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समीक्षा: अँधेरा : सांप्रदायिक दंगे का ब्लैकआउट - विनोद तिवारी | Review of writer Akhilesh's Hindi story by Vinod Tiwari

कथाकार अखिलेश की कहानी 'अँधेरा' 21वीं सदी की तान पर टूटने वाली लंबी कहानी है। "वजूद" "यक्षगान" और "ग्रहण" के साथ "अंधेरा" नाम से कुल चार लंबी कहानियों का संग्रह राजकमल से 2007 में प्रकाशित हुआ । 15 साल बीत जाने के बाद भी यह कहानी हमारे समय के अंधेरे को बयां करती है । इस कहानी पर आलोचक और संपादक विनोद तिवारी का यह विस्तृत समीक्षात्मक लेख हमारे समय के अंधेरे की शिनाख्त करता है । जिन्होंने कहानी नहीं पढ़ी है, उनके लिए यहां कहानी का लिंक भी दिया जा रहा है ।  ~ भरत तिवारी





अखिलेश को बारीक ब्योरों और उनके आधार पर व्यक्ति और समाज के सटीक मानसिक और सामाजिक प्रवृत्तियों को प्रकट करने में कमाल का हुनर प्राप्त है। 

 

अँधेरा : सांप्रदायिक दंगे का ब्लैकआउट 

विनोद तिवारी

(आलोचक, पक्षधर पत्रिका के संपादक। दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली में हिन्दी के प्रोफेसर।)


Majority does not mean large number, it means great fear. ~ Jean Francois Lyotard 


अखिलेश समकालीन हिन्दी कहानी के मन-मिज़ाज और उसकी एक अलग पहचान को गढ़ने, बनाने और बदलने वाले महत्वपूर्ण कथाकार हैं। नब्बे और उसके के बाद की हिन्दी कहानियों में चित्रित जो समकालीन राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य है, उसका बनता-बिगड़ता और बदलता-विकसित होता स्वरूप है, अखिलेश की कहानियाँ उस परिदृश्य की सजग गवाही देती हैं।  लॉन्ग नाइंटीज और उसके बाद सामूहिक सांस्कृतिक-चेतना, धार्मिक-सामाजिक प्रेम और सौहार्द्र की पारस्परिकताओं, मानवीय-संगति, ऊष्मा और संवेदना की मार्मिक जगहों को बचाने की अकारथ होती सामूहिक कोशिशों और लाचार, विवश होते मनुष्य की हताशा-निराशा और उदासी का जितना सच्चा और ईमानदार चित्रण अखिलेश करते हैं और यह चित्रण जिस तरह से हुआ है, वह विशिष्ट है। ऊसर, चिट्ठी, बायोडाटा, यक्षगान, जलडमरूमध्य, शापग्रस्त, ग्रहण अँधेरा आदि कहानियाँ इस बात का उदाहरण हैं। इन कहानियों में मध्यवर्गीय, निम्न-मध्यवर्गीय स्थितियों-परिस्थितियों के साथ अपने चरित्रों को अखिलेश जिस अंतरंगता  से, उनके आंतरिक और बाहरी रोज़मर्रा के संघर्षों को, प्यार से अधिक तकरार, प्रेम से अधिक वैमनस्य के यथार्थ को जिस अनुभव की आँच में रचते हैं, उससे कहानी अपने पूरेपन के साथ जो प्रभाव छोड़ती है, वह रचनात्मक होते हुए भी आलोचनात्मक होती है। अखिलेश की हर कहानी अपने समय-समाज की जटिल और बहुस्तरीय वास्तविकताओं की आलोचनात्मक रचना है। 

 प्रबल राष्ट्रवादी सरकारें एकल सांस्कृतिक नजरिए पर आधारित सांप्रदायिक ज़हर को जहाँ एक ओर धर्म और भक्ति के चरम उपभोक्क्तावाद के सहारे बहुसंख्यक की आस्था और विश्वास को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्यबल और पुलिस-बल के द्वारा अल्पसंख्यक लोगों के भीतर दहशत और भय पैदा कर उन्हें उनके सारे नागरिक अधिकारों से  वंचित करती है जो एक बहुधर्मी-बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में समान रूप से सभी नागरिकों के लिए बनाया गया है और संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है। 

‘अँधेरा’ अखिलेश की सभी कहानियों में अलग से ध्यान आकर्षित करती है। क्योंकि अखिलेश पहली बार सांप्रदायिकता और उसकी नृशंसता और बर्बरता को अपनी कहानी का विषय बनाते हैं। इसके पहले ‘जलडमरूमध्य’ जैसी कहानियों में सांप्रदायिक हिंसा के कुछ सांकेतिक बिन्दु जरूर मिलते हैं। सहाय जी का चिरैयाकोट छोड़ कर अपने गाँव आकर बसने के निर्णय के पीछे हिन्दू-मुस्लिम दंगे को सांकेतिक रूप में दिखाया गया है। पर, ‘अँधेरा’ एक प्रेम कहानी होते हुए भी जिस तरह से सांप्रदायिक दंगे को कथा का केंद्र बनाती है, उस तरह से इसके पहले उनकी किसी कहानी में ‘सांप्रदायिकता’ केंद्र में नहीं है। ऐसा नहीं है कि सांप्रदायिक दंगे को लेकर पहले कहानी और उपन्यास नहीं लिखे गए हैं। बल्कि यह कहा जाय कि आज़ादी के बाद के हिन्दी और उर्दू कथा साहित्य का महत हिस्सा साम्प्रदायिक दंगों पर ही केंद्रीभूत है तो अनुचित नहीं होगा। लेकिन धीरे-धीरे सातवें-आठवें दशक तक यह प्रवृत्ति थमती हुई दिखती है। फिर से नवें दशक में हुए 84 के दंगे को देखा जा सकता है। लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद मुंबई, गुजरात आदि जगहों पर सियासत और मज़हब के गँठजोड़ का जो विनाशकारी शक्ति-प्रदर्शन हुआ वह भुला दिए गए, धुंधले हो चुके अतीत की जैसे कई गुना चमक के साथ पुनर्वापसी थी। जो आज तरह-तरह के नफरती कृत्यों और अमानवीय कारनामों में हम सबके सामने है। डर, भय, आतंक का अँधेरा कायम रहे इसलिए आजकल यह सब उजाले में होता है। 


