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अनु सिंह चौधरी / 'नीला स्कार्फ' की कहानी 'हाथ की लकीरें' | Hindi Kahani from 'Neela Scarf' (Anu Singh Choudhary)

जुल॰ 11, 2014

हाथ की लकीरें - अनु सिंह चौधरी

हिंदी युग्म प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य अनु सिंह चौधरी के कहानी संग्रह 'नीला स्कार्फ'  की बारह कहानियों में से आप शब्दांकन पाठकों के लिए, उनकी लिखी पहली कहानी 'हाथ की लकीरें'...


"ऐ रनिया... रे रनिया। उठती है कि एक लात मारें पीठ पर? आंख के सामने से जरा देर को हटे नहीं कि पैर पसारकर सो रहती है! नौकर जात की यही तो खराब आदत है, जब देखो निगरानी करनी पड़ती है। अब उठेगी भी कि गोल-गोल आंख करके हमको ऐसे ही घूरती रहेगी?" 

मां ने बड़े प्यार से जिस बेटी का नाम ‘रानी कुमारी’ रखा होगा, उस रानी को मालकिन ने रनिया बना डाला है। नाम का ये अपभ्रंश रानी से ऐसे चिपका कि मालकिन और उनके घर के लोग तो क्या, अड़ोसी-पड़ोसी और रनिया के घरवाले भी उसका असली नाम भूल गए। 

सात साल की उम्र में ही रानी रनिया हो गई, और मालकिन का आलीशान घर उसकी दुनिया।   

हर रोज़ बिना लात-बात के रनिया की नींद खुलती नहीं है, सो उस दिन भी क्या खुलती? जेठ की चिलचिलाती दुपहरी तो अच्छे-अच्छों की पलकों पर भारी पड़ती है, फिर रनिया का तो यूं भी कुंभकर्ण से पुराना नाता है। उस दिन भी भरी दुपहर में खटाई डालने के लिए एक छईंटी कच्चे आम छीलने को कह दिया था मालकिन ने रनिया को, और ख़ुद चली गई थीं पलंग तोड़ने। अब नींद मालकिन की मुलाज़िम तो है नहीं, कि उनके कहे से रनिया के पास आती और जाती? 

ख़ैर, मालकिन की एक फटकार ने रनिया को बिल्कुल सीधा खड़ा कर दिया। वैसे कहीं भी सो रहने की पुरानी आदत है रनिया की। कहीं भी ऊंघने लगती है और और जाने कैसे-कैसे सपने देखती है! मिठाई-पकवान, साड़ी-कपड़े, बगल के बिन्नू, पड़ोस की मुनिया... सब आते हैं सपने में। 

आजकल भाभी जी बहुत आती हैं सपने में। अभी-अभी देखा कि भाभी जी...

“ओ महारानी! खड़े होकर खाली मुंह ताकेगी हमारा कि कुछ काम-धाम भी होगा?” रनिया सोच भी पाती कि उसके सपने में भाभी जी क्यों उदास बैठीं नारंगी रंग की साड़ी में गोटा लगा रही थीं कि मालकिन की एक लताड़ ने फिर से उसकी सोच में खलल डाल दिया। 

"अभी आंखें खोलकर सपने देखेंगे तो मालकिन हमारा यहीं भुर्ता बना देंगी," रनिया मन ही मन बुदबुदाई। हाथ-पैर सीधे करने का वक़्त न था। मालकिन के चीखने-चिल्लाने के बीच ही बड़ी तेज़ी से काम भी निपटाने थे। 

वैसे ठाकुर निवास में क़हर बाकी था अभी। रनिया को सोते देख भड़की मालकिन के क्रोध  की चपेट में घर के बाकी नौकर भी आ गए। मालकिन एक-एक कर सबकी किसी ना किसी पुरानी गलती की बघिया उधेड़ती रहीं। अब तो सब आकर रनिया की धुनाई कर देंगे! सबसे छोटी होने का यही तो नुकसान है। 

ऐसे में एक भाभी जी का कमरा ही रनिया की शरणस्थली बनता है। रनिया ने जल्दी से घड़े से ताज़ा ठंडा पानी तांबे की जग में उलटा और भाभी जी के कमरे की और बढ़ गई। 

इन दिनों ठाकुर निवास में उसे दिन भर भाभी जी की सेवा-सुश्रुषा की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है। यहां काम करनेवाला ड्राइवर कमेसर काका रनिया के टोले का है। रनिया को ठाकुर निवास में वही लेकर आया था। मां ने कितनी ही मिन्नतें की थी कमेसर की, तब जाकर हवेली के अहाते में काम मिला था उसको! सात की थी तब रनिया, अब चौदह की होने चली है। तब मालकिन के पैरों में तेल लगाना इकलौता काम था। अब प्रोमोशन हो गया है उसका। मालकिन की परछाई बना दी गई है रनिया। पिछले कुछ हफ़्तों से मालकिन ने रनिया को भाभी जी को सौंप दिया है। अपनी तिजोरी की चाभी सौंपने से पहले अपनी सबसे विश्वासपात्र नौकरानी बहुओं को सौंपना इस ठाकुर निवास का दस्तूर हो शायद!     

