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कवियों व लेखकों ने समाज के मौजूदा हालात पर अपना रोष व्यक्त किया

अप्रैल 28, 2013
अप्रैल 27, 2013, अकेडमी आफ़ फाइन आर्ट्स एंड लिटीरेचर, 4/6, सिरीफोर्ट इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली
सार्क मान्यता प्राप्त, सार्क फाउंडेशन लेखकों के साहित्यिक कार्यक्रम डायलौग में उपस्थित कवियों व लेखकों ने, समाज के मौजूदा हालात पर अपना रोष व्यक्त किया तथा यह प्रस्ताव पारित किया
प्रस्ताव

    आज जब, समझने की कोशिश करते हैं तब भी समझ नहीं आता कि नन्हीं बच्चियों के साथ बलात्कार करने वाले विक्षिप्त मानसिकता के इंसानों का हम क्या करें? ऐसे इंसानों की हम घोर निंदा करते हैं और उनके लिए कठोर से कठोर सज़ा की गुज़ारिश करते हैं। हमारी नज़र में वे इंसान कहलाने का हक़ भी नहीं रखते।

    कठोर सज़ा के हक़दार वे पुलिसकर्मी भी हैं, जो अपनी ड्यूटी पूरे लगन से नहीं करते। ऍफ़० आई० आर० लिखने में ताल मटोल करते हैं, रिश्वत ले कर या दे कर आपराधिक केसों को दबा देने की कोशिश करते हैं। थानों के कार्यक्षेत्र को लेकर इतनी लम्बी बहस करते हैं कि हादसे का शिकार आदमी दम तोड़ देता है। नैतिकता और मानवीय मूल्यों का इतना घोर पतन? ऐसे पुलिसकर्मियों की हम भर्त्सना करते हैं। भर्त्सना हम पुलिस प्रशासन की भी करते हैं, जो ऐसे पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्यवाही करने से बचती है। सरकार की हम भर्त्सना करते हैं जो ऐसे निकम्मे पुलिस प्रशासन को बर्दाश्त करती है।

    अपराधियों से भी अधिक पुलिस का भय लोग महसूस करते है। सबसे पहले पुलिस को सम्वेदनशील बनाया जाए - कर्तव्य के प्रति सजग रहे, भीतर इंसानियत भी हो, रिपोर्ट दर्ज करे। मौके पर पहुंचे। प्रत्येक पुलिसकर्मी को इतना वेतन और दूसरी सुविधाएँ दी जानी चाहियें ताकि वे भ्रष्ट होने से बचें, कर्तव्यनिष्ठ बनें, उनपर नज़र रखने के लिए भी एक एजेंसी हो, राजनितिक हस्तक्षेप और नियंत्रण कम से कम हो, उन्हें सारी आधुनिक तकनीकी सुविधाएं दी जाएँ, जिम्मेवारी के कड़े से कड़े पैमाने तय हों। पुलिस को यह बताया जाए कि भारत का संविधान भारत के हर नागरिक को एक समान अधिकार और हक़ देता है, ऐसे में आखिर कैसे और किस कानून के अंतर्गत पुलिस, अमीरी-गरीबी, जाति -पात, पेशा-व्यवसाय, संप्रदाय के आधार पर ऍफ़ आई आर लिखने और कार्यवाही करने में आनाकानी करती है।

(भरत तिवारी)
27.04.2013, नई दिल्ली
प्रस्ताव को उपस्थित लेखक व कवियों सुश्री अजीत कौर, श्री लीलाधर मंडलोई, श्री मिथलेश श्रीवास्तव, श्री मदन कश्यप आदि ने अपने हस्ताक्षर से अनुमोदित करा (देखें संलग्न तस्वीर)

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