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ज़हर की जड़ें: सांप्रदायिकता और गांधीवादी नज़रिया— रामचन्द्र गुहा @Ram_Guha

मार्च 4, 2017


सांप्रदायिकता पर गांधीवादी नज़रिया

रामचन्द्र गुहा

Ramachandra Guha (Photo: Bharat Tiwari)
Ramachandra Guha (Photo: Bharat Tiwari)


अप्रैल 1941 में, जब अहमदाबाद दंगों की चपेट में आया, तीन दिनों तक हिंसा होती रही, कई जानें गईं और तमाम घर नष्ट हो गए। दंगाइयों ने मजारों-मंदिरों-मस्जिदों को भी नहीं बख्शा। 1941 में अहमदाबाद में जो कुछ हुआ, वह पूरे देश में हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की परिणति थी। समस्त भारतीयों का प्रतिनिधित्व करने के कांग्रेस के दावे को कमजोर करते हुए मुस्लिम लीग मजबूत हो रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ने के बाद कांग्रेस सरकारों ने इस्तीफा भले दे दिया, मगर ध्रुवीकरण जारी था। मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग वाला कथित ‘पाकिस्तान संकल्प’ पारित कर दिया था, तो हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदू अतिवादी गुट अपने भड़काऊ तौर-तरीकों पर कायम थे।

सांप्रदायिक एकता या सद्भाव सही अर्थ में तभी संभव है, जब यह जमीनी तौर पर सकारात्मक सोच के साथ क्रियान्वित होती दिखाई दे।

अहमदाबाद के दंगे से गांधीजी व्यथित थे। दंगों की जानकारी मिलते ही उन्होंने अपने सचिव व विश्वासपात्र महादेव देसाई को वहां भेजा। देसाई कई हफ्ते वहां रहे और समाज के हर तबके से मिले। उन्होंने दंगों पर एक लंबी रिपोर्ट भी लिखी, जो अब तक अप्रकाशित है। दिल को गहराई से छूने वाली यह रिपोर्ट समकालीन भारत के सांप्रदायिक हालात के परिप्रेक्ष्य में भी अत्यंत मौजूं है।
अहमदाबाद के दंगे से गांधीजी व्यथित थे। दंगों की जानकारी मिलते ही उन्होंने अपने सचिव व विश्वासपात्र महादेव देसाई को वहां भेजा।


गुंडा अपने से कुछ करता नहीं। वह हमेशा समाज के कायर और शोषक तत्वों की छत्रछाया में पनपता है ...

अहमदाबाद के हालात देखकर देसाई भी बहुत व्यथित हुए थे। खासतौर से मकबरों, मंदिरों और मस्जिदों को हुए नुकसान से। उन्होंने इसे कायरतापूर्ण व बर्बर कार्रवाई बताया। देसाई लिखते हैं, ‘संभव है कि मुसलमानों ने कुछ किया हो, लेकिन आश्वस्त हूं कि वे साजिश का शिकार बने और साजिशकर्ताओं ने धार्मिक मतभेद का फायदा उठाकर अपने काम को अंजाम दिया। यदि मेरे हाथ में होता, तो मैं सबसे पहले मस्जिदों-मकबरों को उनके मूल रूप में बहाल करवाता। यह सांप्रदायिक सद्भाव के साथ आपसी समझदारी का मार्ग खोलने में सहायक होता।

महादेव देसाई की लड़ाई का मकसद देश की सैद्धांतिक आजादी नहीं, बल्कि असहमतियों के बीच से उपजी सहमति के साथ वास्तविक आजादी पाना था

उनकी नजर में ‘सांप्रदायिक एकता या सद्भाव सही अर्थ में तभी संभव है, जब यह जमीनी तौर पर सकारात्मक सोच के साथ क्रियान्वित होती दिखाई दे।’ वह चाहते थे कि इसकी अगुआई सिविल सोसाइटी वाले करें। देसाई लिखते हैं कि 1941 में सरकार सामाजिक सौहार्द की बजाय ब्रिटिश शासन के पैर मजबूती से जमाने में ज्यादा रुचि ले रही थी। वह मानते हैं कि ‘हिंदुओं और मुसलमानों के बीच स्थायी शांति और सद्भाव परस्पर समझदारी से ही आ सकता है।’

सामाजिक शांति व सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है।

देसाई आगे नागरिकता की भावना की बहाली की बात करते हैं। कहते हैं कि ‘समाज में बुरे लोग रहेंगे ही, यानी गुंडों का खात्मा मुश्किल काम होगा। पर यह भी सही है कि गुंडा अपने से कुछ करता नहीं। वह हमेशा समाज के कायर और शोषक तत्वों की छत्रछाया में पनपता है ...यही लोग थे, जिन्होंने इन गुंडों को पाला-पोसा, इन्हीं लोगों ने जघन्य अपराधों में युवाओं को धकेला। यह सब दोनों पक्षों की संकीर्ण सोच का कुफल था।’

