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पूरे मुल्क को लगना है चासास्का का चस्का - संजीव कुमार

जुल॰ 19, 2013
दिल्ली विश्वविधालय में इस सत्र से फ़ोर र्इयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (एफ वार्इ यू पी) या चार साला स्नातक कार्यक्रम (चासास्का) लागू हो गया है। 10+2+3 की पद्धति से विचलित होने वाला इतना आमूल-चूल बदलाव जिस तरह की हड़बड़ी में और जितने अविचारित-कुविचारित तरीक़े से किया गया, वह अपने-आप में बेमिसाल है। शिक्षक लगातार इस चीज़ की मांग करते रहे कि इस नर्इ व्यवस्था की ज़रूरत और उसके तमाम पहलुओं को सार्वजनिक विचार-विमर्श के दायरे में लाया जाए, पर विश्वविधालय का प्रशासन अपने तानाशाही रवैये पर क़ायम रहा और चासास्का लागू हो गया। यह खुली चिटठी इसी संदर्भ में महीने भर पहले, 'सबलोग मासिक के जुलार्इ अंक के लिए लिखी गर्इ थी।

पूरे मुल्क को लगना है चासास्का का चस्का

(कुलपति के नाम सातवीं चिटठी)
संजीव कुमार

महामहिम कुलपति महोदय,

      इस बार तो मैं 99.99 फ़ीसदी आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूं कि आपके समर्थन में लिखी गर्इ यह मेरी आखि़री खुली चिटठी होगी। अब ज़रूरत ही क्या! हाथी निकल गया है, बस पूंछ निकलनी बाक़ी है।

      नहीं, मैं उस हाथी की बात नहीं कर रहा जिस पर चढ़ कर आप विश्वविधालय के वार्षिकोत्सव में महाराजाधिराज की तरह पधारे थे। वह तो सचमुच का हाथी था। रूपक यानी मेटाफ़र को समझिए, मैं चार साला स्नातक कार्यक्रम (चासास्का) की बात कर रहा हूं।

      संयोग देखिए कि हमारे विश्वविधालय का प्रतीक चिहन भी हाथी ही है। उस ज्ञानवृद्ध यानी बूढ़े-खूसट हाथी को मारकर यह जो नया, अमरीकी शक्ल-सूरत वाला, 'यो यो हड़बडि़या हाथी आपने इंट्रोडयूस किया है, उसका रास्ता रोकने के लिए मान्स्टर-मान्स्टरानियों और विधा-अर्थियों ने क्या-क्या नहीं किया। पर अपार कृपा है उस भगवान कपिल पल्लम की... नहीं-नहीं, कपिल राजू... नहीं, सिल्लम राजू... नहीं, सिब्बल्लम... ख़ैर, जो भी उसका नाम हो, अपार कृपा है उसकी कि 'सबलोग का यह अंक स्टाल्स पर आने तक इस हाथी की पूंछ भी निकल चुकी होगी।

      बावजूद इसके यह ख़त लिख रहा हूं, क्योंकि आपके सार्वजनिक समर्थन की ज़रूरत अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुर्इ है। बड़े-बड़े आलिम-फ़ाजि़ल लोग हाय-तौबा मचाने से बाज़ नहीं आ रहे (आलिम हैं कि ज़ालिम!) और मुझे लग रहा है कि सरकारी हल्के में आपको जितनी भी शाबासी मिले, जनता के बीच इनकी हाय-तौबा आपकी इज़्ज़त को मिटटी में मिलाए दे रही है। इनका कहना है कि हाथी निकल भले ही गया हो, वह जिस रास्ते से गुज़रा है, वहां उसकी नृशंसता के सबूत के तौर पर असंख्य जीव-जंतुओं की लाशें कुचली पड़ी हैं। अजीबोग़रीब नाम हैं उन जंतुओं के! लोकतांत्रिक मर्यादाएं, शिक्षाशास्त्र, भागीदारी, बुद्धि-विवेक, विचार-विमर्श, सामाजिक न्याय, जनहित--पता नहीं क्या-क्या! ये कौन-से जीव-जंतु हैं, महामहिम? क्या ये प्राक-उनिभू (Pre-LPG) युग की प्रजातियां हैं? तब तो इन्हें काल के गाल में समाना ही था! ये तो इन मान्स्टरों और विधा-अर्थियों की साजि़श है कि इन मरे-अधमरे जंतुओं को लाकर पहले उस रास्ते पर इकटठा कर दिया जिससे चासास्का के हाथी को गुज़रना था और जब वे कुचल गए तो शोर मचाना शुरू कर दिया कि देखो-देखो, हाय, कुचल के मार डाला इस पापी महावत ने! अरे, जो जंतु नवउदारवादी वातावरण में जी ही नहीं सकते, उनके मरने का दोष चासास्का और उसके महावत पर क्यों डालते हो भार्इ!

