कवितायेँ: डा. लालित्य ललित

लालित्य ललित 

(डॉ. ललित किशोर मंडोरा)


नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया में सहायक संपादक हैं और हिंदी साहित्य में इनका योगदान विस्मित करने वाला है ... लालित्य के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें. लेकिन पहले उनकी कविताओं का आनन्द उठायें, जीवित कविता किसे कहते हैं ये आप इन कविताओं को पढ़ कर बखूबी समझ जायेंगे. 
samajhdaar kisim ke log kavita poetry hindi lalitya lalit shabdanka online     वैसे तो लालित्य ललित के अनेक संग्रह प्रकशित हो चुके हैं लेकिन उन्हें, बोधि प्रकाशन से प्रकशित एकदम ताज़ा कविता संग्रह "समझदार किसिम के लोग" के लिए बधाई देना ना भूलें. जिसे पढ़ कर कहानीकार मिथिलेश्वर का कहना है "समकालीन हिंदी कविता में अपनी कुछ अलग खासियतों की वजह से लालित्य ललित का यह संग्रह उल्लेखनीय साबित होगा".
    इसी संग्रह पर आबिद सुरती ने कहा - मुक्त छंद की ये कवितायेँ रदीफ़ से आगे बढ़ कर एक अलग मक़ाम पर पहुंची हैं, इसे हम लालित्य ललित की कविताओं का लालित्य कह सकते हैं. अक्सर कहा जाता है जो कविता छंदबद्ध नहीं होती वह जुबान पर नहीं चढ़ती. ललित की रचनाएँ ना केवल ज़बान पर चढ़ जाती हैं बल्कि दिल में भी उतर जाती हैं. 
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कवितायेँ: डा. लालित्य ललित

गांव का खत: शहर के नाम                   

उस दिन डाकिया
बारिश में
ले आया था तुम्हारी प्यारी चिट्ठी
उसमें गांव की सुगन्ध
मेरे और तुम्हारे हाथों की गर्माहट से
मेरे भीतर ज्वालामुखी फूट पड़ा था
सच! ढेर सारी बातें लिख छोड़ी थीं तुमने -
समय से काम पर जाना
ठीक वक्त पर खाना खाना
और सबसे जरूरी शहरी सांपिनों से दूर रहना
कितना ख्याल रखती हो मेरा
या कहूं कि अपना।
याद है वह सावान की अलसाई दोपहर - ब्याह से केवल दो दिन पहले
जब गेंदा ताई के ओसारे में खाए थे
मैंने-तुमने सत्तू और चूरमे के लड्डू
जिन्हें तुम सुबह से ओढ़नी में छिपाए हुए थीं
तुम्हारा खत उनका भी स्वाद दे रहा है
और याद आ गया मुझे बिट्टू के पैदा होने पर
बांटी थी गांव भर में मिठाई
मैंने, बप्पा ने, अम्मा ने नाच-नाचकर
मैंने पिछले हफ्ते फैक्टरी में फिर बांटी थी मिठाई
संभाल-संभाल कर
जब मेरा-तुम्हारा बिट्टू हुआ था दस वसंत का
बिमला कैसी है
क्या बापू को याद करती है
बिमला अब तो बड़ी हो गई होगी
ध्यान रखियों शहर की हवा गांव तक पहुंच चुकी है
लड़की जात है, ताड़ की तरह बढ़ जाती है
तुमने लिखा था पूरन काका भी पूरे हो गए
और हरी नम्बरदार की तेरहवीं चौदस को थी
समय मिला तो
आ जाऊंगा
पर सहर में समय मिलता है क्या ?
वा ‘हरिया’ पिताजी के वक्त आया था
सब कुछ देखना पड़ता है जी।
मेरा भी मन न लगता
मुझको भी कुतुबमीनार देखना है
अब के तुम्हारी एक न सुनूंगी, हां...
अच्छा, शहर में अपना ख्याल रखना
ठीक-ठीक काम करना
मालिक लोगों से बनाकर रखना
जन्नत नसीब होती है
गांव आते वक्त
रेल से मत आइयो
मण्डी टेशन पर बम फटा था
लाली भौजाई कहे थी
लिख दियो, संभल कर आइयो मेरे लिए लाली
पीले रंग का ब्लाउज
बिट्टू के लिए बंडी
बिमला के लिए ओढ़नी और हां -
अम्मा के चश्में का नम्बर भेज रही हूं
बाकी क्या, बस तुम आ जाजो जी,
अच्छा अब सुन लो ध्यान से
‘बाबू’ बन के आइयो
आते वक्त कुर्ता-पाजामा पहन के मत आइयो
यहां रोब नहीं पड़ेगा
पिछले महीने कजरी का ‘वो’ भी
गांव में हीरो बनके आया था
बड़ा अच्छा लगे था
सच, तुम भी पैंट-कमीज और
जूते पहन के आना
वो याद से तिरछी टोपी जरूर लीजो
तू मुझको ‘वा’ में राज दिखे है
अच्छा अब खत बन्द करती हूं
तुम्हारी पत्नी

