श्राद्ध क्या है? क्या श्राद्ध महज़ कर्मकांड है? क्या श्राद्ध अपने पूर्वजों को याद करने की ज़रूरत और उसके महत्त्व को जनसामान्य तक पहुँचाने की एक रीति है?
हिंदी साहित्य के प्रिय प्रो. पल्लव श्राद्ध से जुड़ी अपनी स्मृतियों को बचपन से लेकर आज तक हमारे सामने लाते हैं। राजस्थान से जुड़ी कितनी ही ज़मीनी बातें हैं, जिनसे सामान्य हिंदी समाज, पाठक और मेरे-जैसे लोगों का पहली बार राबता होता है।
इन्हें लिखने के लिए पल्लव जी को बधाई और शुक्रिया।
-भरत तिवारी
हिंदी दिवस का आयोजन, कनागत का पुण्य और ब्राह्मण गुरु चेले को एक साथ भोज करवाने का ऐसा काम कभी न हुआ होगा. ~ सत्यनारायण व्यास
श्राद्ध के दिन
पल्लव
नानी के घर श्राद्ध के दिन सीधा दिया जाता था। एक बड़ी थाली में गेहूं का आटा, दाल, चावल, सभी मसाले, घी और तेल। आटे में छिपाकर रखा गया एक या दो रुपये का सिक्का। इसे गुप्त दान माना जाता। नानी थाली तैयार करतीं फिर नाना जी से कहतीं कि संकल्प छोड़ दो। नाना जी जल का लोठा लेते, एक हाथ में ज़रा सा पानी लेते, जल वाले हाथ को थाली की परिक्रमा करवाते और फिर जल छोड़ देते। नानी नाना जी को याद दिलातीं कि आज आपके पिता जी या माता जी या बड़े भाई साहब या भाभी जी की तिथि है। फिर वह थाली घर के एकदम पास वाले चारभुजानाथ मंदिर के पुजारी को भेजी जाती। नानाजी को ये सारे कर्मकांड अच्छे नहीं लगते थे। वे आर्यसमाजी नहीं थे लेकिन गांधी जी के पक्के अनुयायी थे, हरिजन सेवक संघ में बरसों काम कर चुके थे। उनका कहना होता था कि भरे पेट वालों को खिलाने का क्या अर्थ है? यही भोजन किसी-किसी गरीब गाड़ी लौहार, बागरिये या सफाई करने वाले को करवाया जाए तो ज्यादा ठीक है। लेकिन नानी जी के श्रद्धा भाव के आगे उनकी एक न चलती। कभी कभी यह होता कि एन श्राद्ध की सुबह वे दाढ़ी बनाने बैठ जाते तो नानी कुपित होकर कहतीं,
‘सराध के दन भी याने दाड़ो गुड़वा को काम करणो है।’
यानि श्राद्ध के दिन भी इनको दाढ़ी बनाना ही सूझता है।
असल में श्राद्ध के दिन सजना संवरना निषिद्ध माना जाता है बल्कि उस दिन कपड़े धोना भी अच्छा नहीं समझा जाता। नाना जी समझ जाते कि नानी जी नाराज हैं, लेकिन दाढ़ी तो बन ही जाती। हाँ, नाना जी उस दिन अधिकांश खामोश ही रहते और नानी जी को उनके अनुसार काम करने देने में कोई रोकटोक न करते।
डिस्टेम्पर की थैली बेचने का काम
कभी-कभी किसी श्राद्ध पर घर में बड़ा आयोजन होता था। नानी खीर, पूड़ी और भी कुछ-कुछ बनातीं, कपासन में ब्याही गई अपनी भतीजी निशा को बुलातीं। जिन्हें मैं निशा मासी कहता था। मुझे ही सुबह-सुबह जल्दी उनके घर भेजा जाता। वे हमारे घर से दूर जूने बाज़ार में रहती थीं, मैं जाकर कहता कि आज श्राद्ध है इसलिए बाईजी ने मासी को बुलाया है। मासी हमारे घर आतीं, उस दिन जरूर ही श्राद्ध में बाहर वालों को बुलाया गया होता था। रसोई के सामने वाले कमरे में दरी बिछाकर सबको जीमने बिठाया जाता। मेरी अपनी मौसी नानी के घर में ही रहती थीं जिनके चार बच्चे थे। मौसी का परिवार नानाजी के घर की पहली