मीडिया गरज रहा था — एडवर्टिजमेंट बरस रहा था : शिल्पा शर्मा

Shilpa Sharma Ki Kavitayen

ये सच तो सभी जानते हैं कि अपनी पहली किताब हर कवि/लेखक को बेहद प्रिय होती है. अपने पहले कविता संग्रह ‘संतरंगी मन’ में मैंने जीवन के कई-कई रंगों को पिरोने का प्रयास किया है. भरत जी ने इसे पूरा पढ़ने के बाद इस पर मुझसे व्यापक चर्चा की. इस चर्चा ने मेरे उत्साह और ज्ञान दोनों को ही बहुत समृद्ध किया. इन कविताओं को इस पटल पर प्रकाशित करने के लिए भरत तिवारी जी और शब्दांकन का बहुत-बहुत आभार...

शिल्पा शर्मा


साहित्य की पहुँच कितनी गहरी होगी, यह इस बात पर भी तय होता है कि उसे लिखने वाले की माइक्रोस्कोपिक-नज़र उसके समाज के किस-किस हिस्से पर रहती है. शिल्पा शर्मा की यह नज़र जो उनके पूरे समाज पर है वह दूअन्ख्खी नहीं करती. शिल्पा रोज़मर्रा के जीवन में आतेजाते शब्दों से अपनी भावना को कविता में बखूबी जमा देती हैं, पाठक को 'यह' कभी अचंभित करता है और वह सोचता है, 'कविता लिखना तो आसान काम है' - यह भूलता हुआ कि रचना की आत्मा तो रचनाकार की आत्मा से जुड़ी है. 

शिल्पा की कविताओं का आनंद उठाइए, बार-बार. 

भरत आर तिवारी
शब्दांकन संपादक


उन्मुक्त स्त्रियां

उन्मुक्त स्त्रियां
ढल नहीं पातीं किसी सांचे में वे
जहां घरेलू नज़र आना हो वहां, बिंदास
और जहां बिंदास वहां, सादा-सी
जहां बोलना ज़रूरी वहां मौन
और जहां चुप्पी अहम् हो वहां, वाचाल
अपने स्वार्थ की बात हो तो लापरवाह
दूसरों के हितों के सवाल पर मुस्तैद
अपनी स्थिति से संतुष्ट और सहज भी
अपनी इस बेपरवाह ख़ूबसूरती पर आत्ममुग्ध भी
और हमेशा आगे बढ़ने, बढ़ाने को प्रयासरत
शिकायतों की लंबी फ़हरिस्त लिए
और समाधानों के अनगिनत विकल्प लिए
जिधर नज़र डालूं अनायास ही मिल जाती हैं
मुझे ऐसी निश्छल, उन्मुक्त
और ख़ूबसूरत-सी स्त्रियां




शिल्पा शर्मा की कवितायेँ

प्रेम पराकाष्ठा

मैं अब
धुआं हो जाना चाहती हूं
ताकि समा सकूं
तुम्हारे पोर-पोर में...
अब मैं
हो जाना चाहती हूं पानी
ताकि महसूस कर सको
तुम मेरे वजूद को
मेरे स्पर्श के
कुछ देर बाद तक भी
और अब तो मैं
हो जाना चाहती हूं
अदृश्य भी
ताकि देख सकूं
मेरे बिना
कैसा अनुभूत करते हो
तुम ख़ुद को
शायद जान लेना चाहती हूं
किस हद तक
घुल गई हूं मैं
तुम्हारी जि़ंदगी में
और संशय में भी हूं
कहीं हमने
सांद्रता की सीमाएं
पा तो नहीं लीं?
क्योंकि अभी तो मैं
और घुलना चाहती हूं
तुम्हारी सांसों में
बहना चाहती हूं
तुम्हारी रक्त-नलिकाओं में
इस शिद्दत से
कि खालिस मैं
पूरी तरह
तुम हो जाऊं...





