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कर्फ्यू: पुलिस इंस्पेक्टर चौ. मदन मोहन समर लिखित कहानी


कर्फ्यू

— चौ. मदन मोहन समर

आम जनता सिस्टम की उन नाकामियों को जिनका कारण राजनीति आदि होती हैं और जिनसे पैदा होने वाली समस्याओं से निपटारा पाना पुलिस की जिम्मेदारी हो जाता है, उसके लिए पुलिस को कटघरे में खड़ा करती है. मेरा ख़ुद का सबसे जिगरी दोस्त दिल्ली पुलिस में है, जिस कारण से अनेकों दफ़ा मैंने देखा है कि कैसी लाचारी झेलनी पड़ जाती है, सिस्टम में हमारे साथ-साथ पुलिस को भी. ऐसी कई बातों से रूबरू होने के लिए मध्यप्रदेश के वरिष्ठ इंस्पेक्टर चौ. मदन मोहन समर की यह कहानी 'कर्फ्यू' पढ़ी जानी चाहिए. शुक्रिया इंस्पेक्टर समर!

भरत एस तिवारी




कर्फ्यू

तवे की रोटी पलटते हुए चूल्हे में से लकड़ियां बाहर खींच कर जग्गो ने उन पर पानी डाला फिर एक नज़र दरवाजे की ओर देखा। दरवाजे पर किसी तरह की हलचल न पाकर उसने अपनी झुकती हुई कमर को दुनियां का बोझ समझ कर उठाने के लिए घुटनों पर हाथ रख कर सहारा लिया और खड़ी हो गई। आग बुझाने के बाद भी तवे मे इतना ताप तो रह ही जाता है कि आखरी रोटी पूरी तरह से सिंक जाए। फिर उसने एक पलटी रोटी को दी और खुद को खींचते हुए दरवाजे तक गई। दरवाजा भी क्या, पुराने सड़ रहे पटियों को जंग लगी कीलों के सहारे ठोक कर कुत्ता-बिल्ली के निर्बाध प्रवेश को रोकने के लिए बनाई गई ओट भर था। फिर वैसे भी दरवाजा तो घर के लिए होता है तथा घर का अर्थ कभी भी एक टूटा हुआ चूल्हा, छींदे (खजूर) की एक फटी हुई चटाई, पुराने पीपे (कनस्तर) में ठूंस कर रखी एक धोती, चार जगह से तुरपाई की गई कमीज़ व पैबंद लगे पायजामे से कतई नहीं होता।

दरवाजे पर जाकर जग्गो ने अपनी कमजोर हुई आँखों पर बरसों पुराना धागे से बंधें एक काँच के चश्मे की मदद से दूर तक देखा, लेकिन हरिया उसे आता हुआ दिखाई नहीं दिया। कुछ सोचा व फिर कमर को सीधी कर चूल्हे के पास आई, अधसिंकी रोटी को बचे हुए ताव पर रख कर सेंकने लगी। रोटी सिंक गई तो हमेशा की तरह सिंकी रोटियां लपेट कर रख दीं। एक बार फिर दरवाजे की तरफ देखा, इस बार भी हरिया के आने की आहट उसे सुनाई नहीं दी। हरिया का रास्ता देखते-देखते उसने कोने में रखी टिपरियां उठाईं तथा चाकू व रस्सी लोकर बचे हुए छींदे की झाड़ू बनाना शुरू कर दी।

आज-कल शहर के मिज़ाज काफी गर्म चल रहे हैं।पिछले सात साल से ही शहर ने अपना मिज़ाज बदला है।पहले ऐसी-वैसी कोई बात नहीं थी।सब मिल-जुल कर रहते थे।होली व ईद पर सब गले लगा करते थे।ढोल, मंजीरे व मादल की थाप से महीने भर पहले पता चल जाता था कि होली आ रही है। मगर अब शहर में पुलिस की गाड़ायों की शांय-शांय, गली-चौराहों पर तैनात ख़ाकी वर्दी में खड़े जवानों को हाथ में लहराते डंडे और नीली-चितकबरी वर्दी वाली नये किस्म की पुलिस के मार्च करने से लोगों को पता चलता है कि निकट भविष्य में कोई त्यौहार आ रहा है। फिर जैसे-जैसे त्यौहार पास आता जाता है, वैसे-वैसे शहर की धड़कनें बढ़ती जाती हैं। कंट्रोल की दुकान वाला मिट्टी का तेल देने में आनाकानी करने लगता है, पंसारी की दुकान पर टंगी रेट लिस्ट सिर्फ दिखावे के लिये रह जाती है, उसकी दुकान पर भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि पंसारी और ग्राहक किसी को भी हिसाब मिलाने की फुर्सत नहीं रहती।बाकी बड़े लोगों की बस्ती में रहवासियों को क्या-क्या चाहिये होता है यह तो जग्गी को नहीं पता , उसे तो बस नून, तेल, आटा और मिट्टी के तेल से मतलब है सो इसकी जानकारी उसे रखना पड़ती है।

