
दिल तक उतरती हर बात का भी
क्या अदाज था मेरा क्या उसका बयाँ था
हम साथ साँस भर कर जीने लगे थे।

हम लोग कवि हैं

हम लोग कवि हैं
लोग हमें गाफिल कहते हैं,
वो कहते हैं जिंदंदगी को ज़रा तरीके से जियो
हम कहते है हम तो सफर करते हैं।

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

चर्चित कहानी बनाम प्रिय कहानी - मामला आगे बढ़ेगा अभी : चित्रा मुद्गल

यह अक्सर देखा गया है कि हिंदी में कोई एक कहानी किसी लेखक के साथ कुछ इस तरह बावस्ता हो जाती है कि जहां कहीं भी उस लेखक की चर्चा होती है वही एक कहानी संदर्भ के रूप में सामने आती है। जैसे भीष्म साहनी के साथ ‘चीफ़ की दावत’, अमरकांत के साथ ‘डिप्टी कलेक्टरी’, मार्कंडेय के साथ ‘गुलरा के बाबा’ आदि। यह एक लंबी शृखंला है। इस प्रवृत्ति के कारण लेखक की शेष अनेक सक्षम रचनाएं अचर्चित रह जाती हैं। यह भी जरूरी नहीं होता कि अति चर्चित कहानी ही लेखक की प्रिय कहानी भी हो। इस विरोधाभास को दृष्टिगत रखते हुए हम एक नए स्तंभ की शुरुआत कर रहे हैं—चर्चित कहानी बनाम प्रिय कहानी। स्तंभ की शुरुआत कर रहे हैं— सुपरिचित कथा लेखिका चित्रा मुद्गल की कहानी—‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ के साथ। इस परिचर्चा में चित्रा मुद्गल के अतिरिक्त भाग ले रहे हैं विश्वनाथ त्रिपाठी व शंभु गुप्त।



Chitra Mudgal is one of the leading literary figures of modern Hindi literature.



आज आपके लिए शब्दांकन पर वर्तमान साहित्य, फरवरी, 2015 से कहानी प्रकाशित की जा रही है आगे चित्रा मुद्गल, विश्वनाथ त्रिपाठी व शंभु गुप्त के लेख -
* ‘मामला आगे बढ़ेगा अभी’ बहुत प्रिय है मुझे/ चित्रा मुद्गल,
* निम्नवर्गीय जीवन का यथार्थ/ विश्वनाथ त्रिपाठी और
* सत्ता और विमर्श के अंतर्संबंधों की रवायत/शंभु गुप्त, भी प्रकशित किये जायेंगे


भरत तिवारी

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मामला आगे बढ़ेगा अभी

चित्रा मुद्गल

गेट से लगी गुमटी के भीतर जंग खाई कुरसी से डंडा टिकाए, खाकी वर्दी में मीठी ऊंघ, ऊंघ रहे चौकीदार तावड़े गाली-गलौज भरे शोर ने सहसा हड़बड़ा दिया। कानों पर विश्वास करने के लिए उसने अपने शरीर को सप्रयास समेटा! फिर न खुलने के लिए जिद्दिया रही पलकों को पटपटाया और शोर को समझने की कोशिश की। वास्तव में शोर हो रहा है। कोई सपना नहीं देखा उसने। ऊंघ अभी भी उसकी रानों और जूतों में कैद पंजों में दुबकी हुई उसकी अलसाई देह से मुक्त होने को राजी नहीं थी।

शोर कुछ और स्पष्ट हुआ। गालियों के कुछ कतरे हवा का रुख गुमटी की ओर होने के साथ ही इधर उछल आए। साथ ताल देती-सी तीखी ‘ताड़... ताड़’। किसी पतरे को पीटने जैसा स्वर...

दिमाग सन्न-से चौंका। पतरे पर हो रही चोट ने एक पल को संभ्रम पैदा किया। खालिस र्इंट-गारों की इमारतों के बीच पतरा आया कहां से? कुरसी पीछे खींचकर वह फुर्ती से खड़ा हो गया। स्वत: से बुदबुदाया, ‘‘कहीं से पन आया हो! जो हो रहा पक्का अपनाच कॉलोनी में... बाप रे...!’’ उसने भुजाएं मरोड़कर सुस्ती की आखिरी किस्त झटकी और गुमटी से बाहर निकल आया। सहसा खयाल आया कि जरा वक्त पता कर ले। बार्इं कलाई पर बंधी धुंधले डायलवाली घड़ी उसने गौर से देखी। डेढ़ बजने को था। इतनी रात गए यह शोर...?

ठमककर उसने शोर की दिशा में टोह ली। शोर उसे तीन नंबरवाली इमारत के बेसमेंट से आता हुआ महसूस हुआ। गेट से तीन नंबरवाली इमारत का फासला बमुश्किल तीन-चार मिनट पैदल का होगा। वह हुड़ककर सरपट भागा। नीचे वाले घरों में शोर पहुंच चुका था। कुछ फ़्लैटों में जगाहट हो चुकी थी। कई सोई बालकनियों की रोशनियां उसके दौड़ते-न-दौड़ते जग उठीं। कुछ प्रश्न अकुलाकर उसकी ओर कूदे।

‘‘गुरखा... क्या हुआ?’’

‘‘कौन गाली बक रहा है?’’

‘‘कोई क्या तोड़ता? हम सोने को नई सकता?...’’

