हेलीकॉप्टर : दलित राजनीति पर विजय पण्डित की हिंदी कहानी

विजय पण्डित की हिंदी कहानी 'हेलीकॉप्टर' — शब्दांकन

दलित राजनीति की तिकड़में जिस तरह पहले से ही दबे इंसान को कुतरती है, वह जीरो डिग्री वाले टॉर्चर से कम नहीं है। विजय पण्डित की कहानी ‘हेलीकॉप्टर’ दलित राजनीति की इसी प्रक्रिया की जड़ में बैठकर लिखी गयी कहानी है। कहानी जब 2003 में कथादेश में प्रकाशित हुई तब मैनेजर पाण्डेय जी ने इस पर यह कहा था:

“कहानी 'हेलीकॉप्टर' में बसपा की राजनीति और रीति-नीति की वास्तविकता को बारीकी से समझा और व्यक्त किया गया है। उभरता हुआ नया नेता सरोज कहता है, ‘हाईकमान को अपने नाम के नारे के अलावा कोई और नारा पसंद नहीं।’ यही नहीं वह यह भी कहता है, ‘हमारी नेता जहां बैठती हैं उनकी कुर्सी ही अकेली होती है, बाक़ी सब ज़मीन पर।’ यह है बसपा के भीतर का लोकतंत्र।
बसपा के लिए आंबेडकर का वही अर्थ और महत्त्व है जो कांग्रेस के लिए गांधी का। ‘हेलीकॉप्टर’ कहानी से यह संकेत मिलता है कि बसपा को दलित जीवन की ज़मीनी सच्चाइयों और समस्याओं की जितनी कम समझ है उतनी ही कम चिंता भी है। इसीलिए बसपा की राजनीति के विरुद्ध दलितों में असंतोष का भाव भी पैदा होता है।”

यह कहानी 23 साल बाद आज भी उतनी ही सच्ची है जितनी तब थी जब पहली बार प्रकाशित हुई थी।

~ भरत तिवारी


हेलीकॉप्टर

विजय पण्डित

टेलीविज़न -प्रसंग

पंधारी के ओसारे में पूरा चमर टोला ठुँसा पड़ा था। रमई, तौलन, छेदी, बिट्टा और खरपत्तू के परिवार से तो पंधारी की भतखही थी ही, लेकिन पियारे और मंसा, जिनसे पंधारी के घर से भात छूट गया था, वे भी भीड़ के पीछे दूर खड़े होकर इस फोटो वाली मशीन को चलते हुए एक नज़र देख लेने के लिए उतावले दीख रहे थे। यद्यपि वे अपनी घरवालियों और बच्चों को सख़्त हिदायत दे रखे थे कि पंधारी के ओसारे की ओर कोई भूलकर भी नहीं जाएगा, लेकिन पियारे और मंसा के घर से निकलते ही उनकी दुलहिनें दरवाज़े के पीछे घूंघट की ओट बनाकर इस मशीन को एक नज़र देख लेने का प्रयास करने लगीं।

पार्टी कार्यालय से पंधारी अंगोछे में लपेट और सिर पर रखकर यह टेलीविज़न आज टोले में ले आया था। चमर टोले में यह पहला टेलीविज़न था।

जब से पार्टी के युवा नेता सरोज ने यह डिक्लेयर किया कि चुनाव के दौरान पार्टी की तरफ़ से चमर टोला को एक टेलीविज़न दिया जाएगा, तभी से इस टोले के भीतर ही भीतर दो फाट हो गया था। सवाल यह था कि आख़िर टेलीविज़न लगेगा तो किसके घर लगेगा? क्योंकि इस टोले में न तो कोई ऐसा-सार्वजनिक स्थल था, न ही विद्यालय और न ही पंचायत घर, जहां इसे रखा जाता। पंधारी का पलड़ा इस मामले में इसलिए भारी था कि सबसे ज़्यादा जगह पंधारी के ही ओसारे में थी। जहां चाहे बारिश हो या पत्थर पड़े, पूरा चमर टोला इकट्ठा होकर टेलीविज़न देख सकता था। इसके-साथ ही पंधारी के पक्ष में रमई, तौलन, छेदी, बिट्टा और खरपत्तू सभी का पूरा समर्थन भी था। यह समर्थन इसलिए भी था कि पंधारी और इन परिवारों में अभी भी भात का संबंध कायम था। पियारे और मंसा से पंधारी की सरपतहिया टीले के सरपत को लेकर ख़ूब कहा-सुनी हुई थी। बात लाठी-डंडे तक आ गई थी। यह तो भला हो सरोज नेता का कि उन्होंने आकर दोनों को खूब डांट पिलाई और पार्टी हाईकमान का हवाला देकर समझाया कि इलेक्शन में केवल एक महीना है और इस समय भी सब लोग अगर एकजुट होकर नहीं रहे तो इससे ऊंची जाति के लोगों का ही फायदा होगा। अगर आपस में ही लड़ते-झगड़ते रहे तो प्रदेश में अपनी जो बनी सरकार है, वह तो जाएगी ही, दिल्ली में सरकार बनने का सपना भी कभी पूरा नहीं होगा। सरोज नेता बार-बार समझाते कि यह आर-पार की लड़ाई है। अगर अभी नहीं, तो कभी नहीं.

