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अनामिका की कवितायेँ — बस्ती निज़ामुद्दीन अंक-I | Basti Nizamuddin - Anamika

2:54 pm टिप्पणी करें


Basti Nizamuddin - Anamika

Amir Khusrow aur Puramzaak Aurten Sadak Ki (Ank -I)

बस्ती निज़ामुद्दीन — अनामिका (अमीर खुसरो और पुरमज़ाक औरतें सड़क की) अंक-I

बस्ती निज़ामुद्दीन — अनामिका

(अमीर खुसरो और पुरमज़ाक औरतें सड़क की)

अंक-I


उम्रकैद


किए-अनकिए सारे अपराधों की लय पर
झन-झन-झन
बजाते हुए अपनी जंजीरें
गाते हैं खुसरो
रात के चौथे पहर
जब ओस झड़ती है
आसमान की आँखों से
और कटहली चम्पा
कसमसाकर फूल जाती है
भींगती मसों में सुबह की।
अपनी ही गंध से मताकर
फूल सा चटक जाने का
सिलसिला
एक सूफी सिलसिला है,
किबला,
एक जेल है ये खुदी,
खुद से निकल जाना बाहर,
और देखना पीछे मुड़कर
एक सूफी सिलसिला है यही !


खुसरो की दरगाह

खुसरो के ही मजार के बाहर
बैठी हैं विस्थापन-बस्ती की कुछ औरतें सटकर!
भीतर प्रवेश नहीं जिनका किसी भी निजाम में -
एका ही होता है उनका जिरह-बख्तर।
हयात-ए-तय्याब, हयात-ए-हुक्मी !
            x      x
औलिया के मजार के झरोखे की
फूलदार जाली पर
क्या जाने कब से ऊँचा बँधा है जो
मन्नतों का लाल धागा,
मौसमों की मार सहकर भी
सब्र नहीं खोता !
ढीली नहीं पड़ती कभी गांठ उसकी !
उस गांठ-सी ही बुलन्द और कसी हुई बैठी हैं दरगाह पर
दिल्ली की गलियों की
बूढ़ी कुँवारियाँ,
विधवाएँ, युद्ध और दंगों के भेड़िया-मुखों की
अधखाई, आधी लथेड़ी
ये औरतें !
बैठी हुई हैं वे खुसरो के दरगाह के बाहर
जिनसे सीखी खुसरो ने
अपनी मुकरियों की भाषा।
घरेलू बिम्बों से भरी हुई
अंतरंग बातचीत की भाषा में ही
लिखी जा सकती हैं कविताएँ ऐसी
जो सीधी दिल में उतर आएँ
- सीखा था खुसरो ने
दिल्ली की गलियों में इन्हीं औरतों से।

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कहानी — चीख — उर्मिला शिरीष | Kahani — Cheekh — Urmila Shirish

8:25 am टिप्पणी करें

Painting by Tahir Siddiqui

चीख

— उर्मिला शिरीष

जब लड़की को होश आया तो वहाँ कोई भी नहीं था। काला सन्नाटा छाया था। मच्छरों की भिनभिनाहट तथा नमी की गन्ध कमरे में व्याप्त थी। बाहर बारिश थम चुकी थी, लेकिन पानी बहने की तेज आवाजें तथा टपटपाहट निरन्तर चल रही थी। सड़क पर लोगों का आना-जाना शुरू हो गया था। उसने आँखों पर हाथ फेरा... सो रही हूँ या जाग रही हूँ... कुछ भी समझ में नहीं आया क्षणों तक। किसी और दुनिया का रहस्यावृत आसपास ठहरा हुआ लगा... फिर जींस को पाँवों के नीचे खिसका देखकर बिजली-सा झटका लगा। उसने मन-मस्तिष्क को... अपने अंगों को टटोला। हाथ से सहलाया... खरोंचें... नाखून और दाँतों के निशान उभर आये थे... दर्द की तीखी धार फूट पड़ी, जैसे किसी कोमल हरी शाख में धारदार झुरी भोंक दी हो। वह चीख पड़ी जोर से... नहीं... नहीं... ऐसा नहीं हो सकता... मेरे साथ... यह स्वप्न नहीं है... यह... सब उसी के साथ घटित हुआ है... यह... सच... है - जागृतावस्था का सच। उसने सिर पर जोर-जोर से मुक्के मारे-क्या बेवकूफी है...? क्या सोच रही हो...? क्या थियेटर में बैठी हो... पिक्चरों के सीन... अवचेतन पर छाये रहते हैं... सो वही सब स्वयं के साथ घटित हुआ देख लिया है... मगर यह जगह... यह क्षत-विक्षत रूप... एक-एक दृश्य साफ दिखाई देने लगा... भयानक तेज बारिश हो रही थी। धरती और आकाश का रंग एक जैसा हो गया था... सामने खड़ा आदमी तक दिखाई नहीं दे रहा था। तेज हवा के थपेड़ों के कारण दो बार स्लिप होकर गिरते-गिरते बची थी। रोज की देखी-जानी पहचानी सड़कें थीं...। वही समय था जब वह बैडमिंटन की प्रैक्टिस करके लौटा करती थी। वही ऑफिस थे। वही घर थे... सोचा, थोड़ी देर के लिए खड़े हो जाते हैं, हालाँकि उस समय उसे माँ की हिदायतें भी याद आयीं कि कहीं रुका मत करो, मगर भीषण पानी में सड़क पर खड़े होने या गिरकर पड़े रहने से तो बेहतर था कि कुछ देर के लिए रुक जाए... और भी लोग खड़े थे... पानी थमने का नाम नहीं ले रहा था... सड़कों पर... पानी नालों की तरह बह रहा था... अँधेरा बढ़ता जा रहा था। उसका दिल घबराने लगा... चलना चाहिए... जो होगा सो देखा जाएगा... आज का दिन ही खराब है... उसने स्कूटर स्टार्ट किया, मगर वह नहीं हुआ।

“आप स्कूटर स्टार्ट कर देंगे...!” उसने एक आदमी से कहा जो कि रेनकोट पहनने के बावजूद पूरा भीग चुका था।

“प्लग में पानी भर गया होगा।”

“यहाँ फोन तो है...”

“सामने है...”

वह भागकर दूसरी तरफ गयी... मगर वहाँ दो लड़कों को... देखकर वापस लौट पड़ी, न जाने क्यों उसे वहाँ जाना ठीक नहीं लगा... वे लड़के उसके पीछे-पीछे आकर खड़े हो गये... अब वहाँ कुछ ही लोग थे... अचानक ही शटर गिरने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उसे लगा जोर से बादल गरजे हैं, कहीं बिजली गिरी है। घुप्प अँधेरा हो गया था। शटर बन्द क्यों की? खोलो, उसने दौड़कर शटर उठानी चाही, मगर मजबूत हाथों ने उसे अपनी तरफ खींच लिया जोर से, निर्ममता के साथ। उसकी आवाजें हाहाकार करती बारिश में विलीन हो गयीं। शब्द... नाले में गिरते पानी में बह गये... अथक संघर्ष करने के बाद भी वह स्वयं की रक्षा न कर सकी थी... तूफान में... उखड़े पेड़ की तरह ज़मीन पर पड़ी थी वह... निचोड़े गये फल के छिलके की तरह। उठने को हुई तो जाँघों के नीचे लगा किसी ने गरम सलाखें दाग दीं... बेसाख्ता चीख निकल पड़ी... उसे नहीं मालूम था कि यह चीख उसके जीवन को क्या से क्या बना देगी... क्या हुआ? वही चीख हवा के साथ लहराकर एक साइकिल सवार के कानों में पड़ी... थरथराती हुई शटर की मोटी चादर को भेदती हुई चीख ने उस आदमी को रुकने पर मजबूर कर दिया। पलटकर आया वह। कहाँ से आयी थी वो हृदय को भेदनेवाली चीख... क्षणों तक उसने इधर-उधर देखा... नजर... शटर पर जाकर ठहर गयी। ताला नहीं लगा है इसमें... इसी के अन्दर तो नहीं है कोई? उसने शटर उठायी।

“मुझे घर पहुँचा दो”। सामने बैठी... लड़की गिड़गिड़ाकर बोल रही थी... उसे डर था कहीं यह आदमी भी उसे घसीटकर जमीन पर न डाल दे। आदमी चकित-सा हैरान उसे देखे जा रहा था। इसी बीच “देखो क्या हो गया...” की उत्सुकता लिए और भी लोग आ गये थे... बारिश अब तक कुछ कम हो गयी थी।

“फोन नम्बर बताओ। कहाँ रहती हो?”

थोड़ी देर बाद ही पिता सामने खड़े थे। पिता को लगा एक्सीडेण्ट हो गया, मगर यहाँ तो कुछ और ही दृश्य था। उनके पाँवों से जमीन धसकने लगी, एक शिलाखण्ड चकनाचूर पड़ा था। लोगों की फुसफुसाहटें बढ़ती जा रही थीं, “वहशी थे साले। कौन थे? क्या किसी ने नहीं बचाया? अकेली लड़की को देखकर... अब क्या होगा? बेचारी! जिन्दगी बरबाद हो गयी इसकी तो।”

“आजकल की लड़कियाँ भी तो सुनती नहीं हैं। कहीं भी चल देती हैं।”

“कोई सोचकर चलता है कि ऐसा होगा...”

“अरे! ये तो अपने वर्मा साहब की लड़की है... हो गयी इज्जत बरबाद उनके खानदान की।”

पिता नजरें नहीं उठा पा रहे थे। होंठ मृतक के समान जकड़ गये थे। उन्होंने कार का दरवाजा खोला और तेजी के साथ लड़की को लगभग खींचते हुए-से बैठाकर- इतनी तेजी के साथ कार चलाकर ले गये, मानो इस जगह की धरती फटनेवाली हो। माँ तथा अन्य लोग गेट पर खड़े राह देख रहे थे। उन्होंने एकदम दरवाजे के पास गाड़ी अड़ा दी। वह लाँकती घिसटती हुई चल रही थी मुश्किल से... कुछ कदम चलकर भीतर पहुँचा जा सकता था। क्या हुआ? कहाँ चोट लगी? किसने किया एक्सीडेण्ट? अस्पताल क्यों नहीं ले गये... पूछते लोगों को यकायक ही आसमान को थर्रा देने वाली चीखें सुनाई पडऩे लगीं... अनियन्त्रित पागलों-सी आवाजें... लग रहा था नदी की वेगवती धारा हजारों फीट गहराई से जाकर गिर रही हो... वही घर्राता हुआ रुदन... सबके हृदयों में उतरता जा रहा था... सबके चेहरों पर बिजली तड़क गयी। बेचैन-से वे सब खिड़की से झाँकने लगे। लड़की की देह औंधी पड़ी थी। घायल चिडिय़ा की तरह तड़प रही थी वह... बहिन उसको दबाकर बैठी थी... समझते देर न लगी। आखिर दुनिया की बदसूरत सच्चाई सामने से... यातनादायी रूप में गुजरने लगी। आज किसी ने भी जाने की अनुमति नहीं माँगी। एक के बाद एक लोग चले गये। अफसोस और चिन्ता के शब्द जबान पर थे। आँखों में दया का भाव उमड़ आया था। बाहर अचानक घोर निस्तब्धता छा गयी थी। बड़े गेट पर ताला लगा दिया गया। कमरे का दरवाजा बन्द किया और फुल स्पीड पर पंखा खोल दिया। पंखे की ध्वनि पूरे कमरे में गूँज रही थी घर्र... घर्र... और दूसरा पंखा उनके अपने भीतर चल रहा था... साँय... साँय... सनन-सनन... हृदय के चिथड़े करता हुआ... “अब क्या होगा?...” उनका मन... उद्रभान्त था... मगर सामने पत्नी बैठी थी सिर झुकाये। पहाड़-सा बोझ उनके सिर पर रखा था। आँसुओं की धारा नि:शब्द बह रही थी। क्या इतना चुप होकर रोया जा सकता है? पूरा शरीर लकवाग्रस्त हो गया हो, ऐसा ही लग रहा था उनको देखकर। उन्होंने पाँव थपथपाएँ... ताकि वे हिलें, मगर... कोई हरकत न हुई उनके शरीर में... कहीं कुछ हो तो नहीं गया... सोचकर काँप गये वे...।

बहिन चाय बनाकर ले जा रही थी- फिर पानी... फिर कपड़े। घर में सभी गूँगों के समान बैठे थे... कौन बताये? क्या बताये?

“कौन थे? पहचान पाएगी?” भाई मुश्किल से बोल सका, उसके चेहरे पर लावे की तपिश और आँखों में लाल गोले फूट रहे थे। उसे लग रहा था... किसी फिल्म का घिनौना दृश्य उसकी चेतना पर चिपका हुआ है मगर... बहिन को सामने यूँ पड़ा देखकर... सच... मन को मथे दे रहा था।

“अभी कोई बात मत करो।” बहिन ने भर्राये कण्ठ से कहा। उसका शरीर सिहरन से भरा था और वह जो भी चीज उठाती थी, वह हाथ से छूटकर फिसल जाती थी या गिर जाती थी... लग रहा था महीनों बाद बीमारी से उठी हो।

अंधकार घुप्प और अवसादमय हो गया था। मेघ आकाश को आच्छादित किये हुए थे। कीड़े-पतंगे उड़-उड़कर लाइट पर मँडरा रहे थे। बारिश का पानी जगह-जगह भरा हुआ था... केंचुए-ही-केंचुए पड़े थे... लाल केंचुए... घर में मातम-सा सन्नाटा छाया था मगर मृत्यु के समय तो लोग परस्पर बात भी कर लेते हैं। मिलकर विलाप या शोक मनाते हैं, इस मातम में तो कोई किसी के साथ बैठ भी नहीं पा रहा था बात करना तो दूर...।

लगातार फोन की घण्टियाँ बज रही थीं। इस बार उन्होंने रिसीवर उठाकर रख दिया।

“रिपोर्ट करनी चाहिए।”

“बदनामी करवाने के लिए।”

“मेडिकल...?”

“शोभा (डॉक्टर) को फोन कर दो या ले आओ।”

“अब क्या होगा... पापा?” वह सिर पकड़कर बैठ गया... माँ का कलेजा फटा जा रहा था... वे अर्धमूर्छित-सी पड़ी थीं...।

“कुछ बताया...? इनको भी दिखा देना डॉक्टर को... कुछ हो ना जाए...”

“चीखती है, फिर चुप हो जाती है... सँभले तो... मैं डॉक्टर को लेने जा रहा हूँ।”

“कहा था मत भेजा करो। अकेली घूमती थी। जहाँ मन में आया चल दी। दुनिया खतरनाक है, लोगों का भरोसा नहीं रहा, मगर...” कहते-कहते उनके जबड़े भिंच गये। आँखें शून्य में टँग गयीं। पूरा भविष्य सामने आकर खड़ा हो गया। समाज के लोगों के बीच जाएँगे तो लोग क्या-क्या नहीं पूछेंगे...? कौन शादी करेगा...? कोई करेगा तो सामने वाला उसको एहसास करवाएगा कि तुम वह हो... फिर इसके बच्चों को भी पता चलेगा, बच्चे क्या कहेंगे? शादी न करें तो? बाहर भेज देंगे ऐसी जगह जहाँ कोई न जानता हो मगर कैसे? पूरा परिवार ही कहीं चला जाए... दूर... तब भी लोग कहेंगे वर्मा ने शहर इसलिए छोड़ा क्योंकि उनकी लड़की के साथ... उन्हें अपने सीने में कुछ उमड़ता-घुमड़ता-धसकता-सा लगा। वे जोर-जोर से साँस खींचने लगे... जोर-जोर से मालिश करने लगे, मेरी बच्ची! तेरा जीवन! मन चीत्कार उठा... दौड़कर बाहर गये... खुली हवा में, अंधकार निबिड़ था। सनसनाता हुआ। कितनी देर तक खड़े रहे। मन फडफ़ड़ाया, जाकर सांत्वना दें उसे। छाती से लगा लें। मगर उतनी ही तेजी के साथ पीछे पलट गये। धम से वहीं बैठ गये कुर्सी पर। खुली आँखों के सामने उन्होंने रात को बीतते हुए देखा...।

खबरें तो फैलनी ही थीं, सो सुबह से ही पारिवारिक-मित्रों का आना शुरू हो गया। मित्रों के चेहरों पर कशमकश के भाव थे। क्या पूछें, क्या बताये वाली मन:स्थिति थी।

“कुछ पता चला? रिपोर्ट करवा दी? जो होना था वो हो चुका। सवाल ये है कि बच्ची को कैसे सँभाला जाए। बहुत बुरा असर पड़ सकता है।”

“सामने दीख तो जाएँ सालों को गोली मार दें।”

“जितनी दुनिया आगे बढ़ रही है, उतनी ही जिन्दगी असुरक्षित होती जा रही है।”

“बहू-बेटियों की इज्जत सुरक्षित न रहे तो क्या फायदा?”

“उसकी तबियत कैसी है?”

“सदमें में है।”

“डॉक्टर को दिखा दिया?”

“रात में देखकर गयी थी।”

“कहाँ गयी थी?”

“खेलकर आ रही थी।”

“कितने थे...?”

एकाएक पूछे गये प्रश्न ने उनको भस्म कर दिया। जितनी बार प्रश्नों के तीर छूटते हैं- उतनी ही बार वे भस्म होकर मृतप्राय हो जाते हैं। झुकी आँखें न उठा सके। उठकर भीतर चले गये। मित्र ने अन्दर से आती कराहें सुनीं तो भागकर गये। अपने कहे शब्दों की धार उन्हें महसूस हुई।

“आप इतने कमजोर पड़ जाएँगे तो बाकी का क्या होगा? वह मेरी भी तो बच्ची है। मैं समझ सकता हूँ... सामना तो करना पड़ेगा आपको।” उनके कन्धों को थामकर समझाने लगे मित्र...

