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अढ़ौली (बुलन्दशहर) और बीफ की अफ़वाह - शुऐब शाहिद

अग॰ 28, 2017


अढ़ौली (बुलन्दशहर) और बीफ की अफ़वाह

योगीराज में बरक़रार रामराज्य


25 अगस्त 2017 की बात है। देश की राजधानी से तकरीबन 60 किमी० दूर एक गाँव है, अढ़ौली (बुलन्दशहर से दूरी: 5 किमी०/पोस्ट- सहकारी नगर, जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश/)। पूरे गाँव की आधी आबादी मुस्लिम है। वहाँ बीफ़ की खबर फ़ैल गई। इस पर शहर से बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू युवा वाहिनी का पूरा गिरोह पहुँचा। वहाँ की मस्जिदों में तोड़-फोड़ की। गाँव की मुख्य मस्जिद को बुरी तरह नुक्सान पहुँचाया। और सबसे अहम बात जो मैं बताना चाहता हूँ वो ये कि 'देशभक्तों' का ये समूह मस्जिद की मीनार पर चढ़ गया और वहाँ 'तिरंगा' लगाया और मस्जिद की मीनार से 'जय श्रीराम' और 'वन्दे मातरम' के नारे लगाए गए। ये पूरा मामला पुलिस की मौजूदगी में हुआ।

इस घटना का उल्लेख करते हुए एक मुस्लिम नौजवान स्तम्भकार शुऐब शाहिद (जिनका सम्बन्ध बुलन्दशहर से है) ने एक मार्मिक लेख सोशल मीडिया पर साझा किया। उसी लेख को यहाँ शब्दांकन ने माध्यम से साझा किया जा रहा है। यह लेख इस देश मुसलमान की उस वास्तविक पीड़ा को व्यक्त करता है जिसको ना वक़्त का मीडिया देखता है और ना ही बहुसंख्यक समाज।

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क्या एक समुदाय विशेष को डरा कर, धमका कर, पीट कर या उन्हें क़त्ल करके उनसे जयश्रीराम के नारे लगवा लेना देशभक्ति है 
मैं इस पूरी घटना की वीडियो नहीं साझा कर रहा हूँ। ये काम तो सब करते ही हैं। हिन्दू हो तो शेयर करो.... या मुसलमान हो तो शेयर करो.......वगैरह। मैं ये सब नहीं करता, क्योंकि अभी भी कुछ यकीन बचा हुआ है इस आधे-अधूरे लोकतन्त्र में। इसलिए महज़ जम्हूरी तरीके से अपनी बात कह रहा हूँ।

एक तरफ देशभक्ति है जो मस्जिदों की मीनारों से जयश्रीराम का नारा लगाने से सिद्ध होती है। और दूसरी तरफ हम मुसलमान हैं जो महज़ इस आधार पर देशद्रोही हो गए कि हमारी आस्थाएँ उनकी आस्थाओं से अलग हैं।



मैं जानता हूँ कि मेरे शब्द ज़रा सख्त हो जाते हैं अक्सर, लेकिन एक मामूली विद्यार्थी की तरह आपसे कुछ सवाल पूछना चाहता हूँ। ये सवाल इस देश के एक नौजवान की तरफ से या फिर एक आम नागरिक की तरफ से (अगर आप हमें नागरिक स्वीकार कर सकें तो)।

आप जानते हैं पिछले 3-4 साल से मुझे और मेरे जैसे बहुत से नौजवानों को 15 अगस्त और 26 जनवरी को घरवालों की तरफ से दिल्ली जाने की इजाज़त नहीं मिलती। 

ये सवाल उस संविधान की तरफ से भी हैं कि जो नफरतों के इस घुटन भरे कारागृह में दम तोड़ रहा है। (अगर आज होते तो) यही सवाल उन शहीदों के होते जो देश को बाक़ी रखने के खुद ना रहे। बहरहाल.......जिसकी तरफ से भी आप समझें।

देशभक्ति क्या है ? क्या जन्म के आधार पर खुद को श्रेष्ट समझना, और दूसरे तुच्छ समुदाय पर अपनी आस्थाएँ थोप देना ही देशभक्ति है?

क्या एक समुदाय विशेष को डरा कर, धमका कर, पीट कर या उन्हें क़त्ल करके उनसे जयश्रीराम के नारे लगवा लेना देशभक्ति है ?