जमुना देवी
काली मंदिर के पास
गांव और पोस्ट आफिस-ढुंढसा
जिला अलीगढ़
उत्तर प्रदेश


फूल, पत्ती और तितली                         

दिल की गहराई से
चाहो
फूल को पत्ती को
और फुदकती कूदती तितली को
कुछ देर फूल को
सहलाओ
पत्ती को पुचकारो
देखोगे तुम
आहिस्ता से आ बैठेगी
तुम्हारी हथेली पर तितली
बिल्कुल वैसे ही
जैसे किसी अनजान अजनबी
बच्चे की ओर
निष्कपट भाव से देखो
मुस्कराओ
तो पाओगे
बच्चा भी तुम्हें उसी भाव से
देखेगा
तो मेरे दोस्त
एक दूसरे को इसी भाव से
देखो
तो कटुता मिट जाएगी
हमेशा-हमेशा के लिए
क्या तुम नहीं चाहते
कि सब मिल जाए
देखो एक माला के एक फूल को
देखो
जो अलग छिटका पड़ा है
उसकी गंध होगी तो
पर वो बात नहीं होगी
जो माला की होती है
तो मानो मेरा कहना !
एक सूत्र में रहो
टूटन में क्या है ?
जुड़ कर रहो
मजाल है तुम्हें कोई
डिगा दे
तुम्हें कोई हिला दें
समूची धरातल पर
दिखने लगेगा असर
और तुम पाओगे तुम्हारे साथ
होंगे सभी लोग
जिन्हें तुम चाहते हो
और सच्चे मन की मुराद
हमेशा पूरी होती है
अगर किसी को भी चाहो
तो निष्कपट चाहो
पूरे मन से चाहो
पूरी शिद्दत से चाहो
देखो तुम्हारे हाथ में भी
आ बैठी हैं तितलियां
देखो तो !
पत्ती भी मुस्कराने लगी है
और फूल भी
अरे समूचा बगीचा ही
मुस्कराने लगा है
गीत खुशी के गाने लगा है

यात्राएं                                             

हमेशा सुख देती हो या
कभी-कभी हताशा भी
इसका मलाल नहीं करना चाहिए
कभी अच्छे लोग होते हैं
कभी-कभी बुरे भी
अच्छे लोग अपनी आदतों के कारण
अच्छे हैं
और बुरे लोग अपने कर्मों के कारण
कभी कभार आपको
निकलना चाहिए खुली हवा में
खुले विचार
मन को नई
ऊर्जा से भर देते हैं
मानों या ना मानो
निकलो घूमो
ठहरो देखो
बैठो, ताको, निहारो
चहको
चलो, बैठो, देखो
आहें लो
चाय की चुस्कियां
आपको पूर्ण शिद्दत से
आत्मसात कर देती है
और आप
उन अनुभूतियों के
होकर रह जाते हो
और वे पल
सदा के लिए
आपकी स्मृति कलश
में तटस्थ