सरोज नेता की ही हनक थी कि पूरे चमरटोले ने सरपतहिया टीले के मसले पर आपस में मेल-जोल कर लिया था और यह तय हो गया था कि इस टीले के आधे हिस्से को दोनों धड़ के लोग मिल जुल कर उपयोग करेंगे और आधा हिस्सा टोले के दिशा मैदान के लिए रहेगा। वैसे नेताजी ने भले ही पार्टी हाईकमान की दुहाई देकर व अपनी बिरादरी के राज का हवाला देते हुए दोनों पक्षों को एका बनाए रखने का निर्देश देकर शांत करा दिया हो, लेकिन पंधारी और पियारे में वैमनस्य की जो गांठ बंधी तो बंधी ही रही। जिसकी परिणति यह हुई कि पूरे टोले में दो फाड़ हो गया। हालांकि इस फाड़ को ख़तम करने के लिए नेताजी ने बहुत कोशिश की, लेकिन उसमें अधिक सफलता नहीं मिली। जब तक नेताजी टोले में रहते, तब तक तो मामला ठीक-ठाक रहता। लेकिन जैसे ही वह वहां से निकलते, स्थिति जस की तस हो जाती। राजधानी में हुई बैठकों में पार्टी कार्यकर्ताओं को यह सख़्त निर्देश दिए गए थे कि आपसी रंजिश और गली मुहल्ले के झगड़ों को तुरंत बीच बचाव करके, चुनाव के पहले तक ख़त्म कर दिया जाए, जिससे कि आपसी भाईचारा बना रहे। क्योंकि यह संसदीय चुनाव है और इस बार दिल्ली में पार्टी का झंडा फहराना है और एक बार केंद्र में सरकार बन गई तो इस समाज के लिए स्वर्ग ही स्वर्ग होगा। सरोज नेता के इस आश्वासन पर पूरा टोला बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था कि इस बार चुनाव जीतने पर चमर टोला में विकास ही विकास होगा। पूरे गांव में बिजली, पानी और विशेषकर शौचालय का निर्माण कराया जाएगा, जिससे कि महिलाओं को बाहर निकलने की समस्याओं से सदा के लिए मुक्ति मिल सके.

नेताजी ने जब यह फाइनल किया कि टेलीविज़न पंधारी के ओसारे में ही लगेगा और ओसारे में पियारे तथा मंसा की फेमिली भी टेलीविज़न देखेगी, तभी से पंधारी और पियारे दोनों ही धर्मसंकट में पड़ गए। सबसे ज़्यादा सांसत में पड़ गए पंधारी। दरअसल समस्या बढ़ा दी पंधारी की दुलहिन और उनके मुंहबोले देवर छटंकी ने। छटंकी ने टीवी आने से पहले ही भउजी को बता दिया था कि सिटी में जब लोग टेलीविज़न देखते हैं, तो पकौड़ी के-साथ चाह भी पीते रहते हैं। तो पंधारी की दुलहिन ने छटंकी से पकौड़ी और चाह का-सामान भी मंगवा लिया था। अब पंधारी के लिए घर्मसंकट यह था कि जब टेलीविज़न चलेगा तो चाह-पकौड़ी बनेगी ही और जब पियारे की पार्टी से भात-पानी नहीं है, तो उनको पकौड़ी कैसे खिलाया जा सकता है ? हर समस्या का हल… नेताजी। सो पंधारी अपने दो-तीन लगुए-भगुए लेकर नेताजी के पास पहुंचे। नेताजी ने स्थिति की गंभीरता को महसूस किया और पंधारी की पीठ थपथपाई।

‘चलो मुझे खुशी है कि अपनी बिरादरी के लोग भी अब एडवान्स हो रहे हैं। टेलीविज़न कैसे देखा जाता है, वे जानते हैं। जहां तक भतखही का सवाल है, सो जिस दिन आप लोग टेलीविज़न चालू करने का प्रोग्राम रखेंगे, मैं आ जाऊंगा। उसी समय अपने हाथों से पियारे एंड पार्टी को पकौड़ी खिलाकर यह संकट दूर कर दूंगा। आख़िरकार आपस में एका बनाए रखना भी तो बहुत ज़रूरी है.’

आज पूरा टोला पंधारी के यहां इकट्ठा होकर नेताजी का इंतज़ार कर रहा था। पियारे और मंसा का परिवार दूर से ही हर गतिविधि को चुपचाप देख रहा था। तभी नेताजी अपने पांच समर्थकों के-साथ येजडी मोटर-साइकिल पर सवार हो पहुंच गए। टोले के चेहरे पर रौनक छा गई। सूट-बूट पहने जैसे ही नेताजी ने मोटर-साइकिल को स्टैंड पर खड़ा किया, पंधारी के बूढ़े बाप ने चुटकी ली --

‘बचवा सरोज, नेता लोग तो खादी का कुर्ता पैजामा पहनते हैं और तुम हो कि सूट-बूट डाटे हो.’

‘नहीं चचा, खादी का कुर्ता तो तोंदियल और मनुवादी नेताओं का पहनावा है। उस पहनावे को हम लोगों ने नकार दिया है.' अचानक सरोज की भूमिका एक भाषणकर्ता की हो गई।

‘भाइयों और बहनों! चचा ने बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है। आप लोग तो जानते ही हैं कि हमारा विरोध मनुवाद से तो है ही, उसके-साथ ही-साथ हमारा विरोध उनके पहिनावे और रीति रिवाज़ से भी है। धोती, कुर्ता और जॉकिट मनुवादी पहिनावा है। आपने क्या बाबा-साहब को कभी धोती और कुर्ता में देखा है? पार्टी हाईकमान को क्या कभी धोती-कुर्ता पहने देखा है? सफारी-सूट पहनते हैं वे। यहाँ तक कि हम उनके नाम के पहले ‘श्री’ भी नहीं लगाते, मान्यवर लगाते हैं। बहन जी ने-सार्वजनिक जीवन में कभी-साड़ी नहीं पहनी। वैसे यह सब पॉलिसी मैटर है। आप लोगों को धीर-धीरे सब समझ में आ जाएगा.’

