हम इस समय "गोदामियत" की जकड़ में हैं — अशोक वाजपेयी



लय के बिना, कोई कविता नहीं होगी

— अशोक वाजपेयी



हम ‘जीवन की लय’ की बातें करते हैं और कई बार अफसोस जताते हैं कि हमारे समय ने ये 'लय' खो दी है। जीवन की ठीक यही लय दुनिया में कविता के बीज बोती है। लय के बिना, कोई कविता नहीं होगी। जीवन की यही लय अक्सर कविता में भाषा की लय को रचती है — मानवजाति की यह खोज अनोखी है। जीवन के बिना कोई भाषा संभव नहीं, न ही भाषा के बिना जीवन, कम से कम मनुष्य का जीवन। कविता भाषा और जीवन से रची जाती है। कविता का संसार से एक बहुस्तरीय लेकिन जटिल संबंध है। कविता का जन्म जगत के प्रति प्रेम और अभिलाषा से होता है।
दुनिया एकरूपता और होमोजिनायझेशन — कि सब एक जैसे हों — के अत्याचार का सामना कर रही है
यहां जगत से आशय देश और काल दोनों से है। किसी को ये लग सकता है कि ये धरती केवल चिड़ियों, जानवरों, जंगलों, नदियों इत्यादि के लिए है लेकिन ये दुनिया इंसानों के लिए भी है। धरती को संसार भाषा ने बनाया है। हम कह सकते हैं कि भाषा, ईश्वर, अध्यात्म विशिष्ट मानवीय आविष्कार हैं।



थोड़ी देर के लिए हम इन ख्यालों को किनारे रखकर इस दुनिया में रहने वालों के बारे में सोचे। शायद हम मानवीय इतिहास के सबसे हिंसक समय में जी रहे हैं। इस समय पूरी दुनिया में सैकड़ों गृह युद्ध छिड़े हुए हैं। आतंकवाद, कट्टरपंथ, हत्या का उन्माद, नागरिक जकड़न, प्रवासन, विस्थापन इत्यादि पूरे विश्व में व्याप्त हैं। इसी के साथ है धार्मिक पाखंड से जुड़ी हिंसा, सांप्रदायिकता, नक्सलवाद, घरेलू हिंसा, दलित-मुस्लिम-महिला-असहमतों के साथ होने वाली हिंसा, फैशन, खेल, एंटरटेनमेंट और मीडिया में बढ़ती हिंसा।

एक नई ‘संवाद-रीति’ का जन्म हुआ है – बात निरन्तर भाषा कमतर
हमारी वैश्वीकृत दुनिया की विडंबनाओं में से एक इसमें बड़े पैमाने पर "विलगीकरण" है। ये "विलगित" हर प्रकार के हैं: जाति, पंथ, धर्म, भाषा, विचारधारा।




दुनिया एकरूपता और होमोजिनायझेशन — कि सब एक जैसे हों — के अत्याचार का सामना कर रही है। उदार विचार और कल्पनाएं लगातार खतरे में हैं। स्मृति के बिगाड़ और स्मृतिशक्ति के विनाश के लिए बड़े पैमाने पर घातक अभियान चलाए जा रहे हैं।

हम इस समय "गोदामियत" की जकड़ में हैं, घर को गोदाम बना दिया है — माना जा रहा है कि दुनिया को विचार नहीं भौतिक वस्तुएं बदल सकती हैं। आज दुनिया में कोई बड़ा ख्वाब नहीं है, केवल दुःस्वप्न या मामूली चीजों के स्वप्न हैं। एक नई ‘संवाद-रीति’ का जन्म हुआ है – बात निरन्तर भाषा कमतर (There is new “Samvad-rati”— incessant talk but a shrinking of language.[sic])। सच तो ये है कि शब्दों की कमी हो गयी है। मीडिया और टेक्नोलॉजी रक्तसंचरित, समृद्ध और बहुव्यापी भाषा की पराजय का प्रदर्शन और प्रोत्साहन कर रहे हैं।

धर्म हिंसक-आक्रामक-लड़ाकू हो चुके हैं। उनमें आध्यात्मिकता, दूसरों की चिंता और पर्यावरण दायित्व पूरी तरह खत्म हो चुकी है। पोस्ट-ट्रूथ, फैक्ट-फ्री जगत में विचारों और विकल्पों से विहीन राजनीति हावी हो चुकी है। सत्य अल्पसंख्यक हो चुका है, झूठ लोकप्रिय और नियामक है। प्रेम, चाह, इच्छा, एकजुटता और चिंताओं का संसार लगातार किनारे होते जा रहा है लेकिन ये आज भी जीवित है, बचा हुआ है।



ऐसी वीभत्स स्थिति में कविता एक “दुष्कर आभा” को बचाए हुए है जिससे संसार के क्षणिक और कालातीत स्वरूप को चाहा जा सके, उसका उत्सव मनाया जा सके, उसका अन्वेषण किया जा सके और उसे उभारा जा सके। कविता संसार के मूर्तता, अमूर्तता, स्वप्न,  रहस्य और जटिलता का संधान करती है। कविता संसार में मानवता को व्यक्त, पुष्ट और चिह्नित करने का उद्यम है। कविता अथक रूप से इस बात पर जोर देती है कि तमाम मानवविरोधी शक्तियों की सक्रियता और क्रूरता के बावजूद ढेर सारी मानवता बची हुई है, जीवित है, सक्रिय है। कविता मुख्यतः स्मृति का कोठार है, भूलने के विरुद्ध एक अनवरत संघर्ष है।

कविता धर्म और विज्ञान की तरह परम सत्य जानने का दावा नहीं करती। जो ताकतें या आदमी परम सत्य को जानने का दावा करता है उनके तानाशाह और अत्याचारी बनने की आशंका रहती हैं। सत्य आम तौर पर विरोधाभासों और अपूर्णता को स्वीकार नहीं करता। ये एकांगी होता है। इसलिए ये कविता के बहुत काम का नहीं होता। कविता मानवीय जीवन और अस्तित्व ही बहुलता में वास करती है। भारत में कविता ने राजनीतिक आजादी से पहले स्वतंत्रता हासिल कर ली थी। बंगाली कविता, उर्दू कविता, पंजाबी और सिंधी कविता विभाजन को नहीं स्वीकार करतीं। कवि और कविता शायद आज अंतरआत्मा के आखिरी दुर्ग हैं। कविता एक गतिमान प्रतिरोध है। रबींद्रनाथ टैगोर ने कहा है कि एक छोटी सी मोमबत्ती जग को रोशन कर देती है। कविता एक छोटी सी मोमबत्ती नहीं है। ये दुनिया को रोशन करती है। ऐसे अंधेरे दौर में दुनिया को इस रोशनी की जरूरत है।

अशोक वाजपेयी, रज़ा फाउंडेशन, द्वारा 7-9 अप्रैल को त्रिवेणी कलासंगम, नई दिल्ली, में कविता का द्विवार्षिक कार्यक्रम 'वाक्' आयोजित किया जा रहा है।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
(कुछ फेरबदल के साथ अनुवाद जनसत्ता से साभार) 
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