“क्या होगा उसका? कहाँ लेकर जाएँ?” उनकी आँखों से आँसू टपक रहे थे... पिता की मृत्यु पर भी आँखें सिर्फ नम हुई थीं, लेकिन अभी आँसुओं में डूबी थीं।

घर से कोई नहीं निकल रहा था। भाई ही अलबत्ता इस बीच एक-दो चक्कर लगाकर आया था उस जगह का। मिल भर जाएँ एक बार... मैं कैसी दुर्दशा... करूँगा उनकी। ऐसी जगह ले जाकर मारूँगा कि चील-कौए नौंचकर खाएँगे। मगर जब बाहर जाऊँगा तो लोग कैसे देखेंगे मुझे? क्या कहेंगे? नहीं, मेरे दोस्त ऐसे नहीं हैं, उनको भी दु:ख होगा। वे मेरा साथ देंगे। ये भी तो हो सकता है कि उन्हें कुछ पता ही न हो, मैं खुद होकर नहीं बताऊँगा। उसका पोर-पोर हजारों बिच्छुओं के मारे डंक-सा दुख रहा था... जहर पूरे शरीर में दौड़ रहा था। आँखों में नींद न थी। न खाना खाया जाता। कितना नाज था उसे अपनी बहिन पर। इतनी अच्छी प्लेयर। उसी ने तो जिद करके ज्वाइन करवाया था। अब क्या होगा उसका? वह चुपके से उठकर गया और झाँककर देखा। वह करवट लिए लेटी थी। और वक्त होता तो पीछे से जाकर एक मुक्का मारता। दिन भर की बातें बताता। उसकी बातें सुनता। उसकी सहेलियों के बारे में कुछ हँसी मजाक करता। वह कॉफी बनाकर देती। वह दो-चार नखरे दिखाता। कदमों की आहट रोके वह वहीं खड़ा रहा। आखिर हुआ क्या जो मेरे और उसके बीच इतनी दूरी आ गयी। मन किया दौड़कर गले लगा ले। पुचकार ले उसे, लेकिन पाँव बर्फ की तरह जमे रहे। अन्दर लोहा पिघलता रहा। गलता रहा। उसने सिर पकड़ लिया। चीखती-चिल्लाती बहिन उसके सामने पड़ी है।

अनजाने शरीर उस पर टूट पड़े हैं... उसके मुँह से अनायास निकल पड़ा- हरामजादों! कमीनों! जिन्दा नहीं छोडूँगा। मार डालूँगा... मार डालूँगा। वह आकर पलँग पर औंधा गिर पड़ा। सिर में तेज दर्द हो रहा था। लग रहा था गहरे घाव हो गये हैं। नसें फट जाना चाहती हैं। उसने पास पड़े दुपट्टे से सिर कसकर बाँध लिया। कानों में डूबता-चुभता कुछ सुनाई पड़ रहा था... “तुम्हारा इसमें क्या दोष है? सारा घर सभी लोग तुम्हारे साथ हैं। दुर्घटना थी। उनको तो सजा मिलेगी ही। मिलनी ही चाहिए।” बहिन समझा रही थी उसे। फिर उसने सुना निस्तब्ध-रात्रि के गहराते डूबते अंधकार में कुछ सिसकियाँ दीवारों से टकरा रही थीं।

न चाहते हुए भी घनिष्ठ मित्रों तथा सम्बन्धियों के दबाव में आकर पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज करवा दी थी। डॉ. शोभा ने रिपोर्ट दे दी थी। एस.टी.डी.-पी.सी.ओ. तथा शटर वाली जगह को पुलिस ने सील कर दिया था, क्योंकि वहाँ बैठने वाला लड़का फरार हो गया था। इन सब प्रक्रियाओं से गुजरते हुए लड़की प्रतिक्रियाविहीन माँसपिण्ड की भाँति जो जैसा कहता, करती जाती। मगर उसके गहरे में उतरकर हर पल, हर दृश्य बार-बार जी उठता था... कई बार तो सबकुछ स्वप्न प्रतीत लगता। कई दफे तो लगता जागेगी तो बहिन को बताएगी मगर फिर एहसास होता ये स्वप्न नहीं था, जागते... साँस लेते संसार में उसकी चेतना को इस सत्य का साक्षात्कार हो ही जाता...। उसका घर था। कमरा था, पोस्टर थे। चुप रहने वाली माँ थी, गूँगी बहरी-सी। भाई था जो हर पल बेचैनी और दावानल में सुलगता पूरे घर में घूमता रहता था। चक्कर काटता हुआ। कहाँ जाता था? कहाँ से आता था? किसी को खबर नहीं लगती थी... उसकी आँखों में ऐसी आग धधकती हुई दिखाई देती थी कि वह सिहर जाती थी।

खाना खाते वक्त वह गिलास पटक देता था या थाली या अपने ही कपड़ों को गोल-गोल लपेटकर उछाल देता था। अनायास ही किसी कीड़े या चींटे को पाँव से इतनी शक्ति के साथ रगड़ देता, जैसे उसका नामो-निशान मिटा देना चाहता हो। आत्मा पर निराशा तथा सन्ताप की परतें जमती जा रही थीं। कितना कुछ कहना चाहती है वह मगर होंठ ही नहीं खुलते। बोलने को होती तो जीभ ऐंठने लगती- जैसे अन्दर से किसी ने एक सिरा पकड़ लिया हो। वहीं आँखें हैं... मगर इन आँखों में उन्हीं वीभत्स दृश्यों की भीड़ लगी रहती है... जैसे ही बाहर की दुनिया का ख्याल आता है, अनेक चेहरे सामने आ जाते... बैडमिंटन खेलने के लिए जाएगी तो सब पूछेंगे- क्या हुआ था? क्या बताएगी वह? अगर बताएगी तो फिर पूछेंगे कितने थे वे? वह आँखें बन्द कर लेती, मगर फिर दूसरे चेहरे आ जाते। कॉलेज जाएगी तो वहाँ दोस्त पूछेंगी- क्या हुआ था? क्या तूने विरोध नहीं किया? भाग जाती। रुकी क्यों? तू इतनी कमजोर कैसे हो गयी? कैसे थे? कितने थे?... पूछते वक्त कैसे चेहरे बनेंगे उन सबके... दया-सहानुभूति उत्सुकता... फिर... मजाक... फिर... जहाँ से निकलेगी वहाँ के लोग उसे देखकर कहेंगे, यह वही लड़की है जिसके साथ... ओ भगवान! क्या इसके अलावा... कुछ नहीं रहेगा मेरा अस्तित्व... एकमात्र उसकी पहचान का केन्द्रबिन्दु... यही घटना बन जाएगी... नहीं। नहीं... मैं भाग जाऊँगी... चली जाऊँगी... इस दुनिया से दूर... इस पहचान से दूर... मगर मन। उसे कहाँ भगाओगी... वह तो साथ में ही रहेगा... वह उठकर खड़ी हो गयी... पूरी देह झुनझुना रही थी। कानों पर हाथ रखकर भीतर की आवाजों को झटकने लगी वह... सारा कमरा घूमता हुआ लग रहा था। आसमान नीचे उतरता हुआ दीख रहा था और धरती पाताल में धसकती जा रही थी। अंधकार का सघन वात्याचक्र चारों ओर घूम रहा था... कोई पकड़ो मुझे... रोको। देखो मैं उड़ रही हूँ... मैं जमीन में धँस रही हूँ... वह मन-ही-मन चीख रही थी... मगर शब्द भँवर में फँसकर रह गये थे... थोड़ी देर बाद... उसने देखा... बहिन उसे ग्लूकोज का पानी पिला रही है... और... सिर पर तेल मल रही है... टप टप टपकते आँसुओं ने उसके गालों को धो दिया था।

चार सप्ताह से बाहर का मुँह नहीं देखा था। नहीं देखी थी सुबह की धूप। नहीं देखी थी दिन की चमक। नहीं देखा था सान्ध्याबेला का उदास पतझड़-सा टुकड़ा। अकेली एक कमरे में बन्द थी वो। कमरे से बाथरूम तक उसका आना-जाना था। इतने दिनों से उसने किसी से भी बात नहीं की थी... यहाँ तक कि पापा तक को नहीं देखा था। कभी-कभार जब वे ऊपर आते या उनकी आवाज सुनाई देती तो वह दुबककर बैठ जाती या दरवाजा बन्द कर लेती थी। अजीब सा भय तथा सन्ताप उसको जकड़ लेता था उन क्षणों, बाई ने भी उस कमरे में जाना बन्द कर दिया था। टी वी तथा कैसेट प्लेयर पर धूल जम गयी थी... घर में डुबडुबाता... विषाद हिलोंरे लेता रहता था। कॉलेज खुलने के ठीक एक माह बाद बहिन गयी थी। उसकी तथा अपनी मार्कशीट्स लेने। कब रिजल्ट निकला कब क्या हुआ किसी को होश ही न था। घर पर सहेलियों के फोन आ रहे थे। दोनों एक ही कॉलेज में पढ़ती थीं सो उसकी सहेलियाँ उसे भी जानती थीं। चारों तरफ से नजरें बचाती स्वयं को छुपाती सी कॉलेज गयी बहन। देखकर भी अनदेखा का भाव लिए... बाहर निकल ही रही थी कि देखा अनीषा दौड़कर उसके पास आ रही है।

“क्या एडमिशन नहीं करवाना है तुझे? तुम लोग क्यों नहीं आ रही थीं?”

“बस यूँ ही।”

“तू बीमार थी क्या? एकदम काला चेहरा पड़ गया है तेरा तो?”

“हाँ तबियत खराब थी।” उसने टालने की कोशिश की।

“पापा बता रहे थे कि तेरी बहिन के साथ...।”

“मेरा भी, कॉलेज आना-जाना बन्द कर दिया है पापा ने।”

“तुमने किसी को बताया तो नहीं....।” वह सकपकाकर बोली।

“नहीं... पर... सबको पता... है... मैं आऊँगी उससे मिलने... हम लोगों ने कितनी बार फोन किये थे...? कैसा लगता होगा उसको सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं मेरे तो।”

उसे... करन्ट लग गया हो, इस तरह खड़ी रह गयी निष्प्राण। चेतनाशून्य। तो सबको पता है। सबको... पूरी क्लास को। पूरे कॉलेज को। पूरे शहर को। उसके हाथ-पाँव काँपने लगे।

“क्यों मिलना चाहती हो? नहीं, वह किसी से नहीं मिलेगी, वह यहाँ नहीं है।”

कहकर वह तेजी के साथ बाहर निकल आयी। पीछे से आती आवाजें उसको चुम्बक की तरह खींच रही थीं। उसे लगा पूरा कॉलेज उँगली उठाकर बता रहा है- कि देखा यह वही है जिसकी बहिन के साथ... उसने गाड़ी का गेट बन्द किया। गाड़ी के गेट की दीवार पर सिर टिकाकर बैठ गयी। साँसे तेज-तेज चल रही थीं। पेड़ की शाखों के पीछे गाड़ी खड़ी थी, बाहर से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। सड़क पर गाडिय़ों के आवागमन के कारण इतना तेज शोर हो रहा था कि उसकी सिसकियाँ किसी को सुनाई नहीं दे सकती थीं। क्या होगा उसका? कैसे आ सकेगी वह? देह की सारी चमड़ी छील दो, यहाँ तक कि मर भी जाओ तब भी यह बात... यह रेखा... खिंची रहेगी...। यहाँ से दूर चली जाए... मगर वहाँ कौन सँभालेगा उसे? उसके दर्द भरे कलंकित जीवन को। उसके आँसू नहीं थम रहे थे। घृणा का बवण्डर उसकी नसों में दौड़ रहा था। मैं खून कर दूँगी उनका। मार डालूँगी। मेरी बहिन का जीवन नष्ट करने वालो! तुम नरक में जाओंगे... सड़-सड़कर मरोगे... ईश्वर तुम्हें माफ नहीं करेगा...। अथाह यातना और जलालत से भरे जीवन का दर्द... कौन अनुभव कर सकता है... उसे लगा जैसे कोई शरीर से खाल उतार रहा हो...।

“मम्मी, उसे बाहर भेज दो... हॉस्टल या चाचा के पास। यहाँ तो मुश्किल है उसका रहना। लोग उसे जीने नहीं देंगे।”

“अकेले कहाँ? किसके पास?” माँ की आवाज गहरे कुएँ से आती लगी। आजकल वे भी कभी-कभार ही बोलती हैं।

“हॉस्टल में। यहाँ तो सभी को पता चल चुका है।” माँ ने भावविहीन आँखों से कमरे की तरफ देखा... फिर रुँधे गले से बोली, “आवेश में आकर कुछ कर बैठी तो... देखा नहीं था उस दिन।”

“कभी-न-कभी तो निकलना ही पड़ेगा। पूरी जिन्दगी का सवाल है...।”

“पूरी जिन्दगी...”

सचमुच उसकी जिन्दगी सिवा सवालों के कुछ रह ही नहीं गयी थी। वह बहिन के पास गयी... हृदय उमड़ पड़ा। वही प्यार था। चिन्ता थी। अपने आँसुओं को छुपाकर गोद में लिटा लिया उसे बच्चे की तरह- “तुम्हारा रिजल्ट सेवेंटी परसेंट रहा है। फॉर्म ले आये हैं, लेट फीस के साथ जमा कर देंगे।” वह मुसकराने की चेष्टा करते हुए बोली। उसे लगता क्यों नहीं पहले की तरह सब कुछ सामान्य हो जाता है। वही शोर-शराबा, चीखना... चिल्लाना... हँसना-लडऩा... देर रात तक पिक्चर देखना... डान्स करना... गीत सुनना क्यों नहीं यह खामोशी टूटती है! क्यों नहीं सब एक साथ बैठकर बात करते। क्यों नहीं डाइनिंग टेबल पर खाना खाते। क्यों नहीं भुला देते हैं सब कुछ...। मगर कैसे?... जंगल में लगी आग का ओर-छोर हो तब न। कोई छाया है जो उन सब के बीच में पसरी है। लड़की ने मार्कशीट की तरफ देखा तक नहीं... बहिन का चेहरा और आँखें देखती रही... सबको पता है ना... वह पूछ रही थी... आँखों से... बहिन ने मुँह फेर लिया...। दोनों बहिनों के भीतर समुन्दर हिलोरें ले रहा था... वो छायाकृतियाँ... ताण्डव... कर रही थीं... धप्... धप्... उन्होंने एक-दूसरे का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“तुम्हें हिम्मत से सबका सामना करना होगा। दर्द की आखिरी सीमा तक। अपमान घृणा उपेक्षा और तानाकशी की आखिरी हद तक।” बहिन उसे समझा रही थी...।

'दीदी, शब्द तो तुम्हारे हैं, लेकिन दर्द और वो हादसा तो सिर्फ मेरा है... कहने मात्र से खत्म हो जाएगा? और ज्यादा गहराता जाएगा... फैलता जाएगा... भीतर-बाहर... सब जगह। काश ऐसा होता कि मस्तिष्क की कोई नस काट कर फेंक दी जाती ताकि हम बेजान हो जाते... सामना करने भर से यह दर्द धुल जाता तो मैं पहाड़ की चोटी पर एक पाँव से खड़ी हो जाती। आँधी तूफान का सामना कर लेती...’ वह कहना चाहती है मगर नहीं कह पा रही है... शब्द पत्थरों की तरह कण्ठ के भीतर फँस गये हैं।

पिता जब भी इधर आते हैं, झाँककर चले जाते हैं। उनका चेहरा सूखे वृक्ष की तरह सिकुड़ गया है। रेखाएँ कितनी गहरी और चौड़ी हो गयी हैं। न उनके मुँह से उसका नाम निकलता है न वो सामने जाकर खड़ी हो पाती है... उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करें? मेरा क्या दोष है इसमें? मूर्ति पर जल चढ़ानेवाला भक्त कहा जाता है। फिर जीती-जागती हाड़-माँस की मूर्ति को खण्डित करनेवाला पापी क्यों नहीं माना जाता है? क्यों नहीं वह बहिष्कृत होता है? क्यों वह बेखौफ बेलिहाज समाज की छाती पर घूमता रहता है... वे चेहरे अँधेरे की परत को चीरते हिलाते-डुलाते वे बदबू भरे चेहरे... वे सख्त... काँटों भरे चेहरे... मूर्छावस्था में डूबती वह... घुटती हुई उसकी साँसें और कच्ची हरी दूधभरी शाख के ऊपर पैनी कुल्हाड़ी के जोर से गिरने की खचाक्-सी चीर भरी आवाज़ को समेटे वो दर्द में डूबी लगातार छटपटाती रहती।

आह...! नहीं! नहीं! कहाँ जाऊँ...? क्या करूँ? क्यों नहीं मैं बेहोश हो जाती हूँ? क्यों नहीं मेरी स्मृतियों पर विक्षिप्तता छा जाती है... काश... मैं मर जाती... वक्त का वो टुकड़ा मेरी चेतना से कैसे दूर होगा... हे भगवान्... कोई तो रास्ता सुझाओ, क्या मौत ही रास्ता है इस निर्मम घृणित अनुभव का? जब कोर्ट में मामला चलेगा तो कैसा तमाशा बनेगा मेरा...। मैं नहीं जाऊँगी कोर्ट में! जाऊँगी! नहीं! नहीं जाऊँगी! वह दो राक्षसों से भिड़ रही थी अपने अन्दर। जब सहन नहीं हुआ तो जोर-जोर से पाँव चलाने लगी और तेज... और तेज... इतने तेज कि बेहोश हो जाए... मगर बेहोश होने से पहले ही यकायक पाँव रुक गये... देखा, सामने पापा खड़े हैं... क्षणों तक उसकी आँखों में सिहरन काँपी जैसे भभूका उठा हो आग का... वह छत पर जा पड़ी... ठण्डे फर्श पर औंधी पड़ी काँप रही थी वह। रुलाई का वेग थम नहीं रहा था कि पापा ने माँ को भेजा... माँ ने बहिन को...।

“क्या हुआ?”

“दीदी, पापा की आँखों में नफरत थी।”

“नफरत! नहीं, नफरत क्यों होगी। सन्ताप, लाचारगी... और वेदना होगी। तुम्हें देखकर उनके दिल पर क्या बीतती होगी सोचा कभी तुमने? तुम नॉर्मल हो जाओगी तो पापा भी ठीक हो जाएँगे। वक्त ही हमारे घावों को भरेगा। लोग भूल जाएँगे सब कुछ। पापा तो यहाँ से शिफ्ट तक करने की सोच रहे हैं...।”

“हर कोई ऐसे ही देखेगा... पूछेगा... बात करेगा?”