आज भी शहर के मिज़ाज को देख जग्गी काफी बेचैन थी। घर में रखे पीपे में से पोटली निकाल उसे झटकार-फटकार कर निकले आटो से उसनें यह रोटियां बनाई थीं। कल के बचे छींदे से पाँच झाड़ू और बन गई थीं। बजार में इन झाड़ुओं के दस रुपये से ज्यादा कोई नहीं देता। उसे हरिया का इंतज़ार इसलिये भी था कि वह जल्दी से छींदा लेकर आ जाए तो वह पाँच-सात झाड़ू और बना कर बीस-बाईस रुपयो कमा कर दो-ढाई किलो आटा लाकर घर में रख ले ,ताकि कोई ऐसी-वैसी बात हो जाये तो टाईम-बेटाईम रोटियां पेट में झौंक कर जिंदा रहा जा सके।

अब तक हरिया को न आता देख वह मन ही मन बुदबुदाने लगी। सुबह का गया है पता नहीं अब तक क्यों नहीं लौटा। यार-दोस्तों संग खेलने लग गया होगा। माथे पर चिंता की रेखायों को ने जगह बना ली थी। वह हरिया के दुर्भाग्य पर विचार करने लगी। हरिया जग्गो का इकलौता पोता है। इस दुनियां में न तो हरिया के सिवाय उसका कोई और है व न ही जग्गो के सिवाय हरिया का कोई है। यह लड़का भी बदनसीबी अपने साथ लेकर पैदा हुआ था। दुनियाँ में पहली साँस भी ढंग से नहीं ले पाया था इसकी माँ चली गई थी। जग्गो ने रुई को फाहों से बकरी का दूध पिला-पिला कर बड़ा किया था। पढ़ने जाने की उमर आई तो बाप को सड़क खा गई।ट्रक भी ऐसी टक्कर मार कर गायब हुआ कि पता ही नहीं चला। पता चलता तो तो कुछ टका-धेला ही मिल जाता जो थोड़ी बहुत भरपाई कर बच्चे को काम आ जाता। पर किस्मत में यह भी नही था। अब बुढ़िया जग्गो की लाठी, सहारा, चिमनी सब कुछ यही हरिया ही था। हरिया सुबह-सुबह जाता छींदे काट कर ला देता, जग्गो झाड़ू बना लेती, उन्हें बेच कर दोनो प्राणी दो जून की रोटी खाकर जिन्दा रहने का स्वांग पूरा करते।


जग्गो की तंद्रा टूटी पुलिस की गाड़ी का सायरन सुन। सायरन की आवाज़ उसके कानों में पिघले हुए सीसे की तरह पड़ी। उसके दिल की धड़कन बढ़ने लगी। देखते ही देखते पुलिस वालों के जूतों की आहट भी बढ़ गई। चलो भागो.... ... दिखना मत... ... दे साल्ल्ले में... ... . तेरी तो... ... ... तड़ाक... .चटाक... ... ... .आदि अपशगुनी शब्द सुनाई देने लगे। जग्गो को जिस बात का डर था वही हुआ। लाऊड स्पीकर पर मुनादी होने लगी, सब अपने-अपने घरों में चले जाओ, कोई भी अपने घर से बाहर न निकले, इस आदेश का उल्लंघन करने वाले पर कानूनी कार्यवाही की जायेगी। मुनादी सुन कर जग्गो का दिल बैठने लगा।एक तो घर में खाने को दाना नहीं, दूसरा हरिया घर से बाहर पता नहीं कहां फंसा होगा। पुलिस के हत्थे चढ़ गया तो हाथ-पैर तो तुड़वायेगा ही जेल भी जायेगा। कौन सुनेगा उसकी कि वह तो गरीब छींदे तोड़ कर झाड़ू बनाने वाली बुढ़िया का इकलौता सहारा है। सड़क पर वह दंगाई ही माना जायेगा भले ही आंकड़े देने के लिये ही क्यों न काम आ जाये। कोई बड़ी बात नहीं किसी की छुरी तलवार य फिर पुलिस की गोली ही उसे निगल ले। डरी-सहमी जग्गो फिर से दरवाजे पर आ गई।

उसने बाहर का माहौल भांपने के लिये अपनी झुकती हुई कमर को सीधा कर चार कदम दरवाजे को बाहर निकालो ही थे कि, बाहर खड़े पुलिस के हेड साहब ने ललकारते हुए कहा- “अम्मा घर में घुस जा, कर्फ्यु लग गया है।”

