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पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने — कहानी — मधु कंकरिया | Hindi Story on Stranded Pakistanis by Madhu Kankaria

 


अपना देश, अपना मुल्क कितनी बड़ी नियामत है यह! पर हम अभागे बिना देश के हैं। कौन समझेगा इस पीड़ा को? कौन समझेगा घर का बिस्तर, घर की गलियां छोड़ने का दुःख? सपनों से बाहर होने का दुःख! जीवन गुज़र रहा है पर हर वक़्त जैसे एक ख़ंजर घुसा है सीने में, क्या कभी छू पाऊंगी उस माटी को जहाँ खोली थी आँखें मैंने और मेरी बहन ने? लगता है जैसे एक अँधेरी सुरंग में ठहर गया है जीवन हमारा। आज भी ढाका के उमड़ते घुमड़ते मेघ संभालते हैं मुझे, जान से प्यारा लगता है ढाका मुझे पर ढाका मुझे अपना नहीं समझता, मेरे माथे पर मुहर लग गयी है ‘अटके पाकिस्तानी’ की ...

बांग्लादेश का उर्दू बोलने वाला समुदाय, जिन्हें बिहारी भी कहा जाता है, 1971 से एक कठोरतम स्थिति से गुज़र रहा है। जब पाकिस्तान बना तब बिहार से बड़ी संख्या में मुस्लिमों ने पाकिस्तान (पूर्वी) का रुख किया, फिर जब पाकिस्तान का विभाजन हुआ और बांग्लादेश बना तो ये हिन्दी-उर्दू बोलने वाला, बंगालियों से जुदा व्यवहार वाला, समुदाय ‘Stranded Pakistanis’ बन गया। इन ‘अटके पाकिस्तानियों' की कहानी ‘पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने’ एक संजीदा और शोधपरक कहानी लिखकर मधु कंकरिया ने बेहद प्रशंसनीय कार्य किया है। यह कहानी, या फिर एक ज़िंदा इतिहास पढ़िएगा ज़रूर! ~ सं० 
 

पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने 

— मधु कंकरिया


उतरती धूप में छत पर कुर्सी डाल कर बैठी हुई थी। कौओं की कांव-कांव और कोयलों की कुहू-कुहू के मद्धिम-मद्धिम स्वरों के बीच पास के ही पोखर में पड़ते आसमान के एक गुलाबी हिस्से की परछाई को निहार रही थी कि वॉकर के सहारे रेंगती, सिहरती पत्ती सदृश नमूदार हुई पीले चेहरे वाली वह समीना और मीठी नजरों से मुझे देखते हुए कहने लगी, “अस्सलाम अलैकुम!” 

“अस्सलाम अलैकुम!” थोड़ी हड़बड़ाहट में निकल गया मेरे मुंह से, जबकि मैं अच्छी तरह से जानती थी कि अस्सलाम अलैकुम के जवाब में वालेकुम अस्सलाम कहा जाता है। 

वे मुस्कुरायी, उदासी का अक्स भी उभरा, ओढ़नी से सर को अच्छी तरह से ढांपते हुए कहा उन्होंने, “जैसे ही महमूद भाईजान से पता चला कि आप कोलकाता से आयी हैं, या अल्लाह! मैं तो मरी जा रही थी आपसे मिलने के लिए। अपने मुल्क के लोगों को देखकर एक अद्भुत सुकून जो मिलता है।”

“बैठ जाइये, सहारा देकर बैठाया उन्हें। तो क्या आप भी कोलकाता से हैं? मैंने तो समझा कि आप बांग्लादेशी हैं?” 

वे अब ख़ामोश थीं सिर्फ़ उनकी निगाहें ही बोल रही थीं। मैंने फिर कुरेदा उनको, “तो क्या आप बांग्लादेशी नहीं हैं?” 

वे रोने गाने लगी, यातना का एक महाकाव्य उनकी आँखों के भीतर से झाँकने लगा था, “बांग्लादेश मेरे भीतर बसा हुआ है आपा पर मैं बांग्लादेश के भीतर नहीं हूँ। काश आपकी तरह हमारा भी कोई घर द्वार होता, अपना कहने को कोई देश होता...” बोलते बोलते वे फिर सुबकने लगी। 

या इलाही माजरा क्या है!

“क्या मतलब?” मैंने पुचकारते हुए पूछा। पेड़ से गिरती पत्तियों से फिर गिरे कुछ शब्द उनके ओंठों से, “मतलब यही आपा कि हमारे तो होने को ही अनहोना कर दिया गया है। हम कहीं के भी नहीं हैं। न बांग्लादेशी, न हिंदुस्तानी। सच कहूँ तो मुल्क तो नसीब वाले लोगों का होता है। हमलोगों का क्या मुल्क? एक बार जड़ से क्या निकले कि खदेड़े जा रहे हैं हर कहीं से। हम तो बिना जड़ों के पेड़ बना दिए गए हैं आपा!” वह अब अपने को पूरा उधेड़ने के मूड में आ गयी थी। शायद अधपके अन्न की तरह बहुत कुछ खदबदा रहा था उसके भीतर। पर अधिक कुरेदने की जरूरत नहीं पड़ी, हलके धक्के से ही भीतर जमा अनकहा बाँध टूटी नदी सा बहने लगा था, “आप तो अफ़साने लिखती हैं आपा। आपने औरतों के ऐसे ढेरों अफ़साने लिखे होंगे, शौहर की सतायी औरत, भाइयों की सतायी औरत, सास ननद की सतायी औरत, पर क्या बेवतन लोगों की छाती में जलनेवाली आग का फ़साना लिखा जा सकता है? क्या शरीर से आत्मा के छिटके जाने का दर्द लिखा जा सकता है?” 

“क्या मतलब?” वह सचमुच मुझे थोड़ी रहस्मयी लगी। थोड़ा नीचे खिसक आए चश्मे को ठीक करते हुए कहा उसने, “मेरे अब्बू का जन्म बिहार के सिवान गाँव के मियां टोले में हुआ था। सबकुछ ठीक चल रहा था। अब्बू की कपड़ों की दूकान थी। हमारी दुकान के बने ज़रदोज़ी के काम के बने घाघरा और कामदार जूते पूरे बिहार में जाते थे। अब्बू बड़े चाव से उसमें सलमा सितारे जड़वाते थे। कई बार अम्मी से कहते भी थे — तू भी पहन ये घाघरा, अल्लाह कसम नूरजहां लगेगी। लेकिन अम्मी ग़रारों पर ही फ़िदा रहती। अब्बू का बड़ा नाम था, सिवान की शायद ही कोई दुल्हन हो जिसने बिना अब्बू के घाघरे के सात फेरे खाये हो। हमें तो हिन्दू धर्म से रोमांस था। मोर मुकुट में सजे-धजे कृष्ण, बांसुरी बजा-बजा रास रचाते कन्हैया, लाल जीभ से खून टपकाती काली जी। हमारे मज़हब में बुतपरस्ती गुनाह है लेकिन फिर भी हम रेशम और गोटे से कृष्ण कन्हैया के लिए गद्दे और बिस्तर वाला झूला तैयार करते और जन्माष्टमी के दिन गद्दे पर अधलेटे कृष्ण को देख गदगद होते रहते थे। अपने हिन्दू ग्राहकों को देख रौशन ख्याल अब्बू मज़ा लेते हुए कहते थे ‘क्या बात है आपके भगवानों को देखो जब तब आते जाते रहते हैं और एक हमारे अल्लाह मियां है जाने किन गुफाओं कंदराओं में छिपे रहते हैं’। हमारे मुस्लिम भाई कई बार अब्बू पर तंज़ कसते तो जानती हैं अब्बू क्या कहते, अब्बू कहते — ये मेरे हमवतन हैं, हम निवाला हैं, हम सब एक ही माटी, पानी और हवा के हिस्सेदार हैं, उनकी सदियों पुरानी संस्कृति और फ़ल्सफ़ा में साझीदार होने से क्या हमारा ईमान डोल जाएगा? क्या वह इतना कमज़ोर है? हमारा ख़ुदा इतना तंगदिल नहीं कि नाराज़ हो जाएगा।”