      इन आलिम-फ़ाजि़लों, यानी फ़जूल की बकवास करने वालों ने बयान दे-देकर, लेख लिख-लिखकर, हस्ताक्षर अभियान चला-चलाकर आपको बेदिमाग़ और बददिमाग़ साबित करने में कोर्इ क़सर नहीं छोड़ी है। मैं तो मानता हूं कि चासास्का पर होने वाले हर हमले का निशाना दरअसल आप ही होते हैं। जब तक आपके सिपाहियों को बहस में धूल चटा कर ये आपकी इज़्ज़त का फालूदा निकाल रहे थे, तब तक तो फिर भी बात समझ में आती थी; जबसे हर मोर्चे पर चासास्का को डिफ़ेन्ड करने की कमान आपने अपने हाथों में ले ली, तब से मैं पा रहा हूं कि फालूदा में इनकी दिलचस्पी और बढ़ गर्इ है। यहां मुझे एक बार गब्बर सिंह को याद कर लेने की इजाज़त दीजिए (आखि़र फि़ल्मों को पढ़ार्इ का ज़रिया बनाना चासास्का की एक अहम प्रतिज्ञा है)। ठाकुर के आदमी दो थे और गब्बर के तीन। ये फिर भी लौट आए, और वह भी ख़ाली हाथ। गब्बर की सारी इज़्ज़त मिटटी में मिलाए दिए। तब गब्बर ने क्या किया? पूछा, 'कब है होली, कब और खुद गया गांव के चौपाल पर ठाकुर के दोनों फौजियों से निपटने। आपने भी यही किया जो कि एकदम दुरुस्त क़दम था। अख़बार से लेकर टेलीविज़न चैनलों तक आपके जो सिपाही अपने मूर्खतापूर्ण उत्तरों से आपकी इज़्ज़त का फालूदा निकलवा रहे थे, उन्हें किनारे करके खुद जाना शुरू किया। पर कैसा बौद्धिक जुल्म है, महामहिम, कि उसके बाद से लोग यह कहने लगे, 'बंद मुटठी लाख की, खुल गर्इ तो ख़ाक की। कहने लगे, 'चासास्का दिमाग़ी दीवालिएपन की उपज है, इसमें अब कोर्इ शक नहीं रह गया। अब तक हमें ग़लतफ़हमी थी कि शायद वी.सी. को हिमायती अच्छे नहीं मिल पाए हैं, पर जब वे खुद बोलेंगे तो चासास्का के पीछे का दमदार तर्क सामने आ जाएगा। आखि़र विद्वत परिषद में इतने सारे शिक्षकों ने उनकी बात क्यों मान ली? क्यों सवा सौ से ऊपर के सदन में बस पांच-सात असहमतियां दर्ज हुर्इं? बातों में कोर्इ तो दम होगा! पर अब कुलपति को सुन कर पता चल रहा है कि उनके पास तर्क और आइडिया की नहीं, सत्ता की ताक़त थी, कृपा और कोप की ताक़त थी, अमेरिकीकरण के लिए कृतसंकल्प सरकार की ताक़त थी। वर्ना ऐसी बातों पर तो एकता कपूर का दर्शक वर्ग भी नहीं फुसलेगा, विद्वज्जन भला क्योंकर फुसलने-फिसलने लगे!