सांप्रदायिकता के इतिहास की पड़ताल करने पर जो एक बात प्रमुखता से निकल कर सामने आती है, वह है उसको वृहत्तर और दीर्घकालिक धार्मिक-राजनीतिक लाभ की परियोजना के रूप में उपयोग में लाना। सांप्रदायिक दंगे हमेशा से ही इस धार्मिक-राजनीतिक परियोजना को जिलाए और चलाये रखने के औज़ार की तरह उपयोग में लाए जाते हैं। वस्तुतः धर्म और राजनीति के अर्थ जैसे-जैसे बदलते चले गए, वैसे-वैसे सत्ता, शक्ति और हिंसा के स्वरूपों और आयामों में भी बदलाव दिखाई देने लगते हैं। जब जाति, धर्म, संस्कृति आदि सामूहिक मानवीय निर्मितियों को वर्चस्व और राजनीतिक सत्ता-शक्ति का हथियार बना लिया जाता है तो इनके आधार पर राजनीतिक हिंसा को कभी न्याय के नाम पर, कभी जातीयता की रक्षा के नाम पर तो कभी राष्ट्र की सुरक्षा-संरक्षा के नाम पर तो कभी धार्मिक-गौरव और सर्वोच्चता की पुनर्स्थापना के नाम पर वैध रूप देने का प्रयास किया जाता रहा है। इसके लिए शासन-सत्ता के प्रवक्ताओं, सरकारी इतिहासकारों, दार्शनिकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों द्वारा जो व्याख्याएँ, विचार, मत, तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं, उसे ध्यान से देखा जाय तो वे ‘स्ट्रामैन फैलेसी लॉजिक’ से संचालित होते हैं, जिसके सहारे हर तरह के कृत्य को वैध ठहराए जाने की कोशिश की जाती है। जैसे, कहीं भी सांप्रदायिक दंगे फैलते हैं तो सबसे पहला तर्क यह दिया जाता है कि हिंसा की शुरुआत हमारी तरफ से नहीं उनकी तरफ से हुआ, फिर हमें अपने बचाव में उतरना पड़ा। क्रिया की प्रतिक्रिया तो होनी ही थी, आदि-इत्यादि। तथाकथित वैज्ञानिक सोच वाला व्यक्ति होगा तो न्यूटन के तीसरे नियम को भी उद्धृत कर देगा। ध्यान देने वाली बात है कि इन सबके पीछे संस्कृति को बचाए जाने की दुहाई बार-बार दी जाती है। प्रेमचंद ने तो लिखा ही है कि ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति का खोल ओढ़ कर आती है’। इसलिए हमें सावधानी के साथ यह देखना-समझना चाहिए कि संस्कृति-संरक्षण के नाम पर जो एक खास तरह की ‘ज्ञान-मीमांसा’ तैयार करने की कोशिश की जाती है उसका उद्देश्य क्या है। 

हमें यह समझना चाहिए कि “यूरोप केन्द्रित नवजागरण से संस्कृति को बचाने की चिंता वाजिब है, लेकिन संस्कृतियों के भीतर की तानाशाही का सवाल भी कम गंभीर नहीं है। क्या संस्कृति सिर्फ रहन-सहन के तरीके तक सीमित है और सहअस्तित्व के लिए इन पर सवाल न उठाने की वकालत करना हम सबके लिए ठीक होगा? लेकिन संस्कृतियाँ संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करने का तंत्र भी हैं। ये केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि राजनीतिक, सौंदर्यशास्त्रीय, आध्यात्मिक और नैतिक संसाधनों को भी नियंत्रित करती हैं। इन्हीं संस्कृतियों के भीतर बहुत से लोगों की सहभागिता की उपेक्षा की जाती है। लोगों को शक्ति-संरचनाओं की ‘स्वाभाविक’ और ‘सामान्य’ स्वीकृति के लिए तैयार किया जाता है। विभिन्न स्थितियों में लोगों की प्रतिक्रिया को उनकी इच्छा की अभिव्यक्ति कहा जाता है, जबकि वास्तव में यह प्रतिक्रिया वर्चस्वशाली नजरिए से परिचालित होती है।” (सांस्कृतिक हिंसा के रूप – राजराम भादू, प्राकृतिक भारती अकादमी, जयपुर, पृष्ठ-93)  तात्पर्य यह है कि हिंसा के संरक्षण की जो तार्किक और वैधानिक कोशिशें होती हैं, दरअसल उन्हीं प्रयासों में ही हिंसा को बनाए और जिलाए रखने की रणनीति काम करती है। यह धार्मिक और राजनीतिक दोनों शक्तियों द्वारा किया जाता है। कभी, धार्मिक फायदे के लिए तो कभी राजनीतिक फायदे के लिए, तो कभी दोनों का गँठजोड़ एक दूसरे के फायदे के लिए हो जाता। 