“हमेशा घोड़े पर सवार रहने वाले अब्बू ने भी जब सुना कि पाकिस्तान बनेगा तो बेशक बुरा लगा उन्हें लेकिन कोई ख़ास फ़िक्र नहीं हुई। हिन्दुस्तान में जब लोग कहने लगे कि मुसलमान यहाँ के नहीं है, उन्हें जाना होगा, तब भी मेरे अब्बू ने कह दिया था कि वे कहीं नहीं जाएंगे। जिद्द और ज़िंदादिली दोनों थी उनमें। अम्मी रोती कि हम यहाँ महफ़ूज़ नहीं तो अम्मा को मीठी डांट पीला देते, ’अल्लाह ने किलो भर आंसू दिए, काश छँटाक भर बुद्धि भी डाल दी होती’ लेकिन जैसे ही ख़बर आयी कि रावलपिंडी धू-धू कर जल रहा है और ‘अल्लाह हो अकबर’ के नारे लगाते मुसलमानों ने हिन्दुओं और सिखों के घर जला दिए। ’अल्ला हो अकबर‘ जोश था और खौफ भी। पंजाब भी नफ़रत की आग में उबल रहा था। तब क़यामत की एक रात हमारे यहाँ भी नफ़रतों का बम फटा और हमारे ज़र्रे उड़ गए। बुद्ध की इस धरती पर ‘हर हर महादेव‘ करते बलबाईयों का धर्म उनके भीतर कुलांचे मारने लगा। आधी रात बेकाबू सांड की तरह बलवाइयों की उन्मत्त भीड़ आयी और मजहबी जोश में उन्होंने हमारी दुकान जला दी, छत पर खड़े अब्बू अपनी दुकान को आँखों में आंसू और दिल में ज्वाला लिए जलते देखते रहे। उस एक रात ने ही अब्बू को घर से बेघर और इंसान से मुसलमान बना डाला था। 

चंद दिनों बाद ही विभाजन के बाद आनेवाली हिंसा से घबड़ाकर जिसे जैसा मौक़ा मिला, कोई ट्रेन से तो कोई रोड से तो कोई नौका से निकल भागा। मेरे अब्बू भी समझ गए थे कि अब दाना-पानी उठ गया यहाँ से। भीतर से हम क्या है, किसी को नहीं दिखेगा, पर बाहर से हम इतने मुसलमान तो दिखते ही थे कि हमारा मारा जाना लाज़िमी था। बस सीवान से पूर्वी पाकिस्तान हम दो जुड़वां बहनों और अम्मी के साथ अब्बू यहीं ढाका आकर बस गए। मैं उस समय दो साल की थी। मन को मना लिया कि अब यही अपना मुल्क है।” उसकी कहानी लम्बी खिंच रही थी, मैंने उसे टोकते हुए पूछा, “माना, अब यह पूर्वी पाकिस्तान, बांग्लादेश बन गया, पर इससे आप मुस्लिमों को क्या फ़र्क़ पड़ा, आपका अल्लाह तो अब भी वही है। हिन्दू तो अब आपका कुछ बिगाड़ नहीं सकते थे।” 

गर्म रेत पर पड़ी मछली सी वह तड़पी, आवाज़ अनायास ही चाकू की तरह तेज़ हो गयी, दुपट्टा थोड़ा खिसक गया था, उसे ठीक करते हुए कहा उसने, “अरे कैरम की गोटी की तरह छिटक गए हम सभी और आप कहती है क्या फ़र्क़ पड़ा? बांग्लादेश जब बना तो हम पर वापस वही सब गुज़री जो 47 के दौरान बिहार में गुज़री थी। नफ़रत के जो बीज 47 में बोए गए थे उसकी बम्पर फसल अब लहरा रही थी, पाकिस्तान से फिर एक पाकिस्तान निकला पर इस बार उसका नाम था बांग्लादेश । कहानी वही थी बस किरदार इसबार अपने ही मज़हब के थे। अपने ही मक्का-मदीना के थे। उस समय जलते दिल से यही निकला था कि काश दुनिया से मज़हब मिट जाए तो हमारी दुर्गति न हो! पर इस बार क्या कहेंगे? कहाँ जाएंगे हम?” 

“क्या मतलब?” 

“मतलब अब हमें तिलक, त्रिशूल और मंदिर वाले हिन्दुओं से नहीं, अपने ही मज़हब के बांग्लादेशी मुस्लिमों से ख़तरा था।” 

“क्या कह रही हो? मुस्लिम को मुस्लिम से ख़तरा?” 

“जी मैडम, फिर भींगी उसकी पलकों की झालर — राजनीति के ये उलझे रेशे मेरी समझ से परे हैं, मेरा जन्म चाहे सीवान में हुआ हो लेकिन मैंने बांग्लादेश को शिद्दत से चाहा। इसी के पानियों में मछली की तरह घुलमिल गए थे हम। जीवन ने यहीं मुझे खोला और संभाला था। यहीं रहकर मैंने हायर सेकेंडरी की परीक्षा पास की। गंगा और पद्मा नदी के नाम मैंने अपनी पहली कविता यहीं लिखी, फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ कि उजाड़ दिया गया हमारा आशियाना। आज हमें अपने परिवार के साथ जेनेवा कैंप में रहना पड़ रहा है, अब हमको यहाँ का नागरिक नहीं समझा जाता है, हमारे पास न पासपोर्ट है, न हम सरकारी नौकरी कर सकते हैं। हमसे यहाँ की नागरिकता छीन ली गयी है इसलिए मैं चाहकर भी अपनी जुड़वां बहन इशरत से नहीं मिल पायी, हमारे बीच के सारे पुल टूट गए। ठिकाने वही हैं पर जिंदगी ने अपने ठिकाने बदल लिए हैं। पानी से पानी क्या अलग हो सकता है? लेकिन हो गया। चालीस साल गुजर गए उसे देखे हुए... वो सर्दी की धूप सी सुहानी इशरत...” बोलते-बोलते वह फिर सिसक पड़ी। पीड़ा का समुद्र उसकी आँखों में लहराया। जाने कितनी नदियों का पानी बह रहा था उसके भीतर। कब किस नदी का पानी उफान पर आ जाए और कब कौन नदी उतार पर आ जाए, ख़ुद उसे भी कहाँ पता था। उसका तो कलेजा कट-कट कट रहा था कभी भारत की गंगा याद कर तो कभी ढाका की पद्मा नदी को याद कर। 