      ये बातें सुन-सुनकर मेरा पारा कैसा सातवें आसमान पर चढ़ा होगा, आप समझ सकते हैं। मैं एकता कपूर के धारावाहिकों का प्रतिबद्ध दर्शक रहा हूं और आपकी बातों का क़ायल भी हूं--इसी से पता चलता है कि वे लोग कितना ग़लत अंदाज़ा लगा रहे हैं। अब तक के सभी साक्षात्कारों और बतकहियों यानी टाक-शो में आपने सवालों के हमलों से अपने को जिस तरह बचाया है, वह लासानी है। यूं सिर झुकाया जार्ज बुश की तरह, और निशाना साध कर फेंका गया सवाल वो पीछे जाकर धब-से गिरा जूते की तरह! एक टाक-शो में किसी शिक्षिका ने पूछा, 'इंफ्रा-स्ट्रक्चर कहां है एफ़.वार्इ.यू.पी. लागू करने के लिए? चार बैचेज़ कहां बैठेंगे? पंखे तक तो ढंग से चलते नहीं! जवाब में आपने पूरे इंफ्ऱा-स्ट्रक्चर के सवाल को पंखे पर ही घुमा दिया; कहा, 'अगर पंखे नहीं चलते तो तीन साल के लिए भी नहीं चलेंगे, चार साल के लिए भी नहीं चलेंगे। धब!... सबसे ज़्यादा मज़ा तो तब आया जब यह सवाल पूछा गया कि इतने बड़े बदलाव का प्रस्ताव आपने बमुशिकल छह महीने पहले दिसम्बर की 24 तारीख़ को विद्वत परिषद में लाया, क्या यह उचित है? और जवाब में आप बोले, 'अगर विद्वत परिषद में पारित न कराया जाए तो आप ही लोग शोर मचाते हैं। इसलिए उसे विद्वत परिषद में लाना तो ज़रूरी था। धब! सवाल यह था कि लागू कराने की यह कैसी हड़बड़ी है जिसके चलते अभी-अभी दिसंबर में इसे विद्वत परिषद के पटल पर रखा गया। और जवाब दिया आपने इस सवाल का कि प्रस्ताव को परिषद के पटल पर रखा ही क्यों गया। कोर्इ ठस्स दिमाग़ वाला ही होगा जो इस हाजि़रजवाबी पर कुर्बान न जाए। मैं तो कहता हूं, इससे विश्वविधालय के सभी शिक्षकों और विधार्थियों को सीख लेनी चाहिए कि परीक्षा में सवालों के जवाब किस तरह लिखे जाएं। हे विधार्थियो, प्रश्न कुछ भी हो, तुम उत्तर वही लिखो जो तुम्हें लिखना है। बस, आखि़र में बता दो कि जिसका उत्तर लिखा गया, वह प्रश्न क्या है।

      गोनू झा के बारे में एक कि़स्सा मशहूर है, महामहिम, कि वे एक बार जंगल में तीरंदाज़ी का अभ्यास कर रहे थे। एक आदमी पहुंचा। उसने देखा कि जहां-जहां गोल टार्गेट बनाये गये थे, तीर उनके ठीक बीचों-बीच लगा था। वह अचरज में पड़ा कि साहब, क्या खूब निशाना है! रहस्य पूछा। पता चला कि मिस्टर झा ने पहले तीर चलाए, फिर जहां-जहां तीर लगे थे, उनके चारों ओर गोल घेरे बना दिए। मेरा सुझाव है, जनाब, कि आपके उत्तरों से प्रेरणा लेते हुए अब विश्वविधालय में यही परीक्षा-पद्धति लागू होनी चाहिए।