राष्ट्र की आधुनिक संरचना और व्यवस्था में यह गँठजोड़ लोकतांत्रिकता के तकाजे से टूट जाना चाहिए था पर ‘राष्ट्र-राज्य’ अपनी जरूरतों के लिए इसे येन-केन-प्रकारेण बनाए रखने की पूरी कोशिश करता दिखता है। इसी का नतीजा है कि पिछले एक-दो दशकों में राष्ट्र-राज्य द्वारा हिंसा के समर्थन और संरक्षण के तर्क और आधार बहुत तेजी से बदले और विकसित हुए। इस विकसित तंत्र में सांप्रदायिकता, उससे जनित हिंसा और बर्बरता के वैधीकरण और औचित्य निर्माण की एक सुनियोजित शृंखला रची जाती है जिसके चलते धार्मिक-सांस्कृतिक आधारों पर बहुत ही आसानी से बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक के बीच गर्व, गौरव, नफ़रत, भय, आतंक आदि का वातावरण बनाया जा सके। सांस्कृतिक-धुंध फैलाने के लिए सबसे पहले लोगों के दिलो-दिमाग पर कब्ज़ा जरूरी होता है। धर्म रूपी अफ़ीम इसका सबसे सबल और आजमाया हुआ नुस्खा रहा है। इसमें विज्ञान के नाम पर तकनीकी का संग-साथ हो जाय तो फिर क्या कहने। आज सांप्रदायिक-हिंसा का जो साँचा है उसका नवीकृत रूप तरह-तरह की तार्किक-वैधताओं के साथ धर्म के बाज़ार में प्रचारित-प्रसारित होता है। यह “हमारे नैतिकता के नियमों और विचार के ढांचे को बदल देता है। इस साँचे में ढाला हुआ मन बंदूक की नाल में दुर्गा माई की चुनरी बाँधकर यह सोचता है कि बंदूक की नाल से निकली हुई गोली दुर्गा जी के बाण की तरह अमोघ होगी और वह आध्यात्मिक प्रकृति की होगी। ऐसे साँचे में ढाला हुआ मन अहिंसा के मूर्तरूप गांधी की हत्या करके सोचता है कि वह राष्ट्र का उद्धार कर रहा है।(हन्ना आरेंट : हिंसा का उत्खनन – अंबिकादत्त शर्मा और विश्वनाथ मिश्र, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर, पृष्ठ-73) हिंसा और बर्बरता का ऐसा घुप्प अँधेरा फैलाया जा सके जिसमें प्रेम और भाईचारे की शिनाख़्त मुश्किल हो जाये। इस अँधेरे को फैलाने में नव-उदारवादी व्यवस्था तथा संचार और तकनीकी माध्यमों के विकास ने और सुविधाजनक बना दिया। भूमंडलीकरण से पूरी दुनिया में धर्म और संस्कृति के ताने-बाने में बड़े पैमाने पर रद्दोबदल हुए। नब्बे के बाद दुनिया भर में राजनीति और सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण और वर्चस्व का एक नया दौर शुरू होता दिखता है। इस भूमंडलीकरण ने भारतीय राजनीति में भी दो तरह की प्रवृत्तियों को फलने-फूलने के लिए बहुत ही उर्वर जमीन मुहैया कराया। पहला, अकूत लूट, खसोट, बेईमानी और भ्रष्टाचार की संस्कृति का एक अबाध और निरापद तंत्र (system) के रूप में विकास और दूसरा, धर्म और सम्प्रदाय आधारित कट्टर मानसिकता से संरचित साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद का उभार, विकास और उसका प्रबन्धन। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर इस तरह का सरकारी भ्रष्टाचार और राष्ट्रवाद के नाम धार्मिक-साम्प्रदायिक भावनाओं को भड़काकर एक खास तरह के साम्प्रदायिक-उन्माद को रचने की राजनीतिक मोर्चाबंदी इससे पहले नहीं देखी गयी। यह साम्प्रदायिक-उन्माद एक तरह से आर्थिक उदारीकरण के बाद विकसित उस राजनीति की ही अनुकृति है जिसने ‘उपभोक्ता’ और ‘भक्त’ दोनों को एक कर दिया। इसमें, भक्ति चाहे धर्म के प्रति हो, चाहे बाज़ार के प्रति, चाहे ईश्वर के प्रति हो चाहे राष्ट्र के प्रति, ‘कंज्युमरिज्म’ में कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘अँधेरा’ कहानी की अगर ‘क्लोज रीडिंग’ करेंगे तो कहानी की भीतरी तहों में इस बात के अनेक उदाहरण मिल जाएँगे। हिन्दू गौरव की रक्षा के लिए मुस्लिम बस्तियों को जलाते और मुसलमानों को सबक सिखाने के राष्ट्रीय कर्तव्य को पूरा करने के उद्देश्य से निकले एक दल में प्रेमरंजन और रेहाना फँसे हुए हैं। सघन पूछताछ हो रही है। किसी तरह अपनी होशियारी से रेहाना उन्हें यह विश्वास दिलाने में सफल हो जाती है कि वह प्रेमरंजन की बहन ज्योति मिश्रा है। हिन्दू है। मुसलमान नहीं है। ‘हर-हर महादेव’ का सामूहिक जयघोष करता हुआ दंगाई दल आगे बढ़ जाता है। तभी उनमें से एक भक्त लौट कर रेहाना के काले चश्मे को देखता है और दाँत निपोरते हुए चश्मा मांग लेता है और लगाकर इतराता हुआ फिर उसी दल में जाकर शामिल हो जाता है। 

अखिलेश को बारीक ब्योरों और उनके आधार पर व्यक्ति और समाज के सटीक मानसिक और सामाजिक प्रवृत्तियों को प्रकट करने में कमाल का हुनर प्राप्त है। उनकी भाषा की रचनात्मकता इसमें  उनका पूरा साथ देती है। कहानी का शुरुआती पैराग्राफ ही इसका सबसे प्रमाण है। प्रेम में पड़ा व्यक्ति अपने प्रेमी के लिए क्या कुछ नहीं करना दिखाना चाहता। बात जब प्रेमिका की पसंदगी-नापसंदगी की हो तब पूछना ही क्या? सुल्तानपुर (उ. प्र.) की कादीपुर तहसील के रहने वाले, बजरंगबली के भक्त प्रेमरंजन को अपनी दाढ़ी से बहुत लगाव था। पर उसकी प्रेमिका रेहाना को दाढ़ी पसंद नहीं। अंततः रेहना की इस शर्त पर कि वह उसके साथ अकेले घूमने तभी चलेगी जब वह क्लीन शेव्ड होगा, उसे अपनी दाढ़ी कुर्बान करनी पड़ती है — 

“आखिर क्या करता, हिम्मत बटोरकर 'बांबे हेयर कटिंग सैलून' में घुसना पड़ा था। अनवर नाम का छोटे कदवाला वह हज्जाम गवाही दे सकता है कि सफाचट में अपने रूपांतरण की क्रिया के समय प्रेमरंजन ने आँखें मूँदकर दाँत भींच लिया था और साँसें रोक ली थीं। बाद में आईने में देखकर उसने कराह भरी थी और पुनः आँखें मूँद ली थीं। उसे अपना चेहरा बहुत छोटा, रूखा, कठोर तथा घाघ लगने लगा था। वह अनुभव कर रहा था कि उसका समस्त तेज लुट गया है।” माबदौलत प्यार में, स्वाभिमान, तेज़, अहंकार जैसे पौरुष-भावों की जगह क्योंकर हो। धीरे-धीरे “कुछ दिनों बाद उसका चेहरा क्लीन शेव्ड का अभ्यस्त हो गया, और उसे अपना यह रूप भाने लगा। अब रेहाना की अपनी शर्त पूरी करने की बारी थी। रेहाना ने कहा था कि यदि वह दो माह लगातार क्लीन शेव्ड रहेगा तो तीसरे महीने के पहले हफ्ते में किसी रोज वह उसके साथ घूमेगी लेकिन यदि प्रेमरंजन शर्त हार गया तो रेहाना उससे कभी नहीं बोलेगी। बहरहाल नतीजा आ चुका था। प्रेमरंजन शर्त जीत चुका था और अब उसे उस दिन का इंतजार रहने लगा था जब रेहाना उसके साथ घूमने चलेगी...। आज वह दिन आ गया था। सबसे खास बात यह थी कि आज उसके पास रंगबिरंगी भाँति-भाँति की परेशानियाँ तो दूर की चीज, कोई भी परेशानी नहीं थी। उसे रेहाना से बुद्धा पार्क में मिलना था और उसके साथ देर तक घूमना था।” 

कहानी में ‘बुद्धा पार्क’ की प्रतीकात्मकता कम मानीखेज नहीं है। युद्ध, आतंक, दंगे, हिंसा जैसे कृत्यों को ऐसे ही प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। जबकि बुद्ध, गांधी जैसे महात्मा घृणा, नफरत, हिंसा के खिलाफ़ जीवन भर लड़ते रहे। बुद्ध की करुणा और गांधी की अहिंसा के निहितार्थ क्या क्रूरताओं और हिंसात्मक कार्यवाहियों के लिए आवरण मात्र रह गए हैं? 