मैंने नहीं रोका... बहने दिया उन आंसुओं को। एक गहरी निःश्वास के बाद फिर फुदकने लगे शब्द उसके अवरुद्ध कंठ से, “बचपन के तेईस साल तक परछाई की तरह मेरे साथ रही वह। चाँद और सूरज हमारी पलकों पर एक साथ उगते और अस्त होते थे। वह हॉर्मोनियम बजाती और मैं रवींद्र गीत गाती थी। वह रोटी बेलती और मैं सेंकती थी। वह कपड़े धोती और मैं फैलाती थी। फिर अब्बू ने हमारी शादी करवाई। मेरी शादी ढाका में हुई। दादी चाहती थी कि एक रिश्ता कोलकाता में हो जाए तो कोलकाता में भी आनाजाना लगा रहेगा। इशरत का रिश्ता कोलकाता में हुआ। शादी यहीं मोहम्मदपुर में ही हुई। कैसे भूल सकती हूँ, वह 16 दिसम्बर 1970 का चमकता दिन था। ढाका पूरे नूर पर था। धूमधाम से शादी हुई और फिर इब्राहिम जीजू वापस कोलकाता चले गए। लेकिन हमलोगों का प्रेम देख जीजू ने यहीं बसने का मन बना लिया था, वैसे भी जीजू के परिवार में सिर्फ़ उनकी एक आपा ही बची थी, उनके अम्मी अब्बू का इंतकाल हो ही गया था। तो जीजू अपनी आपा के लिए ढाकाई साड़ी, भांजा के लिए ढाकाई मलमल का कुरता लेकर कोलकाता चले गए, हमसे बोले — इशरत को वहां का विक्टोरिया गार्डन भी दिखा दूंगा और आप सब के लिए चित्तरंजन का रसगुल्ला भी लेता आऊंगा और इंशाअल्लाह अच्छा पैसा मिल गया तो इसी बार सब बेच-बाचकर वहीं मोहम्मदपुर में बस जाऊंगा। आख़िर परिवार का सहारा बहुत माने रखता है। इशरत ने भी यह सोचकर कि वापस तो यहीं आना है, अपनी शादी में मिला कुछ भी सामान साथ नहीं ले गयी सिवाय कुछ सुन्दर ड्रेस के। जीजू को धानी रंग बहुत पसंद था, इशरत ने इशारे से अम्मी के सामने बताया भी था, पर मैं ठहरी गोबर गणेश सो उसके लिए बक्से से अपनी पसंद की हल्के गुलाबी रंग की जामदानि साड़ी निकाल कर ले आयी उसके लिए। उसने पहन तो ली पर जाते-जाते बिट्टो रानी आँखें तरेरना न भूली…” कहते-कहते पहली बार वह हंसी। लेकिन हंसी का आख़िरी हिस्सा फिर मायूसी में बदल गया, आँखों में पीड़ा लहराने लगी, “बस वही आख़िरी झलक थी उसकी। सोलह भरी सोना जो उसे अब्बू ने दिया था। उसे भी दंगाइयों ने लूट लिया। हिंसा और लालच उनके दिमाग़ में घोसला बना चुके थे।”

“हिंसा तो समझ आती है पर लालच?” 

“हाँ आपा! लालच नहीं होता तो हम बिहारी मुसलमानों की सम्पत्ति पर क्यों हाथ साफ़ करते वो। हमारा सोना और हमारे घर पर कब्ज़ा क्यों करते वो? सिर्फ़ एक कमरे को हमारे लिए छोड़कर हमारे सारे मकान और सामान पर भी कब्ज़ा कर लिया।” 

कुछ बेचैन पल!

मैंने उसके सर पर हाथ धर दिया तो मेरा हाथ थाम कहने लगी —”मेरा काम कर देंगी न!” 

“कर दूँगी पर मुझे यक़ीन नहीं हो रहा कि हनीमून मनाने कोलकाता गयी इशरत फिर वापस लौटी ही नहीं? इतने सालों बाद भी?” 

देखते-देखते वह फिर शांत झील से गर्म इस्त्री में तब्दील हो गयी, चेहरे पर कांटे उग आए, “यही तो सारा रोना है आपा, उधर उसको विदा किया इधर मोहम्मदपुर और मीरपुर में मारकाट मच गयी। मेरी मामी अपनी एक बच्ची के साथ वहीं मोहम्मदपुर में रहती थी। मामू सब्ज़ी लेने बाज़ार गए थे। पीछे से बंगाली मुसलमानों ने घर को घेर लिया। कच्चा मकान था। मामी देखने में सुन्दर थी, पहले उस हरामी ने मामी के साथ मुंह काला किया, फिर मामी के पेट में छूरा भौंक दिया। हरामियों ने मामू की पांच वर्षीय बेटी को भी नहीं बख़्शा। उस पर भी छूरा चला दिया। भागे-भागे मामू वापस लौटे तो बेटी की सांस चल रही थी। मामू के पूछने पर कि कैसे हुआ यह सब, उसने मुंह से अटकते स्वर में सिर्फ़ एक नाम लिया ‘राशिद चाचू‘ और गर्दन लटका दी। वह कमीना राशिद और कोई नहीं मामू का ही किराएदार था। वर्षों साथ-साथ पतंगे उड़ायी पर बांग्लादेश बनते ही हम हम नहीं रहे। पड़ौसी पड़ौसी नहीं रहा। मर गया था उसकी आँख का पानी। वह अब गंडासे में बदल चुका था। हम बिहारी बन चुके थे। हरामियों ने दंगे की आड़ में मामू का घर भी कब्ज़ा लिया। वहां से मामू हमारे यहाँ मीरपुर चले आए। लेकिन मीरपुर में भी फ़िजा बदल गयी थी। हमारे सुख चैन पर यहाँ भी बाघ ने पंजा मार दिया था। दंगाइयों का मन हरामी हो गया था और हम बाबर की औलाद हो गए थे। हर नुक्कड़ पर था हमारे लिए खुला चमचमाता ख़ंजर! हर कोई अपने खाल से बाहर आ चुका था, बिजली का नंगा तार हो चुका था। हालत यह हो गयी थी कि जहाँ देखते मर्दों को, सबको कमर में डोरी से एकसाथ बाँध ले जाते वहां के दंगाई बंगाली। हम घरों की सारी खिड़कियां और दरवाज़े बंद रखते। जूता पहन सोते, घर को कंधे पर लादे कि कब भागना पड़ जाए। मेरे अब्बू, शौहर, भाईजान और मामू तो तीन दिन तक घर के अंदर भी दिनभर पलंग के नीचे छिपे रहते, वही सोते, वहीं खाते कि कौन जाने कब कोई भूखा भेड़िया निकले अपनी मांद से और दबोच ले हमें।” 

गहरी सांस खींच बोली वो, ”ऐसी हालात में मेरे घोसले की वह चिड़िया इशरत क्या लौटती! बूँद की तरह टपकी और ओस की बूँद की तरह गायब! बस वही मुट्ठी भर चांदनी सा समय बीता उसके साथ! ऊफ, कितना प्रेम था। वह नीला दुपट्टा लेती और मेरा मन आसमानी हो जाता।” अपने प्रवाह में बहती वह फिर कविता करने लगी थी। 

“असली बात बताओ”, मैं झुँझलायी। वह एक ही बात को जाने कितनी बार बोल रही थी, जाने क्यों उसको लग रहा था कि मैं पूरी शिद्दत से उसकी बात समझ नहीं पा रही हूँ जबकि उसकी बात में ऐसी कोई बात थी ही नहीं कि मैं समझ न पाऊं। वह शर्मिंदा हुई। हलकी झुर्रियों से भरे उसके बूढ़े चेहरे की खाल काँपी। बिखरी स्मृतियों को बटोरते हुए फिर अपनी रौ में बहने लगी वो, “बचपन से ही कविता करना अच्छा लगता था, आदत अभी तक नहीं गयी आपा। फिर बहुत दिनों बाद कोई मिला है न अफ़्साना-निगार आप जैसा तो कविता भी जैसे आज़ाद परिंदा हो गयी है। हां तो मेरा मतलब यह था कि आज पचास साल से तरस रही हूँ इशरत को छू भर लेने के लिए। कौन समझ सकता है मेरे दिल के सन्नाटे को। रात आँख झपकती भी नहीं कि दुःस्वप्न नोंच लेते हैं नींद को। शायद ही कोई रात गुज़री हो कि सो पायी हूँ, कलेजे में वो हूक उठती है कि क्या बताऊँ। लगता है जैसे कोई ख़ंजर गड़ा है भीतर। आठ-आठ आंसू रोते अब्बू भी धरती की लड़ाई लड़ नहीं पाए और आसमान हो गए। इशरत-इशरत करते प्राण निकले उनके। मैं कौन ज़िंदा हूँ, काठ हो गयी हूँ। शरीर यहाँ रूह वहां। जब कलेजे की हूक थमती ही नहीं और घबड़ाहट बहुत बढ़ जाती है तो बेटा मुझे डिप्रेशन की गोली खिला देता है। तीस साल से खा रही हूँ ये गोलियां, अब तो मरी ये भी असर नहीं करती। मेरी गोली तो इशरत है। कुछ साल पहले मेरा बेटा एक बार चोरी से छुपते-छुपाते किसी प्रकार पहुंच गया था वहां केला बगान में। काश! तभी चली जाती उसके साथ! मैंने तो कहा भी लेकिन चोरी-छिपे मुझे ले जाने की हिम्मत नहीं हुई उसकी! अपने लोगों ने भी मना किया, अब पछता रही हूँ, चली जाती तो मन को अमन तो मिल जाता, ज़्यादा से ज़्यादा क्या होता, अंदर ही तो कर देते? अभी कौन बाहर हूँ!” मैंने फिर उस पर विराम लगाते हुए पूछा, 
“केला बागान?” 