उसने रुककर किसी को कोई जवाब नहीं दिया। पर जैसे ही वह तीसरे नंबरवाली इमारत के बेसमेंट में दाखिल हुआ, सामने का दृश्य देख उसकी आंखें फट गर्इं।

सामने मोट्या था। मोट्या के हाथ में एक लंबी लपलपाती सरिया थी। उसी सरिये से वह सक्सेना सा’ब की झक्क सफेद ‘टोयटा’ पर निर्ममता से प्रहार किए जा रहा था। साथ जुगलबंदी करती भद्दी, अश्लील गालियों की बौछार। पहले से ही सहमे खड़े चार-पांच लोगों की उपस्थिति से लापरवाह मोट्या की नजरें जैसे ही उस पर पड़ीं, उसने पलटकर सरिया उसकी ओर तान ली, ‘‘आगे नहीं बढ़ना हो.. नई तो खोपड़ी तुकड़े-तुकड़े करके छोडूंगा! बोत अच्छा घर में नौकरी लगाया! अब्बी जाके बो बड़ा आदमी को बोल?... बोल उसको अबी निच्चू उतर के आने कू? कुतरे का औलाद नई मैं गर मादर... को खल्लास नई किया... धक्का देके निकाला न मेरे कू दरवाजे से? काय कू? पूरा पगार मांगा न इसी वास्ते? ...काट। बोलाना अबी अच्छा तरीके से खाड़ा काट। देखता मैं। बरोबर देखता। भोत धांधल सेन किया। अब्बी सिद्धा होएगा वो सेठिया!’’

मोट्या कुछ डग पीछे हटकर फिरकी-सा घूमा और अपनी पूरी ताकत निचोड़ सरिया कार की ‘विंडस्क्रीन’ पर दे मारी। ‘छन्नाक!’ का शोर उठा। किरचे बिखरीं नहीं, मसहरी की शक्ल में टंकी रह गर्इं। गाड़ियों के सहारे टिके हुए लोग मोट्या का यह विध्वंसक रूप देख भयभीत हो उन्हीं गाड़ियों की आड़ में दुबक गए। वह अपनी जगह पर से बिना हरकत किए चीखा, ‘‘मोट्या...!’’ उसके दांत तनाव से भिंच गए। भिंचे दांतों के सुराखों से गुजरती सिसियाती आवाज में उसने मोट्या को चेतावनी दी, ‘‘फेंक दे सरिया... बेअकल.... मैं बोलता फेंक दे, नई तो सक्सेना सा’ब तेरी बोटी-बोटी अपने जाड़िया कुत्तों को खिला देगा...।’’

‘‘चुप बे चम्मच!’’ मोट्या ने होंठों पर बजबजा आए थूक को ‘पिच्’ से बगलवाली फिएट पर थूका! फिर गरदन को झटका देकर आंखों तक छितरा आई लटों को पीछे फेंकने की कोशिश की, ‘‘धौंस नहीं खाने का मैं।... बोत चमकाया इस साली की बाडी को... अब्बी देख हाल! अक्खा कॉलोनी उठ गया, वो सोता क्या उप्पर? नर्इं... सोता नई, डर के ऊप्परच बेइठा! आने तो दे निच्चू। खोपड़ी नर्इं तोड़ा उसका तो? वो जाड़िया मेमसा’ब पन आएगी न, मैं उसको भी नहीं सोड़ेगा... नई सोड़ेगा!... सा’ब के सामने कइसी भीगी बिल्ली सरखा बइठी होती? बोलने को नई सकती? ताप (बुखार) में होता मैं?’’

मोट्या गाड़ी का पोर-पोर पीटे डाल रहा था। जैसे ही वह उसे धरद बोचने के लिए पैंतरा बदलता, पता नहीं कैसे उसको आभास हो जाता और वह पलटकर उसके सामने सरिया तान लेता। निरुपाय वह सिर से लेकर पांव तक सिवा कांपने के कुछ नहीं कर पा रहा था।

कितने नौकर काम करते हैं इस सोसाइटी में। रोज निकाले जाते, रोज रखे जाते। अक्सर यहां काम करने वाले लोगों से ही नए नौकर ढंूढ़कर ला देने के लिए कहा जाता। उससे भी कहा गया। न जाने कितने बाइयों और छोकरों को उसने किसी-न-किसी के घर काम पर रखवाया। ऐसा दु:साहसी विद्रोही स्वरूप किसी का नहीं देखा ज्यादतियों का रोना सभी रोते। मगर मुंह पर उंगली दिए एक सीढ़ी छोड़ दूसरी पकड़ लेते। समझते, जल में रहकर मगरमच्छ से वैर संभव नहीं। प्रेत-पिशाच लग गया इस हरामखोर को या मगज फिर गया? सा’ब लोगों का गुस्सा पता नहीं अभी इसको। गाड़ी की दुर्दशा देखकर सक्सेना सा’ब पगलाया सांड़ हो उठेगा... नक्कीच।

वह मोट्या की दुर्दशा की कल्पना कर सूखे पत्ते-सा कांप उठा। कैसे रोके नादान को? हाथ धरने दे तब न!

...मोट्या के बूढ़े नाना का मिचमिची आंखोंवाला झुर्रियों पटा तांबई करुण चेहरा तावड़े की आंखों के सामने कौंध गया...

पेरी क्रास रोड के फुटपाथ पर खिले गुलमोहर के छांवदार पेड़ के नीचे, एक जर्जर छतरी को भारी पत्थर के सहारे अटकाए, टाट के मटमैले टुकड़े पर चमड़े की कतरनों का ढेर पसारे, जंग लगे डब्बे में कील-कांटे सरियाए, बूढ़ा मोची वहां राहगीरों की चप्पलें-जूते गांठा करता। उस दिन उसकी बरस-भर पुरानी कोल्हापुरी चप्पल का अंगूठा बीच रास्ते में उखड़ गया और मोची की तलाश में इधर-उधर भटकती उसकी नजर अचानक मोट्या के नाना पर पड़ी। वह पांव घिसटता सड़क पार कर उसी के पास चप्पल बनवाने पहुंच गया। बूढ़े ने छूटते ही पूछा, ‘‘सिलाई मारूं कि किल्ला ठोकंू?’’