चचा को जवाब देने के बहाने पूरे टोले पर रौब गांठ लिया था सरोज ने। पूरा टोला अभिभूत था नेताजी के इस वक्तव्य से। वैसे जब से सरोज नेता का यहां आना-जाना शुरू हुआ है तभी से लोग मनुवाद, हाईकमान, सुप्रीमो और पॉलिसी मैटर जैसे शब्दों से भी परिचित हुए हैं। हालांकि इसका पूरा मतलब टोला के लोग अब भी नहीं जानते फिर भी 'मनु' वाली बोली आजकल बहुत बोली जा रही है, इसे सभी जान गए हैं।

अपना वक्तव्य समाप्त कर सरोज सीधे पियारे की ओर बढ़ गए और गले में बांहें डाले, कान में फुसफुसाते हुए पंधारी के दुआर तक खींच लाए, पंधारी ने पकौडी के लिए हांक लगाई। जैसे ही पंधारी की दुलहिन पकौड़ी की थरिया लेकर आई सरोज ने एक बड़ा-सा पकौड़ा उठाकर पियारे के मुंह में ठूंस दिया। पकौड़ा खिलाने के बाद नेताजी ने ताली बजाई। उनका ताली बजाना था कि इकट्ठा हुआ पूरा टोला ताली बजाने लगा। इसी बीच किसी ने नारा लगा दिया।

सरोज नेता ज़िंदाबाद

ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद।

हमारा नेता कैसा हो?

सरोज नेता जैसा हो.’

समूह ने नारे के सुर में सुर मिलाया।

‘अरे-रे-रे, क्या कर रहे हैं आप लोग? बिल्कुल समझदारी नहीं है। अगर किसी ने पार्टी सुप्रीमो को ख़बर कर दी कि आप लोग मेरे नाम का नारा लगा रहे हैं, तो हमारा कैरियर ही ख़तम हो जाएगा। कुछ तो बुद्धी से काम लीजिए। सुप्रीमो को उनके नाम के नारे के अलावा और कोई नारा पसंद नहीं। समझे कि नहीं ?’

उपस्थित जन समुदाय को डांटते हुए सरोज ने नारा लगाया-

पार्टी सुप्रीमों ज़िंदाबाद

ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद।

बहिनजी ज़िंदाबाद

ज़िंदाबाद जिंदाबाद

बाबा-साहब अमर रहें

अमर रहें अमर रहें.’

पूरे टोले ने नेताजी के-साथ यह नारा लगाकर टोले को गूँजा दिया।

‘अब आप लोग शांत हो जाइए। देखिए हमारे समाज के लिए यह वक़्त इम्तहान का वक़्त है। ऊंची जाति की गुलामी हम सदा से ही सहते आए हैं। अब मौका मिला है कि हम इन गुलामी की जंजीरों को तोड़ दें। इसके लिए यह ज़रूरी है कि हम लोग एक जुट होकर रहें। छोटी-मोटी बातों पर लड़ें-झगड़ें नहीं, क्योंकि अगर हमारे हाथों में सेंटर की बागडोर आ गई तो कल हमारा होगा और पूरे देश की सरकार हम चलाएंगे। आज अपने स्टेट में सरकार है, कोई बड़ी बात नहीं कि आगे दिल्ली में भी हम नीला झंडा फहराएंगे। आप लोगों को चुनाव के बहाने यह टेलीविज़न इसलिए दिया गया है कि इसमें पार्टी सुप्रीमों के दर्शन करें, उनके ओजस्वी व क्रांतिकारी विचारों को सुनें और इस समाज को मजबूत करके इलेक्शन में विरोधियों को चारों खाने चित्त कर दें। जय भीम जय भारत.’

एक बार ताली फिर बजी और नेताजी चुनाव की इस आर-पार की लड़ाई को लड़ने का संदेश देकर एजडी मोटर-साइकिल से भुर्र-भुर्र करते हुए उड़ गए।

सरपतहिया टीला प्रसंग

सरपतहिया टीला की कहानी एक प्रकार से आदिकाल की कहानी है, जिसके ओर-छोर का किसी को पता नहीं। अगर कोई बच्चा अपने बाप से पूछता कि यह सरपतहिया टीला कब से है तो वह बताता कि जबसे वह होश संभाला है, तब से है। एक प्रकार से सरपतहिया टीला किंवदंती हो गई थी उन लोगों के लिए। सरपत के झाड़-झंखाड़ वाली इस आदि महिमा वाले टीले को लेकर कितनी ही कहानियां चमर टोले के-साथ ही-साथ पूरे बभन टोले तक फैली हुई थी। पियारे के बाप कहा करते थे कि बुद्ध भगवान जब अपने चेलों के-साथ जात्रा पर निकले थे तो चलते-चलते यहीं शाम ढल गई थी। तब उन सब ने इसी टीले के समतल ज़मीन पर अपना डेरा जमाया था। रात में उन्होंने अपने चेलों को उपदेश भी यही दिया था। सुबह जब सबको दिशा-मैदान जाने की ज़रूरत महसूस हुई तो भगवान बुद्ध ने अपने तप के बल पर क्षण भर में सरपत उगा दिए, जिससे कि वे और उनके शिष्य बिना किसी लाज-भय के दिशा-मैदान से फारिग हो सकें। तब से इस टीले का सरपत जस का तस बना हुआ है।