“हाँ, वहीं रहते हैं जीजू कोलकाता में, उसने यहाँ आकर जो बताया उसका हाल तो कलेजा मुंह को आ गया। मेरे जीजा जो हुनरमंद कारपेंटर थे, अब काम नहीं कर पाते हैं। मरीगिरी सी बस एक नौकरी है उसके साहिबजादे के पास, मेरी अज़ीज़ आपा, दूध भरे थाल सा उसका रूप, हरी भरी देह, एकदम कजलाई हो गयी है, कमर झुक गयी है। न अब्बू का आसरा न शौहर का...” उसकी उदासी का रंग एकाएक गाढ़ा हो गया। हथेलियों से मुंह ढाँप वह फिर फफक पड़ी। 

कुछ ख़ामोश बोझिल पल! 

उसके कांपते जिस्म को देख, उसको सांत्वना देने के लिए कुछ पूछना ज़रूरी था, इसलिए पूछा मैंने, “मैं कुछ समझी नहीं, क्यों नहीं मिल सकती तुम इशरत से। इतने सालों में क्या की तुमने कोई कोशिश?” दुपट्टे के पल्लू से नाक आंख को पोंछते हुए बोली वह, “क्या कोशिश करती आपा? कैसे करती? बिना पासपोर्ट कैसे जाती? शुरू में तो हमें बस अपनी जान बचाने भर की पड़ी थी इसलिए सरकार ने भी हमारे मुंह पर काला कपड़ा डाल हमें इन कैंपों में डाल दिया कि हम बचे तो रहेंगे, सर पर छज्जा तो रहेगा। पर सरकार ने हमारे सारे नागरिक अधिकार छीन लिए तो हमें भारत जाने के लिए पासपोर्ट कहाँ से मिलता? हमारे पास तो वोट तक देने का अधिकार नहीं था। सरकारी नौकरी तक हमें नहीं मिल सकती थी। रोटी और ज़िंदा रहने की लड़ाई ने ही निचोड़ लिया हमें। अब तो फिर भी कुछ ढिलाई हुई है। फर्ज कीजिये आज परमिशन मिल भी जाय तो शरीर ऐसा जर्जर कि दस मिनट न चल पाऊं, न लम्बा बैठ पाऊं। ऊफ! तब तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि पाकिस्तान के भी दो टुकड़े हो जाएंगे। हमने सोचा था कि पाकिस्तान बन गया अब झमेला ख़त्म, तब क्या पता था कि बँटवारा कभी ख़त्म नहीं होता। युद्ध कभी नहीं थमता। बाहर से चाहे ख़त्म हो गया पाकिस्तान का डर पर भीतर की बांबी में बसा पाकिस्तान कभी ख़त्म नहीं होता। अब्बू ने भला ही सोचा था कि रिश्तों की डोर के सहारे वे कोलकाता की डोर से भी बंधे रहेंगे, कुछ सालों तक रिश्तों की अमीरी रही भी, हम अपने चचाजान से मिलने आते-जाते भी रहे कोलकाता पर बांग्लादेश क्या बना, यहाँ के बंगालियों की तासीर में ही पानी मिल गया। सारे धागे ही टूट गए।” 

“मैं नहीं समझ पा रही हूँ। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में तो भारत ने बांग्लादेश की भरपूर सहायता की थी। फिर भारतीय मूल के मुसलमानों से क्यों इतनी नफ़रत?” 

“हम पर हिन्दुस्तान का अहसान है आपा, इससे मैं कब इंकार कर रही हूँ। लेकिन बांग्लादेश बनने के बाद हमसे अपनी ख़ुशी से जीने का हक़ छीन लिया गया क्योंकि बांग्लादेश बनने के बाद हमें सिर्फ़ मुस्लिम नहीं बिहारी मुस्लिम कहा जाने लगा था। हमारी जड़ें आज के पाकिस्तान में खोजी जाने लगी जबकि हम बिहार से आए थे। हमने तो पाकिस्तान देखा तक नहीं था। पर क्योंकि हम अल्पसंख्यक थे और उनकी तरह न दिखते थे, न बंगाली बोलते थे। हम हिंदी उर्दू बोलते थे। और आपको यह भी पता होगा कि बांग्लादेश बनने के पीछे भाषा का भी बहुत बड़ा कारण था, पाकिस्तान यहाँ के बंगालियों पर उर्दू थोप देना चाहता था। जबकि बांग्लादेशियों को लगता था कि उर्दू का साहित्य उनका अपना साहित्य नहीं है और न ही उर्दू इनकी स्वाभाविक भाषा है। इसलिए अलगाव का बीज तो तभी पड़ गया था जब सालों पहले पाकिस्तान ने बंगाली को दबाकर उर्दू वालों को तवज्जो देना चाहा। माना पाकिस्तान ने गलती की, यह भी माना कि हमारे लोगों से भी चूक हुई, पर वे बंगाली तो टैगोर के गीत गाते थे, पर टैगोर को कितना समझा उन्होंने? दोनों ही देशों में टैगोर का गीत राष्ट्रीय गीत बना, दोनों ने यह भी माना था ‘सवाई ऊपरे मानुष सत्य‘ पर किसने अमल किया इसपर? बताइये!” बोलते-बोलते वह अचानक लपट में तब्दील हो गयी थी। 

मैं चुप! क्या जवाब देती उसके सवालों का? 

एक अजीब सा विषाद आकर बैठ गया था हमारे बीच। 

विषाद को दूर भगाने के लिए समीना को वहीं छोड़ मैं उसके लिए चौके में चाय बनाने चली गयी। 

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बांग्लादेश मेरी संवेदना का हिस्सा तब से बना हुआ था जब मैं कॉलेज में थी। उन दिनों मुक्ति वाहिनी का बांग्लादेश मुक्ति संग्राम चल रहा था। पश्चिम बंगाल के छात्र भी उन दिनों पाकिस्तान विरोधी रैली में बढ़ चढ़ कर भाग ले रहे थे, मैंने भी उन दिनों की रैली में बंग बंधु मुजीब के समर्थन में ‘जय बांग्ला‘ जैसे खूब नारे लगाए थे। उन्हीं दिनों ढाका यूनिवर्सिटी की कुछ छात्राओं ने वहां की अनिश्चितकालीन बंद के मद्देनजर हमारे कॉलेज में दाखिला ले लिया था, उसी दौरान हम हिन्दुस्तानियों ने ढाका और बंगबंधु मुजीब के लिए एक गहरी आत्मीयता मह्सूसी थी। 

जाने अनजाने उन दिनों के ढाका और मुजीब ने मेरे मन में अपना बसेरा बना लिया था। कभी का देखा वह स्वप्न अब पूरा हुआ जब साल भर के लिए मुझे ढाका आने का सुअवसर मिला। 

पहली नज़र में ढाका सचमुच बहुत ही रमणीय लगा। रात यहाँ रात जैसी थी, कभी तारों भरी तो कभी काजल भरी। सुबह शहर फिर बदल जाता। पोखरों, पेड़ों, पाखियों और झूमते बादलों से भरपूर ढाका की सुबह सरगम रचती। नीले आसमान में उड़ान भरते परिंदे, पेड़ों पर फुदकती गिलहरी, ढेरों ढेर हरे तोते, रकम रकम की रंग बिरंगी चिड़िया, उनकी गूँज, टहनियों और पत्तियों की सरसराहट ... प्रकृति के शोर और मौन को सुनने में ही गुजर जाती थी मेरी सुबह। यहाँ के पोखरों में खिले पदम फूलों को देखते-देखते अक्सर ओठों पर भूली बिसरी पंक्ति थरथराने लगती — मेघेर ढाका ढाका। गुड़ गुड़ करते मेघों से ढके ढाका की टापुर टुपुर बारिश जब नारियल की झुकी टहनियों के पत्तों पर गिरती तो सचमुच जल तरंग सी बज उठती थी। 

