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इंदिरा दाँगी (दांगी) के आगामी उपन्यास ‘रपटीले राजपथ’ का अंश

जन॰ 28, 2015

इंदिरा दाँगी के आगामी उपन्यास ‘रपटीले राजपथ’ का अंश

इन कहानियों को ज़रा सुधारने के बदले मे इतना बड़ा सम्मान हाथ से कोई स्थापित साहित्यकार भी नहीं जाने देगा; तुम तो ख़ैर, मेन स्ट्रीम के स्ट्रग्लर कवि ही हो। फिर भी ! तुम सोच लो दो-एक दिन में वर्ना मैं किसी और को...’’

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अवार्ड के बदले आत्मा

इंदिरा दाँगी


आमोद प्रभाकर की बैठक-महफिल मे आज उसके सिवाय कोई दूसरा आमंत्रित नहीं। काँच की पारदर्शी टेबल पर जिन-शराब की तीन बोतलें सजी हैं जिन्हें देखकर ही उनके महँगे होने का पता मिलता है। माहौल इस क़दर चुप है कि विराट जितना ख़ुश-ख़ुश होकर यहाँ आया था, उतना ही खामोश हो गया है।

जिन की पहली बोतल खोली गई। पैग के साथ काजुओं की प्लेट विराट की तरफ़ बढ़ाते प्रभाकर ने रुमाल से अपनी लार पोंछी और बात शुरू की,

‘‘देख यार! अपन तो बिना लाग-लपेट के, सीधे मुद्दे की बात करने वालों में से हैं। तुम इस साल का ‘यत्न-रत्न’ ले लो और बदले में...’’


आमोद प्रभाकर ने लैदर की एक स्याह फ़ाइल पारदर्शी टेबल के ऊपर रख दी,

‘‘ये मेरी कुछ कहानियाँ हैं; इन्हें तुम दोबारा से लिख दो मतलब इन कच्ची कहानियों को अच्छी कहानियों में बदल दो।’’


‘‘लेकिन सर, मैं तो कहानीकार नहीं हूँ। कभी एक कहानी भी नहीं लिखी। मैं भला कैसे...?’’


‘‘ओय, कहानी नहीं लिखी तो क्या हुआ; गद्य तो लिखा है ! तुम्हारे साक्षात्कारों में भाषा की, अभिव्यक्ति की, विचारों की और न जाने किस-किस चीज़ की कितनी ‘वाह ! वाह !’ हुई थी हर तरफ़ ! बस, अपने वे ही सब मसाले मेरी इन फीकी कहानियों में मिला दो।’’

आमोद प्रभाकर ने महँगे रुमाल से अपनी लार पोंछ अपनी जाति, अपना सरनेम सार्थक करने वाले ख़ालिस बनिया लग रहे हैं -सौदे के बदले में पूरे दाम वसूलने वाला लाला। लालाओं की व्यापारिक-व्यावहारिक क़ाबिलियत वाली वो मशहूर कहावत उसे याद आ गई -लाला को मारे लाला या फिर ऊपर वाला।


‘‘लेकिन सर...’’ -चाहकर भी विराट की हिम्मत नहीं पड़ रही है कि एकदम से ना कह दे। ...लाख रुपये का यत्न-रत्न अवार्ड!


‘‘देखो विराट! ऐसा है कि तुम मेरे दोस्त हो तो मैंने सोचा, तुम्हारा ही भला कर दें इस साल। लाख रुपये तो पाओगे ही; यत्न-रत्न की प्रतिष्ठा भी बहुत बड़ी है। वैसे मैं चाहूँ तो अपेक्षा से लेकर रागिनी-दद्दा तक, शहर में किसी को भी ये काम दे दूँ । इन कहानियों को ज़रा सुधारने के बदले मे इतना बड़ा सम्मान हाथ से कोई स्थापित साहित्यकार भी नहीं जाने देगा; तुम तो ख़ैर, मेन स्ट्रीम के स्ट्रग्लर कवि ही हो। फिर भी ! तुम सोच लो दो-एक दिन में वर्ना मैं किसी और को...’’


