'हाशिमपुरा' स्वतंत्रता बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग - विभूति नारायण राय | Vibhuti Narayan Rai on Hashimpura


हर अगला कदम उठाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि वह किसी जीवित या मृत शरीर पर न पड़े - मेरी स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है - विभूति नारायण राय

'हाशिमपुरा' स्वतंत्रता बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग - विभूति नारायण राय | Vibhuti Narayan Rai on Hashimapur

हाशिमपुरा के अन्याय मे सभी दोषी - 

विभूति नारायण राय

हाशिमपुरा का नरसंहार स्वतंत्रता बाद की सबसे बड़ी कस्टोडियन किलिंग (हिरासत में मौत) की घटना है। इसके पहले जहां तक मुझे याद है, कभी इतनी बड़ी संख्या में पुलिस ने अपनी हिरासत में लेकर लोगों को नहीं मारा था। इसके बावजूद एक भी अपराधी को दंडित नहीं किया जा सका। अदालत के फैसले से मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ है। मैंने पहले ही दिन से यही अपेक्षा की थी। दरअसल भारतीय राज्य का कोई भी स्टेक होल्डर नहीं चाहता था कि दोषियों को सजा मिले। राजनीतिक नेतृत्व, नौकरशाही, वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, मीडिया-सभी ने 22 मई, 1987 से ही इस मामले की गंभीरता को कम करने की कोशिश की थी। भारतीय न्याय प्राणाली की चिंता का आलम यह है कि इतने जघन्य मामले का फैसला करने में अदालतों को लगभग अट्ठाइस साल लग गए।


22 मई, 1987 को रात लगभग साढ़े दस बजे मुझे हाशिमपुरा नरसंहार की घटना की जानकारी हुई। शुरू में तो मुझे इस सूचना पर यकीन नहीं हुआ, पर जब कलक्टर और दूसरे अधिकारियों के साथ मैं घटनास्थल पर पहुंचा, तब जाकर मुझे यह एहसास हुआ कि मैं धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणराज्य के सबसे शर्मनाक हादसे का साक्षी बनने जा रहा हूं। मैं उस समय गाजियाबाद का पुलिस कप्तान था और पीएसी ने मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से उठाकर कई दर्जन मुसलमानों को मेरे इलाके में लाकर मार दिया था।

22-23 मई, 1987 की आधी रात दिल्ली-गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गांव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे पर उगे सरकंडों के बीच टॉर्च की रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना और हर अगला कदम उठाने से पहले यह सुनिश्चित करना कि वह किसी जीवित या मृत शरीर पर न पड़े- मेरी स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है। मैंने पीएसी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कराई और करीब 28 वर्षों तक उन सारे प्रयासों का साक्षी रहा हूं, जो भारतीय राज्य के विभिन्न अंग दोषियों को बचाने के लिए करते रहे हैं। इन पर मैं विस्तार से अपनी किताब में लिख रहा हूं, पर यहां संक्षेप में कुछ का जिक्र करूंगा।

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विभूति नारायण राय
पूर्व कुलपति अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा,
पूर्व महा-निदेशक उ०प्र० पुलिस (रिटायर्ड आईपीएस अफसर) तथा
'वर्तमान साहित्य' के संस्थापक-संपादक