“जिन्दगी तो तुम्हारी अपनी है। किसी पर आश्रित मत रहना... पढ़ो, नौकरी करो। बाहर चली जाओ। सब ठीक हो जाएगा... मैं... तुम्हारा साथ दूँगी हमेशा, कभी अलग नहीं होऊँगी...।”

“सब भूल भी जाएँगे तो क्या... मेरे भीतर तो वही चलता रहता है... वही सब... काट सकोगी स्मृति का वो भयानक रोंगटे खड़ा कर देने वाला अंश...?”

बहिन अन्दर समझा रही थी इधर पापा अपनी छाती को जोर-जोर से मल रहे थे... दर्द का गुबार उठता है और... सीने... कन्धे और हाथ... को छूता हुआ... निकल जाता है...।

“तुम कॉलेज क्यों नहीं जाते? क्या एडमिशन नहीं लेना है... क्या करोगे?” बहिन भाई के पास जाकर बैठ गयी। सब कुछ सामान्य करना चाहती है वह। किसी तरह तो माहौल बदले।

“कैसे जाऊँ? बताओ। मैं पागल हो जाऊँगा दीदी। पता नहीं किस-किसको मालूम होगा... कैसे फेस करूँगा मैँ? क्या कहूँगा? तुम्हीं बताओ।”

“सब कुछ छोड़कर बैठने से क्या होगा?”

“मेरी हिम्मत नहीं है दीदी! ऐसी आग लगी रहती है कि लगता... अपना सिर फोड़ लूँ या वे कमीने मिल जाएँ तो... एक-एक को जिन्दा जला दूँ...।”

“इससे क्या होगा...?”

“इसके साथ इतना बड़ा हादसा हो गया और मैं यूँ बैठा हूँ... नकारा... बुजदिल-सा।” वह स्वयं को धिक्कारता हुआ बोला।

“कॉलेज जाओ... एक साल बर्बाद हो जाएगा...।”

“हमारा तो एक साल बर्बाद होगा... उसकी तो जिन्दगी ही...।” कहकर वह... मुक्के मारने लगा। बड़ी मुश्किल से जाने को तैयार हुआ। अब तक जितने दोस्तों के फोन आते थे, मना करवा देता था या मिलता ही न था। एकाध बार कॉलेज की तरफ गया भी होगा तो अन्दर जाने की हिम्मत न पड़ी थी। स्कूटर खड़ा करके ऑफिस की तरफ जा ही रहा था कि दोस्त मिल गया...।

“कहाँ गया था तू? कब से नहीं मिले हम? एडमिशन भी लेगा या नहीं। प्रैक्टीकल शुरू हो गये हैं।”

“बाहर गया था काम से।” उसने बुझे स्वर में कहा।

“घर में कोई प्राब्लम है?”

“खास नहीं। क्या किसी ने कुछ बताया?” उसने आशंकित होकर पूछा।

“कोई बता रहा था कि... जाने भी दे... बता तू कॉलेज कब से आ रहा है...?”

“क्या बता रहा था...?”

“तेरा रिजल्ट क्या रहा...?”

“तू बोल रहा था कि...।” वह आवेश से काँपने लगा।

“पुलिस में रिपोर्ट तो की है। सालों का कुछ पता चला। फाड़कर रख देंगे। मैंने कितनी बार फोन किया था कि जाकर पता करूँ। मिलकर ढूँढ़ें। मगर कोई... बात नहीं करवाता था... कुछ पता चला कि वे कौन थे...” वह जानता था कॉलेज आने पर यही सब होगा... इन्हीं सवालों की पैनी धार पर चलना होगा...।

“कुछ मत कहो।” उसकी आँखों में निरीहता का भाव उतर आया, “होंगे तो आसपास के ही। मिलें तो एक बार। हम लोग इतने परेशान थे। बहुत टेंशन हो गया था यार, हम कोई नामर्द थोड़े ही हैं।” “क्या करूँ... कुछ नहीं सूझता...?”

“अरे तुम्हें क्या हो गया...? क्या बीमार था? इतना दुबला हो गया तू तो... मैं पहचान नहीं पाया। घर में सब कैसे हैं? बहिन तो ठीक है न।” दूसरे मित्र ने तपाक् से पूछा। प्रश्नों पर प्रश्न करते हुए उसके मित्रों ने घेर लिया...।

“अच्छा ये बता-वो अकेला था या...?” दोस्त ने शब्दों को चबाते हुए पूछा।

“चुप रहो तुम सब। भगवान के वास्ते चुप रहो।” वह इतनी जोर से चिल्लाया कि आस-पास के लोग चौंककर देखने लगे।

“सॉरी यार। माफ करे दे। तेरी बहिन क्या मेरी बहिन नहीं है? मैं समझ सकता हूँ तेरे दिल पर क्या गुजर रही होगी? मगर हम भी कैसे भाई हैं, हमारी बहिन के साथ इतना बड़ा हादसा हो गया और हम मुँह छुपाकर बैठे हैं।” दोस्त ने उसके काँपते हाथों को पकड़कर सहानुभूति के साथ कहा... मगर... वह... वहाँ रुक न सका... उसने स्कूटर स्टार्ट किया और हवा में उड़ता गिरता हुआ घर आ पहुँचा। दनादन सीढिय़ाँ चढ़ता हुआ ऊपर आया और जोर से दरवाजा खोला। सामने लेटी बहिन का हाथ पकड़कर लगभग घसीटते हुए बोला, “चलो, बताओ। पहचानो कौन थे वे कमीने। मैं मुँह नहीं दिखा पा रहा हूँ। चुल्लूभर पानी में डूबकर मर जाना चाहिए मुझे। लोग सहानुभूति दिखा रहे हैं और मैं खामोश बैठा हूँ। एक बार बता दो... मैं नोंचकर फेंक दूँगा उन्हें। मार डालूँगा... हरामजादों को...।”

“नहीं भइया, नहीं। प्लीज हमें मत ले जाओ।”

“पागल हो गया है क्या? कहाँ ले जा रहा है?” माँ ने उसे अलग करते हुए कहा। लेकिन उसने माँ को भी धकेल दिया... दीदी तथा पापा भागे-भागे आये...।

“छोड़ो उसे... छोड़ दो...।” पापा ने उसे धक्का देते हुए जैसे-तैसे अलग किया...।

“हमारा जीना मुश्किल हो गया है। घर से कहीं भी निकलकर जाओ तो पता चलता है कि सबको मालूम है... मैं पागल हो जाऊँगा पागल... वह दीवारों पर हाथ मारने लगा... ये क्या हो गया हमारे साथ? हमने किसी का क्या बिगाड़ा था...?... हम यहाँ नहीं रहेंगे पापा...।” वह फफककर रो पड़ा...।

“इसमें इसका क्या दोष है? बताओ। तुम बजाय हिम्मत बाँधने के इस तरह की हरकतें कर रहे हो।” दीदी ने उसे परे धकेलते हुए चिल्लाकर कहा।

लड़की हक्का-बक्का सी... रोये जा रही थी...। उसकी पूरी देह थरथर काँप रही थी। हिचकियाँ नहीं रुक रही थीं...।

“हम लोग कहाँ जाएँ... क्या करें...?”

“मेरी मौत से आप लोगों की इज्जत बच सकती है तो मैं मर जाती हूँ। मुझसे तो पूछो कि मुझ पर क्या गुज़र रही है? इसमें मेरा क्या दोष है? मुझे अपने ही शरीर से कितनी घिन लगने लगी है...।” कहकर उसने दुपट्टा अपने गले में कसना शुरू कर दिया...।

“क्या करती हो...? छोड़ो। बचाओ...।”

तीनों उसको सँभालने में लग गये... सचमुच ही वो मरते-मरते बची। इन कुछ क्षणों में उसकी आँखें ऊपर को घूम गयी थीं बहुत ऊपर... कपाल के अन्दर... ब्रह्माण्ड में जैसे कुछ काँपा... सिहरा... सबकुछ डूबता-सा लगा... अँधकार का महासागर... और शून्याकाश में डूबती चेतना... गले से आवाज नहीं निकल रही थी। गर्दन पर दुपट्टे की रगड़ से गहरे निशान पड़ गये थे। अर्धबेहोशी की अवस्था में पड़ी थी वह। तीनों लोग उसे घेरकर बैठे थे... उसके हाथ-पाँव-तलवे-पंजे मलते हुए भयाक्रान्त... रोते हुए... लग रहा था... किसी ने उन सबके प्राणों को खींच लिया है...।

एक घनीभूत लुबलुबाता वेदना में डूबा सन्नाटा सबके दरम्यान पसरा था जैसे अनन्त छोर तक समुद्र पसरा हो... नीला, मौन... तूफानों तथा लहरों की उत्ताल गति को बाँधे हुए। अब नयी भयावह स्थिति निर्मित हो गयी थी कहीं वह आत्महत्या न कर ले। सब एक-दूसरे से आँखें चुरा रहे थे। एक स्थान पर बैठे होकर भी दूर बहुत दूर... होते जा रहे थे... उनके आसपास इतनी मजबूत दीवार तन गयी थी कि वे सब मुक्त होने के लिए छटपटा उठे थे, लेकिन कोई था जो अट्टहास करता हुआ... हृदय को फाडऩे लगता था...

लड़की ने आँखें खोलकर देखा। सघन मौन... विषाद, चिन्ता तथा वेदना में डूबे चेहरे। भाई... कुर्सी में धँसा बैठा था... अगर मैं पहचान भी लूँ उन सबको और भइया ने आवेश में आकर कुछ कर डाला तो। उनको मारा-पीटा तो वे भी तो भइया को मार सकते हैं। उसके शरीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं... लड़की का दिल इस नये भय से... सिहरने लगा... उसे अपने से ज्यादा भाई की चिन्ता सताने लगी थी अब।

“पहचान लोगी न?” भाई फिर सामने था। एकदम इतने पास कि वह आँख नहीं उठा पा रही थी... उसको ठीक से दिखाई भी नहीं दे रहा था क्योंकि अब भी चक्कर आ रहे थे।

“हाँ!” उसने सिर हिलाया।

“कैसे थे वे... आदमी या लड़के... पहले कभी देखा था... याद करो?”

“नहीं!” वह हिम्मत जुटाकर बोली।

“जब शटर गिराई तो कितने लोग थे? कैसे थे?” वह घुटनों में मुँह दबाकर बैठ गयी। उसके जबड़े भिंचने लगे... नसों में सनसनाता हुआ जहर बहने लगा, लेकिन वह दृढ़ता से बताने की कोशिश करने लगी। वह अन्दर से मरती हुई लड़की को झिंझोडऩा चाहती थी, पर...।

“बताओ, बता दो, तुम चाहती हो कि मैं जिन्दा रहूँ... तो बताओ। जिन्दगी भर मैं इस बोझ के साथ जिन्दा नहीं रह सकता कि अपनी बहिन के लिए कुछ नहीं कर सका...।” वह मुठ्ठियाँ बाँधकर आपस में टकराने लगा...।

“भइया प्लीज...” वह हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी।

“क्या प्लीज...?” वह... दहाडऩे लगा...।

“आप मेरे पीछे अपनी जिन्दगी क्यों बर्बाद करते हो?”

“और तुम्हारी जिन्दगी...? इसलिए बता दो... मुझे।”

अभी मात्र बी.ए. ऑनर्स पास किया है उसने। पूरी पढ़ाई तथा कैरियर सामने था। स्टेट लेबल पर उसका सिलेक्शन हो गया था, मगर अब सब कुछ बिखरा पड़ा था तहस-नहस...कलंकित... अनिश्चित...।

“शिमला जाओगी...? वहीं रहकर पढ़ाई करना।”

“नहीं, उसे यहीं रहने दो। यह हमारा दर्द है हमीं झेलेंगे।” माँ ने विरोध किया।

उसे लगा यकायक ही वह किसी फेंकी गयी वस्तु के समान हो गयी है जिसे कोई भी स्वीकारने के पहले जाँचेगा-परखेगा... धोयेगा...पोंछेगा...। इस दुनिया में... अब वह... अकेली नहीं थी... अपितु उसके अन्दर समायी थी... एक वीभत्स दुनिया की तस्वीर... जिसमें अनेक चेहरे थे...। उसने अपना चेहरा तथा देह देखी... सुडौल-गौरी चिकनी देह... वैसी ही है ऊपर से... देह तो वैसे भी नश्वर मानी जाती है... फिर इसके मैले होने न होने की इतनी विशद व्याख्या क्यों! इतना तूल क्यों दिया जाता है... क्योंकि... आत्मा को धारण करने वाली देह ही होती है- बिना देह के आत्मा का क्या अस्तित्व। सारे अवयव अपनी जगह हैं... उनके रंग बदल गये हैं जैसे आँखों के आस-पास स्याह रेखाएँ घनीभूत हो उठी हैं... पलकें भी... सिकुड़ी-सी लगती हैं... हाँ ये सुबहें... ये शामें... ये दिन के उजाले, ये रात के अँधेरे थे। स्तब्ध खड़े पेड़-पौधे सभी कुछ अपनी जगह खड़े हैं सजीव जागते हुए... कुछ भी तो नहीं बदला बाहर का... बस बदला है, तो हमारा अन्तरंग...। हमारा जीवन...। मैं। हाँ। मैं। नहीं। तो? वह इतनी-सी बात नहीं है...वरना... पापा ऐसे क्यों हो गये हैं अचानक बूढ़े... पस्त। दु:खी। एकाकी। भाई ऐसा क्यों हो गया है दुबला। बेचैन। छटपटाता हुआ। सुलगता हुआ। मम्मी क्यों चुप हो गयी हैं? दीदी क्यों नहीं हँसती है? क्यों नहीं कॉलेज जाती है? उनकी शादी कैसे होगी... लोग... परिचित, रिश्तेदार... कितना बड़ा परिवेश है... और उन सबके बीच वह है... घायल... उसका सिर घूमने लगा... अन्दर मशीन चल रही थी... सब कुछ काटती हुई। घरघराता हुआ उसका पहिया... छाती को दबाकर घूमता है... पापा बता रहे थे कि एसटीडी-पीसीओ वाला लड़का पकड़ा गया है। उनमें से एक को पहचान लिया है। मगर बाकी का पता नहीं चल पाया है... खबर सुनकर फडफ़ड़ाने लगी वह... विक्षोभ और वितृष्णा से उसका हृदय फटने लगा था। अग्निकुण्ड में पड़ी लकडिय़ाँ चिटकने लगी थीं। पानी में आग लगी थी। वह जल रही थी-रात-दिन... अहर्निश... कलप रही थी वह...। आने वाले दिनों के बारे में सोच-सोचकर तड़प उठती थी वह...। सभी का दबाव बढ़ता जा रहा था कि अदालत में उसे कितनी निडरता... निर्भीकता तथा हिम्मत से बोलना होगा... हर पल... भाई की बँधी मुठ्ठियाँ उसे बेचैन किये रहतीं...। उसने दरवाजा खोलकर देखा... सामने पलंग पर भाई लेटा था... बड़ी मुश्किल से दीदी ने खाना खिलाया था। नींद की गोली लेकर ही सो पाता है वह। दीवार से टिककर बैठ गयी वह...। आँखों के सामने कुछ चल रहा है... परछाई... चेहरे... कब नींद लग गयी... उसकी... वही सब सपने में चल रहा था... सामने जज बैठा है... आसपास वकील खड़े हैं, मम्मी-पापा और पारिवारिक मित्र हैं साथ में। वकील उससे पूछे जा रहा है... सवाल-दर-सवाल। चीर रहा है उसके हृदय को। गोद रहा है उसकी आत्मा को। मार रहा है हथौड़ा चेतना पर... और तहस-नहस कर रहा है उसकी जिजीविषा को। वह अचकचाती झेंपती तड़पती-सी कभी सिर हिलाती है तो कभी निरुत्तर रह जाती है... भागना चाहती है, मगर नहीं भाग पा रही है... सबने उसको घेरकर रखा है... उसने देखा था किसी पिक्चर में प्रसव में तड़पती... चीखती... हाथ-पैर पटकती स्त्री को जो सारे दर्द झेलती है मगर... भाग नहीं पाती। उठ नहीं पाती है... महसूस हो रहा है उसे कि उसकी देह के साथ तो एक ही बार बलात्कार किया गया था मगर आत्मा के साथ तो... हजारों बार ये लोग बलात्कार कर रहे हैं... इसीलिए तो आत्मा छटपटा रही है... हृदय में हाहाकार मचा है... उसे लगा-गले में साँसे अटकी हुई हैं... हाथ-पाँव सुन्न पड गये हैं। हिलाने पर भी नहीं हिल रहे हैं। घबड़ाकर उठ बैठी वह... हाँफती हुई... स्वयं को छूकर देखा... लाइट बन्द थी। मगर सभी लोग अद्र्धनिद्रा में थे... उसे कुछ भी नहीं समझ में आ रहा था। सिवा डरावनी परछाईयों के कुछ नहीं देख पा रही थी... लग रहा था... बेहोश हो रही है... अस्पष्ट शब्द... घुटती हुई आवाजें... मुँह से निकल रही थीं... वह बड़बड़ा रही थी... रो रही थी... हाथ-पाँव हिला रही थी, पटक रही थी...।

“क्या हुआ... क्या हो गया...?” माँ-पापा और बहिनें उसे झकझोर रहे थे... पानी के छीटें मारकर जगा रहे थे... क्या हो गया इसको...? क्या होगा...? कहकर माँ... रोने लगी... तुरन्त डॉक्टर को फोन किया... आधी रात को ही सीधे नर्सिंग होम ले गये... जाँच के बाद डॉक्टर ने बताया कि वह गर्भवती है... अनचाहा अनजाना... बीज उसके गर्भ में है... बिना देर किये उसी समय... उसकी डी एण्ड सी करवायी जा रही थी... वह आधी सोई आधी जागी हुई-सी थी। चेतन-अवचेतन के बीच भी उसे महसूस हो रहा था कि उसके आन्तरिक अंगों से चिपके मांस के लोथड़े को नोंच-नोंचकर बाहर निकाला जा रहा है... और कई-कई औजार... उसके अन्दर... चल रहे हैं... फर्क इतना था कि इस बार... उसका... वह हिस्सा सुन्न था। जब उसकी आँख खुली तो सामने डॉ. शोभा बैठी थीं।

“कैसी हो?” पास आकर उन्होंने माथा सहलाकर पूछा।

“ठीक हूँ आंटी, मुझे क्या हो गया था?”