‘‘नहीं सर! सोचना क्या है; कर ही दूँगा ।’’ -विराट के भीतर का न जाने कौन बोल पड़ा ये; और असली वो, जैसे अपना ही बंदी है।


‘‘फिर ठीक है। आज रात से ही इन कहानियों पर काम शुरू कर दो। हम ऐसा करेंगे कि इन कहानियों को जब तुम एक मर्तबा लिख लोगे तो किसी बड़े राइटर से एक बार चेक करवा लेंगे। उनके जो सुझाव रहेंगे, प्लाट, भाषा या भावों को लेकर -उस हिसाब से और सुधारकर लिख देना फिर एक बार। चलो, अब इसी बात पर और एक-एक पैग हो जाये दोस्त।’’


आमोद प्रभाकर ने उसके गिलास में नीट शराब भर दी। तीन बोतल जिन वे दोनों देखते ही देखते पी गये; जिसमें आमोद प्रभाकर ने एक, तो विराट ने दो बोतलें पी होंगी। आते समय नशे मे धुत्त विराट को उसके कमरे तक भिजवाने के लिए प्रभाकर ने अपनी मर्सडीज़् में उसे भेजा। उसके बगल में शराब की पूरी एक पेटी रखी थी और उसके हाथों में स्याह फाइल थी। प्रभाकर का नौकर मोटरसाईकिल लेकर आगे निकल गया था। उसे कार में विदा करते प्रभाकर ने ऊँची-आदेशात्मक आवाज़ में कहा था,


‘‘जाकर सो मत जाना। लिखना।’’


नशे में चूर विराट को प्रभाकर की कार और नौकर ने उसके कमरे तक पहुँचा दिया। उसने कमरे में आते ही पेटी में से एक बोतल निकाली और नीट पीते हुए लिखने बैठ गया। कुछ शराब की झोंक थी, कुछ ‘यत्न-रत्न’ की ...वो पूरी रात लिखता रहा।

लिखते-लिखते शराब की आखिरी बूँद का भी नशा जब उतर चुका; उसने सिर उठाकर घड़ी की तरफ़ देखा। सुबह के साढ़े छह बज रहे हैं। अब सोने की गुँजाइश कहाँ ? वो उठकर नहाने चला गया।

दफ़्तर में दिन में सबने उसने उससे उसकी तबीयत के बारे में पूछा। सुर्ख आँखें, उतरा चेहरा, सुन्न-सा दिमाग़ और शिथिल शरीर ...ये असर केवल शराब का नहीं था, न रात भर जागने का !

अगले दिन विराट ने दफ़्तर से एक हफ़्ते की छुट्टी ले ली। सेलफ़ोन स्विच ऑफ कर लिया। दिन और रात का फ़र्क जैसे वो भूल गया था। शराब पीता रहता और लिखता रहता। थक जाता तो सो जाता। जागता तो फिर शराब पीता, फिर लिखने लग जाता। इतने चूर नशे के बावजूद जब भीतर से कुछ मनाहियाँ ध्वनित हो उठतीं, वो बालकनी को जकड़ लेने वाली उस इमली की डाल को देखता; और अपनेआप को ऊँची आवाज़ मे सुनाता,


‘‘यत्न-रत्न एक तमाचा होगा उस साली सुनंदा के मुँह पर ! मैं उसे साहित्य की दुनिया में लेकर आया। मैंने उसे लिखना सिखाया। वो माने या ना माने, मैं उसका उस्ताद हूँ। मैं उससे ऊँचा था, हूँ -रहूँगा !