हाशिमपुरा संबंधी मुकदमे गाजियाबाद के लिंक रोड और मुरादनगर थानों में दर्ज हुए थे। मगर कुछ ही घंटों में उसकी तफ्तीशें राज्य के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के आदेश से सीआईडी को सौंप दी गईं। सीआईडी ने पहले दिन से ही दोषी पुलिसवालों को बचाने के प्रयास शुरू कर दिए। अपनी किताब लिखने के दौरान मैंने सीआईडी की केस डायरियां पढ़ीं, तो ऐसा लगा कि मैं बचाव पक्ष के दस्तावेज पढ़ रहा हूं। कुल उन्‍नीस अभियुक्तों में सबसे वरिष्ठ ओहदेदार एक सब-इंस्पेक्टर था। मैं कभी यह नहीं मान सकता कि बिना वरिष्ठ अधिकारियों की शह और अभयदान के मजबूत आश्वासन के एक जूनियर अधिकारी बयालीस लोगों के कत्ल का फैसला कर सकता है। सीआईडी ने बेमन से छोटे ओहदेदारों के खिलाफ चार्जशीट लगाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, जबकि बड़े अफसरों को उसने पूरी तरह छोड़ दिया। सीआईडी ने फौज की भूमिका की गंभीर पड़ताल नहीं की। अपनी किताब के लिए सामग्री एकत्र करते हुए मेरे हाथ ऐसे दस्तावेज लगे हैं, जो दंगों के दौरान मेरठ में तैनात फौजी कॉलम के बारे में गहरे शक पैदा करते हैं। मजेदार बात यह है कि ये तमाम तथ्य सीआईडी के पास भी थे। सवाल यह है कि फिर उन्होंने इसे क्यों नजरंदाज किया। क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या फिर अपराधियों को बचाने का सुनियोजित प्रयास था? मैं थोड़े-से प्रयास से उस महिला तक पहुंच गया, जो उस पूरी घटना की सूत्रधार थी। हैरानी की बात यह है कि फिर भला सीआईडी उस तक क्यों नहीं पहुंच सकी? निश्चित रूप से सीआईडी के अधिकारी एक लेखक के मुकाबले ज्यादा साधन संपन्न थे और उनके पास कानूनी अख्तियारात भी थे। दरअसल उनकी दिलचस्पी ही नहीं थी कि इस हत्याकांड के अभियुक्तों की सही शिनाख्त हो और उन्हें अपने जुर्म की सजा मिले।


मामला सिर्फ पुलिस-प्रशासन और जांच एजेंसी का ही नहीं है। हकीकत तो यह है कि राजनेताओं ने भी इस मामले में आपराधिक चुप्पी अख्तियार की। जिस समय यह कांड हुआ, लखनऊ और दिल्ली, दोनों जगह कांग्रेस की सरकारें थीं, और उसके बाद दोनों जगहों पर सरकारें बदलती रहीं। मैं नहीं समझता कि किसी ने भी इस मामले को चुनौती के रूप में लिया। खास तौर से उत्तर प्रदेश की सरकारों ने तो गंभीर लापरवाहियों से हत्यारों को दोषमुक्त होने में मदद की। वर्षों तक दोषियों को निलंबित नहीं किया गया, आरोपितों के खिलाफ अभियोजन में देरी की गई। गाजियाबाद न्यायालय में अभियुक्त पेश नहीं होते थे, इसके बावजूद राज्य के कान पर जूं तक नहीं रेंगती थी। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से यह मुकदमा दिल्ली की अदालत में आया भी, तो काफी समय तक योग्य अभियोजक नहीं नियुक्त किया गया। इस तरह के अनगिनत उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारतीय राज्य को ही यह चिंता नहीं थी कि इतने जघन्य हत्याकांड में दोषियों को सजा मिले।

हाशिमपुरा हत्याकांड में आए अदालत के ताजा फैसले के बाद भारतीय राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए? मेरा मानना है कि यह उसके लिए परीक्षा की घड़ी है। यदि आजादी के बाद के इस सबसे बड़े हिरासती हत्याकांड में वह हत्यारों को सजा नहीं दिला पाया, तो उसका चेहरा पूरी दुनिया में स्याह हो जाएगा। उसे अविलंब हरकत में आना चाहिए। एक ऐसी हरकत, जिससे हाशिमपुरा हत्याकांड की एक बार फिर से निष्पक्ष तफ्तीश हो सके, और समयबद्ध न्यायिक कार्रवाई के जरिये हत्यारों को सजा दिलाई जा सके। करीब अट्ठाइस साल बाद होने वाली यह हरकत तेज और फैसलाकुन होनी चाहिए।

अदालत के ताजा फैसले के बाद भारतीय राज्य की भूमिका क्या होनी चाहिए? यदि आजादी के बाद के इस सबसे बड़े हिरासती हत्याकांड में वह हत्यारों को सजा नहीं दिला पाया, तो उसका चेहरा पूरी दुनिया में स्याह हो जाएगा।
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