“जानकर क्या करोगी? लेकिन अब तुम्हें स्वयं को सँभालना चाहिए। बहुत हो गया। मुझे देखो मैं क्या करती हूँ? कई बार ऐसे केस आते हैं जिनमें जिन्दगी या मौत... या माँ और बच्चों में से किसी एक को चुनना होता है... बचाना होता है... लेकिन आखिरी क्षण तक कोशिश करते हैं। तो महत्त्वपूर्ण क्या है जिन्दगी... सारी जद्दोजहद जिन्दगी के लिये होती है न। तुम्हारी अपनी जिन्दगी की कीमत तुम्हारे लिए कितनी है यह तुम्हें सोचना होगा। पहले तुम स्वयं के बारे में सोचो कि तुम्हें देह को लेकर... तड़पते रहना है या आत्मा की आवाज पर चलना है... बार-बार तुम्हारे साथ घटनाएँ घटित हो रही हैं और तुम स्वयं कुछ नहीं कर पाती हो। यह शरीर तुम्हारा है या किसी और का। यदि तुम मेरी बेटी होती तो मैं तुम्हें कहती उठो-उठो... जागो... जीवन... को अपनी गति से चलने दो... जो हुआ उसका सामना करो। कोई तुम्हें एक्सेप्ट नहीं करता मत करने दो, तुम खुद को एक्सेप्ट करो...।” कहकर उन्होंने रात वाली सारी बात व स्थिति बता दी। वे उससे कोई भी बात छुपाना नहीं चाहती थीं।

“सारी सच्चाई तुम्हारे सामने है। तुम्हारे साथ है।” सुनकर वह चौंकी नहीं। आश्चर्य या दु:ख भी नहीं हुआ... चुपचाप उनका चेहरा देखती रही। ताज्जुब कि दोनों बार घटित घटनाओं में सिर्फ उसकी देह थी। अवयव थे... मन नहीं, आत्मा नहीं।

“आंटी, मैं पराजित नहीं होना चाहती। मेरा स्वभाव वैसा नहीं है, मैं आत्मग्लानि में घुल-घुलकर जीना भी नहीं चाहती। मैं उबरना चाहती हूँ इन सारी परिस्थितियों से, उस डर से... जो चारों तरफ बुना जा चुका है... परिवार वालों को भी समझाना होगा।” आज पहली बार वह खुलकर बात कर रही थी। घटनाओं के गहरे तल से अब वह ऊपर आने को छटपटा रही थी।

“अगर डॉक्टर शरीर के अंग में फैले जहर को ये सोचकर न काटे कि उस हाथ या पाँव के न रहने से उसका शरीर बदसूरत हो जाएगा, अपंग हो जाएगा तो जहर तो फैलेगा ही, मगर मैं फिर कहूँगी कि उस बदसूरती या अपंगता से महत्त्वपूर्ण है जिन्दगी... जिन्दगी... समझी। इसलिए तुम्हें खुद फैसला करना होगा।” डॉ. शोभा ने दृढ़ता के साथ कहा।

उर्मिला शिरीष

ई-115/12, शिवाजी नगर, भोपाल-462003,
मो. : 093031-32118,
Urmilashirish@hotmail.com

घर लौटते हुए उसका मन अजीब-सी बेचैनी से घिरा था। अपने आसपास के दमघोंटू माहौल को वह फेंक देना चाहती थी... सबसे पहले उसने अपनी अलमारी जमाई, किताबें सजाईं, यद्यपि उसका मन स्वयं से लड़ रहा था। एक लम्बी लड़ाई लडऩे की पूर्ण तैयारी कर रही थी वह... कुछ करना है... कुछ... करके दिखाना है... सबका सामना करना है... जैसे वाक्य उसकी सोच, उसके मन को निरन्तर ऊर्जा दे रहे थे। किसी बच्चे की आकुल आकांक्षा कि दौड़कर सबसे आगे पहुँचना है... मम्मी, पापा, भइया तथा दीदी को आश्चर्य हो रहा था कि आखिर उसे हो क्या गया है...? कहीं वह मानसिक रूप से टूट तो नहीं गयी है... अचानक ही ऐसा बदलाव कैसे आ गया?

“दीदी, मेरी मार्कशीट बताना। क्या तुम मेरे साथ कॉलेज चलोगी?”

मार्कशीट देखकर... वह मुसकरा दी। उसने मार्कशीट को यूँ स्पर्श किया जैसे किसी बेशकीमती वस्तु को छू रही हो। उस घटना के बाद आज उसने सबके बीच बैठकर बात की थी।

दूसरे दिन वह ट्रैकिंग सूट पहनकर खड़ी थी। शरीर से कमजोर, मगर मन से स्वस्थ होकर।

“कहाँ जा रही हो? बाहर निकलोगी? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है?”

“स्टेडियम तक।” उसने एकदम शान्त तथा संयत आवाज़ में कहा।

“डॉक्टर ने मना किया था और जाओगी तो सब लोग क्या कहेंगे? पूछेंगे तब। तुम्हें देखकर सब याद आ जाएगा। अब तक तो बात दब गयी होगी।” बुरी तरह से घबड़ाई माँ उसके सामने... खड़ी सवाल-जवाब कर रही थी... उनका व्यवहार एकदम बदल गया था। वे शंकित थीं। कुछ-कुछ सख्त भी।

“मैंने कोई गलती या अपराध नहीं किया, जिसके लिए मैं जिन्दगीभर आत्मग्लानि में घुलूँ। मम्मी। मैं हर स्थिति का सामना करूँगी चाहे मेरा कोई साथ दे या न दे।” कहकर वह बिना रुके, बिना कुछ समझे-समझाये स्कूटर उठाकर चल दी... उसे लगा आज आसमान एकदम साफ और चमकीला है। जानी-पहचानी सड़क पर स्कूटर चलाते हुए उसका मन हवा से बातें करने लगा।

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साहित्य पर बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट (बीवीआई) का मंडराता खतरा

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Intellectual Via Internet - Bharat Tiwari |  बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट - भरत तिवारी

साहित्य पर बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट (बीवीआई) का मंडराता खतरा

भरत तिवारी 

हमें कुछ पता हो या नहीं ये ज़रूर पता होता है कि हमारी समझ में बहुत तरक्क़ी हो गयी है। बीते समय से मोबाइल और कंप्यूटर के प्रयोग (और एटीएम से पैसा निकलना) ने हमें यह विश्वास भी दे दिया है कि हम प्रगतिशील से प्रगति-प्राप्त हो गए हैं। इतने उन्नत मनुष्य आप यदि साहित्य से लगाव भी रखते हो तब तो आप अपने को बुद्धिजीवी भी कहते होंगे (न कहते होंगे तो मानते तो होंगे ही)। इस बीच यदि आप इन्टरनेट पर इस दर्जे के सक्रीय हैं कि आप नेट पर उपलब्ध साहित्य को न सिर्फ ख़ुद के लेखन से और उन्नत बना रहे हैं बल्कि यदाकदा (अंग्रेजी में – फॉर अ चेंज) औरों का लिखा भी पढ़ रहे हैं फिर तो आप अतिविशिष्ट कोटि – बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट (बीवीआई) – की उस जमात से हैं, जिसे यह भी पता है कि यह बस वो ही है जो सब कुछ जानता-समझता है. कुछ बातें जो इस विलक्षण मानव की पहचान बनती जा रही हैं, बन चुकी हैं, आइये उनके बारे में कुछ बातें की जाएँ।

ये बताइए आखिर वो कौन सी ग्रंथि है, जो इन असाधारणों को, किसी के अच्छे लेखन को प्रोत्साहित करने से रोकती है? आप जो, सब पढ़ते हैं, सब से ज्यादा पढ़ते हैं... क्या आप संपादक के नाम ख़त लिख के कभी यह कोशिश करते हैं कि लेखक (बेचारा) तक और अन्य पाठकों (ये बेचारे नहीं हैं क्योंकि इनमें आप भी शामिल हैं) तक अपनी पसंदगी ज़ाहिर करें? इन्टरनेट आपकी ज़ेब में रहता है, ज़ेब में कम हाथों में ज़्यादा... और आप जो अपनी ईमेल आईडी से बेहिसाब प्रेम करते हैं और फिर ईमेल भी लिखते हैं ... आपकी यह कौन सी मानसिकता है जो आप, लेखक को एक ईमेल नहीं लिख पाते? यह लिखते हुए ज़ेहन में एक उठापटक और पैदा हो रही कि ‘उनको’ क्या कहूँ जो आप की तरह इन्टरनेट का प्रयोग अभी नहीं करते जो बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट (बीवीआई) नहीं हैं, जो लेखक, पत्र-पत्रिकाओं, संपादकों को पत्र भेज के अपनी ख़ुशी आदि का इज़हार करते हैं? और वो भी - जो इन्टरनेट का उपयोग तो करते हैं लेकिन बीवीआई नहीं हैं। जिनके लिए प्रशंसा नापतौल के की जाने वाली चीज़ नहीं है, जो प्रशंसा के लिए कद-काठी की जांच-परख नहीं करते। ज़ाहिर है कि आप उन्हें तुच्छ समझते हैं मगर आप नहीं जानते की लेखक को मिलने वाली ऊर्जा का बड़ा हिस्सा, इन ससंतुलित-सकारात्मक पाठकों (बाज़ दफ़ा लेखकों और आलोचकों) से ही आता है। यह ऊर्जाश्रोत अच्छे लेखन के पढ़ने से हुई ख़ुशी को दर्ज़ करता हैं। अमूमन इनका सम्बन्ध लेखन से नहीं होता और शायद यह ख़ुशी की बात है... क्योंकि कहीं ये भी लेखक हो गए तो इनकी ख़ुशी का भी महज अपने लेखन को परोसना-ही हो जाने का डर है।  और ऐसे में तो पहले से ही – मैं... मेरा... मेरी... पुरस्कार... छपी... प्रकाशित... जैसे माने खो चुके शब्दों से बजबजा रहे हिंदी-सोशल-मिडिया का न जाने क्या होगा. बहरहाल अपवाद की तरह कुछ बीवीआई ऐसे हैं जो इंटरनेट पर साहित्य पढ़ने के बाद अपनी राय देते हैं मगर ये एक विलुप्तप्राय प्रजाति है जिसकी रक्षा के लिए इसका दिल से आदर-सम्मान किया जाना चाहिए। इनके कम होते जाने कारण बीवीआईयों की हेय दृष्टि है जिसका काम इन्हें अतितुच्छ महसूस कराना है,. यही कारण है कि इनकी संख्या कम से कमतर होती जा रही है।

आपही बताइए कि यह कितने ताज्जुब का विषय होगा कि किसी कहानीकार की रचना 10,000 लोग पढ़ें मगर उस पर की जाने वाली टिप्पणी ‘शून्य’ और फेसबुक-लाइक ‘चौदह’ हों? इस जैसे अनेक उदाहरण मुझे ‘शब्दांकन’ पर रोज़ नज़र आते हैं... मुझे यह गलत, असंवेदनशील और असामाजिक लगते हैं, आपकी समझ क्या कहती है?

अंत में इतना और कि आप भी बीवीआई न बन जाएँ इससे पहले सम्हलिये, कुछ कीजिये और साहित्य को मैं-मैं-महान में बदलने पर आमादा बुद्धिजीवी-वाया-इन्टरनेट से बचाइए।

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कविता — सुनो लड़कियों! — अखिलेश्वर पांडेय | Kavita - Akhileshwar Pandey

10:55 pm टिप्पणी करें

Kavita - Akhileshwar Pandey हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं...?

Kavita - Akhileshwar Pandey

हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं...?

अब कोई भी खबर
रोमांचित नहीं करती
बड़ी नहीं लगती
उत्तेजना से परे
बर्फ की तरह
ठंडी लगती है
टीवी की स्क्रीन पर अंधेरा है
नेताओं की ग्लैमर की तरह ही
विकास का मुद्दा अब बासी हो चला है
किसानों-मजदूरों का जहर खा लेना
या लगा लेना फांसी भी
विज्ञापन से भरे पेज पर छिप जाता है
चारों तरफ सन्नाटा है
शोर सुनायी नहीं पड़ता
देशभक्ति, राष्ट्रवाद चरम पर है
इंसानियत खामोश है
एकदम तमाशबीन बनकर
कानून के नुमाइंदे ही
कानून तोड़ रहे
सब चुप हैं
राष्ट्रद्रोही कौन कहलाना चाहेगा भला?
किसी से सहमत होना
गिरोहबंदी है
साथ होना लामबंदी
नपूंसकता की परिभाषा
हिजड़े तय कर रहे हैं
सीना का पैमाना 56 इंच हो गया है!
गुंगे फुसफुसा रहे हैं
बहरे सुनने लगे हैं
लंगड़ों की फर्राटा दौड़ हो रही है
हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं...?


सुनो लड़कियों!

शोर नहीं
धीमे बोलो
ऊंची आवाज
शोभा नहीं देता तुम्हें
इतना तेज चलने की आदत
ठीक नहीं तुम्हारे लिए
ये क्या
अभी तक रोटी सेंकना भी
सीखा नहीं तुमने
अरे बाप!
आलू के इतने बड़े टूकड़े
कोई पुरुष पसंद नहीं करता
जाओ
गिलास में पानी भरके
बाप-भाईयों को पिलाना सीखो
शरबत, चाय, कॉफी बनाना
अच्छा हुनर है, लुभाने के लिए
यह तो आना ही चाहिए
जींस-टी शर्ट पहनकर
रिश्तेदारों के सामने
आना भी मत कभी

अखिलेश्वर पांडेय

संपर्क : 8102397081
ई मेल : apandey833@gmail.com
संप्रति : प्रभात खबर, जमशेदपुर (झारखंड) के संपादकीय विभाग में कार्यरत.
जाओ
सलवार-शूट
साड़ियां पहनना सीखो
जब कोई बोले
'जी' बोलो-हौले से
नजरें झुकी हो
जब कोई हो सामने
मुंह खोलकर हंसना
अच्छा नहीं माना जाता
जाओ, जाकर
करो शिव आराधना
तभी मिलेगा
तुम्हें अच्छा वर
अच्छा दांपत्य चाहिये तो
पूजो भगवान विष्णु को
और ये हर समय
हाथ में मोबाइल
क्या ठीक लगता है तुम्हे?
फेसबुक, वाट्सअप
क्या करना इन सबका
औरत ही रहो तो अच्छा
पढ़ो, नौकरी करो
शादी करो
बच्चे पैदा करो
खूब मेहनत करो
सबको खुश रखो
इतना ही करना है तुम्हें
सुनो लड़कियों!
बचपन से बुढ़ापे तक
यही तो सिखाया जाता है तुम्हें
क्या वाकई
इन सब बातों से
सहमत हो तुम...?
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जनमत संग्रह...अराजकता की ओर ले जाएगा — शेखर गुप्ता @ShekharGupta

3:07 am 1 > टिप्पणी

Janmat Sangrah ki Raah ke Jokhim — Shekhar Gupta

Janmat Sangrah ki Raah ke Jokhim — Shekhar Gupta

जनमत संग्रह की राह के जोखिम — शेखर गुप्ता

बीते 17 सालों (करगिल के बाद) में पांच ऐसे उकसावे के मौके आए हैं जब जनता ने पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए मतदान कर दिया होता। इन सभी अवसरों पर सरकार ने जनता के गुस्से की अनदेखी करने का समझदारी भरा फैसला लिया। हमने जिन लोगों को एक तय मियाद के लिए शासन करने को चुना है उनसे यही उम्मीद भी रहती है।

स्विस लोग कई क्षेत्रों में और जीवन की गुणवत्ता के क्षेत्र में वैश्विक मानक तय कर सकते हैं। लेकिन याद रखिए इस लोकतांत्रिक देश ने अपनी महिलाओं को मताधिकार 1971 में दिया। वह भी संसद से पारित होने के 12 साल बाद। पुरुषों के जनमत संग्रह के जरिये इसे रोका गया था।
सदियों के दौरान विकसित हुए आधुनिक लोकतांत्रिक देशों के लिए इन दिनों चुनौती आ खड़ी हुई है। प्रत्यक्ष लोकतंत्र की मांग जोरशोर से सुनने को मिल रही है। इसमें बार-बार जनमत संग्रह के अलावा, वापस बुलाने का अधिकार, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सत्ता प्रतिष्ठान के अधिकार सीमित करने जैसी मांगें शामिल हैं। यह अराजकता की ओर ले जाएगा। और हां, मैं दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए जनमत संग्रह कराने की अरविंद केजरीवाल की मांग से चिंतित नहीं हूं। भाग्यवश हमारे संविधान में इसकी व्यवस्था नहीं है। अगर होती तो इसका स्वाद हमें सबसे पहले कश्मीर में पता लगा होता। लेकिन इसके चलते आधुनिक राज्यों की विश्वसनीयता को एक बड़ी चुनौती नमूदार हुई है। प्रत्यक्ष मतदान काफी हद तक यूरोपीय अवधारणा है। लेकिन यह पहला मौका है जब इसका प्रयोग एक अत्यंत अहम मसले के अलावा एक देश की सार्वभौमिक प्रतिबद्धताओं को लेकर किया गया है। जब तक जनमत संग्रह स्कूली पाठ्यक्रम, कुछ घरेलू विवादास्पद करों, विचारों आदि तक सीमित थे, तब तक कोई समस्या नहीं थी। हालांकि हाल ही में स्विट्जरलैंड के लोगों ने मतदान कर मीनारनुमा किसी भी निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया जो पूरी तरह बहुसंख्यकवादी और संवेदनहीन फैसला था। स्विस लोग कई क्षेत्रों में और जीवन की गुणवत्ता के क्षेत्र में वैश्विक मानक तय कर सकते हैं। लेकिन याद रखिए इस लोकतांत्रिक देश ने अपनी महिलाओं को मताधिकार 1971 में दिया। वह भी संसद से पारित होने के 12 साल बाद। पुरुषों के जनमत संग्रह के जरिये इसे रोका गया था।