यहाँ सचमुच अल्लाह और इंसान हमेशा साथ-साथ रहते थे। सुबह अज़ान उठाती, हर मस्जिद से आती अज़ान की गूँज, फज़र (सुबह की नमाज़) के लिए पुकारती और यह संदेश देती कि प्रार्थना सोने से बेहतर है। लगभग हर ऑटो के पीछे लिखा मिलता ‘अल्लाह सर्व शक्तिमान‘। जगह जगह खुले हुए ‘इस्लामिक बैंक‘। 

मुझे अच्छा लगा कि यहाँ अल्लाह और इंसान साथ-साथ रहते हैं। एक बार मैंने अपनी मातहत को काम का दायित्व सौंपते हुए पूछा — हो जाएगा? उसने फिर अल्लाह को आगे कर दिया और कहा — इंशाअल्लाह। मैंने मज़ाक में कहा — तनख्वाह मैं तुम्हें देती हूँ, अल्लाह को नहीं तो फिर हर बार तुम अल्लाह को आगे क्यों कर देती हो? जवाब में फिर उसने हाथ लहराते हुए कहा — वल्लाह!

हम दोनों ही खिलखिलाकर हंस पड़े! ऐसा प्यारा बांग्लादेश और यह कह रही है कि इस देश ने बर्बाद कर डाला उसे? 

या इलाही माज़रा क्या है!

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‘कब नज़र में आएगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार, 
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद’

बिस्कुट और मठरी के कुछ टुकड़े चद्दर पर गिर गए थे, उन्हें बुहारते हुए कहा उसने — हम बिहारियों ने कितना कुछ तो दिया इस मुल्क को लेकिन जैसे ही भाषा का मसला आया हमारे किये धरे को फोल्डिंग कुर्सी की तरह समेट कर कोने में डाल दिया गया और हमें कह दिया गया — दफ़ा हो जाओ यहाँ से। हम यहाँ की कल्चर बिगाड़ रहे हैं। कितना भरोसा किया था हमने इनपर, उनके गाने की एक पंक्ति है — ये देश तोमार आमार (यह देश तुम्हारा हमारा है)। झूठा था वो गाना। माना कि हममें से कुछ लोगों ने बांग्लादेश बनने का विरोध किया था, कुछ ने पाकिस्तान का समर्थन भी किया था, पर इसका दण्ड पूरे समुदाय को क्यों दिया गया? काश उस समय हम अपने आज को देख पाते। 

“आप लोगों ने मुकाबला नहीं किया उनका?” मेरे पूछने पर उसकी आँखों में शोले भड़क आये थे, “जहाँ जहाँ हम ज़्यादा थे किया भी, पर अब हुकूमत उनकी थी, हम पतला दूध और पतली दाल खानेवाले क्या खाकर मुकाबला करते उनका! हम निहत्थे, वे रथ पर सवार। वे ज़माने के ख़ुदा! हम उनके पैरों की ठोकर! आसमान से नफ़रत और हिंसा बरसने लगी। बांग्लादेश के जन्म का जश्न अभी कायदे से शुरू भी न हुआ था कि खून-खराबा, मारकाट, लूटपाट, नफ़रत और बलात्कार का नया दौर शुरू हो गया। ‘मैं श्रेष्ठ मैं श्रेष्ठ‘ के मारे वे यह भी भूल गए कि इस्लाम का मतलब होता है इन्साफ़। इधर शिशु देश ने मिचमिची आँखों से देखना शुरू किया, उधर हम पर गाज गिरनी शुरू हो गयी। जो अभी तक हमारे पीछे-पीछे दुम हिलाते चलते थे, वे भी आँख दिखाने लगे। हम इस देश के बाशिंदे ही नहीं रहे। वे मुक्त आत्मा थे, क़ानून से ऊपर। उनको आज़ादी मिली और आज़ादी के साथ हमें मारने की भी आज़ादी मिली। हमें मरने की आज़ादी मिली। सबकी अलग-अलग आज़ादी। और तो और हमारे कुत्ते भी अब बिहारी कुत्ते कहलाने लगे। हमें मुकम्मल मुसलमान नहीं समझा गया। क्योंकि हम न बंगाली मुसलमान जैसे दिखते थे और न बंगाली बोलते थे। उर्दू बोलने के कारण और गोरा दिखने के चलते हमें पाकिस्तानी समझा गया। हम बुरका और हिजाब भी नहीं पहनते थे। मछली भी उतना नहीं खाते थे। उन दिनों हम पर जो क़हर गुज़री कि क्या बताऊँ। हसनाबाद में हमारी कॉलोनी थी, जिंदगी की सबसे उदास कविता उस रात लिखी गयी जब खिड़की से मैंने देखा, मालगाड़ी में भरकर लाशें जा रही थीं। सिर्फ़ शक्ल और भाषा देखकर हमें मारा जा रहा था। उनदिनों हमारे बारे में बांग्लादेशी यहाँ तक कहने लगे थे कि हमारी तो चाल-ढाल भी अलग है। इतनी नफ़रत भरी थी उनके अंदर हमारे लिए। वैसे सच कहूँ तो नफ़रत दोनों ओर थी और दोनों की नफ़रत दोनों के लिए खाद पानी का काम कर रही थी। किसी को हमारे पेपर देखने तक की भी फुर्सत नहीं थी, ऐसा जुनून था उनपर हिंसा का। हमारे घर में बांग्लादेशी घुस आए थे कट्टे लेकर, कैसे-कैसे सँपोले, जाने किन-किन से आशनाई लड़ा के माओं ने जणा था उन्हें कि उतारू थे खून पीने को। एक बार तो लगा मार डाले जाएंगे हम सभी पर हम तो जीने पर तुले थे, बच गए। अपने बचाव के लिए उन काले दिनों हमने हिजाब पहनना शुरू कर दिया था। मैंने लिपस्टिक और नेल पोलिश तक लगाना बंद कर दिया था ख़ुद को एकदम मुकम्मल मुसलमान दिखाने के लिए। हम अपने घरों की दीवारों पर कुरान की आयतों की तस्वीर चिपका कर रखते थे कि दंगाई समझ जाएं कि हम मुस्लिम हैं, हिन्दू या हिंदुस्तानी नहीं हैं। हम ही नहीं इस्माइली मुसलमानों का भी यही हाल था, उन्हें भी पाकिस्तानी माना गया। हालात यहाँ तक बिगड़ गए कि इस्माइली मुसलमानों को तो इमाम द्वारा जमातखाने में निर्देश दिया गया कि महिलाओं और बच्चों को बांग्लादेश से बाहर भेज दिया जाए।”

“जमातखाना?” 

“जी नमाज के बाद जो सामूहिक बैठक होती है न।” दाहिने हाथ से माथे का पसीना पोंछते हुए कहा उसने। 

“पर उसमें तो बंगाली मुस्लिम भी होते होंगे?” 

“नहीं मैडम इस्माइली मुसलामानों की मस्जिद अलग होती है।” 

“कैसे पहचानते हो कि यह उनकी है, आपकी नहीं?” 

“मैडम उनकी मस्जिद की बनावट थोड़ी अलग होती है। वे बंगालियों की मस्जिद में तभी जाते हैं जब आस पास उनकी मस्जिद नहीं होती है।”

“क्या आपलोगों की भी मस्जिद अलग होती है?” 

