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अपने पंखों को आकाश दो - गीताश्री

जुल॰ 20, 2013

आदमियों की निगाह में यदि स्त्री करती है गिले शिकवे
या बार-बार दोहराती है एक ही बात
आदमी को समझ जाना चाहिए कि
उसकी आस अभी टूटी नहीं है
और रिश्ता उसके लिए बेशकीमती है
वो सब कुछ के बावजूद उसे निभाने को आतुर है
रहना चाहती है साथ-सुलझा के तमाम बदशक्ल गांठें
और इसी पर है उसका सारा ध्यान
क्योंकि बंदे से अब भी करती है खूब प्यार
- तुर्की कवि कमाल सुरैया
Geeta Shree shri gita गाना गाते-गाते उसकी आवाज भर्रा गई थी। उसने पर्स से रुमाल निकाला और अपने आंसू पोंछते हुए संयमित आवाज में कहा, ‘सॉरी मैम..रहा नहीं गया। आप लोग इतने प्यार से बातें कर रहे हो, समझा रहे हो...मुझे जरा भी डर नहीं लग रहा है। मैं अवार्ड जीतूं या ना जीतूं, यहां से हिम्मत लेकर जा रही हूं...अब सामना करूंगी, पक्का।’ जाते हुए मैंने उसको एक पर्ची पकड़ाई जिस पर लिखा था - ‘तुम दरवाजे से गुजर सको, इसके लिए तुम अपने पंख समेटो मत और कहीं छत से टकरा न जाओ, इसके लिए सिरों को झुकाओ मत, कहीं दीवारें दरक कर गिर न पड़ें, इसके लिए सांस लेने से डरो मत, तुम उन मकबरों में मत रहो, जो मुर्दों ने जीवितों के लिए बनाए हैं’ -खलील जिब्रान। वह पर्ची को मुट्ठी में भींचते हुए बाहर निकल गई।

     वह एक मध्यवर्गीय परिवार से आई हाउसवाइफ थी। उसे गाने का शौक है। नाचने का शौक है। देखने में देहाती लुक वाली उस प्रतियोगी ने चौंका दिया कि मैं शकीरा के गाने पर भी डांस कर सकती हूं। इशारा मिलते ही शकीरा के सबसे फेसम हिप्पस डोन्ट लाई... गाने पर वह थिरक उठी। उसकी डांस प्रतिभा देखकर सब भौचक रह गए। लेकिन वह घर में नाच नहीं सकती, गा नहीं सकती। इजाजत नहीं। शादी और बच्चों के बावजूद उसकी जिंदगी इजाजतों पर टिकी है। घर में पूरा माहौल संगीत विरोधी है। आज भी वही फरमान पति समेत बड़े बुजुर्गों का- कि गाना-वाना फालतू टाइम वेस्ट करने वाला काम है... बच्चों पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। वह अपनी व्यथा सुना कर गई, दूसरी आई, तीसरी आई, और शाम तक लगभग ४० कम उम्र हाउसवाइफ्स से हम इंटरव्यू कर चुके थे। उनको सुन-सुन कर हमारा माथा घूम गया था। हम तीन महिलाएं वहां ज्यूरी में थीं। दिल्ली के एक दैनिक अखबार और गैर सरकारी संगठन आस ने मिल कर एक मुहिम चलाई थी, सुपर हाउसवाइफ्स चुनने की।

     आयोजकों ने बताया कि दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) से ८००० हाउसवाइफ्स की इंट्री आई थी। हम तो सिर्फ़ ४० से मिले। उन सबके भीतर की तकलीफ ने हमें हिला दिया। सबका रोना एक-सा। सबकी शिकायतें एक-सी। हालत ये हुई कि इंटरव्यू कई बार सांत्वना सत्र में बदलता-सा लगा। दोनों तरफ स्त्रियां ही थीं। हमने उनसे पूछा कि ये अवार्ड जीतना आपके लिए क्यों जरूरी है। सबने कहा-कि इससे हमें अपने शौक पूरा करने की आजादी और एक प्लेटफॉर्म मिल जाएगा। अभी तो घरवाले कहते हैं- कौन पूछ रहा है तुम्हें?

