राष्ट्र के संवैधानिक अधिकारों से देश को सैकड़ों वर्षों के बाद बराबरी का मौसम मिला है, जो तानाशाही नहीं, लोकतांत्रिक है।
खबरदार, होशियार!
— कृष्णा सोबती
आज के मुँहतोड़, मुँहजोड़ समयों में यह सियासी तौर पर कितना भला लगता है कि सैनिक शहीद रामकृष्ण साहिब गरेवाल की आत्महत्या पर राजनीतिक दलों की फूहड़ तानातनी, तू-तू, मैं-मैं से लोकतांत्रिक मूल्यों की बेअदबी की जा रही है। क्या सचमुच यह समझा जाता है कि भारत का नागरिक समाज इतना अनपढ़ और बेवकूफ है कि वह ऐसी बदरंग स्थितियों की बेरहम खलबलियों को नहीं पहचानता।
भारतीय सत्ता तंत्र की प्रशासनीय प्रणाली कितनी भी तानाशाही की हो, वह किसी भी बेटे की आत्महत्या पर उनके प्रियजनों को नहीं दुत्कारती।
क्या सचमुच ऐसी घटना में पुलिस की महाभारती दखलअंदाज़ी ज़रूरी थी?
जैसा शोर-शराबा राष्ट्रीय कोलाहल उभारा और उड़ाया जाता है, वह प्रजातंत्र की इज़्ज़त नहीं।लोकतंत्र की सैद्धान्तिक गरिमा अमर-ज्योति के सन्मुख खड़े-खड़े भले प्रजातंत्र के गीत गाती रहे। सैनिक शहीद हो या आत्महत्या करे, वहाँ इस कुचक्र का काम नहीं था। सियासी दलों के बड़बोले नेताओं को मुबारकबाद!
जैसा शोर-शराबा राष्ट्रीय कोलाहल उभारा और उड़ाया जाता है, वह प्रजातंत्र की इज़्ज़त नहीं। हम नागरिकों की विनम्र प्रार्थना है कि बेकार की प्रचार-श्रृंखलाओं को दूर रखें।
यह कम महत्त्वपूर्ण नहीं कि संसद में एक साथ बैठने वाले हमारे माननीय सांसदों के बीच ऐसा कोई व्यावहारिक शिष्टाचार न हो जो मौका लगते ही एक-दूसरे पर जूत-पैजारी करने लगे।
राष्ट्र के संवैधानिक अधिकारों से देश को सैकड़ों वर्षों के बाद बराबरी का मौसम मिला है जो तानाशाही नहीं, लोकतांत्रिक है।
हमारा ऐसा देश जो विश्व में अपनी वैचारिक विशेषता के लिए प्रसिद्ध है, उसे लोकतांत्रिक प्रणाली के अनुरूप अपने में आचार-व्यवहार भी जगाना होगा।
राष्ट्र की प्रजाएँ सियासत के अन्दरुनी तंत्र से इतने नावाकिफ नहीं होतीं कि इस बर्ताव में फर्क न कर सकें कि कोई भी सत्तातंत्र किन-किन कानूनी हथियारों से लैस होता है।
अप्रासंगिक न होगा यह दोहराना कि भारत का हर नागरिक उसी सत्ता तंत्र में आस्था रखे जो नागरिकों के चुनाव से बना हो। कुछ देर पहले लेखक नागरिक भी अपमानित स्थितियों से गुज़रे हैं। राष्ट्र के बुद्धिजीवियों पर ऐसा दुधारी नज़रिया किसी भी सत्ता तंत्र के हित में सफल नहीं होता। ज़रूरी नहीं कि लेखक बिरादरी ही सत्ता तंत्र का जयकारा करे या धिक्कार।
हम भारतवासियों को सत्ता की दहाड़ें नहीं भातीं। उन्होंने लम्बा इतिहास बाहर वालों के साथ साँझा किया है। ऐसे में किसी न किसी बहाने राष्ट्रीय जीवन में विभिन्नताएँ मत जगाइए। हर एक भारतवासी जानता है कि हमारी सेनाएँ हमारी रक्षक हैं। ऐसे में उनके महीन और गुप्त कार्य-कौशल को आपसी मन-मुटावी लांछन में बार-बार सर्जिकल स्ट्राइक का नाम मत दीजिए। ऐसे अहम मुद्दों को इतनी मामूली कोतवाल और कोतवाली की सरगम में बार-बार प्रचार मत कीजिए। आपका नागरिक खासा शिक्षित है।
— कृष्णा सोबती
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1 टिप्पणियाँ
गहरी बेबाक़ इस जन-मन की लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को सलाम !
जवाब देंहटाएं-----प्रेमपुष्प