अगर आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला तय अवधि के लिए चुनी गई स्थिर, विश्वसनीय और भरोसेमंद सरकार पर रखी जाती है तो निरंतर लोकलुभावन मतदान और अप्रत्याशित अनुमान इसे पूरी तरह नष्ट कर देंगे। 

बुरे विचार अधिक संक्रामक होते हैं। नीदरलैंड के यूरोपीय संघ में बने रहने को लेकर जनमत संग्रह की मांग पहले ही अनिश्चितता बढ़ा रही है। कनाडा और ब्रिटेन को क्यूबेक और स्कॉटलैंड में नए दबाव का सामना करना होगा। ऐसी भावना ऐसे अन्य देशों में भी पनप सकती है जो अधिक जटिल और विविधतापूर्ण हैं। अगर आधुनिक लोकतंत्र की आधारशिला तय अवधि के लिए चुनी गई स्थिर, विश्वसनीय और भरोसेमंद सरकार पर रखी जाती है तो निरंतर लोकलुभावन मतदान और अप्रत्याशित अनुमान इसे पूरी तरह नष्ट कर देंगे। ऐसे में किसी भी सरकार के लिए कड़े निर्णय लेना असंभव हो जाएगा। वह व्यापक राष्ट्रीय हित के मसलों पर पूरा समय लेकर जनमत तैयार करेगी और फिर तय समय पर मतदान के जरिये इसका फैसला होगा।

लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि शासन कौन करेगा यह भले ही मतदान तय करता है लेकिन संविधान, कानून और मूलभूत सिद्धांतों में स्थिरता होती है और इनकी अभेद्यता के चलते बहुमत का प्रयोग बहुसंख्यकवाद के लिए नहीं किया जा सकता।

अब जरा इसे भारत पर लागू करके देखें। अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने को लेकर मतदान होता है। तो तमिलनाडु को ऐसा करने से या जम्मू कश्मीर को अपने आपको संप्रभु घोषित करने से किस प्रकार रोका जाएगा? या फिर शायद अत्यधिक क्रोध में जैसा कि 2010 में पथराव वाले दिनों में दिखा था, वह पाकिस्तान में विलय का चयन कर ले? विदर्भ और बुंदेलखंड खुद को अलग राज्य घोषित कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश का शेष हिस्सा इसके खिलाफ मतदान कर सकता है। चूंकि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है इसलिए जाहिर तौर पर बाकी का देश उसे पूरी तरह केंद्र शासित प्रदेश बनाने के लिए मतदान कर सकता है।

प्रत्यक्ष लोकतंत्र मौजूदा समय में उदारवादियों की प्रमुख मांग के रूप में उभरा है। यहां एक प्रश्न है: आप किसे प्राथमिकता देंगे, न्यायालय के फैसले को या एक ऐसे संविधान संशोधन को जो आईपीसी की धारा 377 को खारिज करता हो या इस विषय पर जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए? बाबा रामदेव के विचार को शायद जीत हासिल हो। या फिर अयोध्या में मंदिर निर्माण पर मतदान हो, संविधान का अनुच्छेद 370 रद्द करने पर, सिंधु जल संधि पर, शिमला समझौते पर, ताशकंद समझौते पर मतदान हो तो? अगर ये सारी बातें एकतरफा झुकाव वाली लग रही हैं तो उभरते हिंदू राष्ट्रवादियों की बात कर लेते हैं। आरक्षण नीति के पुनर्गठन पर मतदान हो तो? ऐसा वोट निश्चित तौर पर उच्च जातियों ने सर्वोच्च न्यायालय के आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा तय करने से जो वरीयता ले रखी है वह गायब हो जाएगी। देश की कुल आबादी में उच्च वर्ण के लोगों की हिस्सेदारी 20 फीसदी से ज्यादा नहीं है। उनकी स्वघोषित मेरिट का क्या होगा? बीते 17 सालों (करगिल के बाद) में पांच ऐसे उकसावे के मौके आए हैं जब जनता ने पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए मतदान कर दिया होता। इन सभी अवसरों पर सरकार ने जनता के गुस्से की अनदेखी करने का समझदारी भरा फैसला लिया। हमने जिन लोगों को एक तय मियाद के लिए शासन करने को चुना है उनसे यही उम्मीद भी रहती है।

यह बेवकूफी आगे भी जारी रह सकती है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने ट्विटर पर संदेश लिखकर लोगों से इस बारे में राय मांगी थी कि क्या रघुराम राजन को दोबारा रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया जाना चाहिए? इस सांसद के अपने समर्थकों से बने 'निर्वाचक मंडल’ ने राजन के लिए बड़ी संख्या में नकारात्मक मत दिया था। एक और नेता हैं जो अपने ट्विटर हैंडल और सोशल मीडिया के जरिये गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किए जाने की मांग को लेकर एक तरह से जनमत संग्रह चला रहे हैं। उनका कहना है कि 'मौजूदा राष्ट्रीय पशु बाघ जहां लोगों को खाता है वहीं गाय हम लोगों का पेट भरती है।’

अतीत, खासकर प्राचीन समय की सभी उत्कृष्ट चीजों को लेकर एक नए तरह का आसक्ति भाव देखा जा रहा है। प्राचीन समय, खासकर हमारे अपने वैशाली के बारे में भी काफी कुछ कहा जा रहा है। (बिहार में मुजफ्फरपुर से बाहर निकलते ही आपको वैशाली का साइनबोर्ड दिखेगा जिसमें लिखा है कि दुनिया का सबसे प्राचीन लोकतंत्र आपका स्वागत करता है।) अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के घोषणापत्र में भी लिच्छवी राजवंश की वैशाली को प्रत्यक्ष लोकतंत्र के प्रतीक रूप में दिखाया गया है। घोषणापत्र के मुताबिक वैशाली में नाममात्र के राजा को अपने हरेक फैसले पर लोगों की राय लेनी पड़ती थी। इतिहासकार भी हमें बताते हैं कि आर्थिक रूप से समृद्ध लेकिन सैनिक रूप से कमजोर वैशाली पड़ोसी जनपद मगध के हमले में नष्ट हो गया। मगध की सेना ने वैशाली पर उस समय हमला बोला था जब इसके लोग इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि क्या उन्हें लड़ना चाहिए और अगर हां तो कहां और किस तरह से लड़ा जाए? वह राज्य और उसका नरेश एक मजाक साबित हुआ था।

डेविड कैमरन ने अपने देश के साथ ही समूचे यूरोप को भी नीचा दिखाया है। कैमरन ने एक ऐसे मुद्दे पर जनमत संग्रह करा दिया जिसको लेकर खुद उनकी पार्टी में भी मतभेद था। बेहतर तो यह होता कि पहले वह अपनी पार्टी में इस पर मतदान कराते और अगर पार्टी का बहुमत यूरोपीय संघ से बाहर जाने के पक्ष में होता तो वह चुनाव कराने का ऐलान कर सकते थे।

पुनश्च: सन 1974 में हुए पहले पोकरण परमाणु परीक्षण की सफलता की घोषणा के लिए 'बुद्ध मुस्करा रहे हैं’ जैसा कूट शब्द क्यों प्रयोग किया गया? मेरे मित्र और पूर्व सहयोगी विनय सीतापति (पीवी नरसिंह राव की उनकी लिखी जीवनी, हाफ लॉयन अगले सप्ताह आ रही है) ने अपने शोध में इसका उत्तर तलाश किया है। ऐसा लगता है कि डॉ. राजा रमन्ना भी मगध द्वारा वैशाली के विनाश से परिचित थे। बुद्ध इसे लेकर परेशान थे और उनको लगा था कि अगर वैशाली के पास भी तथाकथित प्रत्यक्ष लोकतंत्र के बजाय सक्षम सैन्य शक्ति होती युद्ध को टाला जा सकता था क्योंकि तब कोई कड़े फैसले नहीं करता। माना जाता है कि उन्होंने कहा था कि 'केवल समान शक्तिशाली या समान कमजोर राष्ट्रों के बीच शांति स्थापित रह सकती है।’ यही वजह है कि रमन्ना ने इंदिरा गांधी से कहा, 'बुद्ध मुस्करा रहे हैं।’ क्योंकि भारत ने अपना शक्ति संतुलन हासिल कर लिया था।
साभार बिज़नस स्टैंडर्ड 
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Flirting Mania पर शार्ट फ़िल्म बनी @tak_era

11:00 am टिप्पणी करें

Flirting Mania पर शार्ट फ़िल्म बनी

Flirting Mania

'फ्लॉर्टिंग मेनिया'


वास्तविक रिश्तों पर भारी पड़ते आभासी रिश्तों की कहानी 'फ्लॉर्टिंग मेनिया', कोई ढेड़ साल पहले शब्दांकन पर प्रकाशित हुई थी। लेखिका और चित्रकार इरा टाक की इस कहानी में एक कड़कपन है जो इरा के लेखन की ख़ासियत है; युवा पीढ़ी की यह रचनाकार भविष्य की सशक्त कहानीकार होगी यह मेरा विश्वास है। अब इरा ने अपनी इस बहुचर्चित कहानी पर 30 मिनट एक शार्ट फ़िल्म बनाई है... बधाई !! फ़िल्म का स्क्रीनप्ले और डायरेक्शन इरा ने ही किया है। जयपुर में शूट हुई फिल्म में निखिल शर्मा और सुब्रता पराशर मुख्य भूमिकाओं में हैं। फ़िल्म का संगीत मेघा श्रीराम ने किया है और बावली बूच फेम दुष्यंत ने फ़िल्म के लिए एक गाना लिखा है। 'फ्लॉर्टिंग मेनिया' पहले नेशनल और इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल्स में दिखाई जायेगी... तब तक इस प्रोमो विडियो को देखते हैं


Flirting Mania Promo

'फ्लॉर्टिंग मेनिया कहानी'

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पड़ताल प्रेम कहानियों की — रोहिणी अग्रवाल | Hindi Love Story — Rohini Aggarwal

12:20 am टिप्पणी करें


Padtal Prem Kahaniyon ki —  Rohini Aggarwal

चुप्पी में पगे शुभाशीष बनाम पचास साल का अंतराल और प्रेम को रौंदती आक्रामकता — रोहिणी अग्रवाल



अज्ञेय की कहानी 'पठार का धीरज' से कुछ दृश्य और संवाद . . .

थोड़ी दूर पर एक स्त्री स्वर बोला, 'तुम लोग वास्तव से भागना क्यों चाहते हो? कुंवर राजकुमारी को प्यार नहीं करता था।'
'फिर किसको करता था, हाथी पर सवार होकर रोज राजकुमारी से मिलने आता था तो . . . ''
''अपनी छाया को । चंद्रोदय होते ही वह कुंड पर आता था, हाथी पर सवार उसकी अपनी छाया कुंड के एक ओर से बढ़ कर दूसरे किनारे नहाती हुई राजकुमारी की जुन्हाई सी देह को घेर लेती थी। उसी लंबी बढ़ने वाली छाया से कुंवर को ऐसा प्रेम था। राजकुमारी तो यूं ही उसकी लपेट में आ जाती थी।''

''कुंवर, क्या तुम मुझे ऐसे ही प्यार नहीं कर सकते, . . . उतावली करके उसको नष्ट करना . . ''
''धीरज, धीरज! हेमा, मैं तुम्हें चांदनी की तरह नहीं चाहता जो आवे और चली जावे, मैं तुम्हें - मैं तुम्हें . . . अपनी छाया की तरह चाहता हूं, हर समय मेरे साथ, जब भी चांदनी निकले तभी उभर कर मुझे घेर लेने वाली . . . ''
''और जब चांदनी न हो तक क्या अंधकार मुझे लील लेगा . . . मैं खो जाऊँगी?'' राजकुमारी का शरीर सिहर उठा।
''तब तुम मुझी में बसी रहोगी राजकुमारी!''

''बात का न बनना ही उसका सार है, अपरिचित। प्यार में अधैर्य होता है तो वह प्रिय के आसपास एक छायाकृति गढ़ लेता है, और वह छाया ही इतनी उज्ज्वल होती है कि वही प्रेय हो जाती है, और भीतर की वास्तविकता न जाने कब उसमें घुल जाती है। तब प्यार भी घुल जाता है। . . . अधैर्य एक प्रकार का चेतना का धुआं है जिससे बोध का एक-एक स्तर मिटता जाता है और अंत में हमारी आंखें कड़वा जाती हैं, हमें कुछ दीखता नहीं।''

प्रेम विडंबना का दूसरा नाम है।

समर्पण और प्रतिदान के सहारे अपने भीतर की रिक्ति को पूरने के लिए उठी मीठी सी टीस भरी भाव-हिलोर प्रेम का पर्याय बन सकती थी, लेकिन . . .

. . . यह लेकिन ही तो फसाद की जड़ है। 'लेकिन' एक मामूली शब्द भर नहीं, कितनी ही सत्ताओं के आतंक और दंभ की टंकार है। वर्जना और फरमान बन कर जब यह रागात्मक सम्बन्ध के महीन तंतुओं से बुनी दो अस्मिताओं के बीच जा पसरता है तो हिंसा का नंगा नाच खेलना इसका पहला शौक बन जाता है। उफ! खाप पंचायतों का हैबतनाक खूनी मंजर याद आने लगा है न! और साथ ही उस खूनी मंजर के पक्ष में मूंछों को ताव देने की अड़ियल लंपट मुद्रओं का खौफ भी। बेशक इस समय अपने गृह-प्रदेश हरियाणा की खाप-पंचायतों का आतंक मुझे बौखलाए हुए है, लेकिन जानती हूं जरा सा संयत होते ही मैं अपने देश के कितने-कितने प्रांतों से गुजर कर पाकिस्तान की बर्बर कबीलाई संस्कृति में दफन होती प्रेम कहानियों को सूंघने लगूंगी, और फिर हवा की तरह हल्की होकर काल की सीमाओं को मिटा दूंगी। हां, मैं जानती हूं स्थूल घटनाएं, अभिनेता और रंग-सज्जा बदल देने के बावजूद पात्र और कहानी ठीक वही रहते हैं - लैला-मजनू को प्रतिस्थापित करते रोमियो-जूलियट; हीर-रांझा के बिखरे सूत्रों को त्रासदी के नए आयाम तक ले जाते यूसुफ-जुलेखा . . . यह विडंबना नहीं तो क्या है कि हृदयों को आत्मविस्तार की ऊँचाइयों की ओर ले जाने वाला प्रेम अपनी विकास-यात्रा के पहले ही पड़ाव पर पुरजा-पुरजा कट मरता है। तो क्या प्रेम सामाजिक विधि-विधानों की अनुमति/सहमति से बनाया जाने वाला एक अनुष्ठान भर है? मनुष्य की सहजात मनोवृत्ति नहीं जो सभी वर्चस्वशाली सत्ताओं को अंगूठा दिखा कर अपना पात्र और समय खुद चुनती है?

पड़ताल प्रेम कहानियों की — रोहिणी अग्रवाल | Hindi Love Story —  Rohini Aggarwal
रोहिणी अग्रवाल
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,
रोहतक, हरियाणा
मो० : 9416053847
लेकिन मैं इन प्रेम-कहानियों के हंताओं को देख कर इतना झल्ला क्यों रही हूं? बाहर-बाहर देखने में सारी ऊर्जा और एकाग्रता लगाती रही तो रूप बदल कर प्रेम और प्रियपात्र में पर्यवसित होते इन हंताओं को नहीं चीन्ह पाऊँगी। 'पठार का धीरज' की राजकुमारी हेमा चीन्ह गई बहुत जल्द क्योंकि अमृत रसधार बन कर प्रेम ने उसे आप्लावित किया ही नहीं, अग्निशिखा बन कर लीलने को झटपट आ पहुंचा। राग और समर्पण की मौन व्यंजनाओं के साथ सह'अस्तित्व की मुखर अभिव्यक्ति करने की बजाय राजकुमार वर्चस्व और इच्छा की निरंकुशता से उसके वजूद पर कोड़े बरसाने लगा। न! प्रेम के बदले आक्रांत कर लेने वाले अधिकार को पाकर ठगी सी रह गई है राजकुमारी। शायद प्रेम से बड़ी दूजी कोई छलना नहीं। और प्रेम से बड़ी पाठशाला भी। वह पगलाई सी घूमती 'ईको' में अपने दर्द का कोई सिरा पा लेना चाहती है। हर ताल-पोखर के शांत स्वच्छ ठहरे जल में अपलक अपनी ही छवि निहारते नारसिस को अपनी बाहों में बांध लेने को आतुर ईको . . . लेकिन कैसे तो ध्यानमग्न तपस्वी सा नारसिस अविचल-अडोल आत्मलीन है। नारसिस की तल्लीनता से छटपटाती है ईको . . . रात भर बिछोह की पीड़ा में तड़पते नारसिस की व्यथा से कहीं ज्यादा तड़पती है ईको। नादान नारसिस समझता है उसका प्रिय जल में रहता है, और जल प्रकाश की जुगलबंदी के बिना प्रिय से उसकी मुलाकात कराता ही नहीं। नारसिस नहीं जानता अपने से बाहर अपने को पाने की तलाश में मारा-मारा घूम कर अपने को ही छलनी कर रहा है। नहीं जानता कि अपने ही चारों ओर जिस द्रव को फैला कर रसमग्न घूम रहा है, वह प्रेम नहीं, आत्मप्रवंचना है।

प्रेम में पूरी सृष्टि का विस्तार है और अपनी गहराइयों का आधार भी। लेकिन . . .