‘‘सिलाई मारना।’’ उसने मजबूती के खयाल से उसे हिदायत दी। बूढ़े ने डोरा खोजते हुए पूछा, ‘‘आप साब मिलिट्री में काम करते?’’

‘‘वाचमैन हूँ।’’ उसने गर्व से अपनी खाकी वर्दी को आत्ममुग्ध नजर से छुआ और बगैर बूढ़े की जिज्ञासा किए अपने बारे में उसे बताने को उत्सुक हो आया कि वह पच्चीस-पच्चीस माले की गगनचुंबी इमारतों वाली कॉलोनी में वाचमैन है। खूब मोटे सेठों की रिहाइश है। शत्रुघ्न सिन्हा और मौसमी चटर्जी भी वहीं रहती हैं। ‘‘मौसमी मेरे को भौत मान देती। उसके घर बहादुर को मैंने काम को रखा।’’ तावड़े की ऊंची पहुंच सुनकर बूढ़ा उसकी बातों से प्रभावित हुआ। इसका अंदाजा तावड़े को इस बात से हुआ कि बूढ़े ने अंगूठे की मजबूत सिलाई के उपरांत चप्पल की अन्य तनियों को पूरी ताकत से खींच-खींचकर उनकी मजबूती परखी और बगैर उसकी इजाजत लिए उन तनियों पर भी एकाध टांके लगा दिए जो अपेक्षाकृत कुछ कमजोर लगीं और किसी भी समय धोखा दे सकती थीं।

‘‘कितना कमा लेते दिनभर में?’’ उसने मात्र अंगूठा गंठवाया है पैसे भी वह अंगूठे के ही देगा। सोचते हुए परोक्ष में उसने स्वर में सामर्थ्य भर सहानुभूति उड़ेलकर बूढ़े से पूछा।

‘‘कमाई किदर साब?’’ स्वर में मिचमिची आंखें उसकी ओर कष्ट से उठाकर बूढ़े ने प्रतिप्रश्न किया, ‘‘बोत-मुश्किल से दोन-ढाई किल्ला-कांटा का खर्चा निकाल करके बचता। ऐरियाच ऐइसा। पैसे वाले साब लोग चप्पल-जूते मरम्मत नहीं करवाते... टूटे कि ताबड़तोड़ नया खरीदते। ताकत होती तभी मैं फेरी लगाता होता। जूना-पुराना चप्पल-जूता खरीदकर उसका मरम्मत-बिरम्मत करके स्टेशन रोड का फुटपाथ पर बेच लेता होता। ऐसा बनाता होता... ग्राहक को एकदम नया सरखा दिखता।’’

‘‘कमाई तभी होती... अब्बी तो खाने का पन नर्इं पुरता।’’ बूढ़े ने नि:श्वास अपने पैबंद उघाड़े और चप्पल उसके पांव की ओर बढ़ा दी। आगे बोला, ‘‘जास्ती चलने-फिरने को नई सकता न... इसी के वास्ते इदरीच बैठता...’’

तनिक सहानुभूति दिखाने पर बूढ़े ने यह भी बताया कि गुजारा होता नहीं, करना पड़ता है। घर पर एक नाती है। पंद्रह का हो रहा, काम-धाम कुछ करता नहीं। बेटी थी उसकी मां नई रही। तानी जन्मते ही दामाद ने उसे छोड़कर दूसरी शादी बना ली। जवान बेटी कब तक सिर पर बैठाए रखता। बिरादरी के एक दोहाजू लड़के के संग उसे बैठा दिया। दोहाजू नौवश (दूल्हा) बच्चा रखने को राजी नहीं हुआ, सो नाती को उसे अपने ही पास रखना पड़ा। नाम है मोट्या। बड़ी कोशिश से उसे ‘मुनसीपालिटी’ की शाला में छठी ‘किलास’ तक पढ़ाया। आगे वह पढ़ने को राजी नहीं। शाला से भाग आता। एकाध घर में भांड़ी-कटका के काम पर रखवाया मगर हर बार काम छोड़-छोड़ घर बैठ जाता। अड़ा हुआ है कि औरतवाले काम वह नहीं करेगा। बूढ़े ने बड़े जतन किए कि जूते गांठना उसे दुनिया का सबसे घटिया काम लगता है। बूढ़े ने बड़े जतन किए कि वह डब्बा-बाटली खरीदने और बेचने के धंधे में ही लग जाए, पर वह भी एकाध रोज भटक- भुटककर छोड़ बैठा। यह कहकर कि डब्बा- बाटली का धंधा बहुत मंदा चल रहा है और मुनाफा एकदम नहीं। ऊपर से लोग स्वयं ही महीनों का भंगार (कबाड़) इकट्ठा कर उसे गाड़ी से भरकर, सीधा दुकान पर ले जाकर बेच लेते हैं। ‘उधर मुनाफा जास्ती मिलता! दस पैसा भी काय कू छोड़ें? पेट्रोल मंगता तो फुंकने दो न!’’

‘‘समझ नहीं पड़ता कि छोकरे के नसीब में क्या है?’’ बूढ़े ने उसके हाथ से जो दे दिया सो लेते हुए भर्राए गले से अपने बेबसी जाहिर की और उसके पांव में चप्पल फंसाते न फंसाते एकाएक चिरौरी-भरे स्वर में हाथ जोड़ गलगलाया, ‘‘बोत मेहरबानी होगी साब... छोकरे को किदर भी काम को लगाओ!’’