      वैसे इस तरह की सलाह मैं दे ही क्यों रहा हूं? पिछले दो साल से, यानी सेमेस्टर प्रणाली लागू होने के बाद से तो इससे भी अधिक उदार परीक्षा-पद्धति अमल में है। कहीं विधार्थियों का फेल होना सिस्टम के फेल होने का सबूत न बन जाए, इसके लिए आपने थोक में नंबर देने की, और जहां उससे काम न चले, वहां पंद्रह-बीस-पच्चीस नंबर फावघलुए में देने की जो प्रथा चलवार्इ, वह अपने-आप में नायाब है। ठीक है, इस चक्कर में कहीं-कहीं भूल से सौ में एक सौ दो नंबर भी मिल गए, पर इसका मतलब यह थोड़े ही है कि इस उदारता की हम आलोचना करने लगें। आपकी यह उदारता चासास्का के क्रियान्वयन के लिए भी दरकार होगी, याद रखें। जो लोग कह रहे हैं कि हिंदी माध्यम वालों और दृषिटबाधितों के लिए कर्इ अनिवार्य फाउंडेशन पाठयक्रमों को पढ़ना असंभव होने की हद तक मुशिकल होगा, उनकी जुबान बंद करवाने के लिए परीक्षा में इस उदारता को थोड़ा और बढ़ाना होगा। इन्हें डिसिटंक्शन माक्र्स दिलवा दें महामहिम, आलोचकों की बोलती बंद हो जाएगी और चासास्का की चतुर्दिक धूम मच जाएगी। वैसे जहां तक बोलती बंद करवाने का सवाल है, वह तो बाउंसर्स की फ़ौज के भरोसे भी हो सकता है जैसा कि पीछे आज़माया जा चुका है, पर चतुर्दिक धूम मचवाने के लिए उदारता का नुस्ख़ा ही ठीक है।

      मुझे पूरा विश्वास है जनाब, चासास्का का चस्का तो पूरे मुल्क को आज न कल लगना ही है! जिसके ऊपर अमरीका जैसी पावन महाशकित का हाथ हो, उसे कौन दबा सकता है! कल बिहार से रामपदारथ भार्इ का फ़ोन आया था। कह रहे थे कि उनके यहां इसके लागू होने की कोर्इ आशंका नहीं है, कम-से-कम अगले साल तो नहीं ही। आशंका (यानी संभावना) इसलिए नहीं है कि वी.सी. की ओर से अभी कोर्इ सुगबुगाहट सुनार्इ नहीं पड़ रही। मैंने कहा, 'आप भी क्या 'मैला आंचल के पात्र टाइप बात करते हैं। हमारे ही यहां साल भर पहले कौन जानता था कि क्या खिचड़ी पक रही है, कहने का मतलब कितनी स्वादिष्ट खिचड़ी पक रही है! अरे, हो सकता है एक गोपनीय टास्कफ़ोर्स गठित हो चुका हो और अचानक 2014 में आपका कुलपति घोषणा करे कि हम चासास्का ला रहे हैं, पूरा ढांचा तैयार है, पंद्रह दिनों के अंदर सारे विभाग अपने-अपने सिलेबस बना कर दे दें।... ऐसी मिसाल तो हमने क़ायम कर ही दी है। रामपदारथ भार्इ बोले, 'लाखों विधार्थियों की जि़ंदगी को बनाने-बिगाड़ने वाला सिलेबस क्या वी.सी. की हिमायत में लिखी जानेवाली तुम्हारी चिटठी है कि बैठे और लिख डाली? अरे महाराज, जेहनी और गंभीर काम है। मैंने कहा, 'इसी धोखे में तो पंद्रह दिन दिए जाएंगे। वर्ना काम तो पंद्रह घंटे से ज़्यादा का नहीं है। टीचर वही जो चुटकियों में सिलेबस बनाए--यही आज का नारा है, हमारे विश्वविधालय ने दिखा दिया। इस पर वे नितांत स्थानीय कि़स्म की सूकितयों का उच्चारण करने लगे। तब मुझे कहना पड़ा, 'यह निठल्ला हिंदुस्तानीपन छोडि़ए, पदारथ भार्इ, और बताए देता हूं, अमरीका से लेकर एमएचआरडी तक, जिसे गरियाना हो गरियाइए, अगर मेरे कुलपति साहब के बारे में कोर्इ कठोर शब्द कहेंगे तो मैं फ़ोन बंद कर दूंगा। इस पर उन्होंने अविलंब एक कठोर स्थानीय शब्द कह डाला। मैंने फ़ोन बंद नहीं किया और कहा कि अगर इससे कठोर कोर्इ लफ़्ज़ आपने निकाला तो मैं फ़ोन पक्का बंद कर दूंगा। भार्इ साहब ने उससे भी ज़्यादा कठोर स्थानीय लफ़्ज़ का इस्तेमाल किया। मैं भी कहां मानने वाला था, कहा कि अगर... ख़ैर, उस प्रकरण को जाने दें, महामहिम। वह अत्यंत दुखद और वीभत्स अतिवाद तक गया और अंत-अंत तक पदारथ भार्इ इस बात पर अडिग रहे कि मेरे कुलपति की करनी को देखते हुए उनकी प्रतिक्रिया कोर्इ अतिवाद नहीं, अपितु अत्यंत माडरेट आकलन है।