इसी टीले को लेकर खरपत्तू के बाबा एक और कहानी सुनाते हैं। एक बार बभन टोला के लोलारख पांडे ने सरपत-साफ़ कर टीले पर कब्ज़ा करने की कोशिश की तो रात में पांडे की मेहरारू को सपन दिखाई पड़ा कि जैसे कोई-साधू उनको आगाह कर रहा हो कि अगर सरपत को उजाड़ने की कोशिश किया तो तेरा सत्यानाश हो जाएगा। पड़ाइन के लाख मना करने के बावजूद भी लोलारख पांड़े नहीं माने और लगे सरपत-साफ़ कराने। लाठा भर भी सरपत-साफ़ नहीं हुआ था कि एक कालिया नाग फुफकारते हुए निकला और पांड़े के इकलौते बेटे को डस लिया। हाहाकार मच गया बभनटोला में। उस रात चमरटोला में नामी मंतर मारनेवाले थे-दुखरन। लोलारख की मेहरारू ने बेटे को डाल दिया दुखरन के-सामने और घूंघट के भीतर से फूट-फूट कर रोने लगी कि दाऊ बचाय लो बेटवा को। हमार सपन का देखा पांड़े नहीं माने। उसी का फल भुगत रहे हैं! इधर दुखरन अपना सिद्ध किया हुआ मन्तर पढ़ रहे थे, उधर पांड़े घुटनों के बीच अपनी मूड़ी छिपाए सिसक रहे थे। इनारा से पचीसों बाल्टी पानी निकाल कर नहलवाया गया। यह बुद्ध भगवान की किरपा थी कि वे मंतर बनकर दुखरन की जीभ पर बास कर लिए और रात की दो घड़ी बीतते-बीतते पांड़े का बेटवा ने आंखें खोल दीं। पांड़े ने उसी इनारा का पानी हाथ में लेकर कुश और अक्षत के-साथ संकल्प लिया कि उसके जीते जी इस सरपतहिया टीला पर किसी ने एक खुरपा भी चलाया तो उसकी मूड़ी काटकर रख देंगे। पांड़े दबंग थे। किसी की हिम्मत नहीं पड़ी कि वह सरपत की एक पाती भी तोड़ता। बाद में वे गांव की खेती-बाड़ी बेंच-बांचकर लखनऊ बस गए और जाते-जाते सरपतहिया टीले के बगल वाले गाटा में सरपत की जड़ गड़वा कर उसे भी टीले के हवाले कर दिया।

सरपत अनंत, सरपतहिया टीला कथा अनंता।

फिलहाल और किसी के लिए यह टीला भले ही अतीत की गाथा बन कर रह गया हो, लेकिन चमर टोले के लिए तो उसकी ज़िंदगी का एक हिस्सा है यह। बुद्धा-धनिया, पियारे-चम्पादेई , नन्हकी-बसेसर, न जाने कितने जोड़ियों के मध्य प्रेम प्रसंगों का जन्म इन्हीं सरपत के झुरमुटों के बीच हुआ। इन्हीं सरपतों पर चमर टोला के कितने ही परिवारों की जीविका चलती रही है। टोकरी, दउरी, मौनी, मौना और न जाने कितने ही गृहोपयोगी-सामानों को बनाकर इस टोला के लोग अपने हुनर का प्रदर्शन करते आए हैं। यह टीला पेट पालने का आधार तो था ही, पूरे टोले की लोक-लाज का रक्षक भी रहा है। टीले का आख़िरी इलाक़ा दिशा-मैदान के लिए सुरक्षित रहता चला आया था। एक तरफ़ औरतों का और दूसरी तरफ़ मर्दों का इलाक़ा। टीले के बगल वाली गड़ही का पानी इस कार्य में सहायक होता। यह अलग बात है कि जब-जब सरोज नेता कहते कि बहनजी के राज में हम यहां पर-सार्वजनिक शौचालय बनवा देंगे और हर शौचालय में पानी का कनेक्शन होगा तो मंसा और पियारे खी-खीकर हंसने लगते और कहते कि भइया हम लोगों का सुख तो खुले में ही बैठने में है। चार दीवारी वाली कोठरी में तो हमारी उतरेगी ही नहीं। उनकी इन बातों पर सरोज नेता कई बार तमतमा चुके हैं और आरोप लगा चुके हैं कि तुम लोग हरदम वही रहोगे छुट्टा जानवर के जानवर ही। अगर नए ज़माने के-साथ नहीं चलोगे तो हरदम दबे-कुचले ही रहोगे।

‘सरपतहिया टीले और चमरटोले के रिश्ते की प्रगाढ़ता को मात्र कुछ शब्दों में ही व्यक्त नहीं किया जा सकता। हम बने तुम बने एक दूजे के लिए। अगर सरपतहिया टीला नहीं तो चमरटोला नहीं। यही सत्य है-शाश्वत सत्य।

सुप्रीमो दर्शन प्रसंग

चुनाव होने को महीना भर भी नहीं बचा था। पंधारी के ओसारे में रोज़ शाम को जमघट होती। बिजली के अभाव में बैटरी से चलने वाले टेलीविज़न को ठीक-सात बजे लगाया जाता। दिन में कोई टेलीविज़न की पेंच न ऐंठे, उससे बचाने के लिए छेदी ने एक सुझाव दिया कि क्यों न बैटरी को एक लकड़ी के बक्से में बंद करके रखा जाए। फिर सवाल उठा कि बक्से की चाभी किसको दी जाए? इस प्रश्न पर विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया कि इसकी व्यवस्था छेदी ही करेगा कि टेलीविज़न का बक्सा कब खुलेगा, कब उसे बंद किया जाएगा। पार्टी की यह सख़्त ताकीद थी कि कोई भी टेलीविज़न का उपयोग गाने-बजाने या मनोरंजन के लिए नहीं करेगा। टेलीविज़न-सात बजे खुलेगा, क्योंकि-सात बजे प्रादेशिक समाचार आता है और तब तक सब लोग अपने घर का भी काम काज निपटाकर खाली हो जाया करते हैं। समाचार में पार्टी सुप्रीमो और भावी प्रधानमंत्री का फोटो भी आता है, जिसका दर्शन पूरा टोला कर सकता है.