बूढ़े की प्रार्थना के साथ ही अचानक उसे सक्सेना साब का आग्रह याद हो आया। जिसे वे गेट से निकलते हुए, उसका सैल्यूट स्वीकारते पिछले पांच-छ: दिनों से लगभग रोज ही दोहरा रहे थे कि उन्हें एक गाड़ी धोनेवाले लड़के की सख्त जरूरत है, जो टाइम का पाबंद हो। यानी उनके निकलने से पूर्व ही उन्हें उनकी दोनों गाड़ियां धुली-धुलाई लकदक मिलें। जिसमें से सफेद ‘टोयटा’ उनकी है और उसी का इस्तेमाल वे अपने लिए आने जाने के लिए करते हैं। ‘प्रीमियर पद्मिनी’ उन्होंने अपनी मेमसा’ब के उपयोग के लिए रख छोड़ी है। उसमें सफर करना उनकी शान के खिलाफ है। ‘टोयटा’ गैरेज में हो तो मजबूरी होती है।

गाड़ी धोनेवालों की वैसे कॉलोनी में कोई कमी नहीं। पर सुबह सभी को एक ही साथ, एक ही समय अपनी गाड़ियां धुली-धुलाई चाहिए। यह काम अधिकतर वहीं काम करने वाला रामा करता। एक साथ कई-कई घरों की गाड़ियां धोने का काम पकड़ लेने के चलते अक्सर गाड़ियां समय से नहीं धुल-पुंछ पातीं। पिछले दिनों रामा को सक्सेना सा’ब ने असंतुष्ट हो काम पर से निकाला इसी वजह से। उनके निकलने का समय हो जाता और रामा बाल्टी और पोंछा लिए गाड़ी पर फटका फेर रहा होता। बगैर धुली गाड़ी में जिस दिन भी वे फैक्टरी पहुंचे, कोई-न-कोई लफड़ा वहां मौजूद पाया।

उसने सोचा, परिवार के चप्पल, जूते आए दिन घिसते-फटते रहते हैं। बूढ़ा लिहाजदार है। उसने बूढ़े से कह दिया कि कल ठीक नौ बजे सुबह वह उसे मोट्या के साथ इसी जगह उसकी प्रतीक्षा करता हुआ मिले।

बूढ़े मोची ने कुल जमा चार दांतों में गद्गद् होते हुए उसे बहुत सारे आशीष वचनों से लाद दिया...

चोर बाजार से उन्हीं के स्तर की टी-शर्ट खरीदकर पहने, दीनहीनता से कोसों दूर मोट्या से मिलकर सक्सेना सा’ब काफी प्रसन्न हुए।

तावड़े और मोट्या दोनों को ही उन्होंने आश्वस्त किया कि सामान्यत: कार धोने के लिए जितनी पगार इस कॉलोनी में औरों को मिलती है उससे वे पचास रुपए ऊपर देंगे इस शर्त पर कि मोट्या औरों का काम चोरी-छिपे नहीं पकड़ेगा। नहीं पकड़ेगा तो उसकी गुजर कैसे होगी? तो गाड़ियां धोकर किसी का पेट भरा है? दूसरों का काम करने देने में उन्हें आपत्ति है तो शेष समय वे उसे किसी और काम में लगा दें!

ठीक है। कुछ रोज वह ऊपरी घर के कामों में मदद कर दे। उसके सौ रुपए वे अलग से दे देंगे। साथ ही उन्होंने यह प्रलोभन भी पेशगी टिका दिया कि मोट्या अगर उनके यहां ईमानदारी से डटकर काम करता रहा और टिका रहा, वे उसे साल-डेढ़ साल बाद निश्चय ही अपनी फैक्टरी में लगवा देंगे। तब उसे ढाई सौ रुपए महीने पगार मिला करेगी। मगर ध्यान रहे। अपशुकन के अलावा प्रतिष्ठा का प्रश्न है। अन्यों की दुहाजू गाड़ियां उनकी ‘टोयटा’ के मुकाबले जगमगाती-इतराती गेट से तैरती न निकलने पाएं। क्रीम- पालिश की कमी नहीं। जी भरकर इस्तेमाल करे।

मोट्या भी मर्दों वाले काम पाकर खुश हुआ।

बूढ़ा उसके एहसान की दुहाई देता न थकता। जब कभी तावड़े की घिसी चप्पल खस्ताहाल जूतों का तलुवा उखड़ता, लाख ऊपरी आग्रह के बावजूद बूढ़ा उससे बनवाई न लेने की हठ न छोड़ता।

‘‘तुम मेरा छोकरा सरखा... बोत-बोत उपकार किया अपने ऊपर... मोट्या काम से बौत खुश है’’ वह स्पष्ट लक्ष्य करता कि कृतज्ञ बूढ़े की चीकट-धोती का एक छोर अनायास उसकी मिचमिची आंखें सोखने लगता। अभिभूत तावड़े का चेहरा कड़क चाय-सा रंग पकड़ लेता।

उस रोज... उसकी दिन वाली ड्यूटी थी। कोई बारह-साढ़े-बारह का समय रहा होगा। सहसा उसकी नजर तेजी से गेट से बाहर होते मोट्या पर पड़ी। उसने गुमटी के भीतर से ही उसे गुहार लगाई, ‘‘कहां लपका जा रहा है, हां। दिखता नहीं आजकल?’’

मोट्या ठिठककर पलटा और आंखें चुराता हुआ उसके करीब आकर खड़ा हो गया, ‘‘इदरीच... थोड़ा काम है।’’

‘‘बूढ़ा बाबा कइसा है? आजकल मैं न्यू-टाकीज के पीछे से निकलकर ड्यूटी को आता...।’’

‘‘मस्त।’’

‘‘और तू?’’