मध्य प्रदेश (तब) के बिलासपुर में जन्मी शिल्पा शर्मा के पिता राज्य सरकार के वन विभाग में अधिकारी थे. अत: उनकी पढ़ाई राज्य के हर उस शहर में हुई, जहां-जहां उनके पिता का तबादला होता रहा. एक जगह बसना और फिर कुछ सालों में ही वहां से उखड़कर कहीं और जा बसना… यह सिलसिला किसी को भी जीवन के कई राग अनायास ही सिखा सकता है. न जाने कब इसी बीच उनका मन लेखन और कविताओं की डोर से जुड़ गया. कविताएं और क़िस्से लिखते रहने के बावजूद यह समझने में उन्हें वक़्त लगा कि लेखन ही उनकी पहली पसंद है. 
इलेक्ट्रॉनिक्स में एम. एससी. करने के बाद दो वर्षों तक उन्होंने भोपाल के एक कॉलेज में बतौर लेक्चरर काम किया. इस बीच एक एनजीओ के लिए अनुवाद का काम करते हुए धीरे-धीरे स्वत: ही वे मीडिया के क्षेत्र में आ गईं. एक्सप्रेस मीडिया सर्विस, भोपाल, से शुरू हुए मीडिया के करियर में कई और मीडिया हाउसेस के नाम भी जुड़ते चले गए. विवाह के पश्चात् वे मुंबई आ गईं. उन्होंने पायोनियर बुक्स प्राइवेट लिमिटेड की पत्रिका होममेकर के शुरुआती अंक से इसके संपादकीय मंडल में दो वर्ष तक अपनी सेवाएं दीं. फिर नौ वर्षों तक उन्होंने फ़ेमिना हिंदी (वर्ल्डवाइड मीडिया प्राइवेट लिमिटेड, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप) पत्रिका के संपादन का काम संभाला. लगभग 17 वर्षों तक मीडिया में विभिन्न पदों पर काम करने के बाद फ़िलहाल वे स्वतंत्र लेखन कर रही हैं. 

मीडिया में काम का अनुभव, 17 वर्ष. नौ वर्षों तक फ़ेमिना हिंदी (वर्ल्डवाइड मीडिया प्राइवेटलिमिटेड, टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप) पत्रिका का संपादन. इससे पूर्व पायोनियर बुक्स प्राइवेट लिमिटेड की पत्रिका होममेकर के शुरुआती अंक से इसके संपादकीय मंडल में दोवर्ष का कार्यकाल. एक्सप्रेस मीडिया सर्विस, भोपाल, से मीडिया के करियर की शुरुआत. 
शैक्षणिक योग्यता: एम. एससी. इलेक्ट्रॉनिक्स, पी जी डिप्लोमा इन ह्यूमन रिसोर्सेज़, बैचलर ऑफ़ जर्नलिज़्म.


ईमेल: shilpaansharmaa@gmail.com




स्व के अर्थ

नितान्त अकेली हूं,
पर उदास नहीं
कामों की लंबी सूची को
तह कर के
डाल दिया है
अलमारी के
सबसे ऊपरी खाने में
और चुरा लिया है
कुछ घंटों का समय
केवल अपने लिए
बैठूंगी यूं ही
पैर पे पैर चढ़ाए
गर्म चाय का मग लिए
हाथों में
ताकूंगी यूं ही
खिड़की के बाहर
देखूंगी दोपहर के
बदलते रंग
जानती हूं
नियमों में चल रही दुनिया
तो रोकेगी मुझे
कहेगी स्वार्थी हूं मैं
पर दुनिया तो
हर बात का लेबल लिए
तैयार खड़ी रहती है
उसकी हर बात पे
कान नहीं देना मुझे
उंहू... आज तो बिल्कुल नहीं
क्योंकि कभी कभी
जीवन का थोड़ा सा हिस्सा
स्व के लिए जीना
भी तो नितान्त ज़रूरी है
ये स्वार्थ
हू ब हू
परिचित करा जाता है
मुझे अपने
स्व के अर्थों से
और...
फिर जाग उठती है
इच्छा ज़िन्दगी के साथ
क़दमताल करने की