आज की परिभाषा                              

इंसान ने आज गढ़ ली परिभाषा
खुद की
वो बन गया है ‘उत्पाद’
बिक रहा है बाजार में
चाहे आटो एक्सो हो या
किसी नामी कंपनी का
अंडरवियर
उसे अब शरम नहीं
वैसे भी
कोणार्क की मूर्तियां हो
या खजुराहो की
क्या फर्क पड़ता है!
संबंधों में ही
कड़वाहट घुल चुकी है
चाय की मिठास भूले लोग
चांदनी चौक से
कतराने लगे है
लेस्बियन/ज़िगलों के
इस जंजाल में
अंतरजाल की चमक में
अपना पड़ोस और
अपनी अहमियत
तलाशते हम गुगल युगीन लोग
उस दिन के इंतजार में है
जब बच्चों के नाम होने लगे
याहू मैसेंजर
ट्वीटर या फेसबुक!
नई पीढ़ी की दुल्हनें
ब्याह संग लाने लगेगी
अपने नवजात शिशु
उसे दहेज में मां-बाप देंगे
लेपटॉप, नोट बुक और
अत्याधुनिकतम मोबाइल
एंड्रायड फोन
और हम आप तस्वीरों में टंगे
अपने नौनिहालों की
हरकतों पर
तमाशाबीन बन कर
चुपचाप देखेंगे
इस जुनूनी हलचलों को
जिस पर हमारा कोई वजूद
नहीं चलेगा।
हमारी तस्वीरों पर
उनका हक होगा
वे जब चाहे
किसी को भी ‘टैग’ कर देंगे
कोई ना चाहते हुए भी
हमें लाईक कर देगा
इच्छा हुई तो
कमेंट भी दे देगा
हमारी बला से
और क्या ?


आज की दुनिया                                   

कितनी बार
आप मरते हो ?
जीवन में एक बार !
नहीं कई-कई बार
मास्टर, प्रेयसी, पिता, पत्नी
बच्चों, सगे-संबंधियों की
टीका-टिप्पणी पर
पड़ोसियों से बदसलूकी पर
बॉस की कुटिलताओं पर
आप अनदेखी भी तो
नहीं कर सके !
इसलिए मरते रहो खुद ब खुद
एक दिन हकीकत का
जमली जामा खुद ब खुद
पहना दिया जाएगा
फ्लाने दिन फ्लाना
मर गया !!
बड़ा चंगा बंदा था
मिलनसार था
सबके काम आता था पर जी
होनी को कौन टाल सकता है !
फ्लाने के जनाज़े में
कईयों ने साथ दिया
लोग आए रस्मी हुए
आंसू टपकाएं निकल लिए
कुछ इतने सहृदय निकले
फेसबुक पर श्रंद्धाजलि दी
फोटो भी चस्पां की
फ्लाना लेखक
संसार छोड़ गया
बड़ी बेहतरीन गज़लें थी
इनकी और लाइक/कमेंट का
सिलसिला शुरु


साहब और बड़े साहब                            

साहब
और बड़े साहब क्या होते हैं ?
एक मक्खन की छोटी टिक्की
और दूसरी आधा किलो की
दोनों को चापलूसी पसंद है
किसी को कम
या किसी को ज्यादा
यदि आप इस पवित्र यज्ञ की
परिभाषा से परिचित है
तो वर्ष भर में
आपकी अनगिनत यात्राएं
होंगी
और यदि आप इस पुराण प्रक्रिया से
अनभिज्ञ हैं तो
आप बैठे रहेंगे कतार में
और दूसरे महसूस करेंगे
आपके बारे में
जिस व्यक्ति का नंबर
मिला रहे हैं
वह आपके संपर्क दायरे से
बाहर है
आप प्रयास करते रहे !!!

संपर्क:
डा. लालित्य ललित
बी-3/43,
शकुंतला भवन
पश्चिम विहार
नई दिल्ली-110063
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1 comments :

  1. aap ko meri kavitaayein pasand aai,me aap ka behad aabhari hoon.meri kosish rahti hay ki me apni mitti se juda rahu aur yahi samvedna aap ko de saku aur tajgi bhi.

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