वैसे रनिया का एक घर भी है, जहां हर रोज़ देर शाम लौट जाती है वो। रनिया की मां पांच घरों में झाड़ू-पोंछे का काम करती है और बाप मटहरा चौक पर सब्ज़ियों की दुकान लगाता है। तीन बड़े भाई हैं और रनिया दो बहनों के बीच की है। सब काम पर लग गए हैं। वैसे मां को सुबह-सुबह आने वाली उल्टियों के दौर से लगता है, अभी परिवार के सदस्यों की संख्या पर पूर्ण विराम नहीं लगने वाला। 

मां जैसा ही हाल यहां भाभी जी का है। अंतर बस इतना है कि आठ सालों के इंतज़ार के बाद भाभी जी पहली बार मां बनने वाली हैं। पूरा परिवार जैसे उन्हें सिर आंखों पर रखता है। वैसे ठाकुर निवास के नौ कमरों के मकान में रहने वाले लोग ही कितने हैं! दिन भर पूरे घर को अपने सिर पर उठाए रखने वाली एक मालकिन, खूब गुस्सा करने वाले एक मालिक और एक भैया जी, जो काम के सिलसिले में जाने किस नगरी-नगरी घूमा करते हैं! पांच नौकरों और दो नौकरानियों की एक पलटन इन्हीं चार लोगों के लिए मुस्तैदी से तैनात रहती है। 

रनिया भाभी जी के कमरे में पानी रख आई है। भाभी जी सो रही हैं। दरवाज़ा खुलने की आहट से भी नहीं उठतीं। दिन भर बिस्तर पर ही रहती हैं वो। शाम होते-होते छत पर चली आती हैं और छत पर तबतक बैठी रहती हैं जब तक शाम ढ़लकर रात में न बदल जाती हो और रनिया के घर लौटने का समय न हो जाता हो। 

रनिया भाभी जी के आजू-बाजू परछाई की तरह डोलती रहती है। लेकिन अपनी परछाई से भला कौन बात करता है जो भाभी जी करेंगी? दोनों ने एक-दूसरे की ख़ामोशियों में सहजता ढूंढ ली है। एक को दूसरे के बोलने की कोई उम्मीद नहीं होती। एक उदास ख़ामोश आंखों से हुक्म देती रहती है, दूसरी ख़ामोश तत्परता से उसका पालन करती रहती है। दोनों अपने-अपने रोल में एकदम सहज हो गए हैं। 

इसलिए उस दिन अचानक भाभी जी ने चुप्पी तोड़ी तो रनिया भी चौंक गई। 

बात पिछले बुधवार की ही तो है। मालकिन का आदेश था कि भाभी जी झुक नहीं पातीं, इसलिए रनिया उनके पैर साफ कर दें। नाखून काटकर पैरों में आलता भी लगा दे। 

मालकिन के आदेशानुसार रनिया लोहे की बाल्टी में गर्म पानी ले आई थी। भाभी जी ने बिना कुछ कहे अपने पैर बाल्टी में डुबो दिए थे। रनिया भी बिना कुछ कहे गर्म पानी में डूबीं भाभी जी की गोरी एड़ियों की ओर देखती रही थी। 

"क्या देख रही है रनिया?" भाभी जी ने ही चुप्पी तोड़ी थी। 

"आपके पांव भाभीजी। कितने सुंदर हैं..." रनिया अपनी हैरानी छुपा न पाई थी। लेकिन ये न बोल पाई थी कि पाँव ही क्यों, भाभी जी आप ख़ुद भी तो कितनी सुन्दर हैं! मां नहीं कहती अकसर कि भैंस पर भी गोरे रंग का मुलम्मा चढ़ जाए तो लोग गाय की तरह पूजने लगें उसको! सब रंग का ही तो खेल है। और भाभी जी तो वाकई सुंदर हैं...   

