ठण्डी चाय: संदीप तोमर की भावनात्मक कहानी

हम दोनों के वार्तालाप में चाय ठण्डी हो चुकी थी, भावना की आवाज़ में एक भारीपन था। उसने कहा—“देखो न शेखर बाबू, अपनी बातों से आपको परेशान कर दिया मैंने, और ये चाय भी एकदम ठण्डी हो गयी, आपको तो ठण्डी चाय पसन्द नहीं, आप तो आधा कप चाय पीकर फिर से गर्म करने को बोला करते थे।


Bhavna holding a cup of cold tea in a Dehradun cottage, reflecting emotional depth from the Hindi story Thandi Chai by Sandeep Tomar
Bhavna leaves the room with a cup of cold tea, a poignant moment from Sandeep Tomar's Hindi story "ठण्डी चाय" set in a Dehradun cottage.

ठण्डी चाय: संदीप तोमर की भावनात्मक कहानी

मुझे लगता है यहाँ पारिवारिक दुनिया में कहानी लिखना या उपन्यास के पात्रों से बातचीत करना उतना ही जोखिम भरा काम है जितना काम न मिलने के चलते आटा—दाल के लिए खींसे से पैसे टटोलने का ढोंग करना। उपन्यास के पात्र की तलाश भी कहाँ खत्म हुई थी, चल पड़ा था मैं, उन पात्रों की खोज में जो मुझे सोने नहीं देते, जो आँखें बन्द करते ही पलकों और पुतली के बीच घूमने लगते, मन करता कि इन्हें पकड़ कर बैठा लूँ और पूछूँ— “बताओ, क्या चाहते हो? क्यों तुम्हें खुद को चैन नहीं और मुझे भी आकर बेचैन करते हो”, लेकिन उनका मेरी पकड़ से दूर होना भी उतना ही सच है जितना उनका अस्तित्व। उनके अस्तित्व की खोज और पारिवारिक दुनिया से निजात पाने की गरज से ही तो निकला था।

शेखर की खोज: एक लेखक का संघर्ष

कार 125 की स्पीड पर थी, देहरादून की वादियों के टेढ़े—मेढ़े रास्ते जीवन के रास्ते से कितनी साम्यता रखते हैं, टीना के साथ चलते हुए कोई रास्ता सीधा मिला ही नहीं, वह हर सीधे रास्ते को कितना टेढ़ा कर देती है, टेबल पर बिखरी किताबें, लिखने के लिए जिन्हें बार—बार खोलना पड़े, या वो अखबार की कतरनें जिन्हें कोट करना हो, हर बार जब भी लिखने के लिए कमरे में जाओ, सब समेटकर रखा हुआ मिले और कतरनें डस्टबिन के हवाले। “टीना कब सुधरोगी तुम ....जब भी लिखने बैठो, नए सिरे से सब शुरू करना पड़ता है, क्यों इस कमरे में आकर अपना समय और दिमाग दोनों लगाती हो?”

“सब बिखरा—बिखरा, तुम्हें अच्छा लगता है शेखर? तंग आ गयी हुई तुम्हारे इस रवैये से .... ।“

“सुनो इस कमरे में तुम न आया करो. इतना आसान नहीं होता किसी काम को फिर से शुरू करना।“

“क्या मिल रहा है यूँ पन्ने काले करने से? समय और घर दोनों बर्बाद कर रहे हो शेखर बाबू.., यू आर बिग फेल्योर।“

“टीना ये फ्ल्योर ही एक दिन बिग सक्सेस में बदल जायेगा, जब मेरे पात्र मुझसे रूबरू हो मुझसे अपना अतीत साझा करेंगे, और मैं उनकी कहानी को मुकम्मल जगह तक ले जाऊँगा.... ।“

                            जीवन के इस संघर्ष को गहराई से समझने के लिए पढ़ें हरिशंकर परसाई का व्यंग्य जिंदगी और मौत का दस्तावेज़, जिसमें जीवन और मृत्यु पर एक अनोखा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है।