मंजिल पर रहता था जबकि नीचले तल्ले (ग्राउंड फ्लोर) की सारी जगहों पर नानाजी-नानीजी का सामान था। हर कमरे में कुछ न कुछ रखा हुआ था। नाना जी खेती बाड़ी की विरासत वाले आदमी थे और उन्हें इस बात का बहुत गौरव-सुख मिलता था कि वे मूलत: किसान ही हैं। खैर। श्राद्ध वाले दिन खाना बनते न बनते मुझे मौसाजी की दूकान पर भेजा जाता, मौसा जी मुझे दूकान का ध्यान रखने का कहकर घर आते और भोजन करते तब तक मैं दूकान पर बैठा रहता। जैसे ही मौसा जी आते, मैं घर भाग जाना चाहता। मौसा जी पूछते कि तूने खाना खा लिया है कि नहीं। अगर मैं खाना खाकर आया होता तो वे थोड़ा डांटने के अंदाज में कहते कि घर पर क्या है, यहीं बैठा रह। मुझे दूकान पर बैठना बहुत उबाऊ काम लगता था। ग्राहक का इंतज़ार करते रहो। इस दूकान के अधिकाँश ग्राहक किसान ही होते थे जो सामान काम खरीदते थे मोलभाव ज्यादा करते थे। मौसा जी की दूकान पर लोहे का सामान मिलता था जिसमें खेती-किसानी, घर निर्माण और पुताई का सामान बिकता था। श्राद्ध के दिनों के आसपास से ही लोगों के घरों में रंग-रोगन पुताई का काम शुरू हो जाता था। उन दिनों कपासन में डिस्टेम्पर नयी चीज़ था, मौसाजी डिस्टेम्पर की थैलियाँ मंगवाते थे जो लगभग दस पंद्रह रुपये की एक किलो की थैली होती थी। सबसे ज्यादा हरे और हलके हरे रंग के डिस्टेम्पर की बिक्री होती थी। उन दिनों मौसाजी की दूकान पर डिस्टेम्पर की थैलियों को ग्राहकों के लिए सजाकर रखा जाता था। उबाऊ होने पर भी मुझे डिस्टेम्पर की थैली बेचने का काम बहुत अच्छा लगता।
रुई धागे में बदलकर लोहे की कील पर धागे की गठरी का रूप ले लेती है
श्राद्धों में सारे शुभ काम वर्जित होते थे और रंग रोगन भी नहीं किया जाता था। इससे बचने के लिए समझदार लोग श्राद्ध शुरू होने के एक दो या कुछ दिन पहले से रंग रोगन -लिपाई पुताई शुरू कर देते। अगर काम पहले शुरू हो गया है तो श्राद्ध में भी इसे निरन्तर किया जा सकता था। हाँ, जिस दिन घर में श्राद्ध हो उस दिन लोग यह काम नहीं करते थे। नाना जी के घर के पास गोविन्द मामा का कच्चा घर था। वह एक वैश्य परिवार था। मामला यह था कि मेरे ननिहाल कपासन में रहने वाले वाले अधिकांश परिचित परिवार के लोग माँ को जीजी कहते और मैं उन्हें मामा कहता। तो गोविंद मामा क्या हमारे गली के हर घर में मेरे मामा थे। गोविन्द मामा की बाई (माँ) अपने कच्चे घर की भींत के लेवड़े (पपड़ियाँ) खुरपी से हटातीं, फिर कच्ची मिट्टी में लीद और मड़ड़ा (एक प्रकार की चिकनी मिट्टी) मिलाकर हाथों से दीवार लीपतीं। बारिश के बाद बाहरी कच्ची दीवारों की मिट्टी उखड़ जाती जिसे वे स्टूल पर चढ़कर ठीक करतीं। इस प्रक्रिया को दड़ना कहा जाता था। दीवारों के बाद वे अपने आँगन में लिपाई करतीं। मुझे उनको आँगन लीपते देखना बहुत अच्छा लगता था। लिपाई के बाद वे दीवारों पर पुताई करती थीं जो चूने से नहीं खड़ी (एक प्रकार का सफ़ेदी का पदार्थ) से होती थी। शायद कच्ची और मिट्टी की दीवालों पर चूना टिकता नहीं था या खड़ी अधिक सस्ती होती थी। गोविन्द मामा