उस दिन पहली बार भाभी जी के चेहरे पर हंसी देखी थी रनिया ने, जेठ को औचक भिंगो देने वाली बारिश की तरह! हंसकर बोलीं, "हाथ की लकीरें हैं रनिया कि ये पांव ऐसी जगह उतरे कि फूलों पर ही चलें!" 

फिर एक पल की चुप्पी के बाद बोलीं, "मुझे चलने के लिए इत्ती-सी फूलों की बगिया ही मिली है रनिया। तेरी तरह खुला आसमान नहीं मिला उड़ने को।" 

किसी को अपनी ज़िन्दगी मुकम्मल नहीं लगती। हर किसी को दूसरे का जिया ही बेहतर लगता है। रनिया को भाभी जी से रश्क होता है, भाभी जी रनिया का सोच कर हैरान होती हैं। कितना ही अच्छा होता कि ठाकुर निवास से निकल कर हर शाम कहीं और लौट सकतीं वो भी... 

रनिया से उस दिन पहली बार भाभी जी ने अपने मन की बात कह डाली थी, और रनिया ने भाभी जी के इस अफ़सोस को अपने पड़ोस के कुंए में डाल आने का फ़ैसला कर लिया था मन ही मन। 

कुछ बातें राज़ ही अच्छी। कुछ दर्द अनकहे ही भले। 

उस दिन अपना काम खत्म करने के बाद घर आकर जब रनिया हाथ-पैर धोने के लिए कुंए के पास गई तो फिर भाभी जी के गोरे पांवों का ख्याल आया। हाथ की लकीरों का ही तो दोष रहा होगा कि उसे ये बिवाइयों से भरे कटी-फटी लकीरों वाले पांव विरासत में मिले और भाभी जी को आलता लगे गोरे, सुंदर पांव। फूलों की बगिया और आसमान का वैसे भी कोई सीधा रिश्ता नहीं होता। 

उधर भाभी जी का पेट गुब्बारे की तरह फूलता जा रहा है और इधर मां का। दोनों के बीच रहकर रनिया का काम बढ़ता चला गया है। मालकिन तो भाभी जी को तिनका भी नहीं उठाने देतीं। भाभी जी का खाना भी बिस्तर तक पहुंचा दिया जाता है। रनिया को मालकिन ने सख्त हिदायत दे रखी है कि भाभी जी जब बाथरूम में भी हों तो वो दरवाज़े के बाहर उनका इंतज़ार करती रहे। 

ठाकुर निवास में पहली बार रनिया को इतने कम और इतने आसान काम मिले हैं। लेकिन भाभी जी की बोरियत देखते रहना, उनके साथ ख़ामोशी से रोज़-रोज़ दिन के कटते रहने का इंतज़ार करते रहना - इससे भारी काम रनिया ने अपनी पूरी ज़िन्दगी में कभी नहीं किया। 

और मां है कि उसका काम खत्म होने का नाम ही नहीं लेता। मां अभी भी उन पांचों घरों में सफाई का काम करने जाती है। इसलिए घर लौटकर रनिया और उसकी बहन चौके में जुट जाते हैं ताकि मां को थोड़ा आराम मिल सके। कम से कम घर में रनिया के पास कुछ अदब के काम तो हैं!

थकी-मांदी लौटी मां को जब रनिया आराम करने को कहती है तो मां कहती है, "अरे घबरा मत। हमको तो आदत है ऐसे काम करने की।" 

कभी-कभी बातों में भाभी जी का ज़िक्र भी चला आता है। "हम अपने हाथों में आराम की लकीरें लेकर पैदा नहीं हुए रनिया। तेरी भाभी जी सी किस्मत नहीं है मेरी कि नौ महीने बिस्तर तोड़ सकें। और वो भी कितनी बार? तेरी भाभी जी की तरह जप-तप की औलाद थोड़े है ये," मां अपने फूले हुए पेट की ओर इशारा करती है और वापस रोटियां बेलने में जुट जाती है। 

हाथ की लकीरें शायद पेट से ही बनकर आती हैं, रनिया सोचती है। जप-तप वाली लकीरें। यूं ही बन जाने वाली कटी-फटी बेमतलब की लकीरें। 

भाभी जी के लिए शहर के सबसे बड़े डॉक्टर के अस्पताल में कमरा किराए पर ले लिया गया है। आठवें महीने में ही उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया है और रनिया की ड्यूटी अब अस्पताल में लगा दी गई है। 