      पर इन प्रतिकूल लोकापवादों से मेरा मनोबल बिल्कुल नहीं टूटा है, महामहिम। आखि़र इस लड़ार्इ में एक ओर लोकापवाद हैं तो दूसरी ओर मनोबल बढ़ानेवाली बातें भी तो हैं। देखिए, सरकार कितने तरह के योगासन कर-करके इस चासास्का को प्रोत्साहन देती रही है। कभी वह हड़बड़ी की आलोचना करने के बाद विश्वविधालय की स्वायत्तता का तर्क ढूंढ़ लाती है जो कि उसे वैसे कभी याद नहीं आता, कभी हल्के से यह बात कह जाती है कि 10+2+3 कोर्इ अनुल्लंघनीय ढांचा नहीं है, कभी कहती है कि इसके बारे में तो यूजीसी को ही कुछ करने का अधिकार है और अंदर-अंदर यूजीसी की बांह मरोड़ कर उसे प्रतिकूल फ़ैसला करने से रोक देती है, कभी मानव संसाधन विकास मंत्री खुल कर आपके सुधार का समर्थन कर देते हैं। कांग्रेस से जुड़े शिक्षक-समूहों को पूरी तरह और भाजपा से जुड़े शिक्षक-समूह को निर्णायक मौक़ों पर आपने जिस तरह से अपनी ओर मिला लेने में सफलता पार्इ है, उससे भी मेरा मनोबल बढ़ा है। विश्वविधालय के शिक्षक संघ को एक ग़ैर-क़ानूनी संगठन बताने के बाद भी आपके द्वारा राजनीतिक समूहों का ऐसा समर्थन हासिल कर लिया जाना उन राजनीतिक समूहों के लिए जितना भी शर्मनाक हो, आपके लिए तो गौरव की ही बात है!... तो विरोध करने के लिए ले-देकर बचे मुटठी भर शिक्षक। पहले आपकी मुटठी भर वाली बात मेरी समझ में नहीं आती थी। मैं सोचता था कि हर मौक़े पर जो सैंकड़ों शिक्षक दिख जाते हैं और इनसे कर्इ गुना न दिखने वाले जो अपने-अपने कालेजों की एसोसिएशन से इस चासास्का के विरोध में प्रस्ताव पारित कर भेजते हैं, उन्हें एक मुटठी में कैसे भरा जा सकता है? पर एक दिन विरोध-प्रदर्शन के एक मौक़े पर मैंने आपकी बात का मतलब समझा। मैंने देखा, एक प्लेकार्ड पर खुली हुर्इ किताब की तस्वीर है जिस पर लिखा है, 'ऐडुकेशन : नाट फ़ार सेल, और किताब की तस्वीर के पीछे मुटठी बांधे एक हाथ की तस्वीर है। मैं समझ गया, मुटठी भर शिक्षक से आपका आशय यही था। यानी ऐसे शिक्षक जो इस बंधी मुटठी वाली तख़्ती को उठाए चलते हैं।

      चलिए, ऐसी तखि़तयां तो पता नहीं कब से दिखार्इ जाती रही हैं और कब तक दिखार्इ जाती रहेंगी। इन 'नाट फ़ार सेल वालों का संकल्प भी कोर्इ संकल्प है! संकल्प तो हमारा है जो बिना किसी तख़्ती के पूरे विश्वविधालय में गूंज रहा है--एफवार्इयूपी : नाट फ़ार डिस्कशन... और कौन कहेगा कि कामयाब नहीं है!

संजीव कुमार 
सी-35,विदिशा अपार्टमेन्ट,
79 आइ०पी० एक्सटेंशन,
दिल्ली - 92

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