क्या एक सेक्युलर देश में सांप्रदायिक नफरत की बुनियाद पर पूरे-पूरे शहरों को क़ब्रिस्तान में बदल देना देशभक्ति है ?

देश क्या है ? धर्म क्या है ? क्या हिन्दुइज़्म ही देश है ? क्या भाजपा ही हिन्दुइज़्म है ?
वन्दे मातरम को तलवार की नोक पर मस्जिदों की मीनारों से चिल्लाओगे तो वो महज़ आतंकित करने वाला नारा बन कर रह जायेगा
आतंकवाद क्या है ? अगर समाज को आतंकित करना ही आतंकवाद की परिभाषा है तो कल मस्जिदों को तोड़ने वाले लोग पूरे गांव के मुसलमानों आतंकित कर रहे थे। मीनार से लगने वाले नारे उस पूरे समाज को आतंकित कर रहे थे। तो क्यों ना उन्हें आतंकी कहा जाए ? वन्दे मातरम को तलवार की नोक पर मस्जिदों की मीनारों से चिल्लाओगे तो वो महज़ आतंकित करने वाला नारा बन कर रह जायेगा। क्यों 'जयश्रीराम' सुन कर आज मुस्लिम नौजवान आतंकित होने लगा हैं ? हम ट्रेनों और बसों में होने वाली राष्ट्रवादी चर्चाओं में ख़ौफ़ज़दा क्यों होने लगे हूँ ? क्यों एक मुस्लिम नौजवान को ऐसी चर्चाओं में खुद के जुनैद हो जाने का खौफ है ? आज अधिकतर न्यूज़ चैनल सेक्युलर समाज को आतंकित करने लगे हैं। तो क्यों ना उन्हें आतंकी चैनल कहा जाए ? क्यों हॉस्टल में और शहर से बाहर रहने वाले मुस्लिम नौजवानों के माँ-बाप खुद को नजीब की माँ की तरह महसूस करते हैं। आप जानते हैं पिछले 3-4 साल से मुझे और मेरे जैसे बहुत से नौजवानों को 15 अगस्त और 26 जनवरी को घरवालों की तरफ से दिल्ली जाने की इजाज़त नहीं मिलती। इस अन्जाने खौफ को किस तरह बयान किया जाए, मुझे नहीं पता।



क्यों इस देश में एक बलात्कारी को बलात्कारी कहने मात्र से शहर के शहर महफूज़ नहीं ? क्यों आज कोई सेक्युलर व्यक्ति/पत्रकार/विद्यार्थी/प्रोफ़ेसर/साहित्यकार आज अपनी ज़ुबानों और क़लम पर पाबंदियाँ महसूस करता है ? क्या सिर्फ लोकतन्त्र चिल्लाने से ये देश लोकतान्त्रिक हो गया ? क्या सिर्फ सेक्युलर कहने से ये देश सेक्युलर हो गया ?

मैं दिखाऊंगा आपको देश का असल हाल

बड़े-बड़े कॉन्क्लेव और पाँच सितारा होटलों से बाहर आइये। आइये अढ़ौली जैसे किसी गाँव में चलिए मेरे साथ। मैं दिखाऊंगा आपको देश का असल हाल। जिसको आपमें से बहुत से लोग देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं। आइये इन गावों में, वो बतायेंगे आपको कि गुलामी किसे कहते हैं। होकर आइये कभी बिसाहड़ा (दादरी) में वहां के मुसलमान बताएँगे आपको कि आतंक का अहसास कैसा होता है कि जब उनके सामने अख़लाक़ के क़ातिल को तिरंगे में लपेटा गया तो उस तिरंगे ने कितना ख़ौफ़ज़दा किया होगा ? इसी अढ़ौली की बात है, 2002 में एक परिवार फ़ोन पर अपनी बेटी से बात कर रहा था जो अहमदाबाद में रहती थी। घबराई हुई बेटी अभी बात भी पूरी ना कर पायी थी के फ़ोन पर नवासे की आवाज़ आयी "अम्मी वो आ गए तलवार लेकर" और फ़ोन कट गया।
पूछना चाहिए उस परिवार से कि आतंकी हमला क्या होता है ?

- शुऐब शाहिद
डिज़ाइनर व स्तम्भकार

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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