उफ़ इतना घुमाव, झटके से मैंने कार में ब्रेक लगाये, एक पल की देरी होती तो गाड़ी सीधी खाई में गिरी होती, खाई देखकर अहसास हुआ कि कितनी लंबी दूरी अवचेतन में जाकर चलाता रहा था, कब से कार वादियों से निकल दुर्गम पहाड़ी की सड़कों पर उसी स्पीड से दौड़ रही थी, बस एक पल की देरी ब्रेक लगाने में होती तो.... कार को साइड में रोक पहाड़ी पर दूर तक निगाह दौड़ाई... काश यहाँ कहीं कुछ दिन रहने का ठोर मिल जाए तो मैं उपन्यास के पात्रों की खोज कर सकूँ; हाँ, लेकिन उससे पहले एक खाका भी तो तैयार करना है। दूर तक निगाह दौड़ता हूँ, दूर कहीं एक कोटेज होने का अहसास होता है, मैं कार का दरवाजा खोल पुनः ड्राइविंग सीट पर बैठ, चाबी लगा कार स्टार्ट करके एक्सीलेटर पर पैर का दबाव बढ़ाता हूँ, कुछ ही पल में कार कोटेज के बाहर रुकती है, कार को लॉक करके मैं कोटेज की ओर बढ़ गया हूँ।

कोटेज का दरवाजा खटखटाता, उससे पहले ही किसी ने दरवाजे को खोल दिया। शायद वह कोटेज का मालिक है और ग्राहक का तलबगार है। यह कोई 35—40 साल का व्यक्ति था, मैं उसके पीछे—पीछे चल दिया, उसने अंदर जाकर जो नाम पुकारा, उसका एक—एक अक्षर मेरे जहन में गूँजने लगा। मैं उसके पुकारे नाम से आश्चर्यचकित जरूर हुआ लेकिन अगले ही पल मेरे होंठों पर अपनी ही बेवकूफी पर मुस्कान दौड़ आई।

“भावना मेम साहब— कोई पेइंग गेस्ट है, कुछ दिन यहाँ रहकर अपने उपन्यास के पात्र खोजना चाहता है।“ —उस व्यक्ति ने कहा।

उसकी आगे की बात मैं पूरी तरह सुन ही नहीं पाया। इतना तो तय हो गया— कोटेज का मालिक वह नहीं है, कोई महिला है, जिसका नाम भावना है। उस वक़्त मेरे दिमाग में यादों का झोंका ज़बर्दस्त दस्तक दे गया। एक उथल—पुथल मुझे झकझोरने लगी।

भावना का अतीत: विश्वास और धोखे की कहानी

रमेश और मैं अभी फिल्म का बारह से तीन का शो देखकर बाहर निकले ही थे, उसके मोबाइल पर एक कॉल आई, उसके चेहरे पर चिंता के भाव उभर आये। पूछने पर उसने बताया—“दोस्त था, रेलवे ट्रैक पर ही हार्ट अटैक हुआ और मर गया, उसकी बहन का कॉल था, जाना होगा। औपचारिकतावश मैं भी साथ चला गया।

दो—तीन बार आना—जाना हुआ था, उस परिवार से अपनापन हो गया। भावना, रमेश के दोस्त की बहन थी। पिता शराबी, घर में गुजारे का कोई साधन नहीं। मैं नॉर्थ कैंपस में था तब और भावना का परिवार पटेल नगर। जब भी वक़्त मिलता उनके यहाँ मिलने चला जाता। उसकी मम्मी ने एक कंपनी में नौकरी शुरू कर दी। आर्ट से बारहवीं करने के बाद उसने बी.ए. में दाखिला लिया था।

मेरा जर्नलिज्म पूरा हो गया था और मुझे अब हॉस्टल छोड़ना था। चूँकि मेरा इरादा उसी शहर में रहने का था इसलिए मैं अपने कमरे का सारा सामान साथ लेकर गाँव नहीं जा सकता था। अभी अगर कहीं किराए पर कोई कमरा लेता तो बेरोजगारी में इस एक माह के अतिरिक्त भार को सहन कर पाना अभी संभव नहीं था।

ऐसे में भावना ने मदद का प्रस्ताव देते हुए सारा सामान उसके घर में रख देने के लिए कहा। "वैसे भी आपके पास कौन सा इतना सामान है जो हमारे छोटे से घर में न आ सके! एक बिस्तर, एक कुर्सी—मेज और तुम्हारी कुछ किताबें, आपके आने तक मैं ये सब संभाल ही सकती हूँ!"