“नहीं। हम सुन्नी लोगों की मस्जिद तो एक ही है। बस भाषा और खान पान, पहनावा उनसे थोड़ा अलग है।” 

मैंने उसे रोका। अभी तक मैं जानती थी कि मुसलमानों में बस सिया और सुन्नी ही दो बड़े धड़े हैं। पर आज समझी कि सुन्नी में भी बंगाली मुसलमान अलग और बिहारी मुसलमान अलग-अलग होते हैं। बंगाली बोलने वाले बंगाली और हिंदी उर्दू बोलने वाले या बिहार से आये बिहारी मुसलमान। फिर ये इस्माइली मुसलमान क्या बला है? 

“मैडम इतना समझ लीजिये कि इस्मायली सिया होते हैं और वे उर्दू बोलते हैं। उन्हें पंजाबी मुसलमान भी कहते हैं। बहुत गोरे होते हैं वे, पंजाबियों की ही तरह लम्बे चौड़े। कुछ की जड़ें तो पाकिस्तान में है भी लेकिन जब सालों से वे यहाँ रह रहे हैं तो यहाँ के ही हुए न! वे भी हमलोगों की तरह उतना भात मछली नहीं खाते। चाय की जगह झागदार लस्सी ज़्यादा पसंद है उन्हें। मैडम उन दिनों दरवाज़े  पर हलकी सी दस्तक भी होती तो हम डर जाते, घबड़ाहट के दौरे पड़ने लगते। बादल भी गरजते या कोई ज़ोर से आवाज़ भी लगाता तो हम सिहर जाते। नसें तन जाती, लगता चटक ही जाएंगी। हर तेज़ आवाज़ मुझे डराती थी। आज तक नहीं गया वो डर। कई बार अभी भी जाने कैसी-कैसी आवाज़ें रात में सुनाई पड़ती है। कई बार लगता भ्रम है कई बार लगता सचमुच कोई चीख़ा था। कई-कई सालों तक मैं रात को भी बत्ती जला कर सोती थी, दिन में भी अकेले रहने से घबड़ा जाती थी, भूले से दिन में आँख लग भी जाती तो खौफ़जदा हो नींद टूट जाती, लगता जैसे पूरे जिस्म में आग लग गयी है। हसनाबाद की खिड़की से देखी वो लाशों से भरी ट्रक आँखों के आगे कौंध जाती। फिर भी हम यहाँ से निकलने को तैयार नहीं थे। दूध के जले जो थे! फिर हम रोज कुआँ खोदने वाले लोग। एक बार भागकर भी क्या मिला हमें? अब दुबारा से तिनका तिनका चुन कर जो घरोंदा बनाया इन सालों में, उसे उजाड़ने और फिर से नयी उड़ान भरने का दम न मेरे बूढ़े अब्बू में बचा था और न ही मेरे श्वसुर में।” पपड़ाए ओंठों पर जीभ फेरा उसने और पानी के दो चार घूँट भर वह फिर चालू हो गयी थी, “पहले अलग मज़हब ने हमें मारा अब अलग रंग और भाषा हमें मार रही थी तो क्या साथ साथ रहने के लिए ज़रूरी है कि इंसान का मज़हब, भाषा… रूप रंग सब एक जैसे हों। जीव जंतु तक अपनी स्वाभाविकता में एक साथ रह सकते हैं तो हम क्यों नहीं? जब जब नया मुल्क बना मेरे जिस्म के टुकड़े होते गए। गंगा और पद्मा नदी का पानी मेरे और इशरत के खारे आंसुओं से आबाद है आपा।” कविता करते करते वह फिर अपने खारे आंसुओं को पोंछने लगी थी। मैं अवाक उसके आंसुओं की धार को देखती रही। 

कुछ पलों की आत्मीय ख़ामोशी के बाद फिर फट पड़ी वह, “बोलिये आपा, आप ख़ामोश क्यों हैं? देश का बंटवारा क्या रूह को भी बाँट सकता है? क्या मेरी झोली में इशरत का उतना ही हिस्सा लिखा था?” बोलते बोलते जैसे ज़िंदा खौफ उसकी आँखों में घमाचौकडी मचाने लगा। 

हमारी आँखें मिली। मैंने देखा, उसकी सपनीली आँखों में अभी भी बहुत जान बची हुई थी। कुछ पल रुक कर वह फिर शुरू हो गयी, ”सरहदों की लड़ाई क्या हुई हम फ़ना हो गए। सच्चाई बेघर हो गयी, नफ़रत को ठौर मिल गया। नफ़रत ने हमसे हमारा आसमान, हमारी रूह, जीवन, बसेरा सबकुछ छीन लिया। जब अखबारों में पढ़ती हूँ कि अमुक ने देश के लिए इतना कुछ किया तो मन कलप उठता है, अपना देश, अपना मुल्क कितनी बड़ी नियामत है यह! पर हम अभागे बिना देश के हैं। कौन समझेगा इस पीड़ा को? कौन समझेगा घर का बिस्तर, घर की गलियां छोड़ने का दुःख? सपनों से बाहर होने का दुःख! जीवन गुज़र रहा है पर हर वक़्त जैसे एक ख़ंजर घुसा है सीने में, क्या कभी छू पाऊंगी उस माटी को जहाँ खोली थी आँखें मैंने और मेरी बहन ने? लगता है जैसे एक अँधेरी सुरंग में ठहर गया है जीवन हमारा। आज भी ढाका के उमड़ते घुमड़ते मेघ संभालते हैं मुझे, जान से प्यारा लगता है ढाका मुझे पर ढाका मुझे अपना नहीं समझता, मेरे माथे पर मुहर लग गयी है ‘‘अटके पाकिस्तानी’ की‘ (स्ट्रेन्डेड पाकिस्तानी/ stranded pakistani )”

“स्ट्रेन्डेड पाकिस्तानी? यह क्या बला है?” 

“आपको नहीं पता?” 

“तीन लाख के करीब एक जैसे दुखवाले हम वे बदनसीब लोग हैं जिन्हें कोई मुल्क अपनाने को तैयार नहीं और जो पिछले पैंतालीस सालों से यहाँ के विभिन्न जेनेवा कैंप में शरणार्थियों की तरह रहे हैं।” 

“जेनेवा कैंप? सुना तो था मैंने भी कि ढाका में ऐसे कई जेनेवा कैंप हैं जिन्हें बिहारी कैंप भी बोला जाता है, जहाँ अधिकतर सिया सम्प्रदाय के मुस्लिम रहते हैं। पाकिस्तान को हराने के बाद पाकिस्तानी मानसिकता को हराना बांग्लादेश के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी। इसलिए जिन्होंने 1971 में पाकिस्तानी सेना की मदद करनी चाही थी, ढाका में होने वाले मुक्ति संग्राम का विरोध किया था। जिन्होंने पाकिस्तानियों की मदद भी की थी और कई स्वाधीनता सेनानियों की हत्या में भी जिनका हाथ था। पाक द्वारा थोपी गयी उर्दू का समर्थन किया था, उस छोटे से वर्ग को बिहारी मुस्लिम कहा जाने लगा और सबक सिखाने के नाम पर बंगाली मुस्लिमों द्वारा उनका क़त्ल-ए-'आम शुरू हो गया था। ऐसे में जेनेवा समझौते के तहत इन बिहारी मुसलमानों को उनकी जान माल की रक्षा के तहत जेनेवा कैंपों में रखा जाने लगा। उनसे उनकी नागरिकता छीन ली गयी और बदले में बस एक शिनाख़्त पत्र दे दिया गया। उस समय कहा गया था कि यह इंतज़ाम सिर्फ़ तीन सालों के लिए है। वे तीन साल आज बढ़कर पचास साल हो गए हैं और वे अभी तक वहीं अटके हुए हैं।” 

मुझे विश्वास नहीं हुआ कि वे सचमुच ऐसे कैंप में रहती हैं, फिर पूछा मैंने, “कहाँ रहते हो आप?” 

“मोहम्दपुर के जेनेवा कैंप में?” 

“मोहम्दपुर? क्या ठिकाना है आपका?” 