की बाई आय के लिए चरखा भी कातती थीं, भोजन इत्यादि के बाद वे दोपहर में चरखा लेकर बैठ जातीं जिसे मेवाड़ में रेटियाँ कहा जाता था। मैं देखता कैसे रुई धागे में बदलकर लोहे की कील पर धागे की गठरी का रूप ले लेती है। कभी कभी मैं जिद करता कि मुझे भी रेटियाँ चलाना सीखना है लेकिन एक हाथ से चरखे का चक्क्कर चलाना और दूसरे हाथ से रुई को संतुलित ढंग से धागे में बदलने का कौशल मैं कभी अर्जित न कर सका।
मुन्नी का लाला
मेरे बड़े होते न होते गोविन्द मामा कपासन छोड़कर व्यापार के लिए अहमदाबाद या गुजरात में कहीं चले गए। उन्होंने अपना कच्चा घर भी बेच दिया। उनकी माँ उनके बड़े भाई के घर रहने लगीं जो हमारे घर से काफी दूर था। धीरे-धीरे भूगोल और संबंधों का दृश्य बदलता चला गया। बहुत बाद में यानी बीस पच्चीस साल बाद जब मैं बेगूं कॉलेज में पढ़ाने जाने लगा, तब एक दिन की बात है। चित्तौड़गढ़ बस स्टैंड पर मैं बेगूं की बस का इंतज़ार कर रहा था। बस आकर खड़ी हुई और मैं अपनी जगह खोजने लगा। बस के भीतर मुझे गोविन्द मामा की बाई दिखाई दीं। वे पहले से अधिक वृद्ध हो गई थीं, लेकिन उन्हें पहचानना मुश्किल नहीं था। मैंने जाकर उनके पाँव छुए। वे मुझे पहचान नहीं सकीं, जब मैंने बताया कि मैं रामचन्द्र जी नन्दवाना का दोहिता हूँ तो वे ख़ुशी से बोलीं मुन्नी का लाला। मेरी माँ का घर का नाम मुन्नी ही तो था। वे मुझे देखकर बहुत खुश हुईं बल्कि उन्हें इस बात से कहीं ज्यादा ख़ुशी थी कि मैंने उन्हें पहचान लिया और मैं उनसे मिलने उनकी सीट पर गया। मेवाड़ में रिवाज़ है कि बहन और बेटी से मिलने पर उन्हें खाली हाथ विदाई नहीं दी जाती। बहन और बेटी ही नहीं, उनके बच्चों को भी खाली हाथ नहीं छोड़ते। दस-पांच रुपये या जो हैसियत हो कुछ न कुछ अवश्य दिया जाता है। गोविन्द मामा की बाई के पास शायद इतने पैसे न थे लेकिन उन्हें याद आया कि उनके थैले में केला है। उन्होंने थैले में से केला निकाला और मुझे दे दिया। ले बेटा यह केला खाना।
नन्दवानों की कथा
चित्तौड़ में श्राद्ध का दृश्य दूसरा था। माँ चल नहीं सकती थीं और उन्हें हर रोज़ स्कूल भी जाना होता था। ऐसे में भी वे श्राद्ध का पालन करतीं। जिस दिन मेरे दादाजी या दादीजी का श्राद्ध होता मम्मी मुझे बाज़ार भेजतीं। मैं पाव-पाव भर जलेबियों की दो थैलियाँ तुलवाता और लेकर घर आता। मम्मी मुझसे संकल्प छोड़ने का कहतीं फिर मैं एक थैली मंदिर के पुजारी को देने जाता। दूसरी थैली की जलेबियाँ मेरे खाने के लिए होतीं। अगर कभी इतवार या अवकाश के दिन किसी का श्राद्ध आता तो माँ भी सीधा निकालतीं, जिसे मंदिर में देकर आना होता था। वे किसी श्राद्ध पर अपनी परिचित एक गरीब ब्राह्मण महिला को बुलाकर भोजन करवातीं और उन्हें कुछ दक्षिणा भी देतीं। चित्तौड़ में श्राद्ध का एक कठिन पक्ष भी था। हम लोग ब्राह्मण थे, किन्तु परम्परा से यह मानते थे कि दान-दक्षिणा लेना हमारा काम नहीं है। इसके पीछे एक मिथक या कथा भी है। यह महाभारत का ही प्रसंग था जो इस प्रकार था कि रुक्मिणी के विवाह के समय संकट खड़ा हो गया।