     इन सभी प्रतियोगियों से पूछे गए कई सवालों में से एक सवाल ऐसा था जिसका उत्तर सबका एक-सा था। सवाल था-क्या आपको लगता है कि हाउसवाइफ्स की तुलना में वर्किंग वीमेन की रिसपेक्ट ज्यादा होती है, घर और बाहर? सबका जवाब हां में था। उनके भीतर वीमेन न होने का जबरदस्त मलाल था। इंटरव्यू के शुरुआती दौर में इन प्रतियोगियों के चेहरे पर हाउस वाइफ्स होने का जो दर्प दिखता था वो धीरे-धीरे फ्यूज होते बल्ब में बदल जाता था। पहले वह कहती, ‘मैं बहुत खुश हूं हाउसवाइफ बनके।मैं खुश हूं...की घोषणा ही मुझे बहुत नकली लगती है, एक फरेब है जो हम खुद के साथ करते रहते हैं। वही हुआ। सवालों के दरिया में ऊभ-चुभ इन महिलाओं की ये खुशी हवा होते देखा मैंने। ज्यादा कुरेदते ही सारी कुंठा बाहर। उनके भीतर की इस कुंठा को निकालना आसान नहीं था। वजहें चाहे जो हों। खलील जिब्रान सही कहते थे, ‘अपने अधिकांश दुख को तुमने स्वयं चुना है।’ अपने हिस्से का सूर्योदय तो अपनी खिड़की से हमें खुद ही देखना होगा, अपनी आत्मा के उजाड़ और उपवन दोनों में खुद ही देखना होगा। कब तक मुंह जोहते रहेंगे, घर परिवार का। इस सरपट भागती दुनिया में कौन खोलेगा हमारी बेड़ियां। इस पर सोचना चाहिए। एक ही जिंदगी मिली है, अपनी अस्मिता के लिए जूझें, भिड़ें और हर परिणाम के लिए तैयार रहें। सपने तभी पास आएंगे। उन्हें मरने न दें। सपनों के घुमड़ते बादलों को खुला आकाश चाहिए मेरी जान।

     बहरहाल, इसी कुंठा से बचने के लिए शहरी वर्ग की हाउसवाइफ्स खुद को इन दिनों हाउसमेकर कहलाना पसंद करती हैं। इससे अपने खास होने का बोध होता है। हाउसवाइफ होना शरमिंदगी की व़जह क्यों बनें?
हालांकि कई बार ये भूमिका अपनी मर्जी से नहीं चुनतीं। समाज के इसी नजरिए के चलते आज भी कामकाजी महिलाओं की संख्या बहुत कम है। हाल ही में कामकाजी महिलाओं के बारे में प्रकाशित एक आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में सबसे कम १०.६ फीसदी और बेंगलूरु में २४.०३ फीसदी महिलाएं काम करती हैं। ये आंकड़े बड़े महानगरों और शहरों में कुछ खास क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की संख्या के आधार पर तैयार किए गए हैं। भारत में कुल कामगारों की आबादी ४८.५ करोड़ है, जबकि महिलाएं इस आबादी का सिर्फ़ एक चौथाई यानी १२.७ करोड़ हैं। है ना सोचने की बात। कहां हैं बाकी महिलाएं...कहां उलझी हैं, किस दुनिया में खप रही है उनकी प्रतिभा। कोई ड्रेसिंग टेबल के सामने वाका-वाका... नाच रही है तो कोई किचन में बेलन-संगीत पर गुनगुना रही है। हाउसवाइफ हो या हाउसमेकर..हालात तो एक ही हैं। दिल को बहलाने को गालिब ये खयाल अच्छा है... की तर्ज पर सोचने से क्या हासिल! अपने सपने पर किसी को पांव न धरने दीजिए। अपने को पहचानिए, खुद से प्यार करिए और अपने किसी खास गुण को तराशिए, चमत्कार हो जाएगा। रोंडा बर्न अपनी किताब रहस्य में लिखती हैं, ‘उम्मीद एक प्रबल आकर्षण शक्ति है-क्योंकि वह चीजों को अपनी ओर खींचती है।’ 

गीताश्री
(बिंदिया, अगस्त २०१३ की सम्पादकीय से साभार)

गीता श्री के संपादन में "बिंदिया" अंक दर अंक नयी ऊचाईयां छू रही है. मेरी समझ में "बिंदिया" महिलाओं की पहली वो पत्रिका बन गयी है, जो साहित्य से जुड़ाव भी रख रही है. ये हिंदी और अपनी सम्पादकीय में गीताश्री जिनके विषय में बात कर रही हैं, दोनों के लिए शुभ संकेत है.

    शब्दांकन और उसके पाठकों की शुभकामनाएं गीताश्री के साथ है.

भरत तिवारी

बिंदिया अगस्त २०१३


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