“रहीम ऑटो पार्ट्स, हुमांयू रोड, जेनेवा कैंप, मोहम्दपुर, ढाका 1202।” 

जाने कैसे मुंह से निकल गया, ” क्या मैं आपके घर आ सकती हूँ?” 

“घर तो क्या आपा सर पर रखा एक छज्जा भर है। यदि आप वहां आ जाएं तो सर आँखों पर, मैं तो बस यही सोच संकुचा रही थी कि पलस्तर उखड़ी दीवारों वाले उस एक कमरे के हमारे अँधेरे से घर में आपको जाने कैसा लगे?” 

“अरे, मुझे आपसे आपके घर में मिलना अच्छा लगेगा!” 

“घर न कहें आपा। घर तो वह होता है जिसकी सरज़मीं पर प्यार और भाईचारे के फूल खिलते हों। जहाँ लोग चाहे कुछ नहीं जानते हों लेकिन मनुष्य होना जानते हो। हमारा तो घर मुकम्मल घर तब बनेगा जब हम सब, दोनों बहने एक साथ मुस्कुराएंगी। क्या कहें, अपने पैदाइशी जल में कुमुदिनी सी खिली रहने वाली हम बहनें अब मुस्काना तक भूल गयी हैं। पहले सोचती थी कि दुनिया में सबसे बड़ा अभिशाप गरीबी है लेकिन आज सोचती हूँ कि दुनिया में सबसे बड़ा अभिशाप शरणार्थी होना है।” उसे फिर यादों के कांटे चुभने लगे थे। अतीत का दौरा सा पड़ गया था। फिर चालू हो गया था उसका हनुमान चालीसा। मुझे बीच में ही उसे रोकना पड़ा, “कल किस समय आऊं?” 

“किसी भी समय आपा!” 

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‘कोयलिया मत कर पुकार / करेजवा लागे कटार’

झिमिर झिमिर बारिश के बीच मैं पहुंची मोहम्दपुर जेनेवा कैंप में। वहां २१वीं और अठारहवीं दोनों सदियाँ एक साथ वर्तमान थी। मोहम्मदपुर से निकलने वाले सभी रास्तों के नाम मुगलिया सल्तनत की याद दिलाने वाले थे — जैसे ताजमहल रोड, शेरशाह सूरी रोड, नूरजहां रोड आदि। बाहर ढेर सारे साइकिल रिक्शे खड़े हुए थे। डाव, गन्ने का रस और चाय की दुकानें और फलों के ठेले भी लगे हुए थे। समीना के घर को खोजने में भी कोई दिक्कत नहीं आयी। सब सबसे जुड़े हुए थे। समीना का घर पूछने के लिए जब मैंने यहाँ की महिलाओं और दुकानदारों से जानबूझकर हिंदी उर्दू में बात की तो वे ख़ुशी से उछल पड़े। भाषा प्रेम जाग गया, एक दंतहीन वृद्धा ने पूछा भी कि आप क्या इंडियन हैं। और जब मैंने बताया कि हाँ मैं भारत से हूँ तो उनके पोपले मुंह पर मुस्कान चमक उठी, माटी और जड़ों का प्रेम कम नहीं होता। 

बहरहाल छोटी-छोटी दुकानों से भरे ये कैंप अपने आप में अति साधारण दैनिक जीवन का एक आश्चर्यलोक थे। यहाँ बेलन के आकार की छोटी-छोटी गलियां थीं जहाँ चिरंतन पसरा हुआ हल्का नीला सा अंधेरा था। हर जगह पलस्तर उखडी दीवारों से झांकती ईंटों और टिन की छतों वाले एक मंजिला या दुमंजिला मकान थे। इन गलियों के बाहर बकरियां, मुर्गियां, आवारा कुत्ते, स्कूटर, साइकिलें, ठेले वाले, मोबाइल, स्टोव, रिपेयरिंग शॉप, कल–पुर्जों के वर्कशॉप, किराने और गोश्त की दुकानें से लेकर राशन, बिजली के सामान, फल, सब्जियों के ठेले, दर्जी, श्रृंगार, दवाई, कपडे, कबाड़ी, जरी के सुन्दर-सुन्दर घाघरे आदि की यानी जीवन के लिए ज़रूरी सभी दुकानें थीं। छोटे-छोटे कुटीर उद्योग थे। हर कोई किसी गतिविधि में लगा हुआ था। यहाँ के लोगों को बनारसी साडी और जामदानी साड़ियों के निर्माण में महारथ हासिल था। विकास और आधुनिकता की परछाईं को झेलते, सीमान्त पर पड़े यहाँ के बाशिंदों के जीवन में कोई विशेष अंतर नहीं आया था। छोटे छोटे घर थे जहाँ कहीं कहीं अँधेरा था, कहीं आग थी तो कहीं राग था। घुटन थी, मुस्कुराती शक्लों के साथ लाचार, बेबस और मनहूस शक्लें थीं। सच्चाई यह भी कि इन दर्द गुबार, धूल धक्कड़ और अभावों के बीच भी एक अनोखी मानवीय लय थी। 

बिजली, पानी की समुचित व्यवस्था नहीं थी। संकरी गलियों के भीतर बने हुए घर। घरों के बाहर ही अड्डा मारती ढेरों औरतें, सभी उम्र की। रंग ढंग, सज धज में एकदम बंगालियों जैसी। लगा नहीं की ये अलग आसमान के परिंदे हैं। लेकिन इन दुकानों के पते पर जेनेवा कैंप लिखा था, बहरहाल कैंप का पूरा नज़ारा लेकर ही मैं समीना के घर तक पहुंची थी। 

उदासी में डूबा उसका कमरा। कमरे के फर्श पर बिछा बिस्तर और पास ही बिछी एक दरी पर बैठी हुई खरबूजे के सूखे हुए बीज छील रही थी समीना। हमें देखते ही मुस्कुरायी। कोने में रखी साफ़ सुथरी सुराही से पानी का गिलास मुझे पकड़ाया। दो घूँट भी भर न पायी कि फिर छलका उनका दर्द, “देखा आपा आपने हमारा कैंप! हम तो इसी माटी के हैं, हमने तो कभी पाकिस्तान को देखा तक नहीं, सिर्फ़ नाम भर सुना है, हमने तो पीठ तक उधर नहीं की फिर भी हमें क्यों पाकिस्तान से जोड़ा जा रहा है? हमको क्यों ‘अटके पाकिस्तानी’ कहा जा रहा है? कलेजे में कटार धंस जाती है जब कोई हमें पाकिस्तानी कहता है। इससे बढ़कर गाली नहीं हमारे लिए।”

वे बोल रही थी और मेरी निगाहें दरवाज़े के बाहर लगे उस बड़े से बोर्ड पर अटकी थी जहाँ पाकिस्तानी झंडा लहरा रहा था और लिखा था - Stranded Pakistanis General Repatriation Committee। H। o - geneva Camp, mohammadpur। हठात मेरे मुंह से निकल ही पड़ा, “आपके यहाँ जो पाकिस्तानी झंडा लगा है, आप लोग उसे उखाड़ क्यों नहीं देते?” याद आया मेरे मकान मालिक ने ही बड़ी नफ़रत के साथ मुझे बताया था कि हम क्यों उन्हें अपना माने, वे तो अभी तक पाकिस्तान का झंडा लगाते हैं। उसका आक्रोश फिर बोल उठा, “बाप रे! हम कैसे उतारे इसे? यह तो जेनेवा वालों ने लगाया है। हम तो यहाँ चुपचाप चूक रहे हैं। यह पूरा इलाका अंतर्राष्ट्रीय देख रेख में है। हम ख़ुद नहीं चाहते कि पाकिस्तानी झंडा यहाँ लगे। हमें क्या मतलब पाकिस्तान से? लेकिन लोग भूल चुके है कि हम भी इसी मिट्टी के हैं। हमें भुला दिया गया हैं आपा। आज भी जब भी कानों में पड़ जाता है न कवि गुरु का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला, आमि तोमाके भालोवासी‘ तो कलेजे में कटार उतर आती है। अब तो शायद इसी कैंप की जमीन पर दम तोडूंगी पर अपने देश और मिट्टी का हिस्सा होकर नहीं। बेगानी होकर इस कैंप में। देश जब होता है आपा तो वह हवा पानी की तरह होता है, बस होता है। मैंने पहले कभी किसी को देश के लिए इतना कलपते नहीं देखा जितना यहाँ कैंप में लोगों को देखा है क्योंकि देश जब आपके लिए नहीं होता है तब उसका नहीं होना आपके वजूद की चट्टानें तोड़ देता है। मरने से पहले अपने घर लौटना चाहती हूँ, ‘अटके पाकिस्तानी’ के दाग से ख़ुद को आज़ाद करना चाहती हूँ। बाकी सब तो धरा पर, धरा का, सब धरा रह जाना है। बस उस अंत से डर लगता है, जब मेरे अपने और मेरा देश मेरे साथ नहीं होगा। इंसान मुल्क के लिए है या मुल्क इंसान के लिए बताओ आपा? यही गुजारिश आपसे अफ़्साना-निगार कि कुछ ऐसा लिखो कि धरती के हलक में अटका इंसान इंसान के भेदभाव का कांटा निकल जाए।” 