“ए साब... ... ए... ... साब ! सुनो तो”-कहती हुई जग्गो हेड साहब की तरफ बढ़ी। लेकिन हेड साहब जब तक पलट कर देखे तब तक एक लाल बत्ती वाली गाड़ी वहां आ गई और वह हेड साहब सैल्यूट मारने के लिये उस गाड़ी के पास चले गये। जीप गाड़ी में बैठे साहब की अस्पष्ट सी आवाज उसे सुनाई दी। साहब कड़क लहजे में समझा रहे थे –“ जो भी घर के बाहर दिखे सख्ती से पेश आना है”। सख्ती शब्द सुन जग्गो की सख्त हड्डियां मानो ढीली पड़ने लगी थीं। हरिया अभी घर से बाहर ही जो था।

अब वह बौराई सी अपने घर में टहलने लगी।कई आसमान की तरफ देख कर हाथ जोड़ती, कभी दरवाजे की तरफ देखती। उसे पिछले कर्फ्यु की घटना याद हो आई, जब फरीदन के बेटे आरिफ को गोली लगी थी।गोली लगने के बाद भी वह बच तो गया मगर अब भी वह न जिन्दों में है न मुर्दों में। फरीदन आज भी उसे देख-देख कर रोती है और कर्फ्यु को कोसती है।

जग्गो का गला सूखने लगा था।वह पानी पीने के लिए घिनौची पर रखे मटके की तरफ बढ़ी ही थी कि दरवाजे पर धाड़-धाड़ की आवाज के साथ अरे... रे... ... रे... ... आह... ... की कराहट सुनाई दी। दरवाजे से लड़खड़ाता हुआ हरिया घर में घुस रहा था। पीछे-पीछे डंडा घुमाते हुए हेड साहब कह रहे थे- ‘’साला... ... बदमाश... जानता नहीं कि कर्फ्यु लगा है”।

हरिया की कराहट सुन और उसे पिटते देख जर्जर होती जग्गो में मानो बिजली प्रवाहित हो गई । वह दौड़ कर गई और झपट कर हरिया को भीतर खींच लिया। हरिया को सहलाते हुए रुआँसी होकर बोली-“क्यों रे कहां चला गया था, कितनी देर लगा दी। मेरे तो प्राण ही सूख रहे थे। तू घर से बाहर और बाहर कर्फ्यु, हे भगवान मेरे हरिया को कुछ हो जाता तो ? जैसे उसने भगवान को उलाहना देते हुए प्रश्न किया।

हरिया का हाँफना कम नहीं हुआ था। वह अम्मा... ... .अम्मा कहता हाँफ रहा था।जग्गो ने पानी का लोटा भर कर हरिया को पिलाया, तब जाकर हरिया संयत हुआ। सांस में सांस आई तो उसने दादी को बताया सुबह चौपाटी पर लोग चर्चा कर रहे थे कि कर्फ्यु लग जायेगा।यह जानकर उसने सोचा कि कुछ ज्यादा छींदे काट कर ले जाये ताकि दो चार दिन का इंतजाम किया जा सके। यह सोच कर वह तलाब के पार चला गया था।जब वह छींदों का गठ्ठर लेकर आ रहा था तब तक कर्फ्यु लग गया था। आनंद चौपाटी के पास पुलिस की गाड़ी उसके पीछे लग गई। पुलिस देख कर वह गठ्ठर रास्ते में फैंक कर भागा तो कुटते-पिटते जैसे-तैसे घर आ पाया।इतना बता कर हरिया रोने लगा और जग्गो की गोदी में सिर छुपा कर बोला- “अम्मा पुलिस वाले मुझे पकड़ कर ले जायेंगे तो तेरा क्या होगा”?

“नहीं बेटा नहीं... .कोई पकड़ कर नहीं ले जायेगा। हम कोई दंगाई थोड़े न हैं”- जग्गो ने दिलासा दिलाते हुये कहा।

“पर अम्मा पिछले कर्फ्यु में तो शफीक और मोहन दोने साथ-साथ कमा कर बाहर से आ रहे थे और पुलिस ने उन्हे पकड़ कर दंगा करने के जुर्म में बंद कर दिया था, फिर दोने छै महीने में छूटे थे। उन्होने कहां दंगा किया था, फिर भी दोनो दोस्त अंदर रहे थे’’- हरिया नें झुरझुरी लेते हुये कहा।

“भगवान हमारी रच्छा करेगा बेटा”- अन्ततः जग्गो ने होनी अनहोनी का जिम्मा भगवान पर छोड़ कर एक गहरी सांस ली।