‘‘मैं पन मस्त!’’ मोट्या संक्षिप्त उत्तर दे चलने को तत्पर हुआ। उसने स्पष्ट लक्ष्य किया कि वह कहीं जाने की हड़बड़ी में उससे ‘गप्प’ के मूड में नहीं है। वह उससे बतियाने को उत्सुक था। उसके सा’ब और उनकी मेमसा’ब के दरम्यान चल रहे मनमुटावों के विषय में भेद लेने की खातिर। इधर कॉलोनी में उड़ा हुआ था कि सक्सेना सा’ब किसी शायरा के चक्कर में हैं और दूसरी शादी करने के लिए मेमसा’ब से अलग होना चाहते हैं। मगर मेमसा’ब उन्हें तलाक देने को राजी नहीं।

‘‘चलता मैं... जरा घई (जल्दी) में है।’’ मोट्या ने बेसब्री दर्शाई।

‘‘ठैर ना, काय की घई?’’ उसने मोट्या के कंधे से लटका एयरबैग खींचकर उसे रोका, ‘‘इतना बड़ा बैग ले के...?’’

‘‘मेमसा’ब ने ‘माडर्न वाइन शाप’ से ताबड़तोड़ एक क्रेट चिल्ड बियर लाने को बोला, बोईच इसमें भरके लाएगा। आज किट्टी पार्टी है। बोत मेमसा’ब लोग घर में आया। मेरे को देरी होयेंगा न तो बोत वादा होयेगा।’’ वह लगभग अपने को छुड़ाता हुआ तीर-सा गेट से बाहर हो गया।

वह अनायास अपने चेहरे पर फैलती अर्थपूर्ण मुस्कराहट को बड़ी देर तक खुदी हुई महसूस करता रहा।

दो-ढाई घंटे के उपरांत... पार्टी के तामझाम से निवृत्त होकर मोट्या उससे मिलने आया तो उसकी आंतरिक प्रसन्नता पके गुलरों सी दरकी अनुभव हुई। खोदने पर उसने बताया कि दोपहर में वह पूरे समय मेमसा’ब की सेवा में होता है। सिगरेट खत्म हो गई तो ला देना। बियर के क्रेट लाना और फटाफट बोतलों को ठिकाने लगाना। ‘नीलम’ से सींक कबाब या ‘फिश रोल्स’ ले आना। लिकिंग रोड जाकर ब्यूटी आर्ट में मेमसा’ब के कपड़े धोने के लिए डाल आना आदि। मेमसा’ब दोपहर का खाना ही उसे नहीं खिलातीं, खासी टिप भी थमाती रहती हैं। पूरे पैसे वह ईमानदारी से बाबा के हाथ में रख देता है। उसे जरूरत ही नहीं होती। मेमसा’ब ने एक हिदायत जरूर दे रखी है कि यह सब उनका व्यक्तिगत मामला है। किसी को उनकी दिनचर्या की कानोंकान खबर नहीं लगनी चाहिए।

‘‘फिर अपने को क्या? अपने को फकत अपने काम से मतलब!’’ मोट्या ने सयानेपन में डूबकर टिप्पणी की। हालांकि उसे वह घर का सारा कच्चा-चिट्ठा ब्यौरेवार बता गया। मगर वह शायद इसलिए नि:संकोच हुआ कि उसकी नौकरी लगी ही उसके प्रयत्नों से थी। और वह किन्हीं भी परिस्थितियों में उसका अहित नहीं चाहेगा। मेमसा’ब की घरेलू अशांति से मोट्या विचलित नजर आया। मोट्या की बातों से यह भी जाहिर हुआ कि उसके मन में मेमसा’ब के प्रति सम्मान ही नहीं, ममत्व भाव भी पैदा हो गया है और विरोध में उतनी ही तीव्र सा’ब के प्रति प्रतिशोधी कड़वाहट।

उसने पहुंचे हुए अनुभवी की तरह गुरु-मंत्र पिलाया, ‘‘ठीक कहता है तू, तेरे को क्या? हां... फकत काम से मतलब, पगार से मतलब। किसी के लफड़े में नर्इं पड़ने का। हां! अगर ये बिल्डिंग में रहने वाले मियां-बीवी अलगीच होते। इनका कोई पन काम एक-दूसरे की मालुमात से नर्इं होता। फकत इतनाच कि ये बीबी हैं अऊर एकच घर में रहते।’’ उसने मोट्या के निश्छल किशोर मन के अभावों और उसकी ममत्व की प्यास को, मेमसा’ब की ओर उन्मुख न होने देने के उद्देश्य से चेतावनी दी, ‘‘नौकर घर-घर नाता जोड़े तो पिच्छु वो नौकरी छूटने पर जिंदा नर्इं बचने का?’’ मोट्या उसकी सीख को बेअसर भाव से मुंह बाये खामोशी से सुनता रहा।

आठ-दस दिन मुश्किल से हुए होंगे कि गेट पर उसके सैल्यूट की उपेक्षा करते हुए सक्सेना सा’ब ने सख्त आवाज में उससे पूछा, ‘‘मोट्या कहां है?’’

वह कार की खिड़की से तनिक बाहर को झांकती उनकी अकड़ी गरदन के करीब आकर खड़ा हो गया विनीत सा। ‘‘काम पर नहीं आया क्या, सा’ब?’’

‘‘दो रोज से बास्टर्ड ने शक्ल नहीं दिखाई... लगता है हरामजादे को मेमसा’ब से जरा ज्यादा ही टिप मिलने लगी है... तभी याद नहीं रख पा रहा है कि मैं बगैर धुली गाड़ी के बाहर नहीं निकलता?’’

वह उनके खौलते क्रोध से सकपका-सा उठा। समझ में नहीं आया कि क्या कहे।

‘‘छोकरा सिद्धा है सा’ब... जरूर बीमार-वीमार पड़ा होएंगा। पता करता मैं...’’