फिर वही लेकिन! शेखर जोशी मुझे बरज देते हैं - प्रेम हर विडंबना का सहज स्वीकार है। प्रेम है, तभी तो विडंबनाओं के दुर्दांत हस्तक्षेप से अपने को बचाना आसान हो जाता है। प्रेम कोमलता और संवेदना के बहाने मनुष्यता के संरक्षण का पहला और आखिरी नाम है।

मैं यकायक एक गिलास, एक एनेमल का मग और एक अलमुनियम के मैसटिन में बांट कर चाय पीते गुसांई ('कोसी का घटवार'), लछमा और उसके पांच-छह साल के बेटे को देखने लगती हूं। मिहिल के पेड़ के नीचे पत्तों से छन कर आती छाया में, घट की 'खिस्सर-खिस्सर' ध्वनि के बीच, कोसी की छप-छप की लय-ताल में वक्त मानो थम गया है . . . पंद्रह बरस के बाद कैसा तो आकस्मिक मिलन . . . न शिकायतें न उलाहने . . . वर्तमान और विगत के साथ मानो .स्मृतियां भी दुम दबा कर भाग खड़ी हुई हैं . . . बस, एक प्रगाढ़ रागात्मक सम्बन्ध में बंधे तीन जन . . . अपनी-अपनी भूख और परिताप को अपने-अपने ढंग से मिटाते, तृप्त होते-दूसरे को परितृप्त करते वे तीन जन . . . .थमे हुए वक्त में मगर निर्वेद रस की धारासार बरसात हो रही है . . . कितना सुकून और संबल अंकुरा जाता है न इस उर्वर जमीन पर . . .  और जड़ों का जड़ों से उलझा-बिखरा दूर तक फैला महीन पुष्ट तंतु जाल!

एक लम्बे अंतराल के बाद 'चिड़िया ऐसे मरती है' (मधु कांकरिया) कहानी के विजय और रेशमा भी मिले हैं। बिछोह का कारण वही सदियों पुराना - जालिम जमाने/परिवार की साजिशों/रंजिशों के चलते प्रिया का ब्याह . . . ससुराल . . . बच्चे . . .  प्रिय इस ओर . . .  सूनी आंखों से सूना आसमान, सूनी डगर, सूना आगत ताकता . . .  परम एकाकी! रेशमा को देखते ही जैसे सूनापन पलक झपकते ही उम्मीद और सपनों के संग-संग झूमते मोहावेश का रूप धर लेता है - 'चलो दिलदार चलो, चांद के पार चलो'। विजय के भीतर का लोक अपनी ही ध्वनियों के भीषण कोलाहल से भर गया है जहां हर ध्वनि दूसरी ध्वनि का सिर कलम कर अपनी प्रेम-निष्ठा का सबूत देने के लिए आतुरतापूर्वक रेशमा तक अकेले ही पहुंचना चाहती है। बेहद मुखर है रेशमा - प्रिय के परिवार-जन की खैरियत की जानकारियां लेते हुए . . .  बेहद बेसब्र इंतजार में बौखलाई बड़बड़ाहट के साथ भरा है विजय कि रेशमा ''मां और बहन से निकल कर मुझ तक आए तो मैं उसे बताऊँ कि मेरा प्रेम जैसलमेर के बालू के धोरों सा नहीं, वरन विंध्याचल पर्वत सा है। देख लो, आज भी मैं वहीं और स्मृतियों के उसी घाट पर खड़ा हूं, अकेला।''

''प्रेम प्रमाण देने या पाने की प्रतियोगिता नहीं है विजय बाबू'', मैं उस खिन्न, हताश, कुंठित, पराजित, विद्वेषी आत्महंता युवक के कान में धीमे से फुसफुसा कर अपने पीछे आने का इशारा करती हूं। ''देखो''। कोसी का घटवार अब भी मौन तल्लीनता के साथ अर्थगर्भित चुप्पियों को पिए जा रहा है।

'खंडहर में बसी चुप्प्यिां अपनी निर्जनता और खोखलेपन से घबरा कर परित्राण के लिए दसों दिशाओं में भांय-भांय करता शोर गुंजा देती हैं विजय। . . .  गुंसाईं को देखो, अपने भीतर मोह और आवेश को मार कर अपनी ही कैद से क्या रिहा हुआ कि वक्त को जीती पूरी सृष्टि उसके भीतर उतर आई। अकेलेपन में आत्मसार्थकता को तलाशना प्रेम की दीक्षा के बिना संभव नहीं।' मैं विजय की अविश्वास से भरी आंखों में झांकते बियाबानों में पहाड़ी सोतों की चपलता, कलरव और अमृत रसधारा भर देना चाहती हूं।



गुसांई और विजय प्रेम की दो भिन्न-भिन्न परिणतियां मात्र नहीं हैं, दो अलग-अलग दृष्टिसम्पन्न लेखकों के व्यक्तित्व का उद्घाटन भी है और एक गहरे दायित्व-बोध के साथ अपने वक्त को रचने का स्वप्न भी। शेखर जोशी के लिए गहराई, ऊँचाई और व्यापकता के अछोर कोनों से बंधा जीवन महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है एक क्षण, एक टीस, एक पुलक, एक रोमांच, जिसके भीतर गुंथी अनुभूति में जीवन का परम सत्य, निचोड़ और दर्शन अपनी समग्र गहनता के साथ व्यंजित हो उठता है। वे सीधी-सरल अनुभूतियों को वाणी देते प्रतीत होते हैं, लेकिन जहां से खड़े होकर उसे सृष्टि के साथ 'संवादरत' देखते हैं, वहां वक्त के दरिया से छिटक कर वह 'अकेला' क्षण जीवन की तमाम संवेदनाओं और सम्बन्धों की संश्लिष्ट जटिलताओं से ओतप्रोत हो जाता है। छोटी सी कहानी 'सिनारियो', 'उस्ताद', 'बच्चे का सपना' हो या 'दाज्यू', बदबू', 'कविप्रिया' और 'तर्पण' - ताउम्र अपने साथ रहते हुए भी इंसान कहां अपने को पहचान पाता है? फिर दूसरों को तुरंत एक छोटी सी मुलाकात के बाद समझने का दंभ कैसा? शेखर जोशी की कहानियां संवेदना के सहारे अपनी समझ को विकसित करने की कोशिशें हैं ताकि अपने दायरे से बाहर निकल कर जीवन और मनुष्य के साथ अपनी संगति एक मधुर लय-ताल के साथ निभाई जा सके। इसलिए सीधी, सरल और स्पष्ट होते हुए भी उनकी कहानियां सतही, इकहरी और 'छोटी' नहीं होतीं - जीवन की व्याख्या करती 'बड़ी' रचनाएं बन जाती हैं। 'कोसी का घटवार' की ही बात करुं तो एक ही घटना के इर्द-गिर्द बुना समय तड़फड़ाता-हांफता, गोल-गोल घूमता वहीं दम नहीं तोड़ता, अपनी हस्ती का विस्तार कर अतीत के गलियारे में चहकते जीवन के उल्लास का साक्षात्कार कर आता है और फिर उस रुपहले आलोक में अपने बदनुमा अंधेरों को झाड़ने की जुगत में जुट जाता है। नहीं, अंधेरों में घिर कर रोशनियों से रोशन लम्हों का स्यापा नहीं किया जा सकता। आशा, जिजीविषा, उत्साह और उल्लास के 'कवि' हैं शेखर जोशी जिन्हें शोर, रोमानियत और दिवास्वप्नों से सख्त परहेज है। वे जानते हैं कठोर यथार्थ आरी की तरह इंसान को चीरता चलता है। यह जीवन की विडंबना नहीं, मनुष्य का सहज प्राप्य है। और यही उसकी संघर्ष-यात्रा का प्रस्थान बिंदु भी। अपने ही रक्त और आंसुओं से टूटे-कुचले वजूद को जोड़ कर उसे अपनी मनुष्यता को बचाए रखना है। गुसांई से शेखर जोशी की अपेक्षाएं बड़ी हैं, इसलिए गुसांई के हौसले और विश्वास भी बड़े हैं। लेकिन पाठक के सामने शेखर जोशी उसे 'महामानव' की तरह प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि ठीक उसकी (पाठक) तरह जीवन और नियति के क्रूर झटकों से बिंधे लहूलुहान इंसान के रूप में परिचित कराते हैं जिसके द्वार पर जिंदगी भर साथ देने के लिए 'सूखी नदी के किनारे का अकेलापन' धरना दे कर बैठ गया है। दिग्-दिगंत तक फैली भांय-भांय करती निर्जनता, 'रेती-पाथरों के बीच 'टखने-टखने तक फैला नदी का पानी' और पहाड़ की उन्नत चाटियों को जेठ के ताप से झुलसाती चिलकती धूप - शेखर जोशी वातावरण नहीं बुनते, गुसांई के फटेहाल यथार्थ को बेलाग ढंग से उद्घाटित कर देते हैं, बस। रेतीले मरुस्थल की वीरानगियों में भटकते पहाड़ी आदमी की छटपटाहट . . . यहीं कहीं जीवनदान देती स्मृतियों का एक भरा-पूरा अतीत है जहां फौजी बन जाने के सपने को पूरा करने की खुरदरी दृढ़ता है और फौजी बन कर उस सपने के इंद्रजाल को जीने की रसनिमग्नता भी। फौजी बनने का सारा संघर्ष मानो लछमा को शान से ब्याह लाने का उपक्रम था। फौजी बन कर (अनाथ-अनाम होने की तिरस्कारपूर्ण अवहेलना के बरक्स अपनी सुनिश्चित अस्मिता पाकर) गुसांई ने पाई है आत्मविश्वास से लबरेज निश्चिंत लापरवाही। लछमा से क्योंकर न ब्याहेंगे लछमा के परिवार वाले? लेकिन नहीं ही ब्याह हो पाया - ''जिसके आगे-पीछे भाई-बहन नहीं, माई-बाप नहीं, परदेश में बंदूक की नोक पर जान रखनेवाले को छोकरी कैसे दे दें हम?'' अपने बलबूते अपनी शख्सियत बनाई जा सकती है, लेकिन मुकम्मल पहचान सामाजिक सम्बन्धों और व्यवस्था के मकड़जाल में फंस कर दो-दो हाथ करने के बाद ही मिलती है। पंद्रह बरस की फौजी नौकरी के बाद गुसांई बेशक अकेला गांव लौटा है, लेकिन वक्त ने आवेश और आकांक्षाओं के उफान को बांध कर उसे संयमी और विवेकशी बना दिया है। हंसती-खिलखिलाती जीवन के आलोक से भरपूर लछमा के इर्द गिर्द मंगलकामनाओं का रक्षा-कवच बुनना उसकी दिनचर्या है और साथ ही गंगनाथ (भगवान) के कोप की आशंका से जूझना भी। वह जानता है गंगनाथज्यू की कसम खाकर लछमा ने उसके लौट आने और किसी अन्य से विवाह न करने की प्रतिज्ञा की थी। झूठी कसम खाने का कोप कहर बन कर लछमा पर न टूट पड़े . . . वह सर्वांग सिहर जाता है और चाहता है लछमा से एक भेंट कर आग्रह करना कि वह ''गंगनाथ का जागर लगा कर प्रायश्चित जरूर कर ले। देवी-देवताओं की झूठी कसमें खाकर उन्हें नाराज करने से क्या लाभ?'' अनुभव और सबक के साथ निरंतर वयस्क होती समझ के परिपार्श्व में विगत को गुनता-बुनता गुसांई न जितेन्द्रिय है, न संन्यासी। बस, अपनी सीमाओं को पहचानता है और सामाजिक मर्यादा को भी। हौले-हौले एक-एक डग बढ़ाते रहने से भी इंसान दूर तक अलंघ्य दूरियां नाप आता है, गुसांई भले ही न जाने, शेखर जोशी खूब जानते हैं, और एक मितभाषी दृढ़ता के साथ पाठक तक अपनी इस समझ केा मूल्य बनना कर संप्रेषित भी कर देते हैं।

'और तुम विजय?' मैंने प्रश्न करती निगाहों से विजय को घूरा, इस विश्वास के साथ कि गुसांई के उदात्त चित्र के बरक्स अपनी लघुता देख पानी-पानी हो जाएगा। लेकिन उसकी आंखों में एक अड़ियल अहं भाव था - 'गुसांई यथार्थ पात्र नहीं है। वह एक रोमानभरी कवि-कल्पना है जो प्रेम को दर्द और आत्मपीड़न में रिड्यूस कर शहादत का सुख पाना चाहता है।'

मैं निर्वाक्! बेशक गुसांई/शेखर जोशी से जमाना अब तक पचास बरस आगे खिसक चुका है, लेकिन इस दौरान मैं भी तो साथ-साथ आगे बढ़ी हूं। फिर इस सहयात्रा में विजय जैसी पीढ़ी कब हाथ छुड़ा कर अलग हो गई? या कि नारसिस और 'पठार का धीरज' के राजकुमार की पीढ़ी एक समानांतर यात्रा तय करती रही और अपनी मान्यताओं-महिमामंडनों को बुनने-गुनने की तल्लीनता में हमने उनसे कभी संवाद करने की कोशिश ही नहीं की? और न ही जाना कि अकेली, उद्धत, ओवरप्रोटेक्टेड और आत्मकेन्द्रित पीढ़ी संवादहीनता का त्रास झेलते-झेलते संवेदनशून्य हो जाएगी? वैचारिक-भावनात्मक टकराहट भले ही कितनी कष्टकर क्यों न हो, टूट कर जुड़ने के बाद दूसरे के अहं/वजूद की स्वीकृति केा तो अपने व्यक्तित्व में समा लेती है।

शिल्पगत बारीकियों और संवेदना की व्यंजनाओं के सहारे मैं 'कोसी का घटवार' कहानी की घटनाओं को अध्यापकीय लहजे में उद्घाटित नहीं करना चाहती। स्त्री के प्रति द्वेष रखती विजय ('चिड़िया ऐसे मरती है') की मनोग्रंथि को गुसांई के सहारे खोल लेना चाहती हूं कि दूसरों (स्त्री) का सम्मान करने का बड़प्पन आत्मादर का भाव अर्जित करने के बाद ही पाया जा सकता है।

 गुसांई की तुलना में शहादत का भाव विजय में कूट-कूट कर भरा है - अपने को अदृश्य कर देने के जतन में नहीं, अपनी महानता की डोंडी पीटने और प्रतिपक्षी (स्त्री) पर कटाक्ष करने में। यह शहादत कहीं आत्मदया का लिहाफ ओढ़ कर समूची स्त्रीजाति की 'व्यावहारिकता' पर व्यंग्य करती है - (स्त्रियां) ''अतीत से मुक्त होते ही वर्तमान को साध लेती हैं, इसलिए जिंदगी में हमसे कहीं ज्यादा कामयाब होती हैं'' तो कहीं एक नैतिक सीख के रूप में अपनी कायरता को ढांपने का जतन करती है - ''मैं आज भी उस रिश्ते को घाटे का सौदा नहीं मानता बल्कि यह मेरे जीवन का वह अनुभव है जिसने मुझे राजा भर्तृहरि की तरह जिंदगी के सत्य-असत्य का अनुभव कराया; जिसने मेरे स्वप्निल मानस, कल्पनाशील आत्मा और इंद्रधनुषी मिजाज पर यथार्थ का गिलाफ चढ़ाया . . . स्वप्न और यथार्थ के थपेड़े खाते वे लम्हे जो मुश्किल से पच्चीस मिनट से भी कम के रहे होंगे, पर जिन्होंने औरत और जिंदगी पर मेरी समझ को पूरी तरह बदल ही डाला था।'' और फिर अपनी 'अव्यावहारिकता' पर कुर्बान जाती आत्ममुग्धता के साथ प्रेमिका को खारिज करने की उद्दण्डता तो है ही '- ''मुझे दुख है कि मैंने उसे खो दिया; पर उससे ज्यादा दुख इस बात का है कि उसने भी अपने आपको खो दिया।'' एक गहरी आश्वस्ति का भाव कि हमारे बिना तुम्हारी नैया का खेवनहार और कोई कैसे हो सकता था भला!

विजय के लिए प्रेम भीषण गर्मी में कुल्फी का लुत्फ उठाने की ऐयाशी है। बेकारी के दिनों में जब सब कुछ एक ही बिंदु पर ठहर गया है, प्रेम उसे गति का आभास देता है। मारवाड़ी विजय का बंगाली साहित्यानुराग से भर उठना और बंगालन रेशमा का हिंदी साहित्य को कंठस्थ कर डालना - दोनों अपनी-अपनी जगह प्रेम का कौतुकपूर्ण खेल खेल रहे हैं। लेकिन वक्त की तरह प्रेम भी कभी एक सीध में नहीं चलता। हाथ में अंगारों की लुटिया लिए वह हर कदम पर अग्नि परीक्षा का आयोजन कर डालने को बेताब रहता है। रेशमा की मां कैंसरपीड़ित न होती, डॉक्टरों ने उसके जीवन की अधिकतम अवधि छः माह न बताई होती, और प्राण त्यागने से पूर्व बेटी के हाथ पीले करने का हठ न पाले होती, तो भी प्रेम विजय-रेशमा की प्रतिबद्धता जानने के सौ-सौ अवसर जुटा लेता। फिलहाल वह रेशमा के साथ लाज-हया ताक पर धर कर जीने का आधार पा लेना चाहता है। ''मुझे भगा ले चल'' - रेशमा की सोच जितनी स्पष्ट और भविष्योन्मुखी है (रेशमा में पारो की अनुगूंज सुनाई पड़ रही है न जो रात के अंधेरे में देवदास के कमरे में आई है और अब उससे अपने पैरों में शरण देने की गुहार लगा रही है), विजय की उतनी ही अस्थिर और पलायनवादी। वह तो आसमान में उड़ती पतंग था, रेशमा के प्रस्ताव ने बिना पेंच लड़ाए उसे काट दिया। औंधे मुंह जमीन पर गिरा तो 'कमाऊ पूत' होने के बावजूद इतना बड़ा कदम उठाने की हिम्मत जवाब देने लगी। अपनी 'कापुरुषता' को उदारमना पुरुष भी नहीं स्वीकारता। विजय ही क्योंकर स्वीकारे? निम्नमध्यवर्गीय युवक के पास बहानों की कोई कमी तो होती नहीं। विजय चुन-चुन कर अपने चारों ओर मजबूरियों की मजबूत दीवार चुन लेने में उस्ताद। मजबूरी नं0 एक, अभाव! ''मैं घर चला आया और देखता रहा अपनी मां और युवा बहन को, वृद्ध होते पिता को। अपने 110 वर्गफीट के सीलन भरे, पलस्तर उखड़ी दीवारों वाले घर को।'' मजबूरी नं0 दो - प्रेयसी को आसमान पर बैठा देने की रोमानियत को ही प्रेम और पुरुषार्थ समझने की हठधर्मिता। ''तेरे जैसे चांद को इस अंधेरे में कैसे रखूं?'' लच्छेदार बातें कभी दूसरे की जमीनी मजबूरियों को नहीं समझ पातीं। मजबूरी नं0 तीन - आत्मविश्वास का अभाव। ''मैं डर गया था, जिंदगी से दूर अपने परिवारजनों के सामने जिंदगी को इतनी जल्दी अपने आगोश में लेने से . . . यदि इस चांद को मैंने धरती पर उतार दिया तो सब कुछ चौपट हो जाएगा।'' भाग्य कोरी किताब लेकर विजय के सामने उपस्थित है। अपनी तकदीर विजय को खुद लिखनी है, लेकिन वह अपना घोंसला बनाने की कला नहीं जानता। विच्छेद को उसने हाथ पकड़ कर खुद स्वीकारा है। जड़ता और जड़ता! विजय की जड़ सोच देवदास की आत्मघाती रोमानियत में अपने अस्तित्व की सार्थकता देख लेना चाहती है - ''मैं स्वयं अपनी पीड़ा का ईवश्र था, इस कारण नहीं चाहता था कि उसके संसार में मेरे चलते कुछ भी खलबली मचे।'' देवदास से अलग परदुखकातरता और हितैषी होने के दावे अलबत्ता खूब हैं विजय के पास।

गुसांई विस्फारित नेत्रों से विजय को एकटक घूर रहा है - 'इतना दंभ कि तुमने भाग्य को ठोकर मार दी?' वह जरा सा उत्तेजित भी हो गया है - 'या कि तुम रेशमा से प्यार ही नहीं करते थे? रेशमा के बहाने सपनों से खेल रहे थे?'