चुनावी बयार बहुत तेज़ बह रही थी। बीच में सरोज नेता आकर सबका हौसला बढ़ाते-- 'इस बार दिल्ली में सरकार बन कर रहेगी। बभनटोला का वोट कांग्रेसियों और भाजपाइयों के बीच बंट गया है। दलितों का असली हितैषी तो बाबा-साहब अंबेडकर ही थे और हमारी पार्टी बाबा-साहेब के ही बताए रास्ते पर चल रही है। आप लोग किसी के बहकावे में न आयें। चुनाव के दिन सभी लोग सबेरे ही तैयार हो जाएं और अपने-अपने-साधन से पोलिंग बूथ तक जाएं। टेलीविज़न में तो आप देखते ही हैं कि आप जैसे ही परिवार की एक दलित महिला किस तरह हेलीकॉप्टर में बैठकर धुंआधार चुनाव प्रचार कर रही है। केवल आप लोगों को सुखी देखने के लिए। वह दिन दूर नहीं कि चुनाव जीतने पर आप लोग भी मोटर गाड़ियों में घूमेंगे और टोले के किसी कार्यकर्ता पर मुख्यमंत्री जी अगर प्रसन्न हो गईं तो उसे भी पार्टी के कार्य में हाथ बढ़ाने के लिए अपने-साथ हेलीकॉप्टर में बैठा कर लखनऊ ले जा सकती हैं। आप लोगों को टेलीविज़न इस लिए दिया गया है कि आप अपनी पार्टी के नेता को देखिए कि वे किस प्रकार अगड़ी जातियों को पीछे छोड़ते हुए इस ऊंचाई पर पहुंची हैं। कितनी ही ऊंची जाति के अफसर उनके आगे दरी पर बैठते हैं। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा है। हमारी नेता जहां बैठती हैं, उनकी कुर्सी अकेली होती है, बाक़ी सब ज़मीन पर। इस पार्टी ने हमें और आप को कहां से कहां पहुंचा दिया है.’

नेताजी बोल रहे थे कि तभी चमर टोला के ऊपर से एक हेलीकॉप्टर उड़ता हुआ दिखलाई पड़ा। वे थोड़ा एलर्ट होकर खड़े हो गए और ऊपर देखने लगे।

‘मा. मुख्यमंत्री जी जा रही है। वे तूफ़ानी दौरे पर हैं। दो-दो हेलीकॉप्टर उनके लिए तैयार खड़े रहते हैं। मान लीजिए अगर एक में तेल ख़त्म हो गया तो दूसरा तैयार। भई वीआईपी मैटर है। "

सरोज नेता ने अपनी जानकारी की धाक जमाई। सभी मान गए कि सरोज पहुंचे हुए नेता हैं। पार्टी हाईकमान और सुप्रीमो के पूरे कार्यक्रम के विषय में जानकारी रखते हैं। दिल्ली, लखनऊ एक किए रहते हैं, तो अगर सरोज नेता को जानकारी नहीं होगी तो किसे होगी? सुप्रीमो बहुत मानती हैं सरोज नेता को।

हेलीकॉप्टर प्रसंग

माननीया मुख्यमंत्री जी की रैली जब इस ज़िले में लगी तो शासन-प्रशासन सबके-सामने यह चिंता उठ खड़ी हुई कि रैली कहां हो, जहां पर ढेरों ट्रैक्टर और ट्रक खड़े हो सकें। रैली में मात्र पांच दिन बाक़ी थे और इस चुनाव अभियान की यह आख़िरी रैली थी।

जिलाधिकारी ने सभी अधिकारियों और सत्ता पक्ष के पार्टी पदाधिकारियों की इमरजेंसी मीटिंग कॉल की। मामला मुख्यमंत्री का था तो सभी तैयारियां पद की गरिमा और प्रोटोकॉल के अनुरूप होनी चाहिए। मीटिंग का एकमात्र एजेंडा था कि आख़िर इस चुनावी रैली का स्थान कौन-सा हो, जिसमें कि हजारों की संख्या में जनता आकर शरीक हो सके और मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर उतारने के लिए एक अस्थाई हेलीपैड भी बन सके।

हेलीकॉप्टर का नाम सुनते ही अचानक सरोज नेता की स्मृति में एक दिन पूर्व का वह दृश्य कौंध गया जिसमें वे चमर टोले में उड़ते हुए हेलीकॉप्टर को देख रहे थे और टोले को यह जानकारी दे रहे थे कि इस हेलीकॉप्टर में मुख्यमंत्री जी चुनावी दौरा कर रही हैं। यह दृश्य याद आते ही उनके मुंह से अचानक निकला-

‘डी. एम. साहब, वो सरपतहिया टीला वाला मैदान कैसा रहेगा?’

मन-ही-मन सरोज नेता सोचने लगे कि अगर सरपतहिया टीले पर एक बार मुख्यमंत्री जी का हेलीकॉप्टर उतर गया तो इस चमर टोला का कायाकल्प हो जाएगा और फिर तो अगले इलेक्शन में अपना टिकट पक्का।

सरोज नेता के इस प्रस्ताव का अंततः सभी ने अनुमोदन कर दिया। क्योंकि सरपतहिया टीले का मैदान इतना बड़ा था कि उसमें कम से कम दस से बीस हज़ार लोग आ सकते थे और पचासों की संख्या में बस और ट्रैक्टर के खड़े होने की व्यवस्था भी हो सकती थी। मीटिंग ख़त्म होते ही मैदान को देखने के लिए जिलाधिकारी के नेतृत्व में पूरा सरकारी अमला दल-बल सहित निकल पड़ा, नगर मजिस्ट्रेट ने अपनी जीप में सरोज नेता को भी बैठा लिया। काफ़िला जैसे ही चमर टोला से होकर गुज़रा, सरोज ने जीप से हाथ निकालकर टोले की ओर लहराया। जीप में बैठे हुए हाथ लहराकर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि जितने नज़दीक मुख्यमंत्री जी के हैं, उतने ही प्रशासन के भी।

