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Book Review: मानस का हंस की आलोचना — विशाख राठी

जून 16, 2020


बुक रिव्यु: मानस का हंस 

अमृतलाल नागर कृत तुलसीदास के जीवन पर आधारित उपन्यास 

— विशाख राठी


मानस का हंस उपन्यास पाठक को बांधे रखता है, लेकिन जगह-जगह ऐसा आभास भी होता है कि आप 1960 के दशक की बनी किसी बम्बइया फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हैं, जिसमें हर तरह का मसाला है। मसाला होना अपने आप में कोई कमी नहीं है, लेकिन कहीं-कहीं वह फॉर्मूला के रूप में आता है तो अखरता है।   


लॉकडाउन में एक दिन खाली बैठे-बैठे अपने किंडल पर कुछ ढूंढ रहा था। अमृतलाल नागर का लिखा, तुलसीदास के जीवन पर आधारित उपन्यास, मानस का हंस दिखा तो डाउनलोड किया और पढ़ने लगा।

नागर जी ने भूमिका में लिखा है कि उनका तुलसीदास पर लिखने का मन तब हुआ जब वह बम्बई में अपने फिल्मकार मित्र महेश कौल के यहां किसी निजी कार्यक्रम के सिलसिले में गए हुए थे। उन्होंने महेश कौल को तुलसीदास के चरित्र पर फ़िल्म बनाने का सुझाव दिया, और कौल साहब ने उनसे सवाल करते हुए बोला, "गोसाईं जी की प्रामाणिक जीवन कथा कहाँ है?"  

नागर जी आगे बताते हैं कि हालाँकि तुलसी चरित पर उनके समकालीनों और शिष्यों ने 5 ग्रन्थ लिखे हैं, लेकिन उनमें से कोई भी प्रामाणिक नहीं जाना माना जाता। 



फ़िल्म बनाने की दृष्टि से लिखा गया

खुद नागर जी रंगमंच में रुचि रखते थे, और इसी सिलिसिले में तुलसीदास द्वारा शुरू कराई गयी बनारस की रामलीला-परंपरा के बारे में जब उन्होंने और पढ़ा-जाना तो उनके मन में तुलसी चरित रचने की इच्छा और प्रबल हुई। 

उपन्यास पढ़ते हुए यह लगातार आभास होता है कि उसे किसी फ़िल्म बनाने की दृष्टि से लिखा गया है। Flashback का उपयोग पूरे उपन्यास में शुरुआत से है। कई जगह डायलॉग फ़िल्मी महसूस होते हैं, और कुछ प्रसंग / पात्र भी।          

तुलसी ने अपनी पत्नी रत्ना और गोद में पल रहे पुत्र तारापति को छोड़ के ब्रम्हचर्य व्रत ले लिया था।  उपन्यासकार ने युवक तुलसीदास के मन के अंतर्द्वंदों को उजागर करने की कोशिश की है।  एक तरफ़ राम, तो दूसरी तरफ़ दुनियादारी। ब्याह से पहले एक तवायफ़ के साथ प्रेम प्रसंग भी है, जिसके बारे में नागर जी ने आमुख में स्पष्ट किया है कि उन्होंने उसे किस आधार पर उपन्यास में कल्पित किया (और यह भी कि उनका उद्देश्य किसी तुलसी-भक्त की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।) उस प्रसंग की साहित्यिक ज़रूरत को परे रख के सोचा जाए तो यह सवाल अवश्य आता है कि उपन्यास अगर आज के माहौल में लिखा गया होता, तो इस पर कैसी राजनीतिक-समाजिक प्रतिक्रिया होती।     

सेल्फ-मेड मैन

एक तरफ़ माँ-बाप के होते हुए भी तुलसीदास लगभग अनाथ अवस्था में पले-बड़े। कई कष्ट झेलने पड़े — भूख, लाचारी, अपमान, तिरस्कार सहने पड़े। यह उल्लेखनीय बात है की बावजूद इस सब के, तुलसी के मन में  खुद के प्रति कोई बहुत बड़ा तरस करने का भाव नहीं दर्शाया  गया है। वह पूरी तरह से 'सेल्फ-मेड मैन' की तरह उभरते हैं, और उस बात का भी कोई दम्भ उनके मन पर नज़र नहीं आता।    

तुलसी का पात्र एक न्याय-संगत, दीनबंधु, हृष्ट-पृष्ट, बेहद सुन्दर, रूपवान, और तेजशील नायक के रूप में गढ़ा गया है। सच के तरफ़दार तुलसीदास, समाज की रूढ़िवादी सोच से लोहा लेने में नहीं कतराते। जैसे जब वह ब्रह्म-हत्या आरोपित 'निचली जात' के व्यक्ति की सेवा करते हैं, या बनारस, अयोध्या और चित्रकूट में प्रभावशाली ब्राह्मण समाज से टक्कर लेते हैं। 

किसी जगह (अनायास ही) अगर वह सामजिक दबावों का शिकार होते दीखते हैं, तो स्त्री-सम्बन्ध के सन्दर्भ में ही। जैसे 'कुलटा' स्त्रियों का ज़िक्र आता है — जो साधु-संतों को 'अपने जाल में फंसाने' के उद्देश्य से आश्रमों के चक्कर काटती हैं।  

