ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया


ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया

अनुवाद ही दुनिया को जानने और दूसरी संस्कृति को समझते हुए अपनी संस्कृति के और करीब आने का जरिया है

कहते हैं किसी बुद्धिजीवी से आमने-सामने बैठकर की गई बातचीत आपको दस किताबों के बराबर ज्ञान दे देती है। लेकिन जब सामने प्रसिद्ध लेखिका नमिता गोखले, यूनिवर्सिटी के अंग्रेजी विभाग की डीन मालाश्री लाल, अनुवाद के क्षेत्र के विशेषज्ञ रक्षंदा जलील और अरुणि कश्यप व पब्लिशिंग के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम करने वाली जया भट्टाचार्य हों तो आपको महज दस किताबों का नहीं बल्कि इतने सालों में उनके किए काम का अनुभव भी मिलता है। ये अवसर था यात्रा बुक्स की नयी किताब “ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया” पर आयोजित एक चर्चा का, जिसमें साहित्य अकादेमी ने समग्र भूमिका निभाई। साहित्य अकादेमी की तरफ से सत्र शुरू करते हुए वहां की उप-सचिव गीतांजलि ने भाषा की महत्ता, उसकी विविधता पर बात करते हुए बताया कि अकादेमी की पूरी कोशिश भाषा के क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ देने की है।


यात्रा बुक्स की प्रकाशक नीता गुप्ता ने अनुवाद और इस किताब से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए इस किताब के लिए मिले पहले लेख के बारे में बताया, जिसमें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की मिनी कृष्णन ने जिक्र किया था, “दुनिया भर में अनुवाद मुख्यतः अन्य भाषा से मातृ भाषा में ही किया जाता है, सिर्फ भारत में ही हम अंग्रेजी में अनुवाद के माध्यम से दीवार की ओर पीठ होने के बावजूद छलांग लगाकर दीवार पार करने की कोशिश करते हैं।” मतलब मातृ भाषा के अतिरिक्त दूसरी भाषा में अपना साहित्य, अपना मत पहुंचा रहे हैं... दरअसल ये किसी भी अनुवादक के लिए गर्व की बात है।



अनुवाद की बात पर असमी और अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले अरुणि कश्यप ने बताया कि अनुवाद करते समय ज्यादा फुटनोट देना उन्हें अखरता हैं, उनकी कोशिश रहती है कि जहां तक हों सके सन्दर्भ को टेक्स्ट में ही स्पष्ट कर दिया जाए, जिससे भाषा का प्रवाह बाधित न हो। वहीं हिन्दुस्तानी और अंग्रेजी में अनुवाद करने वाली रक्षंदा ने अपना पक्ष रखते हुए बताया कि फुटनोट उन्हें कुछ विशेष सन्दर्भ अपने पाठकों तक पहुँचाने की सहूलियत देते हैं। “मंदिर और मस्जिद” के अंग्रेजी अनुवाद के बारे में बताते हुए उन्होंने कुछ खास सन्दर्भों का जिक्र किया, जिन्हें बिना फुटनोट के सही से व्यक्त नहीं किया जा सकता। यही मालाश्री लाल के उस सवाल का जवाब भी था, जिसमें उन्होंने पूछा था कि “मंगलसूत्र, करवाचौथ जैसे सन्दर्भों को अनुवाद में कैसे व्यक्त किया जा सकता है?”

जया भट्टाचार्य ने अपने अनुभव से बताया कि इन कुछ सालों में पब्लिशिंग में अनुवाद का जोर बढ़ा है। अधिकांश प्रकाशकों की लिस्ट में अनुवाद की भागीदारी बढ़ी है, और अनुवाद की गुणवत्ता में भी फर्क देखने को आया है। प्रकाशन और उसके प्रमोशन में उन्होंने नई तकनीकों के योगदान पर जोर देते हुए वाणी प्रकाशन के यू-ट्यूब के इस्तेमाल का उदाहरण दिया।

जयपुर साहित्योत्सव की निदेशक और लेखिका नमिता ने साहित्योत्सव शुरू करने में हुई शुरुआती जद्दोजहद के बारे बताया और ये भी कि अनुवाद को दोयम दर्जे का मानने वाले इस समाज में कैसे भाषाओं ने अपनी सीमाएं लांघकर जगह बनाई।

भले ही तकनीक या विषय के हिसाब से अनुवाद के स्तर कितने ही भिन्न क्यों न रहें, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनुवाद ही दुनिया को जानने और दूसरी संस्कृति को समझते हुए अपनी संस्कृति के और करीब आने का जरिया है। ये एक ऐसे खिड़की है, जहां हम अपने परिवेश में रहते हुए ही बाहरी दुनिया का नजारा कर सकते हैं। “ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया” तो एक माध्यम है, इस सफर पर आगे बढ़ने का, तो इंडिया पढ़ो-पढ़ाओ.

००००००००००००००००

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

ये पढ़ी हैं आपने?

ईदगाह: मुंशी प्रेमचंद की अमर कहानी | Idgah by Munshi Premchand for Eid 2025
चित्तकोबरा क्या है? पढ़िए मृदुला गर्ग के उपन्यास का अंश - कुछ क्षण अँधेरा और पल सकता है | Chitkobra Upanyas - Mridula Garg
ज़ेहाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल Zehaal-e-miskeen makun taghaful زحالِ مسکیں مکن تغافل
पानियों पर लिखे बेवतन लोगों के अफ़साने — कहानी — मधु कंकरिया | Hindi Story on Stranded Pakistanis by Madhu Kankaria
मैत्रेयी पुष्पा की कहानियाँ — 'पगला गई है भागवती!...'
समीक्षा: मुजीब रिज़वी की किताब ‘सब लिखनी कै लिखु संसारा: पद्मावत और जायसी की दुनिया’ — दिव्या तिवारी | Padmavat Aur Jayasi Ki Duniya
Hindi Story: 'शतरंज के खिलाड़ी' — मुंशी प्रेमचंद की हिन्दी कहानी
मन्नू भंडारी: कहानी - एक कहानी यह भी (आत्मकथ्य)  Manu Bhandari - Hindi Kahani - Atmakathy
आज का नीरो: राजेंद्र राजन की चार कविताएं
Harvard, Columbia, Yale, Stanford, Tufts and other US university student & alumni STATEMENT ON POLICE BRUTALITY ON UNIVERSITY CAMPUSES