‘‘पता करो!’’ उनका स्वर चट्टान पर हथौड़े-सा टनका। गाड़ी उसकी औकात रौंदती सर्र से गेट से बाहर हो गई।

वह मन-ही-मन ताव खाकर रह गया। अजीब हैं ये सा’ब लोग! एक तो इन्हें नौकर खोजकर दो ऊपर से उसका अता-पता भी रखो। कुछ हो गया तो सारा दोष उसी पर।

मोट्या के काम पर न आने की वजह उसे सरासर बूढ़े बाबा की अस्वस्थता लगी। वह आशंकित हो उठा। जरूर बाबा मरने-मरने को होगा। बूढ़ी हड्डियां आखिर कब तक घिसटतीं? नहीं तो मोट्या खाड़ा करने वालों में से नहीं। कम-से-कम वह मेमसा’ब को तो आकर बोल के जाता। कोई खबर नहीं, इसका मतलब है कि... और अगर सचमुच बूढ़े को कहीं कुछ हो गया तो मोट्या इस संसार में एकदम अनाथ हो जाएगा।..

मोट्या के अचानक अनाथ हो जाने की भयावह कल्पना से वह अन्यमनस्क हो उठा। मुश्किल से उसका घर खोज पाया।

जिस बात की आशंका थी उसके विपरीत, मोट्या को खटिया से लगा बुखार में तपता पाया। बाबा धंधा छोड़कर उसके सिराहने बैठा मिला। उसके माथे पर ठंडी पट्टियां चढ़ाता।

उसे देखकर निर्जीव से हो रहे मोट्या और चिंतित बाबा के चेहरे पर दिप्प् से रौनक फूटी।

‘‘मेमसा’ब बोत हैरान होगी न!.. बाबा से मैं बोला कि तुमको खबर देने से मेमसा’ब को पता पड़ जाएगा कि मैं ताप में हंू। पड़ेगा तो वो नक्कीच मेरे कू देखने कू आएगी... लई प्रेमालू हय वो.. पन बाबा... मेरे को छोड़ के हटताच नर्इं...’’

वह सकते में आ गया। मेमसा’ब के प्रति मोट्या की माय और विश्वास देख। बड़ी देर तक उसके निकट बैठा वह उसकी बीमारी और दवादारू के बारे में बाबा से बतियाता रहा। उसे ढांढ़स बंधाया। ‘फ़्लू कमजोर कर देता है। जबरदस्ती कुछ करने की कोशिश न करे। जल्दी ठीक हो काम पर पहुंचे। हिम्मत ही नहीं पड़ी कि सक्सेना सा’ब के चढ़े तेवरों के विषय में बता दे और यह भी कि जिस मेमसा’ब की याद में वह अधमरा हुआ जा रहा, वे एक बार नहीं बल्कि कई-कई बार उसके सामने से ‘सर्र’ से गुजर गर्इं। किसी ने पूछा तो वे हैं सक्सेना सा’ब। वह भी अपनी गरज के चलते! क्योंकि वे बगैर धुली गाड़ी के साथ घर से बाहर पांव नहीं देते।

... गाड़ी के न धुल पाने की नाराजगी के साथ-साथ उसे सक्सेना सा’ब के मोट्या पर अधिक भड़के होने की एक वजह और लगी जो उनके कटाक्षपूर्ण लहजे से साफ जाहिर हुई कि मोट्या के द्वारा मेमसा’ब की विशेष खिदमत उन्हें सख्त नागवार गुजर रही है...।

मोट्या की उम्र में कई छोकरे अनुभवों के आंवे में पक-तप के लाग-लपेट में न आते। मगर दस घरों का काम छोड़-पकड़ करते ही यह दुनियादारी उनमें रच, बस पाती। मोट्या का बमुश्किल यह दूसरा घर है। वह नहीं जानता कि इमारतों में रहनेवालों का घर कभी उसका अपना घर नहीं हो सकता। मोट्या की मेमसा’ब के प्रति प्रगाढ़ता पहले भी उसे अखरी थी और उसने उसे सतर्क किया था किंतु मोट्या के कोमल मन के मुगालते को दोबारा तोड़ना जरूरी लगा। सुबह सक्सेना सा’ब से हुई भेंट का विवरण उसने अनिष्ठा के बावजूद मोट्या का ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।

सुनकर मोट्या का चेहरा बुझ गया, ‘‘सा’ब तो एइसा हैइच पन... मेमसा’ब!’’

ललाई आंखें फेर टकटकी लगाए वह बड़ी देर तक छत के पतरे को ताकता रहा। मेमसा’ब उसे अपनी छोटी-सी जिंदगी में देखी गई उन तमाम औरतों से भिन्न लगीं, जो मोहल्ले के रिश्ते से उसे अपनत्व दे दुलारती रहीं... आंखों से छत का पतरा एकदम ओझल हो गया। इतनी लबलबा आर्इं, जैसे फूल खुंपटने को अपनी ओर लचाई हुई टहनी अचानक डाल समेत चरमरा कर पेड़ से अलग-हो गई।...

मेमसा’ब की बातें मथ रहीं। ‘‘मुझे तो बस कहने-भर को घर मिला है। यह सारी मौज-मस्ती तो वक्त कटी हैं... सा’ब कहने को पति हैं और मैं कहलाने की बीवी ... वे अक्सर जो देरी से घर आते हैं न; उसी छिनाल के फ़्लैट में रहते हैं। नया फ़्लैट, नई गाड़ी खरीद के दी है उसे। वही हरे रंगवाली गाड़ी!’’

‘‘शपथ किसी रोज ड्राइवर का आंख बचाकर मैं इंजिन में किलो-भर शक्कर डाल के छोड़ेगा... गाड़ी की छुट्टी।’’

उसकी बातें सुनकर मेमसा’ब खिलखिलाकर हंस पड़ी थीं, ‘‘तू इतना खयाल रखता है मेरा... तुझे तो मैं गोद ले लंूगी।’’...

