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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास से ही भारत का विकास संभव है - डॉ पीएस वोहरा


गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विकास से ही भारत का विकास संभव है।

- डॉ पीएस वोहरा


भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी एक दीर्घकालीन वैश्विक पहचान है जो कि भारत की संस्कृति व गौरवशाली सभ्यता में समाहित है। प्राचीन समय से ही हमने विभिन्न क्षेत्रों में अनेक आयाम स्थापित किए हैं, जिनका योगदान विश्व के विकास में सदैव ही रहा है और भारतीय शिक्षा भी उनमें से एक रही है। इन सबके बावजूद वर्तमान परिदृश्य में अगर समझा जाए तो यह स्पष्ट है कि आज भी भारत विश्व के अनेक विकसित राष्ट्रों से बहुत पीछे हैं और यह तुलना आर्थिक विकास को आधार बनाकर की जाती है। यह सत्य भी है क्योंकि आर्थिक विकास ही सफलता का एक आधार होता है। इस दशा में यह भी समझना अत्यंत आवश्यक है कि अगर भारत आज कई विकसित राष्ट्रों से पीछे है तो इसका मतलब हमारी शिक्षा के प्रसार का स्तर भी तुलनात्मक रूप से उनसे काफी कमजोर है।

अगर विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि निम्न बिंदु भारतीय शिक्षा प्रणाली की विभिन्न कमियों को उजागर करते हैं जिनमें प्रथम बिंदु के अंतर्गत आज आजादी के 70 वर्षों से ज्यादा समय बीतने के बाद भी भारतीय शिक्षा सभी नागरिकों को प्राप्त नहीं हो रही है। दूसरे बिंदु के अंतर्गत भारतीय शिक्षा प्रणाली का रोजगारों की उपलब्धता से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। तीसरे बिंदु के अंतर्गत भारतीय शिक्षा प्रणाली में पूर्ण गुणवत्ता विद्यमान नहीं है। चौथे बिंदु के अंतर्गत यह एक सामाजिक अवधारणा बन गई है कि भारत में अच्छी शिक्षा का स्तर महंगा है। पांचवें बिंदु के अंतर्गत भारतीय शिक्षा प्रणाली के विभिन्न स्तंभों के अंतर्गत आपसी तालमेल नहीं है। छठे बिंदु के अंतर्गत भारतीय शिक्षक स्वयं इस बात से अनभिज्ञ है कि उसे विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में क्या भूमिका निभानी है। सातवें बिंदु के अंतर्गत भारत में ग्रामीण व छोटे शहरों की जनसंख्या को शैक्षणिक सुविधाएं निम्न स्तर की मिल रही है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में भारत की साक्षरता दर 74.04 प्रतिशत है। यह बहुत विचलित करने वाली हकीकत है क्योंकि हम इस बात पर पूर्णतया सहमति रखते हैं कि शिक्षा, आर्थिक विकास की नींव है। भारत के संपूर्ण साक्षरता दर हासिल करने में सबसे बड़ी रुकावट भारत की विशाल जनसंख्या का होना एक बहुत बड़ा कारण है। परंतु 70 वर्ष से अधिक समय बीतने के बाद भी क्या हम हमेशा शिक्षा की उपलब्धता के लिए जनसंख्या को ही एक रुकावट मानते रहेंगे? पर शायद मानते रहे हैं और उसका परिणाम आज हमारे सामने है कि हम विकसित राष्ट्रों से बहुत पीछे हैं।  

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सबसे ज्वलंत समस्या के रूप में बेरोजगारी की समस्या है तथा हर एक सरकार के लिए रोजगारों की मात्रा में वृद्धि करना एक चुनौती रही है। हमें यह विश्वास करना होगा कि इस कमी के पीछे संसाधनों की कमी तो एक कारण है ही परंतु इसके साथ ही हमारे समाज में हर सामान्य स्तर पर देखा जा सकता है कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली रोजगारों को उपलब्ध नहीं करवाती है। विद्यार्थी चाहे तीव्र बुद्धिमान हो या अच्छी अकादमिक सफलता रखता हो, उसे भी अपने जीवन में सफलता के लिए संघर्ष करना पड़ता है । मनचाही सफलता का प्रतिशत हमारे देश में अत्यंत कम है क्योंकि ऐसा सिर्फ इसलिए है कि हमारी शिक्षा के अंतर्गत सभी प्रमुख स्तंभों जैसे कि विद्यालय, महाविद्यालय व इंडस्ट्री में आपसी तालमेल का अभाव है। विद्यालय यह नहीं समझ पाते हैं कि उन्हें अपने विद्यार्थी का विकास कैसे करना है ताकि बच्चों को महाविद्यालयों के अंतर्गत उच्च शिक्षा में समस्या ना हो और महाविद्यालय इस बात से परिचित नहीं है कि उसे शिक्षा देते समय विद्यार्थियों को वह सब भी दिया जाना चाहिए जो उन्हें उनके मनचाहे रोजगार के लिए इंडस्ट्री, उद्योग-धंधों या व्यापारिक घरानों की मुख्य आवश्यकता हो।  इन सब का परिणाम यह होता है कि वर्तमान शिक्षा विद्यार्थी को उचित रोजगार नहीं देती बल्कि विद्यार्थी अपने संघर्ष के माध्यम से ही उचित रोजगार को प्राप्त कर रहा है।