महादेव देसाई जिस दूसरे बिंदु की बात करते हैं, दुर्भाग्य से वह अपने उसी रूप में आज भी कायम है। यह है व्यवस्था से नाराज, असंतुष्ट युवाओं का संकीर्ण स्वार्थों के लिए इस्तेमाल। 

गांधी की तरह महादेव देसाई के लिए भी राजनीतिक रूप से आजाद उस समाज का कोई मतलब न था, जहां हिंदू-मुस्लिम सद्भाव न हो। गांधी और देसाई ने अपना आकर्षक कानूनी करियर यूं ही नहीं छोड़ दिया, इतना लंबा जेल जीवन यूं ही नहीं बिताया। उनकी लड़ाई का मकसद देश की सैद्धांतिक आजादी नहीं, बल्कि असहमतियों के बीच से उपजी सहमति के साथ वास्तविक आजादी पाना था। गांधी के साथ के अपने पच्चीस वर्षों में देसाई उससे पहले कभी इतने निराश नहीं दिखे। उन्होंने लिखा है, ‘स्वराज के लिए संघर्ष लंबा और कठिन जरूर है, लेकिन यह इतना लंबा और कठिन होगा, यह नहीं सोचा था।

महादेव देसाई चीजों को यूं ही हाथ से निकलते देखने वाले इंसान भी नहीं थे। लिखते हैं, ‘जिन्होंने स्वराज की लड़ाई के लिए खुद को समर्पित कर दिया, उन्हें यह लड़ाई अपने मिशन और सिद्धांतों के प्रति भरोसे के साथ जारी रखनी होगी। न भूलें कि सिद्धांत और आदर्श हमारा इंतजार नहीं कर रहे थे। यह हम थे, जिन्हें इनकी जरूरत थी। यदि हम सोच लें और नई शुरुआत करें, तो आज की तारीख में हमारे बीच जो सांप्रदायिक झगड़े हैं, वे हमेशा के लिए हमारे साथ नहीं रहेंगे।

महादेव देसाई ने 1941 में जिन बिंदुओं पर चिंता जताई थी, उनमें दो खासतौर से अब भी प्रासंगिक हैं। पहला तो यही कि सामाजिक शांति व सद्भाव बनाए रखने की जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है। कुछ राजनेता इसके लिए काम करना भी चाहते हैं, तो एक बड़ी जमात ऐसे नेताओं व मंत्रियों की होती है, जो सांप्रदायिक तनाव कराते हैं और उस पर अपनी रोटी सेंकते हैं। ऐसे में, जब नेहरू अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न रोकने के लिए सारे प्रयास करते हैं, तो उन्हीं के प्रपौत्र राजीव गांधी के शासन में 1984 में सिख विरोधी हिंसा का उभार दिखता है। इसी तरह, महाराष्ट्र में 1992-93, गुजरात में 2002, उत्तर प्रदेश में 2012 में अल्पसंख्यकों के खिलाफ सरकार पोषित हिंसा की कुछ घटनाएं सामने आती हैं। 1989-90 में कश्मीर को भी नहीं भूल सकते, जब घाटी से कश्मीरी पंडितों को भगाने का काम हो रहा था।

महादेव देसाई जिस दूसरे बिंदु की बात करते हैं, दुर्भाग्य से वह अपने उसी रूप में आज भी कायम है। यह है व्यवस्था से नाराज, असंतुष्ट युवाओं का संकीर्ण स्वार्थों के लिए इस्तेमाल। भारत में आज ऐसे राजनीतिक संगठनों की कमी नहीं है, जो ऐसे युवाओं का घृणित कामों में अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। हिंदू कट्टरवादी बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद हैं, तो कश्मीर में सक्रिय इस्लामी कट्टरवादी लश्कर और हिज्बुल भी हैं। अंध राष्ट्रभक्त शिवसेना और मनसे हैं, तो मध्य और पूर्व भारत में सक्रिय माओवादी भी इनमें शिामल हैं।

महादेव देसाई की 1941 वाली रिपोर्ट एक तरह से कांग्रेस को सतर्क करने के लिए खतरे की घंटी की तरह आई थी। उस समय कांग्रेस ने कुछ काम तो किए, जिनसे उसकी विश्वसनीयता बनी होगी, लेकिन आज 75 साल बाद यह भ्रष्ट और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। यह कल्पना से भी परे है कि केंद्र की मोदी सरकार गांधी और महादेव देसाई जैसे उनसे बहुत बड़े गुजरातियों की नीतियों पर सोचेगी और चलेगी। अब यह संकीर्ण पूर्वाग्रहों से दूर रहने वाले सिविल सोसाइटी समूहों पर है कि वे गांधी और देसाई के सहिष्णुता, शुद्धतावाद, परस्पर समझदारी और परस्पर सद्भाव के संदेश उन भारतीयों तक ले जाएं, जो आज भी अच्छा सुनना और अच्छा करना चाहते हैं। 

(साभार हिंदुस्तान | लेखक के अपने विचार हैं।)
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