धीरे-धीरे हरिया की पिंडली पर सूजन आने लगी थी, शायद हेड साहब का डंडा जरा जोर से उसके पैर पर लग गया था। उसे चलने में तकलीफ होने लगी थी। जग्गो ने चूल्हा जलाया, उसमें ईंट का एक टुकड़ा डाल कर गर्म किया, और कपड़े में लपेट कर उसके पैर की सिंकाई करने लगी। हरिया को जब कुछ आराम हुआ तो वह रोटी ले आई।पाँच में से दो रोटियां हरिया को खिलाईं, एक रोटी उसने खुद खाई, व दो रोटियां अनिश्चितता लिये आने वाले कल की चिंता करते हुए सम्भाल कर रख दीं। अब कर्फ्यु का कोई भरोसा नहीं था कि कब तक उठे।

रात गुजरी, पूरा दिन गुजर गया। सड़क पर पुलिस के बूटों की आवाज तथा एक के पीछे एक भागती लाल बत्ती वाली सायरन बजाती गाड़ियों के अलावा गली में न तो दूध वाले का “भोंपू” बजा था और न ही शंकर दादा की “चाट गरम” की आवाज सुनाई दी थी।धरमू काका की “गुडपट्टी” खाने के लिये आज बच्चों में धक्कमपेल नहीं हुई थी।और न ही गुलाब भैया “आलू, प्याज, मेथी, हराधनियां, अदरक” की गूंज के साथ निकले थे। हाँ, दो एक अखबार वाले बिल्ला लटकाये कुछ अखबार बाँट गए थे। दरवाजे की झिरी में से झांकने पर जहां तक निगाह जाती थी सारे दरवाजे बंद ही दिखाई देते थे। सुभद्रा बुआ आज गली में रोज की तरह सबका हाल-चाल पता करती हुई नहीं घूमी थी। लछमन मामा आज अपने पट्टे के चड्डा और बंडी पहने ओटले पर नहीं दिखाई दिए। खुदाबख्श ताऊ की “खुदा खैर करे” की चिर परिचित आवाज आज किसी ने नहीं सुनी थी। अलबत्ता कुछ छोटी उम्र के बच्चे कौतूहल वश किसी पुलिस वाले से दोस्ती गांठने की कोशिश में उसे पानी पिलाते नजर से टकरा जाते थे।साथ ही आसमान में मंडराती पतंगों की संख्या कुछ असामान्य इज़ाफा हो गया था।वैसे तो पतंगें किसी शहर की शांति व अमन चैन का प्रतीक होती हैं, किन्तु कर्फ्यु के तनाव युक्त व भयभीत माहौल में कैद लोगों ने शहर की शांति के स्थान पर अपनी आत्मशांति का मार्ग पतंगों में ढूंढ निकाला था, तथा अपने घुटन भरे समय का सदुपयोग पतंगे उड़ाने के लिये किया था। इस तरह पतंगों की प्रासांगिकता ही बदल गई थी।अब आसमान में चील-कौओं की तरह मंडराती पतंगें किसी शहर में लगे कर्फ्यु का संकेत लगने लगी हैं।

जग्गो ने शाम तक इंतज़ार किया। कर्फ्यु न तो इतनी जल्दी हटना था सो न हटा। घर में सिर्फ पाँच झाड़ू बनी हुई रखीं थीं। अगर कर्फ्यु हट जाता तो वह झाड़ू बेच आती।उसने विचार किया कर्फ्यु में हर चीज तो मंहगी हो जाती है, तो झाड़ू भी दो की जगह तीन रुपये में बिकेगी। मगर आज कर्फ्यु नहीं हटा।एक कोने में एक प्याज़ और तीन हरीमिर्च रखीं थीं, जिन्हे सिलबट्टे पर रगड़ थोड़ा नमक डाल उसने चटनी तैयार कर ली। कल की बची दोनों रोटियां लेकर हरिया से बोली- “ले खा ले”

हरिया ने थाली की तरफ देखा- दो रोटी व चटनी लिये दादी बैठी है।

“अम्मा तू नहीं खायेगी”?- हरिया ने जग्गो से सवाल किया।

“नहीं बेटा मुझे भूख नहीं है”- अपनी आँतों की कुलबुलाहट को अनदेखा कर और बिना दाँतों के चेहरे पर बरबस मुस्कुराहट बिखेरते हुए जग्गो ने कहा।

हरिया अपनी उम्र से ज्यादा बड़ा होकर बोला- “अम्मा भगवान सब ठीक करेगा, जल्दी कर्फ्यु हट जायेगा। तेरी झाड़ू भी बिक जायेंगी। तू रोटी खा ले।

‘’बेटा बुढ़पे में भूख मर जाती है”- इतना कह जग्गो ने अपने हाथों से कौर हरिया के मुंह में रख दिया तो ऐसा लगा जैसे उसके हृदय में धरती के पाँचो महासागर हिलौरे लेने लगे हों।

