सुखवीर सिंह की कविताएँ: मृत्यु, मौन और प्रेम

सुखवीर सिंह की कविताएँ — मृत्यु, मौन और प्रेम के बीच | शब्दांकन
सुखवीर सिंह की कविताएँ — मृत्यु, मौन और प्रेम के बीच

तब मुझे
कुछ सिद्ध नहीं करना होगा,
किसी के सम्मुख
अपने होने का प्रमाण नहीं देना होगा।

न प्रयत्न का आवरण,
न पराक्रम का अभिनय,
न सामर्थ्य का मिथ्या अभिमान,
न यह दिखाने की विवशता
कि मैं अभी भी अजेय हूँ।

— सुखवीर सिंह

सुखवीर सिंह एक साधक कवि हैं। प्रेम के ताने-बाने से बुनी उनकी कविताओं में जीवन का दर्शन भी है और प्रेम की गहराई भी। यहाँ सौंदर्य है तो संसार का यथार्थ भी, और मृत्युबोध भी --- जो जीवन का अंत नहीं, वरन् अहंकार का विसर्जन है। तभी तो उनकी कविता अंततः प्रेम की कविता है।

कविता

सुखवीर सिंह की कविताएँ

मृत्यु, मौन और प्रेम के बीच

जब मृत्यु मुझे ढूँढ लेगी

अंततः जब मृत्यु मुझे ढूँढ लेगी, वह भयभीत नहीं होगी— न उसके चरणों में कोई संशय होगा, न मेरे नेत्रों में। वह आएगी जैसे किसी विस्मृत वन-पथ पर बहुत वर्षों बाद कोई अपना लौटता है। चुपचाप वह मेरा हाथ अपने हाथ में लेगी, और उसकी उँगलियों का स्पर्श मेरी समस्त यात्राओं की थकान पहचान लेगा। उसे ज्ञात होगा— मैं उसे खोजते-खोजते कितना दूर चला आया हूँ, कितने जन्मों की धूल मेरे चरणों से चिपकी है, कितने अनुत्तरित प्रश्न मेरी चेतना के अंधकार में अब भी दीप की तरह जल रहे हैं। वह मेरे समीप झुकेगी, और अत्यन्त मंद स्वर में मेरे कर्ण-कुहर में कहेगी— अब तुम्हें किसी चिंता की आवश्यकता नहीं। इतना सुनना ही पर्याप्त होगा। मेरे स्कन्धों पर रखा समस्त भार अचानक निरर्थक हो जाएगा; जैसे प्रातः से पहले रात्रि अपने ही अंधकार को विसर्जित कर देती है। तब मुझे कुछ सिद्ध नहीं करना होगा, किसी के सम्मुख अपने होने का प्रमाण नहीं देना होगा। न प्रयत्न का आवरण, न पराक्रम का अभिनय, न सामर्थ्य का मिथ्या अभिमान, न यह दिखाने की विवशता कि मैं अभी भी अजेय हूँ। मैं पहली बार अपने ही भीतर निर्वस्त्र खड़ा हो सकूँगा— बिना परिचय, बिना पद, बिना नाम, बिना उस व्यक्ति के जिसे संसार ने मुझसे बना दिया था। वहाँ कोई भार नहीं होगा। न अपेक्षाओं का, न स्मृतियों का, न भविष्य का। केवल एक अथाह निस्तब्धता होगी, जिसमें मेरी चेतना धीरे-धीरे अपने ही स्रोत को पहचानती हुई लौट जाएगी। और तब शायद पहली बार मेरा हृदय धड़कने से अधिक विश्राम करना सीखेगा। मृत्यु तब अंत नहीं होगी— वह उस दीर्घ प्रतीक्षा का मौन उत्तर होगी जिसे मैं जीवन कहता रहा। बहुत दूर तक भटकने के बाद, बहुत कुछ होने का अभिनय करने के बाद, बहुत कुछ खोकर भी जीते रहने का अपराध ढोने के बाद— मैं उसकी हथेली में अपना हाथ रख दूँगा। वह मुझे देखेगी। न कोई प्रश्न होगा, न कोई उत्तर। केवल उसकी आँखों में एक ऐसी करुण निस्तब्धता होगी जिसके सामने मेरे जीवन के सारे तर्क अचानक नग्न हो जाएँगे। मैं शायद पूछूँगा— क्या अब सचमुच कुछ नहीं करना? वह कुछ नहीं कहेगी। बस मेरी उँगलियाँ और कसकर थाम लेगी। और उसी क्षण मुझे समझ आएगा— जिस जीवन को बचाने के लिए मैंने अपना समूचा जीवन खर्च कर दिया, वह जीवन कभी मेरा था ही नहीं। मैंने जिसे साहस कहा, वह भय था। जिसे संघर्ष कहा, वह पलायन था। जिसे अस्तित्व समझकर सीने से लगाए रहा, वह केवल धीरे-धीरे समाप्त होता हुआ एक दीर्घ भ्रम था। और मृत्यु— वह मेरे सामने खड़ी होकर मुझे पराजित नहीं करेगी। वह केवल मेरे हाथ से जीवन का वह अंतिम अभिनय छीन लेगी। फिर— न कोई नाम बचेगा, न कोई स्मृति, न कोई प्रमाण कि मैं कभी यहाँ था। मेरे होने की सारी घोषणाएँ एक क्षण में मौन हो जाएँगी। और शायद यही सबसे तीखी मुक्ति होगी— कि अंततः मुझे यह सिद्ध करने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी कि मैं जीवित था। मैं उसकी ओर देखूँगा। वह मेरी आँखें बंद कर देगी। और संसार में एक ऐसा व्यक्ति कम हो जाएगा जो जीवन भर अपने होने का प्रमाण देता रहा। उसके बाद मेरी अनुपस्थिति ही मेरी अंतिम उपस्थिति होगी।