काफ़िला रुकते ही सभी अफ़सर मुस्तैद होकर उतरे। मैदान का मुआयना किया गया। इस बीच चमर टोला से पंधारी, छेदी सहित तमाम बच्चे काफ़िले के आस-पास खड़े हो गए। इस भीड़ को सरोज नेता ने अलग ले जाकर समझाया।

‘देखो, माननीया मुख्यमंत्री जी यहां रैली करेंगी। अब इस गांव का कायाकल्प ही समझो। चिकनी सड़क, बिजली, नल और खेल का मैदान, सब कुछ यहां होगा। विकास की नदी बहेगी नदी। तुम लोग बस देखते जाओ। मैं इस इलाक़े को कहां से कहां पहुंचा दूंगा। हाँ, अब तुम सभी यहां से दफ़ा हो जाओ। अफ़सर लोग मुआयना करेंगे।

सरपतहिया टीले के मैदान को मुख्यमंत्री के अंतिम चुनावी रैली के लिए अधिकारियों ने सर्वसम्मति से फाइनल कर दिया। समय और तारीख़ तो लखनऊ से आ ही गई थी और ज़िला प्रशासन ने स्थान के विषय में अंतिम रिपोर्ट लखनऊ फैक्स कर दी।

पूरे जनपद में मुख्यमंत्री के आने की सूचना फैल गई। पार्टी कार्यकर्ताओं ने लाउडस्पीकर, बैनर और पोस्टर के माध्यम से इस आर-पार वाली लड़ाई का खूब ज़ोर-शोर से प्रचार किया। मुख्यमंत्री के जनपद में आने का मतलब उस जनपद का कायाकल्प। चमर टोला तो इसलिए प्रसन्न था कि अपने जिस नेता को वे टेलीविज़न पर देखा करते थे, उसे अब वे साक्षात देखेंगे और यह सब संभव हो सका है सरोज की बदौलत।

मुख्यमंत्री के आने में केवल एक ही दिन रह गया था। जिलाधिकारी के यहां अचानक फ़ैक्स आया कि सुरक्षा विभाग के लोग रैली वाले मैदान का निरीक्षण करेंगे क्योंकि बिना उनके ओके किए मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर नहीं उतारा जा सकता था। हैलीपैड तथा सुरक्षा व्यवस्था को देखने के लिए लखनऊ से अफ़सरों का काफ़िला पहुंच गया। ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक सहित ज़िले के अन्य आला अफ़सरों ने अगुआई करते हुए वाहनों के काफ़िले को धड़-धड़ाकर सरपतहिया टीला मैदान तक पहुंचा दिया।

मुआयने के समय ही डीआईजी ने एसपी को सरपतहिया टीले की ओर इंगित किया -- "एसपी साहब ! ह्वाट डू यू थिंक एबाउट दिस एरिया? क्या आपको लगता नहीं कि झाड़-झंखाड़ वाला यह टीला जो कि सरपत से घिरा है, सिक्योरिटी को देखते हुए ठीक नहीं है। तालाब और आस-पास का रिहायशी इलाक़ा। फिलहाल हम कोई रिस्क नहीं ले सकते। यह एरिया वैसे भी हैलीपैड के काफ़ी नज़दीक है। आई थिंक एरिया को प्लेन कराना होगा.’

मुख्यमंत्री की सिक्योरिटी में सचमुच में कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता। रैली में कोई चौबीस घंटे बाकी रह गए थे। पूरे टीले के सरपत को काटना और टीले को प्लेन कराना वैसे भी कोई आसान काम नहीं था। लेकिन आसान हो या न हो, कराना तो है ही। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी और नगर मजिस्ट्रेट को इस काम के क्रियान्वयन के लिए आदेशित किया गया।

‘वैसे सर! इस टीले से यहां के निवासियों की जीविका, आस्था और उनका पूरा जीवन जुड़ा हुआ है। इसके सफ़ाए से उनके लिए समस्या उत्पन्न हो जाएगी।’ नगर मजिस्ट्रेट ने अपनी आशंका व्यक्त की।

‘लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट-साहब, यह वीवीआईपी सिक्योरिटी की बात है। अगर कहीं कुछ ऐसा-वैसा हो गया तो हम सब की नौकरी जाएगी। ईओ साहब आप कम से कम पचीस-तीस लेबर इस इलाक़े को समतल करने में लगाइए। रात भर में यह एरिया पूरा प्लेन हो जाना चाहिए.’

जिलाधिकारी ने आदेश दिया।

‘लेकिन अगर टोले के लोग इसका विरोध करेंगे तो?”

सिटी मजिस्ट्रेट ने एक और आशंका दोहराई।

‘पहली बात तो वह इसका विरोध यह सोचकर नहीं करेंगे कि उनके बीच में उनकी पार्टी की मुख्यमंत्री आ रही है, जिन्हे वे पूजते हैं। हाँ, अगर आपको आशंका ही है तो पूरे इलाक़े में धारा 144 लगा दीजिए। एकाध ट्रक पीएसी का भी इंतज़ाम रखिए। पूरे टोले में यह एनाउंस कर दीजिए कि सिक्योरिटी को देखते हुए कोई भी अपने-अपने घरों से न निकले। दैट्स आल.’