वह उनके अपनेपन से खिल आया था। अक्सर छूट लेने लगा था उन्हें ‘मम्मी जी’ कहकर पुकारने की! आपत्ति नहीं की उन्होंने। कोई औलाद भी तो नहीं थी उनके!

... चलते समय उदास मन से मोट्या बोला कि वह सा’ब और मेमसा’ब को उसके बिस्तर से लगे होने की खबर कर दे और खबर न कर पाने की मजबूरी भी स्पष्ट कर दे। ठीक होते ही वह काम पर पहुंच जाएगा।

उसने सा’ब और मेमसा’ब दोनों को ही अलग-अलग खबर कर दी। सा’ब ने अविश्वास से ‘हुंह’ भर किया। मेमसा’ब उसके बुखार की बात सुनकर सचमुच चिंतित हो उठीं। ‘‘उससे कहना कि जब तक वह एकदम ठीक न हो जाए, काम पर न आए।’’ फिर आहिस्ता से आत्मीय स्वर में बोलीं, ‘‘दवादारू की खातिर रुपयों-पैसों की जरूरत हो मोट्या को तो ले जाना मुझसे।’’

दे देने और मांग लेने के लिए कहने में बड़ा फर्क है नीयत का! उसे मेमसा’ब की कुछ क्षण पहले की सहानुभूति घड़ियाली आंसू प्रतीत हुई। पर... मोट्या है कि मेमसा’ब पर अंकुआई अपनी आस्था को लेश मात्र इधर-से-उधर नहीं खिसकाना चाहता...

सातवें रोज मोट्या पूर्ववत् अपने काम पर पहुंचा तो वापसी में उससे मिलता हुआ गया। उसने मिलते हुए जाने के लिए कहा ही था; क्योंकि पिछले दिनों उसने दूसरे वाचमैन से सुना कि सक्सेना साह’ब को गाड़ी धोने के लिए नया छोकरा चाहिए उसे चिंता हुई। कहीं ऐसा न हो कि मोट्या काम पर लौटे और सक्सेना सा’ब उसे काम से बरखास्त कर दें। किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। बस, सक्सेना सा’ब ने उसे चेतावनी भर दी कि आइंदा अगर वह बीमार पड़े तो पहले से ही काम पर न आ पाने की खबर करवा दे ताकि वे अनावश्यक प्रतीक्षा न करें।

मोट्या की दिनचर्या ने हमेशा की तरह अपना ढर्रा पकड़ लिया। लेकिन पहली की रात को महीने का हिसाब लेकर वह घोर असंतुष्ट हो उसकी खोली पर पहुंचा। ठगे जाने की निस्सहायता अवमानना के आघात से छलनी हो अनायास उसकी अब तक कमजोर पीली आंखों में पिघलने लगी, ‘‘मेरा सात दिवस का खाड़ा (नागा) काट लिया... फरेब करके थोड़ी मैं घर पर मस्ती मारता होता!... खाड़ा के वास्ते मैं सा’ब से लड़ाई किया तो वो मेरे को झापड़ चढ़ा के दफा हो जाने कू बोला... धक्का मारके घर से बाहर कर दिया... मेरे को!.. सब समझता मैं... काय का वास्ते काम पर से हकाला सा’ब ने...’’

‘उस का मरजी होता.. मैं उसका रखैल का घर में चौबीस घंटे के वास्ते काम कू जाऊं... मैंने साफ ना पाड़ी होती... बोला होता, फकत गाड़ी धोएगा... उप्पर का काम करेगा... खाना-बीना नर्इं पकाएगा...’

जबी झापड़ मारा... मेमसा’ब पासमेच खड़ी होती... धक्का देके बाहर किया जबी पासमेच खड़ी होती... सा’ब का हाथ नई पकड़ने को सकती थीं? नई बोलने को सकती थी कि मैं ताप में होता? कितना काम मैं फोकटमेच करता होता?...

‘‘छोड़ न... जो हुआ सो हुआ... ये सा’ब लोगों से झगड़ा-बिगड़ा करके फायदा नर्इं...’’

‘‘मैं देखेगा... दूसरा छोकरा कइसा गाड़ी धोएगा, छूने को नर्इं सकता कोई गाड़ी को’’ एकाएक निरीहता झटक उसने चुनौती से भरकर कहा।

बड़े अपनेपन से तसल्ली देते हुए उसने समझाया, ‘‘एक काम छोड़ो हजार मिलता, काय को मगज खराब करता अपना?... मैं एकाध दिन में तेरे को नए काम पर लगाएंगा... ईमानदार नौकर का बोत डिमांड हय... छोड़... ये सा’ब लोग से उलझ के फायदा नर्इं... फिर मेमसा’ब का क्या? हय तो वो उनका बीवीच... कइसा बोलेगी सा’ब के खिलाफ? हांअ!... उनकाच पैसा पर मस्ती मारती न!... इतनाच तकलीफ है तो सा’ब को छोड़कर काय को नर्इं चली जाती?’’ वह सब समझ रहा था। सा’ब के क्रूर व्यवहार से मोट्या को जितना क्षोभ हुआ है, उससे कहीं ज्यादा ठेस लगी है मेमसा’ब की अप्रत्याशित लगातार चुप्पी से। चुप्पी का अर्थ है, वे भी गलत का साथ दे रही हैं!

मेमसा’ब के संदिग्ध व्यवहार की उसके द्वारा की गई आलोचना पर मोट्या पहली बार खामोशी साधे रहा। कुछ देर बाद उठा, कमीज की बांह से आंखें पोंछी, ‘‘चलता मैं।’’

उसने तो नहीं पर उसकी बीवी ने जरूर मोट्या से कुछ देर और बैठने का आग्रह किया और लगभग जिद-सी की कि काफी रात हो रही है। वह खाना खाकर जाए। पर मोट्या था कि बिल्कुल नहीं रुका। खोई-खोई-सी मनोदशा में लिपटा खोली से बाहर हो गया।— ‘बाबा राह देखता होएगा!’