रुक्मिणी के भाई और पिता उनका विवाह कहीं करना चाहते थे किन्तु स्वयं रुक्मिणी भगवान् श्रीकृष्ण से प्रेम करती थीं और उनसे ही विवाह करना चाहती थीं। जब उनका विवाह हठपूर्वक कहीं कर देने की तैयारियाँ हो रही थीं तब उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण को सन्देश भिजवाया कि वे तत्काल आकर उन्हें ले जाएं। रुक्मिणी ने यह सन्देश नन्द ऋषि के माध्यम से भिजवाया। जब श्रीकृष्ण से उनका विवाह हो गया और यह प्रकरण समाप्त हो गया तब उन्होंने नन्द ऋषि को बुलाया और श्रीकष्ण तक प्रस्ताव पहुंचाने के लिए उन्हें पुरस्कृत किया तब उन्होंने अपना नौलखा हार उतारकर नन्द ऋषि को भेंट किया और कहा कि इस नौलखा हार को लेने के बाद तुम्हें किसी और से कोई दान लेने की आवश्यकता न होगी। जीवन निर्वाह के लिए तुम्हारे वंशज लेन-देन का व्यापार कर सकते हैं। कृषि भी उनकी आजीविका का स्रोत रही। इस वरदान में एक शाप भी था कि स्वयं माता रुक्मिणी से दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मण अब किसी और दान से लेंगे तो वे नष्ट हो जाएंगे। इसके बाद नन्द ऋषि की संतानें नन्दवाना कहलाईं और उन्होंने आजीविका के लिए बोहरगत यानी धन के लेन देन का व्यवसाय किया।
कृषि भी उनकी आजीविका का स्रोत रही। अब संकट यह था कि श्राद्धों में अड़ोस-पड़ोस के लोग हमें बुलाते कि आइये, आज हमारे घर में श्राद्ध है, आकर जीम लीजिये तब उन्हें इंकार करना पड़ता लेकिन यह समझाना कठिन होता कि ब्राह्मण होकर भी हम लोग दान दक्षिणा क्यों नहीं ले रहे हैं। चित्तौड़ में हमारे पड़ोस का व्यास परिवार हम लोगों से बेहद घनिष्ठ था। माँ ने उन्हें दान न लेने की नन्दवानों की कथा समझा दी थी इसके बावजूद वे श्राद्ध के दिन मनुहार करते। मैं जब छोटा था तब जबरन मुझे बुलाकर दूध पिलाते। यह सब मुझे अच्छा न लगता किन्तु उनके साथ घनिष्ठता के कारण मैं विरोध न कर पाता।
डबल पुण्य: भाणेज की संतान ताणेज
चित्तौड़ में माँ के मामा साहब रहते थे। वे हर उत्सव-पर्व और श्राद्ध पर मुझे और माँ को अपने घर बुला लेते। मामी साहब मुझ बहुत दुलार करते। माँ उनकी भानजी थीं जिसे मेवाड़ में भाणेज भी कहा जाता था। मैं भाणेज की संतान यानी ताणेज था। ऐसी मान्यता थी कि भाणेज को खिलाने पिलाने से बहुत पुण्य मिलता है फिर मैं तो ताणेज था जिसे खिलाने में शायद डबल पुण्य मिलता होगा। बहरहाल श्राद्ध के दिन मैं और मम्मी नहा धोकर सुबह ही मामा साहब के घर पहुँच जाते। मामी साहब भोज की तैयारी करते। उनके घर में रसोई के बाहर के स्थान की छत पर लोहे का बड़ा जंगला था। इस जंगले के नीचे चूल्हा रखा जाता। मामा साहब खुद पूड़ियाँ तलते, मम्मी पूड़ियाँ बेलती थीं और मामी साहब दौड़ भाग करते रहते। चूल्हे का सारा धुंआ जंगले से बाहर निकल जाता। फिर हम सब भोज करते। बच्चे दो दो बार खाना खाते। मेवाड़ में कहावत है न कि हाथ हुखा बारक भूखा अर्थात खाना खाकर जब बालक अपने हाथ धोते पोंछते हैं तब तक उन्हें फिर भूख लग आती है। मामी साहब खीर बनाते तो उसमें