ज़िलाधिकारी के इस निर्णय से राजधानी से आई सुरक्षा निरीक्षण टीम संतुष्ट होकर चली गई।

अंधेरा घिरते ही पूरे चमरटोला को पुलिस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए घेर लिया और उन्हें घर से बाहर न निकलने की ताक़ीद कर दी। दो ट्रकों में भरकर फावड़ा, कुदाल और दरांती सहित क़रीब पचीस मज़दूर सरपतहिया टीले पर उतारे गए। गैस बत्ती की रोशनी में टीले के सरपत को काटने का काम शुरू हो गया।-साथ-ही-साथ सरपत काटने के बादे टीले को ढहाने और तालाब का पाटने का काम भी। जैसे-जैसे सवेरा होता जा रहा था, आदिकाल से चली आ रही किंवदंती, पूरे टोले के जीवन का आधार, सरपतहिया टीला ध्वस्त होकर एक समतल मैदान में बदलता जा रहा था। टीले को ढहाकर, तलइया को पाटकर, सैकड़ों बोझ सरपत को फूंक कर उसे इस लायक कर दिया गया था कि मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर निरापद रूप से वहां उतर पाए।

हां, इस टीले को ढहाने से पूर्व किसी भी अधिकारी को स्वप्न में कोई चेतावनी नहीं मिली जैसे कि लोलारख पांडे को मिली थी। ख़ुदाई के दौरान इक्का-दुक्का सांप-बिच्छू और गोजर जो भी मिले, वे सब मज़दूरों के फावड़ों और कुदाल के भेंट चढ़ चुके थे।

एक रात के ही अंतराल में सरपतहिया टीला अतीत का विषय बन चुका था।

भोर होते ही महिलाओं की टोली हाथ में लोटा लेकर बाहर निकलकर जैसे ही टीले की ओर बढ़ी, रात में सुरक्षा ड्यूटी पर लगे जवानों ने उन्हें रोक लिया और उन्हें सुरक्षा का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि जब तक मुख्यमंत्री की रैली ख़त्म न हो जाए, प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा कोई भी टीले की ओर नहीं जाएगा।

सवेरा होता जा रहा था और उसी के-साथ बढ़ती जा रही थी महिलाओं की परेशानी। टोले की बहुएं तो मुँह अंधेरे उठने की अभ्यस्त थीं, लेकिन टोले की बेटियां, उनके ऊपर देर-सवेर का काई असर नहीं पड़ता था, क्योंकि दूर तक फैले हाथी तक को ढंक लेनेवाले सरपत, उनकी लोक-लाज को ढंकने के लिए काफ़ी थे। जहां पर दूर-दूर तक टीला दिखाई पड़ता था और टीला को घेरते हुए सरपत हवाओं के झोकें के-साथ अठखेलियां किया करते थे, वहां पर अब एक सुनसान समतल मैदान था। यद्यपि था वह समतल लेकिन टोले के लिए भयावह लग रहा था। उनके लिए ऐसा लग रहा था जैसे उनके घरों को ज़मीदोज़ कर दिया गया हो और वे खुले आसमान के नीचे आ गए हों।

समतल मैदान और खुले आसमान को देखकर टोले की औरतों ने अपनी दिशा बदल दी। उनके लिए बभन टोले के अरहर के खेतों का ही सहारा था, जो उनके लिए आज तक निषिद्ध क्षेत्र माना जाता रहा। क्योंकि बाभनों को यह कतई बर्दाश्त नहीं था कि दुनिया भर की जाति-कुजाति उनके खेतों में हगे-मूतें। लेकिन लाज-शर्म को ढंकने के लिए आज चमरटोला के पास कोई विकल्प नहीं था। हालांकि वे सभी जानते थे कि जैसे ही वे लोटा लेकर जोखन मिसिर के खेत में घुसेंगे, दिन में लाठी-डंडे की नौबत आएगी ही आएगी।

दोपहर से ही मुख्यमंत्री की रैली में दूर-दूर से ट्रकों-ट्रैक्टरों और जबरदस्ती की हथियाई हुई बसों में लोगों का हुजूम आना शुरू हो गया था। इसके पहले सायरन बजाती सरकारी गाड़ियां कई बार रैली की जगह पर आ जा चुकीं थीं। दिन में दो बार सरोज नेता टोले में आकर यह कह गए थे कि सभी औरतें अपने बक्से में रखीं धराऊ धोतियां पहन कर रैली में पहले से ही अपनी जगह ले लें, नहीं तो मा. मुख्यमंत्री जी को ठीक से देख नहीं पाएंगी।

शाम के पांच बजते ही आसमान में गड़गड़ाहट हई और मुख्यमंत्री का हेलीकॉप्टर मंडराने लगा। पूरे मैदान में बैठे करीब हज़ारों की संख्या में नर-नारियों में प्रसन्नता की लहर दौड पड़ी। हेलीकॉप्टर ने ईंट के बने हैलीपैड पर जैसे ही पैर टिकाए, सरोज ने एक ज़ोरदार नारा लगाया।

अभी लखनऊ जीते हैं अब दिल्ली की बारी है।

हम पर राज बहुत किया है। अब दलितों की बारी है।

हेलीकॉप्टर से उतर कर मुख्यमंत्री तेज़ कदमों से मंच पर चढ़ गईं। मंच पर प्रदेश के कुछ मंत्री भी पहुंच गए जो कि मुख्यमंत्री के पूरे भाषण तक खड़े रहे। सरोज को भी एक कोना खड़े होने के लिए मिल गया।

चमरटोले में अब लगने लगा था कि जैसे ही मुख्यमंत्री यहां से उड़ेंगी, तुरंत लखनऊ जाकर एक आडर पास करेंगी और सरपतहिया टीले वाला चमरटोला बिजली की रोशनी में नहा उठेगा, घर-घर पानी की टोटियां लग जाएंगी और शौचालय बन जाएँगे। तब जोखन मिसिर के खेत में डरते-डरते किसी भी औरत को जाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