उसकी आत्मीयता के आगे मेरा कोई भी बहाना बनाना बेकार था और फिर कहीं न कहीं मैं भी तो उससे जुड़ा रहना चाहता था।

गाँव जाने के पहले मैंने अपना सभी सामान पैक करके भावना के घर रख दिया था।

गाँव से लगभग महीने भर बाद जब वापस आया तो .....…., भावना बेहद शर्मिंदा—सी गर्दन झुकाए खड़ी हुई थी।

"क्या हुआ...?" इस तरह उसे देखकर मैं अचंभित था।

वह सिर नीचे किये—किये ही रोने लगी और फिर उसने रोते हुए बताया—“पापा की पीने की लत ने मुझे तुम्हारे सामने भी शर्मिंदा कर दिया शेखर।“

आगे की कहानी मैं समझ गया, बस संतुष्टि थी, भावना का आप से तुम तक का सफ़र।

                                अतीत की इन यादों को और गहराई से महसूस करने के लिए पढ़ें सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेक सिंह, जो बंटवारे के दर्द और नॉस्टेल्जिया को बयान करती है।

उन दिनों जर्नलिज्म करने का अर्थ था किसी अख़बार में काम तलाशना या फिर किसी पत्रिका के लिए विज्ञापन जुटाना। आज की तरह टीवी चैनलों की बाढ़ नहीं थी, नौकरी मिलने या कैरियर बनने के अवसर ऊँट के मुँह में जीरे जितने ही थे। आसफ अली रोड पर एक एन.जी.ओ. का दफ्तर था जिसकी पत्रिका में बतौर सब—एडिटर मैंने जॉब शुरू कर दी।

                                क्या आपको शेखर की संघर्ष भरी यात्रा पसंद आई? पढ़ें मन्नू भंडारी की कहानी नई नौकरी, जिसमें नौकरी और सामाजिक दबावों के बीच एक औरत की कहानी बयान की गई है।

“नाम क्या है तुम्हारा?”—मैंने नौकर से दिखने वाले उस व्यक्ति से पूछा।

एंट्री के लिए रजिस्टर खोलकर मेरे सामने रखते हुए उसने कहा—“जी, धूम सिंह जरधारी।“

एंट्री करने के लिए मैंने नज़र का चश्मा निकालकर लगाया तो काउंटरनुमा टेबल के सामने की दीवार पर लिखी तख्ती पर मेरी निगाह गयी, लिखा था—रूम इज अवेलेबल फॉर वन ओर टू डेज ओनली। मैंने कहा —“धूमसिंह, ये क्या लिखा है, एक या दो दिन ही यहाँ ठहरा जा सकता है लेकिन मैं तो हफ्ता—दस दिन के लिए कमरा लेना चाहता हूँ।“

“साहब जी, इसके बारे में तो मेमसाहब ही बता सकती हैं, मैं तो उनका मुलाजिम हूँ।“—वह शायद अपनी मालकिन को बुलाने चला गया था। अगले ही पल कोटेज की मालकिन रिसेप्शन टेबल के सामने थी। कोई चालीस—बयालीस साल उम्र की औरत, गेंहुआ रंग, वह गोरी नहीं थी। उसकी आँखें बड़ी और नाक पैनी थी। मैंने उसके भूगोल पर नज़र घुमाई, सुडौल बदन, औसत कदकाठी, मैंने उसकी आँखों में झाँकना चाहा। अगले पल मुझे अहसास हुआ, मैं यहाँ शांति और उपन्यास के पात्रों की तलाश में आया हूँ। शायद उसने मेरी नज़रों को पढ़ने का प्रयास किया। उसने क्या सोचा होगा, इसका अंदाज़ा नहीं। पिछले कुछ समय से सिर के बाल और दाढ़ी बढ़ाने के चलते मेरा हुलिया ऐसा हो गया है जो मुझे २० साल न मिला हो वह पहचान ही न पाए।

“मेरे कोटेज के केयर टेकर ने बताया कि आप दो दिन से ज़्यादा यहाँ रहना चाहते हैं, असल में क्या हैं न सर, कोई गेस्ट ज़्यादा दिन रहता है तो वह कंसेशन की डिमांड करने लगता है, और फिर कुछ आत्मीय होने की कोशिश भी, और मैं ये दोनों ही बातें पसंद नहीं करती।“

“आप बताएँ मुझे कितना रोज़ का पे करना होगा और अडवांस कितना?”