मंझौली हैसियत का आदमी


रोज़ बच बच के निकलता
उस सड़क से वो
यूं ही पैदा कर
छोड़ दिए गए बच्चे वहां
अनायास टकराते रहते हैं
कभी खेलते हुए
बेपरवाह से
कभी टपरी-सी
होटलों का बचाखुचा
खाना खाते...
न जाने क्यों
अपना गांव छोड़
डेरा डाल रखा है
इनके माँ-बाप ने यहां?
क्या बनेंगे ये बच्चे?
अपराधी या
टैक्स दाताओं के पैसे
के झूठे उपभोगकर्ता?
नेताओं का बैंक बैलेन्स
बढ़ाने का ज़रिया
और नेताओं का वोट बैंक?
क्या इनके माता-पिता ने
वाक़ई नहीं सुना होगा
परिवार नियोजन शब्द
या इसमें भी
आड़े आ गई होगी
पैसों की कमी?
क्या इन्हीं जैसों की वजह से
नहीं रुकती
उस जैसों की तरक़्क़ी?
फिर यदि वो संभलकर
न चले तो
क्या फ़र्क़ पड़ेगा?
लग जाये ठोकर
एक-दो बच्चों को
क्या उसने ठेका लिया है
संभालता फिरे उन बच्चों को
जिनके माता-पिता को ही
नहीं है उनकी परवाह
और छोड़ रखा है
इन्हें सड़कों पर
यूं ही आवारा फिरने को
ये भावनाएं
अक्सर घेरे रहती थीं उसे
हां, आत्मकेंद्रित है वो
या शायद
दो जून की रोटी को जूझता
समय पर टैक्स देता
मंझौली हैसियत का आदमी...
फिर अचानक आई
अटाटूट बारिश के बाद
क्यों आज उन्हीं सड़कों से
गुज़रता हुआ
यहां-वहां अकुलाहट भरी
नज़रें दौड़ा रहा था वो
क्यों परेशान था कि
नज़र नहीं आ रहीं
वो पोटलियां
वो पन्नियां
वो सूखते कपड़े
और धूलधूसरित
वो बच्चे...
कहां गए होंगे?
हे ईश्वर!
उन्हें बारिश में
रहने का ठिकाना
मिला तो होगा न?
क्या भरपेट
खाना खा सके होंगे?
रक्षा करना उनकी
हैं तो वो अबोध बच्चे ही
उफ़ ये भावनाएं!
क्यों दोनों ध्रुवों से
उसे ही आ घेरती हैं
हमेशा...




हिसाब

इस इरादे से
निकली है घर से
आज ज़िन्दगी का हिसाब
चुकता कर देगी
वह
बरबस ही क़दम
चल पड़े उस ओर
जहां बहती है नदी
शहर से सटी
शांत
जीवन का लेखा-जोखा
पूरा करना है उसे
चाहे कुछ हो जाए
आज लौटेगी नहीं वह
अपना बिम्ब निहारती
अतीत के पन्ने पलटती
यही सोच रही है
क्या नहीं किया उसने?
पिता की लाज
पति, ससुराल का मान
बच्चों की तीमारदारी
सब...
फिर भी हमेशा
अपेक्षाएं बाट जोहती हैं
सिर्फ़ और सिर्फ़ उसकी
आज फ़ैसला करेगी वह
हर किसी की उम्मीद
आ टिकती है
बस उसपर ही क्यों?
आज आंकेगी सब
हिसाब जो करना है
हां, सच में
बिना उसके क्या होगा?
रोज़ की
रोटी-तरकारी?
घर का
सहेजना-संवारना?
चीज़ों का
हिसाब-किताब?
परिवार में
प्रेम-स्नेह?
कुछ भी तो नहीं
हो सकेगा
करीने से...
हां, सच!
उसी की दखल से
सारा का सारा
काम व्यवस्थित है
नहीं तो कितना बिखराव हो
डालनी है उसे
बेहतर नींव
बच्चों के लिए
सहसा उसने घड़ी देखी
चार बज गए
और
फूर्ति से लौट पड़ी वह
क्योंकि
घर में बच्चे
ग्लासभर दूध के लिए
सास-ससुर
चाय के लिए
करते होंगे
उसका इंतज़ार...




