कृष्णा सोबती : शब्दांकन पर उपलब्ध समस्त रचनाएँ

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित हिंदी की महान कथाकार कृष्णा सोबती का दुर्लभ चित्र। Photograph © Bharat Tiwari
कृष्णा सोबती
18 फ़रवरी 1925 – 25 जनवरी 2019
चित्र : भरत तिवारी | Photograph © Bharat Tiwari

कृष्णा सोबती : शब्दांकन पर प्रकाशित रचनाओं का विशेष संकलन

कृष्णा सोबती हिंदी साहित्य की उन विरल कथाकारों में हैं जिन्होंने अपनी भाषा, वैचारिक निर्भीकता और रचनात्मक स्वायत्तता से आधुनिक हिंदी कथा-साहित्य को नई दिशा दी। प्रस्तुत पृष्ठ पर शब्दांकन में प्रकाशित उनकी कहानियों, उपन्यासों, कविताओं, लेखों, पत्रों और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री को एक स्थान पर संकलित किया गया है।

यह पृष्ठ शब्दांकन पर प्रकाशित कृष्णा सोबती की कहानियों, उपन्यासों, कविताओं, लेखों, पत्रों और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री का एक विशेष संग्रह है।

कृष्णा सोबती मुझे पहचानती थीं, जानती थीं और मानती थीं - यह मेरे जीवन के बड़े सौभाग्यों में से एक है। इस अनुभूति को शब्दों में व्यक्त कर पाना कठिन है। उनकी रीढ़ की सीधाई, उनकी निर्भीकता और उनका स्वाभिमानी व्यक्तित्व मुझे बहुत कुछ सिखा गया।

— भरत तिवारी

शब्दांकन पर वर्षों से कृष्णा सोबती की रचनाएँ, विचार, लेख, पत्र और उनके व्यक्तित्व से जुड़ी सामग्री प्रकाशित होती रही है। प्रस्तुत है उनका विशेष संग्रह।


उपन्यास अंश

जीवन परिचय

कहानियाँ

कृष्णा सोबतीजी की "मार्फ़त दिल्ली" पढ़ रहा हूँ. मैं, साहित्य आदतन तोड़ा धीरे-धीरे ही पढ़ता हूँ. और तब तो ठहर-ही जाता हूँ जब कुछ पढ़े जा रहे से कोई विचलन पैदा हो जाती है. कल रात 'पितृ हत्या' पढ़ते हुए ऐसा ही हुआ. रुक गया  अब कृष्णाजी से बात हो, तब बात बढ़े. देर रात थी, इसलिएउनसे बात नहीं हो सकती थी, अब दोपहर हुई तब बात हुई. और कृष्णाजी ने बताया,
"यार,
पाकिस्तान बना तो
वहाँ वाले भी बापू को अपना ही मानते थे,
उन्हें भी यह था कि
इसकी हत्या क्यों की...
"
राजकमल प्रकाशन से छपी इस बेहतरीन किताब पर लिखुंगा ज़रूर...अभी तो वह पढ़िए जिसे पढ़ते कल रात मैं रुक गया था. (मई २०१८, भरत तिवारी)

कविताएँ

निबंध एवं लेख


शब्दांकन पर कृष्णा सोबती

शब्दांकन को यह सौभाग्य प्राप्त है कि उसने समय-समय पर कृष्णा सोबती की रचनाओं, विचारों और हस्तक्षेपों को अपने पाठकों तक पहुँचाया। यह संकलन केवल उनकी साहित्यिक यात्रा का परिचय नहीं, बल्कि हिंदी भाषा की उस निर्भीक परंपरा का भी दस्तावेज़ है जिसकी प्रतिनिधि कृष्णा सोबती थीं।

यदि आपने अभी तक कृष्णा सोबती को नहीं पढ़ा है, तो शुरुआत ‘मित्रो मरजानी’ और ‘आज़ादी शम्मोजान की’ से कीजिए। इसके बाद उनके लेख, पत्र और वैचारिक हस्तक्षेप आपको उनके व्यक्तित्व की व्यापकता से परिचित कराएँगे।


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