आज सूरज ने औपचारिकता भर पूरी की थी।सुबह पूरब से निकला, शाम को पश्चिम में चला गया।पुलिस वाले भी ड्यूटी करते-करते उकता चुके थे।उनकी वर्दी पर अब शुरुआती कड़कपन दिखाई नहीं दे रहा था, बल्कि झुंझलाहट और थकान के ग्राफ में बढ़ौतरी हो रही थी।शाम चार बजे एक गाड़ी आई थी, वह गिनती कर के कुछ पैकेट शहर भर में तैनात पुलिस वालों को बांट रही थी।पैकेट में चार-पांच पूरीयां और आलू की सब्जी थी।जग्गो ने गिरती हुई दीवार की झिरी में से झांक कर देखा था।हेड साहब और उसके मातहत सिपाही ने सड़क पर खड़े-खड़े पूरियां चबाई थीं व बगल वाले मकान से एक लोटा पानी मांग कर पिया और एक लम्बी डकार ली और चौकस हो गए थे।


व्यक्ति को आराम करने के नाम पर चार दिन तक घर से बाहर निकलने का मौका न मिले तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा वह लम्बी तान कर सोयेगा। लेकिन यदि आज़ादी को प्रतिबंधित कर दिया जाये तो आदमी को अपना घर ही पिंजरा लगने लगता है। इसी प्रतिबंध के चलते कुलबुलाहट होने पर रात में जग्गो की नींद खुल गई। रात काफी बीत चुकी थी। इन दिनों सप्तऋषि तारामंडल आधीरात के बाद उदय हो रहा था, जबकि इस समय सातो ऋषि आसमान में साफ दिखाई दे रहे थे। कुत्तों के भौंकने की आवाजे सन्नाटे को तोड़ रही थीं।बीच-बीच में दौड़ती पीली बत्ती की झकपक-झकपक एक अजीब सा खलल पैदा कर रही थी।बाहर ड्यूटी पर तैनात दोनों पुलिस वाले ठंड में ठिठुर रहे थे।सुबह अखबार वाले से लिए चार अखबार भी जल चुके थे। हेड साहब ने मातहत को कहीं से पुराना टायर का टुकड़ा लाने के लिए कहा, ताकि कुछ देर तक आग साथ दे सके। जग्गो से आखिर रहा नहीं गया, वह दो-तीन लकड़िया लेकर बाहर आई तथा हेड साहब से बोली- “साहब ये लकड़ियां ले लो, थोड़ी ठंड दूर हो जाएगी”

दोनो पुलिस वालों ने पहले एक निगाह जग्गो पर डाली, वे सोचने लगे इस विपरीत समय पर उनकी मदद करने को भगवान ने किसे भेज दिया है वर्ना तो कर्फ्यु में सबसे ज्यादा पुलिस को ही कोसा जाता है। न तो कोई हमारा दर्द समझता है न मजबूरी। और लोग कोसें भी क्यों न व्यवस्था बनाने के लिये पुलिस ही तो डंडे फटकारती फिरती है।

हेड साहब को उस कड़कती सर्दी में जग्गो किसी देवदूत से कम नहीं महसूस हुई थी, वह बोला-“ वाह ! अम्मा भगवान तेरा भला करे, अब ठंड दूर हो जाएगी”

साथ के सिपाही ने जग्गो से लकड़ियां लेकर आग में झौंक दी।

“क्यों साब ये कर्फ्यु कब तक चलेगा”?-जग्गो ने थोड़ा डरते हुए मगर हिम्मत से पूछा।

“अम्मा यह तो हमे खुद पता नहीं, बड़े लोग जानें”-बुझी-बुझी सी आवाज में हेड साहब ने कहा और दोनो हाथ आग की तरफ कर पंजों के सहारे उकड़ू होकर बैठ गया।फिर वह बुदबुदाते हुए बोला-“अरे अम्मा, इस रोज-रोज की मारा-मारी से तो हम लोग तंग आ गए हैं, सरकार एक बार छूट दे दे तो बतायें कैसे इन शरारती दंगाईयों को सुधारा जाता है”

हेड साहब की बात सुन कर सिपाही थोड़ा जोश में आया और बोला- “गेहूं के साथ घुन तो पिसेगा, लेकिन एक ढंग की कार्यवाही से बरसों लोग उत्पात मचाना छोड़ देंगे। आ, अम्मा तू भी ताप ले। सर्दी लग रही होगी तुझे भी।