...पिछली बातों और घटनाओं का क्रम अचानक हो रहे इस विस्फोट से जुड़ गया। वह चौंका।

उसके आसपास उबलती, खौलती, तमतमाती धमकियों की भीड़ इकट्ठी हो गई। वे धमकियां उसे ललकार रही थीं। धमका रही थीं। धिक्कार रही थीं। चुनौती दे रही थीं कि चौकीदार रखने का मकसद? एक मामलूी-सी छोकरा ढाई-तीन लाख की गाड़ी का भुर्ता बनाए दे रहा और वह है कि रात पाली के बावजूद आराम से गुमटी में खर्राटें भर रहा? अरे, इन लुटेरों की मिलीभगत है। इतनी बेरहमी से गाड़ी पीट डिब्बा बनाकर रख दिया छोकरे ने, अक्खा कॉलोनी को सुनाई दिया, ये हरामखोर कान में तेल डाल के सोता? डिसमिस करने कू मांगता सोसाइटी को... इतना पगार हम लोग गुरखा लोगों को काय के वास्ते देते? लुटने के वास्ते?

उसे आश्चर्य हुआ। मोट्या के हाथों में लपलपाते सरिये ने उपस्थित भीड़ को निष्क्रिय कर रखा था, पर उनकी जबानें बरछी- भाले सी प्रहार-पर-प्रहार किए जा रही थीं। किसी का साहस नहीं हो रहा कि चार फीट के बित्ते से छोकरे के हाथ से लपककर सरिया छीन ले। नुक्सान ऐन उनकी नाक के तले हो रहा परंतु जान-जोखिम में डालने का काम उन शूरवीरों का नहीं। ठीक ही तो कह रहे— चौकीदार काय के वास्ते रखा?

‘‘साले सब हिजड़े...।’’ मन ही मन उसने करारी गाली उछाली उन सबकी ओर और मोट्या को थोड़ा असावधान पाकर चील-सा झपटा उसकी ओर। मगर उसकी फुर्ती अपनी ओर पलटकर तन गए आक्रामक सरिये की वजह से किटकिटाती ठिठक गई। उसका खिसियाया चेहरा मोट्या पर बेअसरदार चेतावनियां उगलने लगा। उसके भीतर तमाम दस्तकें हो रहीं। ...किसको पकड़ना है उसे। मोट्या को? या मोट्या के बहाने अपने को? मोट्या कुशल लठैतों की भांति थिरक रहा... सरिया भांजता!

अचानक उसने सुना कि सक्सेना सा’ब घर पर नहीं। मेमसा’ब अकेली हैं ऊपर। मेमसा’ब इस उपद्रव की खबर पाकर हतप्रभ हो रहीं। किसी अन्य ने सक्सेना सा’ब को फोन कर इस वारदात की इत्तिला दी। सक्सेना सा’ब ने इधर के लिए निकलने से पहले पुलिस को फोन पर सूचना दे दी। मेमसा’ब को आश्वस्त करने के लिए कहा है कि उनसे कह दो कि वे घबराएं नहीं, वे अविलंब घर पहुंच रहे हैं।

मेमसा’ब, पुलिस और सक्सेना सा’ब के पार्किंग में पहुंचने से मिनट-भर पहले ही नीचे उतरीं। स्लीपिंग गाउन में। बदहवास-सी। सुर्ख आंखें फट गर्इं। ऊपर बैठे हुए संभवत: मोट्या की विध्वंसक कारगुजारी का उन्हें अनुमान नहीं हो पाया होगा कि इस हद तक वह गाड़ी को नुक्सान पहुंचा सकता है।

उन्होंने पूरी कोशिश के साथ पलकें झपका-खोलकर सामने पसरे अकल्पनीय दृश्य की वास्तविकता पर तोलने-परखने का प्रयत्न किया।

पल-भर में ही वे जैसे सारी स्थिति के प्रति सजग हुर्इं। और सबकी चेतावनी के बावजूद, सरिया ताने खड़े हुए मोट्या की ओर निडर- भाव से आगे बढ़ीं। लोगों के साथ-साथ वह भी आशंकित हो कांप उठा। मोट्या का रौद्र रूप आज मेमसा’ब का माथा फोड़े बिना शांत नहीं होने का। उसने स्पष्ट लक्ष्य किया मेमसा’ब की उपस्थिति से बेअसर मोट्या ने सरियावाला हाथ लगभग पूरी ताकत से आक्रामक मुद्रा में तान लिया। उसका चेहरा पसीने से लथपथ थर्राने लगा। बल्कि पूरी देह पत्ते की तरह कांपने लगी। अनहोनी में कसर नहीं!

दम साधे सारे लोग यह देखकर अचंभित हो उठे कि मेमसा’ब ने उसके निकट पहुंचकर आहिस्ता से उसके तने हुए हाथ से सरिया ले लिया। जैसे कोई सावधानीपूर्वक बच्चे के हाथ से तेजधार चाकू ले लेता है। मोट्या ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। झूली हुई बांहें और झुकी हुई गर्दन से पांवों के नीचे बिछी किरचों को घूरने लगा था अपने ही पांवों को, अनुमान नहीं हुआ।

‘‘इतनी हिम्मत कहां से आई रे तुझमें?’’ मेमसा’ब भर्राए कंठ से बुदबुदार्इं। मोट्या आंच पीती बर्फ-सा पिघलता हुआ अचानक घुटनों में मुंह देकर हिचकियां भरने लगा, ‘‘तुमने खाड़ा कटवा दिया न मेमसा’ब... अपने सामने चांटा मारने कू दिया न!... मैं... मैं..’’

उसे हथियार सौंपते देख भीड़ हिंसक हो उस पर टूट पड़ी।


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