“पंद्रह सौ रुपये रोज़, जिसमें सुबह की चाय, नाश्ता, और डिनर इन्क्लूड होगा, अगर लंच भी यहीं करना है तो उसका एक्स्ट्रा देना होगा।“

मैंने पाँच हज़ार रुपये गिनकर उनकी तरफ बढ़ाते हुए रजिस्टर में एंट्री की।

“सर, आपकी कोई आईडी मिलेगी, क्या है न उत्तरांचल सरकार ने आजकल बिना आईडी लिए गेस्ट की एंट्री को मना किया हुआ है।“

मैंने पर्स से अपना वोटर कार्ड निकालकर उसे थमा दिया। उसने कार्ड पर निगाह डाल मेरे चेहरे का मुआयना किया, एक पल में उसकी आँखों की रंगत बदली हुई मैंने महसूस की, साथ ही एक अजीब चमक भी। अगले पल प्रिंटर मशीन से फोटोकॉपी निकाल मुझे आईडी थमाते हुए, उसने कहा—“धूमकेतु, साहब का सामान लेकर आओ।“ अपने पीछे आने का इशारा करते हुए उसने कहा—“अपना रूम देख लो। सामान केयर टेकर ले आएगा।”

“वो, धूम...केतु...?”

“धूमसिंह नाम है उसका, मैं उसे धूमकेतु कहती हूँ, गरीब है, बचपन में माँ—बाप दोनों एक हादसे में मर गए थे। आप फ्रेश हो जाइये, मैं चाय बनाकर भिजवाती हूँ।“

“लेकिन अब तो शाम का वक़्त है और आपके पैकेज में शाम की चाय तो थी नहीं।“

“वो मेरी तरफ से कॉम्प्लिमेंट्री।“—कहकर वह मुस्कुरा दी।

चाय की गर्माहट: यादों का झरोखा

कोटेज को देख मैंने कमरे के साफ़-सुथरे होने की तस्वीर मन में बनायी। लॉक खोल वह चली गयी। धूमसिंह सामान रखकर चला गया। कमरे का मुआयना कर मैं संतुष्ट हुआ, कुर्सी पर बैठा तो एक बार फिर यादों का झरोखा दिमाग में दस्तक देने लगा।

उस रात भावना की मम्मी की कॉल आई, उसके पापा घर से पैसे और बचे-खुचे गहने लेकर कई दिन से लापता थे, मम्मी की नाइट ड्यूटी थी, उन्होंने बताया कि भावना घर पर अकेली है, शेखर तुम घर चले जाओ, कभी उसे मैंने अकेले नहीं छोड़ा, तुम घर पर होंगे तो मैं बेफिक्र रहूँगी।

इतना विश्वास, एक अनजाने से लड़के पर, सोच कर मुझे अपने से ज़्यादा उनके इस विश्वास पर फख्र हुआ। घर गया, खाना खाकर मैं और भावना टीवी देख रहे थे, शायद कोई सीरियल है, भावना को सीरियल देखना पसंद है। भावना की मम्मी की शादी का पुराना-सा सोफा है जिस पर मैं एक कोने में बैठा हूँ, भावना ने अपना सिर मेरे पैरों पर रख लिया। अनायास ही मेरी अँगुलियाँ उसके बालों में घूमने लगी।

“क्या कर रहे हो?”

“तुम्हारे बालों को सहला रहा था।“

“क्यों”

“यूँ ही; अच्छा भानु, एक बात बताओ?”

“पूछो।”

“क्या तुम्हें किसी से प्यार है?”