एक बात और बड़ी आसानी से समझी जा सकती है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में गुणवत्ता का कोई एक स्तर नहीं है या मैं ऐसे कहूं कि शिक्षा पद्धति की गुणवत्ता का स्तर अलग-अलग है तथा इसी कारण ग्रामीण व छोटे शहरों के विद्यार्थी, चाहे वे विद्यालयी शिक्षा में हो अथवा महाविद्यालयों की शिक्षा में हो, उनमें महानगरों के विद्यार्थियों के सामने एक हीन भावना अंतर्निहित होती है जो एक स्तर पर जाकर उनके आत्मविश्वास को कमजोर बनाती है। यह उस विद्यार्थी के लिए बड़ी घातक है जो अच्छे शैक्षणिक स्तर का होते हुए भी आत्मविश्वास की कमी के कारण बड़े शहरों में महानगरों के विद्यार्थियों के सामने चुनौती नहीं दे पाता है जिसके कारण आर्थिक विकास महानगरों तक ही सीमित रह गया है। 70 साल बीतने के बाद भी आज भी छोटे शहर व गांव इसी कारण तीव्र आर्थिक विकास से दूर हैं। इसी परिपेक्ष्य में एक अवधारणा  ने सामाजिक रूप ले लिया है कि शिक्षा अगर गुणवत्ता के साथ चाहिए तो वह महंगी ही होगी। हर अभिभावक निश्चित रूप से अपनी औलाद के लिए एक ही सपना देखता है कि वह अच्छी शिक्षा को ग्रहण करें ताकि उसका भविष्य सुरक्षित हो सके परंतु वह ता-उम्र इस अवधारणा को अपने साथ लेकर चलता है कि अगर वह आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो वह अपने बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कभी नहीं दिलवा पाएगा।

अब एक और शैक्षिक विडंबना की बात की जाए तो वह यह है कि शिक्षक वास्तविकता में इस बात से परिचित ही नहीं है कि उसकी जिम्मेदारी विद्यार्थियों का सर्वांगीण विकास करना है। पता नहीं क्यों एक शिक्षक अपनी जिम्मेदारी मात्र विद्यार्थी का अकादमिक विकास करने तक ही समझता है और शायद वह गलत भी नहीं है क्योंकि उसकी यह सोच समाज से ही विकसित हुई है। परंतु अब समय आ गया है कि इस पारंपरिक विचारधारा से ऊपर उठा जाय तथा शिक्षक को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि उसे विद्यार्थियों का विकास, विद्यार्थियों की मानसिक स्तर को देखते हुए करना है। मानसिक स्तर के अंतर्गत सर्वप्रथम उसे विद्यार्थी की रुचि या इच्छा को जानना तथा उसके बाद उसे विद्यार्थियों को  उससे संबंधित अवसर उपलब्ध करवाना ताकि विद्यार्थी अपनी श्रेष्ठता को स्थापित कर सके साथ ही उस रुचि से संबंधित  रोजगारों के  विकल्पों की जानकारी देना। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षक को यह जिम्मेदारी लेनी ही होगी। यहां पर यह भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि अभिभावक  व समाज इस बात को समझें कि मात्र शैक्षणिक विकास ही विद्यार्थी की सफलता का एक पैमाना नहीं होता है अपितु विद्यार्थी को उसकी रुचि व इच्छाओं के अवसर भी उपलब्ध करवाना भी चाहिए जिससे की उसकी श्रेष्ठता साबित हो सके।

अंत में अगर शिक्षा का आधुनिक समय के हिसाब से विकास होता है तो तीव्र सामाजिक विकास बिल्कुल निश्चित है क्योंकि इससे हमारी आने वाली पीढ़ी एक सभ्रांत नागरिक बनेगी तथा इसी के माध्यम से हम लोग एक नई तरह की लीडरशिप को अपने देश में उपलब्ध करवा पाएंगे,जो आर्थिक व राजनीतिक स्तर पर देश को नए आयाम देगी तथा उसके परिणामस्वरूप भारत आर्थिक विकास की दिशा में और अधिक सशक्त होगा।


Source of literacy ratio - https://censusofindia2021.com/
(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

[सुलझे विचारों वाले डॉ. पी. एस. वोहरा संवेदनशील व्यक्ति हैं साथ ही शिक्षाविद व कुशल प्रबंधक भी है। आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षिक मुद्दों पर तर्क और तथ्यों के साथ लिखने वाले डॉ. वोहरा के आर्टिकल्स देश के विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। आप समय-समय पर विभिन्न न्यूज चैनल के माध्यम से अपनी बात को बेबाकी से रखते आ रहे हैं। वर्तमान में डॉ. वोहरा बीकानेर की जानी-मानी कॉमर्स स्कूल बाफ'ना एकेडमी के सीईओ हैं।
ईमेल: drpsvohra@gmail.com]

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