क्योंकि पेट भरा है तुम्हारा

कह सकते हो
अपशब्द
गवांर, जाहिल
कुछ ख़ास फ़र्क़
नहीं पड़ता मुझे
जनता हूं
इस्तेमाल हो रहा हूं
छला जा रहा हूं
फिर भी छलवा रहा हूं
ख़ुद को
क्योंकि
रोज़गार गारंटी योजना
देती है
महज़ सौ दिन का रोज़गार
पर भूख नहीं समझती
लग ही आती है
तब भी,
जब नहीं होती
रोज़गार की गारंटी
हां, अच्छा है कि
होते हैं चुनाव
हमारे देश में
जब-तब
कभी पंचायत के
कभी विधान सभा
और कभी लोकसभा के
चला जाता हूं
हर पार्टी के
उम्मीदवार की रैली में
कभी अलां पार्टी की
तो कभी फलां पार्टी की
उनके लिए वोट मांगने
पर ये सच का
केवल एक पहलू है
दरअस्ल, उस दिन की
रोटी मिल जाती है
मिल जाते हैं
दो दिनों की रोटी
के पैसे भी
जब वो मुझे छलते हैं
तो मैं भी उन्हें छल लेता हूं
थोड़ा-सा
पेट की ख़ातिर
अब मैं राह देखता हूं
कब बड़े होंगे
मेरे बच्चे
चुनई और मुनिया
और ऐसी रैलियों में जाकर
तब हम कर सकेंगे
और आठ-दस दिनों की
रोटी का बंदोबस्त
जानता हूं
ये दुष्चक्र है
पर भूख नहीं मानती
और फंसा हुआ हूं मैं इसमें
गरिया सकते हो मुझे
अनपढ़ हूं
ख़ुद से ऊपर
सोच नहीं पाता
पर तुम तो पढ़े-लिखे हो
तुम क्यों नहीं मांगते हिसाब
अपने आयकर का?
उन स्वार्थियों से
जिनकी रैलियों में
नज़र आता हूं मैं
अब ये न कहना
कि तुम भी व्यस्त हो
अपने परिवार के
भरण पोषण की जुगत में
क्योंकि ये भी जानता हूं मैं
इसीलिए तो नहीं गरियाता तुम्हें
हां, अब जब भी कोसो मुझे
एक बार ये भी सोचना
तुम्हारे लिए तुम्हारा
तो मेरे लिए मेरा
परिवार प्यारा है
हां, जब कभी तुम
हाथ बढ़ाओगे
मुझे इस दुष्चक्र से निकालने
मैं कुछ दिनों की भूख
और सह लूंगा
अच्छे दिनों की आस में
पर पहल
तुम्हें करनी होगी
क्योंकि पेट भरा है तुम्हारा...




ये प्रबुद्धता मुबारक

मैदान था युद्ध का
थी उंगलियों की सेना
ईंट से ईंट बज रही थी
और ईंट का जवाब
दिया जा रहा था
पत्थरों से
चाय की चुस्कियों के बीच
क्योंकि मैदान छद्म था
स्क्रीन और की बोर्ड वाला
और सूरमा कई थे
ताल ठोंकते
अपने विचारों को
बेहतर बताते
उम्दा इंसान होने का
पुरज़ोर दम भरते

**

रास्ता था आम सा
बिल्कुल असल
वहां दंगे में
दुर्घटना में
आपदा में
तड़प रही थी ज़िन्दगियां
दरकार थी मदद की
तो बनाए जा रहे थे
वीडिओज़
खींची जा रही थीं
सेल्फीज़
और दिया जा रहा था
प्रमाण
तकनीक से लैस
पाषाण हृदय
मशीन हो जाने का

**

टीवी पर
मेरी पार्टी तेरी पार्टी
से कम काली की
बहस जारी थी
मेरा नेता को तेरे नेता
से ज़्यादा सफ़ेद
दिखाने की तैयारी थी
उन्हीं की ढपली थी
उन्हीं का राग था
कुछ मिलीभगत थी
कुछ जुगाड़ था
मीडिया गरज रहा था
एडवर्टिजमेंट बरस रहा था
भ्रष्टाचार फल रहा था
आर्थिक विकास का ग्राफ़
ढल रहा था

**

स्कूलों में
पढ़ने की जगह
मर रहे थे बच्चे
कॉलेज में
आज़ादी की मांग थी
और छेड़ी जा रही थीं
लड़कियां
अबोध सी बच्चियां
बनाई जा रहीं थीं मां
उच्चवर्गीय लोगों
की कारों से
सड़क पर गिर रही थीं
बियर की बॉटल्स
मध्यमवर्गीय युवा
देर रात तक
थिरक रहे थे
बॉलीवुड के गानों पे
निम्नवर्गीय युवा
पार कर रहे थे
औरों के वॉलेट
ब्रांडेड कपड़ों की चाह में
और...
सोशल मीडिया पर
इस बात का हल्ला था
यह एक सौ पच्चीस करोड़
प्रबुद्ध युवाओं का देश है...