हफ़्ता पूरा हुआ। शराब की पेटी चुक गई। स्याह चमड़े की फ़ाइल से निकलीं वे तेईस कहानियाँ अपनी खाल बदलकर फिर उसी फाइल में जा छुपीं। ...और ये खाल किसकी है ?? विराट इस प्रश्न से बचने के लिए दिन-रात शराब और गोश्त में गाफिल है।

आमोद प्रभाकर ने एक नहीं, दो बड़े लेखकों से वे कहानियाँ जँचवायी हैं। उनके सुझावों-टीप-मार्गदर्शनों के अनुसार फिर-फिर कहानियों मे सुधार किए गये। हर बार लिखने के लिए जब वो स्याह फाईल उसके कमरे पर पहुँचाई जाती, साथ में एक पेटी मँहगी-विलायती शराब होती। यों तीन हफ़्तों तक विराट ने उन कहानियों पर जी-तोड़ काम किया।

और उस शाम वो बिल्कुल बे-नशा था जबकि आमोद प्रभाकर के घर फ़ाइल देने गया। प्रभाकर की प्रसन्नता का पार न रहा। कहानियाँ एक नज़र देखते ही जान गये -भट्टी से तपकर निकला खरा सोना है! प्रभाकर जैसे व्यक्ति के लिए उतनी प्रसन्नता बिना पार्टी किए सह पाना मुश्किल था। उन्होंने तुरंत ही ख़ास-ख़ास दोस्तों को फ़ोन लगा डाले और खड़े-खड़े शराब-गोश्त का इंतज़ाम भी कर लिया। पर प्रभाकर के लाख इसरार के बाद भी न विराट ने एक घूँट शराब पी, न वहाँ रुका।

वह सीधा अपने कमरे पर पहुँचा और तकिये में मुँह छिपाकर रोता रहा। उसे बड़ी शिद्दत से महसूस हो रहा है कि वह अपनी आत्मा की त्वचा उतारकर उन कहानियों को पहना आया है। अब उसकी छिली, छटपटाती आत्मा से इतना-इतना रक्त बह रहा है, इतनी-इतनी पीड़ा हो रही है और ये नग्नता असहनीय हो चली है विराट के लिए ! इस समय उसके भीतर ख़ून-ही-ख़ून है! कष्ट ही कष्ट !

अगले महीने उसे ‘यत्न-रत्न’ दिये जाने की घोषणा हो गई। उसके भीतर के घावों पर मरहम लगा जैसे। अब सुनंदा को बताऊँगा! दिल-ही-दिल में विराट पूरे समय वे संवाद तय करता रहा जिनसे वो सुनंदा को बेइज्जत करेगा। ...दंभ से भरा ये विराट ! ...अपनेआप के लिए अजनबी ये विराट !

और बहुप्रतीक्षित घड़ी आ ही गई; इस बरस का ‘यत्न-रत्न’ समारोह ! मेन स्ट्रीम के सब रोशन चेहरे, सब यशस्वी हस्ताक्षर। विराट का दिल किया उनमें से हर एक के ऑटोग्राफ़ ले -हर एक के ! पर यत्न-रत्न पाने वाला लेखक भला ऑटोग्राफ़ कैसे ले ? -उसने फ़ोटोग्राफ़ ज़रूर हर एक के साथ खिंचवाये। सोचा, आगे-पीछे कभी काम आयेंगे। तभी वह यह देखकर आगबबूला हो उठा कि सुनंदा भी इस-उस सेलिब्रिटी-साहित्यकार के साथ फ़ोटो खिंचवा रही है। एक फ़ोटोग्राफर को अपने साथ लाई है -ख़ासतौर पर इसी काम के लिए! सेलफ़ोन से खींची शौकिया तस्वीरें नहीं बल्कि बाक़ायदा खिंचवाये गये फ़ोटोज़ जो यक़ीनन भविष्य में अपनी तरक़्क़ी के लिए इस्तेमाल किये जाने हैं।

अपनी उठी हैसियत के लिहाज़ में विराट ने अपना ग़ुस्सा दबाने की भरसक कोशिश की। सुनंदा को उसने अपनी पूरी शालीनता से पुकारा, एक बार, दो बार, तीन बार भी ! फिर उसकी बाजू दबाकर उसे लगभग खींचता हुआ एक ओर ले गया।

‘‘क्या तमाशा लगा रखा है ये सब ?’’