“प्यार तो कभी किसी से नहीं हुआ शेखर, हाँ एक इंसान है जिस पर बहुत विश्वास है।“

“अच्छा, जान सकता हूँ, कौन है वो इंसान?”

“हाँ, एकदम जान सकते हो—कहकर उसने पास ही अलमारी में रखे हैंड मिरर को उठा मेरे सामने करते हुए कहा—“ये है वो।“

“अच्छा मुझ पर इतना विश्वास?”

“हाँ, मैं तुम पर अंधा विश्वास करती हूँ, शेखर जानती हूँ कि तुम मेरे या मम्मी के उस विश्वास को कभी नहीं तोड़ोगे।“

“फिर भी बताओ कितना विश्वास करती हो, मैंने सुना है अक्सर विश्वास ही टूट जाया करते हैं।“

“जिस पर मुझे विश्वास है, वह मुझसे जान भी माँग ले तो मैं एक पल भी नहीं सोचूँगी।“

“सोच लो भानु, याचक कुछ भी माँग सकता है?”

“इसमें सोचना क्या? आज़मा कर देख लो।“

“सुनो भानु कभी किसी पर अंधा विश्वास मत करना, याचक कब किससे क्या माँग ले, ये कोई सोच भी नहीं सकता।“

“अपना-अपना विश्वास है शेखर बाबू।“

“अच्छा तो सुनो फिर, अभी अपने कपड़े उतारो।“

“ये क्या कह रहे हो तुम, जानते भी हो, होश कहाँ है तुम्हारे?”

“मैंने तो पहले ही कहा था, याचक की इच्छा और मनमर्जी वो क्या माँग ले, तुम ही बहुत बड़ी-बड़ी डींगें मार रही थी...।“

“शेखर, इस तरह तुम मेरा शरीर तो पा सकते हो लेकिन... लेकिन मेरे मन से, मेरी दुनिया से हमेशा के लिए चले जाओगे।“

                                    समाज और रिश्तों की इस जटिलता को और समझने के लिए पढ़ें आँचल की कहानी घूरना, जो सामाजिक आदतों पर एक गहरी टिप्पणी है।

“ये सब बाद की बातें हैं, अभी या तो अपना कहा करो या फिर कह दो कि वो सब किताबी बातें थी, उनसे तुम्हारा कोई वास्ता नहीं था।“

“क्या ये तुम्हारा अंतिम निर्णय है?“

“तुम ऐसा सोच सकती हो।“

“फिर ठीक है।“—कहकर उसने एक-एक कर अपने सब कपड़े...। सीमा का आखिरी अतिक्रमण होने से एक कदम दूरी पर।

स...टा...क...। — जितनी झनझनाहट उसके गाल पर हुई, उससे कहीं ज़्यादा मेरे हाथ में भी। एक झटके में उठ मैं बाहर के कमरे में आ गया। दस मिनट बाद अंदर गया, तो वह सही अवस्था में बैठी अपना गाल सहला रही थी, मुझे देख मुझसे लिपट गयी, आँसू नहीं थमे, दोनों ओर से चुप्पी, कुछ अगर दोनों के बीच था तो वह उसकी चुप्पी थी... अचानक उसके होंठ खुले—“शेखर, सुना था एक विश्वामित्र थे, आज देख भी लिया... जिसका तुम्हारे जीवन पर अधिकार होगा वह बहुत खुशकिस्मत होगी...।“—उसकी रुलाई फूट गयी।

आराम कुर्सी पर बैठे हुए मेरी आँखें बन्द हैं, दरवाजे पर दस्तक हुई तो मैं यादों से बाहर आया—“दरवाजा खुला है...।“ — मैंने कहा।

कोटेज की मालकिन एक ट्रे में दो कप चाय लिए दाखिल हुई, मैं औपचारिकतावश खड़ा हो गया—“आपने खुद चाय लाने की ज़हमत मोल क्यों ली, उस धूमकेतु को भेज देती।“

“क्यों शेखर बाबू, क्या मैं खुद चाय लेकर नहीं आ सकती?”—शेखर बाबू नाम सुन मुझे कुछ खटका, मैं कुछ कहता उससे पहले उसने आगे कहा—“बढ़े हुए बाल, और ये घनी खिचड़ी जैसी दाढ़ी के पीछे का चेहरा इतना भी नहीं बदला कि इसे कोई पुराना परिचित पहचान न सके, फिर आपकी आईडी ने भी तो सब कुछ कह ही दिया शेखर बाबू।“