अयोध्या में जब वह एक आश्रम में 'कोठारी' का कार्य संभाले हुए हैं तब एक प्रसंग में आश्रम में रह रहे एक महंत से तुलसीदास कहते हैं — "न के लिए एक कुलटा स्त्री का सहारा लेना आप  जैसों को शोभा नहीं देता।"  

गोस्वामी पद ग्रहण करने के बाद जब उनकी खुद की पत्नी आश्रम में भी नहीं बल्कि सिर्फ़ काशी में रहने की 'इजाज़त' चाहती हैं तो तुलसीदास मना कर देते हैं — क्योंकि गोस्वामियों के लिए ऐसा करना अनुचित है (हालांकि उनसे पहले कुछ 'गोस्वामी' गृहस्थ जीवन के साथ-साथ अपने पद पर भी बने रहे हैं)। यही नहीं, उनको अपने नाई से सुनी बात से यह भी आभास होता है कि आम जनता और भक्तगण आदि उनके आचरण पर भी उंगली उठा सकते हैं।


तुलसीदास का 'दोगुनापन'

तवायफ़ों, अकेली रह रही महिलाओं, विधवाओं को लगभग पूरी तरह, एक पुरुष की नज़र से देखा गया है - किसी भोग की वस्तु की तरह। उनके चरित्र-पात्र वर्णन में उनके बाकी गुणों-अवगुणों का बखान करने की बजाय उनके नाक-नक़्शे की सुंदरता पर अधिकाधिक जोर दिया गया है।

तुलसीदास की पत्नी रत्ना की बुद्धिमत्ता, और तेज के बारे में नागर जी ने ज़रूर लिखा है। और जगह-जगह रत्ना के ज़रिये, तुलसीदास के राम-आसक्त होने के कारण व्यवहार में आये विरोधाभास पर भी सवाल उठाये हैं। 

रत्ना-तुलसीदास संवाद बहुत पैने प्रश्न उठाता है, जैसे यह:  

“महर्षि ने उत्तरकाण्ड में धोबी की निन्दा सुनकर श्रीराम के द्वारा सीता जी का त्याग कराया है। आपने मानस में वह प्रसंग क्यों नहीं उठाया?” 
तुलसीदास सुनकर चुप। 
चुप्पी लम्बी रही। 
“यदि मेरा प्रश्न अनुचित हो तो क्षमा करें।” 
“नहीं, तुम्हारा प्रश्न जितना सहज है मेरे लिए उसका उत्तर देना उतना सरल नहीं है।” 
“कोई बात नहीं, जाती हूँ।”

“उत्तर सुन जाओ, देवी, मैं तुमसे कुछ न छिपाऊँगा। जो अन्याय मैं तुम्हारे प्रति कर सका, वह मेरे रामचन्द्र जगदम्बा के प्रति नहीं कर सकते थे।”

तुलसीदास रूप-गुण संपन्न तो हैं ही, गजब प्रतिभावान भी हैं। जो कोई उनके वचन-कथा सुनते है, मोहित हुए बिना नहीं रह पाते — फिर वह चाहे आम नागरिक हों, संस्कृत के महापण्डित हों, या राजा-हाकिम हों। एक तरफ़ उनका यश आसमान छूता है तो दूसरी तरफ़ उनसे ईर्ष्या करने वाले पंडित-प्रवाचक भी प्रभावशाली रोड़ों के रूप में उभरते हैं। 

इनमे से कुछ ईर्ष्यालु तो उनकी जान लेने तक पर आमादा हो जाते हैं, लेकिन जब जब तुलसीदास का पाला उनसे पड़ता है (अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप में), वह बात को तूल पकड़ने देने के पक्ष में कभी नहीं रहते, बल्कि खुद को ही घटनास्थल से अलग करते जाते हैं — कभी काशी, कभी चित्रकूट, कभी सोरों वह खुद ही जगह छोड़, नयी जगह जा के बस जाते हैं। 

मुस्लिम शासक (दिल्ली में उस समय अकबर शहंशाह थे) के राज में कुछ जालिम हाकिमों से भी पाला पड़ता है, अयोध्या में राम-नवमी का त्यौहार खुल के मनाने पर प्रतिबन्ध होने का ज़िक्र और डर के माहौल का भी ज़िक्र आता है। 