‘अँधेरा’ विजातीय नहीं बल्कि अंतर्धार्मिक प्रेम-कथा है। यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाला ब्राह्मण हिन्दू लड़का अपने साथ ही पढ़ने वाली एक मुस्लिम लड़की से प्रेम करता है। पर, जिन परिवारों और समाजों प्यार को ही जिस नज़र से देखा जाता हो वहाँ इस प्रेम की स्वीकृति के बारे में सोचा भी कैसे जा सकता है। हालाँकि, अखिलेश कहानी में इस तनाव की रचना ही नहीं करते हैं, सिवाय एक दो जगहों के, जहाँ कहानी का नायक प्रेमरंजन खुद से बात करते हुए, जैसे खुद को ही इसके लिए तैयार कर रहा हो — 

“अरे ऐसे माता-पिता इस्लाम धर्म की रेहाना को अपनी बहू कैसे कबूल करेंगे जो मुसलमानों के लिए घर में अलग ग्लास और प्लेट रखते हैं। जो लोग कटहल और प्याज से परहेज करते हैं तथा बैगन को देखकर भड़कते हैं वे बिरयानी और गोश्त की शौकीन से क्या खाक अपना बेटा ब्याहेंगे। वह मन ही मन बड़बड़ाया – ‘पर मैं करूँगा ब्याह। तुम मुझे कम मत समझो रेहाना, अपनी पर आ गया तो माँ-बाप को भी एक दिन बिरयानी खिलाकर रहूँगा।' उसने तय किया कि इस बार छुट्टियों में घर जाने पर परिवार, परिचितों, रिश्तेदारों के बीच धार्मिक भेदभाव के विरुद्ध और मांसाहार के पक्ष में वातावरण बनाएगा।” शुरू-शुरू में तो उसके खुद के विचार मुसलमानों को लेकर दकियानूस और वाहियात किस्म के थे। मसलन कि मुसलमान के घरों का बना हुआ कुछ भी नहीं खाना चाहिए, क्योंकि वे लोग खाने को पहले जूठा करते हैं तब किसी को खिलाते हैं।“ 

इस ‘जूठ’ वाले  प्रसंग को कहानीकार यूनिवर्सिटी कैंटीन में रेहाना द्वारा लाए गए टिफिन को प्रेमरंजन द्वारा अपने पेट खराब होने का बहाना बनाकर खाने से मना कर देने और बाहर निकल कर एक ठेले पर बिक रहे दही बड़े और छोले खाते हुए दोस्त द्वारा पकड़े जाने पर यह कहना कि — 

''रेहाना के बुरा मान जाने का इतना ख्याल है तो उसकी लाई चीजें खा लेते। यकीन मानो, इस ठेले के दही बड़ों और छोले से खराब कतई नहीं लगता। दोस्त ने फब्ती कसी। नहीं... नहीं... वो बात नहीं है... बात ये है कि... मुसलमान जो चीजें खिलाते हैं उसे जूठा कर देते हैं...।'' 

तमाम कसमों-वादों के बावजूद उस दोस्त ने प्रेमरंजन की इस दकियानूस मान्यता को सबके सामने रख देता है। रेहाना को इससे बहुत गहरा धक्का लगता है। प्रेमरंजन से वह खींच-खिंची सी रहने लगती है। प्रेमरंजन को जब इसका एहसास होता है वह खुद को धिक्कारने लगता है – 

“मैं कितना मूर्ख, दकियानूस और चूतिया हूँ कि अपने देश के अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में ऐसे विचार रखता हूँ। इस संबंध में उसने गहराई से विचार किया और पाया — 'एक जनेऊधारी हनुमान भक्त पिता और प्रति सप्ताह दो उपवास रखनेवाली माँ की औलाद मैं हो भी कैसा सकता हूँ। औरतों के साथ अत्याचार करनेवाले व्यभिचारी बाबा का पोता और शूद्रों पर अत्याचार के लिए विख्यात परबाबा का परपोता मैं प्रेमरंजन निहायत कमीना इनसान नहीं बनूँगा तो क्या बनूँगा।’ वह पश्चाताप की अग्नि में भस्म होने लगा —  हे भगवान, ये मुझसे क्या हो गया...।'' वह हर तरह के जतन करता है कि रेहाना उसकी गलती को माफ कर दे — ''रेहाना खुश हो जाओ और मुझे माफ कर दो... देखो एक गलती दुश्मन की भी भुला दी जाती है... और मैं तो तुम्हारा दोस्त... और अचानक ही उसका वह वाक्य वहीं छूट गया, वह नामालूम किस आवेग में दूसरा वाक्य कहने लगा – रेहाना तुम्हें माफ करना ही पड़ेगा। तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ। तुम्हारी गैर मौजूदगी में भी तुम्हें भूल नहीं पाता हूँ। रेहाना मैं फिर कह रहा हूँ कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ। जूठा क्या तुम जहर भी खिलाओगी तो मैं खाऊँगा।'' 

और अंततः माफ़ी के सबूत के तौर पर रेहाना उसका चुंबन लेकर, उसके होंठों को अपने होंठों में भरकर उसके अंदर जो ज़हर उतारा, उस ज़हर ने प्रेमरंजन की नस-नस में ऐसा असर डाला कि वह अक्सर रेहाना से याचना करने लगा — 

''मुझे एक बार फिर अपना जूठा खिला दो। मैं रोज तुम्हारा जूठा खाना चाहता हूँ। लेकिन उसके हजार आग्रह के बावजूद रेहाना पसीजी नहीं। एक बार की ही सही, प्रेमरंजन के पास अनोखी स्मृति थी। मौके-बेमौके वह अनोखी स्मृति याद आती और तब वह सनसनाहट से भर जाता। जैसे तेज हवा चलने पर बिजली के तार हिलते हैं और आवाज करते हैं, उसी तरह वह अपने अंदर महसूस करता। उसे लगता कि उसके अंदर ढेर सारे बिजली के तार हिल रहे हैं — तेज हवाएँ चल रही हैं — और आवाजें हो रही हैं। और यह भी कि उसके भीतर बिजली दौड़ रही है। नतीजतन वह पुनः कातर स्वर में अनुरोध करता — ''क्या अब मुझे कभी भी तुम्हारा जूठा नहीं मिलेगा?'' 