‘‘तमाशा माने ?’’


‘‘माने ये कि उतनी भोली तुम दिखती नहीं हो जितना दिखावा कर रही हो! यहाँ सब बड़े साहित्यकारों के साथ इतना घुल-मिलकर फ़ोटोज़ क्यों खिंचवा रही हो ? देख रहा हूँ कि साहित्य में आगे बढ़ने की सब चालबाजि़याँ तुझे आती हैं !!’’


‘‘सो तो आपको भी आती है विराट जी ; और मुझसे कहीं ज़्यादा आती हैं !’’ -सुनंदा ने अपना कंधा उसकी पकड़ से छुड़ाते हुए कहा।


विराट का दिल आशंका से धड़क उठा। स्याह फ़ाईल के पीछे की स्याह कहानी कहीं किसी रोशनी में तो नहीं आ गई ?? उसने अपनेआप को भरसक स्थिर रखते हुए पूछा,


‘‘कहना क्या चाहती हो ?’’


‘‘न कुछ आप कहिये, ना मुझसे कहलवाईये! आप जैसे सस्ते साहित्यकारों को मेरा दूर से ही नमस्कार है!’’


‘‘सस्ता साहित्यकार ?? मैं सस्ता साहित्यकार हूँ ? हँ ह ! तभी मुझे ‘यत्न-रत्न’ के लिए चुना गया है?’’


‘‘कोई भी पुरस्कार कभी भी श्रेष्ठ साहित्य की कसौटी नहीं होता । और अगर आप ‘यत्न-रत्न’ पर इतना ही इतरा रहे हैं विराट जी तो मैं आपको बता दूँ कि अगली साल के ‘यत्न-रत्न’ के लिए मेरा नाम फ़ायनल हो चुका है। यक़ीन न हो तो प्रभाकर जी से ही पूछ लीजिये। और हाँ, एक बात और आपको ज़रूर बताती जाऊँ! ’’ - सुनंदा ने तर्जनी की नोक विराट के माथे की ओर उठाई,


‘‘आइन्दा अगर मुझसे बात करने की कोशिश की या मेरे आसपास भी फटके तो मैं तुम्हें अपने मंगेतर से कहकर वो बुरा पिटवाऊँगी कि सब दाँत झड़ जायेंगे तुम्हारे मातादीन मिरौंगिया ! तुम्हें अंदाज़ा नहीं होगा, वे कितने बड़े लोग हैं !’’


‘‘मंगेतर ?? तुम्हारी सगाई हो गई ?’’


‘‘हाँ। और वो भी थ्रीस्टार होटल सीरीज़ ‘रॉयल ब्लू’ के मालिक के इकलौते बेटे से।’’


‘‘ज़रूर ये सिर्फ़ इसीलिए हो सका क्योंकि तुमने स्थानीय मीडिया को ऐसे मैनेज कर लिया है कि वो तुम्हें देश की बड़ी ही होनहार, नवयुवती कवियत्री की तरह प्रस्तुत करती रहती है। मैंने तुम्हें साहित्य में आगे बढ़ाया है। तुम्हें ये जो कुछ भी मिल रहा है या मिलेगा सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी बदौलत है!’’


‘‘इतने ही बड़े वाले साहित्यकार अगर होते तो एक अवार्ड के लिए अपने क्राफ़्ट और अपनी आत्मा को बेच न दिया होता आपने!’’