अपना भाषण ख़त्म करके मुख्यमंत्री तेज़ी से मंच से उतरीं और तेज़ कदमों से हेलीकॉप्टर के पेट में समा गईं। हैलीकाप्टर का डैना घूमना शुरू किया और धीरे-धीरे वह आसमान की ओर उठने लगा और जब तक हेलीकॉप्टर आँखों से ओझल नहीं हो गया, सरोज पूरी ताकत लगाकर नारा लगाते रहे।

हेलीकॉप्टर के उड़ने के बाद की कहानी तीन पंक्तियों में समाप्त होती है।

दलितों और पिछड़ों की पार्टी वाली मुख्यमंत्री के उन्नीस सांसद चुनाव जीत गए और केंद्र में जो सरकार बनी, वह मुख्यमंत्री की पार्टी की सहायता से बनी।

सरोज नेता की कर्तव्यनिष्ठा और परिश्रम को देखते हुए पार्टी हाईकमान ने अपने कार्यालय का काम देखने के लिए उन्हें दिल्ली बुला लिया और उन्हें कार्यालय में ही रहने की व्यवस्था कर दी। साल भर बीत गया, पार्टी की व्यवस्था के कारण सरोज नेता पलटकर चमर टोले में नहीं आ पाए।

जोखन मिसिर सहित पूरे बभनान ने चमरटोले को खेत में दिशा-मैदान हेतु घुसने से मना कर दिया।

अंत-कथा

चुनाव के यहीं कोई साल भर बाद एक हेलीकॉप्टर जोर की आवाज़ करता हुआ चमर टोले के ऊपर से उड़ता हुआ दिखलाई पड़ा। पूरा टोला काम-धाम छोडकर हेलीकॉप्टर को देखने के लिए घरों से बाहर निकलकर आ गया। यद्यपि हेलीकॉप्टर काफ़ी ऊपर था लेकिन न जाने क्यों सबको लगा कि उसमें सरोज नेता बैठे हुए हैं।

पंधारी और पियारे ने जोर से आवाज़ लगाई, ‘सरोज S S S.. !’

लेकिन गड़गड़ाहट के बीच उनकी आवाज़ आकाश में ही विलीन हो गयी। अंततः हेलीकॉप्टर अपने डैनों को नचाता हुआ दूसरी दिशा की ओर मुड़ने लगा।

उसी समय छेदी के बड़के लड़के तूफ़ानी ने ईंट का पाव भर का गुम्मा उठाया और हेलीकॉप्टर की ओर गुस्से में इस तरह मारा गोया वह गुम्मा हेलीकॉप्टर के पेट को चीरता हुआ बाहर निकल जाएगा।

तब तक हेलीकॉप्टर चमर टोले की आंखों से ओझल हो चुका था।


विजय पण्डित : लेखक परिचय

विजय पंडित

वाराणसी जनपद(अब संत रविदासनगर)के जगन्नाथपुर गाँव में जन्म.प्राथमिक शिक्षा गाँव के सरकारी स्कूल

में.उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय और भारतेंदु नाट्य अकादमी,लखनऊ.

कृतियाँ

रंगमंच और स्वाधीनता आन्दोलन,लोकनाट्य नौटंकी,पिस्तौल(नाटक), पूर्ण पुरुष(नाटक),सुनें

छत्रपति(नाटक),कृति मूल्यांकन-बकरी,सुनें द्रोणाचार्य और अपराजिता- विनोद रस्तोगी(सम्पादन),

नायकी देवी(नाटक)

मंचन -निर्देशन

पूरे देश में १०० से अधिक नाटकों का निर्देशन और मंचन ,

फिल्म और धारावाहिक

३० से अधिक धारावाहिक और फिल्म

सम्मान /पुरस्कार /फेलोशिप

पुर्तगाली कवि फेर्नांदो पेसोवा की डायरी पर लिखे फिल्म ‘अदिति सिंह’ का कान फिल्म फेस्टिवल ,फ्रांस में

प्रदर्शन.

लिखित फिल्म ‘जोसेफ बॉर्न इन ग्रेस’ का ऑस्कर पुरस्कार हेतु एलिजिबिल केटेगरी में नामांकन

फिल्म ‘जोसेफ बॉर्न इन ग्रेस’ को ओंटोरियो फिल्म फेस्टिवल में लेखन के लिए पुरस्कार

उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा रंगमंच और स्वाधीनता आन्दोलन विषय पर फेलोशिप,भारत

सरकार के सांस्कृतिक कार्य विभाग द्वारा द्वारा नौटंकी के अध्ययन हेतु फेलोशिप.

दिल्ली सरकार के ‘साहित्य कला परिषद्’ द्वारा नाटक ‘पूर्ण पुरुष’ को मोहन राकेश सम्मान,२००४.

उत्तर प्रदेश साहित्य सम्मलेन सम्मान , प्रयागराज. पद्मश्री गुलाबबाई सम्मान, कानपुर.निराला साहित्य संगीत

अकादमी सम्मान,उन्नाव.अभिनंदिका आर्ट फॉर टेलीविज़न एंड थिएटर, पुरी, ओड़िसा

डॉ सुरेश चन्द्र अवस्थी सम्मान,नाटककार ज्ञानदेव अग्निहोत्री सम्मान,उर्मिल कुमार थपलियाल सम्मान,

वाग्धारा सम्मान,मुंबई, भारतेन्दु हरिश्चंद्र सम्मान(संस्कृति विभाग,उत्तर प्रदेश शासन),उ.प्र. संगीत नाटक

अकादमी सम्मान,

सम्प्रति मुंबई में रहकर लेखन.

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वासरी हिल,मलाड(प.)

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9821122770 vijaypundit@gmail.com

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