इस एक चुंबन से, दोनों का प्रेम समाज के लिए जैसे दृढ़ हो गया हो। 

धीरे-धीरे रेहाना और प्रेमरंजन एक-दूसरे के नजदीक आते गए। खूब अच्छे से एक दूसरे को दोनों जानने-समझने लगे हैं। फिर क्या रेहाना को उसके साथ अकेले घूमने के उस वादे की याद प्रेमरंजन उसे दिलाता है जो क्लीन शेव्ड होने की शर्त पर दिया गया था। दोनों तय करते हैं कि अगले दिन बुद्धा पार्क में मिलते हैं। फिर-फिर साथ-साथ घूमेंगे। पर, मुसलमानों के लिए वह दिन इस कदर हत्या, लूट, आगजनी का आतंक बन कर आएगा, रेहाना को भी कहाँ पता था। वह तो मिलने की उतावली में, समय से पहले पहुँच जाने पर टाइम पास करने के लिए बुद्धा पार्क के पास ही एक साइबर कैफे में बैठे प्रेमरंजन को, जब दुकान मालिक द्वारा शटर गिराने और एक लड़की द्वारा आपत्ति जताने और पूछने पर डर के मारे हकलाते हुए यह कहना कि 'दंगा होनेवाला है। समझ लो शुरू हो चुका है, बहुत भारी दंगा’, सुनाई देता तो जैसे उसके शरीर का खून ही सूख जाता है। वह किसी तरह चेतना में लौटता है —  

“अब प्रेमरंजन गिड़गिड़ाया था — मुझको यहाँ से जाने दीजिए। कृपया आप ताला खोलें, शटर उठाएँ ताकि मैं बाहर निकलूँ। प्रेमरंजन को लग रहा था कि रेहाना बुद्धा पार्क पहुँच जाएगी या कहीं दंगे में फँस जाएगी। दोनों ही स्थितियों में उसे उसके पास रहना चाहिए। इस बार उसकी आवाज में अधिक कातरता थी — प्लीज शटर खोल दीजिए, मैं जाऊँगा।'' अंततः अपने पिता की तबियत खराब होने और आख़िरी साँसें गिनने का बहाना बनाकर वह किसी तरह से उस साइबर कैफ़े के मालिक की मदद से पिछले दरवाजे से निकलने में सफल हो पाता है। उसका और साइबर कैफ़े के मालिक का हिन्दू होना इस मदद में विशेष कारण रखता है। इसे कहानीकार रेखांकित करना नहीं भूलता। यहाँ तक कि साइबर कैफ़े के मालिक की यह सीख भी कि अगर उसे अपने घर पहुँचने में किसी तरह की मुश्किल पैदा हो तो वह इस इलाके के थाना-प्रभारी को जरूर बताए, वह पूरी मदद करेगा, क्योंकि वह भी हिन्दू है – “थानेदार भी हिंदू है। बड़ा जालिम इनसान है भइया वह। दंगों में 'उन' सालों की तो बजाकर रख देता है। उससे अपने पिता की तबीयत के बारे में बताना, वह जरूर तुम्हारी मदद करेगा।'' 

प्रेमरंजन जल्दी से जल्दी बुद्धा पार्क पहुँच जाना चाहता है। उसे डर है कि कहीं रेहाना दंगे का शिकार न हो जाय। इस बदहवासी और भय के मारे उसे बहुत तेज़ पेशाब की तलब हो आती है। वह आस-पास की हर जगह उस जगह को पेशाब के लिए उपयुक्त जगह की नज़र से देखता है, पर उसे निराशा ही हाथ लगती है। ऐसे प्रसंगों के चित्रण में अखिलेश की जो कल्पना-शक्ति होती है, भाषा का जो विट होता है,  व्यवस्था के प्रति जो आक्रोश होता है, उस आक्रोश को अभिव्यक्त करने की जो व्यंग्य-विद्रूप शैली होती है, वह देखने लायक है -उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई। वह एक चौराहा था जहाँ महाराणा प्रताप की घोड़े पर सवार एक मूर्ति थी। इसे भगवान भक्त सरकार ने अभी हाल में बनवाया था। निश्चय ही यहाँ पेशाब करने की गुंजाइश नहीं थी। वैसे भी दंगा तो नहीं लेकिन एक बदहवासी, अफरातफरी माहौल में थी। चारों तरफ डर और संशय रेंग रहे थे...। ऐसे में उसको पेशाब लग गई थी। हालाँकि वह रास्ता चलता जा रहा था लेकिन पेशाब करने लायक स्थान भी तलाशता जा रहा था। जाहिर है वह स्थान अभी तक मिला नहीं था। वह फिर एक चौराहे पर था। यहाँ भी मूत्रालय नहीं, किसी रणजीत सिंह जू देव की तलवार लहराती मूर्ति थी, इसे भी भगवान भक्त सरकार ने बनवाया था। प्रेमरंजन के हृदय से गाली निकल गई — ''ये साली कैसी गधा सरकार है जो मूर्तियाँ बनवाती है, मूत्रालय नहीं।'' अंततः चलते चले जाने पर बस्ती के आख़िरी छोर पर जो आख़िरी मकान था, उसकी एक कोने वाले हिस्से की दीवार पर वह पेशाब करने लगता है। अचानक उसकी नज़र दीवार पर लगे उन पोस्टरों पर पड़ती है जो भगवान भक्त पार्टी (भभपा) की किसी महारैली से संबन्धित पोस्टर थे। वह मारे गुस्से में उन पोस्टरों को अपने मूत्र से भिगोने लगता है – “आपकी पार्टी शौचालय नहीं बनवा सकती तो लीजिए हमारी सप्रेम भेंट।'' यह व्यंग्य, इसमें अंतर्निहित विद्रूपता और खीझ व झल्लाहट के पीछे के वास्तविक कारणों पर आप जब विचार करते हैं तो पाते हैं कि सचमुच ‘मूर्ति’ और ‘मूत्रालय’ में से एक आम नागरिक के लिए जरूरी कौन सी चीज है। यही अखिलेश के कहानीकार का वह रूप है जिसकी चर्चा ऊपर हो चुकी है। चीरती, छीलती हुई व्यंग्य की तेज़ धार जैसे मूत्र की धार को और-और तेज़ बना रही हो। विद्रूपता का चरम। नग्न यथार्थ। 