मीठा रंग डालते थे, मैं समझ नहीं पाता था कि हमारे घर की खीर सफ़ेद और मामा साहब की घर की खीर केसरिया क्यों होती है? खीर पूड़ी के साथ आमतौर पर चने की दाल, आलू की सब्जी होती। मामी साहब के घर हम भोज के बाद थोड़ी देर आराम करते फिर अपने घर जाने को होते तब मामी साहब फिर एक बड़ा टिफिन निकालते, उसमें पूड़ियाँ खीर इत्यादि भरते और हमें दे देते। फिर माँ से कहते, मुन्नी बाई शाम को कहाँ चूल्हा चौका करोगे? मामी साहब सर्दियों में जाजरिया बनाते थे जो हरे चने का हलवा होता था। वह जब भी बनाते, एक टिफिन में अवश्य भिजवाते।
हिंदी का श्राद्ध
मजेदार बात यह भी है आमतौर पर श्राद्ध का पखवाड़ा सितम्बर महीने में आता है। सितम्बर में ही हिंदी दिवस भी आता है। हिंदी का अध्ययन-अध्यापन करने वाले लोग इस बात का मजा लेते हैं कि हिंदी दिवस यानी हिंदी का श्राद्ध। एक हिंदी दिवस पर मेरे साथ ऐसी ही घटना हुई। मैं एम ए पास करके नेट और पीएच डी की तैयारी में जुटा हुआ था कि अचानक एक दिन मेरे गुरु आदरणीय सत्यनारायण व्यास जी ने मुझसे कहा कि बेटा हम दोनों को चूरू चलना है। मैंने कारण पूछा तो समझ आया कि वहां कोई संस्था हिंदी दिवस पर गुरुदेव का सम्मान करना चाहती है। इस मौके पर गुरुदेव को बुलाया गया है और यह आग्रह है कि वे अपनी पत्नी या किसी परिवारी अथवा किसी कवि मित्र के साथ आमंत्रित हैं। दोनों का किराया संस्था देगी। मेरे लिए तो यह पुरस्कार जैसा था कि किराया भी नहीं लगेगा और मैं चूरू देख आऊंगा। हम दोनों चित्तौड़ से बस में बैठकर जयपुर होते हुए चूरू पहुंचे। वहां एक बड़ी और सूनी धर्मशाला में हम लोगों को ठहराया गया। सम्मान समारोह का आयोजन रात को होना था, सुबह के भोजन के लिए स्थानीय आयोजक हमें अपने घर ले गए। उस दिन उनके घर श्राद्ध था। उन्होंने साधिकार कहा कि आज मेरे यहाँ कनागत (श्राद्ध) है सो आप दोनों भोजन कीजिये। उनके यहाँ भोजन में कांजीवड़ा भी था जो मैंने पहली बार खाया। हम लोग मेहमान थे और मेजबान के आदेश से बंधे हुए, क्या करते। चुपचाप भोजन कर लिया। अब शाम के भोज के लिए फिर हमें संस्था के ही किसी सदस्य के घर जाना था, जब हम गए तो उन्होंने कहा कि आज सुबह हमारे घर कनागत था, सो सुबह के भोज की ही कुछ सामग्री अभी भी परोस रहे हैं। हम दोनों ने शालीन मेहमानों की तरह भोजन किया और इस प्रकरण से मुक्त हुए। रात को सोने से पहले गुरुदेव से रहा न गया और वे मुझसे बात करते हुए थोड़ा बिफरे। उन्होंने कहा कैसे लोग हैं, श्राद्ध के भोजन से अतिथि सत्कार निबटा रहे हैं और शाम वाले मेजबान कितने निर्लज्ज थे कि सुबह का भोजन खिला दिया। गुरुदेव बोले, हिंदी दिवस का आयोजन, कनागत का पुण्य और ब्राह्मण गुरु चेले को एक साथ भोज करवाने का ऐसा काम कभी न हुआ होगा। मैं उनकी इस बात पर देर तक ठठाकर हँसता रहा। सर भी अपने व्यंग्य मिश्रित वाक्यों से हँसते मुस्कुराते रहे।