जाने कौन सा डर है मालकिन को कि सारा दिन पूजा-पाठ और मन्नतें मांगने में निकाल देती हैं और शाम को भाभी जी के पास प्रसाद का पूरा टोकरा लेकर चली आती हैं। अब किसी पर चीखती-चिल्लाती भी नहीं वो। क्या जाने कौन से रूप में विराजमान ईश्वर नाराज़ हो जाए? क्या जाने कब किसमें दुर्वासा ऋषि समा जाए? पूजा-पाठ के पुन्न-परताप से पोता हो जाए, इसके लिए शक्कर-सिंदूर के साथ हनुमान जी के सामने इक्यावन मंगलवारों का निर्जल व्रत भी कबूल आई हैं।

बच्चा होना इतनी बड़ी बात तो नहीं, रनिया सोचती है अक्सर! उसकी मां के तो हर साल एक हो जाता है। 

भैया जी काम से छुट्टी लेकर घर लौट आए हैं। वो भी पूरे दिन भाभीजी के सिरहाने बैठे रहते हैं। 

रनिया ने दोनों को अपने मां-बाप की तरह कभी लड़ते नहीं देखा, खूब बातें करते भी नहीं देखा। दोनों एक कमरे में रहकर भी कितने दूर-दूर लगते हैं। कुछ भी हो, लड़-झगड़कर ही सही, मां-बाबू बच्चे तो पैदा कर रहे हैं न हर साल! 

एक शाम रनिया अस्पताल से घर लौटती है तो मां का अजीब-सा खिंचा हुआ चेहरा देखकर डर जाती है। रनिया की बड़ी बहन सरिता बगल से मुनिया की दादी को बुला लाने गई है। 

मां का चेहरा दर्द से काला पड़ता जा रहा है। रनिया समझ नहीं पाती कि भागकर बाहर से किसी को बुला लाए या मां के बगल में बैठी उसे ढांढस बंधाती रहे। इससे पहले कभी उसने बच्चा होते देखा भी नहीं। हां, दीदियों से कुछ ऊटपटांग किस्से ज़रूर सुने हैं। 

रनिया मां की दाहिनी हथेली अपनी मुट्ठियों में दबा लेती है। साहस देने का और कोई तरीका रनिया को आता ही नहीं। 

मां बेहोशी के आलम में कुछ-कुछ बड़बड़ाती जा रही है। 

"संदूक में नीचे धुली हुई धोती है, निकाल ला... छोटे वाले पतीले में ही गर्म पानी करके देना... तेरा बाबू नहीं लौटा क्या... सरिता कहाँ मर गई, अभी तक लौटी क्यों नहीं..." 

पता नहीं कितने मिनटों और कितनी चीखों के बाद पीछे से उसकी बहन सरिता मुनिया की दादी और पड़ोस की दुलारी काकी को लेकर आती है। औरतों ने दोनों लड़कियों को कमरे से बाहर निकाल दिया है और खुद मां को संभालने में लग गई हैं। 

बाहर बैठी रनिया कुछ देर तो अंदर की अजीब-अजीब आवाज़ें सुनती रही है और फिर जाने कब आदतन ऊंघते-ऊंघते वहीं दरवाज़े के पास लुढ़क जाती है। 

मां के पेट से संपोला निकला है जो उसकी छाती से चिपका सब की ओर देखकर ज़हरीली फुफकारी मार रहा है। रनिया के हाथ में छोटी-सी छड़ी है, सोने की। रनिया अपनी सुनहरी छड़ी पर सांप का खून नहीं लगाना चाहती। बाबू उसकी चोटी खींच रहा है, “हाथ उठाती क्यों नहीं? कैसी पागल है तू रनिया...”

दुलारी काकी रनिया की चोटी खींच-खींचकर उसे जगा रही है। 

"कितना सोती है रे तू रनिया। कुंभकरन की सगी बहन है तू तो। एक घंटे से चिल्लाकर उठा रहे हैं। चल अंदर जा। भाई हुआ है तेरा। खूब सुंदर है, माथे पर काले-काले बाल और रंग तो एकदम लाट साब वाला... भक्क-भक्क सफेद। अरे समझ में नहीं आ रहा क्या बोल रहे हैं? ऐसे क्यों देख रही है? जा, अंदर जा। मां का ख्याल रख, समझी?" 