अब भावना कमरे में रखी दूसरी कुर्सी को थोड़ा आगे खींच बैठ गयी। एक कप मेरे हाथ में था और दूसरा उसके। मैंने मन ही मन सोचा— ‘पहचान तो मैंने भी लिया था, जब तुम काउंटर पर आई थी।‘

“आपने कुछ कहा?”—उसने पूछा।

“तुम आज भी उतनी ही अच्छी चाय बनाती हो... भा...।“ आगे के कुछ अक्षर मेरे होंठों के अंदर ही छूट गए।

मुझे जल्दी ही अहसास हुआ—अजीब था यह कॉम्प्लिमेंट, ऐसी प्रशंसा का अब कोई मोल नहीं था।

भावना की पीड़ा: एक टूटी ज़िंदगी की कहानी

"तुमने पूछा नहीं शेखर, मैं यहाँ ये सब क्यों करती हूँ?" चाय का शिप लेते हुए उसने कहा।

"आई थॉट इट्स योर हॉबी।"—मैं माहौल को हल्का ही रहने देना चाहता था।

उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा। उसकी त्यौरियाँ चढ़ी हुई थी।

"नॉ इट्स नोट हॉबी, ए राइटर कैन थिंक लाइक दिस, आई एम क्वाइट सरप्राइज्ड।“

उसकी बात करने का लहजा बदल गया था। छोटी-सी चुप्पी ने कुछ देर डेरा जमाया लेकिन कुछ देर बाद उसने फिर कहा—"शेखर, रजत जब मुझसे मिला, उससे पहले से ही वह शादीशुदा था। आई लव्ड हिम फ्रॉम द डे ऑफ माय मैरिज। मगर धीरे-धीरे मुझे पता चला, उसके लिए मैं सिर्फ एक ज़िंदा औरत का बदन थी, जिससे उसने शादी की हुई थी, वह उसे सऊदी अरब ले जाने की फ़िराक में थी, मुझे देखने के बहाने आई तो अपने इरादे से मुझे अवगत करा दिया था, रजत को मेरा दर्द से कराहना सुनाई ही नहीं देता था। मैं सोचती सब ठीक हो जायेगा, जब उसको मुझे भोगना होता तो मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहता— आई लव यू भानु! और मैं भूल जाती कि एक औरत ने मुझे अपने इरादे बताये थे, एक दिन वह हमेशा के लिए चला गया।“

“ऐसे कैसे चला गया, क्या इतना आसान है सब कुछ? किसी से शादी करके छोड़ देना?”— मेरी आँखों के सामने टीना का चेहरा घूम गया, कितना कुछ सहने के बाद भी क्या मैं उसे छोड़ने की बात सोच सकता हूँ?

“छह साल, शेखर पूरे छह साल कोर्ट के धक्के खाने के बाद आखिर मुझे लीगली सेपरेशन मिला।“

“और तुम्हारा खर्च, कंपनसेशन?”

“क्या कोई किसी की ज़िंदगी बर्बाद करके, किसी तरह से कोई भी भरपाई कर सकता है?”

“आखिर कानून भी तो है न, यूँ ही...।“—मुझे खुद ही अहसास हुआ, टीना के साथ क्या मैं कानूनी लड़ाई लड़ पाया? मैं तो सामाजिक लड़ाई भी नहीं लड़ पाता, आखिर खुद ही अवसाद में जीने को अभिशप्त हूँ।

“सास-ससुर कहते रहे, बेटी की तरह तुम्हारी शादी करेंगे, एक समय मुझे भी लगता था, वे मुझे प्यार करते हैं, या फिर अपनी गलती का प्रायश्चित है उन्हें।“

“गिल्ट भी सबको हो ये ज़रूरी नहीं, हो सकता है, कानून के डर से तुम्हारे साथ होने का ड्रामा कर रहे हो।“—मैंने कहा।