सिपाही ने जग्गो को पिंजरे से बाहर निकल कर पंख फड़फड़ाने का अवसर दे दिया था। जग्गो भी डरते-डरते अपने ओटले पर बैठ कर आग सेकने लगी। सिपाही अपनी पीड़ा दबा नहीं सका, जैसे बांध फूटने के बाद नदी उफनती है वैसे ही उसकी झुंझलाहट उफनने लगी थी। कुछ इसी तरह के प्रवाह में बहते हुए वह कहने लगा- हद्द हो गई ड्यूटी की, कल सुबह से टंगे हैं, दो दिन बीत गये। घर में घरवाली बीमार पड़ी है न उसे देख पा रहे हैं न दवाई दे पा रहे हैं। आज बिटिया का जन्मदिन था, बेचारी दिन भर रास्ता ताकते-ताकते रो-रो कर सोई होगी। कल से भूत बने डटे हुए हैं न नहाये न धोये।ऐसी भी क्या नौकरी है”।

अपनी वरिष्ठता का ध्यान रखते हुए हेड साहब ने दिलासा देने वाले अंदाज में सिपाही को समझाते हुए कहा- “सुना है कल रामदीन पंडित, काज़ी हबीब खान, ज्ञानी संतोख सिंह, फादर डेनियल, कुछ पत्रकार और बड़े नेता कलेक्टर के साथ मीटिंग करने वाले हैं। कुछ तो हल निकलेगा इस कलमुंहे कर्फ्यू का।

हेड साहब का यह जुमला सिपाही का दिल नहीं बहला पाया था। एक आक्रोश भरे स्वर में जलती हुई लकड़ी, जिस पर राख जम गई थी को दूसरी लकड़ी से झटकार कर उसने ठंडी साँस खींचते हुए कहा- “अरे दीवान जी, इस मीटिंग से कुछ न होने का, यही सब तो जड़ हैं इस फसाद की। ये लोग आग ललायें, रोटियां सेकें, जले जनता और मरे पुलिस।

“साब जी, गरीब का तो सब जगह मरण है। घर में न आटा है न भाजी, कल कैसे दिन कटेगा पता नहीं। कुछ भी समझ में नहीं आता”-कुछ कुलबुलाहट भरे शब्द जग्गो के भीतर से निकले।

“हाँ अम्मा, अब जो सबके साथ वह तुम्हारे साथ’’- हेड साहब ने जग्गो को दिलासा दी।

तभी बत्ती की झकपक पास आती देख दोनो पुलिस वाले गाड़ी की तरफ बढ़े, लेकिन गाड़ी बिना रुके सीधी चली गई, शायद गाड़ी में मौजूद साहब की झपकी लग गई थी व उनका ड्रायवर बत्ती जला कर उनकी उपस्थिति सड़कों पर दर्ज करा रहा था। इधर जग्गो भी बत्ती की झकपक से डर कर भीतर चली गई थी।

सुबह जब सूरज फिर निकला तो शहर में कल जैसा ही सन्नाटा था। हाँ इतना जरूर हुआ था कि कुछ दूध वालों और अखबार वालों को कर्फ्यू पास दिया गया था। दूध वाले अपनी कमीज पर पास चिपकाये दूध बाँट रहे थे। अखबार वाले सामान्य दिनों से दुगनी प्रतियां लेकर सायकल दौड़ा रहे थे। लोग खिड़की में से झांक-झांक कर अखबार खरीदने का प्रयास कर रहे थे ताकि इनके पन्नो से ही शहर के बारे में कुछ ताजा जानकारी मिल सके। इन परिस्तिथियों में रष्ट्रीय य प्रादेशिक से ज्यादा स्थानीय अखबारों की विश्वसनीयता व इज्जत बढ़ जाती है।

दोपहर को सरकार के आला अफसरों ने एक मीटिंग ली। जनता के प्रतिनिधी झक्क सफेद कलफाये कपड़ों में तैयार हो गए। धर्म के ठेकेदार, समाज के इंजीनियर, राजनीति के खिलाड़ी, गरीबों के स्वयंभू चिकित्सक तथा प्रजातंत्र के जीर्ण-शीर्ण महल में लगे दीमक खाए चौथे स्तंभ सरकारी बत्तीधारी गाड़ियों में सवार होकर मींटिग हेतु कलेक्टर के सभागार में पहुंच गए। शहर कुलबुला रहा था।कर्फ्यू लगे दो रातें व पूरा दिन गुजरने के बाद आधा दिन और बीत गया था। लोग घरों में कैद होकर रह गए थे। शहर की हवा में अभी भी एक तरह की तल्खी नज़र आ रही थी। मीटिंग में सभी पक्षों ने दूसरे पर लानत-मलानत थोपी।प्रभारी मंत्री की टांग खिंचाई हुई। पुलिस को कोसा गया। सूचना तंत्र को फेल बताया गया।जोर-जोर से बोल कर भड़ास निकाली गई।लेकिन आखिर में निर्णय लिया गया कि, शाम को साढ़े तीन बजे से साढ़े पांच बजे तक महिलायों व बच्चों को लिए कर्फ्यू में ढील दी जायेगी। सोलह साल से अधिक उम्र का कोई भी पुरुष घर से बाहर नहीं निकलेगा। अब प्रश्न यह खड़ा हो गया कि किसी की उम्र सोलह साल य उससे कम है यह कैसे मानेंगे ? क्या कोई अपना जन्म प्रमाण पत्र गले में टांग कर बाहर आयेगा ? इस बड़ी विकट समस्या का समाधान निकाला गया कि जिनकी मूछें अभी नहीं आई हैं य सिर्फ रेखायें दिखाई दे रही हैं उन्हें सोलह साल माना जायेगा।अगर मूछधारी य शेविंग करके कोई बाहर आयेगा तो उसे कर्फ्यू के उल्लंघन का दोषी माना जायेगा। हालांकि इसके भी कारण हैं क्योकि यह नई-नई मूंछधारी जवानी ही जल्दी बहकावे में आकर किसी भी शहर को कर्फ्यू में झौंक सकती है। इस निर्णय के बाद मीटिंग खत्म हो गई।