उसका दुःख फिर बोलने लगा। जिस्म हल्के हल्के कांपने लगा था। उसके बेटे ने वातावरण को थोड़ा हल्के करते हुए कहा, ”आपा, पिछले दस पंद्रह सालों में समय का चाक घूमा है, हवा का ज़हर कम हुआ है। हमारी स्थिति में सुधार भी हुआ है और अब उनको जो 1971 में नाबालिग थे या वे जो 1971 के बाद में जन्मे है, उन सब को नागरिकता दी जाने लगी है। अब इस नयी उगी पीढ़ी ने भी ख़ुद की माटी को देश की माटी में ढाल लिया है, हमलोगों ने बांग्ला भाषा और संस्कृति को पूरी तरह से अपना भी लिया है, लेकिन अतीत है कि फिर भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। लोग हैं कि बीते हुए को भी जबरन रोक कर रखे हुए हैं।” 

इस बीच सलमा उठ कर जाने कहाँ खिसक गयी थी। मुझे लगा शायद चाय लाने गयी हो। लेकिन थोड़ी देर में ही वह वापस। हाथ में एक डायरी और मीनाकारी की हुई पीतल की एक डिब्बी थी जो उस माहौल में यूं लग रही थी जैसे ठूंठ के बीचोबीच खड़ा कोई हरा भरा पेड़। उसमें दो चमकती सोने की बालियां थीं। मुझे देते हुए कहने लगी, ”आप मेरे मुल्क की हैं, कभी जा कर इशरत को दे देना, सोलह भरी सोना तो वे लूट कर ले गए, ये दो बालियां अम्मी के पास रह गयी थी, जाते वक़्त अम्मी मुझे संभला गयी उसकी यह अमानत …” बोलते बोलते उसकी पीड़ा चिथड़ों की तरह उसके चेहरे से चिपक गयी थी। 

“दे दोगे ना आपा!” उसका चेहरा सांझ का आसमान हो गया था, एक रंग आ रहा था एक जा रहा था। क्या जवाब देती मैं, दो दो मुल्क उसके भीतर थे लेकिन किसी भी मुल्क में उसके लिए इंच भर भी जगह न थी। 

एक ख़ामोश आत्मीय चुप्पी पसरी रही कुछ देर। फिर मैं उठने को हुई तो फिर जकड लिया उसने - दे देंगी न, बस यही बचा है मेरे पास, सबसे बचा कर रखी है। हिम्मत नहीं हुई मेरी उसे मना करने की। उसके शब्द मेरी आत्मा की देह को बार बार अपनी नुकीली चोंच से कोंच रहे थे। 

चुपचाप ले ली मैंने उससे उसकी बालियां। सौ सौ कमल खिल उठे उसके चेहरे पर, मुची तुड़ी साड़ी के कोने से माथे पर चुनचुनाते पसीने को पोंछते हुए मुझे आशीष देती कहने लगी, “ख़ुदा आपको सलामत रखे आपा, मेरी तरफ से उसे खूब छूना, खूब प्यार देना। महीने भर पहले उसकी आवाज़ सुनी थी, मोबाइल पर झलक भर देखी थी। आवाज़ भी क्या सुनी बस रोना भर सुना था। काश उसे छू पाती! जेठ के प्यासे की तरह तड़प रही हूँ कि किसी प्रकार एक बार उसे बाँहों में भर लूँ। बचपन में उसने खूब उमेठे थे मेरे कान, तब वो मेरी सबसे बड़ी दुश्मन थी, मैं कई कई दिनों तक उससे कुट्टी किये रहती पर आज जब वक़्त ने ही कुट्टी कर ली तो भी वह अटकी है मेरे हलक में।” और वह फिर बिसूरने लगी। 

“कितने साल की होगी वो?” अंतरिक्ष की ओर देखते टूटी आवाज़ में बोली वो, “बताया तो था कि मेरी जुड़वां हैं, मैं पिचहत्तर की हुई तो वो भी तो …” फिर सिसकी। साड़ी के कोने से आँखों को पोंछा उसने, सदियों का इन्तजार कालिमा की तरह जमा था वहां। 

“और यह डायरी? क्या है इसमें?” 

“रात जब नींद उचट जाती तो डायरी भरने लगती हूँ, पता नहीं डायरी को भरती हूँ या ख़ुद को। इसमें कवितायें है हमारे बचपन की, बिछुड़ने की, गंगा की, पद्मा नदी की...” बोलते बोलते फिर समुद्र बन गयी उसकी आँखें। 

उदासियाँ मुझे दबोचने लगी थी। अब वह सिर्फ़ एक पीड़ा थी, दुःख थी, बेचैनी थी जिसके कुछ परिंदे अब मेरी डाल पर आकर बैठ गए थे। मुझे उन्हें उड़ने देना था इसलिए जल्दी से बाहर निकल लम्बी लम्बी सांस ली। पर निकल कर भी लगा जैसे थोड़ी सी वहीं रह गयी हूँ। देर तक पीछा करती रही भादों सी उमड़ती उसकी आँखें और उसके सवाल, मुल्क बड़ा है या इंसान? इंसान के लिए मुल्क है या मुल्क के लिए इंसान? चेहरा ऐसा जैसे यातना शिविर से निकल आया कोई यहूदी। 

“क्या कहूँ उसे?” 

मेरी कलम में वो ताकत नहीं कि ‘कवि कुछ ऐसी तान सुनाओं …‘ की तर्ज़ पर दो देशों के पानियों पर लिखे इन बेवतन लोगों के जानलेवा अफसानों को शब्दों में पिरो सकूं! कह सकूं उन सवालों की कहानी जो उसकी रक्तिम आँखों में उग रहे थे। दे सकूं उनकी आवाज़ों को आवाज़! किस खाते में दर्ज होंगा, जीवन का यह कारवां, ये जुल्म, ये मटमैली जिंदगियां, यह दर्द! 

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बहरहाल चार महीने, छब्बीस दिन और आठ घंटों बाद मैं वापस कोलकाता। लौटने के अगले के अगले दिन जब पहुंची इशरत के घर तो वह जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रही थी, नीम बेहोशी में जाने उसने मुझे पहचाना या नहीं पर उन बालियों को ठीक पहचान गयी थी वह! जिन्हें देख एक हल्की सी जुम्बिश हुई थी उसकी बुढ़ाती अधमुंदी आँखों में, शायद कोई इंतजार कुंडली मार कर बैठा था वहां। 

अगली सांझ अपनी सीमाओं से मुक्त, धरती की लड़ाई से दूर आसमान हो गयी थी वह!

खुली अधखुली मुट्ठी में पड़ी हुई थी बालियां। 

डायरी शायद अनखुली अनपढ़ी ही रह गयी थी। 



मधु कांकरिया 

मधु कांकरिया की पुस्तकें 



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