सांप्रदायिक दंगे को लेकर और हिन्दू-मुस्लिम प्रेमी-प्रेमिका की थीम को लेकर इधर हिन्दी में अनेक कहानियाँ लिखी गयी हैं। शाह आलम कैंप की रूहेंअसगर वज़ाहत, चोर-सिपाहीमो. आरिफ़, परिंदे के इंतज़ार सा कुछनीलाक्षी सिंह, यूटोपिया वंदना राग, शह और मातराकेश मिश्र, खाल मनोज पांडेय, दंगा भेजियो मौला, गो सेवाअनिल यादव आदि इस विषय की उल्लेखनीय कहानियाँ हैं। ‘अँधेरा’ इन सबसे अलग कहानी इसलिए है कि इस कहानी में सांप्रदायिक हिंसा विषय होकर भी कहानी का केंद्रीय-विषय नहीं है। कहानी का नाभिक प्रेम ही है, हिंसा नहीं। दूसरे, हिंसात्मक दंगे, भय और आतंक से प्रभावित, टार्गेटेड खास कौम के लोगों के साथ-साथ मजदूर, रिक्शेवाले, ठेलेवाले, रेहड़ी वाले मेहनतकश आम लोगों के रोज़मर्रा के कमाने-खाने वाले जीवन पर जो प्रभाव होता है वह कितना अमानवीय और असहनीय होता है। दंगे, दंगे के बाद का कर्फ़्यू। आम लोगों के दंगे और उसके बाद की कार्यवाहियाँ डर, भय, आतंक, भूख, आदि की असमाप्त किश्त की तरह होती हैं। इस असह्य किन्तु यथार्थ जीवन-परिस्थितियों का जैसा सघन और मार्मिक चित्र अखिलेश रचते हैं, वह कहानी में अलग से रेखांकित करने वाली बात है। दंगा और उसको लेकर की जाने वाली ‘तैयारियों’ संबन्धी दो भिन्न-भिन्न भावनाओं के मानचित्र कैसे दृश्यमान किए जा सकते हैं, कहानी में देखने लायक है। पहला उदाहरण, मुस्लिम बस्ती एक बूढ़े के इस कथन में देखा जा सकता है — 'दंगा' और 'तैयारियाँ' लफ़्जों को सुनकर वह उसे शक से देखने लगा। बूढ़ा शायद उसके शक को भाँप गया। प्रेमरंजन की पीठ पर हाथ रखकर हँसने लगा — गलत सोच रहे हो। 'तैयारियाँ' से मेरा मतलब है कि दंगा होगा तो यहाँ कर्फ्यू जरूर लगेगा। इसलिए घर में कम-से-कम आटे के दो कनस्तर भरे होने चाहिए और चार-पाँच किलो आलू भी। चटनी के लिए टमाटर, हरी मिर्च, धनियाँ की पत्ती इकट्ठा हो जाए, इसके लिए तरद्दुद करूँगा। कर्फ्यू का क्या ठिकाना... जाने कितने दिन चले...। अच्छा, मेरी मंजिल आ गई, खुदा हाफिज। वह एक अधटूटे घर में घुस गया।” यह तो उन आमलोगों की तैयारियाँ हैं जो दंगे के बाद के मंजर को बयां करती है। पर, दंगे की ‘तैयारियाँ’ करने वाले लोग तो और ही लोग होते हैं। दूसरा उदाहरण खुद प्रेमरंजन की बचपन के खेल की स्मृतियों के सहारे प्रस्तुत इस विचार में देखा जा सकता है — “और वह जान गया था कि जिस तरह बिच्छू के डंक जैसी नुकीली मूँछें खाँटी हिंदुत्व का परचम हैं उसी तरह सफाचट मूँछ किंतु दाढ़ीवाला चेहरा मुसलमान होने का पुख्ता सबूत है। अलीगढ़ हो, आजमगढ़, अयोध्या हो या अहमदाबाद — दंगे में इनसान के पास नकली दाढ़ी और बिच्छू के डंकवाली नकली मूँछ लगाने के लिए एक सफाचट चेहरा होना चाहिए। एक तरह के दंगाई दिखें तो दाढ़ी मूँछ दोनों लगाकर शिवाजी बने रहो या दाढ़ी उखाड़कर केवल मूँछ में महाराणा प्रताप हो जाओ — सुरक्षित रहोगे। दूसरी तरह के दंगाइयों के दिखने पर मूँछ जेब में रखकर केवल दाढ़ी लगा लो। और इस वक्त जब मुस्लिम बहुल इलाके से बुद्धा पार्क की तरफ बढ़ता हुआ वह अपने को मुसलमान दिखाने का यत्न कर रहा था, उसके मन में रक्षाकवच के रूप में दाढ़ी-मूँछ का विचार इस रूप में प्रकट हुआ — ''कितना अच्छा होता कि इस समय मेरे पास नकली दाढ़ी-मूँछ होती। नकली दाढ़ी-मूँछ को मैं अपने सफाचट चेहरे पर लगाता, जो रेहाना को बेहद प्यारा है। मैं इस्लाम के नाम पर लड़नेवाले बलवाइयों के दिखने पर अपनी नकली मूँछ उखाड़ लेता लेकिन हिंदूवादी फसादियों के मिलते ही मैं पुनः अपनी मूँछ लगाकर उसे ऐंठने लगता।'' प्रेमरंजन का यह सोचना केवल खामखयाली नहीं हैं। बल्कि दंगों के शिकार, पीड़ित बचे लोगों को जब आप कभी कुरेदेंगे तो पाएंगे कि इससे भी अमानवीय, भयानक और लज्जाजनक वाकये मिलेंगे। दंगाईयों से अपने को बचाने के लिए लोग कौन-कौन से रूप, किस-किस तरह के उपाय नहीं करते हैं। इस संबंध में मुझे मोहम्म्द आरिफ़ की एक कहानी याद आ रही है ‘चोर सिपाही’। यह कहानी गुजरात के गोधरा में हुए सांप्रदायिक दंगे को अपना विषय बनाती है। कहानी में, जब गोधरा के उस बर्बर और अमानुषिक कृत्य की याद को सलीम की नानी साझा करते हुए बताने लगती हैं कि, कैसे नामुरादों ने उन्हें भी नहीं छोड़ा था जो बीमार थीं, उन्हें भी नहीं छोड़ा जो मरने को थीं और उन्हें तक नहीं बख्सा जिनके पैर भारी...सातवाँ आठवां महीना चल रहा था। इस पर, उनके यहाँ काम करने वाली रहीमन दाई का यह कथन देखना चाहिए – “बस कुछ को छोड़ा। दाई ने नानी को लगभग काटते हुए कहा।  किन्हें? नानी और मामी की आवाज़ एक साथ आयी।... जब उन्होंने चिल्लाकर कहा... गिड़गिड़ा कर कहा कि, मुझे छोड़ दो, भैया मुझे न छुओ... महीने से हूँ... मासिक धरम हो रहा है। सुनकर वे गुस्से से दाँत पीसते हुए, तलवार भाँजते हुए आगे बढ़ जाते थे।” धरम तो धरम है, भले ही मासिक धरम हो। हिन्दू धर्म में ऐसी स्त्रियाँ वर्जित और त्याज्य समझी जाती हैं। आपदधर्म में इस मान्यता का, हत्या, बलात्कार बचने के लिए इस तरह से उपयोग क्या समूची मनुष्यता पर, उसकी विद्रूपता पर करारा तमाचा नहीं जड़ता। उस युक्ति का सटीक उपयोग ‘अँधेरा’ कहानी में भी हुआ है। जब बुद्धा पार्क से प्रेमरंजन और रेहाना किसी महफ़ूज जगह की तलाश में भाग रहे होते हैं, तभी रास्ते में वे दंगाईयों द्वारा पकड़ लिए जाते हैं। रेहाना की हालत तो ऐसी है कि काटो तो खून नहीं। पर प्रेमरंजन अपने को हिन्दू बताकर बचने का प्रयास करता है। पर दंगाईयों का संदेह उसके साथ की लड़की को लेकर है। वे लड़की के बारे में पूछते हैं। रेहाना एक पल के भीतर ही अपने को समझाती है कि उसे इस परिस्थिति से कैसे बचना है – “प्रेमरंजन के बोलने के पहले ही रेहाना बोली — मैं इनकी बहन हूँ। सगी बहन। यकीन न हो तो आपके पास मोबाइल है, हमारे घर मिलाकर दरियाफ्त कर लें। साधू चौंका — ऐं तुम तो उर्दू शब्दों का बहुतै प्रयोग कर रही हो। एक चेले ने भीड़ से गरदन निकाली — स्वामी जी नुक्ता भी लगाय रही है। साधू ने कहा — हाँ देख रहा हूँ... इनका तलुफ्फजौ बहुत कायदे का है...। साधू ने रेहाना का गाल सहलाया — 'मुसलमानिन हो का?' नहीं, मैं ज्योति हूँ। ज्योति का मतलब बताय सकती हो? लौ जिसके जलने से प्रकाश होता है। अच्छा श्रीराम के गुरु का नाम? वशिष्ठ और विश्वामित्र — रामचंद्र जी के दो गुरु थे। उर्मिला कउन थीं? लक्ष्मण जी की पत्नी। अऊर मारीचि? एक राक्षस, जिसने हिरन का भेष बनाकर सीता जी को भरमाया था। किसी ने उत्साह में आकर ताली बजाई, सभी ताली बजाने लगे। 'हर हर महादेव' चीखकर कहने वाला पुनः चीखा — स्वामी जी यह मुसलमानिन हो ही नहीं सकती, कहिए तो शर्त बद लूँ। साधू भी खुश लग रहा था। उसने निर्णायक प्रश्न किया — कउन जात हो तुम लोग? 'पंडित।' प्रेमरंजन ने जवाब दिया – मिश्र। साधू की बाँछें खिल गईं। वह इतना खुश हुआ कि फसाद के उस हड़बड़ माहौल में भी एक संक्षिप्त भाषण देने लगा — यह है असल हिंदुत्व का संस्कार। ज्योति जी को देखिए, शलवार-कुर्ता पहनी हैं। पैंट, जीन्स, स्कर्ट, टाप्स जैसी सेक्सी और पश्चिमी सभ्यता की पोशाकें पहननेवाली छिनारों को सीखना चाहिए इनसे। यदि वे नहीं सीखेंगी तो हम उनको सिखावैंगे।” बाद में जब वे दोनों एक खाली पड़े घर में छिपे हुए हैं, तो अचानक प्रेमरंजन के दिमाग में यह सवाल कौंधता है कि रेहाना हिन्दू धर्म और मिथकों के बारे में इतना कैसे जानती है। यह शायद उसके प्यार का नतीजा होगा, उसने सोचा होगा कि जिससे शादी होनी है, उसके लिए भी तो कुछ जानना पड़ता है। प्रेमरंजन पूछता है — ''रेहाना तुम हिंदुओं के बारे में इतना कैसे जान गई — सीता, उर्मिला, मारीचि, ज्योति — कैसे जान गई सब। सच बोलना, मुझसे मिलने के बाद ही जाना होगा? प्रेमरंजन का अंदाजा था कि रेहाना ने हिंदू रीति, रिवाजों, कथाओं, चरित्रों के बारे में अपना ज्ञानवर्द्धन विवाह के बाद अपने ससुरालवालों को खुश करने के इरादे से किया था जो आज संकट की घड़ी में काम आया। लेकिन रेहाना ने उसके अनुमान को गलत सिद्ध किया — 'तुमसे मिलने के पहले ही मैं हिंदू धर्म के बारे में थोड़ा-थोड़ा जानने लगी थी... अब बेहतर जानकारी हो गई है...। मैं ही नहीं कई मुसलमान हिंदुओं के बारे में जान रहे हैं। मुंबई के दंगों में मुसलमानों के कत्ल के बाद वहाँ के कई मुसलमान दंगों में अपने मुसलमान होने की आइडेंटिटी छिपाने के लिए तुम्हारे मजहब की बातें सीखने लगे थे... पर गुजरात के दंगों के बाद मुल्क भर के मुसलमान बैचेन हुए...। तुम्हें हैरानी होगी, लेकिन सच है — रामायण, महाभारत की कथाओं की किताबें मेरे अब्बू ने मुझे पढ़ने के लिए दीं। कहा था उस वक्त उन्होंने — 'बेटी पढ़ लो, बुरे वक्त में काम आ सकती हैं...।' और देखा तुमने प्रेमरंजन, वह पढ़ना... बुरे वक्त में काम आया...। रेहाना सिसकने लगी।”