लाउड स्पीकर लगी पुलिस की गाड़ियों से मुनादी होने लगी। साड़े तीन बजे से महिलायों व बच्चों को बाहर जाने की खबर ने उनके पंखों में जान भर दी। महिलायों के चेहरे खिल गये, बच्चे चहचहाने लगे जग्गो पर भी एक संतुष्टी की विचित्र चमक आ गई।

घड़ी की सुईयों ने जैसे ही साढ़े तीन बजाये, शहर जिंदा हो उठा। यूं लगा जैसे शीतल बयार गुलाबों से लदी किसी बगिया को शरारत कर छेड़ गई हो। एक बाँध सा फूट गया। भले ही महिलायों व बच्चों की ही सही चहल-पहल से सूनी गलियां मांग भरी सुहागन सी लगने लगीं। पंसारी की दुकान पर पर उसकी बेटियों व पत्नी ने तकड़ी बांट सम्भाल लिये।संजू की चक्की की धड़धड़ाहट सुनाई देने लगी। भाजी तरकारी वाली टोकनियां सिर पर रख कर निकल पड़ीं।

जग्गो भी रोटी की उम्मीद में अपनी पाँच झाड़ू लेकर बेचने चली गई। चौपाटी पर उसे दूर तक बिखरे हुए व कुचले पड़े छींदे दिखाई दिये। हरिया की मेहनत को यूं दम तोड़ कुचलते देख जग्गो के आँसू बह निकले।वह बजार में अपनी चिर-परिचित जगह पर जाकर झाड़ू बेचने के लिये खड़ी हो गई। भीड़ आ रही थी फिर जा रही थी। सभी अपनी जरूरत की वस्तुयें खरीद रहे थे। लोग भाजी-तरकारी, राशन-तेल पर टूट रहे थे। ऐसे में किसे फुर्सत थी कि वह सफाई का औजार झाड़ू खरीदने में समय व्यर्थ करे। वैसे भी इस माहौल में झाड़ू की कोई उपयोगिता भी तो नहीं रहती। वक्त के मिज़ाज के अनुसार किसी ने भी जग्गो से झाड़ू खरीदना तो दूर उसकी तरफ देख कर दाम तक नहीं पूछे। धीरे-धीरे समय बीतता जा रहा था। जग्गो अब आवाज लगा रही थी- “झाड़ू ले लो, झाड़ू” । आपाधापी के शोर में जग्गो की व्याकुलता भरी पुकार दब कर खो जाती थी।

अब तक जग्गो की एक भी झाड़ू नहीं बिकी थी। इतने में पुलिस की गाड़ी मुनादी करती निकल गई- “सवा पाँच बज गये हैं, कर्फ्यू में छूट का समय समाप्त होने को है, आप सभी अपने-अपने घरों को रवाना हो जायें। यह मुनादी सुन जग्गो का कलेजा बैठने लगा, वह घर कैसे जायेगी। झाड़ूयों को लाद कर वापस ले जाना आज उसे दुनिया का सबसे बड़ा बोझ महसूस हो रहा था। उसकी झाड़ू हमेशा तीन रुपये में बिकती थी। अगर कोई भाव-ताव न करता तो एक दो झाड़ू चार रुपये में भी बिक जाती। इसी हिसाब से वह पाँच झाड़ूयो के कम से कम पंद्रह-सोलह रुपये मान कर उन्हे बेचने व फिर उन पैसों से कुछ भाजी तरकारी तेल तड़का और आटा लेकर जाने की बेताबी में थी।