विराट सन्न रह गया। सुनंदा वहाँ से जा चुकी है, उसे जलता हुआ छोड़कर। विराट को अब आमोद प्रभाकर पर बेइंतहा ग़ुस्सा आ रहा है। उसने अपनी जान डालकर काम किया। कूड़ा-करकट जैसे गद्य को चमचमाती कहानियों में बदल दिया और उसके इस एहसान का ये सिला दिया उन्होंने! और बात अगर इस साली सुनंदा को पता है, मतलब भोपाल के हर एक साहित्यकार को पता है ?? ...और क्या यहाँ उपस्थित हर एक साहित्यकार को भी पता है ?? जिनके साथ वो अभी गर्व के साथ सिर उठाकर फ़ोटोज़ खिंचवा रहा था और वे सब भी जो उसे बधाई देते नहीं थक रहे थे -क्या वे सब भी स्याह फ़ाइल वाली सच्चाई जानते हैं ??

विराट ने अपने सीने पर हाथ रख लिया; उसे कुछ घबराहट महसूस हो रही है। ...शराब की तेज़ तलब जैसी घबराहट! उसने आयोजन-स्थल स्थित प्रभाकर के दफ़्तर का रुख़ किया।

भीतर कई आई.ए.एस. अफसर-कम-साहित्यकार बैठे हैं। साथ ही, हिन्दी के एक ऊँचे समीक्षक, एक ग्लैमरस लेखिका और एक युवा कवि लड़का भी वहाँ है।

ऊँचे माहौल में पड़ते ही विराट के भीतर का मातादीन मिरोंगिया सिकुड़ गया। बड़ी झिझक के साथ उसने प्रवेष किया।


‘‘अरे, आओ आओ हमारे यत्न-रत्न! सुबह से कहाँ हो भई ? हमारे ख़ास मेहमान तुमसे मिलना चाहते हैं।’’


शिष्टता से मुस्कुराता विराट इंगित की गई सोफ़ा-कुर्सी पर बैठ गया। मेज़ पर एक नई किताब पड़ी है। उसने अनायास उठा ली। आमोद प्रभाकर का नया कथा संग्रह ‘बिखरे रत्न’ ! और प्रकाशक पेंग्विन बुक्स इंडिया !! विश्व के इतने बड़े प्रकाशन हाउस से ये तेईस कहानियाँ आई हैं !!! इसी किताब का आज लोकापर्ण होना है इसी समारोह में। विराट की आँखों में आँसू आते-आते रह गये। ...लाख रुपट्टी के बदले अपना सर्वश्रेष्ठ बेच दिया। -और अब ये बात साहित्य-स्ट्रीम का बच्चा-बच्चा जानता है !!

शाम भव्य समारोह में उसे ‘यत्न-रत्न’ से नवाज़ा गया। प्रसिद्ध लोग मंच-माइक से उसकी प्रषंसा करते रहे, तालियाँ बजती रहीं, मीडिया कवरेज़ होता रहा; लेकिन पूरे समय विराट ऐसा दिख रहा था जैसे किसी शरीर से आत्मा ग़ायब हो गई हो -नहीं ! दरअसल, उसकी आत्मा ग़ायब नहीं हुई थी। वो भीतर के अंधेरे में पड़ी सिसक रही थी -निर्मम बलात्कार से गुज़री किसी मासूम लड़की की तरह।

देर रात गये वो अपने कमरे पर लौटा। हाथों में वज़न असहनीय हो चला है। महानगरीय फूलों के दर्जन के लगभग बुके थे। उसने सब बालकनी में डाल दिये जैसे इमली की ताक़तवर डाल के सामने अपने हथियारों सहित सरेंडर कर दिया हो!