प्रबल राष्ट्रवादी सरकारें एकल सांस्कृतिक नजरिए पर आधारित सांप्रदायिक ज़हर को जहाँ एक ओर धर्म और भक्ति के चरम उपभोक्क्तावाद के सहारे बहुसंख्यक की आस्था और विश्वास को अपने पक्ष में करने का प्रयास करती हैं, वहीं दूसरी ओर सैन्यबल और पुलिस-बल के द्वारा अल्पसंख्यक लोगों के भीतर दहशत और भय पैदा कर उन्हें उनके सारे नागरिक अधिकारों से  वंचित करती है जो एक बहुधर्मी-बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में समान रूप से सभी नागरिकों के लिए बनाया गया है और संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है। धर्मनिरपेक्ष संविधान और सबके लिए समान न्याय वाली शासन-व्यवस्था में सांप्रदायिक दंगों में बहुसंख्यक लोगों की तुलना में अल्पसंख्यक समुदायों के साथ सेना और पुलिस का जो अमानवीय और वीभत्स कृत्य होता है, उससे संविधान प्रदत्त मानवीय-गरिमा की क्षति तो होती ही है सेना और पुलिस पर से अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों का जो भरोसा खत्म हो जात है इसे कहानी में अखिलेश ने बहुत ही दर्दनाक ढंग से चित्रित किया है। प्रेमरंजन के द्वारा बार-बार पुलिस आ गयी है, पुलिस अब सब सम्हाल लेगी, सब ठीक हो जाएगा, अब डरने की बात नहीं है रेहाना। इस पर रेहाना गुस्से के मारे फट पड़ती है — ''ये क्या पुलिस-पुलिस लगा रखे हो। वह रुक गई। एक-एक लफ्ज पर जोर देते हुए बोली — 'पुलिस सिर्फ हिंदुओं के लिए है।' अगला वाक्य उसने फुसफुसाकर कहा — 'हमारे लिए ये कातिल हैं। इन सभी की आँखों को देखो, कैसे वहशत से चमक रही हैं।' प्रेमरंजन ने अवाक रेहाना को देखा। उसे वह बिल्कुल अजनबी सी लगी। जैसे यह कोई दूसरी रेहाना थी। वह खब्तुलहवास सा बोला — 'ये क्या कह रही हो तुम... हिंदू-मुसलमान...।' उसने एक बार फिर एक लचर वाक्य कहा — 'मुहब्बत करने वाले हिंदू-मुसलमान की बात नहीं करते हैं।' रेहाना की आँखों की पुतलियाँ गोलाई में नाचीं — 'दंगे मुहब्बत की कब्रगाह होते हैं। इस वक्त हकीकत यही है कि मैं मुसलमान हूँ और पुलिस की संगीनों के साये में तुम जितने महफू़ज हो मैं उतनी ही खतरे में।'' दंगे मुहब्बत की कब्रगाह होते हैं। पुलिस की संगीनों में तुम जीतने महफूज हो मैं उतनी ही खतरे में। ये वाक्य तात्कालिक गुस्से में निकले वाक्य भर नहीं है बल्कि रेहाना के कौम के लोगों की उस सामूहिक प्रताड़ना और असीमित पीड़ा से निकलने वाले दर्दनाक अनुभव हैं। बार-बार देखे, भोगे गए यथार्थ का अनुभव । 