जश्न

रास्ता वही था
पर कुछ तो
अलग था
रास्ते के
हर पत्थर का
रंग था
कुछ बदला हुआ
चमकदार,
गर्मजोशी से भरा
रास्ते के दोनों ओर
दुकानें वही थीं
पर उनके रंग
चटक लग रहे थे
खिले, खिलखिलाते से
दुकानों पर
चाय-पकौड़ी बेचते
लोग वही थे
पर उनके चेहरों पर
चमक थी
रोज़ का
मुरझायापन नहीं
बीच-बीच में आनेवाले
पेड़ वही थे
पर यूं लग रहा था
उसकी अगवानी के लिए
हिल रहे हैं
उनके पत्ते
और उनकी छांव
केवल उसी के
पांव पसारकर
सुस्ताने की
राह देख रही है
और पत्तियां
अब भी टूटकर
बिछ जाया करती  हैं
बिल्कुल
कालीन की तरह
और तो और
कुछ पंछी  भी
फुदक रहे  हैं
यहां-वहां
आते-जाते राहगीर
इतने भी
आत्मकेंद्रित नहीं
खुद में डूबे हुए नहीं
जितने रोज़ाना उसे
दिखाई देते हैं
सूरज इतनी जोर से
चमक रहा है कि
आंखें खोलना मुश्क़िल
पर इतनी धूप में भी
कई बच्चे कर रहे हैं
धमाचौकड़ी
सार्वजनिक मैदान में
मिचमिचाती आंखों से
भी देख सकता है वो
कितना खुशनुमा  है समां
और ये भी कि
दिन का ये पहर
इतना मोहक होता है
न जाने कितने अर्से बाद
आज उसने देखी है
दोपहर की धूप
नौ से साढ़े छह
की नौकरी बजाते
उस आदमी की
हाफ-डे पर
घर वापसी
और ज़िन्दगी से
दोबारा मुलाक़ात   
का जश्न
बड़ा रंगीन था आज




घाव

ऑफ़िस को आते
ऑफ़िस से जाते
लोकल ट्रेन के
डिब्बों में या फिर
सफ़र करते हुए
बसों और रिक्‍शा में
जब कभी जाता है ध्यान
किसी महिला के चेहरे
या शरीर के खुले हुए
हिस्सों पर
और देखती हूं
किसी पुराने या ताज़े
घाव के निशान,
बुन लेती हूं
उसके घाव की
गहराई जितनी
गहरी कहानी,
उसके बदन पर
लिपटे हुए कपड़ों
और गहनों की
क़ीमत के हिसाब से
गढ़ लेती हूं
उसका परिवेश,
और हमेशा
प्रार्थना करती हूं
मेरे ताने-बाने में उतरी
इस कहानी में
उस पर होनेवाले
अत्याचार केवल
काल्पनिक हों,
पर जब पाती हूं मौक़ा
इन बातों को
उससे पूछने का,
फिर चाहे वो
सलीकेदार
लिबास में हो
या पैबंद लगी
पोशाक में,
अमूमन पाती हूं
व्यर्थ गई
मेरी प्रार्थना,
हां, यदि कभी
अपनी व्यथा कह
फूट-फूटकर
रो लेती है
कोई कहानी
तो
उसके दुख को
हल्का होता हुआ
महसूस करती हूं,
राहत की कुछ सांसे
ले भी नहीं पाती
कि कहीं और
किसी और
महिला के घावों पर
अटक जाती है नज़र,
हे ईश्वर!
मैं नहीं लिखना चाहती
ऐसी कहानियां,
तू इन घावों को
पूरने की सद्बुद्धि दे,
हर उस मानव को
जो इन घावों
का कारण है,


००००००००००००००००

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

सितारों के बीच टँका है एक घर – उमा शंकर चौधरी
Hindi Story: दादी माँ — शिवप्रसाद सिंह की कहानी | Dadi Maa By Shivprasad Singh
Hindi Story आय विल कॉल यू! — मोबाइल फोन, सेक्स और रूपा सिंह की हिंदी कहानी
 प्रेमचंद के फटे जूते — हरिशंकर परसाई Premchand ke phate joote hindi premchand ki kahani
मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — 'पगला गई है भागवती!...'
Harvard, Columbia, Yale, Stanford, Tufts and other US university student & alumni STATEMENT ON POLICE BRUTALITY ON UNIVERSITY CAMPUSES
ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
वैनिला आइसक्रीम और चॉकलेट सॉस - अचला बंसल की कहानी
मन्नू भंडारी की कहानी — 'रानी माँ का चबूतरा' | Manu Bhandari Short Story in Hindi - 'Rani Maa ka Chabutra'
तू तौ वहां रह्यौ ऐ, कहानी सुनाय सकै जामिआ की — अशोक चक्रधर | #जामिया