एक वज़नदार प्रतिमा मिली थी माँ सरस्वती की जो उसने टेबल पर रख दी और ऊपर से चादर से ढाँप दी -दिल में कहीं लगा, माँ सरस्वती उसे ऐसे देख रही हैं जैसे किसी निर्मम हत्यारे को देखा जाता है। उसे अपनेआप पर इतनी शर्म आ रही थी इस समय कि उसने वो लिफ़ाफ़ा भी खोलकर नहीं देखा जिसमें लाख रुपये का बैंक-ड्राफ़्ट रहा होगा। लिफ़ाफ़ा उसने अपनी क़ीमती काग़ज़ों वाले बीफ्रकेस में बंद कर दिया। और उन्हीं कपड़ों-जूतों में कई घण्टों तक बिस्तर पर यों ही पड़ा रहा -स्तब्धता से षून्य की ओर बढ़ता हुआ। स्तब्धता से आगे अगर शून्य है तो हर शून्य से आगे एक नई शुरुआत है।

एक नई शुरुआत !!! -उसके भीतर जैसे आत्मा लौट आई। उठा और अपना सामान पैक करने लगा। सबकुछ -अपना सबकुछ समेट लिया उसने चंद घण्टों में। पैक सामान जब वो कमरे से बाहर निकाल रहा था, पूरब दिशा एक नये सूर्य की आहट से उजली हो उठी थी। गौरेयों की चह-चह से सुबह ऐसे जागती जा रही है जैसे उनींदी पलकें झपकाती कोई नन्ही लड़की सोई-सोई-सी उठ बैठी है। सड़क पर एक जमादार झाडू लगा रहा था। हाकर लड़का इस-उस दरवाज़े के आगे अख़बार डाल रहा था। इत्तेफ़ाक से उसे एक ख़ाली टेम्पो दिखा। अपना सबकुछ समेट-सम्हालकर वो टेम्पो में आ बैठा। आदिनाथ सर के घर का पता उसकी ज़ुबान पर अपनेआप आ गया जैसे और टेम्पो चल पड़ा।

आदिनाथ बाहर बगीचे के बाँस-सोफ़े पर बैठे चाय पी रहे थे। बाउन्ड्रर-द्वार के आगे सामान से लदा-फदा टैम्पो रुकता देख खड़े हो गये। विराट ने टेम्पो से उतरकर गुरू के चरण स्पर्श किये।


‘‘तुम इतनी सुबह ? और ये सामान-असबाब ?? सब ख़ैरियत तो है ?’’


‘‘अब ख़ैरियत है सर। घर वापिस जा रहा हूँ।’’ -उसके चेहरे पर आज की सुबह अपनी पूरी ताज़गी में खिल उठी है।


‘‘गाँव जा रहे हो ?? ख़ैर, वज़ह मैं नहीं पूछूँगा। कुछ-कुछ समझ सकता हूँ तुम्हारी मनस्थिति को। ग़लतियाँ सबसे होती हैं। जाने दो ख़ैर। मुँह से निकलते ही बात छोटी हो जाती है। आओ, तुम्हारे लिए ब्लैक टी बनाता हूँ। घर में तो अभी सब सोये पड़े हैं।’’


‘‘नहीं सर। अब चलता हूँ। ट्रेन का समय हो रहा है। अपने कमरे का किराया तो मैंने परसों ही चुकाया था। मेरी मोटरसाईकिल मेरा एक दोस्त ले गया है दो दिनों से। उसे फ़ोन कर दूँगा, यहाँ रख जायेगा। बाद में, यहाँ से ले जाकर ट्रेन से मुझे पार्सल कर देगा। तो आज्ञा दीजिये। आज की पहली ही गाड़ी से निकल जाऊँगा।’’


‘‘तुम तो हवा के घोड़े पर सवार होकर आये हो एकदम ! अरे भई, एक मिनिट तो ठहरो। मैं आता हूँ।’’