बहुसंख्यक हिंसा द्वारा उक्त सामूहिक प्रताड़ना तब तक मुकम्मल नहीं हो सकती जब तक मीडिया इसे अपने तरह-तरह के चैनलों के सहारे सहयोग न दे। दंगों की भयावहता को, उसके आतंक, भय और क्रूरता को जिस संवेदनहीन तरीके से, हिंसा को हिंसा के ही नमक-मिर्च के सहारे  समाचार चैनलों पर जिस ढंग से दिखाया जाता है, वह कम हृदय-विदारक नहीं होता। अखिलेश की पैनी नज़र से मीडिया का यह चरित्र भी कहानी में छूटता नहीं है। रेहाना और प्रेमरंजन भागते-भागते एक घर में छिपने के लिए जब अंदर जाते हैं तो घर खाली पड़ा हुआ है। ऐसा लगता है कि सभी सदस्य दंगे के डर से जल्दी में घर छोड़कर भाग गए और ताला लगाना भूल गए या उनके साथ कोई अनहोनी घटना घटी हो। बहरहाल, शहर का मंजर जानने के लिए प्रेमरंजन टी. वी. खोलता है तो देखता है कि “एक बस्ती भी आग की लपटों में थी...। सिर पर भगवा पट्टी बाँधे और गले में भगवा दुपट्टा डाले लोग मोटर साइकिलों, जीपों और ट्रकों में सवार होकर दौड़ रहे थे। उनके हाथों में तलवारें, रिवाल्वर या त्रिशूल थे...। जिनके हाथों में ये नहीं थे, वे टूटी हुई खाली बोतलें अथवा तेजाब से भरी बोतलें लिए हुए थे...। सड़क पर जगह-जगह दुकानें, घर और वाहन जल रहे थे...। कैमरा यहाँ से उठकर कर बस्ती के अंदरूनी रिहायशी हिस्से में पहुँचता है — यहाँ की दीवारों के चेहरे पर जैसे भयानक चेचक के दाग उभर आएँ हों — वे गोलियों के निशानों से भरी हुई थीं। घरों के कमरे-आँगन रक्त और शवों से भारी हो गए थे और कराहों तथा रुदन से भर गए थे...। एक व्यक्ति के सिर पर तलवार से वार किया गया था वह तड़फड़ा रहा था... कुछ स्त्रियाँ भागी थीं तो बलात्कार के बाद उनके पैर काट डाले गए थे। एक गर्भवती स्त्री को चीर दिया गया था — वह और उसका भ्रूण साथ-साथ मरे पड़े थे...।” इस वीभत्स दृश्य के टीवी स्क्रीन पर रहते हुए ही अचानक बिजली चली जाती है। चारों ओर घुप्प अँधेरा छा जाता है – सबकुछ अँधेरे में डूबता हुआ-सा। यह अँधेरा सांप्रदायिक दंगे का ब्लैकआउट है – “अब कमरे में न टेलीविजन के दृश्य थे न उसकी ध्वनियाँ थीं। सिर्फ अँधेरा था। रोशनी और अँधेरे में क्या फर्क होता है? रोशनी में सब कुछ दिखता है लेकिन वह खुद नहीं दिखती। अँधेरे में कुछ भी नहीं दिखता सिर्फ अँधेरा ही दिखता है। मगर रेहाना को दिख रहा था। स्मृतियाँ, कल्पनाएँ, स्वप्न और आशंकाएँ अँधेरे में ज्यादा स्पष्ट और चटख दिखती हैं...। रेहाना के सामने अनेक दृश्य अँधेरे में चमगादड़ों की तरह फड़फड़ा रहे थे...। अँधेरे में सुनाई अधिक साफ देता है — रेहाना के माथे में ढेर सारी अप्रिय आवाजों का कोहराम था...। उन्हीं अप्रिय आवाजों के बीच उसे सुनाई दी एक बहुत प्रिय आवाज की दबी-घुटी रुलाई...। प्रेमरंजन अपना रुदन छिपाने की कोशिश कर रहा था...। रेहाना स्तब्ध रह गई, एक क्षण के लिए उसकी सारी व्यथाएँ पीछे छूट गईं...। वह उठकर प्रेमरंजन के पास आई। अँधेरे में उसने प्रेमरंजन का सिर सहलाया — 'तुम क्यों रो रहे हो? तुम्हारा क्या कसूर?' रुलाई का बाँध टूट गया — वह फूट-फूटकर रोने लगा।” प्रेमरंजन का शर्मसार होकर यह रोना-बिसूरना, इस तरह से फूट-फूटकर रोना क्या हमारे अंदर बहुत सी भावनाओं और मूल्यों को किरिच दर किरिच तहस-नहस नहीं कर देता? क्या हमें इस पर सोचने के लिए विवश नहीं करता कि हमने अपने चारों ओर यह कैसा ‘अँधेरा’ रच लिया है? बुद्ध याद आते हैं, गाँधी याद आते हैं। हमारे समय में गाढ़े होते और न छंटने वाले अँधेरे को देखकर प्रेमरंजन की तरह ये दोनों रोते हुए, अपने ही लोगों पर शर्मसार होते देखे जा सकते हैं। 

 
विनोद तिवारी
संपर्क : सी-4/604, ऑलिव काउंटी, सेक्टर-5, वसुंधरा, गाज़ियाबाद-201012 



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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