फिर आएगी मृत्यु एक दिन

हृदय-गुहा में कूप अतल है, तम का पारावार, उसके तल में बीज सुप्त है, लिए सृष्टि का सार। जिस दिन वह अंकुर फूटेगा, जागेगा अनुराग, भर लेगा ब्रह्मांड अंक में, बन प्रलयंकर आग। इतना तेज भरा है उसमें, इतनी प्रखर मशाल, देख न पाते नयन मनुज के, कहते तम विकराल। ज्योति जहाँ सीमा को लाँघे, वहीं घना तम छाय, रवि को सम्मुख जो देखे, वह दृग की ज्योति गँवाय। रे मानव! तू खोज रहा क्या, बाहर दिशा-दिशांत? तेरे भीतर ही सोया है, वह चिर-ज्योति अशांत। मैं उतरा सोपान पकड़कर, किंतु रुका हर बार, अतल-द्वार पर खड़ा मिला फिर, भय का पहरेदार। भय भी है, करुणा भी इसमें, अश्रु-सिंधु अपार, फिर भी अधरों पर स्मित-रेखा, ज्यों निशि में उजियार। यह कैसा संग्राम हृदय में, यह कैसा उन्माद, रोदन में भी हास छिपा है, हास लिए अवसाद। फिर आएगी मृत्यु एक दिन, श्याम, मौन, विकराल, शिथिल पड़ेंगी भुजा हमारी, टूटेगा भ्रम-जाल। जब वह आलिंगन में लेगी, मूँदूँगा मैं आँख, बुझते ही बाहर के दीपक, खुलेगी भीतर आँख। मुँदते ही ये नयन खुलेगा, अंतर का वह द्वार, दीखेगा वह बीज कि जिसने, युग-युग किया पुकार। पर यह क्या! वह बीज हृदय में, कभी नहीं था, हाय! प्रिया-हथेली पर रक्खा था, जग से छिपा-छिपाय। जिसको मैंने जीवन-भर निज, हृदय कहा, पहचाना, वह तो उसकी खुली हथेली, मैं ही था अनजाना।

कवि-परिचय

सुखवीर सिंह मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं। संप्रति वे लोक निर्माण विभाग एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग में प्रमुख सचिव हैं।

डी-3/23, चार इमली, भोपाल
ईमेल: singhsukhveer1608@gmail.com

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