विजय जवाब देने की कोशिश में हकला कर रह गया।

'माता-पिता के विरोध की बात दूर, तुमने तो उन्हें सूचित भी नहीं किया।' गुसांई का रोम-रोम लछमा के पिता की विवाह-अस्वीकृति से झनझना गया। न, अपमान नहीं, हताशा! किन्हीं नई रणनीतियों को क्रियान्वित करने की आवश्यकता कि वे कन्यादान के लिए राजी हो जाएं। इसके लिए उसे वक्त चाहिए। धीरज और इंतजार  . . . लछमा की तरह गुसांई भी इन दोनों नियामतों की कीमत जानता है। यही वादा लेकर तो वह उस साल छुट्टियां खत्म होने पर पलटन लौटा था। विश्वास की डोर दोनों तरफ मजबूत थी कि परिवार और बिरादरी की सहमति लेकर अपना आशियाना बसा लेंगे वे दोनों।

लछमा की तुलना में रेशमा अधिक साहसी और डाइनेमिक पात्र है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा मिजरेबल भी। वह स्त्री की पारंपरिक छवि - पोटली - होने की विवशता का प्रतिकार भी है और लछमा की तरह उसका विस्तार भी। आश्चर्य है कि 'कोसी का घटवार' पाठ-विश्लेषण की सर्जनात्मक प्रक्रिया में जहां गुसांई और लछमा दोनों के अंतःराग की कहानी बनी रहती है, वहीं 'चिड़िया ऐसे मरती है' कुंठित विजय को परे धकेल कर हाशिए पर ठिठकी रेशमा को केन्द्र में ले आती है। बेशक दोनों कहानियां आधी सदी के अंतराल को पार कर संवेदना और चिंता के एक ही बिंदु पर जा मिलती हैं - पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था की पड़ताल की जरूरत, गोकि दोनों ही कहानियों में प्रत्यक्षतया इस सवाल को बिल्कुल नहीं उठाया गया है। 'कोसी का घटवार' में इसलिए कि 'नई कहानी' के जमाने में 'मनुष्य' की अस्मिता को प्रकाशित-संवर्धित करने का जज्बा अधिक था, उसे उसके समाज, मनोविज्ञान और भूगोल के केन्द्र में रख कर भीतर तक समझने-विन्यस्त करने की व्यकुलता तब तक नहीं पनपी थी। 'नई कहानी' आदर्श और रोमान का विरोध करने के दावे भले ही करे, तल्ख यथार्थ को उकेरने की छटपटाहट में वह स्टीरियोटाइप्स में अंतर्निहित विडंबनाओं को उलट-पलट कर देख जरूर लेती थी, उन्हें झकझोर कर तोड़ने का साहस अपने भीतर नहीं पाती थी। इसलिए स्टीरियोटाइप्स को प्रश्नांकित करने के बावजूद स्टीरियोटाइप्स और अपना-अपना सलीब ढोती विडंबनाएं 'नई कहानी' में यथावत् बने रहते हैं। इसीलिए ये कहानियां एक मार्मिक हिलोर के साथ पाठक के अंतर्मन को छूती हैं, लड़ने की ऊर्जा से भीतर की आग को लहकाती नहीं हैं। 'नई कहानी' के उलट 'चिड़िया ऐसे मरती है' में पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था के पुनरीक्षण का सवाल इसलिए नहीं आया है कि मधु कांकरिया अस्मिता विमर्श को बेमानी मानती हैं। प्रचलित सोच के अनुरूप साहित्य को लिंग, धर्म, वर्ग, वर्ण आदि विभाजनों से परे वे एक समग्र बोध का नाम देती हैं जो सारे पाठकों में साधारणीकरण की समान प्रक्रिया उद्बुद्ध कर एक सा आस्वाद कराता है। आज जब शिक्षा एवं जनतांत्रिक चेतना के प्रसार के कारण हाशिए पर खड़ी अस्मिताएं अपने विवेक और दृष्टि से साहित्यिक-सामाजिक संरचनाओं को पढ़ने-गुनने लगी हैं और परंपरागत दृष्टि से 'मनुष्य' नाम से सम्बोधित अस्मिता को अपनी शोषक ताकत के रूप में चीन्हने लगी हैं, तब साहित्य को अखंड-समग्र मानने की हठधर्मिता उनके लिए 'सवर्ण मर्द मानसिकता' का पर्याय बन जाती है। कहने की जरूरत नहीं कि विजय इसी सवर्ण मर्द मानसिकता का प्रतिरूप है। सम्बन्ध-विच्छेद के लिए अपने पलायन में छुपे नकार को उत्तरदायी मानने की बजाय वह 'बाजार बनी प्रेमिका' पर सौ-सौ लानतें भेज कर उसे ही कठघरे में खींच लाता है। यह वही शातिर पैंतरेबाजी है जो पहले प्रेम के नाम पर स्त्री का 'आखेट' करती रही है, और फिर उससे मन भर जाने पर सती बरक्स कुलटा की अवधारणा रच कर उसे गरियाने लगती है।

मैं देख रही हूं, गुसांई ही नहीं, लछमा भी विजय को झिड़क देने के लिए कसमसा रही है। उस बेचारी (रेशमा) का इतना सा कसूर कि रेडीमेड कपड़ों की दुकान पर 'भारी डिस्काउंट का आखिरी दिन' की सूचना पढ़ कर अपने शिशु के लिए कपड़े खरीदने दुकान में घुस गई है; व्यस्त भाव से दुकानदार से मोलभाव कर रही है; और पूरी तरह भूल चुकी है कि दुकान के बाहर उसका भगोड़ा प्रेमी प्रतीक्षा कर रहा है। हो सकता है, भूली न हो; उसकी उपस्थिति से बाखबर हो, ठीक वैसे ही जैसे अपने पति के बटुवे की हैसियत से है। चयन का मौका आया तो प्राथमिकता पत्नी धर्म को देकर घर-गृहस्थी के खर्चे में कुछ बचत कर लेना चाहती हो। जानती है कि सुघड़ गृहिणी की बचत पूरे परिवार की अतिरिक्त आय बन जाती है। हो सकता है, विगत प्रेमी के चेहरे पर पुती प्रणय-याचना उसे लिजलिजी लगी हो - 'पराए माल' पर लार टपकाने की कुत्सित आदिम मनोवृत्ति . . . और अपनी ही हताशा को धोने के लिए वह स्वयं एकांत चाहती हो।

विजय प्रतिकार में आगे बढ़ आया है। गर्व से ऐंठी खीझ के साथ उसने हम तीनों को ठोक-पीट कर बता दिया है कि ''न अतीत की कोई चांदनी छिटकी हुई थी उसके चेहरे पर और न ही वर्षों बाद हुए मिलन की कोई उत्तेजना, न लगाव और रोमांच ही था।''

लछमा और गुसांई ने एक-दूसरे पर भरपूर नजर फेंक कर वितृष्णा से मुंह मोड़ लिया है। क्या कहें इस आत्मकेन्द्रित अड़ियल से? 'जिंदगी की हकीकतों के सामने इन रोमानी बातों की कोई कीमत नहीं विजय बाबू।' अपने पर संयम रख मैं तफसील से विजय को पंद्रह बरस बाद मिले गुसांई-लछमा की भेंट के बारे में बताती हूं।

''तुम?'' जाने लछमा क्या कहना चाहती थी, शेष शब्द उसके कंठ में ही रह गए।

''हां, पिछले साल पलटन से लौट आया था, वक्त काटने के लिए यह घट लगवा लिया।'' गुसांई ने . . . होंठों पर असफल मुस्कान लाने की कोशिश की।

कुछ क्षण तक दोनों कुछ नहीं बोले। फिर गुसांई ने ही पूछा, ''बाल-बच्चे ठीक हैं?''

आंखें जमीन पर टिकाए, गरदन हिला कर संकेत से ही उसने बच्चों की कुशलता की सूचना दे दी। जमीन पर गिरे एक दाड़िम के फूल कोे हाथों में लेकर लछमा उसकी पंखुड़ियों को एक-एक कर निरुद्देश्य तोड़ने लगी और गुसांई पतली सींक लेकर आग को कुरेदता रहा।

बातों का क्रम बनाए रखने के लिए गुसांई ने पूछा, ''तू अभी और कितने दिन मायके ठहरने वाली है?''

अब लछमा के लिए अपने को रोकना असंभव हो गया। टप-टप-टप, वह सर नीचा किए आंसू गिराने लगी। सिसकियों के साथ-साथ उसके उठते-गिरते कंधों को गुसांई देखता रहा। उसे यह सूझ नहीं रहा था कि वह किन शब्दों में अपनी सहानुभूति प्रकट करे। इतनी देर बाद सहसा गुसांई का ध्यान लछमा के शरीर की ओर गया। उसके गले में काला चरेऊ (सुहाग-चिन्ह) नहीं था। हत्प्रभ सा गुसांई उसे देखता रहा। . . . ''

''विजय, तुम अपने से अलग रेशमा के वजूद को किसी और के साथ जुड़ा देख ईर्ष्या से फुंक गए . . . और गुसांई . . . लछमा की देह के साथ सट कर बैठे उसके बच्चे को देख कर जैसे उसे लछमा के हिस्से का सारा प्यार उंडेल देने का बहाना मिल गया हो। इसीलिए कहती हूं, प्यार देह की चीज नहीं, हृदय का संवेदन है - लचीला तरल संवेदन। रूप बदल कर कभी वात्सल्य में ढल जाता है, कभी जिम्मेदारी में। मूलतः वह समर्पण ही है।'

'रेशमा को खुद ही क्रूर जमाने के हवाले कर अब तुम दोनों की दुनिया अलग होने का रोना कैसे रो सकते हो बेटा?' गुसांई ने स्नेह से विजय को पुचकार दिया, 'मेरी दुनिया तो समाज ने मिल कर लूट ली थी। फिर भी लछमा मुझसे जुदा कहां हुई?' लछमा की दीठ में आत्मविश्वास और तृप्ति छलक रही थी।

'न बेटा, औरत हो या मर्द, किसी के सरोवर का पानी नहीं सूखता। बेमानी है तुम्हारा यह शिकवा कि ''कैसे लहरों के साथ दौड़ने वाली, कविता, स्वप्न और सौन्दर्य में ही विचरण करने वाली एक खरगोश लड़की सिर्फ दाल-रोटी की ही होकर रह गई।'' रेशमा के दर्द में घुली लछमा मानो खुद रेशमा हो गई हो।

'न, अतीत के प्रेत से मुक्ति इतनी आसान नहीं होती बेटा। मर्द हो या औरत, एक सी फितरत लेकर पैदा होता है इंसान। बस, फर्क यह है कि औरत बियाबान में उगे कीकर की तरह आप ही आप अपने सीमित संसाधनों के सहारे जीना सीख लेती है। अतीत की कड़वाहट जहर बन कर उसकी रगों में भी उतर जाना चाहती है, लेकिन अपनी गोद में खेल रहे जीवन को बचाने के लिए वह अतिरिक्त मुस्तैदी से नीलकंठ बन जाती है। अपने ही दर्द का उत्सव मनाने या बदले की झोंक में खून के बवंडर उठा देने की ऐयाशी उसके नसीब में कहां?' लछमा के आगोश में रेशमा कब दुबक गई, पता ही नहीं चला।

'लोभ और हिकारत की नजर से औरत को देखने का संस्कार दिल से निकाल फेंको बेटा। यह तुम जैसों को बहुत छोटा बना देता है।' लछमा कुछ ज्यादा ही सख्त हो गई, 'जान लो कि प्रेम पहले-पहल लोभ का चोला पहन कर ही आता है, लेकिन फिर दृष्टि पाते ही अपना व्यक्तित्व सिरजने आगे-आगे बढ़ता रहता है। तुम्हारी तरह उसी बिंदु पर टिक कर खड़ा रहा तो वणिक्बुद्धि से प्रेम और प्रिय के बरक्स अपने लोभ को ही तोलता रहेगा। रेशमा बाजार नहीं बनी बेटा, अलबत्ता तुम बाजार से अलग कभी कुछ हुए ही नहीं।'

मैं बाग-बाग! लगा यही समय है विजय को बता दूं कि पंद्रह साल के बिछोह के बावजूद लछमा और गुसांई का सरोवर पानी से ही लबालब नहीं भरा, कमल-फूलों से भी अटा पड़ा है। कैसा अबूझ संतुलन बैठाया है दोनों ने प्रेम और दायित्च, विगत और वर्तमान में कि अलग-अलग जमीन पर खड़े होकर वे जमीन के नीचे जड़ों के महीन जाल से भी जुड़े हैं और ऊपर आसमान में तैरते शुभाशीषों से भी। एक साथ निःसंग और आप्लावित! कुछ पाने की आकांक्षा नहीं, दे देने की व्याकुलता। दाता होने के बड़प्पन-भाव के साथ नहीं, दुख-दारिद्र्य दूर कर पाने के एक अनिर्वचनीय संतोष के साथ। लछमा के घर दो दिन से नमक-तेल खरीदने के पैसे नहीं हैं, भूख को पेट से बांध कर बेटा उसकी अभावग्रस्तता की डोंडी पीट रहा है और लछमा है कि आर्थिक मदद के लिए पेंशनयाफ्ता गुसांई के बढ़े हाथ को अदब के साथ परे ठेल देती है - ''गंगनाथ दाहिने रहें, तो भले बेरे दिन निभ ही जाते हैं जी। पेट का क्या है, घट के खप्पर की तरह जितना डालो, कम हो जाए। अपने-पराए प्रेम से हंस-बोल दें, तो वही बहुत है दिन काटने के लिए।'' संन्यांसी नहीं है गुसांई। लछमा के नकार ने मानो उसके अस्तित्व और सम्बन्ध दोनों को नकार दिया है। एकदम फालतू और बाहरी हो जाने की प्रतीति! कड़वाहट ने उसकी जबान को कड़ा कर दिया है। अपने ही 'होने' पर चाबुक बरसाने लगा है वह - ''दुख-तकलीफ के वक्त ही आदमी आदमी के काम नहीं आया तो बेकार है। स्साला! कितना कमाया, कितना फूंका हमने इस जिंदगी में। है कोई हिसाब! पर क्या फायदा! किसी के काम नहीं आया। इसमें अहसान की क्या बात है? पैसा तो मिट्टी है स्साला! किसह के काम नहीं आया तो मिट्टी, एकदम मिट्टी!'' तो क्या विजय की तरह खौलते-उबलते वह आत्माभिमान से जगर-मगर प्रेयसी को ही गरियाने लगे? विजय की तरह यथार्थ की तीखी लहर ने उसे भी भीतर तक छील दिया है कि ''वर्षों पहले उठे हुए ज्वार और तूफान का वहां (लछमा के चेहरे पर) कोई चिन्ह शेष नहीं था। अब वह सागर जैसे सीमाओं में बंध कर शांत हो चुका था।'' चौराहा अप्रत्याशित मिलन के अवसर जुटाता है तो बिछोह की पीठिका भी तैयार करता है। हताशा और स्वप्न-भंग के बीच गुसांई इस सत्य को जानता है। दोस्ताना भाव से विजय की पीठ पर हाथ रख कर वह उसी के शब्दों में अपने दर्द को साझा कर रहा है कि हां, तुम्हारी तरह ''भावनाओं का झीना-झीना सा पुल हम दोनों के बीच भी बनने ही लगा था कि तभी (लछमा के प्रतिवाद से) सब कुछ कच्चे कांच सा दरक उठा।'' लेकिन यह तो निरी एक प्रतिक्रिया है, सरोवर में कंकर फेंकने से उठी एक हिलोर।

'तुम क्रिया-प्रतिक्रिया को आप्लावनकारी सत्य मान कर पलायन कर गए विजय, मैं उस पल के भीतर डुबकी लगा कर लछमा के द्वीप पर दूर तक तैर आया।''

विजय के चेहरे पर आश्चर्य फैल गया। कैसी अनहोनी बात कह रहे हैं गुसांई बाबा। मैं तो वहीं उस पल के ऊपर ठिठका खड़ा रहा और लानतों-मलामतों का कीचड़ फेंक-फेंक कर उसे दलदल बनाता गया कि ''क्या यह वहीं रेशमा है जो सारी दुनिया भूल मुझमें डूब जाया करती थी, जो आज इतने वर्षों बाद मिली भी तो क्या मिली।''

'औरत की दुनिया हम मर्दों की तरह इतनी सीधी-सपाट नहीं होती बेटा,' गुसांई ने आत्मग्लानि से पुते विजय के चेहरे पर स्नेह से उंगलियां फिरा दीं। 'अपने घेरे से बाहर निकलो तो पाबंदियों में जकड़ी औरतें असीम विश्वास के साथ जीवन को सींचती दीख जाती हैं।''

'पर बाबा, मैंने रेशमा को बाजार बनते देखा है।' प्रतिवाद का हल्का सा स्वर विजय की ओर से।

'औरत को इंसान बनने की मोहलत तो हम देते नहीं बेटा, फिर पल-पल रूप बदलने की इजाजत कैसे दे देंगे? हां, मायाविनी कह कर हम ही उसे धिक्कारते रहते हैं क्योंकि पल-पल उग्रतर होती हमारी लालसाएं उससे क्या कुछ नहीं पा लेना चाहतीं।' गुसांई में समंदर का धीरज और अनुभव-राशि से अर्जित मनुष्यता का अथाह भंडार!