जब मैं उदयपुर आ गया तब श्राद्ध पक्ष में ही एक बार एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे परेशान कर दिया। हुआ यह था कि विख्यात कवि और मेरे स्थानीय अभिभावक नंद बाबू का फोन आया और उन्होंने कहा कि आज तुम भोजन करने मेरे घर आ जाना, हिमांशु भी आएँगे। मैं समझ नहीं सका कि क्या है? जाने पर मालूम हुआ कि उनकी पत्नी का पहला श्राद्ध था जिसे उन्होंने बड़े पैमाने पर किया था। उनके घर भोज था और अनेक लोग थे। मैं उनके पहुंचा और झिझकते हुए श्राद्ध का भोजन किया लेकिन भोज के बाद उन्होंने मुझे दक्षिणा में दस या बीस कुछ रुपये दिए। मैं इंकार करता रहा, नन्दवानों की कथा सुनाता रहा, पर नंद बाबू से कौन जीत सकता था? ये रुपये मेरी जेब में थे और मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैंने कोई निषिद्ध या पाप कर्म कर दिया है। आखिर किसी मंदिर में जाकर वे रुपये चढ़ाकर मुझे कुछ चैन मिला कि अब ठीक है।
श्राद्ध है क्या
उदयपुर में ही मैंने देखा कि लोग श्राद्ध का भोज संध्या समय भी करने लगे हैं जबकि इस भोज का विधान सुबह का ही माना गया है। कारण यह रहा होगा कि अब नौकरीपेशा लोगों के लिए सुबह काम पर जाने के साथ भोज करना और व्यवस्थाएँ देखना सम्भव ही नहीं होता तब कैसे श्राद्ध किया जाए। देखा जाए तो श्राद्ध है क्या? दिवंगतों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने का एक अवसर ही तो श्राद्ध है। हाँ, इसके साथ जुड़े कर्मकांड को ठीक न समझा जाए तथापि यह तो उचित ही है कि वर्ष में एक बार हम अपने दिवंगतों को याद करें। श्राद्ध के वैभव का प्रदर्शन करने और कर्मकांड को बढ़ावा देने पर अनेक आपत्तियाँ हुई हैं जो उचित ही हैं, कहते भी हैं कि जीते जी जिन बुजुर्गों की सेवा नहीं की उनके श्राद्ध पर खीर पूड़ी खिलाकर आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
दिवंगतों को श्रद्धांजलि क्या इसी तरह ही हो सकती है?
दिल्ली में आकर हम लोगों के लिए भी सवाल आया कि श्राद्ध पर क्या किया जाए। हमारी सोसायटी में एक मंदिर है जिसके पुजारी मूलत: बिहार के पंडित जी हैं। शुरू शुरू में वे ही हमारे घर आते रहे और उनकी पत्नी भी। पंडित जी घर आते तो विधि विधान से श्राद्ध करवाते। जल, कुमकुम, थाली, लोटा और भी कुछ कुछ। बाद में यह हुआ कि मीनाक्षी (मेरी पत्नी) को कई बार इस सारी प्रक्रिया में अरुचि होने लगी। मीनाक्षी का तर्क था कि दिवंगतों को श्रद्धांजलि क्या इसी तरह ही हो सकती है? फिर उन्होंने एक रास्ता निकाला। हमारे घर कूड़ा उठाने आने वाली आशा (आशा बंगाली मुसलमान हैं) को वे श्राद्ध के दिन भोजन की थाली देने लगीं और यह आग्रह कि यहीं आराम से भोजन कर लो। इस प्रसंग का समापन यह है कि मेरे गुरु वेदपाठी और अनन्य विद्वान सदाशिव श्रोत्रिय जी ने एक बार मुझसे पूछा कि महानगर में रहते हुए तुम पुरखों को कैसे याद करते हो पल्लव? श्राद्ध पक्ष में कुछ करते हो या नहीं? थोड़े संकोच के साथ मैंने मीनाक्षी की विधि उन्हें बता दी। श्रोत्रिय सर ने ज़रा सा पॉज लिया और बोले,
इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता,
पल्लव।
शाबास।
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