“ससुर को कैंसर डिटेक्ट हुआ तो कोठी बेच वो अपनी बेटी के पास चले गए।“— वह लगभग रुआँसी होकर बोली।

“ऐसा ही छलावा करते हैं लोग, मुझे भी यही अंदेशा था, वही हुआ भी। लेकिन तुम उस कोठी पर तो अपना अधिकार कानूनी तौर पर ले सकती थी।“

“उससे भी क्या होता? जब पति ही नहीं रहा फिर किसी भी दौलत या कोठी से क्या मेरा आगे का जीवन कट जाता?”—वह अब मानो इस बात को बताते हुए भी अपसेट थी।

“फिर यहाँ कैसे आई?”—मैंने बेतुका सा सवाल किया।

“कोर्ट से जो मुझे मिला उस पैसे से जीवन गुज़ारने के लिए कुछ तो करना था, वहाँ रहती तो सब कुछ मुझे मानसिक रूप से परेशान करता, इसलिए मैं यहाँ चली आई, ये कोटेज खरीद अपना गुज़ारा कर रही हूँ।“

                                    भावना की यह कहानी आपको पसंद आई? पढ़ें मन्नू भंडारी की भावनात्मक कहानी रानी माँ का चबूतरा, जिसमें एक माँ की भावनाओं और बलिदान को दर्शाया गया है।

हम दोनों के वार्तालाप में चाय ठण्डी हो चुकी थी, भावना की आवाज़ में एक भारीपन था। उसने कहा—“देखो न शेखर बाबू, अपनी बातों से आपको परेशान कर दिया मैंने, और ये चाय भी एकदम ठण्डी हो गयी, आपको तो ठण्डी चाय पसन्द नहीं, आप तो आधा कप चाय पीकर फिर से गर्म करने को बोला करते थे। लाओ कप, मैं चाय गर्म करके लाती हूँ।“—ठण्डी चाय का कप मेरे हाथ से ले, वह दरवाजे से बाहर निकल गयी, पर्दे की सरसराहट के साथ मुझे एक आवाज़ और सुनाई दी... दबी हुई सिसकियों के साथ ठण्डी चाय के कप ट्रे में लुढ़कने की आवाज़।

मुझे लगा— कितने ही पात्र हमारे मन में कहीं गहरे पैठे होते हैं, लेकिन वक्त की गर्त उन्हें इतना धुंधला कर देती है कि हम उन तक पहुँचने की कोशिश भी नहीं करते। भावना का किरदार मुझे उपन्यास के पात्र की तलाश की पूर्ति होता हुआ दिखाई दिया।

मैंने मन ही मन कहा “भावना, तुम जीवन की नायिका भले न बन सकी लेकिन मेरे उपन्यास की नायिका, मैं तुम्हारी कहानी को अमर कर दूँगा।“

टीना का चेहरा एक पल को मेरी आँखों के बीच आकर ठहरा, मन ही मन बुदबुदाया—“तुम जीवन की नायिका न बन, ऐसी खलनायिका बनी हो कि लाख चाहकर भी तुम्हें उपन्यास में कोई चरित्र निभाने को नहीं दिया जा सकता....।“

मैं वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया, दरवाजे पर पुन: दस्तक हुई—“हुजुर गर्मागर्म चाय।“

मैंने उठकर दरवाजा खोला, भावना के अन्दर दाखिल होते हुए मैंने कहा—“तुम आज भी नहीं बदली।“

मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया। एक आह मैं अपने कानों में सुन रहा हूँ।

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मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रख दिया। एक आह मैं अपने कानों में सुन रहा हूँ।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

लेखक परिचय: संदीप तोमर

जन्म: जून 1975
जन्म स्थान: खतौली (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा: स्नातकोत्तर (गणित, समाजशास्त्र, भूगोल), एम.फिल. (शिक्षाशास्त्र), पी.एच.डी. शोधरत
सम्प्रति: अध्यापन
साहित्य: 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह सहित आत्मकथा प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन।
सम्पर्क: डी 2/1 जीवन पार्क, उत्तम नगर, नई दिल्ली 110059
मोबाइल: 8377875009
ईमेल आईडी: gangdhari.sandy@gmail.com

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