'किसी को देकर हम खुद को बड़ा या सुखी नहीं करते, पाने वाले को छोटा कर देते हैं। दान ऐसा हो जो किसी को न दीखे, बस, हवा और पानी की तरह उसकी जमीन को नम और उर्वर बना दे।'

मुझे मानो सवाल का जवाब मिल गया कि क्यों यह कहानी 'कोसी का घटवार' दिल को इतना छूती है। परंपरागत कहानियों सरीखी बिछोह की पीर इसमें नहीं है। होती तो लैला-मजनूं आदि के किस्सों की श्रेणी में सूचीबद्ध होकर स्मृति से उतर जाती लेकिन यह जो कलेजे में इतनी दूर जाकर धंसी है कि अलौकिक सुख बन कर मेरे भीतर की 'स्त्री' को पुलकाए जा रही है, वह इसीलिए न कि 'दान ऐसा हो जो किसी को न दीखे, बस, हवा और पानी की तरह उसकी जमीन को नम और उर्वर बना दे।'

न, चोरी-चोरी बेहद संकोचपूर्वक लछमा के आटे में दो-ढाई सेर अतिरिक्त आटा मिलाता गुसांई दानवीरता के दावों से बहुत दूर है। अपनी हर कहानी के साथ पात्रों के जरिए पाठक की भावभूमि का उदात्तीकरण करते शेखर जोशी इतने क्षुद्र व्यक्तित्व में गुसांई को विघटित नहीं कर सकते। उनकी नायिका प्रेम के दो बोल पाकर बुरे दिन काटने का हौसला संजोए है तो नायक प्रेम के मर्म को समझ कर जीने का औदात्य। और प्रेम है कि अपनी फितरत से बाज नहीं आता। लम्बे बिछोह के बाद क्षणिक मिलन की घड़ियों में भी अग्निपरीक्षा का सरंजाम! प्रेम के घनत्व के साथ-साथ मनुष्यता की गहराई और ऊँचाई मापने के जतन भी। वासना (मांग और रोमानियत, वर्चस्व और भावुुकता) को गला कर ही प्रेम दमकता है। विजय प्रणयी याचक की क्षुद्रता से मुक्त नहीं हो पाया है; गुसांई नीर भर बदली बन कर लछमा की दरकी जमीन पर बरस गया है। स्त्री न होते हुए भी शेखर जोशी स्त्री-मानस को बखूबी पढ़ लेते हैं। यहां यह कहना बिल्कुल जरूरी नहीं कि स्त्री होने के बावजूद मधु कांकरिया स्त्री-मन के अंदेशों, द्वंद्वों, आशंकाओं और भीत सिहरनों को कहानी में कहीं भी व्यक्त नहीं कर पातीं। दरअसल रेशमा को स्त्री/मनुष्य रूप में उन्होंने देखना चाहा ही नहीं। वह कहानी की कल्पना में बाजार यानी एक रिजेक्शन के रूप में उभरी है - स्टीरियोटाइप्स को पुष्ट करती प्रखर सोच के साथ। मितभाषी शेखर जोशी और उनसे भी ज्यादा मितभाषी गुसांई . . . घरघराते कंठ से लछमा को पुकार कर पीठ मोड़ने वाला चुप्पा गुसांई भीतर की हलचल को न शब्दों में बांधना जानता है, न चेहरे पर पोतना। विजय और मधु कांकरिया दोनों इस कला में सिद्धहस्त हैं। गुसांई प्रेमियों के मनोविज्ञान का अपवाद तो नहीं। मैं विजय के सहारे उसके लछमा-मिलन के रोमांच को गुनने लगी हूं। शब्द शेखर जोशी के नहीं, मधु कांकरिया के हैं - ''उसकी आवाज में वही प्रेम, वही जादू था और पलक झपकते ही फिर एक आनंद नगरी का निर्माण होने लगा था, जिसमें सिर्फ मैं था और वह थी। उसने कहा, चलिए, कहीं बैठ का चाय पीते हैं। मैं निहाल हो गया। आज बहुत सारा जी लूंगा मैं। थोड़ी देर तक सपनों का एक रंगीन और खुशनुमा टुकड़ा हमारे साथ चलता रहा।''

स्त्री के पास कुछ हो न हो, छठी इन्द्रिय खूब सक्रिय होती है . . . और वर्जनाओं के बोझ तले उसकी चेतना में सही-गलत का मूल्यांकन करते रहने की चौकसी भी। प्रेमी से मिलने का रोमांच और पतिव्रता होने का दबाव - तमाम रोमांच भरे आह्लाद के बावजूद संस्कारों की लक्ष्मण रेखा के पार प्रेमी 'पर-पुरुष' ही रह जाता है। मधु कांकरिया चूंकि रेशमा की ओर से बात नहीं करतीं, मैं लछमा की सिहरन और बढ़ती धड़कन के जरिए विजय की प्रेमातुरता के प्रति रेशमा की रिजर्वेशन को जान जाती हूं। विदा की वेला में गुसांई का स्वर कातर हो आया है। अटक-अटक कर वह जिस भाव-विह्वल स्वर में लछमा का नाम पुकार रहा है, उससे लछमा के 'मुंह का रंग अचानक फीका' होने लगा है। गुसांई को चुपचाप अपनी ओर देखते पाकर उसे संकोच होने लगा है। 'न जाने क्या कहना चाहता है' - वह मानो अरक्षित हो उठी है। यकीनन भीतर ही भीतर अपने को मजबूत करके प्रेमी की हर ओछी हरकत का प्रतिकार करने का हौसला भी जुटा लिया है उसने। 'कहीं फिर से प्रणय-निवेदन तो नहीं?' - खीझ और विरक्ति से सर्वांग कांपा हो तो हैरत की बात नहीं। शर्म से पानी-पानी होते हुए गुसांई ने लछमा से निवेदन तो किया ही है - ''कभी चार पैसे जुड़ जाएं तो गंगनाथ का जागर लगा कर भूलचूक की माफी मांग लेना। पूत-परिवार वालों को देवी-देवता के कोप से बचा रहना चाहिए।'' लछमा ने आश्वस्ति की गहरी सांस ली मानो रिडेम्पशन के इस पल में एक बार फिर गुसांई को पा लिया हो उसने। और गुसांई . . . वह सिहर गया है, प्रायश्चित और वचन-भंग की पीड़ा के कारण नहीं, अनावृत्त हो जाने की शर्म सेे कि जिस प्रेम की अंतरंग स्मृतियों को जीवन का संबल बना कर हृदय की गुह्यतम गहराइयों में छिपा रखा था, वही अब सतह पर सबके सामने प्रकट हो गया है। लेखक ने नहीं बताया कि लाज की आभा से उसका चेहरा सिंदूरी हो गया है, लेकिन यह कोई बताने की बात भी नहीं। सिर्फ समझने की बात है कि गुसांई की लाज में अपने गोपन रहस्य के उघड़ पड़ने से लछमा की लाज भी घुल गई है। समझने की बात तो यह भी है कि इस दोहरी लाज में सम्बन्ध की मिठास और ताजगी बने रहने के आह्लाद की लालिमा भी घुल गई है। कौन कहता है कि दोनों अकेले हैं और रिक्तहस्त रंक भी।

'यह सब कुछ ज्यादा ही रोमानी नहीं हो गया?' विजय मुझे झिंझोड़ देता है। ''जमाना बहुत तेजी से आगे बढ़ गया है, और आप हैं कि पचास साल पीछे जो गईं तो वहीं जम कर बैठ गईं। आजकल देखिए, फास्ट, सब कुछ फास्ट - बनाना, तोड़ना, आगे बढ़ना। वी एडोर एक्शन!'

. . . फिर स्पीड़ . . फतवेबाजी . . . हिंसा . . आतंक . . . ''इन्हीं पायदानों पर आगे बढ़ते हो न तुम? पीछे लौटना हमेशा पुराना, कमजोर या अप्रासंगिक होना नहीं होता। पीछे बहुत मूल्यवान कुछ छूट जाए तो उसे सहेज कर लाना ही होगा - ऐसा मूल्यवान जो फिलहाल आचार-व्यवहार से गायब हुआ है; पीछे छूटा ही रह गया तो स्मृतियों से भी गायब हो जाएगा। प्रेम के आलोक में अपनी मनुष्यता को बनाए रखने का वरदान।''

मैंने देखा, लछमा के कंधे पर सिर रख रेशमा फूट-फूट कर रो रही है। ''मेरे पास दस हाथ हैं मां, बस, एक जोड़ी पांव नहीं। चाहती थी, विजय के पांवों पर खड़ा होकर दसों हाथों से उसके सिर पर छाए आसमान को चौड़ और चौड़ा कर दूं। पर उसने सुनी ही नहीं मेरी बात! देखी ही नहीं मूझे चीरतीं मजबूरियां! . . . और आज भी . . . '

मैं सोच रही थी, जाने किस कुहासे में घिर गए हैं हम। तमाम प्रगतिशीलता और पश्चिमीकरण के बावजूद लड़कियों के पास चलने को लक्ष्योन्मुखी स्वतंत्र पांव नहीं, और दौड़ते-फांदते लड़कों के पास मजबूत इरादों से भरे हाथ नहीं। क्या इसलिए कि प्रेम और सम्बन्ध, हृदय और बुद्धि के समन्वयात्मक समंजन को जांचने-सिरजने के लिए शेखर जोशी जैसी आस्थाशील सृजनात्मकता धीरे-धीरे चुक रही है? क्या इसीलिए 'कोसी का घटवार' को युवा पीढ़ी की आचार संहिता की प्राथमिक पाठशाला का दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए?





डॉ0 रोहिणी अग्रवाल

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग,

महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,

रोहतक
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मुद्राराक्षस का न रहना सचमुच एक पटाक्षेप — वीरेन्द्र यादव | Virendra Yadav on Mudra Rakshasa

12:12 am टिप्पणी करें

मुद्राराक्षस का न रहना सचमुच एक पटाक्षेप — वीरेन्द्र यादव
Photo: Rommel Mudra Rakshasa

Virendra Yadav remembers Mudra Rakshasa 

मुद्राजी का मुद्राराक्षस नाम भी इसी लेख के चलते चल निकला क्योंकि डॉ. देवराज ने मुद्राजी के मूलनाम सुभाष चन्द्र आर्य के नाम से इसे न प्रकाशित कर मुद्राराक्षस के छद्मनाम से प्रकाशित किया था। 

बीती तेरह जून को प्रख्यात लेखक मुद्राराक्षस का देहावसान हिन्दी के बौद्धिक जगत को ही नहीं बल्कि वृहत्तर हाशिए के समाज को भी जिस गहराई से व्यथित कर गया, वह विरल है। ‘लाल सलाम’ और ‘जय भीम’ के उदघोष के साथ उनका अंतिम संस्कार उल्लेखनीय इसलिए है क्योंकि संभवतः यह पहली बार था कि किसी गैर-दलित उत्तर भारतीय लेखक को दलित समाज और मार्क्स वादी कतारों का इतना अपनापन एक साथ मिल पाया, विशेषकर तब जबकि वे न तो कट्टर अम्बेडकरवादी थे और न ही सांचे ढले मार्क्सवादी। मार्क्स, लोहिया और अम्बेडकर उनके बौद्धिक प्रेरणास्रोत अवश्य थे, लेकिन अपनी संशयालु आलोचनात्मक दृष्टि के चलते वे इन सभी विचार सारणियों के बीच से अपनी अलग बौद्धिक राह बनाने के कायल थे। इसी का परिणाम था कि जहां भगत सिंह के सकारात्मक मूल्यांकन के लिए उन्होंने पुस्तक लिखना ज़रूरी समझा वहीं प्रेमचंद को वे अंत तक प्रश्नांकित करते रहे। दरअसल उनके सत्ता विरोधी विद्रोही मानस के चलते व्यावहारिकता और समायोजन के लिए कोई अवकाश नहीं था। उल्लेखनीय है कि जिस दौर में हिंदी बौद्धिकों की बड़ी जमात दिल्ली का रुख करके अपने जीवन को धन्य-धन्य करने में लगी थी, मुद्राजी आकाशवाणी की अपनी नौकरी छोड़कर अपने पैतृक नगर लखनऊ वापस हुए क्योंकि आपातकाल के उस दौर में रीढ़ को सीधा रख पाना लगभग असंभव था। अपने उपन्यास ‘भगोड़ा’ में मुद्राजी ने इसके अत्यंत प्रामाणिक और आत्मकथात्मक सन्दर्भ प्रदान कि ए हैं। उनके लिए आपातकाल उनकी रचनात्मकता का नया प्रस्थान बिन्दु था। ‘मरजीवा’, ‘तिलचट्टा’ और ‘तेंदुआ’ सरीखे पश्चिम की अब्सर्ड नाट्य-विधा को तिलांजलि देकर यह उनके नए रचनाकार व्यक्ति त्व के उदय का वह समय था जब उन्होंने ‘हम सब मंसाराम’,’शांति भंग’ और ‘दंडविधान’ सरीखे उपन्यास लिखे और विपुल वैचारिक लेखन कि या। यह अनायास नहीं है कि उत्तर आपातकाल के ही इस दौर में उन्होंने दलित, स्त्री और अल्पसंख्यक के मुद्दों को अभियान की हद तक वैचारिकता और रचनात्मक स्वर प्रदान कि ए। उन्होंने अपने इस दौर के लेखन में हिंदी साहित्य की प्रभुत्वशाली धारा और सुखासीन समाज का हाशिए के वर्गों की निगाहों से देखने का जो जतन कि या उसने जहाँ दलित समाज के बौद्धिकों और सामान्य पाठकों के बीच उन्हें चर्चित और लोकप्रिय बनाया वहीं सत्ता प्रति ष्ठान, अभिजन समाज और प्रभुत्वशाली लेखकों के कोपभाजन के भी वे शिकार हुए। यही कारण था कि जहां सरकारी तंत्र के पद, प्रतिष्ठा और पुरस्कार उनसे दूर रहे वहीं जनसम्मान और जन-अभिनन्दन के विपुल अवसर उनके लिए जुटते रहे। वे जन्मना दलित नहीं थे, लेकिन सभी अम्बेडकरवादी संगठन और पत्र-पत्रिकाएं उन्हें अपना रहबर और प्रवक्ता मानती थीं।

Virendra Yadav on Mudra Rakshasa
साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, सामंतवाद और अभिजनवाद का सतत विरोध एवं उसके बरक्स परिवर्तनकामी प्रगतिशील मूल्य चेतना उनके समूचे वैचारिक चिंतन का मूल आधार रही। वर्णाश्रमी हिंदुत्व और ब्राह्मणवादी प्रतिगामी सोच के वे कठोर निंदक थे। उनकी पुस्तक ‘धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ’ धर्म की विभेदकारी और शोषक संरचना का मौलिक क्रिटीक है। उन्होंने अपनी वैचारिक निष्पत्ति यों द्वारा धर्म, पूंजी, साम्राज्यवाद और वर्णाश्रमी-जाति श्रेष्ठता के अंतर्संबंधों का खुलासा जिस सहज पदावली में किया उससे उनकी जनस्वीकार्यता और लोकप्रियता बढ़ी । समसामयिक मुद्दों पर वे जिस तीखेपन, बेलाग और प्रहारात्मक शैली में लिखते थे उससे उनकी जो जनपक्षधर, निडर, साहसिक और सत्ताविरोध की बौद्धिक छवि बनी वह उनके व्यक्तित्व की अलग पहचान थी। जिन दिनों अज्ञेय का हिंदी समाज पर काफी रौब-दाब था और जब ‘तार-सप्तक’ को हिंदी में आधुनिकता का पथ-प्रदर्शक सिद्ध करने के शीर्षासन किए जा रहे थे तब मुद्राजी ने समूची ‘तार-सप्तक’ मुहिम को ‘एक्सपेरिमेंटल राइटिंग इन अमेरिका’ की अनुकृति सिद्ध करते हुए डॉ.देवराज द्वारा सम्पादित पत्रिका ‘युगचेतना’ में एक ध्वस्तकारी लेख लिख डाला। मुद्राजी का मुद्राराक्षस नाम भी इसी लेख के चलते चल निकला क्योंकि डॉ. देवराज ने मुद्राजी के मूलनाम सुभाष चन्द्र आर्य के नाम से इसे न प्रकाशित कर मुद्राराक्षस के छद्मनाम से प्रकाशित किया था। तब मुद्राजी मात्र बाईस वर्ष के थे। यह लेख इतना चर्चित और बहस-मुबाहिसे का केंद्र बना कि मुद्राजी को अपना वास्तविक नाम छोड़कर छद्मनाम ही अपनाना पड़ा, लेकिन नाम के छद्म के अतिरिक्त मुद्राजी का सबकुछ एक खुली किताब था। उनका न रहना सचमुच एक पटाक्षेप है। उनकी स्मृति में हार्दिक नमन।

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