हक्की-बक्की रनिया उठकर भीतर चली आई है। बच्चा पैदा कर देने के बाद मां इत्मीनान और थकान की नींद सो रही है और उसके बगल में सफेद धोती में लिपटा उसका भाई गोल-गोल आंखें किए टुकुर-टुकुर ताक रहा है। रनिया झुककर उसे देखती रहती है और फिर उसी के बगल में लेट जाती है। सांप और सोने की लाठी वाला सपना कहीं गुम हो जाता है।

रनिया की नींद देर से खुलती है। मां तब तक वापस चौके में आ चुकी है और चूल्हा जला रही है। रनिया का नया भाई सो रहा है, बाबू काम पर जाने के लिए सब्ज़ी की टोकरियां निकाल रहा है और उसकी बड़ी बहन सरिता छोटकी को गोद में लिए दरवाज़े पर झाड़ू दे रही है। 

जल्दी-जल्दी हाथ-मुंह धोकर रनिया भाभी जी के पास अस्पताल की ओर भाग जाती है। डेढ़ महीने हो गए हैं भाभीजी को अस्पताल में! ये डॉक्टर भी कैसा पागल है! मां को बच्चा जनते देखकर तो डॉक्टर के पागल होने का शक और पुख्ता हो गया है। 

भाभीजी बीमार थोड़े हैं, बच्चा ही तो होना है उनको। फिर ये ताम-झाम क्यों? 

फिर एक दिन अस्पताल के दरवाज़े पर कमेसर काका रोक लेते हैं उसको। काका का चेहरा सूखा हुआ, आंखें लाल। रनिया को देखकर बोल पड़ते हैं, "घर जा रनिया। तेरी ज़रूरत नहीं अब भाभी जी को।" 

रनिया हैरान उन्हें देखती रहती है और फिर बिना कुछ कहे भाभी जी के कमरे की ओर बढ़ जाती है। रनिया सोचती है कि भाभी जी के डॉक्टर के साथ-साथ भैया जी के ड्राईवर कमेसर काका भी पागल हो गए हैं शायद! 

भाभी जी के कमरे के बाहर सन्नाटा है। अंदर वे लेटी हुई हैं, बिना पेट के। भैया जी गलियारे में डॉक्टर साहब से कुछ बात कर रहे हैं और मालकिन बगल में कुर्सी पर आंखें बंद किए बैठी हैं। कोई रनिया की ओर नहीं देखता। कोई रनिया से ये नहीं पूछता कि उसे आने में इतनी देर क्यों हो गई। 

पीछे से कमेसर काका उसका हाथ पकड़कर नीचे खींच ले जाता हैं। "लेकिन हुआ क्या है काका? भाभीजी तो कमरे में सो रही हैं। फिर सब इतने परेशान क्यों हैं? और उनको बेटी हुई या बेटा? मैंने पेट देखा उनका..." 

"भाभीजी के पेट से मरा हुआ बच्चा निकला रनिया। इतने दिन से इसी मरे हुए बच्चे की सेवा कर रही थी तू। बेचारी... कैसी किस्मत लेकर आई है ये बहू।" 

स्तब्ध खड़ी रनिया कमेसर काका के शब्दों के अर्थ टटोलने लगती है। 

"मरा हुआ बच्चा पेट से थोड़ी निकलता है किसी के? ये कमेसर काका न कुछ भी बकते हैं। मां के पेट से तो किन्ना सुंदर भाई निकला उसका। भाभी जी से ही पूछेंगे बाद में। अभी तो ये बुढ्ढा हमको अंदर जाने भी नहीं देगा," ये सोचकर रनिया धीरे से अस्पताल से बाहर निकल आई है। 

दोपहर को जब कमेसर काका भैया जी और मालकिन को लेकर घर की ओर निकलते हैं तो रनिया सीढ़ियां फांदती-कूदती भागती हुई भाभीजी के कमरे में जा पहुंचती है। 

रनिया को देखकर भाभी जी ठंडे स्वर में कहती हैं, "जा रनिया। मुझे तेरी ज़रूरत नहीं। मुझे तो अपनी भी ज़रूरत नहीं।" 

रनिया घर लौट आई है। किसी से कुछ नहीं कहती, बस अपने नवजात भाई को गोद में लिए बैठी रहती है। 

बैठे-बैठे ऊंघती हुई रनिया सपने में लाल सितारोंवाली साड़ी में भाभीजी को देखती है और उनकी गोद में देखती है सफेद कपड़े में लिपटा बेजान बच्चा। उसके भाई की गोल-गोल काजल लगी आंखें, मां का बढ़ा हुआ पेट, भाभी जी के आलता लगे पांव, खून-सी लाल फूलों की क्यारियां, हाथों की कटी-फटी उलझी हुई लकीरें... नींद में सब गड्ड-मड्ड हो गए हैं।

Anu Singh Choudhary 

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