नागर जी ने आम और छोटे तबके के मुसलामानों के प्रति मानस के हंस के ज़रिये एक (मोटे तौर पर) अमन-पसंद कौम का चित्र पेश किया है। अकबर एक इन्साफ़-पसंद और सभी धर्मों का आदर करने वाले शहंशाह के रूप में दिखाया गया है। कुछ पंडितों द्वारा झूठे मुक़दमे में फंसाये जाने पर काशी का हर तबका तुलसीदास के पक्ष में खड़ा हो जाता है — जिसमें सभी जातियोँ के लोग और ग़रीब मुसलामानों का भी ज़िक्र किया गया है  — विरोध प्रदर्शन होता है, कुछ मार-काट भी। अकबर शांति बहाल करने के लिए अब्दुर्रहीम खानखाना (रहीम) को भेजते हैं। तुलसी से रहीम की मुलाक़ात होती है और रहीम, तुलसीदास को जागीर देने तक का प्रस्ताव  रखते हैं, जिसे विनयपूर्वक तुलसीदास ठुकरा देते हैं। इन सब प्रसंगों में कितनी ऐतिहासिक सच्चाई है, और कितनी नागर जी की कल्पना? उपन्यास खुल के सांप्रदायिक स्वरूप या द्वेष की भावना को कभी हावी नहीं होने देता। लेकिन इन प्रसंगों को पढ़ते हुए एक तरह की बेचैनी महसूस होती है — क्या लेखक कुछ और कहना चाहते थे? क्या वह अपनी आस्थाओं और पूर्वाग्रहों को दबा रहे हैं? (या यह आज के समय में, कुछ भी लिखे गए में बेमतलब के मतलब ढूंढ लेने का श्राप है?)  

तुलसीदास की अपनी काव्य रचनाओं में कहीं भी मंदिर ध्वस्त करने की या उस पर मस्जिद बनाने की बात शायद नहीं आई है, इसलिए बार-बार इस बात का ज़िक्र थोड़ा अटपटा लगता है। 


तुलसी कबीर निर्गुण-निराकार राम द्वन्द

तुलसीदास के सगुण-साकार राम और कबीर के निर्गुण-निराकार राम के बीच का द्वन्द कई जगह आता है, जिसमें तुलसीदास कबीर के गढ़े राम को उस काल-समय की ज़रुरत के रूप में देखते हैं। वह कहते हैं, 

"देश काल के अनुरूप ही धर्म-बोध ढलता है। कबीर साहब ने जिस समय निर्गुण राम का प्रचार किया उस समय कैसा घोर अत्याचार हो रहा था। सारी मूर्तियाँ और मन्दिर ध्वस्त कर दिए गए थे। भद्र समाज कायर बनकर विजेताओं के तलवे चाटने लगा था। और निर्धन-दीन-दुर्बल जन-समाज बेचारा हाहाकार कर उठा था। अनास्था के ऐसे गहन शून्य-भरे भारत रूपी महल के खण्डहर में कबीरदास यदि निर्गुनियाँ राम का दीया न बारते तो आज उसमें भूत ही भूत समा चुके होते।

बात समझाते हुए, आगे यह भी कहते हैं, 

"कबीर साहब को राम-धाम-लाभ हुए सौ-डेढ़ सौ वर्ष बीत गए किन्तु तब से लेकर अब तक वे और उनके पथगामी तीव्र प्रहार करके भी जन-जन के हृदयमन्दिर से रावणहन्ता रामभद्र की मूर्ति भंजित नहीं कर पाए।"

कुल मिला के तुलसी चरित्र के कई पहलुओं पर अपनी नज़र डालता हुआ यह उपन्यास पाठक को बांधे रखता है, लेकिन जगह-जगह ऐसा आभास भी होता है कि आप 1960 के दशक की बनी किसी बम्बइया फिल्म की पटकथा पढ़ रहे हैं, जिसमें हर तरह का मसाला है। मसाला होना अपने आप में कोई कमी नहीं है, लेकिन कहीं-कहीं वह फॉर्मूला के रूप में आता है तो अखरता है।   

तुलसीदास की संगठन प्रतिभा — पूरे काशी को रामायण की रंगभूमि बना देना, सब तबके के लोगों, सभी जातियोँ को उसमें शामिल कर लेना, अखाड़े स्थापित करना, प्लेग महामारी (जिसके लिए नागर जी ने हिंदी के ताऊन शब्द का प्रयोग किया है) से लड़ने के लिए जवानों की फ़ौज  खड़ी कर देना तुलसीदास के चरित्र के बारे में मेरे लिए नई और ज्ञानवर्धक जानकारी रहीं। 

भाषा में अलग अलग बोलियां, और यहां तक की उच्चारण (बांग्ला-भाषी, मराठी भाषी पात्रों का हिंदी उच्चारण) उपन्यास को रोचक भी बनाता है और विनोदी भी।

तुलसीदास की काव्य प्रतिभा, उनके दोहों का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन शायद उतना नहीं जितनी अपेक्षा थी। रामायण के अलावा तुलसीदास रचित अन्य रचनाओं का उल्लेख कम ही आता है। यह निश्चय ही एक कवि की जीवनी पर आधारित उपन्यास की कमी है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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विशाख राठी लगभग ढाई दशकों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े रहे हैं। Headlines Today, CNN-IBN, Star Sports, Star TV जैसे चैनल्स, और नामी प्रोडक्शन हाउसेस में कई साल काम करने के बाद, वो पिछले 2 साल से डॉक्युमेंट्रीज़ और वीडियो फ़िल्में बनाने का काम freelancer के तौर पर कर रहे हैं। साथ ही असल घटनाओं पर आधारित वेब सीरीज़ के लिए रिसर्च का काम भी करते हैं।  पिछले 9 साल से रिहाइश मुंबई में।




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