उसने आवाज लगाना शुरू की-“दो रुपये में झाड़ू’’ किन्तु किसी ने नहीं सुना।

वह फिर चीखी-“ एक रुपये में झाड़ू” मगर किसी पर कोई असर नहीं हुआ।

अब वह आर्त स्वर में बोली-“ एक रुपये में दो झाड़ू ले लो” लेकिन फिर उसकी पुकार शोर में खो गई।

दूर से पुलिस की मुनादी करती और सायरन बजाती आवाज से वहां मौजूद महिलायें और बच्चे अपने घरों को दौड़ लगाने लगे थे।

अब वह बैचेन होने लगी और दौड़ती हुई एक मकान के सामने पहुंची। गिड़गिड़ाते हुए बोली- “बाई जी, झाड़ू ले लो”

“नहीं चाहिये”-अंदर से एक बेरुखी सी आवाज सुनाई दी।

वह तेजी से बगल के मकान के दरवाजे पर गई और बड़ी आशा से आवाज लगाई-“बहन जी झाड़ू ले लो”। लेकिन यहां भी उसे निराशा भरा जवाब मिला। अब जग्गो का कलेजा बैठने लगा था। कर्फ्यू फिर से लगने का समय पल-पल नजदीक आ रहा था। उसके चूल्हे के जलने का एक मात्र सहारा उसके हाथों में रखी हुई पांच झाड़ू ही तो थीं। आज उसे लगा कर्फ्यू क्रूर ही नहीं होता गरीबों के पेट का दुश्मन होकर अट्टहास करता हुआ कोई दानव भी होता है। वह फिर एक मकान की दहलीज पर जाकर सिसकी- “झाड़ू ले लो बाई जी, जो मर्जी में आए दे देना” लेकिन मकान का दरवाजा नहीं खुला।

अब सामने के मकान की तरफ उसने एक सभ्रांत सी महिला को अपने घर की तरफ बढ़ते देखा। यही उसकी आशा की आखरी किरण थी। जग्गो यह मौका खोना नहीं चाहती थी। वह दौड़ती-दौड़ती महिला के पास गई। दोनो हाथ जोड़ कर बोली-“ बाई जी, पाँच झाड़ू हैं रख लो, बस पाँच रोटी दे दो, मुझे पैसे नहीं चाहिये”

वह अपनी बात पूरी कर पाती इतने में सायरन बजाती पुलिस की गाड़ी मुनादी करती हुई पास आ गई- “कर्फ्यू में छूट का समय खत्म हो गया है। आप लोग घरों में जायें, अन्यथा कानूनी कार्यवाही की जायेगी। सायरन बजा मुनादी करती पुलिस की गाड़ी को पास आते देख वह सभ्रांत महिला डर कर अपने घर में घुस गई व दरवाजा बंद कर लिया। जग्गो अवाक हो वहीं जड़वत खड़ी रह गई। सभी घरों के दरवाजे हड़बड़ी में बंद हो गये थे।

ड्यूटी पर तैनात पुलिस के जवान ने जग्गो से कहा- “अम्मा जल्दी से घर भाग जा, अब कर्फ्यू लग गया है”

पंडित जी पास के किसी मंदिर में आरती की तैयारी कर रहे थे। मस्जिद से मौलवी साहब द्वारा दी जाने वाली अजान गूंज रही थी। गुरूद्वारे में प्रकाश कर सुखमनी साहब का पाठ प्रारम्भ हो चुका था। गिरजे में भी घंटा बजा कर मोमबत्तियां जला दी गईं थीं। कर्फ्यू की छूट का फायदा उठा महिलायें घर का जरूरी सामान ले आई थीं। घरों में छौंक-बघार की गंध उठने लगी थी। पुलिस वालों की ड्यूटी भी बदली कर दी गई थी। फिर से कर्फ्यू लागू हो चुका था। सड़क पर कुछ कुत्तों के पिल्ले, थोड़े से आवारा सांड, नालियों से निकल कर आते सुअर, इक्के-दुक्के प्रभावशील पासधारी, ड्यूटी पर तैनात पुलिस वाले और शहर का जायजा ले रहे बत्तीधारी अफसर दिखाई दे रहे थे।

जग्गो कर्फ्यू द्वारा हरिया से छीन कर कुचले और लहूलुहान छींदों से पैर बचाते कांधे पर पाँच झाड़ू लटकाये चुपचार निढाल सी जा रही थी। शायद कर्फ्यू की बंदिशें अब उस पर कोई असर करने में असफल थीं। घर पर हरिया टुकुर-टुकुर दरवाजे को देख रहा था, इस आशा के साथ कि अम्मा रोटी लेकर आ रही है... ... ... 

चौ. मदन मोहन समर
सीनियर इंस्पेक्टर
16, श्रीहोम्स, चूनाभट्टी
कोलार रोड, भोपाल (मप्र)
सम्पर्क- 9179052222



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