आदिनाथ उसे हाथ से ठहरने का बार-बार इशारा करते भीतर चले गये। उनके हाथ में चाँदी की मूठ वाली छड़ी थी। उसने पहली बार सर को छड़ी के सहारे जाते देखा। सर इन दिनों जैसे ज़्यादा ही तेज़ी से बूढ़े हो गये हैं। तो क्या वे सब अफ़वाहें सच हैं कि पिछले दिनों आराध्या को हृदयेश के साथ कई बार होटलों से बाहर निकलते, पार्कों में घूमते और बंद गाड़ी मे जाते हुए देखा गया ? और विराट ये समझ रहा था कि उससे द्वेशवश सुनंदा ने ये बातें उड़ाई हैं। विराट अपनी मूर्खता पर आप ही मुस्कुरा उठा। सर भीतर से लौट आये हैं। उनके हाथ में शादी का एक कार्ड है।

‘‘ अरु की शादी है इसी पच्चीस तारीख़ को। मैं आता तुम्हारे कमरे पर कार्ड देने। अब तुम जा रहे हो तो यहीं दे रहा हूँ ’’

अब विराट एकदम चुप। आदिनाथ ने उसका कंधा थपथपाया,

‘‘मैं जानता हूँ तुम्हें ये बुरा लग रहा है कि मैंने तुम से सलाह-मशविरा नहीं किया। कोई काम नहीं बताया और अब तुम विदा लेने आये हो तो यों परायों की तरह अपनी बेटी की शादी की ख़बर तुम्हें सुना रहा हूँ! वो हुआ यों बेटे कि पिछले दिनों तुम्हारा नाम जिस तरह से विवादित रहा है, तुम्हारे यत्न-रत्न और प्रभाकर के कथा-संग्रह के कनेक्शन वाले मामले में, तुम्हारी शराबनोशी के बारे में भी जो अफ़वाहे उड़ती रही हैं इधर। फिर ये भी कहीं सुनने में आया कि तुम शराब पीकर आराध्या के बारे में अर्नगर्ल बातें करते हो, तो मेरे होने वाले दामाद ने भी और घर में भी सब ने यही कहा कि मैं तुम्हें ना बुलाऊँ लेकिन मैंने उन सब को दो टूक उत्तर दे दिया कि मैं विराट के कमरे पर कार्ड देने ज़रूर जाऊँगा। वो बच्चा है मेरा !’’ -आदिनाथ ने उसके सिर पर हाथ फेरा। चश्मा उतारकर अपनी आँखें पोंछी।

विराट का दिल भर आया। आज सर हिन्दी आलोचना के दृढ़ दिशा पुरुष नहीं लग रहे हैं। वे एक असहाय, बूढ़े पिता दिख रहे हैं।


‘‘घर पहुँचकर मैं भी शादी कर लूँगा सर।’’


‘‘कोई लड़की है तुम्हारे मन में ?’’ -सर ने दुलार से पूछा।


‘‘है तो सही; अगर अब तक मेरी राह देख रही होगी तो !’’


सर के चरण स्पर्श कर विराट ने विदा ली।


‘‘तुमने तो निमंत्रण कार्ड खोलकर भी नहीं देखा ? जानना नहीं चाहोगे अरु की शादी किसके साथ हो रही है?’’


‘‘मैं जानता हूँ सर।’’ बाउन्ड्री का गेट बाहरी तरफ से बंद करता विराट जाते हुए बोला। उसके चेहरे पर नम मुस्कुराहट थी, ...ऐसी मुस्कुराहट जो रोने से बचने के लिए जबरन लाई जाती है चेहरे पर; और जो चेहरे को, रोते हुए चेहरे से कहीं ज़्यादा दयनीय बना देती है।

 आदिनाथ ने एक लम्बी साँस ली। जीवन भर प्रतिष्ठा का जीवन जिये पिता के भीतर बदनाम बेटी के लिए शर्मिन्दगी गहरे तीर-सी आरपार उतरती चली गई।

...कभी विराट उनके मन में था, आराध्या के लिए !



संपर्क

इंदिरा दाँगी

खेड़ापति हनुमान मंदिर के पास, 
लाऊखेड़ी, एयरपोर्ट रोड, 
भोपाल (म.प्र.) 4620 30
मोबाईल: 08109352499

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